Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Dec 25 - संत के पैरों की धूल माथे क्यों लगाते हैं? समाधि के अंतिम छोर और संत की रहस्यमयी व्याख्या! Baba ji Vijay Vats Satsang
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- 0:09बाबा जी परम सतप्रकाश जब बुध पुरुष या संत पुरुष चलते हैं।
- 0:29तो लोग उनके चरणों की धोली माथे से क्यों लगा लेते है और मंदिर
- 0:42में? पुजारी खड़ाओं को पहनते हैं।
- 0:51दोनों ही सवाल एक जैसे। अगर आप कहो कि जूते गंदे हो जाते
- 1:11हैं, जूतों को बाहर उतारना पड़ता है, इसीलिए खडाव पहनते हैं तो
- 1:23खडाव भी गंदे हो जाएंगे। अगर तुम बाजार में खड़ाव में पा
- 1:28कर निकलोगे तो खड़ाव भी गंदे हो जाएंगे, लेकिन ये कारण नहीं था।
- 1:38संत पुरुष जब निकलता है पहले संत पुरुष का।
- 1:46डेफिनिशन्स सुन लीजिए जिसने उस आनंद का रस पिया जिसने उस सक्त
- 2:01रूपी आनंद का रसपिया वह संत। सत और आनंद दो शब्दों से मिला है।
- 2:14संत सत्य को जान लिया, आनंद को पी लिया एक ही बात है।
- 2:31तो जिसने उस सत्य को पी लिया, रस को पी लिया तो विराट उसके ऊपर
- 2:41उतरता है। उन घड़ियों में जब संत सत्य को
- 2:47पीता है तो यह विराट जिसकी। समझ आपको आती नहीं, इसका और छोर
- 2:57नहीं, जिसका विस्तार फैला। आप माप नहीं सकते, बियॉन्ड
- 3:03मेजरमेंट से है। वो जब उसको पा लेता है।
- 3:11संत तो धन्य हो जाता है गगन मंडल से आई हुई वो आनंद की समुद्रों की
- 3:27बहार फुहार। जैसे बूंद के ऊपर उतर गई हों तो
- 3:34बूंद का हाल क्या होगा, बूंद के ऊपर समुद्र उतर गया तो क्या हाल
- 3:43होगा, बूंद का निहाल हो जाएगा। चारों खानी चित्त हो जाएगी, उसकी
- 3:52बुद्धि और वह समझ नहीं पाएगा। यह हुआ तो हुआ क्या?
- 4:00और ऐसे ही व्यक्ति को संत कहा जाता है।
- 4:08आज तो अशिक्षित लोक। पाखंडी लोग मान्यताओं से ग्रसित
- 4:16लोग मंदिरों में बैठे हैं। आपके सारे पुजारी, छोटे बड़े
- 4:24मंदिर का कोई भी हो सब ढोंगी हैं सब व्यापारी।
- 4:32संत व्यापार नहीं करता, संत बांटता है, इस फर्क को समझ लेना
- 4:41संत लेन देन नहीं करता। संत सिर्फ बांटता है और उसके बदले
- 4:47में कुछ मांगता नहीं। आपके पुजारी व्यापार करते हैं,
- 4:57आपसे धन ले लेते हैं और आपके हित में परमात्मा से अरदास कर देते
- 5:03हैं। वह लेन देन की भाषा है।
- 5:11तो आपकी पुजारी, व्यापारी, संत, व्यापारी नहीं होता है।
- 5:18संत सिर्फ और सिर्फ बांटता है। अपने आनंद को कैसे?
- 5:27उससे संभाले सम्बलता नहीं इतना आनंद हो जाता है जैसे गगर्गियां
- 5:34भर गई हो और छलकने लग जाए। ऊपर से तो जब वह पूरा भर जाता है,
- 5:47वह विराट बूंद पर गिर जाता है। तो उसका सारा शरीर का रोम रोम उस
- 5:56आनंद को प्रवाहित करता है और उसके सारे पोर अंगुल देंगे सर पांव के
- 6:04हाथों के सारे पोर। उस विद्युत प्रवाह को बिखेरते हैं
- 6:14लगातार मेरे इस शब्द को आप गोर से समझ लेना मैंने पोर कहा है 10
- 6:28गांव के। और दशा के इसलिए संतों के और
- 6:36बड़ों के पांव के हाथ लगाया गया, पोरों को छुआ गया, शिष्य पांव को
- 6:46छूता है, पांव के पोरों को छूता है।
- 6:50उंगलियों को और गुरू अपने हाथ के पौरों से उसे आशीर्वाद देता है।
- 6:55सिर पे रखता है तो चेतना का एक सर कर प्रवाहित हो जाता है।
- 7:08जब वह बरसता है तो इतना बरसता है कि फिर उसका सीधा कनेक्शन उस
- 7:16समुद्र से हो जाता है जो समुद्र ना कम होता है ना ही कम किया जा
- 7:24सकता है। समुद्र में से कितना भी निकाल लो
- 7:32वह कम नहीं होता। बस यही एक बात है जो बुद्धि से
- 7:42परे हो जाते। आपकी बुद्धि कहती है यह कैसे हो
- 7:46सकता है? चिढ़ी चोंच भर ले गई नदी ना घटे
- 7:49हो नीर दान दिए धान न घटे कह गए वो बक्श तो कबीर दान की बात करते
- 8:03हैं। तो वह इस दान की बात करते हैं जो
- 8:11आध्यात्मिक दान है, जो गुरु प्रवाहित करता है।
- 8:15तुम्हारी सिखों की बात कबीर नहीं करता है, तुम समझने में गलती कर
- 8:20जाते हो। तो अगर शेष से चूच भर ले भी जाएगा
- 8:32आचार्य के पास बैठ के आचार्य उपासना।
- 8:39आचार्य के पास भटके चौंच भर छिड़ी ले भी जाएगी तो नदी में से गढ़ता
- 8:46नहीं, यह उसकी व्याख्या है उस समुद्र की जो उस बूंद के ऊपर उतरा
- 8:55था कब है? जैसे 28 अक्टूबर 1985 को इस बूंद
- 9:04के ऊपर वो सुद्र उतरा, उसके बाद लगातार प्रवाहित हो रहा है सारे
- 9:13शरीर का पोर पोर। रोम रोम बिखेर रहा है उसको वो
- 9:26जहाँ बैठेगा वहाँ प्रत्येक रोम में से वह आनंद जरेगा अगर कोई
- 9:36बैठा होगा जीवंत। तो वह उसे पीलेगा और अगर नहीं कोई
- 9:42जीवंत बैठा तो दीवारें पी लेंगे। इनको प्राण प्रतिष्ठा कहते थे।
- 9:50जब संत मूर्ति के संपर्क में आता है तो मूर्ति प्राण प्रतिष्ठित हो
- 9:56जाती है। क्योंकि संत के रोम रोम में से वह
- 10:01अमृत्य जड़ता है। तुमने तो आज मंत्राभिषेक करके
- 10:07मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा करनी शुरू कर दी, जो कि एक कर्मकांड
- 10:12मात्रा है। लेकिन उपनिषद जिसकी बात करते हैं
- 10:28वो उसकी बात करते हैं जो आपकी बुद्धि में आती नहीं हैं, उपनिषद
- 10:37कहते हैं। पूर्णस्य पूर्ण महादायें पूर्ण
- 10:44में से अगर पूर्ण भी निकाल लिया जाए पूर्ण में वह शिष्य से तो
- 10:49पूर्ण ही शेष बसता है। भला ये आपकी बुद्धि कैसे समझेगी
- 10:57बताइए? इसलिए जब मैं कहता हूँ कि वह नहीं
- 11:02समझाया जाता तो आप कहते हैं कि बाबा समझ नहीं आई आपकी बात, आपकी
- 11:15बुद्धि उसे नहीं समझ पाएगी। जब उसका बाहरी ओर छोर आप
- 11:20मेज़रमेंट नहीं माप सकते तो उसके भीतर के रस का।
- 11:24अनुमान आप कैसे लगा सकते हो? चिढ़ी चोंच भर ले गई बस संत तो
- 11:38सिर्फ चोच भर पीता है वो समुद्र में वह चोच भर ही पीता है उसकी
- 11:46हसीती इतनी। फिर उसका कनेक्शन सीधा समुद्र से
- 11:51हो जाता है। फिर समुद्र से सीधा प्रवाहित हो
- 11:55जाना शुरू हो जाता है। फिर वो कितना भी बरसाता रहे।
- 12:00मौका तो नहीं होता, घटता नहीं है, ना घटता है, ना बढ़ता है, ना कम
- 12:06होता है, ना ज्यादा होता है। इसलिए उपनिषद ने जो बातें कही,
- 12:14उलटेपुलटी बातें कही और उलटी पुलटी बातों को तुमने अपनी बुद्धि
- 12:21से विसारित करना शुरू कर दिया। उल्टी पुल्टी बातों को आपने अपनी
- 12:29बुद्धि से व्यावसायिक करना शुरू कर दिया।
- 12:31कैसे व्यावसायित करोगे तुम? वह दूर से दूर और पास से पास कैसे
- 12:41कोई चीज़ दूर से दूर होती हुई पास से पास हो सकती है?
- 12:45क्या बुद्धि का अनुमान लगा पाएगी? नहीं लगा पाएगा?
- 12:51यह अनुभव का मसला है। यह गणित का मसला है ही नहीं तो
- 13:04संत वह है जिसकी बूंद के ऊपर समुद्र उतर गया।
- 13:14तो वह बूंद सागर में एकाकार हो गए।
- 13:19फिर उसका संपर्क सागर के साथ सदा ही बना रहेगा।
- 13:24फिर उसके भीतर से चौंच भर कोई ले जाए, नहीं घटता।
- 13:31क्यों? क्योंकि सब जगह वहीं है।
- 13:35जो चिड़ी चोच भर के ले गई, वो चिड़ी के भीतर भी वो ही है।
- 13:48सब जगह पे है सर्व व्यापक है, तो छिड़ी अगर चोंच भर कर ली गई तो
- 13:57राहत उसके भीतर है क्योंकि छिड़ी सर्वव्यापक के भीतर ही विचरण करती
- 14:04है। लेकिन उससे पार कहाँ गई चिड़ी
- 14:11चिड़ी ने चोंच के को भर के अपनी प्यास मिटा दी, लेकिन वह जल तो
- 14:19नहीं घटा, वह तो चिड़ी के पेड़ में चला गया।
- 14:25और परमात्मा सर्बयापक है, वह घटेगा कैसे नदी ना गड्ढे और नीर
- 14:33दान दिये धन ना घटे कह गयो भक्त कबीर यह बात आप संसार में ले लेते
- 14:38हो संसार की ये बात कबीर ने कही नहीं।
- 14:44कबीर संसार की बात कहते हुए संसार की बात उदाहरण के रूप में कहते
- 14:50हैं, यह बात अलग है, वह सर्वव्यापक है, तो चिड़ी के भीतर
- 14:59भी है। समुद्र के भीतर भी वही है।
- 15:05चिढी ने चोंच भर लिया, वो चोंच भी सर्व व्यापक के भीतर ही मौजूद है,
- 15:13तो घटा किसका पूर्ण से पूर्ण माताएं पूर्ण में अवश्य शित है उस
- 15:21पूर्ण में से। पूर्व को भी निकाल लो, चिड़ी सारा
- 15:26भी पी जाए, समुद्र तो भी सर्पजापक ही चिड़ी हो जाएगी, सर्पजापकता
- 15:39उसकी खोती नहीं। सर्वव्यापकता उसकी गढ़ती नहीं और
- 15:45सर्वव्यापकता उसकी बढ़ती नहीं, क्योंकि जो सर्वव्यापक ही हो गया,
- 15:51उसका अर्थ ही ये है कि वह बढ़ाया नहीं जा सकता।
- 15:56सर्व का मतलब ही ये है कि जिसे पार कुछ नहीं।
- 16:04जिससे आगे कुछ नहीं। उसको सर्व कहते हैं सर्व व्यापक
- 16:10सब कहीं। तो उसमें से अगर पूर्ण भी निकाल
- 16:24लो तो पूर्ण ही शेष बचेगा क्योंकि जाएगा काम अगर समुद्र में से
- 16:38निकाल दिया गागर भर के तो गागर भी तो वही है।
- 16:49तो समुद्र में घटा कैसे? हाँ थोड़ा ट्रांसफॉर्मेशन हुआ,
- 16:56समुद्र का पानी थोड़ा घाघर में चला गया लेकिन गाटा कहाँ नदी ना
- 17:01घटे ओह नीर नीर घटा क्या? नीर समुद्र से घटा तुम कह सकते हो
- 17:09तुम्हारी बुद्धि के हिसाब से, लेकिन मैं तुमसे पूछता हूँ कि
- 17:16समुद्र से घटा तो क्या गागर में नीस में गया?
- 17:25क्या गागर में सर्वव्यापकता नहीं है?
- 17:28क्या गागर सर्वव्यापकता से कुछ अलग है?
- 17:32अगर अलग है तो फिर वह सर्व व्यापक है नहीं, पर्सन टेढ़ा है।
- 17:41जवाब भी टेढ़ा है इसे थोड़ा सहजमति से समझने की चेष्टा करो।
- 17:53जब उसने बूँदने समुद्र को पिया, तुम्हारी बुद्धि कह की बूँद
- 17:59समुद्र को पी कैसे सकती है? बिल्कुल ठीक सवाल लेकिन ऐसे ही
- 18:10उल्टबासी कबीर जैसे शांत करते हैं और उलट वासियों से ही वो समझाया
- 18:20जा सकता है क्योंकि वो गणित से समझाया नहीं?
- 18:26तो ये उलटमासी हैं कि वो दूर से दूर है और पास से पास और यह
- 18:33उलटमासी है के सर्वे में से सर्वे को निकाल लो तो फिर भी सर्वे बच
- 18:39जाता है और यह उलटमासी है। जल में रहकर मीन है व्यासी एक
- 18:46अजूबा हमने देखा तुम्हारी तकलीफ ये है।
- 19:03कि तुम उसे बुद्धि से समझने की चेष्टा करते हो एंड इट इस
- 19:14इम्पॉसिबल जो इम्पॉसिबल है? उसको तुम पॉसिबल बनाने की चेष्टा
- 19:24करते हो, जो कभी पूरी नहीं होगी। तुम्हारी बुद्धि की यही दुविधा
- 19:30है। तुम्हारी बुद्धि कहती है, पहले
- 19:33जानू, फिर छलांग लगाऊंगा। फिर छलांग लगाऊंगी।
- 19:41लेकिन संत कहता है छलांग लगाए बिना तुम जान कैसे पाओगे?
- 19:49ये उलट बसी होगी ना तुम्हारी बुद्धि कहती है पहले जान लूँ।
- 19:56फिर छलांग लगाई तो कबीर कहते हैं जीने खोजा तनपाइयाँ जो छलांग लगा
- 20:06गया, वही समुद्र को पा सका। गहरे पानी बैठ गहरे गहरे उतरते
- 20:16जाओ और उस तल में रसातल में समा जाओ, मैं वह बौरा बूढ़ा डरा मैं
- 20:25बेचारा बूढ़ा, कमजोर, अशक्त, निर्बल डर गया।
- 20:33गे वो किनारे बैठ और किनारे पे बैठ गया, हिम्मत न जुटा सका, साहस
- 20:40न जुटा सका। यह व्यंग्य है तुम्हारे लिए और
- 20:45शायद तुम इस व्यंग्य को समझे। वो किनारा कहते हैं, बुद्धि को
- 20:56तुम बुद्धि में ही बैठे रहते हो। मैं वह पूरा बूढ़ा में डरा और
- 21:05कबीर कहते हैं कि बुद्धि बेचारी है।
- 21:11बुद्धि कमजोर है बूढ़ी हो गई है तलाशते तलाशती थक गई है निर्बल हो
- 21:20गए है डर जाती है गयो किनारे बैठ तो तुम बुद्धि में ही।
- 21:27बैठे बैठे उस ब्राट को समझना चाहते हो?
- 21:31यही तो तकलीफ है, वैज्ञानिक की वैज्ञानिक की यही तकलीफ है और
- 21:39वैज्ञानिक इसी तकलीफ में जूझते हुए मर जाएंगे।
- 21:46और आखिर में अल्बर्ट आइंस्टीन की तरह क्या शब्द कहेंगे ही इस नॉट
- 21:56ओनली अननोन बट ऑल्सो अननोनबल? वह सिर्फ ऐसा नहीं कि अज्ञात है।
- 22:07वरना वह ऐसा है कि अज्ञे भी है अनप्रेडिक्टेबल अननोनबल इस नॉट
- 22:17ओनली अननोन। वह ऐसा नहीं कि अभी जाना नहीं
- 22:21गया। कभी जान दिया जाएगा नहीं, ऐसा
- 22:24नहीं। अल्बर्ट आइंस्टीन कहते हैं वे ही
- 22:28इस नॉट ओनली अननोन बट ऑल्सो अननोनबल।
- 22:34वह कभी जाना जाय रही ताकियां गल्लां कथिया ना जाए।
- 22:42जे को कहे पांच छः पशिता है। इसी दुविधा में साइंटिस्ट बेचारे
- 22:50परेशान होते होते, बुद्धि के दल पर बैठे बैठे डर जाते हैं और
- 22:58उसमें साहस करके छलांग नहीं ले पाते।
- 23:04तो फिर कहीं पहुँच भी नहीं पाते, रस नहीं पी पाते, खोपड़ी कभी रस
- 23:12को न पी सकेगी इस बात को आप अंडरलाइन कर लो और तुम्हारी
- 23:19खोपड़ी लाखों प्रयत्न करती है आनंद के रस के।
- 23:24पीने की लेकिन सिर्फ मज़ा ही पी सकती है।
- 23:29रस नहीं पी सकती। तुम्हारी खोपड़ी रस को पीने की
- 23:40निरंतर चेष्टाएं करती हैं लेकिन असफल रहती हैं।
- 23:48हाथ आता है। उसके मज़े के कुछ पल और बहुत कुछ
- 23:56गवाने के बाद मज़े के कुछ पल उसके हाथ आते है जो कुछ पल के लिए होते
- 24:05हैं और फिर खो जाते हैं। इसलिए विज्ञान जिसे वैज्ञानिक
- 24:13जिसे हल नहीं कर सकता, संत उसे हल कर लेता है तो संतो ने उसे पिया।
- 24:25पीकर व्याखयित करने की, चेष्टा की और व्याखयित करने की चेष्टा का
- 24:31नाम ही ओपेनशीव है। पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लिया
- 24:39जाए। तो पूर्ण ही शेष व्यवस्था है।
- 24:42तुम्हारी बुद्धि कह ली तुम्हारा दिमाग भेजा खराब हो गया है,
- 24:47बिल्कुल खराब हो गया है जब तुम्हारा भेजा खराब नहीं शून्य हो
- 24:55जाए, भेजा रह ही न जाए। भेजे को अपनी औकात पता चल जाए,
- 25:05उससे ना हो सकेगा तो भेजा समर्पण कर देता है और समर्पण के बाद पहला
- 25:13स्टेप शुरू होता है अध्यात्म का। तो पहला स्टेप क्या है?
- 25:19बुद्धि को समर्पित बुद्धि का समर्पण पहला स्टेप है।
- 25:27करना ही होगा अन्यथा तुम किनारे बैठे ही हो, ओके मैं वपुरा
- 25:34बुडंडरा। गयो किनारे बैठ लेकिन याद रखो तुम
- 25:43एक रास्ता पहले बता देते है जिन खो जाता न पानी, गहरे पानी पैठ।
- 25:53जो समुद्र की अतल गहराइयों में रसातल में उतर गए, उन्होंने भी
- 25:58लिया और तुम्हारी दिक्कत ये है कि तुम चाहते हो कि हम किनारे पे
- 26:07बैठे रहे हैं और उसके रसातल का पान भी करते रहे असंभव।
- 26:14आईटी स इम्पॉसिबल एंड इम्पॉसिबल कैनट बी पॉसिबल एवर?
- 26:34इसलिए भारत भूमि महानतम है। कारण जिसने वो समुद्र पी लिया
- 26:46उसके रोये रोये से जलता है और सबसे ज्यादा पांवों की तलियों से
- 26:50जलता है पोरों से। इसलिए हम संतों के पांवों में
- 26:57झुककर प्रणाम करते हैं, उंगलियों को छूते हैं तो करंट का एक सर्कल
- 27:05प्रक्रिया में आ जाता है। यही परंपरा हमने बनाई और आज ये
- 27:14परंपराएं कर्मकांड बन के रह गईं, लेकिन अर्थ तो रखती हैं, चाहे
- 27:23आपको ये पता न हो। कि बिजली की नंगी तार को हाथ
- 27:27लगाने से करंट लगता है। शॉक्ड लगता है।
- 27:29व्यक्ति मर भी सकता है, चाहे ना भी बताओ लेकिन अनजाने में भी अगर
- 27:36तुम बिजली के नंगी तार को हाथ लगा दोगे?
- 27:40यू वेरी शॉक्ड आर डाई? तो चाहे आपको रहस्य का पता हो या
- 27:48ना हो इसलिए हमने सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स अब्रेविएशन बचा
- 27:56के रख लिए बचा के इसलिए रख लिए। के रहस्य को जानना कोई ज्यादा
- 28:05जरूरी नहीं है। वर्ण रहस्य को पीना रहस्य को कर्म
- 28:18की तरह कर देना बड़ा महत्वपूर्ण है।
- 28:23अब तुम चाहे न जानो कि शांत जीस राह से गुजर जाता है।
- 28:29उसके पांव के तरिया पोर जीस माटी को छूते हैं।
- 28:35वो परम पवित्र हो जाती है, रस से युक्त हो जाती है।
- 28:47जीस जल को छूते हैं। वो जीस जल को छुआ।
- 28:54बुध ने जीस जल को छुआ। महावीर ने जीस वृक्ष के नीचे बैठे
- 29:02बुध। जीस वृक्ष के नीचे बैठे महावीर।
- 29:09हम आज सिर्फ इन बातों पर बहस करने योग्य रह गए।
- 29:19वह जल पवित्र हो गया, लेकिन पवित्र क्यों हो गया?
- 29:25हम ये बात चाहें ना जाने। लेकिन जल तो पवित्र ही रहेगा।
- 29:32इसलिए जो चट्टोपाध्याय ने वंदेमातरम लिखा उनके शब्दों में
- 29:43भारत भूमिका बड़ी गहराई से वर्णन था।
- 29:47तुम आज उस पर बहस कर रहे हो पार्लियामेंट, लेकिन क्या कोई
- 29:54उनके अर्थों को गहनतम अर्थों को जानता है?
- 29:59नहीं जानता जीस धरती से। संत निकल गया।
- 30:08उस धरती पर उनके पग चिन्ह लगे और उनके पांव के पोर लगे, उंगलियां
- 30:15लगीं वो आनंद धरती ने पी लिया इसलिए हम इसको पावन धरा कहते हैं।
- 30:25चुनो मैं उस जुबान को जिसपे आए तेरा।
- 30:42नाम तक उसका पवित्र हो गया। तो वंदे मातरम जो लिखा गया आज हम
- 30:51उस पर बहस कर रहे है और सब उल्लू बैठे है उल्लू नहीं उल्लू के
- 30:55पट्ठे बैठे है। सुजला सुफला।
- 31:06मलैया, जिसे तलान जीस जल को हाथ लगाया उसने निरंजना नदी पीने के
- 31:19लिए जीस जल को हाथ लगाया। हाथों के पोरों ने छुआ उस नदिया
- 31:26के जल को और उसमें उनका वो करंट तोड़ गया।
- 31:31जो रस पिया बने सुजलाम। और जीस वृक्ष के नीचे बैठे है।
- 31:47उनके शरीर से निकली हुई प्रत्येक आनंद के कारण उन वृक्षों ने पी
- 31:56ली। हिमालय पे गए मले शब्द हिमालय से
- 32:05बना हिमालय मले हिमालय पर जाके बैठ तो जीस सब बर्फ़ के ऊपर बैठे।
- 32:21उसका संपर्क उसके शरीर से होगा। जो सुगंधित हवाएं वहाँ से गुजरी,
- 32:33उनके तन बदन को छूकर। वो उसके आनंद को साथ लेकर चली गई।
- 32:45मलय जी शीतलाम ये शीतलमाए। जो यहाँ से गुजरे।
- 32:52बुद्ध के शरीर से लगकर, महावीर के शिर से लगकर कबीर के शिर से लगकर
- 32:57नानक के शिर से लगकर और जीस धरती पे उछल।
- 33:11मातरम माता के समान तुम्हारे लिए फल रद्द हो गए।
- 33:27मातरम हेमा मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ, तुम आज अर्थ खो गए, आज
- 33:41तो शब्द भी ना रहे। आज तो शब्द भी बहस में तब्दील हो
- 33:47गए और तुम्हारी बुद्धि की सदा यही चेष्टा रही है हे माँ तुम्हें
- 34:00प्रणाम करता हूँ तुम जलसे भरी, फलफूलों से लदी हुई।
- 34:09मंद मंद पवन से शीतल, हरियाली से डकी हुई हे, मातृभूमि
- 34:25चाँदनी से झलभलाती रातें हाथों में लगे हुए वृक्षों की शोभा मधुर
- 34:34मुस्कान वाली। मधुरवाणी से सुशोभित सुख देने
- 34:40वाली कल्याण करने वाली वरदान देने वाली सुखदा वरदान।
- 34:54मलयज शीतलाम शशि शामला मातरम, वंदे मातरम मूड लोग बैठे
- 35:21पार्लियामेंट में इस बात पर चर्चा कर रहे हैं एक एंकर किसी आरएसएस
- 35:35वाले का इंटरव्यू ले रहा था। वो कहता है सुनाओ बंदे मात्र में
- 35:42उसको नहीं आए पड़ा नहीं था उसने भेड़ें कभी पड़ा भी नहीं करती
- 35:50सिर्फ पीछे ही चला करते हैं बस वो भेड़ ही होगा कोई आरएसएस का?
- 35:59लेकिन मैं कहता हूँ कि उसको नहीं पता वो कहता है, मुझे नहीं पता तो
- 36:05मैंने उससे एंकर से पूछा और छोड़ो, वंदे मातरम, तुम्हें वंदे
- 36:11मातरम का अर्थ पता है? तो उसकी बोलती बंद हो गई।
- 36:19वंदे मातरम अगर राठी भी ले ये व्यक्ति बहुत शब्दों से ज्यादा
- 36:25कुछ मायने नहीं रखता। क्या उसका अर्थ तुम जानते हो?
- 36:33एंकर महोदय? जो बहु गए शश्य शामलान जीस धरती
- 36:45के ऊपर हम उस महापुरुषों के पांव पड़े और उन धरती के कणों ने।
- 36:53उस रहस्य का पान किया जीस जल को छुआ उस जल ने उन महान पुरुषों के
- 37:04उस रस का पान किया। महत्ता गंगा जल के नहीं है समझना
- 37:08बात को। महत्ता नदियों के जल की नहीं
- 37:15महत्ता उन संतों के हैं जो उस जल में प्रवेश करके उसको छूते हैं और
- 37:21अपनी करणों को पीने का अवसर देते हैं।
- 37:23गंगा को वह नर्मदा हो, वह गंगा हो, ब्रह्मपुत्र हो कावेरी।
- 37:31यमुना हो, सरस्वती हो ये तो कोहरा पानी है, इनकी महत्ता पानी से है
- 37:39ये कभी समझना मत। हम चूक गए रिशू ने हमारे लिए।
- 37:51बचा के रच रखे थे। रेप्रेसेंटेशन्स जिन्हें हम चिन्ह
- 38:09के रूप में पहचानते हैं। वो चिन्ह बचा के रखे थे जैसे
- 38:17शिवलिंग और बहुत सी चिन्ह। ये टल्लों का हडकाना शंखनाद ये
- 38:25घंटे गढ़यार इनका अर्थ तुम जानते हो?
- 38:31यद्यपि ये कर्मकांड तुम रोज़ करते हो हवन यजन तो कर्मकांड रोज़ करते
- 38:39हो, लेकिन इसका अर्थ तुम्हें पता नहीं और जब तर्क तुम अर्थ नहीं
- 38:44जानते, ये कर्मकांड भी बेकार है। तो महत्ता गंगा की बिल्कुल भी
- 38:51नहीं है, महत्ता है उन संतो की जिन्होंने उस महत को पिया, विराट
- 39:01को पिया और जिनके शरीर का रोमरो। उसको प्रवाहित कर रहा है और वो
- 39:08गंगाजल में उतरे निरंजना नदी का ज़रा भी महत्त्व नहीं महत्त्व है
- 39:17बुद्ध बुद्ध के शरीर के पोरों ने। रोम ने नरंजना नदी में प्रवेश
- 39:27किया तो निरंजना निहाल हो गए। क्यों?
- 39:36क्योंकि बुद्ध ने उस एनलाइटनमेंट के लम्हे में वह विराट पी लिया।
- 39:45और जब व्यक्ति वराट को पी लेता है तो स्वभाविक रूप से वह वराट उछलता
- 39:55है भीतर और कहता है मुझे बांट। तो फिर संत दौड़ता है, संत दौड़ता
- 40:06है क्योंकि उसके भीतर का रस ऊलांघ ही मारता है कि मुझे बांटे तो संत
- 40:15बांटता है। एक हिसाब से संत का बांटना उसकी
- 40:19मजबूरी भी है। और एक हिसाब से तुम्हारे ये रोते
- 40:23हुए मुखड़े तुम्हारे दरदीले चेहरे तुम्हारे दुख भरे ये माथे।
- 40:35तुम त्रिपुंड लगा के सजाते हो इन्हें, लेकिन संत का माथा जब वो
- 40:47पी लेता है, उस समुद्र की अगाध गहराइयों को तो अवलोकित हो जाता
- 40:54है, उस रस से मधुर रस। तुम आज सारा कर्मकांड किये हो,
- 41:01कोई पीला लगा लेता, कोई सफेद लगा लेता?
- 41:04लेकिन ये सारे कर्मकांड हैं। तुम यजन में आहूत करते हो।
- 41:09सामग्रियों को अवन सामग्रियों को, आम की लकड़ियों को, चंदन की
- 41:14लकड़ियों को। आहूत करना था अपनी एगो को, अपने
- 41:19अहंकार को, ये ये जिन करना तो एक कर्मकांड था लेकिन ये जिन का जो
- 41:27महत्त्व था वो तुम झुक गए इस आंगन में।
- 41:34जब तुम भीतर जाओगे तो आग लगेंगी जो झूठ बोले तुम अपने स्व अर्थ के
- 41:43लिए वो तुम्हारे आड़े आएगा। तुम ऐसे ही नहीं गुजर पाओगे उस
- 41:50अंतःस्थल में उतरने के लिए। ये कल सब बाधाएं बनने को हैं
- 41:55तुम्हारे बोले हुए झूठ इसलिए संत तुम्हें आगाह करता है आवेर करता
- 42:00है, जगाता है, जग जा, अभी वेला है।
- 42:09उठ जाग मुसाफिर और भाई अब रहन कहाँ जो सोवत है जो सोवत है सो?
- 42:29खो वतु है जो जाग तू है सो पा वतु है मानस का जामा ऐसे ही चला जाएगा
- 42:42और तुम धर्मसेगर जाओगे 1 दिन धरा तुम्हारा कमाया जिसे तुम अपना।
- 42:52संपत्ति कहते थे कहाँ संपत्ति रह जाती है वो तुम्हारे संग तो
- 43:01तुम्हारे शरीर भी नहीं जाता तुम्हारे संग तो तुम्हारे शरीर
- 43:05पे। पहना हुआ कुर्दे की जेब में तुमने
- 43:08जो रखा हुआ है वो भी नहीं जाता कुर्दे की जेब में जो तुम पैसा
- 43:14डाल लेते हो, चाहे डालर हो, चाहे रूपया हो, यही रह जाता है और
- 43:19तुम्हारे उस शरीर को चार भाई पकड़ के आग में डाल देते हैं या दफन कर
- 43:24देते हैं। संतों ने बहुत बहुत आयामों से
- 43:33तुम्हें जगाने की चिष्ठा की है। सत्यों को तुम्हें अवगत कराने की
- 43:40चिष्ठा की है, लेकिन काश। तुम सत्यो से अवगत होने की खुद भी
- 43:49प्यास जगाओ, तुम तो प्रश्न पूछते हो और मैं जानता हूँ प्रश्न जिसके
- 43:57भीतर है प्रश्न कभी आध्यात्मिक? यह बात गौर से सुन्दरना प्रश्न
- 44:03कवि, अध्यात्म या संसार की नहीं हुआ करता?
- 44:08प्रश्न कभी सांसारिक या अध्यात्मिक नहीं हुआ करते।
- 44:14प्रश्न मात्र दुख से उत्पन्न हुई एक व्याधी है?
- 44:20प्रश्नमात्र एक चित्रकार है तुम्हारे प्राणों की जो उस दुखी
- 44:28मन से उपजती है, सुखी मन कभी प्रश्न नहीं करता।
- 44:36निसं प्रश्न हो गया है वह उस रस का?
- 44:40आशीर्वाद करता है जो तुम वास्तव में हो।
- 44:45इसलिए संचलन ये जो प्रश्नों की लंबी लंबी फहरस्त मेरे सामने आ
- 44:51जाती है, बस थोड़ी सी बात में मेरा जुबाब समझ लेना।
- 45:03तुम दुखी हो पुत्र, अन्यथा प्रश्न पैदा न होता जाग्य बलक के भितर
- 45:11प्रश्न नहीं पैदा होता। कृष्ण और कबीर और नानक के भितर
- 45:16प्रश्न नहीं पैदा होता क्या? बुद्ध के भीतर प्रश्न नहीं पैदा
- 45:21होता, महावीर के भीतर प्रश्न नहीं पैदा होता क्यों?
- 45:26क्योंकि बहुत सुखी हो गए दुःख ही मन के भीतर ही प्रश्न उठते हैं और
- 45:34तुम प्रश्नों को। संदेश दे तो नहीं ये तो मैंने
- 45:39पारमार्थिक प्रश्न पूछा है प्रश्न कभी भी पारमार्थिक या संसारिक
- 45:47नहीं हुआ करता प्रश्नमात्र तुम्हारे दुखों की तकदीर लिखते
- 45:53हैं। तुम्हारे दुखों की तस्वीर लिखते
- 45:57हैं। अगर तुम में कोई भी प्रश्न शेष रह
- 46:00गया तो यह समझ लेना, उसे लवादा मत उड़ा देना यह तो परमात्मा का
- 46:07प्रश्न है। मैंने संसारिक प्रश्न तो पूछा ही
- 46:12नहीं। प्रश्न मात्र ही सांसारिक है।
- 46:18प्रश्न मात्र ही तुम्हारे दुख का व्याख्यान है, अगर कोई भी प्रश्न
- 46:25तुमने तुम्हारे भीतर शेष रह गया। तो समझो तुम अभी सुख के उस कगार
- 46:33पे नहीं पहुंचे जिसे रहस्य कहते हैं।
- 46:36संत जिसे पीकर व्यक्ति परम मौन हो जाता है, चुप हो जाता है, जहाँ
- 46:46इतनी चुप्पी है पिंटो साइलेंस। और तुम्हारा प्रश्न शो है
- 47:03निःसप्रसन्नता समाधान जिसका हो गया, जो समाधि में चला गया वह
- 47:11निष्प्रेषण हो जायेगा, इस लक्षण को याद रखना।
- 47:17सूरत कलारी भाई मत हारी सूरत कलारी।
- 47:31भय मतभारी मदवापी गई बिन तो ल जब तुम निस्प्रश्न हो जाते हो तो
- 47:51समाधान तुम्हारे प्रश्नों का होता है।
- 47:57अगर प्रश्न बाकी तो समझो अभी समाधान होगा अंतिम गंतव्य है
- 48:07समाधि। और अंतिम गंतव्य समाधि में
- 48:12तुम्हारे सभी प्रश्नों का समाधान नहीं होता।
- 48:15सिर्फ तुम्हारे दुखों का, तुम्हारे रोगों का तुम्हारे
- 48:20कष्टों का, तुम्हारे संतापों का, तुम्हारे दर्दों का।
- 48:27इलाज यक मुक्त हो जाता है। एक बार भी हो जाता है समाधान
- 48:36सिर्फ तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों के जवाब नहीं मिलते वरन तुम यक सा
- 48:45यक लग। निष्प वर्षण नहीं होते तुम्हारा
- 48:51अभाव भी खत्म हो जाता है त दक्षिण तुम कबाल की बात है क्या धन वर्ष
- 48:59जाता है परम धन वर्ष जाता है। आयो जी, मैंने।
- 49:08राम रतन धन पायो पायो जी मैंने राम रतन धन पायो धन नहीं मिलता।
- 49:25परम धन मिल जाता है अभाग समाप्त तो मैं कहता हूँ, अगर अभावों को
- 49:35समाप्त करना है या तो धरती पे कम न्यूज़म ले आओ समानता भाग ले आओ।
- 49:41और अगर तुम्हारे तथाकथित सेठ संपन्न लोग समाजवाद नहीं लाने
- 49:46देते तो फिर एक और रस्ता है। संतों के पास वो बहुत बढ़िया
- 49:53रस्ता है जो सुख पायो राम भजन में।
- 50:02वो सुख नहीं अमीरी में दन में वो सुख नहीं मिलता अगर तुम अभावों से
- 50:13ग्रस्त न होते हुए अभाव तुम्हारे समाप्त हो भी गए।
- 50:21तो भी अगर तुम उस पार पे नहीं पहुंचे तो तुम्हें तपती नहीं
- 50:26मिलेंगे। बहुत से लोगों के अभाव पूरे हो
- 50:30जाते हैं, लेकिन फिर उन्होंने करना क्या है ये नहीं पता होता।
- 50:38बहुत से लोग मेरे पास आ जाते हैं। बाबा अब तो कोई है नहीं, सब है,
- 50:46जो चाहिए वो भी है लेकिन शांति नहीं है।
- 50:58वो रस नहीं है। जीस रस में आप आनंद मग्न दिखाई
- 51:01पड़ते हैं। जीस रस में वे भोर होकर आप गाते
- 51:08हैं वो रस दिखाई नहीं पड़ता हमें। है ये आपके बोलचाल से, आपके गायन
- 51:17से आपके लक्षणों से पता चल जाता है कि वो है लेकिन वो मिलेगा
- 51:26कैसे? इसकी तरकीब नहीं पता, बस मैं यही
- 51:32कहता हूँ। कि जो लोग तुम्हारे मार्गदर्शक बन
- 51:36गए हैं वो बाधा है, वो ही बाधा है, वो ही कहते हैं राह भ्रम करो,
- 51:43राधे राधे करो, पांच नाम करो, 1000 नाम करो यही बाधा है।
- 51:52अगर तुम्हें सब मिल गया, संसार में और तृप्ति ना मिले तो फिर एक
- 51:59ही रास्ता शीश है तुम कहते हो हम तो राम राम भी करते हैं, हम तो
- 52:06राधे राधे भी करते हैं। पांच इनाम भी करते हैं लेकिन।
- 52:11तपती फिर भी नहीं संतुष्टि फिर भी नहीं तो फिर इसका मतलब तुम्हारा
- 52:16मार्ग गलत है। मार्ग को सही करना होगा तो मार्ग
- 52:25गलत कहाँ है? चूक कहाँ हो गई?
- 52:28चूक ये हो गई कि तुमने परिश्रम से धन कमाया, संसार कमाया।
- 52:34और तुम्हारी खोपड़ी ने ये मान लिया कि परमात्मा भी परिश्रम से
- 52:38मिल जाएगा। यहीं जोक हो गई।
- 52:44परमात्मा मिलता है श्रमहीनता से, विश्रामता से, आराम से।
- 52:56संसार मिलता है काम से, श्रम से, परिश्रम से परिश्रम, चारों दिशाओं
- 53:06में श्रम करो तो संसार मिलेगा, विश्राम करो।
- 53:12पूरी तरह से आराम करो तो बर्बाद हो जाएगा और एक पंथ दो काच
- 53:20तुम्हारे अभाव भी समाप्त हो गए। दुःख दरिद्र तो समाप्त हुआ ही हुआ
- 53:26तुम्हारी पीड़ाएँ भी समाप्त हो गयी।
- 53:30तुम्हारी बुद्धि हीनता भी समाप्त हुई।
- 53:33तुम प्रबुद्ध भी हुए, तुम्हारी व्याधियां भी मीटिंग, कष्ट, क्रैश
- 53:39भी। मुझे चिंताएं भी समाप्त हो गई।
- 53:41क्या ये ज्यादा अच्छा नहीं है? मैंने पहले ज्यादा अच्छा मार्ग ही
- 53:49बोला। क्योंकि वह मार्ग आज खो गया था,
- 53:56इन बू जड़ संतों ने आपको गलत मार्ग पे डाल दिया।
- 54:05सही मार्ग दिखाने के लिए पहले मैं अध्यात्म नहीं उतरा।
- 54:11जब मेरा ग्रंथ कंप्लीट हो गया, बोलने को कुछ और बचा नहीं।
- 54:16अभी अगर तुम कोई प्रश्न अध्यात्मिक जैसे आज पूछ लिया तो
- 54:20मैं जवाब देता हूँ और मैं प्राइऑरटी देता हूँ।
- 54:23इन प्रश्नों को जब कोई प्रश्न नहीं होता फिर तुम संसारिक प्रश्न
- 54:29उठाते हो। फिर मैं उन प्रश्नों को उठा लेता
- 54:32हूँ। चलो जब तक बैठा हूँ इस घर में, तब
- 54:37तक तुम्हें कुछ तो बता जाओ पर महात्मा न बता सका जो कि बताया
- 54:44नहीं जा सकता, मैं तुम्हें थ्योरी बता सकता हूँ।
- 54:53लेकिन तुम्हें प्रैक्टिकल में उतरना होगा।
- 54:57प्रैक्टिकल में तुम उतरते नहीं, इसलिए तुम वहीं के वहीं बने रहते
- 55:04हो। काग पढ़ाया पिंजरा पढ़ गया चारों
- 55:08बेत। तो वे तो तुमने चारो पढ़ लिए
- 55:11लेकिन प्रक्टिकली नहीं समझाए, समझा नहीं जब वो समझ में आता ही
- 55:20नहीं तो समझोगे कैसे? अरे ठीक ठीक तो मूर्ख के मूर्ख ही
- 55:27रह जाता। ये पार्लियामेंट में बैठे हुए सभी
- 55:30लोग डेड हैं, शब्दों से संतुष्ट हो जाते हैं, शब्दों से बहस कर
- 55:36लेते हैं। शब्दों के ही इनके सारे प्रयास
- 55:42है, लेकिन शब्दों से कुछ हल नहीं होता।
- 55:47ना शब्दों से भूख मिटती है, ना शब्दों से प्यास मिटती है ना
- 55:52शब्दों से अभाव समाप्त होती है तुम सब कुछ भी दे दोगे देखिए
- 55:57मैंने कहा मैं 25,00,00,000 दे दूंगा, दे भी दूंगा कहाँ से लेके
- 56:03आऊंगा? ये जिसने वायदा किया है उसकी
- 56:06सिरदर्दी है। ज़रा तुम कहो तो ज़रा तुम भी तो
- 56:15अपनी झोली फैलाओ झोली तो अब तक 4000 लोगों ने फैलाई।
- 56:24और वोट हैं सतान में करो। जागो सोने वालो, सुनो मेरी कहानी।
- 56:48तुम्हारी चाहत तो हैं हम उस उसमान को छी लें, उस आसमान को छू लें,
- 57:00लेकिन तुम्हारे चारों ओर अंधकार रूपी बुद्धि तुम्हें पथ भ्रष्ट कर
- 57:07देती है। ये बुद्धि कहती है नहीं ऐसे कैसे
- 57:10मिल जाए? बुद्धि सबसे बड़ी अड़चन है।
- 57:17तुम कहते हो परमात्मा नहीं, मैं कहता हूँ संसार में भी ये अड़चन
- 57:21है तुम चौंकना मत, संसार में भी बुद्धि अड़चन बनती है।
- 57:31तुम्हें अभी इस तथ्य का पता नहीं, क्योंकि अब बड़ी लंबी हो रही है
- 57:37मैं किसी अन्य वीडियो में बताऊँगा 1 घंटे के करीब वीडियो होने चाहिए
- 57:45पूछा है। संत जीस धरा पे चलते हैं लोग उस
- 57:50माटी को माथे से क्यों लगा लेते हैं क्योंकि संत के रोए रोए से वो
- 57:57रहस्य आनंद जरता है और जीस माटी पे गुजर गए वो माटी उस रहस्य को
- 58:05पी लेती है। इसलिए उस मिट्टी का हम तिलक करते
- 58:09हैं। आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं, दिखाएं
- 58:29झाँकी हिंदुस्तान की, इस माटी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की।
- 58:39वन्दे मातरम, वन्दे मातरम, वन्दे मातरम, वन्दे मातरम हे माता
- 58:52तुम्हें वंदन करते हैं। जहाँ से गुजर गया संत।
- 58:58वो माटी साधारण माटी नहीं रहती, वह माटी माँ बन जाती है अब तुम
- 59:05समझना हम माँ क्यों कहते हैं नदियों को, माटी को, माँ क्यों
- 59:09कहते हैं? जीस नदी के जल में संत उतर गया वह
- 59:14नदियां माँ हो गई। जीस पेड़ की छाया में संत बैठ
- 59:18गया, वह पेड़ माँ हो गया, पिता हो गया और ये धरती तो संतों की धरती
- 59:29है, यही झांकी है हिंदुस्तान की। संत जहाँ चलता है, माटी चूस लेती
- 59:44है उसके आनंद के रस को, इसलिए इस माटी में लोट पोट हो जाना है।
- 59:51मेरे चाचा जब जाते थे अयोध्या में।
- 59:55मैं तुम्हें सत्य बात बताता हूँ। अब उनका निधन हो गया।
- 1:00:01जब अयोध्या में जाते तो रास्ते में जंगल पड़ते जंगलों के रास्ते
- 1:00:06वो पैदल जाते, मैंने पूछा चर्चा यहाँ से बसें भी जाती?
- 1:00:14और कोई संसाधन जाते तुम पैदल क्यों जाते कहते पुत्र अब तुम
- 1:00:22समझदार हो गया, मैं वहाँ से लूट पोट के जाता हूँ धोती पहनी होती,
- 1:00:32कुर्ता पहनना होता। कुर्ता निकाल देते और लूटपुट हो
- 1:00:36के जाते हैं, सारे शरीर पे माटी लग जाती है और उस माटी को उठाकर
- 1:00:44तिलक करते सिर मुँह पे मार लेते हैं और आँखों में आंसू आ जाते
- 1:00:52हैं। मैंने कहा चाचा क्या हुआ?
- 1:00:55कहते है वो धरती है जहाँ से राम गुजरे, मेरे भगवान गुजरे तब इतनी
- 1:01:05समझ नहीं थी, आज पता चला। तो राम गुजरे तो क्या हुआ?
- 1:01:13माटी ने क्या पी लिया? वो आनंद पी लिया जीसको दुनिया तरस
- 1:01:19रही है तुम्हें चाहे सारा जहन मिल जाए लेकिन इस माटी की राह को मत
- 1:01:30छोड़ देना। तुम कंगाल हो जाना मंजूर कर लेना,
- 1:01:35लेकिन इस समाटी का तिलक लगाना मत भूल जाना इस समाटी का तिलक जरूर
- 1:01:41लगा लेना। हाँ वो बच्चों तुम्हें दिखाएं
- 1:01:47झांकी हिंदुस्तान की। इस माटी से तिलक करो, ये माटी है
- 1:01:55भगवान की वंदेमातरम, वंदेमातरम जो भाग्यवान हुआ जो उस भगवत्ता को
- 1:02:09उपलब्ध हुआ। जो विराट के साथ एक आकार हुआ,
- 1:02:13जिसने उस विराट का रश्मी लिया उन घड़ियों में जिसे हम समाधि कहते
- 1:02:21हैं, एनलाइटन मेंट कहते हैं, प्रबुद्धता कहते हैं वह भगवान हो
- 1:02:29गया। वह कहीं से भी गुजरा।
- 1:02:31नानक ने उदासियाँ की तो उस धरती को चूम लेना, कभी तो कहते हैं कि
- 1:02:40उस नाम को ही चूम लेना। जीस पे नाम आए उस जुबान को भी चूम
- 1:02:45लेना। कि शुक्र मेरे वतन का नाम तो
- 1:02:54तुम्हारी जुबान पे आया हूँ और तुम चर्चा कर रहे हो वंदे मातरम की
- 1:03:02उल्लू के पट्ठो। तो मैं समझदार कहूं चीज़ के अंतः
- 1:03:16रस को समझे बिना बहस करना बेकार फिर तुम्हारी बुद्धि की खुजलाहट
- 1:03:22के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ये जो तुमने पार्लियामेंट हाउस बना
- 1:03:27रखा है। मूड़ों का घर है पागल बैठे हैं
- 1:03:34यहाँ गधे संत इस धरती पर पैदा हुए हैं
- 1:03:47इसलिए मैं सदा ही पश्चात से लाया गया।
- 1:03:52लिबरल सेक्स का फॉर्मूला ओशो का सिरे से मैं काटता हूँ।
- 1:03:58अरे कहाँ गंध उठा रहा है तुम इस सब ब्रह्मचर्य से फलीभोत पुष्प
- 1:04:04पल्ल्वित धरती के ऊपर तुमने क्या गंदगी खला दी, तुमने कैसे लोगों
- 1:04:10के हाथों में आश्रम दे दिया? जिनके भीतर संस्कृति और संस्कार
- 1:04:18पाश्चात्य के थे और उनको अध्यात्म का कुछ ठोर ठिकाना ही नहीं पता तो
- 1:04:25फिर उजाड़ तो बनना ही था सारे उल्लू बैठा दिया तुमने?
- 1:04:40बर्बाद गुलस्ता करने को एक ही उल्लू काफी है बर्बाद ही गुलस्ता
- 1:04:50करने को बस एक ही उल्लू काफी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है।
- 1:04:57अंजान में बुलस्त क्या होगा जिधर जाओ उल्लू की उल्लू बैठ ये माँ
- 1:05:08अमृतं बुला लिया ये माँ फलाना प्रसाद बुला लिया ये माँ फलाना
- 1:05:13प्रसाद अरे नाम ही हिंदू रखे हैं? संस्कृति तो इनमें पाश्चात्य है।
- 1:05:21यहीं चूक खा गए और अब वो मुझे समझाते हैं ऐसा काम तुम मत कर
- 1:05:25लेना। संत जीस धरा से गुजर गया उ कोई भी
- 1:05:43गुजरा उ कबीर गुजरा के नानक गुजरा के बुद्ध गुजरा के महावीर गुजरा
- 1:05:49के राम गुजरा के कृष्ण कृष्ण कोई भेद नहीं होता सन्तु में।
- 1:05:56बूंद जब सुंद्र में समा जाती है तो भेद रहितता हो जाती है, बूंद
- 1:06:02सुन्दर ही हो जाती है। बस इतना ही ख्याल रखना के
- 1:06:10पाश्चात्य हो अपूर्व में तुमने मिला तो दिया।
- 1:06:16खिचड़ी तो तुमने बना दी इसको अन्नकूट मत बना देना खिचड़ी तो
- 1:06:23बना दी तुमने कृपा करना इसको अन्नकूट मत बना देना।
- 1:06:28बस मैं इसी बात से डरता हूँ के हिंदुस्तान की धरती।
- 1:06:34अन्नकूटना तुम कभी बना दो, क्योंकि जब आध्यात्मिकता मूर्खों
- 1:06:44के हाथों में आ जाती है और देश ही आज तुम मूर्खों के हाथों में जो
- 1:06:52जो नाम बदलने को। बदलाव कहते हैं गरीब भी का नाम
- 1:07:01तुम अमीरी रख दो, क्या अमीर हो जाओ, भूखे को कह दो, रोटी रोटी का
- 1:07:10जाप करो, भूख मिट जाएगी, क्या भूख मिट जाएगी?
- 1:07:15प्यासे को कहो? रेगिस्तान की धरती में जलती हुई
- 1:07:18आग में प्राण मांगते हो पानी और तुम कह के जाप करो, पानी, पानी,
- 1:07:26पानी, पानी, पानी जाप करो, प्यास मिट जाएगी, क्या मिट जाएगी व्यास
- 1:07:32लेकिन तुम तो ऐसे ही बुद्धुओं के। अधीन है तुम्हारी बुद्धि फिर
- 1:07:41तुम्हें मैं क्या कहूँ? किस नाम से संबोधित करूँ तुम्हें?
- 1:07:52मूढ़ों को तो मूढ़ों के ही नाम से संबोधित किया जा सकता है।
- 1:08:01बस यही थी महिमा हमारे हिंदुस्तान की माटी थी।
- 1:08:07इतने आध्यात्मिक लोग यहाँ पैदा हुए हैं, विदेश में कहीं भी नहीं
- 1:08:14हुए। थोड़े बहुत कोई टाँमे टाँमे जिसे
- 1:08:18कह देते हैं कुछ थोड़े थोड़े लेकिन पूरी की पूरी कतार पूरा का
- 1:08:27पूरा झुंड इसी धरती पे पैदा हुआ है इसलिए ये धरती।
- 1:08:36महत्त्व हो गई। इसमें आध्यात्मिकता की महक है,
- 1:08:45खुशबू है, सुगंध है, इसको माथे से लगा दो, इसको चूम लो।
- 1:08:54माँ का दिल बन के कभी सीने से लग जाता है तू बंदे मातरम माँ का
- 1:09:11दिल। बन के कभी सीने से लग जाता है तो
- 1:09:22और कभी नन्ही सी बेटी। बन के याद आता।
- 1:09:34है तू? जितना याद आता है मुझको उतना
- 1:09:42तड़पाता है तू। तुझ पे दिल करवाऊं हैं मेरे
- 1:09:54प्यारे वतन हैं मेरे बिछुड़े चमन तुझ पे दिल करवाऊं।
- 1:10:10ए मेरे धन्यवाद।