Latest / Baba ji Vijay Vats / 22 Dec 24 - तुम्हें कैसे पता चलेगा कि आनंद अभी तुमसे कितनी दूर है?कब तक मिलेगा तुम्हें आनन्द परम रस?
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- 0:11पंकज कुमार विश्वास, श्रद्धा और अनुभव आपने?
- 0:29तीन बातों का जिक्र किया, थोड़ा विस्तार कर सकोगे इस बात का
- 0:49विश्वास से शुरू करना होता है। श्रद्धा पड़ाव है बीच का और अनुभव
- 1:04मंजिल है। विश्वास से शुरू करो, श्रद्धा तक
- 1:18पहुँचो और श्रद्धा से आगे निकल जाओ अनुभव में।
- 1:31एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात को शुरू करूँगा।
- 1:44एक राजा के प्रदेश में अकाल पड़ गया था।
- 1:50तीन वर्ष तक बारिश नहीं हुई। खाने को एक दाना भी न हुआ।
- 2:00अगले साल भी बारिश न पड़ती तो लोग भूखों मर जाते।
- 2:10जैसे तैसे। अब तक गुज़ारा कर लिया था।
- 2:22विद्वानों को बुलाया गया, गुरुजनों को बुलाया गया।
- 2:26संकटकाल में यही सहारा होते हैं। इन्हें शुद्ध रहना चाहिए।
- 2:41जब हार जाती है, जनता राजा तो सहारा होता है गुरुजनों का, इसलिए
- 2:50सब दूषित हो जाए, गुरुजन दूषित ना हो।
- 2:59तो सब बच जाता है। गुरुजन दूषित हो जाएं तो सब सड़
- 3:10जाता है। गुरुजन ने कहा।
- 3:20हम एक यज्ञ की व्यवस्था करेंगे। उस यज्ञ के अंतिम आहुति के वक्त
- 3:32मूसलाधार बारिश हो जाएगी। राजा हमारा प्रदेश?
- 3:40अकाल से मुक्त हो जाएगा। राजा ने कहा ठीक जल्दी से
- 3:51व्यवस्था करो, मंत्रियों को कह दिया कि सारा सामान जगह सुनिश्चित
- 3:55कर देओ सारे। नागरिक को आदेश दिया कि आपने
- 4:02पहुंचा है वहाँ अच्छा सा मुहूर्त निकाला गया, व्यवस्था हुई सभी
- 4:18लोग। उस शटल पे पहुंचने लगे जहाँ पर जज
- 4:24का आयोजन किया जाना था। रंगबिरंगी वैशाखें।
- 4:37नहाय धोएं के मेकअप वगैरह करके सभी बाल वगैरह संवार के सभी चल
- 4:52रहे हैं। भूखों मर रहे दिखावा जरूरी है एक
- 5:07छोटा बच्चा कहने लगा 8 साल का छोटा बच्चा माँ हमने किधर जाना
- 5:14है? पुत्र यज्ञ का आयोजन किया गया है।
- 5:21यहाँ बारिश नहीं होती फिर कौन करेगा?
- 5:26माँ गुरुदेव करेंगे हाँ तो फिर क्या हो जाएगा?
- 5:32बारिश हो जाएगी। हाँ, बारिश आ जाएगी पुत्र तो माँ
- 5:44अगर बारिश आ जाएगी तो कपड़े तो भीग जाएंगे, मैं नए कपड़े
- 5:52डालूँगा। मेरे पास एक ही जोड़ी सुंदर
- 5:56कपड़ों की है। मैं बिना कपड़ों के नग नहीं
- 6:01जाऊंगा। छोटा बच्चा 8 साल का आने का नहीं।
- 6:07बेटा देखो हम कैसे सज धज के जाते हैं।
- 6:10कहता नहीं माँ जब बारिश आएगी तो। मैंने कोई वस्त्र नहीं पहनना है।
- 6:18चल पड़ा यज्ञ के आयोजन फसल पर बहुत भारी भीड़ थी और वो बच्चा
- 6:34अकेला बच्चा नगन। माँ ने कहा ना लो बच्चा कहता है
- 6:49नहीं हुआ बारिश में न आएँगे बड़ा मज़ा आता है वैसे ही जैसे था, चला
- 7:02बैठ गए या जी का आयोजन हुआ? आखिरी आहुति के वक्त बच्चा लगातार
- 7:10आसमान की तरफ झांक रहा। काले बादल लाएंगे, गरजेंगे,
- 7:17बरसेंगे, हम नहाएंगे और घर जाकर सुंदर कपड़े डालेंगे।
- 7:31यहाँ थोड़ी बात समझ लेना, संकल्प भीतर से अगर आए तो परमात्मा की
- 7:45आवाज हुआ करते हैं। भीतर से संकल्प आना चाहिए।
- 7:55और तुम्हारे भीतर वो करतार बैठा है, सारी सृष्टि का सृजन हारा।
- 8:12वह जो भीतर से कुछ बोलता है उसे संकल्प कहता है।
- 8:19आज मूर्ख पंक्तियों ने दिमाग से सूची हुई बात को संकल्प बार बार
- 8:28दोहराते, वो संकल्प हो जाएगा नहीं वो संकल्प नहीं होगा।
- 8:36संकल्प तुम्हारी करने से नहीं होता, संकल्प भीतर की उपज है।
- 8:41परमात्मा के दर्द से आया करता है संकल्प अब एक बात यहाँ ठहर जाओ,
- 8:47थोड़ा सा आपको बता दू काम आएगी। दुनिया लाख रोके, तुम्हारे
- 8:58शास्त्र लाख रोके तुम्हारे पंडित, पुरोहित, गुरुजन लाख रोकें,
- 9:10मुहूर्त गलत है। मत जाओ लेकिन अगर तुम्हारे
- 9:17तुम्हारे भीतर से ये आवाज आती है कि चले जाओ तो मुहूर्तों को मत
- 9:24देखना, क्योंकि मुहूर्तों की किताबें शास्त्र हैं।
- 9:30और संकल्प की किताब परमात्मा है। संकल्प परमात्मा से आता है।
- 9:37मुहूर्त किताबों से शास्त्रों से आती है और परमात्मा की आवाज़ सत्य
- 9:45है। शस्त्र गलत हो जाएंगे।
- 9:49परमात्मा की आवाज गलत नहीं होती। भीतर से उसके परमात्मा ने बोलना
- 9:56शुरू कर दिया कि बारिश आए हुए हैं, तुम्हारी भी जिंदगी में ऐसे
- 10:02क्षण आते हैं अगर ऐसा कोई क्षण आ जाए।
- 10:08मुझे लोग पूछ लेते हैं बाबा भीतर से आता है कि मुझे ये करना चाहिए
- 10:16लेकिन हमारा मन ये कहता है कि नहीं ये नहीं करना चाहिए तो उस
- 10:21अवस्था में क्या करें? दुविधा में पड़ गए।
- 10:25मैंने कहा भीतर की बात को मानना चाहिए वो आवाज आवाज आए, खलक नकारा
- 10:37आए खुदा वो खुदा का नकारा होता है उसे मत लेना।
- 10:51बशर्ते कि तुम भीतर की आवाज़ को ठीक से परखने से माहिर हो गया हो।
- 10:59कई लोग मन की आवाज़ को परमात्मा की आवाज़ समझ लेते हैं या धोखा
- 11:05खाये जाते हैं। ये आवाज़ तभी आएगी जब तुम्हारा
- 11:10मन। तिरोहित हो जाएगा तो फिर एक ही
- 11:15आवाज़ रहती है वो होती है परमात्मा की।
- 11:19बच्चों में ऐसी आवाज़ आती है 8 साल का बच्चा मन अभी बोलना शुरू
- 11:28नहीं किया था। भीतर से आवाज आई कि बारिश आएगा,
- 11:35नग्न चले जाओ, बारिश में नहाएंगे, कपड़े मत डालो, गीले हो जाएंगे
- 11:44सर्दी का मौसम घोर ठंडी। लेकिन बच्चा बच्चे के भीतर तो ये
- 11:55बात जज गई कि बारिश आई थी और फिर तुमसे कह दूँ।
- 12:06ये संत लोगों की आवाज क्यों पूरी हो जाती है तुमने कभी सोचा नहीं,
- 12:13क्योंकि संत इनोसेंट होता है। जस्ट ट्रैक ए चाइल्ड।
- 12:19उसका मन सुरोहित हो गया होता है और फिर एक ही आवाज रह जाती है वो
- 12:25आवाज। खुदा और खुदा की आवाज कभी गलत
- 12:40नहीं होता है। वह जानता है कब का हुक्म आखिरी
- 12:52आहूति होने को थी। सब खड़े हो गए।
- 12:57अंतिम आहुति डालने के लिए ओम पूर्ण मदह पूर्ण वधम पूर्ण और
- 13:04बच्चा भी खड़ा हो गया। बच्चा बड़ा खुश था।
- 13:10अंतिम आहुति डाली जाएगी, बारिश आ जाएगी और अभी कहीं मेघों का निशान
- 13:14नहीं था। लोग सोच रहे थे कर्मकांड है
- 13:25तुम्हारी इच्छाएं क्यों नहीं पूरी होती?
- 13:28क्योंकि मन इसमें व्यवधान डालता है जब ये मन?
- 13:35पुरोहित हो जाएगा तो फिर जो आवाज भीतर से आएगी वो परमात्मा की आवाज
- 13:44होगी और वह पूरी हो जाएगी। मन खल डालता है इस खल डालने वाले
- 13:53मन को पुरोहित करना। ही तुम्हारा लक्ष्य अंतिम आहुति
- 14:03गिरी। मेघ आए उमड़ घुमड़ के काले मेघ
- 14:13लोगों में प्रसन्नता हुई। पंडितों की गुरुजन की छाती फूलकर
- 14:26गुप्पा हो गए। वह जय जयकार होने लगी।
- 14:34तेज बारिश मूसला हर वर्ष तीन वर्ष से बरसाना था।
- 14:47इतने बारिश हुए। गुरुजन के चरणों में लोटपोट हो
- 14:55गया। राजा भी गिर पड़ा।
- 14:59लोग उतावले थे। कब इस महान पुरुष के चरण स्पर्श
- 15:05कर लिया जाए? एक दूसरे को धक्का मुक्की हो रही
- 15:09थी तभी एक आवाज आई। ऊपर से आकाशवाणी हुई।
- 15:15जैसे एक बिजली से कौंधे जय जकार हो रही थी।
- 15:23गुरुदेव के ऊपर से आवाज आई आकाशवाणी हुई रोको।
- 15:34हमारे गुरुदेव के कारण ये बारिश नहीं हुई और न ही तुम्हारे यज्ञ
- 15:38के कारण। ये बारिश तो एक एक नन्ही फरियाद
- 15:51के कारण। नन्ही संकल्प के कारण हुई सिर्फ
- 16:00एक व्यक्ति के कारण यह बारिश हुई। मैं उस से बड़ा खुश हूँ।
- 16:09सभी रूग गाय गुरु की चाल स्पष्ट करना बंद कर दिया कड़कती हुई
- 16:17बिजली का समान व आवास ये गुरुदेव का कोई चमत्कार नहीं मत छूओ इसके
- 16:30पांव। एक बच्चे के कारण वह जो नग्न हो
- 16:36रहा है उसके कारण में बरसा है एक के कारण।
- 16:55लोगों ने बच्चों की तरफ से नहाया नहीं धोया नहीं सुंदर कपड़े उसकी
- 17:02माता से पूछा तुम्हारा बच्चा है? हाँ ये नहाया नहीं, ऐसे सुंदर
- 17:09कपड़े नहीं डाले। ये।
- 17:13शुरू से ही कह रहा था कि आज बारिश हो के नहाने की क्या जरूरत है।
- 17:19बारिश में नहाएंगे, मूसलाधार बारिश होगी ना?
- 17:24और अगर कपड़े मेरे पास एक जोड़ी ही तो है तो भीग जाएंगे।
- 17:32आके पहनूंगा। नहा के बारिश में आकाशवाणी हुई कि
- 17:43इस बच्चे के कारण इस बच्चे का संकल्प इस बारिश को इन मेघों को
- 17:55बरसने के लिए बाधित करके। और फिर बोल दूँ?
- 18:04संकल्प बुद्धि से नहीं होता, बुद्धि तो अड़चन डालती है, बुद्धि
- 18:12पग पग पर शंकाएँ जताती है। ऐसा कैसे होगा?
- 18:19अब तक अंतिम आहुति बढ़ गई और कोई बादल नहीं गरजा।
- 18:26कोई गन्ने मेघ नहीं उमड़ उमड़ के आये ऐसे कैसे बारिश होगी, कोई
- 18:31हवाएं नहीं चले। बुद्धि बाधा है इसलिए रोज़ कहता
- 18:48हूँ बुद्धि को हटा दो जीसको सुख चाहिए, सच्चा।
- 18:59बुद्धि को परमात्मा के चरणों में रख दे, बुद्धि को जुदा कर दे, अलग
- 19:11कर दे बस फिर जो रह जाएगा वह परमात्मा है।
- 19:26बुद्धि का स्वभाव शंकालू है। यह क्षण क्षण पल पल तुम्हें
- 19:36डराएगी, कंपाइल मेरे पास रोज़ मैसेज जाते हैं, बाबा डर लगता है,
- 19:45बाबा कमपन होता है। बाबा विचार बढ़ जाते हैं तूफानों
- 19:51की तरह और मैं तो बाहर आ जाता हूँ डर के मारे तुम कहते हो भीतर जाओ
- 19:57भीतर से मिलेगा लेकिन भीतर कैसे जाए या डर तो हमें भीतर जाने देता
- 20:06ही नहीं। रोज़ ऐसे ही कमेंट करते हैं,
- 20:13लेकिन मैं कहता हूँ कि भीतर जाने से पहले मृत्यु को स्वीकार कर लो
- 20:20तो भीतर जा पाओगे। मृत्यु से जो घबराया वो भीतर नहीं
- 20:25जा जा पाएगा। मैं पूरा बूढ़न डरा मैं बूढ़ा था
- 20:30बेचारा गयो किनारे बैठ जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी बैठ मैं
- 20:40बेचारा मुँह से डरता रहा, बूढ़ा कांपता रहा, किनारे पे बैठ गया।
- 20:46तुम भी किनारे पे बैठे हो आकांक्षा बड़ी है उस परम्परास को
- 20:52पीने की, कोई नहीं कह सकता कि तुम्हें तड़प नहीं है, तड़प बहुत
- 20:59है, वह रस ऐसा। प्रत्येक का मन लालायित है।
- 21:09अभी पीलू इस रस को लेकिन बुद्धि अड़चन डालती है तो मैं रोक लेती
- 21:21है। जीसको ही चाव हो उस प्रेम रस को
- 21:29पीने का? न मिलन की चा प्रेम मिलन।
- 22:19शेष तलीधर घर विर आ। मुझे तो हेम मिलन के विचार शीश
- 22:51थालीधर कर मेरा। आ शीश तलीधर घर मेरे आ घर मेरे आ
- 23:14ये तो। प्रेम।
- 23:17मिलनों की पहले मृत्यु को स्वीकार करो, फिर भीतर चलने का शुरुआत करो
- 23:30से पहले मौत को स्वीकार करना पड़ता है।
- 23:36मृत्यु को स्वीकार नहीं किया तो बाहर भागना पड़ेगा देखो अगर इतनी
- 23:42हिम्मत है तो इस रास्ते पे चल लो प्रेम रस पियोगे पीने को मिलेगा
- 23:51वो प्याला। जन्म जन्मो से जिसके लिए प्यासे
- 23:55हो, इसे ढूँढ़ते फिरते हो, अगर सिर को काट पे हसेली पे नहीं रख
- 24:07सकते तो फिर इस रास्ते पे मत चलना, ये रास्ता तुम्हारे लिए है।
- 24:22थोड़ी सी बात से तुम्हारा आँकार टूट जाता है और तुम परमज्ञानी बन
- 24:26जाते हो रोज़ मुझे समझाने वाले लोग आ जाते हैं बाबा ऐसा नहीं ऐसा
- 24:31होता है। मैं कह देता हूँ भाई जब तुम जानते
- 24:40ही थे तो फिर मुझे सुनना क्यों तुमने जानते ही थे भाई तो मुझे
- 24:51सुनना ही क्यों? और तुम्हारी मुझे समझाने की सारी
- 24:58चेष्टा व्यर्थ जाएगी, मैं समझने वाला हूँ, मैंने पी लिया।
- 25:07अब समझाने की जरूरत नहीं है और वो पिया ही जाता है, समझा नहीं जाता।
- 25:16समझने की चेष्टा में कितने कितने वीर लूट गए इस महोबत मैंने जाने
- 25:30कितने तबाह हो गए। मोहब्बत के गलत रास्तों पर चलने
- 25:42वाले तबाह हो जाते हैं। मोहब्बत ने मारे जमा, कैसे कैसे?
- 26:01मोहब्बत में मारे जमा कैसे कैसे जमीं खा गई?
- 26:16आसमान कैसे कैसे जमीं खा गई आसमान।
- 26:35कैसे कैसे मोहब्बत ने मारे जमा कैसे कैसे तुम शास्त्र पढ़ के आ
- 26:51जाते हो? दूर ही रहा करो भाई मुझे समझाने
- 27:00की सबसे स्थान व्यर्थ हो जाएगी पर मैं बार बार कहता हूँ 1 दिन आएगा
- 27:10तुम्हारे तथा कथ गुरुओं को। मेरी शरण में आना ही पड़ेगा।
- 27:22यू विल हैव टु सरेंडर वे तुम्हें मेरी शरण लेनी ही होगी, अन्यथा
- 27:28भदकते रहोगे और ज्यादा देर तक व्यक्ति भटक नहीं सकता।
- 27:35तुम अपने स्वभाव से दूर। ज्यादा देर तक नहीं टिक सकते।
- 27:40तुम कितनी देर तक क्रोध कर सकते हो?
- 27:43क्योंकि क्रोध तुम्हारे स्वभाव से परे है।
- 27:48क्रोध में तुम जलते हो, बड़े से बड़ा क्रोध भी 24 घंटे ग्रोध नहीं
- 27:56कर सकता। जल जाएगा उसे वापिस आना पड़ेगा
- 28:02पर्चा क्योंकि क्रोध है तुम्हारा स्वभाव ने और अपने स्वभाव में तुम
- 28:07जन्मो जन्मो तक टिक सकते हो, लेकिन अपने स्वभाव से बाहर।
- 28:15क्रोध हो, काम हो लो हो मो हो अंकार हो इसमें ज्यादा देर तक टिक
- 28:20नहीं सकते ये तो रात बना दी परमात्मा ने, गैप पड़ जाता है रात
- 28:31का और सुबह फिर तुम। उसी जंजा बात में पड़ जाते हो और
- 28:36अगर रात न बनती तो तुम 24 घंटे क्रोध नहीं कर सकते हो।
- 28:42अपने स्वभाव से परे जाना मुश्किल ही नहीं, असंभव है, तुम रहोगे
- 28:51चिल्ला। इसलिए मैंने कहा तुम क्रोध नहीं
- 28:57कर सकते, प्रेम कर सकते हो, प्रेम तो तुम सारी जनदगानियाँ लुटा सकते
- 29:08हो। पर ज़रा भी पश्चात नहीं होगा
- 29:13तुम्हें प्रेम का, लेकिन क्रोध का पश्चात होगा क्योंकि क्रोध
- 29:17तुम्हारा स्वभाव नहीं है, तुम्हारा स्वभाव तो परम जागरूकता
- 29:21है, स्वभाव तो तुम्हारा परम प्रेम है, स्वभाव तो तुम्हारा बड़ा शरण
- 29:28है। करुणा भान हो तुम इसलिए अपने
- 29:32स्वभाव से परे तुम्हारा मन जमता नहीं है।
- 29:39तुम्हें चैन नहीं आता तुम्हें अगर आज चैन नहीं है, कहीं कुछ भी
- 29:44कमाने निकल जाते हो। तो उसका यही कारण है कि तुम
- 29:49स्वभाव से छिट के गए हो, स्वभाव से दूर हट गए हो और मानवता जितनी
- 29:57स्वभाव से ज्यादा दूर निकल जाएगी, उतनी ही ज्यादा दुखी हो जाएगी
- 30:04स्वभाव से दूर निकलना। एक पैमाना है तुम्हारे दुख को
- 30:11मापने का, तुम कितने दुखी हो, बस इस पैमाने से माप लेना कि तुम
- 30:18स्वभाव से कितने दूर हो गए हो। स्वभाव में सदा के लिए तुम रह
- 30:29सकते हो सदा के लिए हो तुम स्वभाव में स्वभाव से बाहर ज्यादा देर
- 30:36तुम टिक न सको खैर तुम्हारी सेकलॉजी की किताबें।
- 30:45तुम्हें सिखाती हैं कि संकल्प बुद्धि से करना होता है बढ़ाना
- 30:50होता है और तुम्हारे दर्शन शास्त्र इस बात को खंगालते हैं
- 30:57सही बातें हैं और मैं तुम्हें कहता हूँ दर्शन शास्त्र की।
- 31:02और मनोविज्ञान की सभी किताबों को जला देना कुछ सीखना है तो जीवन से
- 31:09सीखना और तुम जीवन हो, किताबें मुर्दा किताबों से मत पूछना,
- 31:17किताबें मुर्दा हैं, उनको सर के ऊपर मत ढोना।
- 31:24वो मृदा है, उनसे कुछ मत पूछना, तुम्हारे सवालों का, तुम्हारी
- 31:29अड़चनों का, तुम्हारी गुथियों का, तुम्हारी समस्याओं का समाधान
- 31:33जीवंत ही कर सकता है और जीवंत गुरव होता है।
- 31:40कागज़ के पन्ने गुरु नहीं होते। कागज़ के पन्नों का भार सिर के
- 31:45ऊपर ढोए ढोए तुम मत सरना। श्रद्धा जरूर रखना, न तो मस्त की
- 31:53जरूर होना क्योंकि इन किताबों में।
- 31:58उनश्रेष्ठ व्यक्तियों की वाणी जो कभी हो गुजरे हैं, लेकिन जीवन
- 32:06नहीं है। अगर तुम्हें जीवंत गुरु उपलब्ध न
- 32:12हो तो तुम शास्त्रों का सहारा ले। कोई अगर काल ऐसा आ जाये, परम
- 32:18अंधकार का जीवत गुरु उपलब्ध न हो और जीव जो जीवत गुरु उपलब्ध हो वह
- 32:26नकली हो, बनावटी हो, शरारती हो तो फिर तुम कागजों के पन्ने के गुरु
- 32:34का सहारा ले लेना। लेकिन जब तक जीवंत गुरु उपलब्ध है
- 32:41तब तक इन कागजों के पन्नों को जखाई मत मारना, इसमें जीवन नहीं
- 32:46मिलेगा। जीवन बताता है जीवंत गुरु वह
- 32:52जीवंत मूर्ति। वो जिया है, उसको जीने का अनुभव
- 32:58है। शास्त्र को जीने का अनुभव नहीं
- 33:01कागजों को पढ़ने का जीने का अनुभव कैसे हो सकता है?
- 33:06मंदिर की मूर्तियों को जीने का अनुभव कैसे हो सकता है?
- 33:11तीर्थों को गंगासागर को आज यात्रा को जीने का अनुभव कैसे हो सकता
- 33:17है? कुरान को, बाइबल को, ग्रंथ को,
- 33:20गीता को जीने का अनुभव कैसे हो सकता है?
- 33:23यह कागजी बनने है, इनमें शब्द अंकित हैं।
- 33:29महान पुरुषों को इनका सत्कार तो अवश्य करो, सिर के ऊपर रख लो दो
- 33:35ही मत करो, दोना गलत है, इनके शब्दों को जीने के ढंग है, हृदय
- 33:45में उतारो तो भला यह काम कि? सिर्फ ढोते ढोते तुम थक जाओगे?
- 33:54जीवन भारी मालूम पड़ने लगेगा। संकल्प आता है भीतर से क्योंकि
- 34:07तुम्हारे घट में ही परमात्मा है और घट में उतरना पड़ेगा आज नहीं
- 34:12कल। इसलिए मैंने कहा 1 दिन तुम सब को,
- 34:18तुम्हारे गुरुओं को तुमको तुम्हारे कितने ही बड़े पूजनीय
- 34:24गुरु को ना हो दे वुड हैव टू सरेंडर?
- 34:31उन्हें मुझे समर्पण करना ही होगा। उसके बिना उनकी गति नहीं है, न
- 34:37तुम्हारी, न उनकी सकोलोजी कहती है, दिमाग से सोचो, मनोविज्ञान
- 34:46दोहराते चले जाओ, यह मूर्ख भावना। और अपनी जगह वो ठीक भी हैं
- 34:53क्योंकि उन्हें अनुभव नहीं है और मैं कहता हूँ जिससे जो अनुभव ना
- 34:58हो वो बोलना नहीं चाहिए तो इस मामले में वो सच्चे हैं लेकिन वो
- 35:03अज्ञानी है। सच्चा व्यक्ति हो सकता है,
- 35:09अज्ञानी भी हो सकता है, लेकिन अगर कहीं ज्ञानी सच्चा हो जाए, ज्ञानी
- 35:15सच्चा ही होता है। ज्ञानी झूठ बोल ही नहीं हो सकता
- 35:23तो गोल गुलजार हो जाए। फिर।
- 35:32प्यार का मौसम आ जाए, गलियों ने घूँघट खोले हर फूल पे भंवरा।
- 35:56कलियों ने घूंघट खोल हर फूल पे घबरा ढोल कियारा प्यार का मौसम
- 36:12गोलोगुल। रार का मौसम कलियों ने घोंघट खोले
- 36:24हर फूल पे व। फिर कलियां अपना घूँघट उठा देंगी,
- 36:35हर फूल पे भमरा डब लेगा पर प्यार का मौसम आ जाएगा गुलो गुलजार का
- 36:42मौसम आ जाएगा। लेकिन इस डर को पहले।
- 36:50पहले ही मिटा देना होगा। मैं तुम्हें कहता हूँ, आखिर में
- 36:54भी तो डर ही है तुम्हारे भीतर तुमने बहुत चीजों को दबाया है और
- 37:01जो दबाया है वो मरती नहीं। वह बनी ही हुई हैं, उन्हें
- 37:08स्वीकार करना होगा। इस समृद्धि को स्वीकार जो नहीं
- 37:11करता, वह अपने भीतर नहीं उतर सकता।
- 37:14पहली शर्त है मरना होगा, शीशतली पे डरना होगा फिर यह यात्रा शुरू
- 37:23कर पाओगे। अगर इतनी हिम्मत नहीं तो पैसा कमा
- 37:28लो, पदवी कमा लो, मान सम्मान इकट्ठा कर लो और बहुत सी चीजें
- 37:33हैं काम धाम ताश खेल लो फ़िल्म देख लो, फिर इधर आने की बात ही मत
- 37:42सोचना। या फिर डेरों में निकल जाओ।
- 37:48पांच नाम जगते रहो वक्त बीत जाएगा साइकोलॉजी की बकवास करते रहो
- 38:00दर्शन शास्त्र के। शब्दों को खंगालते रहो, शास्त्र
- 38:09शास्त्र करते रहो, बस तुम जीवन को खो दोगे, सब बचा लोगे, जीवन हाथ
- 38:21से छूट जाएगा और जीवन छूट जाए तो तुम लूट जाते हो।
- 38:25इसलिए तुम लूटे हुए खिलाड़ी तुम सब हार चूके हो सब खो चूके हो तुम
- 38:34हारे हुए खिलाड़ी क्योंकि तुमने जीवन को खो दिया जीवन के साथ जो
- 38:40तार भिड़ते थे वो तारे ही तुमने तोड़ दी।
- 38:45तुम कहीं और डोर यात्रा पे निकल गया, अब तो तुम्हें पता ही नहीं
- 38:53है कि तुम्हें चाहिए क्या तुम कुछ भी इकट्ठा कर लेते हो।
- 39:03तुम धूल में लट्ठ मार रहे हो देखता हूँ तुम्हें कुछ नहीं
- 39:09तुम्हें अपना मंतव्य ही नहीं पता। भृत्य को स्वीकार करने का अगर
- 39:19साहस न हो। दूर ही बने रहना, शास्त्रों में
- 39:27जाख मार देना कम से कम नाम तो होगा सूचनाओं को इकट्ठा कर लेना।
- 39:34शहर लोगों की तरह कम से कम प्रसिद्धि तो मिलेंगे, ख्याति तो
- 39:39मिलेंगे, लेकिन। अपने भीतर जीवन के पास जाने की
- 39:47इच्छा मत पालना नहीं जा सकोगे। उसका प्रथम प्रथम अनिवार्य कदम है
- 39:54मृत्यु को स्वीकार कर लेना। गोरख कहते हैं मरो हे जोगी मरो।
- 40:03मरो मरण है मीठा तुम मृत्य को कड़वा समझते हो, अनुभव कहता है
- 40:12गोरखा कि मरना मीठा है, अब कौन ठीक तुम अज्ञानी ठीक?
- 40:21या गौरख ज्ञानी ठीक मरो है जो भी मरो मरो मरण है मीठा ऐसी मरणी मरो
- 40:31जीस मरणी मर गो रख टीठा मेरे पास बहुत से कमेंट आते में कोई जवाब
- 40:39नहीं देता। बस यही जवाब है उन लोगों के लिए
- 40:43कुछ भी होता है हार्ट बीट 200 हो जाती है हो जाने दो तुम नहीं
- 40:49मरोगे पक्का मैं अनुभव से बात करता हूँ शस्त्र को।
- 41:00तो मैंने फूंक दिया है, जला दिए हैं शास्त्र उनकी राख को गंगा में
- 41:06बहा दिया है मैंने शास्त्र की बात मेरे से उम्मीद मत करना मेरे पास
- 41:13संभव ही है सिर्फ। अगर शीश तली पर धरने का साहस न हो
- 41:28तो कायरों के लिए ये रास्ता है ही नहीं।
- 41:37तुम्हारे लिए ताश खेल लो। फ़िल्म देख लो, व्यापार कर लो।
- 41:43पैसा जुटा लो, धन के अंबार लगा दो, मान सम्मान ले लो प्राइम
- 41:48मिनिस्टर चीफ मिनिस्टर हो जाओ, तानाशाह बन जाओ, लोगों के मुख्य
- 41:58ग्रास छीन लो, भूखे तड़पा दो। तुम्हारे लिए ये काम बचते हैं बस
- 42:06ये किया जाओ उस आनंद और रस में डूबने की बात तो कभी स्वप्न में
- 42:15भी मात्र सोंचना वहा जाने के लिए। एक सबसे पहले अनिवार्य कदम है
- 42:24मरना होगा अन्यथा इस अभिलाषा को त्याग दो तो मैंने कहा संकल्प
- 42:37भीतर से आता है। और भीतर जाने की तैयारी करने के
- 42:40लिए सबसे पहले मृत्यु को स्वीकार करना होता है।
- 42:45नहीं स्वीकार कर सकते कुछ और कर लो, संकल्प आएगा भीतर से तुम्हारा
- 42:55अंत का परमात्मा बोलेंगे, यह कर लो।
- 42:59वो कर लेना तुम्हारा शास्त्र लाख कहे के शुभ घड़ी नहीं है,
- 43:17दूसरा बोले हो जाओ। मासूम हो जाओ तुम चालाक और
- 43:32तुम्हारी चालाकी जैसे तुम्हारा क्रोध तुम्हें जला देता है,
- 43:38तुम्हारा काम तुम्हें शक्तिहीन कर देता है।
- 43:46काम से आनंद की एक झलक देखना तो सो गया है, लेकिन काम से ही आनंद
- 43:54की झलक देखते रहना वो रखता है। और भी राहतें हैं बसल की राहत के
- 44:04सिवाय इससे बड़ी भी आनंद की अवस्थाएं और भी राहतें हैं बसल की
- 44:17राहत के समाह और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा इससे बहुत
- 44:27बड़े बड़े सुख पूरे शराब से नशे की मंजिल देख लेना।
- 44:41ये जो कहते हैं डेरे वारे शराब मत पीओ, मैं नहीं कहता मैं कहता हूँ
- 44:47जरूर पीओ, एक बार देखो इसका स्वाद क्या होता है उससे?
- 44:54तुम्हें बड़े सुख को ढूंढने में सफलता मिलेंगे।
- 44:58चिंतना उधर जाएगी, एक बार पी के देख लेनी चाहिए, लेकिन एक बार
- 45:05एडजेक्शन में अगर रोकते हैं तो इसलिए रोकते हैं कि तुम एक बार
- 45:14पीने के बाद रुकते नहीं, फिर बड़ी मंजिल की तरफ।
- 45:18पावते हैं फिर उसी के अडिक्ट हो जाते हैं, बस सहारा मिलके तो
- 45:30पतंजलि कहते हैं, महावीर बुद्ध कहते हैं ब्रह्मचर्य जरूरी है
- 45:36लेकिन काम से उसकी झलक लेना अशोभ नहीं है।
- 45:42सो गया झलक तो लोग है ना किस्से तो काम से झलक मिल जाएगी आनंद के
- 45:52मद से शराब से झलक मिल जाएगी स्थिरता के शो से हीनता के ठहर
- 46:02जाते हो शराब पीकर तुम्हें। ठहराव का पता चलेगा, फिर तुम परम
- 46:12ठहराव में जाने के खोज करने निकल पड़ो तो इन विचारों का उपयोग कर
- 46:19लेना चाहिए अवश्य। लेकिन इसके एडिक्टेड नहीं होने
- 46:26चाहिए। बस यही है कि मियाँ जो तुम्हें
- 46:29समझनी हो, ये विकार भी तुम्हें कुछ समझाने के लिए आते हैं।
- 46:36मासूम हो जाओ बाबा कहते हैं शह से शरण 5,00,000 हो गए।
- 46:46तुम सिर्फ रटते रहते हो, तुमने ये नहीं सोचा बाबा कहते क्या है रोज़
- 46:53सयानप करते हो और रोज़ तुम ये बात दोहराते हो से सयानप लाखों में ते
- 46:59कना। और सिर्फ बाबा नाथ ने के सभी ने
- 47:05कहा है इस बात को हिस्सा कहते हैं।
- 47:09ओनली दे विल एंटर इन मैं गार्ड्स किंगडम हू विल बी इनोसेंट जस्ट
- 47:14लाइक ए चाइल्ड बच्चे के समान। इनोसेंट हो जाओ, मासूम हो जाओ,
- 47:25बोले बन जाओ और गुगु बन जाओ, मुझसे कोई पूछता है ना बाबा 4:00
- 47:31बजे तक तुम दीक्षा क्यों नहीं देते?
- 47:36मैंने कहा 4:00 बजे तक मैं गुगु होता हूँ।
- 47:47उसके बाद थोड़ी थोड़ी तुम मासूम बन जाओ, मासूमियत से मिलता है
- 48:02खुलते हैं, द्वार उसके मासूमियत जरो का है मासूमियत द्वार।
- 48:11और ईशा ने भी कहा और सभी ने कहा छोड़ दो तुम्हारी स्यानपों को और
- 48:21स्यानपों से तुम जो इकट्ठा कर पाओगे, कूड़ा है और कूड़े को तो
- 48:28कितना ही ढूढो। ना कूड़ा खत्म होगा, ना तुम्हारी
- 48:37आकांक्षा मटेगी एक छोटा बच्चा, सात 8 साल का बच्चा, मासूम, गरीब।
- 48:51बाप मर गया, बचपन में माँ बेटा दो ही रह गए।
- 49:00किसी तरह घर गुजर चल रहा है। माता बीमार हो गई।
- 49:07दवा बूटी जलानी होती तो बच्चा साथ चला जाता।
- 49:14माता किसी रोग से पीड़ित हो गई तो बच्चा चला गया।
- 49:25हॉस्पिटल में माता के साथ। बच्चा अब इतना समझदार नहीं है,
- 49:32बोला मासूम है इनोसेंट डॉक्टर ने बहुत इलाज किया।
- 49:47आखिर में उसकी माता के पास विधवा थी।
- 49:49बेचारी आसपास के घरों के काम करके बर्तन वगैरह पांच गए।
- 49:58कुछ खाने पीने का राशन वगैरह ले आती।
- 50:00अपने बच्चे को पालती गुजर बसर चलता रहा।
- 50:06ज़िन्दगी बीतती रही, 1 दिन ज्यादा बीमार हो गई।
- 50:13डॉक्टर ने अस्पताल में अडमिट कर लिया, घर कोई था तो नहीं, बस
- 50:17बच्चा उसके पास था, कोई पानी धानी, कोई दवा बेटी सामने से
- 50:23लानी। लेकिन बीमार ज्यादा हो गए है।
- 50:38डॉक्टर की समस्या से बाहर आ गया। इसकी सर्जरी करनी हो गयी।
- 50:44ऑपरेट करना होगा। तो उस विध्व औरत ने कहा कि डॉक्टर
- 50:50साहब मेरे पास तो मेरा पति नहीं है और पैसा पैसा है नहीं तो
- 51:07डॉक्टर भोला देवी। हम तो खो दिया हम लाजुम हैं इस
- 51:14हॉस्पिटल का मालिक कोई और है क्षमा करना हम जितना कर सकते थे
- 51:20हमने कर दिया। अब हमारी समझ से बाहर पैसा बहुत
- 51:26लगेगा। तो डॉक्टर उस विधवा औरत को कहने
- 51:43लगा, देवी अब तो भगवान ही तुम्हें बचा सकते हैं।
- 51:52बच्चा सुन रहा था। भगवान से कहो वो ठीक करते थे
- 52:02डॉक्टर ने कहा हो चरा के बच्चा सुन रहा था जल्दी से बाहर निकल
- 52:07गया उसकी मांऊ से खर्चे के लिए 10 पैसे रोज़ देती थी, खर्च लेता था,
- 52:16सस्ता ज़माना था। बाहर चला गया, दुकान पे गया,
- 52:30दुकानदार से कहा अंकल। यहाँ आपके भगवान मिल जाएंगे, वो
- 52:43करें, गौर तक गौर से जगह भगवान मिल जाएंगे।
- 52:48हाँ, मेरे पास 10 पैसे भी हैं। तो दुकानदार ने खा बच्चे भगवान तो
- 53:02सामने मंदिर में मिल गए बाबा मंदिर में चला गया पुजारी बैठे थे
- 53:13बाबा। 10 पैसे ले लो, भगवान दे दो।
- 53:26पुजारी ने कहा 10 पैसे में भगवान क्यों?
- 53:33ज्यादा महंगा होता है तो मैं कोई बात नहीं मेरी माता अभी बीमार है
- 53:40ठीक हो जाएगी मुझे 10 पैसे रोज़ देती है मैं रोज़ चुकाता रहूँगा
- 53:45तुम मुझे भगवान दे दो एक बार यहाँ देखो कितने भगवान बड़े हैं?
- 53:54बाल सुलभ हृदय से बोल रहा है मैं तुम्हें रोज़ 10 पैसे चुकाता
- 54:01रहूँगा मैं तुम्हारा कर्ज उधार दूंगा मुझे भगवान दे दो, कोई भी
- 54:06दे दो यहाँ तो देखो कितने पड़े। बाल सुलभ की बात का जवाब बड़े से
- 54:19बड़ा पुजारी नहीं दे सकता। बाल सुलभ का जवाब सिर्फ ज्ञानी दे
- 54:24सकता है, सिर्फ ज्ञानी के पास होता है उसका जवाब।
- 54:31क्योंकि वह भी बच्चों की तरह मासूम होता है तो पुजारी तो हक्का
- 54:40बक्का रह गया। मंत्र के अंदर एक बहुत बड़ा सेठ
- 54:45पुजारी था, सिर पर माल रखा। प्रणाम कर रहा था और बच्चे की
- 54:53बातें और संभार सुन रहा था। यह मूर्ति को प्रणाम करके उठा।
- 55:09बच्चे से पूछा क्या बात में बेटा है?
- 55:16बच्ची ने सारी गाथा सुनी थी सेठ समझ कहा उसने वहाँ से एक बहूति
- 55:26उठाई। जो राख होती है ना दूध की वो वहाँ
- 55:33से उठाई कहते ये ले बचा ये अपनी माता की मस्तक पर लगा देना बस ठीक
- 55:41हो जाएगा बच्चा गया और उसके पीछे पीछे सेट चला गया।
- 55:53बच्चे ने जा के बहुते लगा दी माँ के मस्तक पे है और बच्चा सेठ
- 56:01डॉक्टर के पास चला गया। डॉक्टर से पूछा क्या बात है, क्या
- 56:07बिमारी है इसको? डॉक्टर ने सारी बात कही, गरीब
- 56:12आदमी बेदवाया है, इसके पास पैसे नहीं हैं और हम भी मुलाजम हैं,
- 56:21मालिक कोई और है आपको पता ही है पैसा बहुत खर्च का।
- 56:31यह समस्या है ठीक हो जाएगी, सर्जरी करनी पड़ेगी।
- 56:47सेठ ने कहा डॉक्टर को इसका इलाज करता हूँ।
- 56:52ये लो ब्लैंक चेक जितना खर्चा आए, इसपे भर लेना और निकाल लेना।
- 57:11संत के दर पे और भगवान के दर पे सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- 57:22संत के दर पे जाके फरियाद करोगे भगवान के दर पे जाके फरियाद
- 57:27करोगे? किसी न किसी तरह वो किसी में
- 57:30प्रवेश करेगा। आपका साधन बना देगा, आपकी
- 57:35समस्याएं दूर हो जाएंगी। यही पीछे है कि इसकी फलासिप ही
- 57:40है, लेकिन बाल सुलभ हृदय होना चाहिए।
- 57:51उसकी माता का ऑपरेट हुआ और ठीक हो गई।
- 57:56बाल सुलभ रहता है जीसको ईशान ने कहा कि सिर्फ वो ही मेरे परमात्मा
- 58:06के दरबार में प्रवेश पा सकेंगे। जो बच्चे के समान कोमल, मासूम
- 58:15पर्दे वाले हो गए छर रहे थे। कपट रहे थे, छिद्र रहे थे निर्मल
- 58:24निर्मल मान जन सोई मोई। व।
- 58:37निर्मल मान, जन सोई मोहि पा व मोह कपट।
- 58:49छल छिद्रण। मुझे कपट छल छिद्र ये अच्छे नहीं
- 59:00लगते निर्मल नरदोष कलसत्ता से हीनमान प्राणी।
- 59:09मुझे बड़ा प्यारा लगता है हृदय से लगा लेता हूँ उसे माता ठीक हो
- 59:19गयी, भोले बन जाओ छोड़ दो, चालाकियों को चालाकियों से तुम
- 59:37कमाते हो। ये जो शतरंज की चालें रोज़ बचाते
- 59:40हो, समेत तो हो दूसरों को उल्लू बनाते हैं।
- 59:47नहीं तुम खुद ही उल्लू बन जाते हो, जिंदगी का पल पल बड़ा अनमोल
- 59:54है इसकी कोई कीमत नहीं। पर ये पल पल सब कौड़े के भाव बेच
- 1:00:06देते हो छल कपट प्रपंच में गला देते हो, बेकार कर देते हो।
- 1:00:17राजनीति में उलझा हुआ ये समाज आज नरक की कगार के उपयोग पर पहुँच
- 1:00:23गया है और सारा विश्वास जल रहा है दो दो अपने आपको ऊंचा दिखाने की।
- 1:00:34ललक मैं ऊँचा हूँ सिर्फ दिखाना उनको दिखाना है जो आज है कल नहीं
- 1:00:40रहेंगे कितने मूर्खता है, कितने मूर्खता है तुमने दिखा भी दिया कि
- 1:00:49मैं महत्त्व हूँ। सर्वश्रेष्ठ हूँ, दुनिया में मेरा
- 1:00:54सा कोई भी नहीं तो किन को दिखाते हो उनको जो आज हैं, कल नहीं
- 1:01:01रहेंगे बस यही मुर्दा तुम्हारा वक्त बर्बाद कर रही है।
- 1:01:14उनको दिखा रहे हो जो कल खुद ढेर हो जाएंगे, जो बस में भूत हो
- 1:01:20जाएंगे और फिर कभी नहीं आएँगे। इस रूप में कभी नहीं आएँगे ठीक
- 1:01:28कहा चारवा ने बस में भूत से देहस्य।
- 1:01:32और न आगमन होता फिर कभी आता देखा है उससे जो चला गया अखबार कभी
- 1:01:43नहीं आता चिट्ठी न कोई संदेश। तुम छोड़ के अपना देश कहाँ पर चले
- 1:02:07गए कहाँ? पर चले गए।
- 1:02:18वहाँ से ना कोई चिट्ठी आती है, ना कोई मैसेज आता है और सभी वहाँ चले
- 1:02:28जाते हैं। इस दिल पे लगा के ठेस इस दिल पे
- 1:02:41लगा के ठेस, कहा तुम चले गए। उनको दिखाते हो अपने सर्वोपरि
- 1:02:59होने का अंक, जो आज है कल नहीं रहेंगे और कोई संदेश कोई नहीं
- 1:03:06आएगा। साली जोड़ के एक कविता में पानी
- 1:03:16में लिखते हैं अलेक्जैंडर मुझे ऐसे जीने दो मुझे कोई देखे ना
- 1:03:25मुझे कोई जाने ना पर मेरे मरने पे कोई अफसोस ना करे।
- 1:03:31लेट मी लिव उनसीन अन्नोन एंड अनलिमिटेड लेट मी डॉल स्टील फ्रॉम
- 1:03:37दी वर्ड नॉट ए स्टोन टेल व्हेर आई लॉ मुझे इस तरह से चुरा लो इस
- 1:03:45संसार से कोई कवर गाहा का पत्थर ये न बताए।
- 1:03:51के यहाँ अलेक्जैंडर को दफन है तो मन को दिखाती हो अपना अहंकार
- 1:04:08जो कल नहीं रहेंगे, तुम भी नहीं रोकें वक्त बड़ा अनमोल है।
- 1:04:20इस वेला को तुम परम आनंद में डाल सकते हो परम खुशबू से युक्त हो
- 1:04:27सकते हो परम ख्वारी से लिप्त हो सकते हो इतना आनंद है वहाँ।
- 1:04:35व्याख्यात नहीं किया जा सकता तुम ज़रा चलो उस देश में जीस, देश में
- 1:04:48शोक गम दुख दर्द का नमो निशान। कोई जलन नहीं वहाँ कोई आग नहीं
- 1:04:57वहाँ आओ।
- 1:05:07चले आहो हजूर, तुमको? सितारों पे ले चलूँ दिल झुम जाए
- 1:05:34ऐसे नजारों में। ले चलूँ आओ हजूर आओ सितारों पे ले
- 1:05:59चलूँ दिल झुं। मज़ा ऐसी बहारों में ले चलूँ और
- 1:06:17हजूर। हम से रोशन है चाँद और तारे हम से
- 1:06:28रोशन है, चाँद और तारे हम को दामन समझिए, गलत का हम से रोशन है,
- 1:06:40चाँद और तारे। हमको दामन समझिए, गैरत का उठ गए
- 1:06:48हम अगर जमाने से ना मिट जाएगा मोहब्बत का तिल हैं नाजुक कली से,
- 1:07:00फूलों से। दिल है नाज़ुक कली से फूलों से ये
- 1:07:07न टूटे, ख्याल रखिएगा दिल है नाज़ुक कली से फूलों से ये न
- 1:07:14टूटे, ख्याल रखिएगा। और घर आप से ये टूट गया और घर आप
- 1:07:26से ये टूट गया जाने जा इतना ही समझियेगा।
- 1:07:37फिर कोई बाबरी मोहब्बत की फिर कोई बाबरी मोहब्बत की अपनी जुल्फें
- 1:07:45नहीं संवारेगी फिर कोई बाबरी मोहब्बत की अपनी जुल्फें नहीं
- 1:07:55संवारेगी। आरती फिर किसी कन्हैया की कोई
- 1:08:00राधा नहीं उतारी थी। फिर कोई बाबरी मोहब्बत की अपनी
- 1:08:18जुल्फें नहीं संवारी थी। आरती फिर किसी कन्या की कोई इरादा
- 1:08:30नहीं उतारे थे। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:08:45हे नाथ नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण को बिंद।
- 1:08:58हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे
- 1:09:14मुरारी हे नाथ? नारायण वसुदेव पितमात स्वामी सखा
- 1:09:30हमार है पितमात स्वामी। सखा हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव,
- 1:09:50श्री कृष्ण गोविंद हरे। मुरारी है।
- 1:10:01नात नारायण वासुदेव धन्यवाद।