Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 May 26 - अष्टावक्र ने राजा जनक को मात्र कुछ क्षणों में ब्रह्म दर्शन का क्या मार्ग बताया?
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- 0:08सुदेश कुमार बाबा जी, प्रणव बाबा जी ऋषि अष्टावकर के पत्नी और बाल
- 0:24बच्चों के बारे में। कुष्प्रकाश दल ऋषियों का जीवन
- 0:34कैसा होता है ऋषि अष्टबक्र के महर्षि वधान्या की कन्या सुप्रभा
- 0:50के साथ? शादी हुई थी, तीन बच्चे, दो बेटी
- 1:02हैं, एक बेटा। जब सुप्रभा के पहला प्रसव था
- 1:16तुलसी अष्टावक्र के घर में कोई धन सामान्य, अत्यधिक गरीब थे।
- 1:32इतने गरीब थे के आसपास के लोग कुछ दे जाते थे तो भरणपोषण हो जाता
- 1:40था। रेश्यों का जीवन ऐसा ही होता है।
- 1:53क्योंकि ऋषि अपने शुरू में रहता है, कामकार कम करता है, करता है
- 2:10तो जरूरत के लिए करता है, तो सुप्रभा बोली?
- 2:20हे प्रिया हमारे घर कोई धन तो है ही नहीं।
- 2:29कल को प्रसव के वक्त स्त्रियों को भी कुछ देना होगा।
- 2:37और भी सामान की जरूरत पड़ेगी फिर हम क्या करेंगे?
- 2:47अष्टावक्र बोले हाँ सुप्रभा तुम्हारी बात तो ठीक है लेकिन
- 2:55राजा है ना जनक? उनसे मांग लेंगे।
- 3:02राजा किस लिए होता है, कोई पैन्डामिक आ जाए, कोई जरूरत पड़
- 3:12जाए तो लोग अपने घरों में इकट्ठा नहीं करते।
- 3:18राजा से मांग लेते हैं। राजा के पास सारा कोष होता है।
- 3:22राजकोष कहते हैं उसे जैसे जैसे ज़माना बढ़ता गया, राजा बेईमान
- 3:32होते गए और लोगों ने स्वयं जोड़ना शुरू कर दिया।
- 3:38यहाँ से चलित स्वयं जोड़ने की प्रथा पहले राजकोष में से ले आया
- 3:44करते थे। जीसको जो जो तहेरे जाव, तुम क्यों
- 3:58चिंता करती हो राजा जनक से? जो चाहिए होगा तो अष्टावकर चले
- 4:10हैं। राजा अचानक के पास कुछ धन
- 4:14प्राप्ति कर दिया। और जनक का राजकोष प्रत्येक नागरिक
- 4:23के लिए सदा खुला रहता था। पुरानी व्यवस्था बताता हूँ, जो
- 4:30सटीक थे। आज जो व्यवस्था है वह बेईमान है।
- 4:39एक व्यक्ति अपने लिए जोड़ता जाएगा, जोड़ता जाएगा और जोड़ता
- 4:43जाएगा। शास्त्र जाएगा छोड़ तो सब खुशी ही
- 4:53जाएगा। फिर कहेगा कि मेरे बच्चों के लिए
- 5:02फिर वह उसके बच्चों के लिए ऐसे पीढ़ी घर पर तुम जोड़तें रहते हो।
- 5:12पहले यह व्यवस्था थी, राजकोष के पास सब कुछ होता था।
- 5:19तुम्हें अन्न की जरूरत है, तुम्हें गायों की जरूरत है, दूध
- 5:25की जरूरत है तो राजा से जाके ले आओ अक्सर ऋषि लोक।
- 5:34राजा से जाकर मांग लेते थे गाय को बच्चों के दूध के लिए तो राजा गाय
- 5:43दे देता तो अष्टावक्र चले हैं राजा जनक से धन मांगने के लिए।
- 5:54वहाँ पर शस्त्र हो रहा है ब्राह्मण बैठे हैं बस ब्राह्मण
- 6:05वैसे वेद याद कर लिए उपनिषद याद कर लिए।
- 6:14इन रट्टा मारने वालों को तभी ऋषि ही कहा जाता था।
- 6:23आज भी जो लोग शब्दों का रट्टा मार लेते हैं वो कबले बहुत ही ज्यादा
- 6:27है। उनको ऋषियों की गणना होती है।
- 6:32बड़े चाव से सुनते हैं लोग जबकि ऋषि तो वो है जिसने अपने भीतर उसे
- 6:40क्षेत्र छैया में विश्राम कर दिया है, जिसका दिमाग सूचनाओं से नहीं
- 6:48भरा। वर्ग जिसका ह्रदय प्रेम से भर गया
- 6:52है करूणों से भर गया है अष्टवक्र आठ ही जगह से टेढ़े बैठते हैं
- 7:06अष्टवक्र जब चलते। तो कई पोस्टर बंद होते हैं।
- 7:18शरीर ही टेढ़ा मिला तो राजा के दरबार में जब गया है तो वहाँ कई
- 7:30बैठे हुए ब्राह्मणों ने मृम चर्चा शुरू कर रखी।
- 7:35यानी परमात्मा का व्याख्यान। अगर ऐसा होता है तो फिर ऐसा कैसे
- 7:43होता है? शब्दों में परमात्मा को उस विराट
- 7:47को समझाने की चेष्ठा ऋषि नहीं किया जाता।
- 7:53वर्षी घर नहीं थे राजजनक खुद भी अज्ञानित इसलिए अज्ञानियों की सभा
- 8:02में अक्सर चर्चाएं चलती हैं। अज्ञानियों की सभा में अक्सर
- 8:11कॉम्पिटिशन होता है। तुम उन्हें वेदाचार्य समझ लेते
- 8:21हो? आचार्य समझ लेते हो, उन्हें ज्ञान
- 8:27है सिर्फ शब्दों का। थ्रोटिकल ऋषि वो होता है जो
- 8:36प्रैक्टिकल ज्ञान रखे। यह कोई कहानी नहीं है।
- 8:45गीता कोई कहानी नहीं गीता कोई नॉवेल भी नहीं है।
- 8:52उपन्यास भी नहीं है। मुझे एक व्यक्ति कहने लगा बाबा
- 8:59आपकी जीवनी पड़ी है, इंग्लिश की जीवनी बड़ी प्यारी है बा कमाल
- 9:09बड़ा मज़ा आया। एक रात में सारी जेबनी पड़ती
- 9:16मैंने कर लेकिन कोई बदलाव तो आएगा बदलाव काहे बाबा तुम्हारे चेहरे
- 9:26की रंगत तो खिल? मेरे जीवन से तुमने कुछ सबक लिया
- 9:35तुम्हारे इस जीवन के बाहर भी कुछ जीवन है तुमने ये सीखा मेरे जीवन
- 9:42से नहीं बाबा ये तो नहीं सीखा। लेकिन दट इस वेरी इंटरेस्टिंग
- 9:51इंटरेस्टिंग तो मन के लिए होता है हसन मन का क्या?
- 10:03लेकिन क्या रस की अनुभूति भी हुई पढ़ते वक्त?
- 10:07हाँ बाबा झंझनाट बहुत हुई, शरीर में मन बड़ा खेला।
- 10:15इन अज्ञात की बातों को सुनकर मैंने कहा बस यही थी कीमती बात
- 10:25जीम नहीं पड़ तो सभी लेंगे। लेकिन जीवनी को बढ़कर उस जीवन के
- 10:35पार भी कुछ है जिसने मेरी बुद्धि को चक करा दिया और मैं उसे अज्ञात
- 10:45शक्ति की खोज। सारी कहानी मेरी वायग्राफी में
- 10:51बढ़नी है। मैं मेडिकल का छात्र था, मेरी
- 10:58अपनी कुछ उमागें थीं, कुछ बनना चाहता था लेकिन परमात्मा?
- 11:05कहता था नहीं तुमने होना है तुमने बनना कुछ नहीं और उसने मुझे होने
- 11:13में धकेल दिया। मैं हो गया और बड़ा शुभ हुआ।
- 11:21शुक्र है उसने मुझे बनने नहीं दिया कुछ।
- 11:25न डॉक्टर, न इंजीनियर, न सर्जन। उसने मुझे होने में दखील दिया और
- 11:33मेरा होना बड़ा है। उसमें जो मज़ा है।
- 11:44वो संसार की किसी चीज़ में नहीं मेरी बायोग्राफी सुपर लेकिन
- 11:55बायोग्राफी ऐसे पढ़ो जैसे ये सारी घटनाएं तुम्हारे ऊपर व्यतीत हो
- 12:01रहे हैं। जैसे तुम पिक्चर देखते हो मूवी।
- 12:08तो नायिका के ऊपर या नायक के ऊपर कोई कष्ट आता है तो तुम भी रोते
- 12:12हो और खलनायक के ऊपर कुछ आता है तो तुम हँसते हो, तुम इसे ऐसे
- 12:23पढ़ो। जैसे ये सारी दास्तां तुम्हारे
- 12:29ऊपर गुजर रही है तो फिर तुम्हारा बदलाव शुरू हो जाएगा।
- 12:38अगर मेरी बायोग्राफी तुम्हारे हृदय के भीतर उतर गई।
- 12:43तो फिर एक उपन्यास नहीं रहेगा, ये फिर वास्तव में एक जीवनी हो
- 12:48जाएगी। तुम उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते
- 12:52हो और तुम जीवनी की तरह भी पढ़ सकते हो उपन्यास की तरह पढ़ा तो
- 13:01मनोरंजन होगा। जीवनी की तरह बढ़ा तो परिवर्तन
- 13:05होगा और मैं तुम्हें कहता हूँ इसे पढ़ना, एक जीवनी की तरह पढ़ जैसी
- 13:18ये सारी घटना तुम पर बीत रही। पढ़ने पढ़ने का बड़ा फर्क होगा।
- 13:26इस जीवनी को बढ़कर अगर तुम्हारे जीवन में कुछ बदलने का भाव नहीं
- 13:34आया तो फिर मनोरंजन ही हुआ। बाह के ब्राह्मण अष्टा वक्र को
- 13:43देखकर हँसने लगा, ऊंची गद्दी के ऊपर बैठा जनक जब ब्राह्मणों को
- 13:59हँसते हुए देखा तो उसकी धड़कना टूटे।
- 14:05उन ब्राह्मणों को हंसते हुए देखकर अष्टावकर ठहाका मार के हंसने लगे।
- 14:15राजा जनक ने पूछा ब्रह्मर्षि, तुम क्यों हँसे?
- 14:28अस्थावक के बोला राजन मैं तुम पर हँसा, ये मुझ पर हँसे, ब्राह्मणों
- 14:38की सभा मुझ पर हँसे और मैं तुम पर हँसा।
- 14:45ठहाका मार कर राजन जनक कहने लगे, मुझ पर क्यों से राजन मैं तुम पर
- 14:57हसल यहाँ सा कि यह जो सभा तुमने बढ़ाई।
- 15:05यह ब्राह्मणों की सभा है। हाँ ब्राह्मणों की सभा है।
- 15:11जनक बोले राजन तुम गलती खा गए, यह तो चमारों की सभा है।
- 15:23जनक का चेहरा मुरझा के कोई ज्यादा उम्र के नहीं हैं।
- 15:32अष्टावक चेमारों की सब? ब्रह्म की बातें कर रहे हैं,
- 15:41शास्त्रार्थ कर रहे हैं, परमात्मा का विचार कर रहे हैं, आपसी
- 15:48सूचनाओं का आदान प्रदान कर रहे हैं, अष्टम कर बोला इसीलिए तो
- 15:55हँसा। कि सूचनाएं आदान प्रदान हो रही
- 16:01अनुभव नहीं और ब्राह्मणों की सभा तो होती अगर अनुभव आदान प्रदान
- 16:10होते। तुमने तो ऐसे चमार इकट्ठे कर दिए
- 16:18जो मेरे शरीर का ढांचा देखकर हँसे तो चमड़े की वर्क करने वाला तो
- 16:26चमार ही होता है ना राजा? ब्रह्म की बरख करने वाला ब्राह्मण
- 16:34होता है तो राजन इन्होंने तो चमड़े की परख की।
- 16:40मैं कैसे आठ जगह से टेढ़ा मेढ़ा होकर चलता हूँ तो फिर चमार भी
- 16:45हुआ। ना ब्राह्मण होते।
- 16:52तो अनुभव का आदान प्रदान करते हैं, चमार हैं तो शास्त्रों के
- 16:59शब्दों का आदान प्रदान करें और इनमें से कोई भी जीते बड़ा चमार
- 17:05जीतेगा, छोटा चमार हारेगा। गमगीन हो गए।
- 17:20राजा जनक को प्रथम बार समझा आया कि यह जो मैं चौबीसों घंटे अपने
- 17:27दरबार में ब्रह्मचर्चा। चलने की मूर्खता वाली हूँ।
- 17:34यह वाकई ही ब्रह्म चर्चा नहीं है। यह चमड़े की चर्चा है।
- 17:40यह आवरण की चर्चा है। जैसे डॉक्टर बैठकर बात करें।
- 17:51स्टंभ कहाँ होता है, लिवर कहाँ होता है, पित्त कहाँ होता, फेफड़ा
- 17:56कहाँ होता, हार्ट कहाँ होता, यह चमारों की डॉक्टर चमारों की
- 18:04सभाएं। क्योंकि चमड़े की व्याख्या करता
- 18:09है और ब्राह्मण वह जो चमड़े के भीतर विद्यमान है वह जो रोए रोए
- 18:18में विद्यमान वह जो चेतन है, वह जो इस चमड़े को चेतनता प्रदान
- 18:25करता है। ब्राह्मण उसकी बात करता है।
- 18:33अगर मेरे जीवन में यह ट्रैन का इंसिडेंट न होता तो निश्चित रूप
- 18:44से मैं क्योंकि डाईसेट किया चमड़ी को उधड़ा देखा दिल धड़क रहा था
- 18:58लाखा रंग का बड़ा शानदार दिल। और सारे भीतर के ऑर्गन्स मैंने
- 19:05देखे। लेकिन यह पढ़ाई चमारों की पढ़ाई
- 19:13ब्राह्मणों की पढ़ाई नहीं और वह विराट विश्वरूप चाहता था कि मैं
- 19:21ब्रह्म की। विद्या पूजन।
- 19:27उसने मुझे ब्रह्म से रूबरू करवा दिया।
- 19:32उसकी लीला कुछ और चाहती थी। मेरा दिल कुछ और चाहता था।
- 19:42और अंततः जीत तो उसकी होती है, होता है वही जो मंजूरे खुदा होता
- 19:49है मदई लाख बुरा चाहे भी तो क्या होता है?
- 19:59मैंने डॉक्टर बनने की तमन्ना की थी, मैं बन गया विराट पता चला कि
- 20:13तुम जो बनने जा रहे थे वो संकीर्ण बनने जा रहे थे जबकि वास्तव में
- 20:19तुम विराट हो। तो अष्टमक की ये बात सुन के कि
- 20:30चमारों की सभा इकट्ठी की, उसने तर्क दिया ये चमड़े के पार है।
- 20:40चमड़ा कैसे आठ जगह से टेढ़ा मेढ़ा पोस्चर बदल कर चलता है उस पर
- 20:45हँसे। बातें ब्रह्म की तो फिर आचार्यों
- 20:54को मैं ब्राह्मण कैसे कर दूँ? दूरदराज तक ये अपने।
- 21:04वोकबुलरी को फैला देंगे दक्षता है, लेकिन तुम कितना ही इकट्ठा
- 21:19करता हो अगर तुम्हें रस की एक बूंद न मिले तो तुम तड़पते ही
- 21:31रहो। अगर उस रस की एक मूंग ना मिली और
- 21:39संसार का सारा मटेरियल मिल गया तो तुमने कुछ नहीं पाया।
- 21:51तुम खाली झोली लेकर यहाँ से विदा हो जाओ।
- 22:00तकदीर की मैं कोई बोलूं तकदीर की मैं कोई बोलूं?
- 22:20डाली से बिछड़ा हुआ बोलूं तकदीर की मैं कोई बोलूं?
- 22:36डाली से बिछुड़ा हुआ फूल हूँ 713 नहीं, 713 नहीं।
- 22:55संग दुनिया चले भी तो क्या है? एक।
- 23:04तू ना मिला सारा? संसार तुम कमर।
- 23:14और सारा संसार सारा संसार कमाने निकला है और सारा संसार जोड़ी
- 23:24झाड़ के जाएगा। संत अकेला।
- 23:35जिसने रस का पैदा पी लिया, वहीं झोली भर के जाएगा तो अस्तबकर ठीक
- 23:45है, राजन तो नहीं चमारों के। बुला रखी है ब्राह्मणों के भ्रम
- 23:59तुझे भ्रम है कि यह ब्राह्मण चमड़े की बर्फ़ रखने वाला
- 24:06ब्राह्मण कैसे? ब्राह्मणत्व का अनुभव तो इनमें
- 24:13लैश भी नहीं बात तो चमड़े की और शब्दों की बात चमड़े की ही होती
- 24:22है। ये तुम्हारी सारी किताबें।
- 24:28चमड़ों का ही वर्णन करते हैं, शब्द भी चमड़ों का वर्णन करते
- 24:32हैं, शब्द भ्रम की चर्चा नहीं कर सकते शब्द भ्रम की चर्चा करने में
- 24:43असमर्थ हैं शब्द। चमार है शब्द चमड़ों की व्याख्या
- 24:51कर सकता है यहाँ लग्न है यहाँ हार्ट धड़कता है यह ओरिकल है
- 25:02वेंट्रिकल है। ये ब्लड है, हीमोग्लोबिन है, ये
- 25:08ऑक्सीजन है कार्बन, ये स्मॉल इंट्रेस्ट है।
- 25:13लार्ज इंट्रेस्ट ये है बस ये सारा चमड़ा है, ये चमारों की भाषा इनके
- 25:24भीतर बैठा। वह शीतल आनंद प्रदाता आनंद की महक
- 25:33को बिखेरता हुआ। ब्रह्म किसने जाना तो अष्टवक सही
- 25:44कहता है। जनकुठे कोई चीज़ भीतर लड़ गई सत्य
- 26:00के भीतर इतनी ज्ञान होती है। कि वह पत्थर को भी जीवंत कर दे और
- 26:10तुम्हारे सामने देखो सत्य बोल रहा है इसे झड़ के भीतर बोल रहा है।
- 26:21लेकिन चेतना का पूंज इस जड़ ढांचे को बोलने पे विवश करता है और
- 26:29बोलने की शक्ति देता है और बोलने की चेतना देता है।
- 26:35अगर यह सत्य भीतर न हो, तो चमड़ा कैसे बोलेंगे?
- 26:43यह तो माटी है और माटी ने माटी में मिल जाना पानी पानी में मिल
- 26:55जाएगा आकाश आकाश में मिल जाएगा अग्नि अग्नि में।
- 27:00और वायु, वायु में कौन निकल गया? इसके भीतर से और कौन था?
- 27:09इसके भीतर जब यह बोल रहा था, बस उसे ही भ्रम कहता है।
- 27:19चर्चा भ्रम की हो रही है जनक के दरबार में और हर समय चलती है,
- 27:29अष्टावक्र कहता नहीं, यह चमड़े की चर्चा है ही राजन तुमने चमारों की
- 27:37सभा इकट्ठी कर दी है। तुम्हें भ्रम है कि ये ब्राह्मणों
- 27:42का समूह है, वर्ण है तो ये समूह चमारों का दो शब्द कलेजे के भीतर
- 27:52उतर गए। जनक गद्दी से उठे।
- 27:59और अष्टा व्रत बकर के चरण पकड़ लिया।
- 28:07हे परमपरिष जिसकी तुमने बात की मैं उससे अनभिज्ञ हूँ और आज मुझे
- 28:17थोड़ा समझाया। कि यह जो चर्चा कर रहे हैं, यह भी
- 28:23उस ब्रह्म से अनभिज्ञ है क्योंकि आज मुझे समझ आया कि वह अनुभव
- 28:31व्याख्यात नहीं किया जा सकता। शब्द तो खुद ही मुर्दा है।
- 28:39शब्दों में जान डालने वाला चीर्तन चाहिए और चीतन अनुभव के बिना आसान
- 28:48गहरे शब्द हैं थोड़े से आराम से सुन।
- 28:55क्या तुम मुझे उस ब्रह्म के दर्शन करवा सकते हो?
- 29:03अष्टावकर ने कहा अवश्य, राज़ तुम इस जन्म में मुझे दर्शन करवा
- 29:13दोगे। बस घोड़े की एक पादुका से दूसरी
- 29:23पादुका तक पहुंचने के लिए जितना वक्त जाही राजन, इतने वक्त में
- 29:30मैं तुम्हें ब्रह्म दर्शन करवाता। हैं तो इतने वर्षों तक हमने जखाई
- 29:43ही की अस्त वक्त इतने वक्त तक तुमने जकाई ही की, वरना यह बात तो
- 29:53इतनी है। बस इतनी देर में।
- 30:21यहाँ सूत्र आता है अष्टावक्कर का क्योंकि राजन तुम ही हो और
- 30:32तुम्हें तुम्हारे तक पहुंचने के लिए कोई जन्मों की जरूरत नहीं
- 30:36होती। किसी यात्रा की जरूरत नहीं होती,
- 30:41किसी युक्ति की जरूरत नहीं होती। विज्ञान भैरवतंत्र की 112 गतियों
- 30:46की आवश्यकता नहीं होती। अपनी तक ही तो पहुँचना, फिर किसी
- 30:56विधि। या किसी सीढ़ी या किसी उपाय या
- 31:00किसी वाहन की आवश्यकता कहाँ रह जाती है?
- 31:03राजन प्रथम उसने ब्राह्मणों से कहा तुम जाओ
- 31:22अपने अपने घर बस बात समझ में आ गयी पहले बात समझ में आनी चाहिए।
- 31:37फिर युक्ति भी समझ में आ जाए। पहले तुम्हें ये तो समझ में आना
- 31:46चाहिए कि वह कौन था जिसने इस 7080 किलो के व्यक्ति को तीसरे पायदान
- 31:56से उठा के। गाड़ी के प्लेटफार्म के भीतर औंध
- 32:02हैं, मुंगरा के बाहर कोई नहीं। गाड़ी चल रही है प्लेटफार्म अभी
- 32:10आए नहीं, पीछे कोई है नहीं। तो कौन शक्ति है वो?
- 32:21बस यह प्रश्न अगर भीतर नहीं उपजा, तुम्हें तुम्हारे स्वयं के अनुभव
- 32:27से तुम मेरी वायब्राफी कोई काम ना करे, फिर यह भी एक शास्त्र बन
- 32:33जाए? जहाँ हजारों लाखों शास्त्र भरे
- 32:38पड़े हैं, वहाँ यह भी एक शास्त्र बनकर तुम चिन्ह हो गए।
- 32:43अलमारी में इसका कोई उपयोग ना रहा इसका कोई सहारा ना रहा।
- 32:54काश। तुम्हें बायोग्राफी पढ़कर भीतर से
- 32:59ये बात उठ जाती कि क्या ऐसा होता है?
- 33:06बस ये प्रश्न उठ जाए काफी। बाबा कहते हैं गर्मी आभ कपड़ा
- 33:27वैसे तो ज़रा ज़रा उसकी रहमत है, तुम तो एक ज़रा बना भी नहीं सकते
- 33:35बातें बड़ी ऊंची ऊंची करते हो। उपदेश, बड़े ऊंचे, ऊंचे करते
- 33:43हजारों किताबें, और दसियों 1000 तुम वीडियो जारी कर देते हो और
- 33:50करोड़ों करोड़ों बार लोग तुम्हें सुनते हैं।
- 33:57लेकिन बावजूद इसके किसी के हृदय में वह प्रेम उतरा।
- 34:04नहीं उतरा तो जखाई थी, कोरी, तुमने अब तक कोरी जखाई थी, फिर
- 34:13हिंदुस्तान में कर रहा हूँ? यह वार के किसी मुल्क में कर लो,
- 34:19कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रत्येक व्यक्ति रस की तलाश में
- 34:29चाहिए रस। तुम दाद देते हो उनकी खोपड़ी में
- 34:35शब्द यह एक प्रकार की हिप्नोटिज्म है, सम्मोहन है तुम शब्दों से
- 34:45व्यक्ति को सम्मोहित कर देते हो ठीक है तुम पार हो गए भावसागर।
- 34:54लेकिन इतना सस्ता ये है तुम्हारे शब्दों से दिशा तो मिल सकती है
- 35:08अनुभव है। शब्द बता सकते हैं कि सच्च खंड तो
- 35:17है, लेकिन सच्च खंड में पहुंचना तो तुम्हें होगा शब्द बताएंगे कि
- 35:26स्वर्ग किसी शांति कहीं है, लेकिन मरना तो तुम्हें ही होगा।
- 35:35बिना मरे स्वर्ग पाया कहा जाता है और फिर ये संत शब्दों से खिलवाड़
- 35:44करता बात थी के मरे बिना। सच खंड नहीं पाया जा सकता।
- 35:54इन्होंने बात को डक ये कहते हैं, जब तुम मरोगे, तब हम तुम्हारी
- 36:01अंगुली पकड़ के सच खंड ले जाएंगे। बात बिगाड़ ली, शब्दों का अर्थ का
- 36:07अनर्थ कर दिया। रिशु ने कहा था मृत हो जायेगा
- 36:15मोया बाज न मोया बाज। न मिलदा सजन वे।
- 36:28उस मालिक दा प्यार। मोय।
- 36:35बाज ना मिलदा सजन। बे मरने के बिना वह मिलता नहीं।
- 36:49जैसे तुम अभी हो अपने आप को तुमने अपना होना समझ रखा है, उसे मरना
- 36:59होगा तुम स्वयं को अब क्या समझे हो, शरीफ?
- 37:06अष्टावकर कहते तुम शरीर नहीं हो, तुम्हारी भावनाओं को कोई चोट
- 37:13पहुंचा देता, तुम ₹500,00,00,000 का हरजाना डाल देते हो, क्या तुम
- 37:19भावना ही हो? यही अष्टवकर कहते हैं, भावना ही
- 37:24तुम नहीं। और तुम्हारी शरीर की कीमत भी ₹5
- 37:32छियाने है। करोड़ों का मुआवजा भाव नहीं आहत
- 37:37होंगे। क्या तुम विचार हो नहीं यह तो
- 37:42बुद्धि की पैदाई। विचार भी तो तुम नहीं ना भावना हो
- 37:52ना ये सारा ढांचा हो फिर तुम कौन हो?
- 37:58जिसके कारण से यह सारा ढांचा गतिमान है वह तुम।
- 38:13तुम्हारे पास जैसे बिजली के सारे उपकरण हों, रौशनी देने वाला बल्लभ
- 38:20हो, हैलोजन पंप्स हों पानी को। ऊपर ले जाने वाला।
- 38:26पंप हो। हीटर हो गरमाइश देने वाला, ठंडक
- 38:31देने वाला एयर कंडीशन्ड हो, लेकिन अगर बिजली ना हो तो विद्युत ना हो
- 38:38तो पावर ना हो तो तो सब ढांचा भीका है।
- 38:44उचा ही बल्ब है, चाहे ट्यूब है। चाहे ऐसी है, चाहे हिट है सब
- 38:53बेकार। यह स्टमक यही करता है।
- 39:05तुम जो हो वो अपने आप को जो समझ रहे हो अब।
- 39:15उससे मरना होगा, उसको भूलना होगा और जब तुम नकली नकली का बनना जो
- 39:26आज सोचे हो अपने आपको। वह तुम्हारा मरेगा तो फिर शक्ति
- 39:35का होना उजागर होगा जो तुम वास्तव में हो, इन रियल इन रियल वह प्रकट
- 39:46होगा आखिर तुम हो कौन? किसे कहते हैं?
- 39:53रमन हू आर यू ये जानू नो दाई सेल्फ ये जानू सेल्फ रिमेम्बर,
- 40:02याद करो कि तुम कौन हो? गुरजीत कहते हैं।
- 40:10तुम झट से कह देते हो, हाँ मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ, मैं भावना
- 40:17ही हूँ मैं विचार हूँ गुरजित कहते हैं, यह तो तुम्हारे वस्त्र हैं,
- 40:28यह तो तुम्हारे। लगा दे ये तुम नहीं हो तुमने इन
- 40:35कपड़ों के साथ इतनी चपकाहट बना ली, ये कपड़ों का होना ही
- 40:42तुम्हारा खुद का होना हो गया, यही तुम्हें भ्रम में डालता।
- 40:53तुम इन कपड़ों को ही अपना होना मानने लगे, जबकि यह तुम्हारा होना
- 41:00नहीं है, यह तो जब चाहो तुम बदल लोगे।
- 41:07वासन की जीर्णनयिता विहाय नवानिग्रहण अति नरो प्राणी तथा
- 41:17श्री राणी विहाय जीर्ण अनन्याणी सयति नमानिधि।
- 41:27इस वस्त्र को तुम जब चाहे उतार के मैला हो जाए, कट फट जाए, तुम उतार
- 41:36कर नया वस्त्र पहन लो, लेकिन इसका अर्थ ये तो नहीं कि यह यह कपड़ा
- 41:47तुम से। नहीं कपड़े जो थे वह तो कपडा
- 41:54तुमने उतार दिया तुम इस कपड़े को ओढ़े हुए जो थे वो वास्तव में हो।
- 42:09लगाव के कारण तुमने इस कपड़ों को अपना होना मान लिया।
- 42:16इसे ही मैं रोज़ कहता हूँ क्लिंग हो गए हो तुम?
- 42:22मैं शरीर हूँ भावनाएँ हूँ? विचार हूँ वासनाय हूँ यह संस्कार
- 42:32तुम में गहरा हो गया जन्मो जन्मो से तुम मानती आई कि मैं शरीर और
- 42:41जीस चीज़ को तुम ज्यादा देर तक दोहराओगे।
- 42:47वो तुम्हारे गहरे हृदय के स्थल में बैठ जाएगा।
- 42:54किस झूठ को तुमने सत्य बनाना हो, उसको बार बार रिपीट कर लो, यह मन
- 43:02की आदत है। इसे ऑटो हिप्नोटिस्म कहते हैं,
- 43:09मैं शरीर हूँ, मैं शरीर हूँ, मैं शरीर हूँ, 1 दिन तुम शरीर हो
- 43:15जाओगे, लेकिन झूठे झूठे। बी के के अंदर इसी झूठ का
- 43:25इस्तेमाल होता है। सुबह उठो मेरे जैसा राजकुमार कोई
- 43:33भी नहीं मेरी जैसी राजकुमारी कोई मैं बड़ा भाग्यशाली।
- 43:41इससे दोहराओ 5 मिनट दोहराओ और तुम 1 दिन भाग्यशाली हो जाओगे।
- 43:55मैं सहमत हूँ हो जाओ। लेकिन शाब्दिक रूप से सच में,
- 44:10क्योंकि यह शब्द तुमने इतना गहरा सोच सोच के इतना गहरा दबा दिया
- 44:17फंसा दिया। कि तुम्हारा रोआ रोआ इस शब्द से
- 44:21भर गया तुम्हें क्या इस दोहराने के बाद भी तुम्हारी व्यथा मिट
- 44:31जाती है? तुम्हें दर्द होना बंद हो जाता
- 44:37है। रोज़ की चिंता तुम्हें सताना बंद
- 44:41कर देती है, बस तुम इसे स्वीकार कर लेते हो।
- 44:54दोहराते दोहराते दोहराते। तुम्हारा अन्तः मन यह स्वीकार कर
- 45:02लेता है। जैसे बुध ने स्वीकार कर लिया कि
- 45:09जीवन दुख वैसे ही तुम्हारा मन इसे स्वीकार कर लेता है कि मुझसे
- 45:18ज्यादा भाग्यशाली कोई नहीं। लेकिन ध्यान रखना, स्वीकृति होना
- 45:27एक्जिस्टेंस होना नहीं है स्वीकार करना हो जाना नहीं होता है।
- 45:38तुमने मान लिया कि मैं भाग्यशाली हूँ मान लिया हो नहीं गए।
- 45:48रही मन व दुःख। की चिंता क्यों सताती है?
- 45:57दुख तो अपना साथी। है राही मन वाधु।
- 46:06की चिंता क्यों सताती है? दुख तो अपना साथी है।
- 46:18दुख तो अपना साथी है तुमने मान लिया, एक्सेप्ट कर दुख कहीं नहीं
- 46:25गया, तुमने दुख को स्वीकार कर लिया, लेकिन याद रखना रहे तुम
- 46:32दुखी। जैसे तुमने पीढ़ा को स्वीकार कर
- 46:39लिया, जैसे तुमने विपन्नता को स्वीकार कर लिया कि मैं गरीब हूँ
- 46:46तो ठीक मैं गरीब। ऐसे ही तुमने ये स्वीकार कर लिया
- 46:53कि मैं जैसा भी हूँ, भाग्यशाली हूँ, यह मन की स्वीकृति है, यह
- 47:06एग्ज़िस्टन्स का बदलाव नहीं। यह मनस के तल पर घटित होती हुई
- 47:13घटना यह ट्रांसफॉर्मेशन नहीं और तुम दोनों को एक समय आज बीके वाले
- 47:22अपने आपको बड़ा भाग्यशाली मानते हैं।
- 47:28लेकिन मानस के तलब संतत्व के तल पर एग्जिस्टेंसली तुम भाग्यशाली
- 47:39नहीं हो संत एडजिस्टेंसली भाग्यशाली।
- 47:48वह वास्तव में भाग्यवान हो जाता है क्योंकि भगवान के पास पहुंचता
- 47:53है वह विराट के पास पहुँचकर बराठ हो जाता है।
- 47:58यह बात अलग है कि विराट तुम मानते चले जाओ अपने आप को कि मैं विराट
- 48:05हूँ, मैं विराट हूँ। मैं विराठ हूँ तो शब्दों से तुम
- 48:12व्याट हो जाओगे, जैसे काशी में गंगा किनारे बैठे लोग जाप करते
- 48:18हैं मैं ब्रह्मस्त्र मैं ब्रह्म, मैं शिव हूँ।
- 48:27शिवो हम शिवो हम यह मान लेंगे शिव हो नहीं गए हैं कंगाल हो, लेकिन
- 48:44मान लिया है कि मैं राजा हूँ। मान लेना के मैं राजा हूँ और राजा
- 48:55हो जाना इन दोनों में जमीन आसमान का फर्क है।
- 49:01सटकोरोजिकली यू कैन एक्सेप्ट योरसेल्फ।
- 49:06अफेक्टफुल मनोवैज्ञानिक रूप से तुम अपने आप को खुश नसीब समझ सकते
- 49:15हो, लेकिन एक्जस्टेंसी भी यू विल नॉट बी।
- 49:25अस्तित्वगत रूप से तुम भाग्यशाली नहीं हो, बस दोहराव तुम्हें
- 49:34भटकाता है, राधा राधा करते करते तुम राधा हो नहीं जाता।
- 49:46राधा तो चेतना को कहता है हो तुम मुर्दा तो राधा राधा दोहरानी से
- 49:58तुम्हारी चेतना की प्रगति नहीं होती राधा राधा कहने से।
- 50:05तुम्हारी चेतना कतल तो वही रहेगा, लेकिन राधा हो जाने से तुम्हारी
- 50:13चेतना कतल परिपूर्ण हो जाएगा। सीखाने वालों ने तो यही सिखाया
- 50:19था। कि तुम चेतना हो जाओ, परिपूर्ण
- 50:24100% प्रस्परस चेतना हो जाओ, लेकिन तुमने राधा का जाप करना
- 50:32शुरू कर दिया और ऐसे ही तुम्हें मार्गदर्शक मिल गए।
- 50:42तुम परिपूर्ण चेतना नहीं हुए, क्योंकि जीस दिन तुम परिपूर्ण
- 50:47चेतना हो जाओगे, तुम्हारे चेहरे की नुहार बता दो, तुम्हारे बोलने
- 50:54का डंग बता देगा। तुम्हारे जीने के लक्षण बता
- 50:58देंगे, तुम्हारी वासना ही खत्म हो जाएंगी।
- 51:03फिर कोई भी के बाहर आकर नहीं कहेगी।
- 51:07ये मेरा शोषण हुआ। जिसकी तमन्नाएं नहीं मीटिंग,
- 51:19जिसकी वासनाएं नहीं मीटिंग बना, वह विराट कैसे हो गया?
- 51:28जब कोई व्यक्ति बराट हो जाता है, इस शब्द को ध्यान से समझें।
- 51:34जब कोई व्यक्ति समष्टि में विलीन हो जाता है, जब कोई तुच्छ विराट
- 51:41हो जाता है तो उसकी तुच्छता की सारी लक्षण समाप्त हो जाता है।
- 51:53भोगों का भोगणा तुच्छता का लक्षण विराट का हो जाना, भोगों का त्याग
- 52:02हो जाना तुम्हारे में कोई विकार नहीं आएगा।
- 52:14तुम विराट होना नहीं चाहोगे, अभी तो तुम विराट होना चाहते हो, मैं
- 52:22यूपीएससी क्लियर कर जाऊं, मैं आई ए एस बन जाऊं।
- 52:26मैं सीएम पीएम बन जाऊं। यह विराट होने की आकांक्षा और अगर
- 52:33तुम विराट हो ही गए तो क्या तुम फिर कहोगी कि मैं राजा बन जाऊं?
- 52:40क्या तुम कहोगी कि मैं सीएम पीएम बन जाऊं नहीं क्योंकि विराट हो ही
- 52:47गए? बैराट का हो जाने के लक्षण होते
- 52:54हैं कुछ वो लक्षण भगवान कृष्ण ने बताया जो विराट हो गया उसका मन
- 53:03ठहर गया। तुम्हारा मन तो तुम्हे रात को भी
- 53:09सोने नहीं देता तुम्हारा मन तो तुम रात को भी करवटें बदलते रहते
- 53:17हो। याद में तेरी जग जग के हाँ।
- 53:34रात भर के वक्त बदलते हर घड़ी दिल में।
- 53:49तेरी उल्फत के धीमे धीमे चिराग जलते जब से तुने।
- 54:09निगाह फेरी है, दिल है सोना तो रात देरी है जब से तुने।
- 54:29निगाह फेरी है, दिन है सुना तो रात देरी है, चाँद भी अब।
- 54:47नजर नहीं आता अब सितारे भी। कम निकल थे।
- 55:03याद? में तेरी जाग जाग के हम रात भर कर
- 55:14वक्त। बदलते जब तुम बराट हो ही गए।
- 55:24तो भला दोहराने की आवश्यकता क्या है?
- 55:31जब कोई राजा हो जाता है तो दोहराव छूट जाता है।
- 55:38राजा की गद्दी पर आसीन राजा। क्या कभी कहता है हाथ में माला
- 55:44पकड़े, मैं राजा हूँ, मैं राजा हूँ, मैं राजा हूँ कहता है तू
- 55:52क्यों नहीं कहता क्योंकि वो राजा होगा इसलिए दोहराब छूट जाएगा।
- 56:01जब तुम सच में राजा हो जाओगे यही मैं कहता हूँ सत्य में तुम जो हो
- 56:08वो हो जाओ और कैसे होगे जो असत्य में तुम अब अपने आपको मान लिए हो,
- 56:17उसको मरना होगा। जो ब्लैकबोर्ड पे अभी लिखा हुआ
- 56:23है, वह डस्ट से मिटाना होगा, नई इबारत लिखनी होगी और नई इबारत में
- 56:35प्राणी इबारतों को ढाना हो। नई इमारत को खड़ी करने में प्राणी
- 56:44इमारत के ढांचे गिराने होंगे। अभी तुमने जो स्वयं को कुछ माना
- 56:53वो तुम्हारा मानना गिरेगा। सत्य प्रकट होगा और सत्य प्रकट
- 57:01होने के लक्षण क्या है? जैसे राजा राजा बनकर दोहराना बंद
- 57:09कर देता है मैं राजा हूँ, मैं राजा हूँ, मैं राजा हूँ क्या कभी
- 57:16राजा कहता। उसे पता ही है कि मैं राजा हूँ,
- 57:23ना तो वो दोहराता है कि मैं राजा हूँ, ना वह दूसरों को समझता है कि
- 57:30मैं राजा हूँ क्योंकि वह राजा हो गया है।
- 57:35ये आचार्य लोग लोगों को समझा रहे हैं कि मैं राजा हूँ, तुम मेरी
- 57:43बात सुनते क्यों नहीं और यहाँ वाले नहीं सुनते तो विदेशों में
- 57:48जाके सुना देंगे इसलिए झूठ का प्रचार करना पड़ता है।
- 57:55इसलिए झूठ का प्रसार करना पड़ता है।
- 57:59सत्य का प्रसार नहीं करना होता। सत्य अपने आप में प्रसारित है ही,
- 58:07उसको ऑथेंटिसिटी की आवश्यकता नहीं होती।
- 58:11सत्य को प्रसार की आवश्यकता नहीं होती।
- 58:15सत्य का प्रमाण ही उसका प्रसार जो सत्य में राजा है, वह आपको
- 58:23दोहराते हुए नहीं मिलेगा कि मैं राजा हूँ और अगर अभी कोई व्यक्ति
- 58:30दोहरा रहा है तो समझ लेना यह अभी राजा हुआ।
- 58:36जो दूसरों को विश्वास दिलाने की चेष्टा करता है कि मानो मैं राजा
- 58:40हूँ, मैं भाग्यशाली हूँ दोहराओं इसका मतलब वह भाग्यशाली हुआ।
- 58:53जीस दिन तुम सच में फिटफुल हो गए भाग्यशाली हो गए उस दिन दोहरा बंद
- 59:03हो जाएगा यही कबीर कहते हैं वह अवस्था कैसी होगी?
- 59:12भलो गयो हरी भी सरो सर से टली भलाई, यह तुम्हारा जाप बंद हो
- 59:20जाएगा यह जो हरी हरी कर रहे थे यह बिशर जाएगा माईदा गिर जाएगी हाथ
- 59:30से। पर कबीर कहते हैं, वह वेला बड़ी
- 59:36शुभ वेला होगी, सर से टली बला। यह जाप भी तो एक बला थी, यह बोझा
- 59:45था। भलो भयो हरि सरो सर से टली भला,
- 59:55क्योंकि जब तुम हो ही तो दोहराना क्यों वाह, व्हाई यू अरे
- 1:00:05रेपिकेटेड? रेपुटेशन की आवश्यकता क्या है?
- 1:00:12जब तुम होगी मैं भाग्यशाली हूँ मैं भाग्यशाली हूँ यह बिल्कुल ऐसा
- 1:00:22है काशी के गंगा तीर पर। माला लेकर शिबो हम शिबो हम का जाप
- 1:00:30करना जीस दिन तुम शिव शुभ हो ही गए उस दिन हाथ से माला गिर जाएगी
- 1:00:38और तुम पाओगे कि मैं शिव ही हूँ जीस दिन तुम भाग्य शादी हो गए।
- 1:00:45उस दिन दोहराब बंद हो जाएगा। यह लक्षण जब तक दोहराब जुड़ता है
- 1:00:54समझो तुम भाग्यशाली नहीं हुए। जीस दिन भाग्यशाली वस्तुतः हो गए।
- 1:01:02उस दिन दोहराब मिट जाएगा। मज़ा घर जाएगी जैसे थे तैसे भय
- 1:01:09कहते में भाग्यशाली था ही यही कहते हैं जैसे थे तैसे भय जो था
- 1:01:21में वह हो गया। भूल गया था खुद को अब कुछ कहा न
- 1:01:29जाए। अब कहूं तो क्या कहूं?
- 1:01:32किस्से कहूं लेकिन तुम तो प्रचार करने के लिए शो में निकल जाते हो।
- 1:01:41दूसरों को सम्मोहित करने की आदत हो गई है।
- 1:01:44तुम्हें तुम लोगों को बताना चाहते हो कि मैं भगवान हूँ, मैं बाकी
- 1:01:52शादी हो गया हूँ क्या जरूरत है क्या अभी सूरज ने कहा कि मैं
- 1:01:57सूर्य। क्या कभी चाँद ने कहा कि मैं चाँद
- 1:02:02हूँ क्या कभी गुलाब के फूल ने कहा कि मैं फूल क्या रात की रानी क्या
- 1:02:21गेंदा? क्या चंदन ने कहा कि मैं चंदन हूँ
- 1:02:30नहीं घोषणा करने की कोई जरूरत बाकी ना रही जब वह व्यक्ति फैटफुल
- 1:02:37हो ही गया। और अब एक बड़ा फर्क समझ लो तुम
- 1:02:49दोहराते हो कि मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली व्यक्ति हूँ।
- 1:02:57यह मानसिक स्थल पर होगा। साइकोलॉजी पर और होना है तुमने
- 1:03:07एग्जिस्टेंशियली अस्तित्वगत रूप से भाग्यशाली तुमने होना है
- 1:03:14अस्तित्वगत रूप से एग्ज़िस्टन्शियली।
- 1:03:19हो जाते हो तुम साइकोलॉजिकली यही फर्क है।
- 1:03:25उससे पूछा था किसी बी के के भक्त ने बाबा जी क्या फर्क है?
- 1:03:35भाग्यशाली हूँ मैं भाग्यशाली हूँ मैं भाग्यशाली हूँ, रेपुटेशन करते
- 1:03:40करते तुम्हारे दिमाग की नसों के भीतर ये बात घर कर जाएगी ऑर यू
- 1:03:47विल साइकोलॉजिकली चेंज युअर मैएंड चेंज युअर मैएंड नॉट स्टेट?
- 1:03:55अवस्था नहीं बदलेगी। तुम्हारी ट्रांसफॉर्मेशन विल नॉट
- 1:04:00हैपन साइकोलॉजिकली यू विल बी फैथफुल एक्सिस्टेंटली यू विल नॉट
- 1:04:13बी? फेट फॉर अस्तित्वगत रूप से तुम
- 1:04:20भाग्यशाली नहीं होगे साइकोलॉजिकली मनोवैज्ञानिक रूप से तुम
- 1:04:27भाग्यशाली समझोगे, अपने आप को होगे नहीं यह बड़ा ह्यूज डिफरेंस
- 1:04:32है। और यही गलती तुम खा रहे हो इन
- 1:04:36ठगियों के कारण पैसा इकट्ठा करने का तुम इस धरती को चाहे सारी बीके
- 1:04:43बना लो, सारी राधा स्वामी डेरे बना लो, क्या हो जाएगा?
- 1:04:51धरती तो वही रहेंगी, तुम्हारी लिखी हुई ये बरतें, आज नहीं कल
- 1:04:58मिट जाएंगे रेत के ऊपर लिखे हुए नाम कितनी देर तक ठहरा करते हैं
- 1:05:06आँधियाँ आएंगी, तूफान आएँगे और उड़ा के ले जाएंगे उन नामों को।
- 1:05:12श्रद्धा के लिए नहीं होते। ऐसे ही तुम सब मुल्कों में अपनी
- 1:05:19ब्रांचेस खोल रहे हो, खोल लो कितने धर्म आए, कितने चले गए और
- 1:05:28समय की गर्त में। आंधियों और तूफानों में उनकी
- 1:05:33रेतें बहगिन उनके नाम उजड़ गए। लेकिन एक ना उजड़ा जो वास्तविक
- 1:05:42रूप से था जिसे बाबा कहते हैं, आद सच पहले भी था।
- 1:05:50जुगाड़ सच जोगु पहले हुई थी, है भी सच आज भी सच है, खुशी भी सच
- 1:06:00भविष्य में भी सच रहे, वह नहीं बदला जा सकता।
- 1:06:09तुम्हारे महेल चुबारे यहीं रह जाएंगे सारा तुम्हारे महेल
- 1:06:24चुबारे। यहीं रह जाएंगे सारे तुम्हारे महल
- 1:06:33चौबारे यहीं रह जाएंगे सारे अकड़ किस बात की प्यारे?
- 1:06:44पकड़। किस बात की, प्यारे?
- 1:06:48ये सर फिर भी झुकाना है। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास।
- 1:07:00जाना। ये झूठ मत बोलो कि मैं भाग्यशाली
- 1:07:04हूँ, ये झूठ है मुझसे बड़ा भाग्यशाली कोई भी नहीं नहीं तुम
- 1:07:11अब आगे ही रहोगे दोहरा लेने से कोई भाग्यशाली नहीं।
- 1:07:19अगर दोहरा लेने से कोई भाग्यशाली होता तो बहुत आसान प्रक्रिया थी,
- 1:07:27मिटना होता है, ब्लैकबोर्ड पे लिखा हुआ डस्ट से मिटाना होता है
- 1:07:34और नई इबारत लिखनी होती है। फिर तुम सच में भाग्यशाली हो
- 1:07:39जाओगे फिर तुम अस्तित्वगत भाग्यशाली हो जाओगे अभी तुम
- 1:07:44साइकोलॉजिकल भाग्यशाली हो तुमने मान लिया है तुम हो नहीं और जीस
- 1:07:49दिन तुम हो जाओगे उस दिन तुम्हारे झरे झरे में।
- 1:07:53तुम भाग्यशाली हो वो ज़रा ज़रा बोलेंगे की तुम भाग्यशाली हो
- 1:08:04धन्यवाद आज के प्रवचन का सार असत्य को बार बार दोहराना पड़ता
- 1:08:14है, झूठ को बार बार दोहराना पड़ता है।
- 1:08:20और सत्य को मज़ा लेना होता है। सत्य के अस्तित्व का मज़ा लेना
- 1:08:26होता है। झूठ को बार बार दोहरा कर उन्हें
- 1:08:33पुनः जिंदा करना होता है। इसलिए जो तुम दोहराव कर रहे हो,
- 1:08:38समझो तुम झूठे हो। जब तुम हो गए तो तुम उस अस्तित्व
- 1:08:42को मज़ा दोगे, उस अस्तित्व में झूमोगे नाचोगे खाओगे?