Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Apr 25 - अध्यात्म का आखिरी प्रश्न! एक प्रश्न जो पिछले 35 वर्षों से पूछा जा रहा था और जिसका मैं सीधा उत्तर देने से बचता रहा!
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- 0:01एक सवालः बाबा जी, लगातार 35 वर्षों से मैं आपसे पूछ रहा हूँ।
- 0:20और आपने उसका जवाब आय के नहीं दिया, ऐसा क्या है?
- 0:36कृपया अब तो आपने बहुत बोल दिया अब आप?
- 0:44मेरे जवाब को भी मेरे हृदय को भी तृप्त कर दीजिये, इस जवाब से मेरे
- 1:00प्रश्न। ऐसा क्या दिखता है संत को आखिर
- 1:08में कि वह खमोश हो जाता है और जिसे आप कहते हो रूपांतरण
- 1:20ट्रांसफॉर्मेशन वो हो जाता है? कृपया इसका जवाब संक्षिप्त में
- 1:31दीजिए क्योंकि बोल तो आप बहुत लिया है, कुछ समझ में आया कुछ समझ
- 1:40में नहीं आया। लेकिन स्पष्ट उत्तर आपने कभी नहीं
- 1:47दिया कि कभी वो वेला आएगा जब आप इस प्रश्न का जवाब?
- 2:02मुझे मेरे इस क्वेश्चन का जवाब और भी कुछ क्वेश्चन हैं।
- 2:20लेकिन आप में ऐसी क्या खासियत थी जो हम में नहीं कि आपको ट्रेन में
- 2:31हनुमान जी ने उठा के पटक दिया? क्या ऐसा खास था?
- 2:44और भी बहुत से प्रश्न हैं बाबा, मैं इतना दुखी हूँ कि मैं मरना
- 2:55चाहता हूँ, परंतु आपकी बातें सुनकर अब तो मरने का विषय नहीं
- 3:02करता। क्यों?
- 3:07क्योंकि वह सूक्ष्म शरीर देखी, वह तो फिर भी रहेगा, दुख तो फिर
- 3:16भोगना पड़ेगा। विकास मलिक लीजिये उतरा फिर ये
- 3:31वीडियो छोटी बहुत हो जाएगी, फिर ऐसा मत कहना और उसके बाद बोलने को
- 3:44कुछ रहेगा ना? इसलिए इधर से उधर से उधर से उधर
- 4:03से मैंने जवाब तो आपको दिया। बहुत बार कोई डाइमेंशन नहीं चूका
- 4:14कि मैंने आपके प्रश्न का जवाब न दिया हो।
- 4:21लेकिन तुम बिल्कुल सरल शब्दों में सीधा सीधा पूछना चाहते हो कि आखिर
- 4:27क्या दिख जाता है कि व्यक्ति को उन लम्हों में?
- 4:41कि खिचड़ी मुद्रा लग जाती है, लगानी नहीं पड़ती, मौन हो जाता
- 4:46है, उसका सारा एजिस्टेंस अस्तित्व मौन हो जाता है।
- 4:58दिखता क्या है ऐसा? बाबूलाल चौधरी 35 वर्ष से लगातार
- 5:14मुझे प्रश्न पूछा है और मैं लगातार इस प्रश्न का सीधा उत्तर
- 5:24देने से बचता रहा। जानबूझ कर क्योंकि फिर तो
- 5:35अध्यात्म दो शब्दों का खेल ही रह जाएगा और ध्यान रखना।
- 5:48जो लोग एनलाइटन हुए और कगार पे हैं, उन्होंने मेरे शब्द सुने ही
- 5:59हैं। उन्होंने सिर्फ मेरे ये दो पक्षे
- 6:07सुने हैं जो मैं आपको सुनाने चला हूँ और ये थीम।
- 6:22तो आइए बाबूलाल आपके प्रश्न का जवाब हाजिर है।
- 6:51वहाँ जाकर व्यक्ति देखता है दिल थाम लेना था उसे कि मैं नहीं हूँ।
- 7:12और यह कोई बौद्धिक विचार नहीं, यह कोई मन का उपजा हुआ ख्यालात नहीं,
- 7:25यह कोई भीतर से उछ्ती हुई भावनाओं की उमंग, तरंग और लहर में है।
- 7:36यह निरोध शुद्ध दर्शन है। अंत में जाके यह दिखता है।
- 8:00मैं नहीं हूँ और सारे प्रश्न फन हो जाते है क्योंकि प्रश्न करने
- 8:16के लिए कोई चाहिए। बहुत से लोगों ने बहुत से लोगों
- 8:24ने तरह तरह के मुज़फ्फर प्रश्न पूछे हैं।
- 8:33मातृपोपड़ी की खुजलाहटें थीं, इसके अलावा कुछ नहीं।
- 8:47गली में खेलते हुए बच्चों के साथ मैं भी मिल गया और खेलने लगा,
- 8:56लेकिन ऐसा नहीं कि मुझे खेल में आनंद आता था।
- 9:00उन बच्चों में इतना उत्साह देख के उनके साथ खेलने लगा।
- 9:09मेरा शौक भी नहीं था बस मेरे जवाब बिल्कुल ऐसे ही थे।
- 9:16तुम माटी से खेल रहे थे, बच्चे थे और तुम्हारे संग मैं भी हो लिया
- 9:24और कुछ न था। अब आइए इसको थोड़ा सा व्यवसायित
- 9:35करें ज़रा सोचिए तुम किसी बड़ी कुर्सी पे बैठे हो, पौधे पे
- 9:48विराजमान हो? और अचानक जब तुम दफ्तर पहुँचती हो
- 9:56तो आपके टेबल पर एक पत्र लिखा होता है।
- 10:01आज से आपकी नौकरी छीनी जाती है, आप अब?
- 10:08इस कुर्सी पे बैठने के योग्य नहीं रहे तो आपके मन पे का कोई तरीके
- 10:21है वो शक्ति जिसके बल पर तुम ताकत का इस्तेमाल कर रहे थे वो शक्ति
- 10:32किसी ने छीन ली। ऐसे ही कोई प्राग मिनिस्टर जाय और
- 10:45जनता कहर के हमने आपको गद्दी से उतार दिया।
- 10:55या लोग इतने बगावती हो जाए। वो कहें कि जल्दी गद्दी छोड़ दो।
- 11:04बहुत से हुक्मरानों को गद्दी छोड़कर भागना पड़ा।
- 11:10श्रीलंका, बांग्लादेश की शेप हसीना आज भी हिंदुस्तान में हैं।
- 11:20भागना पड़ा मसोलनी को, लेकिन लोग कहाँ भागने देते हैं?
- 11:49आपकी एक कुर्सी चली गई, गद्दी चली गई, छोटी थी या बड़ी थी, इससे
- 11:58फर्क नहीं पड़ता। बात ये है कि आपका जीवन का वस
- 12:04सहारा। जिससे सब तुम्हारा संसार चल रहा
- 12:08था, वो छिन गया और तुम अपने होशों हवा खो बैठते हो।
- 12:22क्लर्क से चपरासी से उसका वो दर्द छीन लिया या प्राइम मिनिस्टर से
- 12:30चीफ मिनिस्टर से? उसका उधास छीन लिया जाए, कुर्सी
- 12:34छीन ली जाए या राष्ट्रपति पर महाभियोग लिखा के कुर्सी छीन ली
- 12:40जाए या सीबीआइ से महाभियोग लगा के कुर्सी छीन ली जाए तो क्या असर
- 12:49होगा उनका? उससे भी बुरा असर होता है जब कोई
- 13:01संत अपने चरम बिंदु पे होता है। और जब वो खुली आँखों से निहारता
- 13:11है बस ये शब्द जो मैंने पहले बोला तुम नहीं हो।
- 13:30और वह अपनी पूर्ण शक्ति से देखता है और पाता है कि वास्तव में मैं
- 13:40नहीं हूँ तो उसका क्या हसर होता होगा।
- 13:47संत कहते हैं, वहाँ जाकर जोबा चुप हो जाती है, बोलती बंद हो जाती
- 13:54है, ऐसा क्या दिख जाता है लो आज मैंने खोल दिया, जिसने पाया बोल
- 14:05ना सका क्या बोलेंगे? अंतिम आधार तुम्हारा छीन व्याख्या
- 14:16तुम ही नहीं जहाँ तक भी बर्दाश्त की योग्यता लोगों की कुर्सी चली
- 14:24जाती है, लेकिन जीवन तो नहीं रहता।
- 14:31कुर्सी चली गई। बहुत से हुकमरणों की कुर्सी जाती
- 14:38है। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था हो या
- 14:41तानाशाह, तानाशाही में तो अक्सर लोग बदल दिया करते हैं।
- 14:53प्रताड़ित हो के और लोकतंत्र में वोटिंग के द्वारा बदल देते है।
- 15:02लेकिन ज़रा सूचना किसी की कुर्सी गई तो उसकी महज ताकत चली गई।
- 15:17यहाँ तो बहुत गहरा आघात है यहाँ तो तुम ही गए तुम ही नहीं हो वहाँ
- 15:26कुर्सी गई, तुम तो बची। वहाँ तुम्हारे हुक्म करने का
- 15:39माध्यम गया, लेकिन तुम तो बचे क्या है ऐसा जैसा व्यक्ति नग्न
- 15:52आँखों से निहार लेता है। या कोई स्वपन नहीं होता, कोई
- 15:56कल्पना नहीं होती, कोई कुछ ऐसा नहीं होता जिसपे ब्रह्म पाला जा
- 16:06सके। पष्ट लग्न आँखों से परम चेतना से
- 16:13युक्त व्यक्ति। यह सत्य देखता है कि मैं नहीं
- 16:21हूँ, फिर तुम तो खिचड़ी मुद्रा लगाते हो।
- 16:27जीवा तालु के साथ उसकी खिचड़ी मुद्रा लग जाती है।
- 16:34बोले कि बंद हो गए, इसलिए बहुत से प्रश्न आए कि बाबा अक्सर ये शब्द
- 16:45हम पढ़ते हैं, जिसने जाना वह मोन हो गया।
- 16:49क्या था ऐसा क्या जाना जाता? नो मैंने खोल दिया, तुम ही नहीं
- 16:58हो वास्तव में तुम ही नहीं हो और इससे आगे तुमसे कुछ छीना भी नहीं
- 17:10जा सकता। इसलिए कृष्ण कहते हैं मुझसे कुछ
- 17:15छीना नहीं जा सकता और मुझको कुछ दिया भी नहीं जा सकता।
- 17:25इसका अर्थ आपके मार्गदर्शक और और करेंगे।
- 17:35सत्य ये है कि जिसकी अस्मिता ही न बची, स्व ही न बचा उसको कुछ दे
- 17:46दोगे तो किसको देओगे जब वो है ही नहीं।
- 17:52उससे कुछ छिनोगे तो किसका छिनोगे जब वो है ही नहीं, ये है अंतिम सच
- 18:13बाबूराम अफसोस मत करना क्या सत्य है?
- 18:27और इस सत्य से रूबरू न हों हम कभी अहंकार सदा, इससे बचता है कि मैं
- 18:37इस सत्य से कहीं रूबरू न हो जाऊं, ऐसा न हो।
- 18:45मेरा अस्तित्व ही खो जाएगा। इसी से डर का मारा अहंकार बचता
- 18:53फिरता है। सभी गलियों ऊंचों में, धरती छान
- 19:01लेता है, आसमान छान लेता है। बस बीज़ी होने की चेष्टा करता है।
- 19:08कहीं याद न आ जाए कहीं मेरा आमना सामना न हो जाए, कहीं ऐसा न हो कि
- 19:23मुझसे मेरा स्व ही छीन लिया जाए। संत कहते हैं, पलटू कहते हैं,
- 19:32पलटू। शुभ दिन शुभ घड़ी याद पड़े जब
- 19:38नाम, लग्न, मुहूर्त, जोठ शब्द। और बिगाड़े का जब ये याद आता है
- 19:51कि तुम ही नहीं हो तो तुम्हारी तो कबर की नींव खुद गई, अब कोई
- 20:04तुम्हें क्या दे सकता है ज़रा सोचना।
- 20:11बाकी तो मन के बहलाभ्यास तो मृत व्यक्ति को जो चला गया उसे कोई भी
- 20:23पुरस्कार दे दो, नोवेल हो। भारत रत्न हो या संसार भर के कोई
- 20:31भी उपाधियाँ हो क्या मृत व्यक्ति के लिए ये मायने रखते हैं?
- 20:41नहीं। तुम्हें कौन क्या देख सकता है और
- 20:58पलटू एक आशा की किरण जगाते हैं। पलटू कहते हैं कि ये शुभ दिन आएगा
- 21:10आपका। जब मुझे याद पड़ेगा दिखाई पड़ेगा
- 21:18वो अंतिम घड़ी पल्टू ने देख लिया, जान लिया और वो पलट गया।
- 21:24इसे ट्रांसफॉर्मेशन कहते हैं। पल्टू का नाम पल्टू नहीं था।
- 21:33पलटू कर नाम चिरंजीवी एक सामान्य व्यापारी थे।
- 21:49दुकानदार थे, कामधंधा करते थे बनिया से।
- 21:58इसके लिए पलटू ने अपने दोहों में लिखा मैं पलटू बनिया उनका नाम था
- 22:12चरनजीवी उत्तर प्रदेश के जलालपुर नंगजलालपुर।
- 22:21गांव में उनका जन्म हुआ और खुशी खुशी अपना जीवन जापन करती थी।
- 22:36अपना परिवार चलाती थी, कुछ नहीं किया उन्होंने जीवन में।
- 22:49अचानक से वो उतरा, किन्हीं अव्यस्त क्षणों में उन दिनों
- 22:58व्यस्तता बहुत कम होती थी। आज तो तुम्हारे मोबाइल ही तुम्हें
- 23:05व्यस्त रखता है और मैं तुम्हें कहता हूँ कि जब तक मोबाइल रहेगा
- 23:15तुम्हारे हाथों में। तुम्हें खुद परमात्मा भी आ जाए,
- 23:28खुद परमात्मा भी तो तुम्हें उच्चरम दृश्य दिखला न सकेगा।
- 23:40क्योंकि तुम उसके योग्य नहीं तुमने इतनी शक्ति गंवा दी।
- 23:48सुबह आँखों को मसलते हुए उठते हो और सबसे पहले हाथ मारते हो।
- 23:56आज की ताजा खबर क्या है? और तुम सारा दिन आँखें गढ़ाई रहते
- 24:10हो, तुम्हारा मगज इनमें उलझा रहता है, बच्चों का, कार्टून में,
- 24:20गेम्स में और बड़ों का सियासत में धर्म में धर्म मिल जाता है।
- 24:31नहीं जो भी तुम्हें इंटरेस्टिंग लगता है।
- 24:35किसने कितने रन बनाए आईपीएल में? अवार्ड कॉम्पिटिशन में किसने
- 24:54छक्का लगा दिया? तुम उठकर दाद देने लगे, तालियां
- 25:00मचाने लगे। तुम्हें नहीं पता तुम्हारा खुद का
- 25:02छक्का लग गया। तुम खुद उड़े ये तुम्हें पता और
- 25:14जब तक यह हमारा बचपन बड़ी शांति से गुजरा मुशक्कत थे, अभाव भी थे।
- 25:30लेकिन व्यस्तता नहीं थी। बस थोड़ी देर की व्यस्तता, लेकिन
- 25:36उसके बाद बड़ा खुरा बना खेलकूद आज खेल कूद खत्म हो गया।
- 25:47आज खेलकूद का जब वक्त है, हम मजबूरी में बच्चों का हाथ में
- 25:56मोबाइल दे देते हैं। हैलो बेटा जी देख लो तुम्हें पता
- 26:03नहीं ये बच्चे के लिए जहर है। लेकिन कर भी कर सकता है ना बात
- 26:13चिरंजीवी यह बनिया व्यापारी था, मज़े से अपना घर चला रहा था।
- 26:29किन्हीं अज्ञात अव्यस्त क्षणों में ये मेरे शब्द नोट कर लें जब
- 26:37तुम बीज़ी नहीं हो लोग मुझे कहते हैं बाबा ये मन हमें बीज़ी ही
- 26:44रखता है। नहीं तुम इसके साथ ही चिपट के।
- 26:49बीज़ी होते हो तुम तो सदा ही नॉन बिज़नेस में हो, तुम कभी व्यापार
- 26:55नहीं करते, देखिये बड़ा प्यारा शब्द करते हो नॉन बिज़नेस जहाँ
- 27:00व्यापार ना हो बिज़नेस जहाँ व्यापार।
- 27:09तुम हर वक्त बीज़ी नस करते रहते हो।
- 27:13मैं सुनाया करता हूँ एक वक्त की रात सोया था, जान बूझकर बात को
- 27:17लंबी कर रहा हूँ ताकि इतनी छोटी भी वीडियो आप कहोगे ये भी कोई
- 27:25वीडियो है? बाबा 2 घंटे की डाला करता है।
- 27:36कपड़े का व्यापारिक था, रात को सो रहा था।
- 27:42पुराने जमाने में कपड़ा पीठ पर लादकर ग्रामों में बेचा जाता था,
- 27:48शहर से उठाया जाता था। बहुत से लोग ये जिंदा करते थे,
- 27:54कोई साइकिल पे कोई पैदल ढक्का मांडा सो गया।
- 28:09और सुबह जब जागने का वेला था तो उसे सपना आया कि किसी ग्राहक के
- 28:20साथ वह मोलभाव कर रहा है। किसी ने अपना सूट लेना है।
- 28:32ओके तबाही ऐसा करो पांच मीटर कपड़ा तीर्थ ठीक है क्या भाव
- 28:40लगेगा, भाव लगेगा देखो ₹2 लगाते हैं गज के जब गज होती।
- 28:51तुम्हें एक पीसा कम लगा तुम बस इतनी सी रैत काफी होती थी, एक
- 28:59पीसा कम ₹2 ग्राहक बोलर नहीं भाई एक पीसा में।
- 29:14मैं तो डेढ़ रुपया तो ऐसे करो, डेढ़ रुपया में एक सूट दे दो, चलो
- 29:25दो दे दो। उस व्यापारी को तो पता था कितना
- 29:32ही कम कर लो। फिर माता सो गए।
- 29:39आज बड़ा सीरियस प्रसंग चल रहा है। नहीं गिद्दड़वाहट के व्यापारियों
- 29:48की बात नहीं करूँगा। फिर भी मैं कुछ कमाऊंगा।
- 29:59उसने कहा डेढ़ रुपया उसने मांग के ₹2.01 कम कर लूँगा, उसने कहा
- 30:07ग्राहक तो फंस गया। अब चीज़ तो सारी 12 आने की दून हो
- 30:14रहा है तो उसने कहा अच्छा देख अब तू बोलना मत ना तेरी ना मेरी यह
- 30:29दे। पौने दौर पे अच्छा तो उसने बहुत
- 30:38ठान फाड़ दिया। सुबह सुबह का विला तक घरवाली
- 30:43चलाई। ओह जी ओह जी तुमने अपना बौता पड़
- 30:52लिया है ऐसे सपने चलते हैं हम रात को भी व्यापार चलता है लेन देन
- 31:10होता है मोल तोल होता है। ये ले ना तेरी ना मेरी जब ₹1.75
- 31:19अपना बोथ था पढ़ ले तो तुम बीज़ीनेस में?
- 31:31से कभी निकलते हैं तो किन्हीं ऐसे क्षणों में जब वह एवस्त्र था,
- 31:40बिल्कुल खाली बैठा था और बिल्कुल खाली क्षणों में वह उतरेगा।
- 31:48तुम तो श्रद्धा ही अपने आप को व्यस्त रखना चाहते हो।
- 31:52मेरे चैनल से जाओगे, कहीं दूसरे चैनल पर कुछ इकट्ठा करना शुरू कर
- 31:58दोगे? इकट्ठा करने की आदत तो मन की जाती
- 32:03है, फिर दान इकट्ठा कर लो की इज्जत इकट्ठी कर लो की गलतियाँ
- 32:07इकट्ठी कर लो। कि सूचनाएं इकट्ठी करके सर बन
- 32:11जाओ, बस इकट्ठा करो। यह मन का स्वभाव है, स्वभाव न कहो
- 32:22यह मन का संस्कार हो गया है। जन्मो जन्मो की?
- 32:28ये पुनरावृत्ति तुम्हारा संस्कार बन के आज आदत में ढल गई।
- 32:46अचानक 1 दिन वो उतरा अव्यवस्थ क्षणों में वो उतरा और चिरंजीवी
- 32:55पर लटका। उसे लोग कहते चरनजीवी तन मैं पलटू
- 33:08बनिया बह गया। चरनजीवी पलट गया, खुद का नाम उसने
- 33:19रखा, ये तो मेरे माँ बाप ने रखा था।
- 33:24पल्टू कहते हैं, मैंने अपना नाम खुद रखा, पलट गया, जीवन पलट गया।
- 33:32जिसे ट्रांसफॉर्मेशन कहते हैं। सब पलट गया, कुछ ना बचा।
- 33:42अब तक तुम्हारा था सब अब तुम्हारा तो बचा ही नहीं अफसोस कि तुम भी न
- 33:51बजे वहाँ जाकर यह दिखता है बाबूराम।
- 34:06इसके लिए मैं कहता हूँ साहस की आवश्यकता है तुम पानी के लिए से
- 34:13कुछ और मिल जाता है कुछ। जिसकी उम्मीद ही ना थी।
- 34:25बड़े शोक से चरित्र है कि कुछ मिलेगा, संसार जीत लूँगा मैं
- 34:41जंक्चर पॉइंट पर पहुँच चुका वहाँ ऐसा करूँगा, सपने संजोय थे।
- 34:52पिछले जन्म में जाऊंगा देखूंगा कौन था ऐसे ही बुद्धू थे वो ही है
- 35:01चाल बेड़ंगी जो पहले थी वो अब भी है।
- 35:10कुछ सोचता है कि देखूंगा कौन सा आप राजा से हैं, मैं भी देखूंगा
- 35:17कहीं ना कहीं राजा होऊंगा। ओके भाई मैं तो गधा भी था।
- 35:26लोग कह देते हैं तुम बाबा कहते हो, मैं गाँधी था, मैंने कहा मैं
- 35:29गजा खिचता हूँ, हाँ भूल जाते हैं और मेरे कहने का क्या, मैं तो
- 35:40बहुत कुछ कहती हूँ। लेकिन तुम तो भीतर उतर के जानोगे,
- 35:46तुम क्या थे, वो बड़े मज़े की बात है जब तुम अपने भीतर उतरोगे और
- 35:53जानोगी के मैं क्या था मैं कौन था तत्क क्षण तुम यूनिवर्स से एक
- 35:58आकार हो जाओ। और तुम बड़े सरलता से जान सकोगे
- 36:03कि मैं हिस्सा में बैठा व्यक्ति क्या था, कौन था?
- 36:10लेकिन कठपुतलियों का खेल है कठपुतलियों को नचाने वाला।
- 36:21राजारानी तो होते हैं जिनको नचाता है, लेकिन राजारानी वास्तव में
- 36:28होते हैं। नहीं होते बस कठपुतलियों को पता
- 36:33नहीं होता कि हम राजा हैं, हम रानी हैं, वास्तव में हम नहीं।
- 36:39हम किसी के हाथ की कठपुतली हैं, हम किसी के हाथ की सृजना हैं,
- 36:45हमारा खुद का वजूद नहीं है। यह आखिर में दिखता है।
- 36:56बाबूराम वहाँ कोई? तुम्हारी होशियारी चलती नहीं,
- 37:07इसलिए नानक कहते हैं, सह से स्याणा पान लक्खव इक न चले नाल
- 37:14ज़रा बताओ तुम करोगे क्या उस क्षण में जब उघड़ जाओगे सारे के सारे।
- 37:22और अपनी ही नग्न आँखों से देख लो के वास्तविकता व्हाट सेरे या लेटी
- 37:30तो कहाँ ज़ोर रहेगा आपका ज़ोर न जुगती ज्ञान विचार।
- 37:43ज़ोर न झुकती छोटे संसार तुम्हारी किसी प्रकार का ज़ोर वहाँ नहीं
- 37:53उछलता जब चाहे तुम्हें सत्य दखला देता है।
- 37:59और तुम कहते हो मैं हूँ मैं हूँ तो मुमकिन है इम्पॉसिबल वर्ल्ड
- 38:07नॉट फाउंड इन मैं डिक्शनरी और वही व्यक्ति के लिए मृत्यु पॉसिबल हो
- 38:17जाती है। नेपोलियन बोनापार्ट का इम्पॉसिबल
- 38:27वर्ड इस नॉट फॉर मी डिक्शनरी मेरे शब्द कुश में असंभव नाम का कोई
- 38:32शब्द है एव्रीथिंग इस पॉसिबल फॉर मी।
- 38:38लेकिन मृत्यु उसके लिए संभव हो जाती है।
- 38:47मृत्यु को रोकना उसके लिए असंभव हो जाता है।
- 38:55लफ्साज़ी है महज अब समझाई क्यों संत बैठ जाता है एक कोने में दुबक
- 39:05के। क्यों संत एक स्थान पर बैठ के
- 39:11तुम्हारे सब 3600 प्रकार के भोग विलास त्याग देता है, टेस्ट
- 39:19वर्ड्स को तो उसके भी काम करते हैं।
- 39:21जीवा पे मरे नहीं, लेकिन क्यों? वो कोई स्वाद नहीं चखना चाहता।
- 39:29क्या हुआ? इसे यह घटना घट गई जो चिरनजीवी को
- 39:37परतु बना दी और मैं सदा कहता हूँ कृष्ण कहते हैं, लक्षणों से देखना
- 39:46भाई। लक्षण नहीं तो समझ लेना तो घटना
- 39:56नहीं घटी। दो हर्षों की बात है, लक्षण है तो
- 40:04समझ लेना कि घटना घटी। जिन शब्दों में आनंद का रस भीग के
- 40:12लिए बढ़ते बढ़ते संग न आया वह शब्द अपनी रस है क्योंकि रस में
- 40:23डूबे नहीं हैं। तो साफ है कि घटना घटी नहीं तर्क
- 40:31है, तर्क के जाल हैं समझ है समझ के ढंग है वो कबलेरी है सीखा समझा
- 40:41सब है, लेकिन। अगर उस अनुभव का संघ नहीं तो फिर
- 40:51कुछ भी नहीं। 713।
- 41:02नहीं संग तेरा नहीं सात दुनिया। शले भी तो क्या है?
- 41:25एक तो न मिला। सारी दुनिया मिले भी तो क्या है
- 41:50मेरा दिल? खिला सारी बगिया खिले भी तो क्या
- 42:09हैं एक तोना मिला। अगर आखिर में जाके ये बात न देख
- 42:18पाए जो कि आपकी केचड़ी मुद्रा लगा देते हैं, जो संत कहते हैं जिसने
- 42:27जान लिया वह चुप हो गया। क्यों?
- 42:33क्या हैं इसके विशेष शब्द? शायद संत तुम्हें कहना नहीं चाहते
- 42:40थे। संत चाहते थे कि तुम इन शब्दों से
- 42:45भी चपट जाओगे। इन्हें भी तुम अपनी समृति के
- 42:52भीतर। ज्ञान के भंडार में संजोले पे, यह
- 42:58भी तुम्हारी सूचनाओं के भंडार में एक सूचना की तरह सुरक्षित हो
- 43:06जाएगा जानते थे, लेकिन मैंने इसलिए बोल दिया।
- 43:14ओके न बताएं तो भी तो तुम वही हो और बता देंगे तो शायद वो फॉर्मूला
- 43:21आजमा लिया, कुछ न हुआ, अब बता ही दिया जाए।
- 43:28शायद एकाध व्यक्ति के भीतर गड़े से नीचे उतर जा रहा था।
- 43:35सत्य तो ये है बाबू लाल वह व्यक्ति जान लेता है कि तुम ही।
- 43:52वे न राजगद्दी छीनता है, न धन खजाना, न हीरे जोहरात, न महल
- 43:58अटारियाँ, न रानियाँ न पुत्र पोतरा कुछ नहीं छीनता, न जानता
- 44:08धरती कुछ नहीं छीनता। बस वो तुम्हें ही छीन लेता,
- 44:17तुम्हें ही भक्ष लेता है वो वहाँ जाके फिर तुम्हारी बोलती बंद न
- 44:25होगी और जीवा तालु से न लगेंगी तो क्या होगा?
- 44:31और जिसने जान लिया कि मैं नहीं हूँ, वही उदगार कर सकता है।
- 44:40अहम ब्रह्मास्वा यद्यपि बात शब्दों की नहीं, बात सत्य की है
- 44:48या तो कह दो कि मैं ही हूँ। यह कह दो कि मैं नहीं हूँ ये दो
- 44:53छोर से कहीं हुई दो बातें एक सत्य को कह दो कि मैं नहीं हूँ, यह कह
- 45:03दो कि मैं ही हूँ बस दोनों का मतलब एक ही होता है।
- 45:13जो संत जो उस स्तर पर पहुंचे, एक ने कहा अहम ब्रह्मस्व मैं हूँ
- 45:28ब्रह्म हंसूर ने कहा अनल हक ये देखिये अंतिम सत्य हैं।
- 45:36कोई धर्म से स्वीकार्य न स्वीकार्य क्या फर्क पड़ता है?
- 45:45सत्य को स्वीकारने की आवश्यकता कहाँ होती है?
- 45:49सत्य तुम्हारे स्वीकार्य के भरोसे थोड़े बैठा है, इतनी सृजना जिसने
- 45:55की? और तुम छाती ठोक लेते हो, फैला
- 45:59लेते हो एक कण भी न बना सकोगे। पानी की बूंद हवा का दर्रा है रेत
- 46:06का कण तुम बना सकते हो हम्म तो फिर।
- 46:14तुम्हारी हैसियत क्या है और कहा क्या है दो तरफ़ों से कहा गया एक
- 46:26ही सत्य का अनुभव मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ वह।
- 46:36अज्ञान के रूप में अहिंकार के रूप में नहीं हो जाता है।
- 46:44उसका कोई वजूद नहीं रहता, मिट जाता है ऐसे जैसा बरवाना शमा में।
- 46:52जब भी हुई क्षमा की लो से आकर्षित हो के चमचमाहट से आकर्षित हो के
- 46:59फना हो जाता है और भस्म भूत हो जाता है, उसका कोई वजूद शीश नहीं
- 47:07रहता। एक तरफ़ से कम शून्य हो जाओगे,
- 47:17तुम न बचोगे और जो बचेगा वो शुद्ध अस्तित्व होगा तो कृष्ण शुद्ध
- 47:26अस्तित्व से बोलते हैं कि मैं ही हूँ वस्तु, मेरी शर्म में आशा।
- 47:33और कहते हैं, उस अज्ञानी से जो समझते है कि मैं ही हूँ बात दो
- 47:40तनों की आगे अहंकारी भी कहता मैं ही हूँ, लेकिन उस कतल अहंकार के
- 47:49घोड़े पर सवार। झूठा कृष्ण कहते हैं मैं ही हूँ
- 47:57समर्पित हो जा मेरे मैं तुझे सब बातों से मुक्त कर दूंगा।
- 48:05वो उस तल के असली छोर से बोलते हैं कृष्ण।
- 48:11जिसका अहंकार पूर्णतया सिमट जाता है वह अस्तित्व हो जाता है और
- 48:17अस्तित्व ही है। अस्तित्व के सिवा यहाँ कुछ नहीं
- 48:21है। बिन नामी नाहीं कोठा नाम कर था
- 48:35अस्तित्व। उस अस्तित्व को जान लेना अपने
- 48:39होने की तरह यह नाम था तुमने जपना शुरू कर दिया।
- 48:46जीता किता तीता नाम इस पसारे में भी वह अस्तित्व कण कण में
- 48:53विराजमान है। जेता कित्ता केता?
- 48:58नाउ अस्तित्व समझ लेना बहुत बार नाम मैं बोलेंगे लेकिन नाम
- 49:05तुम्हारे नाम नहीं ना वाहे गुरु है।
- 49:11ना राम ना रहीं ना अल्लाह, ना गौत कुछ भी तो नहीं है ये तो शब्द हैं
- 49:19अस्तित्व नहीं है शब्द अस्तित्व नहीं हुआ करते शब्द तो अस्तित्व
- 49:27शब्द भी अस्तित्व नहीं हुआ करता। समझे समझे अस्तित्व शब्द भी
- 49:37अस्तित्व नहीं हुआ करता, फिर राम कैसे अस्तित्व हो सकता है?
- 49:43अल्लाह कैसे अस्तित्व हो सकता है? लेकिन समझाने के लिए यह बातें
- 49:50क्यों समझाने के लिए ऐसा समझ में जो नहीं आता उसे फिर समझाने के
- 49:56यही तरीके रह जाते हैं। इशारे और इशारों के आगे एक मूक
- 50:01भाषा दूर तलक जाती हुई। इशारों इशारों में तुम्हें कुछ
- 50:08बतलाती हुई जेता किता तेता नाम ये सारा पसारा नाम ही है अगर इसको
- 50:19कंपैरिजन करोगे तुम उपनिषद के साथ ईशा वासिमिदम सर्वम जगत या जगत।
- 50:25आइए बिलकुल समान अर्थ मिलेंगे आपको।
- 50:32जेता कित्ता तेता नाउ बेननामि नाहीं।
- 50:36कोठा ईशा अवश्य में दम सर्वम जयते केंद्र जगत या आम जगत था।
- 50:43इस जगत के कण कण में ईश्वर विद्यमान है।
- 50:46बिलकुल वही हैं अल्फाज़ बदल गए अर्थ वही जो सारा पसारा उसे
- 50:57अस्तित्व कहते हैं बाबा और है भी। और उस अस्तित्व के बिना उस नाम के
- 51:04बिना कहीं कोई कुछ भी नहीं है। तुम उसे जपो मत बाबा के शब्दों का
- 51:13अर्थ तुमने अनर्थ कर दिया यही दिखता है आखिर में।
- 51:22तुम नहीं हो और तुम नहीं हो के दो मतलब होते हैं, एक तल पे तुम नहीं
- 51:29हो वो है अहंकार का तल, ईगो का तल जिसे तुमने अपना होना माना बाबा
- 51:38कहते ये काल्पी ने कहा, भाई? यह टूटे तो भ्रम छूटे और तुम अपने
- 51:46असली मुकाम पे आ जाओ, जो कि तुम्हारा असली घर है असली
- 51:52अस्तित्व है तुम्हारा असली हुंद है तुम्हारी वहाँ पहुँच जाओ कृष्ण
- 51:59कहते हैं, स्तिथि भ्रम हो जाओ। महावीर कहते हैं, केबल में उतर
- 52:06जाओ, जहाँ बस एक है, वो बाबा नानक कहते हैं, एक ओमकार भूले शह कहते
- 52:14हैं। मस्जिद कोलो जोड़ा ठरया जा ठाकर
- 52:24दे डेरे वड़या जिथे बज दे नाद 1000 वह एकांत स्थान जहाँ सब शोर
- 52:31शराबे खत्म जहाँ मथुर रस की ध्वनि गूंजती है, वहाँ चला गया मैं।
- 52:41लक्षण बताते हैं। व्यक्ति के अलफाज़ बताते हैं,
- 52:46व्यक्ति की गहराई उसके शब्दों से परखी जाते हैं।
- 52:55क्या देखता है बाबूलाल? मैंने बता दिया दिखता है कि तुम
- 53:02नहीं हो आँखें फटी की फटी रह जाती हैं, ये क्या सब जन्म बेकार दिखते
- 53:13हैं। क्या फिर मेरा सब कमाया धमाया
- 53:18बेकार हो गया? हाँ जब तुम ही न रहे बस एक ही रह
- 53:25गया तो फिर तुम कहाँ से बचे? बस वो एक ही रह जाता है।
- 53:36और कोई उसे देख लेता है कि मैं मीठा और कोई उसे देख लेता है कि
- 53:41मैं हुआ एक तरफ से देखोगे तो मैं मीठा और दूसरी तरफ से देखोगे तो
- 53:49मैं हुआ कृष्ण हो जाते हैं और परटू।
- 53:55मिट जाते हैं। इन दो की कहानी समा गई।
- 54:02इन थोड़े से अलफ़ाज़ों में ये दिखता है, तुम नहीं हो ओवैसी झटका
- 54:12मत समझना। क्योंकि जब तुम नहीं हो जाओगी तो
- 54:18आनंद के समुद्र तुम्हें चारों तरफ़ से ढक लेंगे, मस्ती का वो
- 54:24तूफ़ान लहराता आएगा और तुम्हें अपने आगोश में संभालेगा और तुम?
- 54:33ऐसे मस्त हो जाओगे सुरत। कलारी भाई मत बारी।
- 54:52सूरत कलारी बयमतवाड़ी मद बगी गई बिना बोल मन मस्त हुआ।
- 55:12हुआ फिर क्यों? बोले मन मस्त हुआ फिर।
- 55:20क्यों बोले मस्त हुआ, फिर क्यों बोले?
- 55:35फन सा पायो पायो। मानसरोवर ताल चली आ क्यों दो लह
- 56:04मानस तो हाँ फिर क्यों? बोले मनुस्त हुआ फिर?
- 56:14क्यों? बोलू फिरो पयो।
- 56:44गांठ घटिया हो बार बार आको क्यों खोले मनो मस्त हुआ तो क्या?
- 57:03बोले मनुमस्त हुआ फिर क्यों बहुत? चुप हो जाता है।
- 57:11व्यक्ति फिर क्यों बोले कारण क्या रह जाता?
- 57:16है। बोलने का मनुमस्त हुआ।
- 57:22फिर क्यों हो हो गया? ये लग जाती है केशरी मुद्रा तुम
- 57:29लगा लगा के थक जाते हो वह नहीं उतरता वह उतरेगा तुम्हारी अवस्थ
- 57:36क्षणों में याद रख लो यह बात बहुत बार बोल दी तुम्हारी भीतर।
- 57:43अंतश को छुई नहीं मेरी बात तुम फिर मोबाइल देख रहे हो, तुम फिर
- 57:52गेम्स देख रहे हो, तुम फिर कार्टून देख रहे हो।
- 58:02तुम फिर कुछ और उड़पटांग कबाड़े दिख रहे हो, आज की खबर देख रहे
- 58:08हो? मन भटकता हुआ भटकता हुआ मन की
- 58:13निशानी है। ये प्रश्न जो उठते हैं विकास मलिक
- 58:18ये पुत्र भटकते हुए मन की निशानी है।
- 58:21और भटकता हुआ मन जीस दिन ठहर जाएगा उस दिन प्रश्न उठना बंद हो
- 58:26जाएगा क्या जवाब दूँ, क्या जवाब दूँ, मैं तुम्हारी सवाल का?
- 58:40और किस किस सवाल का जवाब दूँ? संत थकता नहीं बोलते वक्त प्रभु
- 58:49का गुणगान करते करते कभी कोई थका गाता ही चला जाता है।
- 58:56बेकरार इधर। तू गाये जा बेकरार दिल तू गाये जा
- 59:14जिसे। सुन के दुनिया जूं।
- 59:19उठे और जो उठे। दिल दीवाने बेकरारे दिल।
- 59:33तू? गाये जा बेकरारे दिल श्री कृष्ण
- 59:45गोविंद हरि मोरा श्री कृष्ण गोविंद।
- 59:55थोड़ा सा नीचा सुन लेता हूँ। हरे मुरारी, हे ए नाचत नारायण
- 1:00:13वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद आरे मुरारी
- 1:00:24देनाथ नारायण वासुदेव व पितृमात्य स्वामी सखा हमार।
- 1:00:54हमार पितुमात स्वामी सखा हमार हे नाच नारा न वासुरेवा हे नाच नारा।
- 1:01:13जन वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हारे मुरारी के नाथ नारायण
- 1:01:29वासुदेव के नाथ नारा। जनम वासुदेव।
- 1:01:45धन्यवाद।