Latest / Baba ji Vijay Vats / 11 Jun 25 - नहीं चाहिए तुम्हारा “शुक्रिया”...परमात्मा का बहुत गहरा संदेश! भगवान होना था भाग्यहीन नहीं!
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- 0:01प्रणाम बाबा जी, केशव पराग चंद्र बाबा जी, मूर्ख और बुद्धिमान।
- 0:19व्यक्ति के लक्षण क्या बुद्धिमान, वह जो सब कुछ कर के भी उसका श्रेय
- 0:35लेने की चेष्टा न करें? सब कुछ कर के भी।
- 0:43उसकी श्रेय लेने की चेष्टा न करें।
- 0:48वह बुद्धिमान जैसे जैसे परमात्मा परमात्मा ने इतनी वराट सृष्टि की
- 0:59सृजना की। लेकिन ज़रा भी श्रेय लेने की
- 1:05चेष्टा नहीं की। परमात्मा ने कभी कहा मैंने यह
- 1:11बनाया परमात्मा ने कभी कहा मैंने फल, फूल, वृक्ष, जीव जंतु।
- 1:23पानी पंचतत्व, ग्रह, नक्षत्र, तारे, ब्रम्हंड कि मैंने बनाया।
- 1:40कभी उसने श्रेय लेने की चेष्टा की नहीं की तो जो श्रेय लेने की
- 1:49चेष्टा नहीं करता बनाने के बावजूद भी वही समझदार है।
- 2:01और मूर्ख कौन है मूर्ख? वह क्यों करता कुछ नहीं सिर्फ
- 2:14श्रेय लेता है सिर्फ और सिर्फ। श्रेय लेता है करता कुछ नहीं।
- 2:26जैसे जैसे किसी कोच फैक्टरी में कोई गाड़ी का डब्बा बना, कोई इंजन
- 2:37बना। किसने वेल्ड किया लोहा किसने
- 2:45सकरूज नट बोल्ट फिक्स किये, किसने रंग रोगन किया, किसने गद्दियाँ
- 2:55जचाईं? सब काम धम कर दिया सभी ने और फिर
- 3:06जब गाड़ी तैयार हो गई तो कोई चुप कैसे आया और झंडी दिखा गया।
- 3:18श्रेय लेके आओ तो चाणक्य कहते हैं ऐसा व्यक्ति जो सिर्फ श्रेय ले
- 3:25जाए ध्यान से सुन लेना। ऐसा व्यक्ति जो सिर्फ श्रेय ले
- 3:31जाए। उससे बड़ा मूड कोई नहीं होता और
- 3:38उससे बड़ा समझदार और दानी कोई नहीं होता तो सब कुछ बना दे,
- 3:44विराट के सृजना का सृजन करते और ज़रा भी ना जताए, हमने बनाया।
- 3:55हम हैं सर्जक कभी परमात्मा ने कहा, तुम्हें आकर के सर्जना का
- 4:05निर्माण जो तुम देख रहे हो, मैंने किया कभी तुमसे कोई मावजा मांगा।
- 4:12सारी दुनिया श्रेय लेने की दौड़ में एक दूसरे से आगे मैराथन की
- 4:20दौड़ लगा रही हूँ एक भाग रहा है, दूसरा उसके पीछे तेज़ भाग रहा है।
- 4:31पहला चाहता है मैं श्रेय ले लूँ दूसरा चाहता है श्रेय मैं ले लूँ
- 4:38बस यही मूर्खता है और व्यक्ति तो इतना मूड है कोई पशु, पक्षी,
- 4:50जानवर। पेड़, पौधा, पत्थर, संसार का कोई
- 4:59अस्तित्व, परमात्मा का धन्यवाद, सिर्फ एक मनुष्य है जो परमात्मा
- 5:09का धन्यवाद करे। और मनुष्य से बड़ा मूर्ख मेरी
- 5:17बातों को ध्यान से सुन धन्यवाद किसका?
- 5:24करियर सारी सर्जना। अपने होने में संतुष्ट है और अपने
- 5:33होने में शांत है अपने होने का लुत्फ उठा रही है और एक मनुष्य है
- 5:42ऐसा मूड की वह नाम स्मरण कर रहा है।
- 5:51एक व्यक्ति नाम स्मरण कर रहा था। मैंने पूछा उससे क्या कर रहे हो?
- 5:56मैं तो प्रभु का नाम स्मरण कर रहा हूँ।
- 6:01मैंने कहा कुछ मांगना है नहीं सब है।
- 6:07तो फिर क्यों नाम से गुण कर रहा है उसका अहसान?
- 6:12चुकाना चाहता हूँ शुक्राण करना चाहता हूँ उसकी शिफ्ट सालाह करना
- 6:22चाहता हूँ यानी की क्या उसने मांगा?
- 6:31क्या उसने मांगा मेरी शिफ्ट करो मेरी शलागाह करो मांगा तुने पर जब
- 6:40मांगा नहीं तो तुम नामजद क्यों कर रही हो?
- 6:48यही मुड़ता है। मैं रोज़ कहती हूँ, जब परमात्मा
- 6:56मांगता नहीं गिराधे राधे करो, कृष्ण कृष्ण करो, राम राम करो या
- 7:03कभी मांगा हो तो बता दो। कभी किसी भक्त को कहा हो परमात्मा
- 7:10नहीं, कभी किसी कार्य खंडव किसी प्राणी मात्र को कहा मैं नाम
- 7:21स्मरण से प्रसन्न होता हूँ, मेरा नाम स्मरण करो तो बताओ।
- 7:29और जीस तिन परमात्मा ने ये बात कह दी कि मैंने इतना किया क्या तुम
- 7:36मेरा नाम सिमंड नहीं करो, क्या तुम मुझे धन्यवाद नहीं दोगे?
- 7:42समझना उस तिन परमात्मा? अपने वराटत्व से गिर गया।
- 7:50उस विराट की वराटता इसी बात में है।
- 7:54वह सब कुछ करके भी श्रेय नहीं मांगता, श्रेय नहीं लेता।
- 8:05और तुम धक्के से नाम शमण के बहाने राधा राधा करते हो, उसे रिश्वत
- 8:13देने की चेष्टा करते हो, हनुमान जी की सवमणि मन्नत मानते हो?
- 8:26मातारानी की चुन्नी मातारानी की शादी मन्नत मानते हो।
- 8:34मेरा ये काम कर दो मातारानी तेरे दरबार पे आऊंगा आऊंगी।
- 8:42तेरे को साड़ी चिढ़ाउंगी तेरे को चुन्नी चिढ़ाउंगी जी क्या मजाक
- 8:49है, जिसके भीतर इतना ही लोभ नहीं है?
- 8:59सच्चा दाता तिल ना तमाम तिल भर भी उसमें तमा नहीं, वह सच्चा है तुम
- 9:08उसको झूठा बनाने पे तुले हुए हो तुम एक अपराध कर रखे हो, जान बूझ
- 9:17कर अपराध कर रहे हो। सच्चा दाता तेल न दाना वह दाता
- 9:25देने वाला दाता बनाने वाला दाता सृजन करता जिसने सारा विश्व रच
- 9:32दिया उस में। तिल भर भी तमन्ना नहीं है लोभ
- 9:42नहीं है, लालच नहीं है, इतना भी लालच नहीं है कि तुम श्रेय दे दो,
- 9:52धन्यवाद कर दो सुकराना कर दो। ये शुकराना तुम्हारी एजाज है और
- 9:57मैं इसे रिश्वत कहता हूँ। परमात्मा के तोहफों का आनंद उठाना
- 10:14सीखूं। और अगर तुम परमात्मा द्वारा
- 10:19प्रदत्त दोषों का आनंद उठाओगे तो परमात्मा बहुत खुशी, शोक,
- 10:30परमात्मा प्रसन्न होगा। और अगर तुम उसकी शब्द सलाह भरोगे
- 10:38तो वह तुमसे नाराज हो जा रही। मैंने कब मांगा और तुम उसे उसकी
- 10:50करनी का रिवॉर्ड दे सकोगे। उसका नाम श्रवण करके शब्द सलाह
- 10:59करके उसका धन्यवाद करता हूँ के तुम जो उसने दिया शुक्राणा करके
- 11:09वापस कर पाओगे। अगर सही में तुम वापस करना चाहते
- 11:15हो तो परमात्मा ने इतना सुंदर से किया सुव्यवस्थित सभी प्रकार के
- 11:22भीतर की एक्यूरेट सूक्ष्म क्रियाएं चल रही है।
- 11:27अपने आप तेल झड़पता है। पिपरे सांस लेते हैं, भोजन की
- 11:35नाली, भोजन बचा रहे हैं, लिवर जुइसेस पैदा कर रहे हैं, सभी अंग
- 11:42प्रत्यंग अपने अपने काम कर रहे हैं, किडनी फिल्ट्रेशन कर रही है।
- 11:52सभी अंग बृचंग अपना अपना काम कर रहे हैं।
- 11:57अगर तुम उसकी एवज में वापस करना चाहते हो तो जैसा यंत्र तुम्हें
- 12:05मिला वैसा ही यंत्र तुम प्रोड्यूस करके उसे वापस करो।
- 12:12बिल्कुल वैसे फिर होगा ये प्रतीका फिर होगा ये उसकी वापसी उसके
- 12:26कर्मों का। उसके उपकार का वापस आना, लेकिन
- 12:38तुम तो शरीफ तो छोड़ो, तुम में तो इतनी ताकत हुई नहीं कि तुम एक कजर
- 12:44रहा। पानी की वाष्प बना दो, मिट्टी का
- 12:51कण बना दो हवा का एक झोंका पैदा करो, शरीर का एक बार बना एक नाखून
- 13:02तक पैदा नहीं कर सकते। शुक्राणा करने चले थोथ चना बाजे
- 13:11गाना यह शुक्राने की आड़ में हम उस पर अहसान कर रहे।
- 13:25मैंने देखा है ऐसे जो उलाहना देते हैं, मैं रोज़ तेरी स्तुति करता
- 13:32हूँ, मैं रोज़ सुबह उठ के हनुमान चालीसा करता हूँ, लेकिन तू है कि
- 13:39मेरा दर्द सुनता ही। तुम इतने अहसान, परम उत्सव हो,
- 13:51शुक्रना कर के छुपाओ उस परमदयालों का सच्चे सा है होगा?
- 14:02उसकी बड़ाई तुम कर कैसे पाओगे, जिसकी बड़ाई का कोई और छोड़ना आदि
- 14:10नहीं, अंत नहीं, मध्य नहीं, तुम्हें पता नहीं उसका मेज़रमेंट
- 14:15का विस्तार कितना वह कहाँ से शुरू होता कहाँ से अंत होता कहाँ से
- 14:20उसका मध्य। हम कैसे उसको कर पाओगे?
- 14:30लेकिन सारी दुनिया जैसे पागल खाना हो गई।
- 14:37अब अलग से पागल खाना बनाने की जरूरत नहीं रहेंगी।
- 14:43मैंने परमात्मा से पूछूं कितने लोग बाग हैं तेरा नाम स्वर्ण कर
- 14:53रहे हैं, कोई कहता होगा? आई एम यू आर यू आर माइ कोई कित्ता
- 15:06वाओ हे गुरु सतनाम। कोई राम राम कोई रात ही रात है,
- 15:25सभी तेरा स्तुति गान कर रहे हैं क्या तुम्हे नहीं लगता प्रभात
- 15:34क्या इनके लिए अलग से पागल खाना बनाते ना चाहिए?
- 15:42भला इनकी तमन्ना ये पूरी कर पाते हैं।
- 15:45ये तुम्हें वापसी में कुछ वापस करना चाहते हैं।
- 15:49क्या वापस कर पाएंगे? जीस जुबान से राम राम करते हैं,
- 15:54वो भी तो तुम्हारी दी हुई है? और राम राम करने के लिए जो जीवा
- 16:00हिलती है उसकी चेतना और एनर्जी तुम्हीं से तो आती है तो परमात्मा
- 16:10बोला। अलग से पागलखाना बनाने की जरूरत
- 16:18नहीं है। अलग से पागलखाना तब बनाया जाता है
- 16:24अगर थोड़े से पागल एक आध कोई पागल हो जाए जब सारी सृष्टि पागल हो गई
- 16:34है। तो फिर अलग से पागलखाना बनाने की
- 16:38आवश्यकता कहाँ रह जाती है? फिर सारा संसार ही पागलखाना, बस
- 16:47अलग से पागलखाना बनाने की जरूरत तो तब होती है कोई परिवार में एक
- 16:52आध का मुकाबले हो जाए। तो उसे पागलखाने में ले जाओ।
- 16:57मेंटल ट्रीटमेंट का उसे उसका मानसिक उपचार करो।
- 17:04लेकिन आज ये दुनिया है में कुछ न करके भी श्रेय लेने की चेष्टा में
- 17:10भागी जा रही है। उसे कुछ भी आज सारी दुनिया
- 17:20परमात्मा का बखान करने पे लगी हुई है।
- 17:26उस तत्व का बखान जिसका। ना कभी ज्ञान होगा, ना कभी दर्शन
- 17:38होगा ना उसके बारे में तुम्हें जर्रा भी पता चलेगा और उसके बारे
- 17:46में तुम व्याख्यान कर रहे हो कभी सच में सोच के।
- 17:54तुम बड़े व्यस्त हो कि नहीं खाली मरहरों में आराम से बैठ के सोचना
- 18:04क्या तुम उसका किया हुआ तिल भर भी लौटा पाओगे?
- 18:11उसने इतना किया? जन्म से मृत्यु तक तुम जो भी चीज़
- 18:19प्रयोग में ले के आते हो, सब उसी की बनाई उसी का बनाया जलता है,
- 18:26उसी का बनाया उगता है, उसका बनाया फरी बहुत होता है।
- 18:31उसी का बनाया विपरीत होता है तो तुम कहाँ से आ गए तुमने तुम्हारे
- 18:38शरीर से मेहनत की यह शरीर किसका इस शरीर का जर्रा भी तुमने बनाया
- 18:48फिर मैं कहाँ से आएगा? क्या तुम पागल नहीं हो?
- 18:54क्या तुम समझदार हो? ज़रा सोचना फुर्सत के लम जब तुम
- 19:05खाली हो जाओ, नॉन बिज़नेस में आ जाओ ए व्यस्त हो जाओ।
- 19:11व्यस्तता ज़रा भी ना रहे तो ज़रा सोच ले फल दो पल के लिए क्या मैं
- 19:19उस सद्दी व परम पिता परमात्मा का तिल मात्र भी वापस कर पाऊंगा?
- 19:29कितनी क्षमता है मेरे जो हाथ वापस करेंगे वो हैं किसके, किसने दिए
- 19:41और जो तेलमात्र तुम वापस कर पाओगे वो तेल किसका?
- 19:48यहीं चूक हो गई। मानव से सारी सृष्टि आनंदित है।
- 19:55उसके उपहारों से एक मानव है के उसके उपहारों का आनंद न ले।
- 20:03के। उसके उपहारों को वापस लौटाना
- 20:12चाहता है। इससे बड़ा मूड, प्राणी और ये
- 20:23वृक्ष। ये कोयल की कुफू कुफू ये वृक्षों
- 20:32का खिलना, फूलों का खुशबू देना, झरनों का बहना, ये मूक हवाओं का
- 20:41चलना। सुगंधों का बिखरना, फूलों का
- 20:44खिलना, कलियों का मुख खोल देना, रस्मों का गहन ग्रह, नक्षत्रों का
- 20:56चलना मुक्त। चंद्रमा सूरज की मुख्य सेवा सुबह
- 21:07उगते सांज डूब जाते हैं, सारे दिन तुम्हारी सेवा करते हैं तुम उसके
- 21:17बनाए हुए। तोहफों का आनंद लेने के बजाय उसके
- 21:24बनाए हुए तोहफों का वापसी करना चाहती हूँ।
- 21:33मतलब क्या है? तुम अहंकारी हो।
- 21:38जो व्यक्ति किसी भी ढंग से उसके दांतों का आनंद न उठा के लुत्फना
- 21:46उठा के साला उसकी आस्तुति। करने में व्यस्त है, कुछ लौटा
- 22:03दूँ? उसको ऐसा भाव है उससे बड़ा पागल
- 22:10और ये पागलपन सिर्फ मनुष्य में। विवेक क्या दे दिया भगवान इस
- 22:19विवेक का तुमने दुरूपयोग करना शुरू कर दिया जीस विवेक को ठीक
- 22:26क्या और गरज क्या उसमें प्रयोग करना चाहिए था उस विवेक को तुमने?
- 22:45साला ही साला शलाघ्र करने में शिफ्ट करने में गुज़रने का।
- 22:58तुम लोग को जांच ना सकोगे अगर सच में तुमने उसके शिफ्ट करना अगर सच
- 23:09में तुमने उसका किए हुए का आदर करना वापस करना।
- 23:16तो बिलकुल वैसी ही चीज़ बनाओ और वापस करो ऐसा पागलपन किसी में कोई
- 23:25नहीं चाहती कि मैं अपने कंठ की वाणी।
- 23:37इससे कुछ बदला दू उसको इससे कुछ उसका भार उतरे फूल नहीं चाहते।
- 23:45यह सुगंधी जो बिखेर रहा हो, इससे परमात्मा प्रसन्न हो जाए, लेकिन
- 23:52तुम तुम परमात्मा को प्रसन्न करना चाहते हो।
- 23:57कैसे भी प्रसन्न करना चाहते हो पत्रम पुष्पम फ़िल्म तो ये पत्र
- 24:05चिड़ातित्य जो पत्र तुमने पैदा नहीं किया, जो उसी की अमानत है,
- 24:13उसी की पैदा। पत्थरम पुष्पम पुष्प फल चढ़ा देते
- 24:18हो, फूल चढ़ा देते हो फलम तोयम पानी चढ़ा देते हो, जो भी तुम
- 24:26चढ़ाते हो, छत्तर चढ़ा देते हो सोने के उनमें से तुमने एक कण भी
- 24:34नहीं बन गया। फिर तुमने क्या खाक चढ़ गया?
- 24:41ये तुमने बनाया कुछ नहीं तो तुने चिढ़ाया क्या?
- 24:48बस यही विडंबना है मानव की यही मोड़ता है मानव की।
- 24:53वह बनाता कुछ नहीं, सिर्फ श्रेय लेने का माहिर श्रेय लेने की बड़ी
- 25:02जलती है, उसे करता कोई और है और श्रेय लेना मनुष्य चाहता है।
- 25:14कुछ नहीं करता तुम अगर कुछ करते हो तो बता दो परमात्मा को देने के
- 25:29लिए तुम्हारे पास है क्या तुम्हारा कुछ अपना है?
- 25:37जो परमात्मा को तुम चढ़ा सको, जो परमात्मा को तुम भेंट कर सको, जो
- 25:44परमात्मा को तुम बदले में वापसी कर सको, तुम्हारे पास कुछ अपना
- 25:49है। गौर से देखोगे तो तुम्हारा अपना
- 25:54कुछ भी, जो चिढ़ाओगे वो मूढ़ता के कारण चिढ़ाओगे, वो चाहे सोने के
- 26:02मुखटों हो, चाहे जल हो, चाहे पत्र हो, पुष्प हो या फल।
- 26:13अगर उसको उसकी नियामतों का उसके गिफ्ट्स का, उसके तोहफों का कुछ
- 26:25प्रतिकार करना चाहते हो, वापसी करना चाहते हो?
- 26:31तो बिलकुल एक दम से नाम छोड़ देना क्योंकि इससे बड़ा पागल प्रनाहित
- 26:42शराब पीने से मस्जिद में बैठकर। जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में
- 26:50बैठकर या या वो जगह बता जाना खुदा का घर या फिर बता दें कि तुम्हारा
- 26:59क्या है तुम क्या अर्पण कर सकते हो उसके?
- 27:08जो उसका नहीं है वही तो अर्पण करवाओगे तुम तुम्हारी तरफ से
- 27:16तुम्हारी तरफ से क्या है तोहफा? उसके लिए क्या नाम सुना है?
- 27:22क्या गरीबों को दान? क्या उसकी इस सृष्टि को पालन पोषण
- 27:31ये तुम करोगे? बस तुम्हारी मूर्खताएं ऐसी ही?
- 27:43तुम ऐसे ही पागलपन में उलझे हुए हो और ठीक कहा परमात्मा ने अलग से
- 27:51पागलखाना बनाने की जरूरत तभी है पुत्र जब कोई समझदार बचा हो।
- 28:02जब सभी पागल हैं और कोई समझदार एक निकले यदा कदा हजारों साल हजारों
- 28:15साल नरगिस अपनी बेनौरी फिरोती है। बड़ी मुश्किल से होता है चमन में
- 28:23बेदावर बैठा कोई एक गुलशन में घोल गिरता है, कभी परमात्मा कहते हैं
- 28:33यह समझदार यह भाग्यवान हुआ। इसका बीज खेला और पुष्प बनकर
- 28:45प्रलोभित हुआ सुगंध बिखेर और यह सुगंध बिखेरना ही गिफ्ट लेना है,
- 28:55अन्यथा तुम परमात्मा को खुशी। और वह जो एक पुष्प खिलेगा, वह अलग
- 29:06से अकेला बैठ जाएगा। वह तुम्हारी भीड़ में नहीं खोएगा।
- 29:15सारी दुनिया आज बागलों की भीड़ है।
- 29:17तुम गौर से देखना कभी सबको त्याग, सबको त्याग ए व्यस्त क्षणों में,
- 29:33नॉन बिजिनेस में आज। और एक वेस्ट क्षणों में फुर्सत के
- 29:39लम्हों में बैठ के सोचना कि क्या मैं उस विराट को कुछ वापसी कर
- 29:46सकता हूँ? क्या होगा अगर तुम उसका नाम ले
- 29:49लोगे वो उसको? बड़े गजब की बात है, सारी शक्ति
- 29:59तेरे तोहों का आनंद उठा रही है, एक आदमी ही इतना भाग्यहीन हो गया
- 30:08है जीसको भाग्यवान होना था, भगवान होना था।
- 30:13वह ही इतना भाग्यहीन हो गया है कि उसके पुरस्कार को उसके तोहफों का
- 30:20आनंद उठाने की बजाय उसका नाम व्यक्त कर रहा है।
- 30:29इससे बड़ी मूर्खता और कोई नहीं उग सकता अगर तुम कुछ दे सकते हो।
- 30:36तो मुझे कमेंट में लिखते हैं तुम कुछ नहीं क्योंकि तुम्हारा बनाया
- 30:45कुछ है ही नहीं। तुम कमाई को अपना बनाया समझ लेते
- 30:51हो। एक ने दूसरे की जेब से डाका मार
- 30:55दिया। अपनी जेब में डाल दिया उसको तुम
- 30:59कहते हो ये मेरा वो तुमने कमाया भी नहीं वो तुमने बनाया भी नहीं,
- 31:08उसका जो मटेरियल है वो भी तुम्हारा नहीं है जो धन तुमने
- 31:13चुरा लिया। किसी के पास था, उसका भी नहीं था।
- 31:17जीसको चुराया और जिसकी जेब में गया उसका भी नहीं है।
- 31:24सब माल मालिक का है इसलिए उसको सच्चा साहेब सच्चा मालिक का है।
- 31:31सच्चा साहेब साहेब का मतलब? मालिक सब उसका है तुम्हारा कुछ जो
- 31:46मर गया जो झील गया, जो जन्म गया, जो चला गया, जो आ गया।
- 31:55सब उसका तुम्हारा कुछ और तुम दिन भर रात अगर आंसू बहाते तो इन्हीं
- 32:03चीजों के लिए बहाते तुमसा मूड कभी नहीं देखा।
- 32:16जिसे इतना ही नहीं पता क्या छा तुम्हारा जो खो गया क्या छा बनाया
- 32:27तुमने जो बिगड़ गया। क्या पाया था तुमने जो खो गया
- 32:36क्या था तुम्हारा जो तुमने बनाया था पर वो कोई छीन के ले गया तो
- 32:47परमात्मा जी? कोई एक व्यक्ति गुलशन में उठेगा,
- 32:54लहराएगा खुशबुओं ने वह खुद अपना मुकाम चुन लेगा, उसकी फिक्र मत
- 33:01करो पुत्र ये दुनिया तो एक पागल खाना है।
- 33:06अलग से पागल खाना बनाने की जरूरत नहीं।
- 33:10क्योंकि जब दुनिया ही पागलखाना हो जाए, सभी पागल हो जाएं तो फिर अलग
- 33:15से पागलखाना बनाने की औचित्य भी क्या रह जाती है?
- 33:21कुछ भी तो नहीं रहती। तुम सुमित हो मेरा।
- 33:29तुम समित हो, मैं है नानक विक्से कर विचार नानक कहते हैं, परमात्मा
- 33:39तुम्हें देख देख के हँसता है नानक विक्से कर विचार।
- 33:47तुम्हें देख देख के हँसता है क्यों हँसता है, हँसता है
- 33:53तुम्हारे पागलपन पे हँसता है तुम्हारी मूडताओं पे हँसता है
- 33:58तुम्हारी मान्यताओं पे हँसता है तुम्हारे पाखंडों पे हँसता है
- 34:03तुम्हारी मान्यताओं पे तुमने जो थोप नी।
- 34:06तुम्हारी थोप न उभे तुम आज इतने विकृत हो गए हो, इसको कौन कैसे
- 34:17सुधारें और परमत में मज़े से देख रहा है।
- 34:26जिसका कुछ है नहीं, वो छाती पिट रहा है और जिसका है वो मज़े से
- 34:33आनंद ले रहा है। नानक विग से कर भी चा वह विग से
- 34:40वह प्रसन्न होता है जिसका है नहीं वह छाती पीटता है मेरा चलन।
- 34:50यह धारणा ही गलत है। किन्हीं अभागे क्षणों में किन्हीं
- 34:55अभागे लोगों ने दुष्ट पुरुषों ने ऐसी इजाजतें की थीं, जो आज
- 35:01मनुष्यता पर भारी पड़ गई। जिसने तुम्हारा चैन लूट लिया,
- 35:07सबसे कीमती तुम्हारा वक्त लूट लिया, सब कुछ लूट लिया।
- 35:20कहाँ तक नाम? गिनवाएं सभी ने हमको लूटा है, सभी
- 35:35ने हमको लूटा है। सभी ने तुमको लूट लिया।
- 35:44हमारा कीमती वक्त जो उसके तोहफों का आनंद मनाने में गुजर सकता था,
- 35:54आज इन मूर्खों का प्रवचन सुनने में गुजर रहा यह पखंडी।
- 36:24परमात्मा तुम्हारी हरकतों पे हँसता है शेर के मारे हुए पे
- 36:35गीजड़ कलोलें करती है आपने देखा कब जंगल में शेर मारता है अपना
- 36:43शिकार? जितनी भूख उतनी खा लेता है बाकी
- 36:49छोड़ दे, शेर चला जाता है, उसके बाद गीदड़ आते हैं, गीदड़ करोले
- 36:55करते हैं। देखा हमने मार गिराए देखा घुस के
- 37:02मारा घर में। यह है सर तुम्हारी मूर्खताओं के
- 37:17अतिरिक्त, और कुछ नहीं। वह संत संत नहीं जो तुम्हारे वक्त
- 37:28को हनन करते हैं बामुकर तुम्हें थोड़े से लम्हे मिले हैं जीने को
- 37:37कितनी सी ज़िन्दगी है तुम्हारे पास?
- 37:41के दो चार पल के जीवन में और तुम उसके दिए हुए तोहफों का आनंद
- 37:48मनाने की बजाय हंसने, खेलने, गाने कूदने और आनंद मनाने की बजाय।
- 38:03तुम राम राम में उलझे हो जाओ, किसने पागल बना दिया?
- 38:08तुम्हें? कौन दोस्त हैं जिसने तुम्हारा समय
- 38:16छीन लिया? ये समय मिला था तुम्हें उपहार
- 38:23मिले थे, तुम्हें इस समय का सदुपयोग करते हैं और इन गिफ्ट्स
- 38:32का उपहारों का लुत्फ लेते हैं। तो तुमने सही जीवन व्यतीत किया।
- 38:43उसके उपहारों का लुत्फ लेके जो जीवन को आनंदमय कर देता है उसका
- 38:50जीवन सार्थक हो जाता है। जो उसके उपहारों को दिए हुए
- 38:57उपहारों का आनंद नहीं लेता, व्यर्थ की बकवास में उलझा रहता
- 39:04है, बस वही मूर्ख है तुमने पूछ पुत्र मूर्ख कौन वही मूर्ख?
- 39:14तुम्हारा कुछ नहीं है, सच्चा दाता तिल ना तब है सब उसका है और वह
- 39:23सच्चा सब उसका है और उसमें ज़रा भी तमन है।
- 39:32बस सब कुछ बना के उसका श्रेय नहीं लेना चाहता।
- 39:36फिर ना तम आए, ज़रा भी तमन्ना नहीं उसके भीतर तमा नहीं उसके
- 39:41भीतर कि मुझे कोई श्रे दे, लेकिन फिर भी तुम श्रे देते हो?
- 39:50रस्सी जल गई, बल में गया। तुम इंसान इंसानों को रिश्वत देते
- 40:01ही देते, भगवान को भी रिश्वत देने में संलग्न होगा।
- 40:07तुमने अपनी मानसिकताएँ परमात्मा पर थोप दी।
- 40:13के जैसे रिशों से आदमी वश में आ जाता है भैसी आदमी वश में आ जाता
- 40:21है, साम, दान, दंड, भय इनसे आदमी वश में आ जाता है।
- 40:27इसी तरह परमात्मा भी वश में आ जाएगा।
- 40:30रिश्वत देखे? कौन नहीं वश में होता?
- 40:36और यह शब्द प्राण घातक सिद्ध हुआ तुम्हारे लिए छोटी सी जिंदगी का
- 40:47तुम लुत्फ उठाते उसके उपहारों का आनंद उठाते उसके रस को पीकर।
- 40:58घूंठ घूंठ पीते उस रस को कंठ से नीचे उतारते उस रस को और झूम झूम
- 41:06जाते मीरा की तरह पग में घूंघुर बांध लेते हैं नानक की तरह गीत
- 41:11गाते हैं कबीर की तरह सुरती में। मस्त हो जाती है जैसे उसकी सार्थक
- 41:20कुछ शिष्यने लोगों ने उसके उपहारों को ग्रहण किया, आनंद माना
- 41:26और वह लम्हे सार्थक कर लिए। जितनी देर जिए कुछ कुछ।
- 41:35गिने चुने व्यक्ति जिसकी तमन्ना की थी नरगिस ने हजारों सालों से
- 41:44बड़ी मुद्दत से होता है चमन में तीता वर पैदा हो कोई एक कबीर पैदा
- 41:49हो वह सुरती कुमारी रे गया। कोई एक नानक पैदा हुआ, उसने कोयल
- 41:57की तरह गीत गाए, कोई एक महावीर पैदा हुआ, उसने अपने क्या वरले का
- 42:08आनंद उठाया, कोई एक बुद्ध पैदा हुआ?
- 42:13उसने व्यर्थ को त्याग उसने तुमको समझाया कि कुछ तुम्हारा ढंग भरे
- 42:23पूरे आसन को हीरे जड़ित संघासन को उसे लात मार दी।
- 42:32किसलिए सिर्फ निर्वाण के लिए तुम मुक्ति चाहते हो मुक्ति का मतलब
- 42:41क्या मुक्ति का मतलब तुम दुखी हो तुम्हें चाहिए सुख क्या राम राम
- 42:50करने से सुख मिल जाएगा? क्या कोई भी नाम जपने से सुख मिल
- 42:55जाएगा? बुध कहते हैं छोड़ो ये बुकवा से
- 43:02ऐसा कुछ करने से सुख नहीं मिलेगा। सुख कैसे मिलेगा, सुख मिलेगा अपने
- 43:08उस तल पे मुझसे जाओ। जहाँ सब वासनय विचार विकृमियां सब
- 43:16समाप्त हो जाती हैं और तुम नरोल शुद्ध बुद्ध अवस्था में वहाँ
- 43:21प्रतिस्थापित हो जाते हो लुत्फ उठाया जीवन का उन्नयन।
- 43:29कुछ गिने चुने लोग इस धरा पे आए जो तुम्हें सीखा के जीवन को कैसे
- 43:36जिया जाता है, उसके दिए हुए उपहारों को भोग करें।
- 43:42त्याग करने उसने उपहार त्यागना के लिए तुम्हें दिए ही नहीं।
- 43:51अन्यथा वो बनाता क्यों उसने बनाए किसी कारण है तुम्हारे उसने बनाए
- 43:59तो कारण ये था कि तुम इन्हें भोगो भोगकर इनका लुत्फ उठाओ अपने ही
- 44:06बच्चों को दिए। और बच्चा लात मार दे बच्चा न नूकर
- 44:14करे बच्चा शिकायत करे बच्चा के हैं मैं तो इसके प्रतिकार स्वरूप
- 44:21तुम्हारा वज़न करूँगा चार 6 घंटे मुझे नहीं चाहिए मोस्ट की भिक्षा?
- 44:31बा जाए इस मोहब्बत से उठा ले पान पान हमें तेरे तोहफे नहीं चाहिए
- 44:42बस तुमसे बड़ा बाघिन और कौन होगा? कौन दोस्त तुम्हारे जीवन में आया,
- 44:52जिसने तुम्हारे फुर्सत के लम्हे छीन लिए और व्रत के जंजालों में
- 44:58तुम्हें उलझा दिया भला कोप से देखना?
- 45:05उन नौन बिज़नेस के क्षणों में उतर के के क्या वास्तव में जो मैं कर
- 45:13रहा हूँ परमात्मा को उसकी एवज में कुछ दे सकता हूँ मेरे में इतना बल
- 45:20है। कि मैं उसको उसके दांतों का बदला
- 45:25दे सकूँ तुम पाओगे नहीं, मैं निर्बल हूँ, मैं सबर नहीं, मैं
- 45:36कुछ नहीं दे सकता उसको प्रतिकार कर।
- 45:41मैं बिगाड़ सकता हूँ और तुम नामधारियों ने बिगाड़ा तुमने
- 45:51गेहूं खाया, मलमूत्र बना के निकाल दिया, शुद्ध जल पिया, मूत्र बना
- 45:57के निकाल दिया तुमने उसकी दांतों को।
- 46:02खराब किया और तुम सोचते हो कि उसका बदला कैसे चुका है?
- 46:10बस जो ऐसा सोचता है वह मूढ़ और जो ऐसा करता है कि उसके दिए हुए
- 46:18उपहारों का। आनंद उठाता है हँसी पो खेली पो
- 46:24दरी पो दया ये हँसना खेलना ये गाना ये नाचना, ये कूदना ये खुशी
- 46:34भीतर से उठ गई तुम्हें कुछ देख कर।
- 46:40वह भी खुशबू कर नान का विकस है कर विचार तुम जब रोते हो चिल्लाते हो
- 46:47छाती पीटते हो हाय मेरा ये चला गया हाय मेरा, वो चला गया तो वो
- 46:51हँसता है बना इसका खाक। जिसका था वो तो चुप करके बैठ उसने
- 47:01तो बनाने का श्रेय ही नहीं लिया और जो पिट रहा है उसने बनाया ही
- 47:08नहीं था, फिर उसका गुम कैसे हो गया?
- 47:12उसका चला कैसे गया? यह मूड़ता तुम्हारे दिमागों में
- 47:17किसने घुसेड़ दी, थोड़ा सा जागो होश में आओ इतनी बेहोशी अच्छी
- 47:27नहीं होती जागो जाग के देखो क्या वास्तव में तुम?
- 47:34कुछ वापस कर सकते हो, उस महामालिक को गोद से देखोगे, निष्पक्ष होके
- 47:42देखोगे तो पाओगे नहीं? मैं कुछ वापस नहीं कर सकता।
- 47:47बस यही बुद्धि माता है। इससे पहले तो मूर्खता कर रहा था।
- 47:53जैसे ही किसी व्यक्ति ने उसके उपहारों को भोगना शुरू किया,
- 47:59नाचना गाना शुरू किया उस रस को पिया और उस मस्ती में सुरूर में
- 48:04मस्त हो गया। वैसे ही उसे देखकर परमात्मा में
- 48:10भी प्रसन्न हुआ। जैसे तुम्हारा कोई बच्चा।
- 48:13जिसे तुमने कोई उपहार दिया वह उस उपहार को भोगकर बड़ा परम प्रसन्न
- 48:18होता है, अठभास करता है, खुश होता है तो तुम भी खुश हो जाते हो।
- 48:26अगर वो उस चीज़ को लेकर दुखी हो जाए तो तुम क्या सोचोगे मैंने सो।
- 48:33बनाया, इसने ठुकराया क्यों ठुकराया परमात्मा ने तुम्हें चीज़
- 48:44बनाई तुम इसको भोगो, ये इतनी सृष्टि इतनी प्यारी सृष्टि पैदा।
- 48:53दिखाने के लिए नहीं, भोगने के लिए भी रखे।
- 48:59इसमें भी रस है नीरस तो ये भी नहीं है।
- 49:05इसमें भी रस है, इसको पियो, पीके, नाचो, गाओ, हँसो खेलो।
- 49:13और फिर जब इसको भोग के इसके भोग में तुम्हें तिकपता नजर आए,
- 49:20कड़वाहट नजर आए तो फिर तुम उस मुकाम पे चले जाओ, एक दूसरा मुकाम
- 49:28भी परमात्मा ने तुम्हारे भीतर दिया है।
- 49:33जहाँ जाकर तुम्हारी सुर्ती लग जाती है, जहाँ शब्द और सुर्ती का
- 49:41एकाकार होता है, जहाँ खुलता है तीसरा नृत्य जहाँ सहस्रार की
- 49:48हजारों पंकड़ियां एक दम से घिल जाती है।
- 49:51और परम खुशबू का उद्गम स्रोत खुल जाता है।
- 49:58तुम उसके आनंद में भीनी भीनी सुगंध लिए मस्ती में झूमते हो,
- 50:07फिर तुम वहाँ चले जाओ। उसकी दी हुई सर्जना को भोगो, उसको
- 50:16वापस करने की चिष्टा न करो, क्योंकि यह एक अमूड़ता है और यह
- 50:22अमूड़ता जो कर रहा है वो बंद कर दे तो ज्यादा अच्छा है।
- 50:27मत जपो उसका नाम जप के तुम उसको वापस कर पाओगे उसकी इतनी दांतों
- 50:35को एक ज़रा भी बना पाओगे, नहीं बना पाओगे तो अभी से बंद कर दो और
- 50:44उसकी सृष्टि को भोगकर। तुम्हें अगर कुछ नहीं मिला सवाय
- 50:49तीक्तता के कड़वाहट के, तो फिर चलो वहाँ चलो जहाँ पर आनंद के
- 50:58झरने बहते थे जहाँ से मस्ती की सुगंध उगती है।
- 51:07जहाँ से तुम्हारे अनप के फूल खेलते हैं, चलो मेरे संग।
- 51:18चलो। सितारों पे ले चलो।
- 51:33दिल। झुमजा ऐसे बहारों में।
- 51:42ले चलो, आओ हजूर और सितारों। पे ले।
- 51:56चलो दिल झूम जा। ऐसी।
- 52:03बहारों में ले चलो आओ हजूर, तुमको तुम।
- 52:15उससे कुछ देने का प्रयास बंद करो। उसे कुछ दे ना पाओगे अपनी पूरी
- 52:25शक्ति लगाकर भी तुम उसको कुछ ना दे पाओगे माटी का एक कण भी तुम ना
- 52:33भेंट कर पाओगे तुम्हारे में इतनी शक्ति है।
- 52:39जिसने इतनी सर्जना की बड़ा विराट है वो और उसको कुछ देने का ख्याल
- 52:48सी पाप है अपराध है, बंद करो ये अपराध कैसे चुकाओगे उसका कर्ज?
- 53:00हमें जानकर हैरानी होगी वह तुम्हें कर्ज के रूप में कुछ देता
- 53:04है। वह तुम्हें जो देता है नियामत के
- 53:08रूप में देता है, वह तुम्हें जो देता है तौहफे के रूप में देता है
- 53:14ताकि तुम इसका आनंद मान सको। जैसे पिता अपने पुत्र के लिए
- 53:18तोहफा ले के तुम उसके प्रतिकार स्वरूप कुछ मन में रखे के मुझे
- 53:25कुछ देगा। सच्चा पिता कभी कुछ नहीं मांगता
- 53:31और सच्चा बाप भी कोई तमन्ना नहीं रखता।
- 53:34सच्चा दाता। वह शिक्षा है, उसके मन में ज़रा
- 53:44भी तिल मात्र भी लोभड़ और तुम उसे दे भी तो कुछ नहीं हो सकता, उसी
- 53:51की बनाई हुई संग रचना उसे क्या दे सकती है?
- 53:57इस फितूर को दिमाग से निकाल यह मात्र फितूर है।
- 54:03मूर्ख वह जिसने कुछ बनाया नहीं, जो कुछ बना नहीं सकता, फिर भी
- 54:12श्रेय लेने को बेताब है। और समझदार को जो ये समझ जाता है
- 54:18कि मैं कुछ बना नहीं सकता, मैं कुछ खो नहीं सकता।
- 54:24मैं कुछ बना नहीं सकता जीसको ये समझ में आ गया, वह समझदार हो गया।
- 54:33मूड़ताओं का त्याग हो, समय बड़ा कीमती है पल पल बीता जाए, गनी गई
- 54:45थोड़ी रही तभी बीती जाए जो बाकी बची है।
- 54:55उसको गँवाओ और सबके लम्हे पैसा उर्झो मत, ये तुम्हारी उलझें किसी
- 55:06दुष्क ने ना जाने के अभागे क्षणों में तुम्हें गुमराह कर।
- 55:13नहीं, तुम मुझसे कुछ नहीं कर सकते, ये बकवास कोरी बकवास और ये
- 55:22लोग जो इस तरह का प्रचार करते कुछ ना करो।
- 55:28तुम कुछ कर सकते भी नहीं और अंत में तुम पाओगे तुम कुछ नहीं कर
- 55:35सकते और बिल्कुल अंत में तुम जाके पाओगे कि तुम हो ही।
- 55:44श्री कृष्ण। गोविन्द।
- 55:50अरे मुरार। हे न थ न?
- 56:00रहा यन व सु द। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे
- 56:16नाथ नारायण वासुदेव वा श्री कृष्ण गोविन्द।
- 56:25अरे मुरारी हेनाथ नारायण वासुदेव पितुमात स्वामी सखा।
- 56:43पितुमात स्वामी सखा। हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव।
- 57:04हेनाथ नारायण, वासुदेव, वासु, कृष्ण, गोविंद, हरे, मुरारी,
- 57:13हेनाथ, नारायण, वासुदेव। जीवन मिला है।
- 57:23गाने के लिए जीने के लिए मस्त होने के लिए पग घुंघरू बांध के
- 57:31नाचने के लिए उस मस्ती का सरूर पीने के लिए, उस मदहोशी के आलम
- 57:39में डूबने के लिए उस सागर के। सुरती के समुद्र में छलांग लगाने
- 57:47के लिए तुम अट्टहास करो, आनंद का गर्जन करो, आनंद हो जाओ उसमें
- 57:58जिसकी सजना है जिसकी लीला। श्री?
- 58:02कृष्ण गोबिंद हरे मुरारी ए नाथ नारायण वसुदेव।
- 58:21धन्यवाद।