Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 Mar 26 - ठहरना ही सूत्र है: दौड़ने से कभी ज्ञान नहीं मिलता
Transcript
- 0:00इच्छाएं सिर्फ एक व्यक्ति की पूरी होती है होता है।
- 0:07संत संत की इच्छा पूरी इस तरह होती है कि उसकी इच्छा समाप्त हो
- 0:17जाती है। उसकी इच्छाएं समाप्त हो जाती है।
- 0:26उसकी इच्छा कोई रहती नहीं, यहाँ तक कि उसकी जीने की इच्छा में
- 0:31नहीं रहती है तो क्या वह आत्महत्या कर लेता है?
- 0:35नहीं। आत्महत्या इसलिए नहीं करता
- 0:42क्योंकि इसकी इच्छाएं गिर जाती हैं।
- 0:45एक असत्य को जानने के बाद वह सत्य यह है।
- 0:59जो इन राजनीतिज्ञों को तथा कथित धार्मिक प्रवचनकर्ताओं को गुरुओं
- 1:07को गुरु मैं तुम्हें आज ये ठहराने की बात बता दूँ ये जो।
- 1:20किसी भी धर्म का प्रचार करें, धर्म चाहे कोई भी हो, हिंदू हो,
- 1:28मुसलमान हो, सिख हो, ईसाई हो, पारसी हो, जो होते हो, इनमें से
- 1:35किसी को भी। विश्वास नहीं है कि परमात्मा है
- 1:42बस यही मूल दुख का कारण है कितना भी तुम्हें समझा ले।
- 1:58कितनी भी शिष्य इकट्ठे कर ले, कितनी भी सब्सक्राइबर इकट्ठे कर
- 2:04ले, कितनी भी बहशन कर ले, कितनी भी शिष्य बना ले, प्रेस करने वाले
- 2:12कितनी भी मनाली करा ले। लेकिन एक बात को मेरे याद रखना
- 2:20इन्हें भरोसा नहीं है कि परमात्मा है और काम करता है।
- 2:26भरोसा और भरोसा का जी भरोसा नहीं। दर्शन का भरोसा जो किसी की किताब
- 2:42पढ़ के आ जाए, शास्त्र पढ़ के आ जाए, कोई धार्मिक ग्रंथ पढ़ के आ
- 2:49जाए व परमात्मा का विश्वास कागजी है।
- 2:56आत्मघाती, इसको पढ़ने के बाद तुम ये मान लोगे कि हाँ मैं ज्ञानी हो
- 3:05गया हूँ, वस्तु से तुम अज्ञानी रहोगे।
- 3:11ये बहुत बड़ी। सत्य की बात तुम्हें मैंने आज
- 3:17समझाई, तुम्हारा गुरु चाहे कोई भी हो, चाहे तुम नासिक हो और तुम
- 3:29कहते हो कि हम तो पहले से ही कह रहे हैं कि परमात्मा है नहीं,
- 3:34विश्वास किसपे करें। लेकिन तुम्हें ये भी विश्वास नहीं
- 3:41है कि परमात्मा नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि जो पागल हो
- 3:51जाता है वो राजनीति में चला जाता है?
- 3:54आज मेरा विचार बदल गया। पहले कहता था जो राजनीति में चला
- 4:03जाता वो पागल हो जाता है आज मैं कहता जो पागल हो जाता, वो राजनीति
- 4:09में चला जाता है ढूंढ ढूंढ के थक जाता है आदमी।
- 4:16और दो ही बातें हैं या तो तुम कहोगे वे है नहीं ब्रह्मात्मा मार
- 4:23के सो जाओगे, तुम चार बाक हो जाओगे, तुम निक से हो जाओगे।
- 4:31यार तुम कहोगे कि वह परमात्मा है, तुम मंत्र जाओगे, गुरुद्वारा
- 4:36जाओगे, मस्जिद जाओगे, चर्च जाओगे, तुम पूजा करोगे, प्रार्थना करोगे
- 4:41शोर स्वचार पूजन करोगे, नमाज़ पढ़ोगे, सारे त्यौहार मनाओगे
- 4:48लेकिन एक बात को ख्याल में रखना। ये सारे कर्मकांड कर्मकांड है, यह
- 4:59दर्शन से नहीं आते, यह तुम्हारी मान्यताओं से आते है तो एक बात
- 5:08मैंने कही। इसको हृदय में उतार तुम चाहे
- 5:14आस्तिक हो, तुम चाहे नास्तिक हो, लेकिन तुम दोनों मूर्ख हो, जो
- 5:22मंदिर जाता है, गुरुद्वारा जाता, मस्तिष्क जाता गरजा, घर जाता।
- 5:34वह पागल है क्योंकि उसे पता ही नहीं, ईश्वर है भी कि नहीं और भला
- 5:44ये व्यर्थ की यात्रा क्यों कर रहे हो?
- 5:47आज यात्रा। तीर्थ यात्रा ये काहे कर रहे हो?
- 5:54ये सब तुम्हारी मान्यता आधारित फौकी फिलॉसोफी है।
- 6:02यह ज्ञान नहीं है, ये तुम्हारी मान्यता है।
- 6:07और मान्यताएँ सच तब होती हैं जब तुम दर्शन कर लेते हो।
- 6:18इसलिए मैं तुमसे एक बात आज कहता हूँ, तुम चाहे किसी मजहब से हो या
- 6:28किसी मजहब से नहीं हो। नास्तिक होना भी एक तरह का मजहब
- 6:34में होना नास्तिकता भी एक मजहब है।
- 6:39आस्तिकता भी एक मजहब है, वो एक दो तरीका है, लेकिन दर्शन कोई मजहब
- 6:48नहीं होता। दर्शन तो आँखों देखी वह सत्य होती
- 6:55है जो उसने देख ली जैसे हम आज आसमान में तारे देखते है, सुबह
- 7:03सूरज उगता है हम देखते है। शाम सूर्य ढल जाता है चाँद उग
- 7:12जाता डर जाता हम देखते हैं यह मान्यता नहीं है फूल खिलते हैं
- 7:20भागों में हम देखते हैं सुगंध आरती।
- 7:27हम सूंघते हैं, आनंदित होते हैं। यह मान्यता नहीं है यह सत्य का
- 7:34दर्शन और तुम्हारी मान्यताओं में तुम चाहे आस्थिक हो, तुम चाहे ना
- 7:42आस्थिक हो, लेकिन तुम दोनों ही मूर हो।
- 7:51तुम सिर्फ कर्म कांडे निभाए जाते हो।
- 7:58बस एक ज्ञानी ही ऐसा ऑथेंटिक वर्शन है।
- 8:06जो सभी रूढियों को सभी मान्यताओं को तोड़कर जो बोलता है वह सत्य
- 8:13बोलता है। वह जो बोलता है अपना देखा बोलता
- 8:20है। किसी का कहा सुना पढ़ा, शास्त्र
- 8:26में लिखा गन बोलता लिखा लिखी की है, नहीं देखा देखी बात परमात्मा
- 8:37के उस आनंद के रस के बाद। न लिखने में आती न देखने में आती।
- 8:49यह तो साक्षात दिव्यदक चक्षु से दिखता है।
- 8:55तुम्हारी इन खुली आँखों से परमात्मा नहीं दिख पाएगा।
- 8:58अगर दिखता तो अब तक दिख जाता। वह दिखेगा किसी और आंख और वो आंख
- 9:08तुम्हारे पास है नहीं, जब वो आंख खोलेगी तो तुम्हें सत्य नज़र
- 9:14आएगा। माना इनती गुनती चिंती के लोग हैं
- 9:21यहाँ संसार। और तुम पागलों की भीड़ में इन्हें
- 9:28पागल कैसे? और तुम्हारे कहने का इन लोगों पे
- 9:34कोई असर नहीं तुम महावीर के। पत्थर मारते हो तुम बुद्ध के ऊपर
- 9:45सूख जाते हो, गालियां निकालते हो, मोहम्मद के हाथ पांव काट लेते हो
- 9:53ईशा को तुम सूली चढ़ा देते हो मीरा को तुम जहर का प्याला पीला
- 9:57देते हो, सुख रात को तुम। जहर का प्याला पीला देखते हो?
- 10:04कारण क्या है? सिर्फ एक कारण है तुम तुम्हारी
- 10:10मान्यता को सही मानते हो और सुकरात अपने दर्शन को।
- 10:19सुखरात तुम्हारी मान्यताओं को पांव के ठेंगा पर रखता है क्योंकि
- 10:29वे उसने ही जानती है। उसने अपने नग्न नयनों से निहार
- 10:34लिया उसका स्वरूप। सब देख लिया, जिसके जानने से सब
- 10:46जान लिया जाता है। उस सर्वे को उसने जान लिया इसलिए
- 10:54तुम लाख जकाई मारो, मैं तुम्हारा बुरा नहीं मानूंगा।
- 11:00तुम गालियाँ निकालो, तुम कीचड़ फेंको, तुम उन्हें कोई नुकसान
- 11:08पहुंचाना, तुम उन्हें ज़लील कर। उन्हें सब स्वीकार बस उनका तो एक
- 11:23ही तरीका है और जिसने वह दर्शन कर लिया, सत्य उन सबका एक ही तरीका
- 11:32होता है। कबीर कहते हैं, सब्य सेयण एक मत।
- 11:39ऐसे ही लोगों को कबीर सच्चे कहते हैं।
- 11:44मूर्ख अपनों अपने बस एक मत होते हैं श्रेणी कि बहरा स्वरूप है।
- 11:54रसो वैसा और तुम तब तक भटकते रहोगे।
- 12:03खंडहरों में, गुफाओं में, मंदिरों में, मस्ज़िदों में भटक नहीं
- 12:09होती। काबा चले गए, तीर्थों पे चले गए
- 12:14गंगासागर चले गए बद्रीनाथ, अमरनाथ, केदारनाथ लेकिन ये सब
- 12:24नौटंकिया कहीं जाने से तुम्हें सुकून नहीं है।
- 12:32और अगर किसी को मिला हो तो बता दो मैं सदा ही कहता हूँ नहीं मिलता
- 12:42क्षण भर का आनंद तो तुम अपनी खटिया भी ले लेते हो।
- 12:51लेकिन वह अखंड नहीं होता। आनंद तो वह जिसकी तार कभी टूटना।
- 13:05ज़िन्दगी की न टूटे लड़ी ज़िन्दगी की न टूटे लड़ी।
- 13:24प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी लंबी लंबी उमरिया कुछुड़ो लंबी लंबी।
- 13:42उमरिया को छोड़ो, प्यार की एक घड़ी हैं, बड़ी प्यार कर ले घड़ी
- 13:59दो घड़ी। और जिसने घड़ी दो घड़ी तो बहुत
- 14:06ज्यादा कह दिया। यह सिर्फ शायरी के अलफाज़ हैं।
- 14:14सत्य तो यह है कि जिसने एक भूत भी उस रस की पीली।
- 14:21उसकी जिंदगी का आनंद अखंड हो जाता है।
- 14:27तुम लाख तोड़ो बेहद जोड़ता है, असंभव है।
- 14:37संत के आनंद को तोड़ देना काट दो भून दो सूली झटका, दो जहर फैला दो
- 14:51तुम जो कर सकते हो कर दो। लेकिन उसके आनंद की लड़ी तुम
- 14:58थोड़ा न हो गई, बस यही उसका कमाल है और यही सत्य का कथन बेमिसाल
- 15:09है, जिसने सत्य को जाना। जिसने रस को पिया, वह अमर हो गया
- 15:21और उसका आनंद भी अमर हो गया। व्यर्थ की बड़कनों को छोड़ इनमें
- 15:32तुम बहुत तुल जली। बहुत जन्मो जन्मो से तुम इन्हीं
- 15:41कामों में उलझा करते हो, कभी राजा हो लिए, कभी कंगाल हो लिए।
- 15:51कभी सारी दुनिया का धन जोड़ लिया, कभी बेहाल हो लिए, लेकिन कभी
- 16:00आनंदित नहीं हुए और यह बड़े कमाल की बात है कि वह रस भी के तुम ठहर
- 16:10जाते। और यह और भी कमाल की बात है कि जब
- 16:18तुम ठहर जाती हो, परिपूर्णता से ठहर जाते हो, तब उस रस को भी लेते
- 16:25हो। ये बातें बड़ी एकता नजर आएंगी और
- 16:29बड़े विपरीत भी नजर आएंगी। तुम जब ठहर जाते हो तो उस आनंद का
- 16:37पान करते हो और तुम जब उस आनंद का पान करते हो तो ठहर जाते हो।
- 16:45ये बात बड़ी अजीब सी लगेंगी। अगर तुम्हें सत्य का दर्शन करना
- 16:52है जिसके दर्शन करने के बाद सभी दौड़ धूप में मिट जाएगी।
- 17:03छीना छपटी में मिट जाएगी, जोड़ तोड़ मिट जाएगा।
- 17:11तुम हार जाओगे, तुम थक जाओगे, इस ज़िन्दगी की आपाधापी से तो मैं
- 17:20तुम्हें एक ही अलफ़ाज़ कहना चाहता हूँ, आज कुछ न करो।
- 17:31परमात्मा को पाने के लिए कुछ न करो, उस रस आनंद को पाने के लिए
- 17:41उस रस आनंद को पाने के लिए कुछ न करो।
- 17:47ठहर जाओ मात्र ठहर जाओ, सिर्फ ठहर जाओ और ठहरने से तुम उस सत्य को
- 17:58पालोगे जैसी चलती हुई गाड़ी में तुम भ्रमित हो जाते हो कि पेड़
- 18:04पौधे दौड़ रहे हैं। चाँद तारे आसमान दौड़ रहा है।
- 18:11यह सारा संसार तुम्हें घूमता हुआ दौड़ता हुआ दिखाई पड़ता है, लेकिन
- 18:16वो एक भ्रम होता है। वह भ्रम टूटता कब है जब गाड़ी ठहर
- 18:24जाती है? तो तुम पाते हो कि यह स्टेशन तो
- 18:32ठहरा हुआ है यहाँ लोग जो ठहरे कल तक नज़र आते थे मुझे, भागते हुए
- 18:40ये तो सब ठहरा हुआ है ये चाँद धारे।
- 18:45ये दूर दूर जमीन, ये दूर दूर के नज़ारे सब ठहरे हुए यह बेद क्यों
- 18:56तपन हुआ पहले तुम दौड़ रहे थे, गाड़ी दौड़ रही थी तुम उस।
- 19:03गाड़ी के ऊपर सवार थे। गाड़ी के संग संग तुम भी दौड़ रहे
- 19:09थे और तुम्हें भ्रम हो गया कि शायद ये चाँद तारे तोड़ रहे हैं
- 19:17ये वृक्ष, ये धरती? ये आसमान सब दौड़ रहा है, लेकिन
- 19:25कुछ भी नहीं दौड़ रहा सब अपनी जगह ठहरा है, सत्य को जानने के बाद
- 19:37तुम उस रस को। पहली बार पिओगे और फिर पहली बार
- 19:46पीने के बाद तुम इस मैराथन की दौड़ से बाहर हो जाओगे।
- 19:51यह एक लक्षण है। संत का संत अगर तुम्हे दौड़ता
- 19:57दिखाई पड़े। तो समझ लेना, संतत्व में कुछ कमी
- 20:06संत अभी हो, क्योंकि जो आनंद रस पीने में है।
- 20:18वह घूमने फिरने में, तीर्थ यात्रा करने में, आजमक्का में, गंगा सागर
- 20:24में नहीं, जो सुख छत, जूते चुपा रहे ना बल्क, ना बुखारें तो ठहराव
- 20:36में कैसे पहुंचा? इस चलती हुई गाड़ी से नीचे उतर
- 20:43जाओ क्योंकि यह गाड़ी फिर चलेगी। हर स्टेशन पे ये ठहरती ये
- 20:53तुम्हारा मन। इस गाड़ी से नीचे उतर जाओ।
- 21:00सटेशन का मतलब ही होता है ठहरना टु स्टे ठहराव सटेशन के ऊपर आ जाओ
- 21:13तुम ठहर गए हो अब तुम दौड़ोगे नहीं।
- 21:16गाड़ी दौड़ेगी, मन दौड़ेगा, लेकिन तुम सिटीजन के ऊपर शीतल बनते
- 21:27रहोगे और इस भागते हुए मन को निहारते रहोगे और जानते रहोगे।
- 21:37यह दौड़ता हुआ मन मैं नहीं हूँ मन दौड़ता है जैसे पहले तुम्हें लगता
- 21:46था चाँद सितारा दौड़ता है वृक्ष धरती आसमान दौड़ता है।
- 21:54ऐसे ही अब लगेगा कि मन दौड़ता है। दौड़ना इसका स्वभाव है तो तुम इसे
- 22:02दौड़ने दो। तुमने क्या करना है?
- 22:07तुम्हें कुछ भी नहीं करना है तुम सटेशन के ऊपर।
- 22:13खड़े खड़े ठहर जाओ और तुम अपने आप में उतरने लगोगे, रोज़ गहरे होते
- 22:24चले जाओगे। रोज़ गहरे होते चले जाओगे।
- 22:301 दिन तुम परम ठहराव के उस रसातल में पहुँच जाओगे जहाँ वह आनंद का
- 22:40सागर मौजूद है। फिर पानी को कुछ बाकी नहीं रहता।
- 22:49फिर तुम्हें उस दिन तुम सच्चे आस्तिक हो जाओगे, उससे पहले
- 22:57परमात्मा को मान लेना, मेहज मान लेना नास्तिकता होती है।
- 23:05नै मानना तो नास्तिकता होती है। ईश्वर को मानना, दर्शन से पहले भी
- 23:11नास्तिकता ही होती है तो तुमने जाना तो है नहीं?
- 23:21आँखें खोलो, सत्य को जानो ठहरने से तुम्हें यह ज्ञान मिलेगा।
- 23:28दौड़ने से कभी ज्ञान हुआ नहीं करते।
- 23:33ठहरना है सूत्र मैं रोज़ बताता हूँ तुम्हें और बार बार याद
- 23:42दिलाता रहूँगा जब तक सांस में सांस बाकी।
- 23:49और जीस दिन ठहर जाओगे उस दिन तुम आनंद से भरे हुए खजाने हो जाओगे
- 24:01फिर तुम औरों को लूटाना। उससे पहले तुम औरों को मत लूटाना
- 24:07क्योंकि तुम्हारे पास लूटाने जैसा कुछ है नहीं लूटाने जैसी चीज़ इस
- 24:14सृष्टि में एक ही है और वह है आनंद का रस।
- 24:23वे अभी तुम्हारे भीतर है, अभी तो तुम खुद ही दौड़ रहे हो, अभी
- 24:29तुमने उस आनंद को पाया नहीं। अभी तो तुमने संसार के सुख पाए,
- 24:35संसार के साधन पाए, सुख होने के साधन पाए, रस नहीं पिया।
- 24:45और सच्चे आस्तिक, तुम उस दिन आओगे, जीस दिन उस रस को पीओगे उस
- 24:51दिन जो ठहराव आएगा वो कालातीत होगा, उसको मृत्यु नहीं मार
- 24:57सकेंगे। वहीं पे आके कृष्ण कहते हैं, नैनम
- 25:03छदंती शस्त्रण उसे कोई शस्त्र नहीं काटता, जो ठहरा हुआ तत्व है
- 25:10उसे शस्त्र नहीं काटता। नैनम छदंती शस्त्रण।
- 25:18नैनम बहती पावका न चैनम क्लेदन त्यापो न क्षति मारता, फिर तुम
- 25:28आनंद में सदा झूमते रहोगे, इसको याद रखना मन तुम्हारा बार बार
- 25:34तुम्हें भुलाने की चेष्टा करेगा। क्योंकि इस ठहराव में मन मरता है
- 25:41और मन कभी नहीं चाहता कि वह मरे इसलिए वह तुम्हारे ठहरने में
- 25:48तुम्हारी इमजाद नहीं करेगा वरन खलल डालेगा उसे खल डालने देना,
- 25:55उससे झगड़ा मत करना। धीरे धीरे वह चुप हो जाएगा।
- 26:01खर ल डालनी बंद कर दे और तुम धीरे धीरे परम ठहराव में चले जाओगे।
- 26:10यही है तुम्हारा गंतव्य उससे बाद में तुम।
- 26:16बांटने के योग्य हो जाओगे, उससे पहले तुम बांटने के योग्य नहीं,
- 26:22क्योंकि बांटने के योग्य आनंद ही हुआ करता है।
- 26:27सुख भी बांटने जैसी चीज़ नहीं। आनंद मात्र रस आनंद बांटने योग्य
- 26:35मैं तभी बांटोगे, फूल तभी बांटेगा सुगंध को जब वह सुगंध से भरा
- 26:44होगा, तुम सुगंध से पहले भरो। जमातों को इकट्ठा करने की चेष्टा
- 26:54मत करो, हालांकि मन तुम्हारा मन कहेगा शिष्य बना लूँ, लेकिन मैं
- 27:04तुम्हें कहता हूँ पहले गुरु होने के योग्य हो जाओ।
- 27:09और गुरु होने की योग्यता क्या होती है?
- 27:13तुम्हारे भीतर आनंद का वह सागर पैदा हो जाए और तुम उसमें
- 27:20असिश्चित हो जाओ, प्रतिष्ठित हो जाओ जिसे कृष्ण कहते हैं अपनी
- 27:26प्रज्ञा में स्थित हो जा ही अर्जुन।
- 27:30फिर तुम बांटने के योग्य हो जाओगे।
- 27:33अभी मैंने कहा तुम्हारी दुनिया में तुम्हारे गुरु बांट रहे हैं
- 27:39लेकिन आनंद नहीं है वो वो एक छलावा है।
- 27:48बहुत शलाबा है इस शलाबे में जो आ गया वह ठग आ गया।
- 27:56अगर तुम्हें रस नहीं आता आनंद नहीं आता तो यह कोरी लफ़ज़े और
- 28:04लफ़ज़ों से। ना विकास हुआ करते हैं, ना आनंद
- 28:09आया करते हैं। मेरी इन बातों को गौर से सुनना,
- 28:17मनन करना, गुणना और फिर ठहरने का जतन करना।
- 28:251 दिन तुम पाओगे मैं जो बोल रहा था वह सत्य बोल रहा था, धन्यवाद।