Latest / Baba ji Vijay Vats / 23/5/26 - किसी को भी Enlightened करना मेरे बायें हाथ का खेल है: मात्र संकल्प भर से! #shaktipaat
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- 0:17नमस्कार बाबूजी, प्लीज़ रिलीज मी फ्रॉम माय कर्मा एंड शो में थे
- 0:29पाठ ओएफ एनलाइटनमेंट। प्लीज़ रिलीव मी फ्रॉम दी
- 0:39ट्रैवलिंग वाइज़ ऑफ फ्लाइट्स एयरप्लेन आई डिमांडेड रॉन्ग
- 0:47थिंग्स फ्रॉम यू। टू बी जज्ड बट आई एम फ्रेंड यू
- 0:57प्लीज़ फॉर्गिव मी फ़ॉर दिस रॉन्ग डिमांड एंड अनलाइक।
- 1:10एक जज विद्या का सवाल है, तुम भी सभी यही मांगते हो, तुम रस नहीं
- 1:32मांगते, तुम पदार्थ मांगते हो। और पदार्थ मांगते हो रस पाने के
- 1:44लिए यही उलटबासी हैं अब यह बिटिया रोज़ रोज़ के जहाजों के चक्कर
- 2:01रोज़ रोज़ के यहाँ से उधर वहाँ से उधर।
- 2:05बाला, ये कोई जंदगानी थोड़ी होती है, दूसरों पर हुक्म चलाने वाला,
- 2:19दूसरों पर अपनी तानाशाही थोकने वाला।
- 2:26वो जज हो या राजा हो या धनपति हो या किसी ऊंची पोस्ट पे, वो शिक्षक
- 2:37हो। व्यक्ति की यही मुड़ता है।
- 2:53वह दूसरों को कमैंड करना चाहता है और उसकी खुद की इंद्रियां उसके
- 3:02कमैंड में नहीं। रोज़ तुम्हारी इन्द्रियां बगावत
- 3:12कर देते हैं, रोज़ तुम्हारी जीवा स्वादिष्ट पदार्थों को खाने के
- 3:20लिए लपलपाती है तुम्हारी इन्द्रियां तक तुम्हारे वर्ष में
- 3:27नहीं। और तुम संसार को अपने वश में करने
- 3:31चले। पूरी दुनिया की यही मोड़ता है और
- 3:47यह मोड़ता दुख में ले जाती है। संत यही रोज़ समझाता है कि
- 4:05इंद्रिया तुम नहीं हो। इंद्रियों से पाया गया सुख तुम तक
- 4:16नहीं पहुंचता। इंद्रियों के द्वारा पाया गया सुख
- 4:32या इंद्र के द्वारा पाया गया सुख इंद्रमान को कहते हैं इंद्रियों
- 4:37का स्वामी इन्द्र यानी मन। जो सुख तुम पाते हो वह इंद्रियों
- 4:47के स्टिमुलेशन से पाते हो या मन के खुशी से पाते हो तुमने कुछ जीत
- 4:59सोंची थी। वह पूरी हो गई।
- 5:04तुम खुशी से नाचने लगे, तुम्हें पता है कि यह खुशी तुम्हारे
- 5:11अस्तित्व तक नहीं पहुंचती। बात गहरी है थोड़ी शांति से सुन।
- 5:24इन्द्रियों से पाएगा सुख या इन्द्रियों के राजा, मन से पाएगा
- 5:31सुख? तुम तक नहीं पहुँचता तुम्हारे
- 5:41दर्द हो रहा है। तो याद रखो दर्द तुम्हें नहीं हो
- 5:48रहा, तुम दर्द से बहुत दूर बैठे, वह दर्द तुम्हें दिखाई पड़ता है
- 5:56उसकी तपश चिंता की तपश सारी रात तुम जागते हो।
- 6:02कल क्या होगा, कैसे बच्चे बनेंगे, क्या इंतजाम करें?
- 6:11इनकी पढ़ाई का ज़माना बहुत आगे चला गया।
- 6:19अब कल ही मुझे कोई कह रहा था ये सर लोग?
- 6:25आप को भटकाने के लिए अटूट प्रयास कर रहे हैं आज क्योंकि इनको एक
- 6:38अभ्रांति हो गई है स्वयं को। कि इंडिया ने एआई को समय पर
- 6:48अडॉप्ट नहीं किया, इसलिए इंडिया भी चढ़ गया।
- 6:58बाकी मुल्क चाइना चढ़ गया। किसी वक्त अमेरिका एक मुल्क था,
- 7:06एक नंबर का। हाँ जी चाइना एक नंबर हो गया, कल
- 7:17बिल गेट्स था, एक नंबर का अमिर परसों कोई और था और आज कोई और है।
- 7:32दौड़ के अंदर प्रथम आना और उसे प्रथम आने की खुशी बनाना, ध्यान
- 7:43रखना तुम तक नहीं पहुंचती ये खुश। बाहर बाहर रह जाती है।
- 7:54जैसे तुम्हारे कपड़ों को कोई रंग है और तुम उन रंगों को देख कर खुश
- 8:02होते रहो लाली। मेरे लाल की लाली मेरे लाल की
- 8:12जिद्द देखूं तित लाल लाली खोजन में गई मैं भी हो गई लाल सारा दिन
- 8:25ये भरोसे चलता है और सारा दिन। तुम इनकी बातों को सुनते हो और ये
- 8:41महा मूड है क्योंकि एक बार आदमी भटक गया।
- 8:51तो फिर वो भटके हुए रास्ते पर ही चलेगा और कितनी दूर निकल जाएगा
- 8:56इसका कोई अंदाज नहीं है। क्योंकि परमात्मा की सृजना का
- 9:01विस्तार अव्यवस्थित असीम है। अनंत है असंख्य तुम कहाँ तक
- 9:12भटकोगे इसका तुम्हें भी कोई अंदाज नहीं बस एक बार भटकने की राह
- 9:24सुनता हूँ मैं इसलिए बोलता हूँ। कटु वचन भी बोलता हूँ आप उसे
- 9:33निंदा समझ लेती हो, नहीं वह आलोचना है, मैं कहता हूँ
- 9:42प्रेमानंद तुम्हें गलत ले जाएगा। यह राधे राधे का जप या राम राम का
- 9:49जप तुम्हें कहीं नहीं पहुंचा था। यू अरे नॉट इन दी राइट पार्ट यह
- 10:03रिश्ता आनंद के रस तक जाता नहीं। आनंद तक जाने वाला रास्ता कोई और
- 10:14है और यह जीतने भी सरल बुद्धि बुद्धि से प्रभावित होती है।
- 10:32बुद्धि बुद्धि से हिप्नोटाइज़ हो जाती है।
- 10:37तुम्हारी बुद्धि कहेगी अरे यह तो बहुत बड़ा जानकार है और तुम उसके
- 10:46पीछे लग जाओगे। बुद्धि बुद्धि से प्रभावित हो गए।
- 11:00तुम्हें प्रोटाइज़ हो जाता है और यह सर रोग तुम्हें रस्सा भटकाने
- 11:14में जितनी बड़ी योगदान देते हैं, कोई और योगदान नहीं देता।
- 11:19ये तो भटक गया। मैं अक्सर कहानी सुनाता हूँ कि
- 11:25किसी व्यक्ति की नाक कट गई थी। नाक कट गई तो बाहर आकर जब जख्म भर
- 11:35गया। बाहर आया तो लोगों ने देखा हंसने
- 11:40लगे वो कहते रहे हंसते क्या कहते शीशे में अपना आईने में अपना मुख
- 11:50देख कहते देखा है? लेकिन मुझे परमात्मा मिला है, नाक
- 11:59कटाने से परमात्मा मिल जाता है, ये मुझे भी नहीं पता था।
- 12:04मुझे भी किसी विशाल गुरु ने बताया है कि राधे राधे झपलो राम राम
- 12:09झपलो पांच से नाम झपलो उस रस की धार तक पहुँच जाओगे।
- 12:18अब गलती से तुम डेरे में चले गए, जब तुम्हारे माँ बाप जाते थे, अगर
- 12:23वो मूड थे, तो क्या तुमने भी मूड होना रस्ता भटका देते हैं और तुम
- 12:37हो जाते हो? हिप्नोटाइज़ तुम नहीं होते
- 12:42तुम्हारा अस्तित्व नहीं होता, तुम्हारा एग्जिस्टेंट नहीं होता
- 12:51हिप्नोटाइज़ तुम्हारी बुद्धि होती है और बुद्धि तो बड़ी है।
- 12:59ये तो छोटी छोटी बात पे मुग्ध हो जाती है।
- 13:05पांच 4 दिन पहले मुझे कहने लगा मोदी जी में बड़ा लाभान्व है,
- 13:15देखो चेहरा। लाल पड़ा है।
- 13:18मैंने कहा मैं तुम्हारा चेहरा अभी लाल कर।
- 13:20देता हूँ। तो बाबा कैसे?
- 13:27मैंने कहा चार झापट मार के उससे भी ज्यादा लाल कर देता हूँ।
- 13:34अगर लाली को देखकर मुक्त हो जाना एक क्वालिफिकेशन है तो तुम गलत
- 13:47रिश्ते पर हो। एक व्यक्ति की बातें सुनकर भी हम
- 13:59एक व्यक्ति को 12 वर्ष तक। गद्दी पर बिठाये रखते हैं और पता
- 14:04नहीं गद्दी पर बैठे व्यक्ति तो हुकुम चलाना चाहता है।
- 14:10वह हुकुम मानना नहीं चाहता और संत कहता है कि जब तक तुम हुकुम चलाओ।
- 14:22तब तक तुम दुखी रहो, जीस दिन तुमने हुक्म मारना सीख लिया
- 14:34ज़िन्दगी में सिर्फ। एक ही चीज़ सीखने दोगे हुक्म
- 14:42मानना सीखो। अगर कुछ सीखना है तो सूचनाओं को
- 14:49संग्रहित करना मत सीखो। विषयों को कंठस्थ करना मत सीखो
- 15:06ईहा ऊहों की बातों को इकट्ठा करके अपनी छाप दूसरों की बुद्धियों पर
- 15:16अंकित करना मत सीखो। अंततः यह है तुम्हें नर्क में जब
- 15:29भी तुम किसी चीज़ की अपेक्षा करते हो आकांक्षा करते हो, मेरे उस तल
- 15:38के लिए तुम्हारी आकांक्षाओं को पूरा करना ज़रा भी मुश्किल है।
- 15:50लेकिन ध्यान रखा मांगने से पहले कहीं तुम ऐसा तो नहीं मांग रहे कि
- 15:58जीतने सुखी तुम आज हो उतने सूखे भी न रह जाओ, कहीं ऐसा तो नहीं
- 16:07मांग रहे हो? यही इस बिटिया का दुखड़ा है।
- 16:14पूरा हो गया जो महंगा मिल गया आई डिमांडेड रॉन्ग थिंग्स फ्रम यू टु
- 16:23बीए जज मैंने जज होने को मांगा। मिल गया।
- 16:31फिर अब दुखी को यही वीद्र की कीमियाँ यही रसायन तुम्हारी
- 16:43मांगें पूरी नहीं होतीं। तो तुम समझते हो कि अगर ये पूरी
- 16:50हो जाए तो हम सुखी हो जाए और तुम्हारी सर लोग तुम्हारी इन
- 16:59अंतकाक्षों को पूरी करने का पूरा प्रयास करते हैं यूपीएससी लड़ो,
- 17:06बन जाओ आय। आइआरएस कमांड करो, लोगों को क्या
- 17:11हो जाएगा? आई डिमांडेड रॉन्ग फ्रॉम यू टू बी
- 17:26जज्ड बट आई एम प्रेइंग यू प्लीज़ फॉर्गिव मी फ़ॉर दिस रॉन्ग
- 17:31डिमांड। एंड एनलाइटन में अंत में तो सुखी
- 17:36ही चाहिए होता है। अंत में वह राशि चाहिए होता है,
- 17:46लेकिन तुम कान को सीधा सीधा नहीं पकड़ते हो।
- 17:52तुम उल्टा करके पकड़ते हो, तुम पदार्थ मांगते हो, तुम गद्दियाँ
- 18:07मांगते हो और उस तट पर जाकर गद्दियाँ मिल तो जाती हैं।
- 18:17लेकिन गद्दियों से जो पाया जाता है वो बेमानी निकलता है उसका कोई
- 18:22अर्थ नहीं निकलता। गद्दियों से दुख पैदा होता है अगर
- 18:28आज हमारे प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मुझे तीन किलो गालियाँ पड़ती
- 18:32हैं। तो बताओ इतने कत्लोगारत करके इतने
- 18:48झूठ कफर तूफान भर के अच्छे थे बचपन में पिता ने भाग मुझकर चाय
- 18:58बेच के थोड़ा सा। गहना बनाया था लेके भाग और बच्चों
- 19:08को मैं कैसे पलूंगा इसी फिक्र और चिंता के भीतर पिता नहीं प्रण
- 19:16क्या ये कहानी है? हमारे प्रधानमंत्री के फिर मन
- 19:29सोचता है कि अगर मैं लोगों पर भूकंप करने लग जाऊं तो सुखी हो
- 19:35जाऊं। तो हुक्म भी करने लग गए।
- 19:43फिर सोचा कि आज एक स्टेट में कल सारे मुल्क को मैं हुक्म करना
- 19:50शुरू कर दूँ। यही तो सब चाहते हैं ट्रंप क्या
- 19:54चाहता है? क्या नहीं है उसके पास?
- 19:59लेकिन दूसरे की थाली में लड्डू बड़ा लगता है।
- 20:03तुम्हें ट्रंप के पास सब कुछ लगेगा, ट्रंप को लगेगा मेरे पास
- 20:07कुछ नहीं वेन्जवाला के मादरो को उठा लो, उसके घरवाली को उठा लो तो
- 20:15मुझे तेल का कुंभ मिल जाएगा। फिर ईरान को जीतू फिर इराक को जीत
- 20:22ही लिया, लेकिन मिल क्या गया? बात फूट का है, बात शील्ड का
- 20:35नहीं। बात यह है कि फल क्या आया, एकता
- 20:40आया या मीठा? कड़वा आया कि मीठा मांगने वालों?
- 21:01मैं तुम्हें हतउत्साहित नहीं कर रहा हूँ, एक छोटी बिटिया की कहानी
- 21:06सुना रहा हूँ जो उसी ने भेजी है। मुझे आज बट और उसी ने मांगा था।
- 21:19तेरी झुलफों से तेरी झलफों से जुदाई कैद, मांगी थी रिहाई तेरी
- 21:56जिल्फों से जुदाई मांगी थी? रिहाई तो नहीं मांगी से तेरी
- 22:24झुलफोंस? मांगते तुम कहती हो चाहते हो रिहा
- 22:32बना। प्रत्येक व्यक्ति की यही दुखड़ा
- 22:36है। तुम मांगते कुछ और हो चाहते कुछ
- 22:42हो, थोड़ी बात गहरी है, शांति से सुनना और समझाना।
- 22:52तुम चाहते हो रस और तुम्हारा ही मन सोचता है कि पदार्थ मांगनू
- 23:00पदार्थों को भोगने से रस मिल जाएगा, यही दुविधा है।
- 23:09तुम चाहते हो रस धरती का कोई भी व्यक्ति एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं
- 23:16और बल्कि एक भी प्राणी ऐसा नहीं जीसको रस नहीं चाहिए, लेकिन भैया
- 23:24मांगता क्या? ज़रा देखो मेरे पास कितने लोग आते
- 23:28हैं। और मैं उनकी तकलीफों को उस अतल पर
- 23:37जाकर ठीक कर सकता हूँ। भलीभाँति जनता मुझे लोग कहते हैं
- 23:48बाबा आप इतना बोलते हो, आपके चमत्कार हमने देखे हैं।
- 23:55शाम मानव क्यों बोलता है? कई चीजें होती नहीं तो बेचारा है,
- 24:00उसने देखी और सारी दुनिया को 8.5 अरब जनता को एक व्यक्ति अगर दर्शन
- 24:10भी देना चाहे, एक एक करके तो नहीं दे पाएगा अपने पूरे जीवन में।
- 24:16तो तुम चमत्कार की बात करते हो एक राम राम करने वाला नास्तिक
- 24:23व्यक्ति मुझे कहने लगा कर्फ्यू के अंदर मैंने कहानी तो बहुत बार
- 24:27सुनाई के सिद्धो मेरे को शराब मंगा दो।
- 24:34और मुझे अच्छी तरह से पता है राम राम करने वाला व्यक्ति शराब मांग
- 24:40ही नहीं सकता। हाथ में माला है।
- 24:44लंबी 1000 वाली और हम इकट्ठे बैठा करते थे।
- 24:53मैंने कहा क्या करोगे, कर्फ्यू लगा है कहाँ से मंगाऊं कहते यहाँ
- 24:59ठेके से तो मंगवाना भी नहीं मैंने कहाँ और कहाँ से मंगाऊं ऊपर वाले
- 25:04ठेके से मंगा दो तो मैं समझ गया बात को।
- 25:11ऐसी बातें कहने वाले लोग बाहर से चाहे दिखावा करें, आस्तिक होने
- 25:18का, लेकिन अंत से वह नास्तिक होता है।
- 25:24अगर अभी तक ऊपर के डर का पता नहीं चला तो फिर राम राम करने से फायदा
- 25:30क्या है? तुम भजन करते किसका हो तुम अरदास
- 25:40करते किस से हो तुम स्मरण करते किसका हो?
- 25:50पर जब तुम्हें पता ही नहीं किसका स्मरण करते हो?
- 25:55तो फिर क्या है? यह बुद्धिमानी है कि बुद्धुपन
- 26:02सारी धरती भरी पड़ी है। ऐसे लोगों से कोई अल्लाह का नाम
- 26:08लेकर खुद को मूर्खा बनाता है। इट्स गार्ड ऑटो हिप्नोटिज्म अपने
- 26:16आप को तुम स्वसंभव सम्मोहित कर दो।
- 26:22ऑटो हिप्नोटाइज़ ऊपर से मंगा दो परमात्मा की सृष्टि में क्या
- 26:32नहीं? और परमात्मा की सृष्टि में
- 26:35परमात्मा क्या नहीं कर सकता? तुम्हारी बुद्धि तो कहेगी कि
- 26:43जर्रा भी खुद बन गया, किसी ने नहीं बनाया बुद्धि तो सदा ही ऐसी
- 26:49भाषा सोचेगी। लेकिन अगर तुमने ये स्वीकार कर
- 26:54लिया कि खुद कुछ बन सकता है, प्रकृति खुद बन सकती है तो
- 27:01परमात्मा खुद क्यों नहीं बन सकता? यहाँ आकर क्यों ब्रेक लगा देते
- 27:05हैं बुद्ध बुध क्यों कहते हैं? कि लॉज आर सुफ्फिसिएंट
- 27:18बुद्धनास्तक है और बुद्ध ईमानदार है जब तुमने एक बात को मान लिया
- 27:31कि कुछ भी। से भम है, स्वयं से पैदा हो सकता
- 27:38है, तो फिर परमात्मा स्वयं से पैदा क्यों नहीं हो सकता?
- 27:46तुम क्यों रुकते हो आकर प्रकृति? और परमात्मा से तो आगे फिर तुम
- 27:53महाप्रमात्मा पे चले जाते हो लेकिन प्रकृति पे क्यों रुक जाते
- 27:58हो, इसकी कोई दलील तुम्हारे पास नहीं और मैं दोनों को बराबर समझता
- 28:10हूँ। वो चाहे बुद्धनास्तिक हो, चाहे
- 28:18कोई ऐसा व्यक्ति हो जो आस्तिक हो, जो कहता हो कि परमात्मा से भम है,
- 28:25दोनों ही चीजें बेकार हैं, जब तक कि उसका दर्शन हो।
- 28:31जो सहभम है प्रकृति तुमने देखी इसलिए तुम प्रकृति पे विश्वास कर
- 28:39लेते हो क्योंकि तुम नगन आँखों से निहारते हो ये चट्टानें ये रेतीली
- 28:47मरुस्थली भूमिया। ये सारा खेल खिलारा यह गुलशन या
- 28:57चलती हुई मदहोश करने वाली हवाएं यह तुम देखते हो, महसूस करते हो
- 29:08इसलिए तुम इसे मान लेते हो। वह तुमने महसूस किया नहीं, इसलिए
- 29:18तुम मानते नहीं, इसलिए मैं इन लोगों को ईमानदार कहता हूँ।
- 29:25ईमानदार जो देखा नहीं, वो माना नहीं।
- 29:30ठीक है ही तुम्हे प्रकृति को देखा, ज़रा ज़रा देखा तो फिर आगे
- 29:38सोचने की जरूरत क्या है? बस खुद से बन गया, लेकिन उनका
- 29:46क्या होगा? जिसने प्रकृति को बनाने वाला देख
- 29:52लिया, जो स्टेम्प लगाती हैं, तुम कहती कागज की लेख और मैं कहता हूँ
- 30:05तो उनका क्या होगा? देर अबेर, जब तुम इस अनुभव की हुई
- 30:16प्रकृति के निचोड़ को पालते हो। कि सृष्टि दुख देती है, जीवन दुख
- 30:30है, बोगों में सुख नहीं है तो फिर तुम उस अज्ञात की खोज में भागते
- 30:39हो। जीसको कबीर कहते हैं मैं कहता हूँ
- 30:45आँखों में देख ब्लूस्टार के भोजन में यहाँ एक ऑपरेशन हुआ था 1984
- 30:56में जबकि हमारे प्राणों से प्यारा अकाल तत्व डाल दिया गया था।
- 31:07आकाश तक से नहीं ढहा था, हमारी आस्थाएं ढह गई थी, हमारे प्राण
- 31:17जैसे किसी ने तोड़ दिया। उस जमाने में पंजाब में करीब एक
- 31:26महीने का कर्फ्यू लगा था। सप्ताह भर में 1 दिन की छुट्टी 2
- 31:34घंटे के लिए राशिम पानी के देने के लिए और हम सब घरों में बंद रहे
- 31:43थे, लेकिन घरों में। हर वक्त बंद रहना बहुत मुश्किल
- 31:48होता है तो चुरासी की बात है 85 में मैं भी तुम्हारी तरह भटका
- 32:02करता था तो हम शाम को। शिवालिक पब्लिक स्कूल की छत के
- 32:14ऊपर रत्न वकील हुआ करते थे। उनका एक स्कूल था बहुत बड़ा मशहूर
- 32:22शिवालिक पब्लिक स्कूल उसकी छत के ऊपर बैठ जाते प्रेमी लोग।
- 32:29हाथों में माला होती राम राम करते नहीं जाने कब से राम राम कर रहा
- 32:37था तुम करोड़ों की बात करते हो। बरसों बरसों तक लगातार चरकड़ी
- 32:48घुमे लेकिन मिला क्या? कुछ नहीं मिला।
- 32:58एनर्जिलसनेस के अलावा शाम को थक जाते हैं, थक हार कर सो जाते हैं।
- 33:06बस ये भी तो एक मजदूरी ही थी। पल्लेदार बाहर डो डो के थक जाता
- 33:13है, हम राम राम करके थक जाते हैं, एनर्जीलेसनेस उसमें भी आती है।
- 33:19एनर्जीलेसनेस हमारे में भी आती है।
- 33:25लेकिन परमात्मा एनर्जी लसने से निमित इसलिए संतों ने कहा सत्य,
- 33:33अहिंसा, अस्त, ब्रह्मचर्य, प्रि ग्रह ये सारी चीजें तुम्हीं शक्ति
- 33:39को खींचती हैं। इकट्ठा।
- 33:50तुम शक्ति को गंवाओ, ब्रह्मचर्य से गंवाओ, खंडन करके या राम राम
- 33:58से गंवाओ उच्चारण करके बात एक ही है।
- 34:04तुम शक्ति को गंवा रहे हो। और फिर शक्ति को गवा रहे हो तो
- 34:12ब्रह्म जैसी जरिया की इच्छा मत रखो।
- 34:18तुम्हारी दुविधा ही यही है सारे संसार तुम चाहती कुछ हो तुम
- 34:27मांगते हो। इस बेटी की करुण गाथा, इसने जो
- 34:37मांगा मैं जज बन जाऊं वो उसे दुख दे रहा है।
- 34:46रोज़ रोज़ जहाजों के चक्कर वही लोग जहाजों के चक्कर काटते हैं
- 34:55जिनको जहाजों का सफर करते हुए मज़ा आता है।
- 34:59अभी मन भरन अभी ना। जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा न अभी
- 35:19ना जाओ छोड़कर। के दिल अभी भरा नहीं अभी ना जाओ
- 35:34छोड़ कर और तब तक तुम चक्कर काटते रहोगे।
- 35:42जब तक इस बिटिया की तरह तुम्हें एरोब्लेन के चक्कर में एक मुसीबत
- 35:49नजर आई। सोने का गहना तब तक भार नहीं लगता
- 36:01जब तक वह भार मालूम नहीं पड़ता। वर्धमान भगवान महावीर को कपड़ा भी
- 36:12बाहर लगने लगा तो उन्होंने वस्त्र भी त्याग कर दिया।
- 36:21नग्न हो गया, बाहर लगा और अभी तुम्हें ये शरीर वार नहीं लगता।
- 36:27क्योंकि इसमें आ सकती है। अभी तो तुम शरीर को मैं माने हो,
- 36:35इससे पहले तुम वस्त्रों को मैं माने थे, अच्छे से परिस करके
- 36:40सेलिब्रिटी नहीं पढ़ने देना है। कभी तुम विचारों को मैं कहते हो
- 36:52विचारों से उलट बोलने वाला तुम्हारा दुश्मन प्रतीत होता है,
- 36:57कभी तुम्हारी भावनाओं को उलट चलने वाला तुम्हें दुश्मन प्रतीत होता
- 37:01है। तुम्हारी मान्यताएँ टूटती हैं।
- 37:10पूरी दुनिया चाहती कुछ और है एक भी झरने जो रस न चाहता हो कोई जीव
- 37:25ऐसा नहीं जो रस नहीं चाहता तो मैं एक बात बोलूं।
- 37:31पत्थर भी रस जाता है, इसलिए पत्थर, रस पानी हेतु जड़ से परम
- 37:39चेतन तक की यात्रा करता है। कुछ तो मजबूरियां नहीं होंगी।
- 37:48यूँही कोई बेवफा नहीं होता, थोड़ी सी तो चेतना पत्थर में भी, पानी
- 37:56में भी, हवा में भी अग्नि में भी आकर्ष में भी होती है थोड़ी सी।
- 38:04और वही चेतना तुम्हे प्रेरित करती है अनंत चेतना होने के लिए और ये
- 38:13छोटी सी प्रेरणा 1 दिन विशालकाय वटवपृक्ष में तब्दील हो जाती है।
- 38:22फिर तो मानस जामिया में आ जाता है।
- 38:28पर मानस जामा तुम्हें उलझा लेता है।
- 38:38कबीर कहते हैं कागज कलम छुओ नहीं ना तो पाठशाला का मुँह देखा ना
- 38:48कलम को छुआ। ना कागीत पर चार अक्षर लिखी,
- 38:56लेकिन कबीर के शब्दों को आज कितने रस पूर्ण गाया जाता है?
- 39:08हंसपयो मानसरो ताल तलीया मन मस्त हुआ फिर क्यों
- 39:40बोल मन मस्त हुआ? हम सपा ओह मानसरो ताल चले या
- 39:57क्यूँ ढोल? अनपढ़ कवि उसके शब्दों पर आज
- 40:19डॉक्टरेट की डिग्री मिलती है। ये शब्द कहाँ से आया है?
- 40:25मुझे पूछ लेते हैं बाबा आप ने ग्रंथ से तो कोई पढ़ा है, ना गीता
- 40:33पढ़ी ना कुरान पुराण बाइबल कुछ भी नहीं पढ़ा ना ग्रंथ फिर इतना
- 40:39ज्ञान कहाँ से आ गया जहाँ से कबीर को?
- 40:48तुम सूचनों को पाने चले हो, बुद्धि सूचनों की फराक में चलती
- 40:57है और किसी को शर्क उलझा लेते है। किसी को पीली दाढ़ी रंगने वाली
- 41:09उलझा लेते हैं और उनके निहेत स्वार्थ सर भी अपने आपको यह लबादा
- 41:21मानता है। यह दाढ़ी पीली काली करने वाला,
- 41:30त्रिपुंड को सजाने वाला, वह जयंतीमाला धारण करके प्रवचन करने
- 41:36वाला भी स्वयं को देह मानता है। मूढ़ताएं दोनों की बराबर है।
- 41:46मूडदाएँ सबकी बराबर होती हैं, लेकिन कुछ लोग हैं जो मैराथन में
- 41:58दौड़ते दौड़ते उस दौड़ से बाहर हो जाते हैं, वो कबीर हो जाते हैं
- 42:06अन्यथा सारा संसार मैराथन की दौड़ में दौड़ ही चला जाता है।
- 42:12कोई एक कोई एक हज़ारों सालों में नरक सप्नी बेनूरी पे रोती है बड़ी
- 42:24मुश्किल से होता है चमन में दीदा वर्ग पैदा।
- 42:40कहाँ से आता है? कबीर तो पढ़ सकते ही नहीं, हम पढ़
- 42:47तो सकते हैं। हमने 251012 जितना पढ़ा पढ़ा तो
- 42:54है लेकिन कबीर तो बिल्कुल हम। फिर इतनी गहरी बातें कहाँ से आ
- 43:01जाती हैं? के उसके एक एक शब्द पे तीसिस होता
- 43:05है कहाँ से आया जी किसी को भी आया वहीं से आया वहीं से आता है सभी
- 43:18को। एक ही सथल है जीसको सर्वज्ञ कहा
- 43:23जाता है, वह सब कुछ जानता है। तुम्हें बाहर के ग्रंथ पढ़ने की
- 43:29ज़रा भी आवश्यकता है। इसी कारण से गुरु गोविंद सिंह
- 43:35कहते हैं। सब सिखन को हुक्म है गुरु मान्यव
- 43:42कृत। यह जो लिखा हुआ है इसमें पढ़ लो,
- 43:50जीवंत गुरु तुम्हें उलझा सकता है। और अपने अंत में चले जाओ, वह
- 43:57सर्वज्ञ बैठा है, जो सच्चा गुरु है तो रामानंद से कबीर सीख लेते
- 44:07हैं राम राम ये बाहर का ग्रंथ हो गया उसका।
- 44:14उतर जाते हैं भीतर उस सर्भज्ञ के ग्रंथ के पास जिसके पास क्या नहीं
- 44:20है। सूचनाएं ही नहीं उसके पास तो
- 44:24अस्तित्व को बनाने का ढंग भी है, वह तो अपने अस्तित्व से।
- 44:34अस्तित्व का खंडीकरण भी कर सकता है।
- 44:36विखंडीकरण भी कर सकता है वह जोड़ भी सकता है।
- 44:42वह दौड़ भी सकता है एको अहम् बहुशामी यह भी कर सकता है बहु तो
- 44:50अहम् एको अहम्। यह भी कर सकता है एक से बहुत हो
- 44:57जाऊं और बहुत से एक हो जाऊं, दोनों ही कर सकता है क्या नहीं कर
- 45:06सकता। सजिया साहिबा क्या कुछ नहीं करते
- 45:27हैं। सजया साहिब क्या कछु नहीं करते,
- 45:45क्या कछु नहीं। करते तुम्हारी बुद्धि गति ऐसा तो
- 45:55नहीं कर सकता, ऐसा तो नहीं कर सकता बस फिर तुम नास्ते को फिर
- 46:05तुमने उस तत्व को जाना नहीं। जो सब कुछ कर सकता है नथिंग इज़
- 46:13इन पॉसिबल पर हैं। तुम जर्रा तक नहीं बना सकते इसलिए
- 46:24तुम ऐसी नैतिकता भरी बातें करते हो?
- 46:30उसके घर क्या नहीं, लेकिन जो तुमने देख लिया तुम वही मानते हो
- 46:38कि बस यही है। उसके घर में थोड़े से ही साल बीते
- 46:45थे जब कोई नहीं मानता था। कि इलेक्ट्रान, प्रोटॉन,
- 46:53न्यूट्रॉन कुछ ऐसा भी होता है जो दिखता नहीं लेकिन होता और चक्कर
- 47:01लगाता है बड़ी तेजी से फिर कहाँ गई तुम्हारी वो फिलॉसोफिकल
- 47:08व्यवस्था? कि जो दिखता है बस वही होता है।
- 47:17तुम्हें पता है दुनिया में सिर्फ 1% से भी कम चीजें दिखती हैं।
- 47:2399% से ज्यादा चीजें नहीं दिखते हैं और तुम 1% को ही।
- 47:32नियम मान लेते 1% अपवाद है, नियम नहीं है।
- 47:41नियम तो ये है जो नहीं दिखता वह सत्य है जो दिखता है।
- 47:50वह असत्य। इसीलिए इसी आधार पर शंकराचार्य ने
- 48:03कहा ब्रह्म सत्यम जो नहीं दिखता वह सत्य जगत मिथ्या, जो दिखता है
- 48:12वह मिथ्या। बस यही आधार था उसका ब्रह्म सत्यम
- 48:20जगत मिथ्या जो नहीं दिखता वह सत्यम और जो दिखता है वह असत्य
- 48:29है। और जब मुझे पहली दफ़े एनलाइटनमेंट
- 48:35की झलक मिली जो ये बिटिया कहती हैं कि नहीं चाहिए मुझे मुझे
- 48:46एनलाइटन करना है। तुम जहाजों पर सैर करने के लिए
- 48:53तरस जाते हो, प्लीज़ रिलीव मी फ्रम दी ट्रैवेलिंग, वायर्स ऑफ
- 49:03फ्लाइट्स, एरोप्लेन मुझे छुटकारा दिलाओ।
- 49:14ये तो बिल्कुल क्रू में पर जैसी बात हो जैसे क्रू में पर कहता है
- 49:20कब जान छूटेगी, कब यह चक्कर पूरा होगा?
- 49:25हम घर पहुँचेंगे, आराम से बैठेंगे और क्रू में पर थक जाता है।
- 49:33जहाज की सफर करता रहता है। ऐसे ही ट्रैवलर भी थक जाता है।
- 49:43अभी तुम पाए नहीं हो गए नहीं हो इसीलिए तुम्हारे मन में अंक
- 49:47अच्छा। मैंने गलत मांग लिया था आई
- 50:01डिमांडेड रॉन्ग, मैंने गलत तमन्ना की थी थिंग्स फ्रम यू टु बी जज्ड।
- 50:12बट आई एम प्लेइंग यू प्लीज़ फॉर्गिव मी कृपया मुझे माफ़ करो
- 50:20फ़ॉर दिस रॉन्ग डिमांड एंड एनलाइटन मी।
- 50:31कहीं पुत्री ऐसा तो नहीं अभी भी जो तुम मांग रही हो वो गलत ही हो।
- 50:42अच्छे से सोच रहा हूँ। मेरे घर किसी चीज़ की कमी नहीं।
- 50:55पर अच्छी तरह से सोच लो, कहीं ऐसा तो नहीं कि अभी भी तुम गलत मांग
- 51:04रही हो? पहले मांगा कि जज हो जाऊं, जहाजों
- 51:10पे घूमो, घूम लिए। अब कहती हूँ थक गई मैंने गलत
- 51:15डिमैंड की थी, अब मुझे एनलाइटन कर दो, क्या अभी भी तुम्हारी डिमैंड
- 51:21सही है? थोड़ा गोर कर दो, कोई बात नहीं
- 51:29एनलाइटनमेंट मेरे बाएं हाथ का खेल।
- 51:35और सच पूछो तुझे हाथ का काम, यह सिर्फ संकल्प से ही हो जाएगा,
- 51:47लेकिन थोड़ा सोचो। क्योंकि उसके बाद फिर कोई और मौका
- 51:55नहीं मिलता। बस वो आखिरी पड़ाव है जहाँ जाकर
- 52:09तुमने जंप ले लिया। वह आखिरी जंप है पॉइंट ऑफ नो
- 52:17रिटर्न। फिर तुम वापस नहीं आ पाओगे देख लो
- 52:25बूंद डिमैंड कर रही है कि मैं सागर होना चाहती हूँ, हो जाओगी
- 52:33क्योंकि सागर ही तो हो। सागर ही से तो बिछड़ जाती है बहुत
- 52:40किसी वक्त और फिर उसकी चाहत सदा लगी रहती है।
- 52:52कितने अच्छे दिन थे वो जब मैं समुद्र के साथ एकमिक होकर आनंद और
- 53:00लुत्फ उठाया करता। और कितने बुरे दिन आ गए जब मैंने
- 53:08सागर का दामन छोड़ दिया, भटकी, दुखी हुई, प्रताड़ित हुई।
- 53:22और फिर जुदा हुई बूँद सागर में ही विलीन हो जाना चाहती है प्रत्येक
- 53:30बूँद तुम सभी बूँदें हो और सभी बूँदें उस समुद्र में जाने के
- 53:37लिए। कल्प रहे हैं।
- 53:42अंतिम तौर पर तुम यहीं पे आ जाओगे डिट्ठे सब मैं थॉम नहीं तो दे जय
- 53:51है जो सुख छंजू दे चुवारे न बलख न बुखार।
- 53:59लेकिन यह तमन्ना आने से पहले तुम्हारी सभी तमन्नाएं तुम्हें
- 54:07दुख देने वाली प्रतीत होनी चाहिए, तुम्हारे अपने अनुभव से,
- 54:13शास्त्रों से नहीं। शास्त्रों में तो लिखा है जीवन
- 54:17दुख है लेकिन बुद्ध के लिए था तुम्हारे लिए नहीं।
- 54:26बुद्ध के लिए जीवन दुख है और बुद्ध का शास्त्र यही बताएगा
- 54:31क्योंकि जो बुद्ध ने मंडा है। तुम्हारे लिए जीवन दुख हो जाएगा
- 54:36तुम ऐसा काम करो इसलिए मैं करता हूँ शास्त्र को फेंक दो, बस
- 54:42शास्त्र से शब्द ले लो, राह ले लो और फिर तुम उस राह पर चल पड़ो।
- 54:50राह क्या है? रहा है।
- 54:54अंतर्मुखी हो जाओ, बहुत बार बोला मैं और बार बार बोलेंगे।
- 54:59अंतिम स्वास्थ्य को बाहर से सारी चपकाहटों की शक्ति जो तुमने झोंक
- 55:07रखी है, इन्सर्ट कर रखी है। उसमें से सारी शक्ति को वापस
- 55:14कहें, चलो नॉन क्लिंगिंगनेस वो शक्ति इकट्ठी हो जाएगी और भीतर
- 55:21जंप कर जाओ। बस इतनी सी तो बात है।
- 55:37ज़रा भी तो मुश्किल नहीं दिल के आईने में थी बस तस्वीरें यार दिल
- 55:49के आईने में थी बस तस्वीरें यार। जब ज़रा गर्दन झुकाए देख ले, यह
- 56:02तो तुमने बेटी बड़ी छोटी सी चीज़ और ज़रा सोच लो क्या तुमने डिमॅंड
- 56:12ठीक किया? अगर डिमैंड ठीक किया तो फिर मेरे
- 56:25लिए ज़रा भी मुश्किल है, लेकिन फिर कहीं ऐसा ना हो, ये भ्रम भी
- 56:36हो जाया करते हैं। कई बार बूंदों को भ्रम हो जाता है
- 56:41कि मैं सागर होना चाहती हूँ। जब सागर होने की कगार पे पहुँचती
- 56:46हैं तो विवेकानंद कह देते हैं। सोम जी मेरे माँ बाप भी हैं, मेरा
- 56:55परिवार भी है, भाई बहन भी हैं। और चिल्ला पड़ता है यहाँ कुछ लोग
- 57:02पहुंचते पहुंचते रह गए चीख मारियों में छोड़ दिया और अगर बस
- 57:10दो क्षण की दे रहे वो चीखते नहीं तो पहुँच जाते।
- 57:17बस इतनी सी दूरी रहेंगी जब जेंटर तिरंगे अपने पूरे वाइब्रेशन से
- 57:28फेंकी जाती है। तो तुम एनलाइटनमेंट के कगार पे
- 57:34चले जाते हो। ऑर यू इन्सर्ट योरसेल्फ कंप्लीटली
- 57:38इन दी शून्य? तुम शून्य में अपने आपको प्रवाहित
- 57:44कर देते हैं। बाहर से डेल्टा रेंज गुरु फेंकता
- 57:53है। साधना में तुम अपनी साधना से
- 57:58डेल्टा रेंज प्रोड्यूस करते हो। बस इतना सफर साधना में साधना से
- 58:09साधक डेल्टा रेंज को प्रोड्यूस करता है।
- 58:14उस डेल्टा रेंज की सहारी शून्य में प्रवेश होकर इनसठ होकर बौद्ध
- 58:20समुद्र में समाकर समुद्र हो जाती। यह साधक की प्रक्रिया है और गुरु
- 58:30की प्रक्रिया। तुम बस तैयार भर हो जाओ, खुद को
- 58:39खोने के लिए तैयार हो जाओ, इस शब्द को आप चक्र में ले।
- 58:53अगर क्षमा के भीतर परवाना अपना वजूद भस्मीभूत करने के लिए तैयार
- 59:01हो गया है तो आ जाओ, लेकिन कहीं ऐसा ना?
- 59:11यहाँ आकर कह दो कि इससे क्या होगा?
- 59:16तो फिर ये प्रश्न ये संडे और तुम्हारा धरा थोड़ा सा संडे
- 59:25तुम्हें सागर में विलीन होने से वंचित कर देगा।
- 59:38संदेहरहित परिस्थिति में इसे ही मैं कहता हूँ कि भूमि को तैयार कर
- 59:43दो, फ्लो कर दो, पानी दे दो, खाद दे दो बीज में डाल दूंगा,
- 59:53प्रस्तुति मैं कर दूंगा। तुम धरती को तैयार करो।
- 1:00:03क्या करें अनुभवों को शब्दों में व्याख्याय करना मुश्किल तो बहुत
- 1:00:09होता है लेकिन करना पड़ता है। करें क्या?
- 1:00:14और कोई चारा नहीं पता है। वह शब्दों में आता नहीं, वह
- 1:00:21शब्दों से बताया जाता नहीं ही कैनट बी एक्सप्लेंट नीदर ही कैनट
- 1:00:26बी एक्सप्लेंट नोर ही कैनट ही कैन बी डेस्क।
- 1:00:33नॉट डेफिनिशन ना उसकी कोई व्याख्या अनुभव की क्या व्याख्या
- 1:00:45होगी, ज़रा बताओ दर्द की व्याख्या तुम कर सकते हो?
- 1:00:52एक छोटे से छोटे अनुभव की व्याख्या नहीं कम कर सकते, लज्जत
- 1:00:57की व्याख्या नहीं कम कर सकते। तुम कह देते हो बड़ी लज्जत का
- 1:01:07डिस्क्राइब डिफाइन दी लज्जत नहीं कर सकोगे।
- 1:01:12एक छोटे से छोटे अनुभव हो। यू कैननॉट डिफाइन नॉट कैन बी
- 1:01:18डिस्क्राइब्ड नॉट कैन बी डिफाइन अनुभव को व्याख्यात नहीं किया जा
- 1:01:29सकता और फिर तुम चाहते ये हो। कि मैं उस पर विराट को शब्दों में
- 1:01:35व्याख्या कर दूँ हौ इट कैन बी पॉसिबल इट इस नेक्स्ट टु
- 1:01:41इम्पॉसिबल लेकिन फिर भी हम बोलते हैं क्या करें?
- 1:01:53तुम्हारे मुरझाए हुए चेहरे देखे, तुम्हारी दर्द से भरी हुई आहें
- 1:02:04तुम्हारे भीतर से आती हुई रुद्रन की वो अवस्था तुम बोलो ना बोलो,
- 1:02:11लेकिन तरंगे तो हम जान ही लेते हैं।
- 1:02:15जब व्यक्ति दरवाजे पे आता है तो मैं समझ जाता हूँ इसको दुख क्या
- 1:02:22है? क्योंकि वह न बोले जो साथ लेके
- 1:02:30आयात रहेंगे वह तो बोलते हैं। तुमने देखा कभी तुमने बहुत दिन तक
- 1:02:36स्नान ना किया हो तो तुम्हारे शरीर में से दुर्गन्ध आना शुरू हो
- 1:02:40जाती है। तुम ना बोलोगे मैं नहीं नहाया
- 1:02:44लेकिन वो दुर्गन्ध बोलती है कि तुम नहीं नहाये ऐसे ही तुम्हारी
- 1:02:50भीतर की रेंज। जो निकली वो बता देती है मुझे
- 1:02:56क्योंकि सात फुट तक तुम्हारी रेंज जाती है कॉमली यहाँ आकर बाजार में
- 1:03:06तुम छः फुट तक रेंज रखते हो, जितना तुम्हारा कद है, यहाँ आकर
- 1:03:1010 गुना बढ़ जाती है। विस्तार हो जाता है।
- 1:03:15उसका ये थोड़ी गहनतम बातें तुम हर बात का जुआ बुद्धि से चाहता हो,
- 1:03:29हर बात का जुआ। और मैं किसी भी बात का जवाब
- 1:03:35बुद्धि से नहीं दे सकता। बड़े मज़े की बात है।
- 1:03:42तुम कोशिश करते हो कि गाड़ी तो चलती है, दो लाइनों के बीच में
- 1:03:51चलती है, लेकिन ज़रा बता तो दो। कि इनके बीच का फासला कैसे कवर
- 1:04:00होगा? मैं कहता हूँ लाइन के ऊपर गाड़ी
- 1:04:06तो चलेगी और जब ये फासला खो गया तो पुत्र फिर गाड़ी नहीं चलेगा।
- 1:04:16जब तुम अड़ जाते हो नहीं, मुझे तो शब्द में ही बताओ तो फिर मैं मौन
- 1:04:22हो जाता हूँ ले बेटा इसे समझने की चेष्टा कर ले।
- 1:04:31अगर तू नहीं चाहता कि पैरेलल एक पूरी पटड़ी एक गाड़ी को चलाती है,
- 1:04:43अगर यह पैरेलल दो स्पेस को खत्म कर दिया जाए, तो गाड़ी नहीं
- 1:04:49छोड़ेगा। सपीश तो रहेगा ही रहेगा और वही
- 1:05:01सपीश तुम्हारे प्रश्नों का कारण बनता है।
- 1:05:07रोज़ ऐसे प्रश्न आते है और ऐसे ऐसे व्यक्तियों के प्रश्न।
- 1:05:17जिनको मेरे चैनल कंट्रोलर उनको किती व अनसबस्क्राइब कर दिया?
- 1:05:31उनको अंगूठा लगा दिया। लेकिन फिर वो प्रश्न लिख देते
- 1:05:36हैं, शराब पी के आ जाते हैं, प्रश्न लिख देते हैं।
- 1:05:48हम कहते हैं किसी और गुरु से पूछ लो, शायद वह शब्दों में व्याख्याय
- 1:05:55कर दे। अच्छी तरह जानते हुए भी कि
- 1:06:01व्याख्यायत नहीं किया जाता वो फिर जब कोई बात युद्ध हो जाए कि हम तो
- 1:06:08शब्दों में ही जानना चाहेंगे तो हम कहते हैं ठीक कोई और गुरु तलाश
- 1:06:13लो। हम तो नहीं बता पाएंगे झूठ हमसे
- 1:06:19बोला नहीं जाता सत्य शब्दों में आता नहीं, फिर करें तो क्या करें?
- 1:06:30फिर तुम्हें ब्लॉक करने के सिवा कोई रास्ता हमारे पास है अभी।
- 1:06:34अब देखिए मैं बोलता बोलता, अध्यात्म को तुम्हारे दुखी,
- 1:06:43तुम्हारे फाउंडेशनल प्रश्न को देखकर मैं राजनीति की तरफ आ गया।
- 1:06:52जब तुमने कहा कि भूखे वजन न होए गोपाल ये तो आपने तो मैंने देखा
- 1:07:05कि ठीक इनकी समस्या से ही लेकिन मेरा जो मुख्य दायित्व है वह मेरे
- 1:07:14भीतर के। कि चुभन है, और चुभन ये है कि
- 1:07:20तुम्हारे लटके हुए चेहरे, गमगीन चेहरे मुझे मेरे भीतर के उस
- 1:07:27दास्तां की बात सुना जो लबालब भरा है।
- 1:07:33आनंद से। और मैं हर भक्तों से पीता हूँ तो
- 1:07:40फिर मैं सोचता हूँ ये भी तो पी सकते हैं।
- 1:07:45इनके भीतर भी तो वही है और इस करुणा के कारण मैंने बोलना शुरू
- 1:07:53किया। राजनीति।
- 1:07:58और जो लोग नए आए थे, उन्होंने मुझे राजनीति में मैंने कहा भाई
- 1:08:07छोड़ो परिणाम है आपको आप कहीं और चले जाओ।
- 1:08:12कहते बाबा पर वोट किसे लोगे? मैंने कहा मुझे तो आवश्यकता नहीं,
- 1:08:18मुझे तुम्हारे होठों की कोई आवश्यकता नहीं।
- 1:08:23मैं इतना परिपूर्ण हूँ कि इसमें एक बूंद और भी समाहित नहीं की जा
- 1:08:28सकती। फिर?
- 1:08:33फिर मैं तो चला था इसलिए। घर से तो हम चले थे खुशी की
- 1:09:06खड़े थे। वो ही साथ हो लिए खुद दिल से दिल
- 1:09:19की बात कही और रो लिए। यूं।
- 1:09:29हस्रदा किधर तुम मूल चीज़ को भूल जाते हो?
- 1:09:40मैंने ये शुरू क्यों किया? तुम आज की स्थिति को देखते हो?
- 1:09:47कि मैं बोल रहा हूँ शायद वोटिंग मांगने के लिए शायद मैं प्राइम
- 1:09:51मिनिस्टर बनना चाहता हूँ और तुम्हारी सोच ठीक है क्योंकि तुम
- 1:09:58दुखी हो फिर तुम्हारा प्रश्न ठीक है।
- 1:10:03कॉकरोच पार्टी की तरह तुम क्यों नहीं?
- 1:10:07और फिर संकल्प क्यों नहीं कर सकते?
- 1:10:12अब मैं तुम्हें किस किस बात का जवाब?
- 1:10:30उनको ये शिकायत है की हम कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं कहते।
- 1:10:49अपनी तुझे आदत तू है के हम अपनी तुझे आदत तू है के हम कुछ नहीं
- 1:11:05कहते। कुछ नहीं कहते उनको ये शिकायत है
- 1:11:20तुमको? शिकायत है कि मैं कुछ नहीं कहता।
- 1:11:24अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते।
- 1:11:29फिर अब कैसे बेड़ पड़े एक भू एक आध्यात्मिक व्यक्ति भौतिकता में
- 1:11:36उतरा और तुमने अपना नजरिया ही बदल लिया?
- 1:11:49नहीं ऐसा। मैं ना तो संकल्प करूँगा ऐसी
- 1:11:58शुद्र बातों के लिए क्या संकल्प करना?
- 1:12:03फिर तो मैं ये कहूंगा रूखी, सुखी खाये के ठंडा पानी।
- 1:12:10दे खबर आई झोंपड़ी मत ललचा बैठी। ये भी मार्ग है तुम चलने वाले
- 1:12:19बनो, रास्ते बहुत हैं। जरूरी चौपड़ी हुई दो खानी, एक
- 1:12:33खालो रूखी, सूखी खालो देवताओं ने सोचा था एक राजकुमार जीसको।
- 1:12:463600 प्रकार के पकवान एक इशारे पे हाजिर हो जाते हैं।
- 1:12:51वह घर से निकला है तो कितने दिन काटेगा?
- 1:12:55बाहर जीसको रसीले पदार्थ दिखाने की लत बढ़ गई।
- 1:13:01वह बाहर मानकर केतिर दिखाएगा। लेकिन उनको बुध के बेहतर का वह
- 1:13:09दर्द नहीं पता था। उसको उस काँटे की चुभन नहीं पता
- 1:13:14था जो बुध को हृदय के पार चली गई। वह काँटा इतना विदीरण कर गया उसके
- 1:13:20हृदय को। के बुध लौट के नहीं आए और देव था
- 1:13:31उन्हें सोचा था उसके पिता ने भी सोचा था चला गया है, कोई बात नहीं
- 1:13:39यहाँ से भगवान कैसे मिलेंगे उसे आज नहीं कल 4 दिन तक कर ऐसा किया
- 1:13:45जाएगा। जब हर घर के आगे जाके मांगेगा और
- 1:13:50तरह तरह की गालियां पड़ेंगी तीन किलो रोज़ की, फिर कैसे पचा
- 1:13:56पायेगा राज़ सिंहासन के सुखद पिल्लों पर आराम करने वाला।
- 1:14:06कैसे वनों की तपस्या को झेल पाएगा?
- 1:14:15यही कौशिल्या कहती है, राम को तू चला तो है पुत्र।
- 1:14:23लेकिन राजसी महलों के ठठ वठ वणो में कहाँ होते हैं?
- 1:14:30बेटा लाडले महलों में रहने वाले। लाडले महलों में रहने वाले कांटों
- 1:14:54की राहों पे यही कुछ तेरे कोमल से फ़ोन।
- 1:15:24कांटे सहन कैसे करेंगे? राजसी भोजन को खाने वाली इकया
- 1:15:33कैसे गुजर बसर गएगी वणों के कंधमूल खाकर?
- 1:15:43फूल पतियां खाकर तुम गुजर बसर कैसे करोगे?
- 1:15:46पुत्र ये कांटों की राहों पर कैसे चलेंगे नरम कोमल पांव तुम्हारे?
- 1:16:01कोमल सी शिया फिर सोने वाले। कोमल सी शिया फिर सोने वाले कोमल
- 1:16:16सी शिया फिर। सोने वाले कांटों की राहों न जा न
- 1:16:32जा। ना ज रे ना ज रे ना।
- 1:16:46ज। यही शुद्धोधन भी सोचा जख मार के आ
- 1:16:53जाएगा। लेकिन जिसका हृदय विदरीण हो जाता
- 1:17:00है, वह लूट कर कब आता है? तो 100 किलो पुत्र यह क्या यह
- 1:17:11काँटा हृदय के? बार छित क्या है?
- 1:17:18इतना हृदय विदीरण है इसे ही मैं कहता हूँ तैयारी, परिपूर्ण भस्म
- 1:17:26होने की तैयारी और देखिए बड़े बड़े शहंशाहे आलम।
- 1:17:33साहस की सहनशाही आलम नरेंद्र जैसे लोग विवेकानंद जैसे लोग कब जाते
- 1:17:41हैं? बड़ा मुश्किल रास्ता है बड़ा
- 1:17:47मुश्किल रास्ता। पुतरी शब्द को सुनो, रहिम न मोम
- 1:17:56सुरंग चढ़ चेलिपो पावक माह रहीम कहते हैं कि जैसे मोम के घोड़े के
- 1:18:04ऊपर सवार हो गए। आग की सुरंग में से जाना होता है
- 1:18:14घोड़ा है मोम का जो आग में पिघल जाता है पानी हो जाता है रही मन
- 1:18:22मोम तुरंग चढ़। रहीम कहते हैं जैसे मोम के घोड़े
- 1:18:28पर चढ़कर जलीबो पावक माँ कहते हैं आँख को जैसे आँख के बीच में चलना
- 1:18:37होता है, प्रेमपंथ ऐसोकचन इतना कठिन है प्रेम का।
- 1:18:45सबको निभत ना? सबको नहीं निभते हैं, बिलकुल
- 1:18:53इंकार नहीं करते रहे क्योंकि रहीम खुद चले हैं सबको निभत ना?
- 1:19:04रहिमन मोम सुरंग चढ़ाएं जलीबो पांव का माह, प्रेम पंथ ऐसे कठिन
- 1:19:16यह प्रेम तक जाना उस एनलाइटनमेंट को प्रेम कहते है यह प्रेम रस से
- 1:19:23भरा। आनंद की छलकन है, उसमें ऐसी आनंद
- 1:19:30की सुगंध है, उसमें ऐसा रस है, किस्से व्याख्यायित करूँ, वह
- 1:19:36शब्दों में आता नहीं। रहिमन मोम तुरंग चढ़े चले वो पा व
- 1:19:43कमाहु ऐस प्रेमपंथ ऐसो कठिन सब को उन्हें बाहतना।
- 1:19:58यह घोड़ा मौन और आग का बैर होता है।
- 1:20:04मौन के घोड़े पर चढ़कर तुम सुरंग को पार करना चाहते हो पर कर पाओगे
- 1:20:16क्या होगा? मम तो पिघल जाएगा और तुमने पूरी
- 1:20:22सरंग को पार कर ले प्रेम की सरंग और फिर तुम जल जाओगे क्योंकि मम
- 1:20:33का घोड़ा तो। फिर तुम जल जाओगे, जल जाओगे, उस
- 1:20:41कुर्बानी की तरह, जो क्षमा के भीतर प्रवेश तो करता है, बाहर
- 1:20:48नहीं आता। पॉइंट ऑफ नो रिटर्न।
- 1:20:57इसलिए मैं कहता हूँ पुत्री कहीं ऐसा तो नहीं अब तो घबरा के ये
- 1:21:03कहते हो कि मर जाएंगे घर मर के भी सहन ना पाया तो किधर जाओ?
- 1:21:15यह अति है जब शूल गहरा हृदय को पार करता है, जैसे बुद्ध के और
- 1:21:27बुध रात को आंधी रात को सोए पड़े अपने 6 दिन के पुत्र को।
- 1:21:34और जिसे वो बहुत प्रेम करते थे और अपने पिता को भी कोई कम प्रेम न
- 1:21:41करते थे और अविदा कह दिया कपिल वास्तु को।
- 1:21:50अरे विदा आज प्यारे वतन चल अलविदा आज प्यार वतन चल दिए छोड़
- 1:22:19के में लगी यही लगन।
- 1:22:45अलविदा आज, प्यारे। बुद्ध को भी कोई कम याद नहीं होगी
- 1:22:55क्योंकि बुद्ध अभी तक अज्ञा नहीं है, लेकिन बड़े साहस की आवश्यकता
- 1:23:02होती है। और ज़रा देखो यहाँ लोग अपनी
- 1:23:07लंगोटी तक नहीं छोड़ पाते। भिक्षुक गुरु से सीख रहा था,
- 1:23:15जितना गुरु को आता था, ईमानदार होते थे।
- 1:23:18गुरु आज की तरह बेईमान नहीं होते थे के डेरे बना लिए नामदान दे
- 1:23:24दिया। राधे राधे जपते रहो ऐसे भाई मान
- 1:23:27लो जितना आता था बता दिया बाकी देखो बेटा मैं इतना ही जानता हूँ
- 1:23:34और हक भी क्या है तुम अगर चार रोटी खाते हो तो पांचवी नहीं कर
- 1:23:41पाओगे, तुम उठ जाते हो। तो इतना जुड़ा हुआ कहाँ सब लेके
- 1:23:47जाओगे भरोसा बल का भी नहीं और सलमान तुम मान इतना ऊंचा करते हो
- 1:23:59कि जैसे मैं गद्दी के साथ सारी उम्र चिपका ही रहूंगा।
- 1:24:05छोड़ दे, बनती नहीं यही प्रश्न तो किया था जनक ने अष्टावक्र से क्या
- 1:24:14कोई है, जो मुझे उस तत्व तक पहुंचा दे जिसे प्रेम कह?
- 1:24:27अष्टावकर कहने से कहा हाँ राजन, तुम इस जन्म में पहुंचने की बात
- 1:24:34करते हो, मैं तुम्हें दो क्षणों में पहुंचा सकता हूँ।
- 1:24:42जैसे घोड़े के इस पायदान पे एक पांव रख के दूसरे पायदान पर
- 1:24:47पहुँचने के लिए जितना वक्त लगता है, मैं तुम्हें इतने ही वक्त में
- 1:24:52पहुंचा सकता हूँ। बड़ा सुन्दर शब्द है क्यों
- 1:24:58क्योंकि तुम्हें हो? कहीं जाना नहीं है।
- 1:25:06जिसे छोड़ के आए वो तुम ही हो तत्व मसीह श्वेत कह दो फिर क्या
- 1:25:17हो गया, दुखी क्यों है? सोई सोई सपना देख रहे बड़ी दूर
- 1:25:30निकल गए इतनी दूर निकल गए के याद आती है सताती है।
- 1:25:39और इसे स्वप्न से छूटना बड़ा मुश्किल हो जाता है।
- 1:25:45ये संस्कार बन जाता है स्वप्न देखना संस्कार बन गया है तुम्हारा
- 1:25:51संस्कारों से छूटना बड़ा मुश्किल हो जाता है।
- 1:25:56तुम जो करते हो उस करने का संस्कार तुम्हारे मन के भीतर तह
- 1:26:03जमाले का और वह तह जमते जमते 1 दिन हेमालय पर्वत बन जाता है,
- 1:26:12लेकिन ध्यान रखना पर्वत चाहे कितना भी हो।
- 1:26:16पल भर में गिराया जा सकता है क्योंकि हीरा भीतर पड़ा है।
- 1:26:20हीरे तुम हिमालय कितना भी ऊँचा, सुमेरु पर्वत कितना ही ऊँचा लेकिन
- 1:26:33वो है। बहुत नाज़ुक वह ऐसा पथरीला नहीं
- 1:26:40जैसा तुम्हारा सुमेरु या तुम्हारा बीमार है, ये तो पाथर का है, यह
- 1:26:46नहीं कराया जाता, लेकिन तुम्हारी थोप नहीं पत्थर नहीं।
- 1:26:53तुम्हारी थोपना ये बड़ी कोमल एक झटका मारोगे घर जा के यही तो हुआ
- 1:27:01सिर पे हाथ रखा रामकृष्णा ने और तुम उस अंत तक पहुँच गए।
- 1:27:12यहाँ देखकर क्या रे इतनी गहरी मैं बचूंगा कैसे के मरूंगा बस अंत समय
- 1:27:21दिखने लग गया और यह अंत समय दिखना बड़ा शुभ है।
- 1:27:27अगर तुमने जाना है प्रेम पंथ तक। और बड़ा अशुभ है।
- 1:27:35अगर तुम अभी संसार में रहना चाहते हो इसलिए मैं कहता हूँ पुत्री
- 1:27:41अच्छी तरह से सोच लो, कहीं तुमने अभी अब भी तो गलत नहीं मान रही।
- 1:27:48मेरे लिए पूरी मुश्किल है। मैं तो देख ही दूंगा, तुम सोचो
- 1:27:58पुनर्विचार करो, पुनर्विचार करो क्या अब की तुमने ठीक मांग लिया।
- 1:28:12अगर ठीक मार दिया तो मैं तो सदा यहीं, पर मैं कहीं जाता मैं कभी
- 1:28:20यहाँ से गया नहीं, बस भ्रांति थी कि मैं गया लेकिन पाया।
- 1:28:28आई ऐम हियर फॉर एवर सदा से मैं यहाँ और सदा तक मैं यहाँ रहूँगा
- 1:28:37आज सच जुगाद सच हेवी सच नानक हो। धन्यवाद।