Latest / Baba ji Vijay Vats / 2 Feb 25- अंतर्मुखी कैसे हों? बाहरमुखी से अंतर्मुखी होने का सबसे बड़ा सूत्र! बाहरी से आंतरिक यात्रा
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- 0:22आनंद कुमार कांबली सड़ी फकीर दी हस्या ताड़ी मार चंगा ए बी ले
- 0:38गया। मोटे आवतों पर इसका गहरा अर्थ
- 0:48समझाने के कृपा करे। बाबा आज प्रश्न बहुत हैं छोटे
- 0:54छोटे। कृष्ण गोपियों के साथ अंतरंग
- 1:10क्षणों में क्यों जाते हैं, जबकि विराट आनंद उन्हीं का है?
- 1:26बिल्कुल ऐसे जैसे तुम बच्चों के साथ खेलते हो, तोतली भाषा बोलते
- 1:32हो? इसका अर्थ ये नहीं कि तुम भाषा
- 1:43में निशानाध नहीं हो। तुम भाषा के पूर्ण निष्णात्मक
- 1:51व्यक्ति हो, लेकिन बच्चों के साथ तुम तोतली भाषा का इस्तेमाल करते
- 1:58हो खेलते हो, बच्चों के साथ बच्चों की तरह खेलते हो?
- 2:09बिल्कुल ऐसे ही कृष्ण गोपियों के साथ या रानियों के साथ या नरकासुर
- 2:21से छुड़ाई गई स्त्रियों के साथ अंतरण कक्षणों में जाते हैं।
- 2:28क्यों चाहते हैं कृष्ण? जब विराट अस्तित्व का आनंद उनके
- 2:36पास है, बस सिर्फ खेलते हैं, वह इसलिए उनके जीवन को लीला कहा।
- 2:43उन्होंने खेला बच्चों की तरह खेला।
- 2:47बच्चों के पास जाके तोतली भाषा बोला स्कार्स ये नहीं कि वह भाषा
- 2:54जानते नहीं थे, उनसे ज्यादा भाषा कौन जानता था?
- 3:04कंबली शरीफ कीर्ति हस्या ताड़ी मार।
- 3:11जंगा ये भी लग गया मोटे हो तो पार फकीर की कंबली को आग लग गई तो
- 3:20सर्दियों में ओढ़ा करते हैं एक काली कंबली वाले उसको आग लग गई।
- 3:34ताली बजाकर हंसने लगा, खिलखिलाने लगा।
- 3:43बोलता है अच्छा हुआ ये भी कंधों के ऊपर का भार कम हो गया।
- 3:54बड़ी दौर का इशारा है। इनको संतरे है से कहते हैं आज का
- 4:07सूत्र भी हम लेंगे। पर्दा हटा के रहस्यमय चले जाओ शिव
- 4:22सूत्र नू का 13/11 पर्दा हटा के रहस्यमय चले जाओ।
- 4:37गहरी बातें होती हैं। शांत लम्हों में सुना करो बुद्धि
- 4:51सी पकड़ से परे होते हैं। इसलिए बिल्कुल जब फारिग हो जाओ,
- 4:58सभी कामों से तो प्रवचनों को सुना करो पर्दा हटा के रहस्य में चले
- 5:17जाओ। कि पर्दा किसका हटाना है, वो
- 5:26रहस्य क्या है घूंघट? के पटखोल रे तोहे पिया मिलेंगे।
- 5:49घूँघट? के पटखोलरे तो है पिया।
- 5:57मिलेंगे पर्दा है घूँघट। और घूँघट है बुद्धि और पिया है वो
- 6:13रहस्य जिसकी शिव बात करते हैं पर्दा हटा दे।
- 6:23रहस्य मैं चला जा रहस्य बड़ा मीठा है रहस्य रस से भरा पड़ा वो रस।
- 6:42जिसकी एक बूंद पाने के लिए आप सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हो
- 6:46जाते हो, मिटने का रस परवाने का शम में जल जाना, असम हो जाना, खाक
- 6:57हो जाना, वो एक क्षण का आनंद वही रस है।
- 7:05लेकिन बुद्धि इसे पागलों का खेल एक है और मज़े की बात है रहस्य
- 7:17में आप रोज़ जाते हो। और मज़े की बात है।
- 7:23रहस्य में जाने के लिए आप सारे दिन प्रयास करते हो, लेकिन आज तक
- 7:30जान नहीं पाए। क्या हम सारे दिन काम क्यों करते
- 7:36हैं? फ्रॉड कहते हैं कि व्यक्ति सारे
- 7:47दिन काम करता है, सेक्स के अर्थ करता है घूमता है सारे धन और एक
- 8:04बात तुम्हें और याद करता हूँ। थोड़ा उल्टा पड़ेगा, लेकिन समझना
- 8:11समझ में आएगा जो कौन जितनी मेहनती होगी उतनी कामों की भी होगी।
- 8:32फिर सुनना इस बात को। जो कॉम जितनी मेहनती होगी, उतनी
- 8:39कामों की भी होगी। अब जरेश को कहाँ से बड़ा?
- 8:49क्योंकि उस काम के क्षण के एक आनंद को उठाने के लिए सारे धन
- 8:56प्रयास करना पड़ता है। चाइना आज बहुत ऊंची तल पे पहुँच
- 9:02गया। उसका कारण चाइनीज बड़े।
- 9:11सेक्सी होते हैं। छोटे छोटे गिट्को से चार चार
- 9:16बुरियाँ उठा लेती हैं। वो सर के ऊपर सेबन के सारे दिन
- 9:21जीत तोड़ के काम करती हूँ। तुम देखना कभी चाइनीज को काम करते
- 9:25हो और क्यों करते हैं? सेक्स के घर था, अंतरंग क्षणों
- 9:40में जाएंगे ये लोग रात सारे दिन जी तोड़ के काम करेंगे।
- 9:54हिंदुस्तान में कुटियाओं में बैठे हुए लोग जितनी कौम ब्रह्मचर्य में
- 10:02उतरेगी वैसे ही कौम ब्रह्म की तरह निष्क्रिय हो जाएगी, निरलिप्त हो
- 10:10जाएगी। ब्रह्मचर्य का अर्थ ब्रह्म जैसा
- 10:15आचरण और ब्रह्म जैसा आचरण का मतलब निर्लिप्त।
- 10:25निर्लेप वेलिप्त नहीं होता और काम?
- 10:30काम वासना एकलिप्तता है इसलिये सन्यासी ये ऋषि मने एकांत में
- 10:45बेहद जंगलों में कुठिया डाल के। अपने अंतःस्थ में उतर के उसर
- 10:50अह्स्य को पीते रहते हैं, मेहनत नहीं कर सकते थे।
- 11:04मेहनत तो होती है सिर्फ कामयाब में सिर्फ मेरे इन शब्दों को
- 11:13गोल्डन में देख लेना। अकेली जाके सुनना तुम्हें
- 11:18समझायेगी कि मैं कहाँ से क्या बोल रहा हूँ, भीड़ भाड़ में तुम्हें
- 11:26समझी नहीं आएगा? हिंदुस्तान क्यों पिछड़ गया?
- 11:37इन ऋषियों मीनू की अक्रमाण्यता के कारण और अक्रमण्यता आई ब्रह्मचर्य
- 11:45के कारण ब्रह्मचर्य तुम्हें उस रहस्य में पहुंचा देता है इसलिए
- 11:59पतंजलि ने ब्रह्मचर्य को। रहस्य तक पहुंचने का एक अनिवार्य
- 12:05अंग बताया सत्य, अहिंसा, अस्त, ब्रह्मचर्य, अप्रग्रह, सत्य में
- 12:24जीना, हिंसा नहीं करना। चोरी नहीं करना ब्रह्म जैसा आचरण
- 12:33करना, याने निलिप्त रहना, निलिप्त रहना यानी चिप करना नहीं, किसी के
- 12:41साथ नॉन आइडेंटिफिकेशन। यह प्रोपोर्शनली इक्वल चीजों को
- 12:54समझना जो कोन जितनी ज्यादा बाहर की तरफ होगी वह उतनी ही कर्मठ
- 13:06होगी। हाथ तोड़ के काम करेगी और वह उतनी
- 13:12ही काम मुख होगी, वह एक पल एक क्षण का आनंद उनसे हार्ड तोड़ काम
- 13:24करवाएगा। यही कारण भारत में बाहर की रिसर्च
- 13:37नहीं हो सकी। जीस मुल्क ने बाहर की रिसर्च की।
- 13:45वो जापान हो वो अमेरिका हो, वो चाइना हो।
- 13:53उसका मूल उदगम है सेक्स बस उसका एक पल ध्यान से समझे न बात को
- 14:06अंतरंग क्षणों में मिला हुआ एक पल आनंद का।
- 14:18तुम इतने ज्यादा बेहरमुखी हो जाते हो कि फिर से उस आनंद को उठाएंगे
- 14:26और सारे दिन कर मठता से हार्ड तोड़ मेहनत करते हो।
- 14:36इसलिए जीतने, ये जीडीपी वगैरह बढ़ी।
- 14:40जीतने देशों के सभी कर्मठ हुए हैं और सभी कामुक हुए हैं।
- 14:50ये सभी सभ्यताएं परम कामुक सभ्यताएं।
- 14:55यह सीधी सी प्रपोर्शनेट बात याद रखना जो कौन जितनी ज्यादा
- 15:02ब्रह्मचर्य की तरफ आकर्षित होगी, उतनी ही ज्यादा निश्चय क्रियता
- 15:07में आ जाएगी और जितनी ज्यादा निष्क्रियता में आ जाएगी।
- 15:15उतनी ज्यादा सब्र में आ जाएगी। जितनी सब्र में आ जाएगी, उतना ही
- 15:23अमृत पीयेगा प्याले भर भर के अमृत पीयेगा दोनों तरफ अमृत हैं।
- 15:34बैरमुखी हो गए तो भी अमृत है, अंतर्मुखी हो गए तो भी अमृत है
- 15:43लेकिन बैरमुखी होने वाला अमृत है। तुम्हें हार्ड तोड़ मेहनत करनी
- 15:50होगी और वह अमृत का क्षण। तुम्हें मिलेगा एक पल जीसको तुम
- 15:57बढ़ाने की चेष्टा करोगे और वो उस पल को बढ़ाने की चेष्टा तुम्हें
- 16:07कर्मठ बना देगी। तुम ये रिसर्च करने में बाध्य कर
- 16:10देगी। तुम साइंटिस्ट हो जाओगे, तुम
- 16:15बहर्मुखी हो जाओगे, तुम दिन में सपने देखने लगोगे, कैसे?
- 16:19मंगलग्रह पे पहुंचें तो जितनी खोजें, क्योंकि जितनी तरक्की हुई
- 16:31बहर्क। बाहर की चीजों की वो उन्हीं कोम
- 16:38होने की जो कर्मठ थे, बाहर से काम कर रहे थे, सक्रिय थे लेकिन उनके
- 16:49पास उस रहस्य का एक पल ही था। अगस्त को मिलाने की चेष्टा करते
- 17:02जाना मैं भी चलूँगा, आप भी संग संग चलो बेहरमुखी हुए लोग कर्मठ
- 17:16हो गए। उन्होंने बाहर से मेहनत की।
- 17:18और बाहर से मेहनत करेंगे। रिसर्च करेंगे तो एटम खोज लिया
- 17:25गया इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन खोज लिया गया मोलेक्यूल
- 17:29खोज लिया गया, मैटर खोज लिया गया, जहाज बना लिए गए, रॉक तो बना लिए
- 17:38गए। आज चंद्रमा में काम रखा, कल मंगल
- 17:47पर रख देंगे, परसों के सोहर को रख देंगे, बहरहमुखी लोगों का ऐसा ही
- 17:56चलता रहेगा और 1 दिन हार जाएंगे। क्यों?
- 18:01क्योंकि इसकी इस मिल्की वेव गैलेक्सी में भी इतने अरबों तारे
- 18:11हैं। किस किस पे जाओगे आप ज़िन्दगी
- 18:17बड़ी छोटी है। बाहरमुखी होने से तुम्हारे पास एक
- 18:29ऑप्शन बचती है उस रहस्य में जाने की और उस रहस्य में जाने की एक
- 18:41ऑप्शन है। और एक ही बूंद है पर भर के लिए एक
- 18:58क्षण भर का वो आनंद का दर्शन तुम्हें इतना तरो ताजा कर जाता है
- 19:07कि तुम अगले दिन ज्यादा। कर्मठ हुए उठते हो फिर दूसरे दिन
- 19:15उस गूंद को पीएंगे। ऐसे ही ज़िन्दगी बीत जाती है सुबह
- 19:23होती है, शाम होती है ज़िन्दगी यूँ ही तापमान होती है।
- 19:33तो ऐसी कौमें जिन्हें भीतर के उस रस के महतल का पता नहीं था जीस रस
- 19:41की एक बूंद के लिए वो सारा दिन। हाड़तोड़ मेहनत करते हैं।
- 19:49उन्हें उस तल का नहीं पता जो आनंद से भरा पड़ा है, उन्हें पता ही
- 19:56नहीं है। मार्गदर्शन ही नहीं किया इसलिए
- 20:01पश्चिम में अंत तक जाने के लिए। बहुत कम लोग हुए और भरा पड़ा है
- 20:10पूर्व पूर्व की एक ईंट उठाएंगे एक अपप्रबुद्ध व्यक्ति मिलेगा।
- 20:25मैं अतीत की बात कर रहा हूँ आज की पूर्व को खजाना पता लग गया, पूर्व
- 20:39के हाथ एक कुंजी लग गई। उस कुंजी से खजाना भूल गया और
- 20:46बसों ठहर गया। जो एक पल के लिए ठहरता था वहरमुखी
- 20:56व्यक्ति सारा दिन हाथ तोड़ मेहनत करके उसे एक रस की मौत मिलती थी।
- 21:07और पूर्व के हाथ वोंके जाने लग गया, वो है समुद्र रस का आनंद का
- 21:20तो जब पूर्व ने। उस रस की एक बूंद पीली तो उसका रो
- 21:28अरवानिहाल हो गया तो ध्यान रखना जीसको उस समुद्र का आनंद मिल गया
- 21:38हो। वह ज्यादा क्रियाशील नहीं होगा।
- 21:45क्योंकि वह शहर गया, उसका मन उसे सताता नहीं बगाता नहीं दौड़ाता
- 21:53नहीं, क्योंकि सो वह मिल गया जिससे सब्र हो जाता है, तृप्ति हो
- 21:58जाती है और प्रचुर मात्रा में मिल गया।
- 22:04उसने डुबकी लगाई और वह समुद्र ही हो गया।
- 22:11इसलिए वह भटका नहीं है। बाहर तो बाहर की जितनी खोजें हैं
- 22:16वह पूर्व में नहीं हैं। भीतर की जितनी खोजें हैं, वह
- 22:20पश्चिम में नहीं हुईं। भीतर रोज़ डूबता चला गया पूर्व और
- 22:30बाहर रोज़ निकलता चला गया पशु एक बात को ध्यान से समझ लेना।
- 22:46बुद्धि को पकड़े पकड़े लोग रहस्य की बातें करने वालों को सुन नहीं
- 22:54सकते हैं। मेरे श्रोताओं में बहुत कम लोग हो
- 22:58गए हैं। तुम देखना क्यों क्योंकि रहस्य की
- 23:04बातें। बुद्धि को गपोड़ लगती हैं, झूठ
- 23:09लगती हैं, रहस्य की बातें इतनी गहरी हैं, उतनी जाकर जो मज़ा
- 23:19मिलता है वहाँ। और बुद्धि की समझ में नहीं आता।
- 23:31अंतरंग क्षणों में बुद्धि एक पल के लिए ठहरती है और आपको उस एक पल
- 23:40का आनंद सारे दिन नहीं भूलता। सारा दिन का व्यक्ति बूढ़ा हो
- 23:44जाता है तो नहीं भूलता। इन्द्रियां काम करनी छोड़ देती
- 23:50हैं, लेकिन उस रस की याद बनी रहती हैं और उसे क्योंकि फार्मूला एक
- 23:56ही पता है मार्ग एक ही पता है दूसरा मार्ग उससे पहले।
- 24:06इसलिए वह कोशिश करता है कि जवान बना रहूँ सदा क्योंकि जवानी है तो
- 24:16संयंत्र काम करते रहेंगे। और वह रोज़ एक बूँद जगता रहेगा।
- 24:29ये थी पश्चिम की परम्परा पश्चिम यहाँ ठहर गया एक बूँद रोज़ बड़े
- 24:38मेहनती होंगे लोग वह कौन बड़ी मेहनती होगी?
- 24:45वहाँ की जीडीपी ग्रोथ बहुत होगी। ऊंची ऊंची मंजिलें बनाई जाएँगी,
- 24:51नई नई टेक्नोलॉजी खोजी जाएँगी आज एआई का निर्माण हुआ, अमेरिका ने
- 24:59एआई किया। चाइना ने एआई का बाप खड़ा कर
- 25:06दिया, ये सब बेहरमुखी लोग हैं, बाहर जाने के लिए तुम्हें उलटे दे
- 25:17देंगे। पुस्तकों का अनुवाद कैसे करना है?
- 25:24एक भाषा को दूसरा कैसे तब्दील करना है?
- 25:28तुम बोलोगे, छपके आ जाएगा, रोज़ नई टेक्नोलॉजी का विस्तार होता ही
- 25:36चला जाएगा बाहर। लेकिन भीतर वाला क्या कहता है?
- 25:45बाहर वाला रस की बातें सुन नहीं सकेगा।
- 25:52क्यों? उसका कारण की बुद्धि कहेगी ये सब
- 25:56झूठ मार्कस मान ही नहीं पाएंगे की परमात्मा है मान तो बुद्धि ही
- 26:08नहीं पाई मार्कस तो बहुत उसकी बात है।
- 26:14समाधि को उपलब्ध हो गए, लेकिन पहुँच नहीं पाए।
- 26:24उनकी करुणा उन्हें संसार में खींच लाई।
- 26:28बस इतना ही काफी है। व्यक्ति दुखी है।
- 26:34और मैं उसका दुख हारण कर एक इल्ल्यूसन टूट गया।
- 26:38मैं लोगों को बताता हूँ जीस कारण से तुम दुखी हो जीस कारण से तुम
- 26:44दर्द में हो जीस कारण से तुम चिंतन मनन में चिंता की आग में जल
- 26:49रहे हो वो कारण मिल गया बुथ को। और कारण मिलते ही बुध उठ गए।
- 27:03बुध निखा आगिन। क्योंकि मानवता ज़िन्दगी दुख है।
- 27:12बुध का ये सार तत्व है। बुध कहते हैं जीवन दुख है।
- 27:19निश्चित ही जो व्यक्ति कहता है जीवन दुख है वह दुख को हटाने के
- 27:26उपाय करेगा। और बुद्ध को जब ये सूत्र मिल गया
- 27:33कि तुम कौन हो, तुम शरीर नहीं हो, मन नहीं हो।
- 27:38बुद्ध फौरन उठ गया। बुद्ध के साथ वही आर के मेडीज़
- 27:45वाली हुई यूरेका यूरेका मिल गया। मिल गया।
- 27:51आगे जाने की नचिष्ट की बुध ने माही उनकी इच्छा थी।
- 28:00जीवन दुख है, इसी से प्रभावितों के बुआई थे।
- 28:07हर व्यक्ति मरता है। इसी चीज़ ने जोड़ा था और इसी चीज़
- 28:12ने उन्हें घर छोड़ने, कपिलवस्तु छोड़ने, सिंघाशीन छोड़ने को
- 28:16प्रेरित किया था। उन्होंने साधना की।
- 28:28अपने अंत में उतरे और जान लिया कि मैं कौन हूँ, लेकिन बात यहाँ आके
- 28:36खत्म नहीं होती, समझ लेना बात को रस होता है, रहस्य है।
- 28:47भीतर जाने के लिए खोपड़ी का पर्दा हटाना पड़ता है।
- 28:52बुद्धि का पर्दा हटाना पड़ता है। बुद्ध ने भी बुद्धि का पर्दा
- 28:57हटाया क्योंकि पर्दा हटाने के बिना बुद्धि के पार जाया नहीं
- 29:03जाता। इस कचरे को तो एक तरफ रखना ही
- 29:08होगा तो बुद्ध ने भी इसे एक तरफ रखा तभी भीतर पहुंचे अन्यथा नहीं
- 29:15पहुँच सकते थे। लेकिन बात ये है कि बुद्ध जीस
- 29:21नियत से गए थे कि जीवन दुख है। उसका समाधान मिल गया।
- 29:28इसीलिए वहाँ जाकर जो स्थिति उपलब्ध होती है उसे कहते हैं
- 29:35समाधि समाधान मिल गया। बुद्ध को समाधान क्या मिल गया?
- 29:43न तो मैं दुखी होता हूँ, न मैं चिंतित होता हूँ, न मेरे दर्द
- 29:52होता है क्योंकि जो चिंता करता है, जो जलता है, जिसके दर्द होता
- 29:58है जो। शिखर के अंदर रात भर सो नहीं
- 30:02सकता, वो मैं नहीं हूँ। ये बुद्ध को पता चल गया और बुद्ध
- 30:09का मंतव्य हल हो गया और वो तो उठ गया मात्र 6 साल में वो उठ गए।
- 30:18अब तुम्हें यहाँ थोड़ी सी बात बताता हूँ।
- 30:27जो उस स्तर तक भी नहीं पहुंचे वो पूछेंगे बुद्ध कैसे पहुंचे?
- 30:36बुद्ध किसी भी पक्षणा वगैरह के द्वारा नहीं पहुंचे।
- 30:44विपश्यना वगैरह की विधियों तो उन्होंने इजाद की, उससे पहले वो
- 30:48जानते भी नहीं थे। बुद्ध पहुंचे विधियों को त्याग
- 31:04पर। किसी विधि के द्वारा बुद्ध नहीं
- 31:09पहुंचे। विद्या तो सब कंगालनी थी बड़े
- 31:12गुरु बदले जैसा गुरु ने कहा अक्षर सह पालन किया बुद्ध सही शिष्य
- 31:24जिसे। बाबा नानक सिख कहते हैं, अक्षय से
- 31:30पारण किया जैसा गुरु ने कहा बुद्ध ने वैसा लेकिन वो नहीं मिला।
- 31:45कुछ करने से नहीं मिला। ये भी बाबा नानक कहते हैं इस शब्द
- 31:51को हृदय पे लिख लेना। ज़ोर न जुगती छोटा संसार।
- 32:01आपकी किसी भी युक्ति के भीतर आप को मुक्त करने की ताकत नहीं है।
- 32:11कोई भी युक्ति राम राम हो, राधे राधे हो, 112 विधियों हो विज्ञान
- 32:17भवतंत्र की या कोई और हो। ज़ोर न झुकती छोटा संसार और
- 32:25हैरानी की बात है कि सिख धर्म में जन्मे पले बढ़े हुए लोग आज नाम जप
- 32:38कर रहे हैं। युवतियों का पालन कर रहे हैं जबकि
- 32:46बाबा का सीधा सीधा उपदेश कि कोई जुगत मत करो क्योंकि कोई युक्ति
- 32:55तुम्हें वहाँ पहुँच जाती है। ज़ोर न जुगती छोटा संसार कोई
- 33:05युक्त अपना के तुम संसार के बंधनों की बेड़ियों को काट नहीं
- 33:11सकता है। इसलिए कोई भी युक्ति करनी बंद कर
- 33:17दो। रहस्य अमरत की भूत है, थोड़ा आज
- 33:30शॉट में सु जाऊंगा और आप इस शॉट को ही फैला के समझ लेना।
- 33:42रहस्य अमृत की बूंद है और उस अमृत की बूंद तक जाने की एक ही उपाय
- 33:55है। कोई तकनीक नहीं है तकनीक एक ही है
- 34:02क्या इस घूँघट के पट को पटा दो घूँघट?
- 34:13के पट खोल रे। तोहे या मिलेंगे बुद्धि के पट को
- 34:27एक तरफ़ रख दो और बुद्धि तुम्हें 1000 तरक देगी।
- 34:35बुद्धि कहेगी नहीं यह बकवास है इस संसार को अगर परमात्मा ने बनाया
- 34:45तो परमात्मा को किसने बनाया? बुद्धि मांगती है जवाब लेकिन आपको
- 34:53जानकर अश्चर्य होगा। कि परमात्मा की सृजना में जवाब
- 34:58किसी चीज़ का तुम्हारे पास नहीं है, क्योंकि यू कैन इन्वेंट बट
- 35:07कैननॉट क्रिएट तुम खोज सकते हो, बना नहीं सकते।
- 35:13यही दुविधा है बुद्धि की। बुद्धि खोज लेगी और छाती चौड़ी कर
- 35:19लेगी, लेकिन बना नहीं सकेगी। यहीं आके बुद्धि पट जाती है तो
- 35:28पूर्व की शरण में आना पड़ता है। आज नहीं कल पश्चिम पूर्व की शरण
- 35:33में आ जाएगा। थका हरा मांदा एक एक बूंद एक एक
- 35:40बूंद कब तक पीएंगे 1 दिन थक जाएगा जब देखेगा पूर्व को गट्टा गट्ट
- 35:50पीते हुए उस रहस्य के अमृत को। तो हतप्रभ रह जाएगी।
- 35:55बुद्धि ये कैसे हुआ? हम जीस सबूत के लिए लालायित सारे
- 36:05दिन हार्ट तोड़ मेहनत करते हैं। ये घट घट दिया जाता है।
- 36:13तो आज नहीं कल पश्चिम को पूर्व में आना पड़ेगा और पूर्व को न
- 36:24खुदा ही मिला, न बसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे।
- 36:34पूर्व की भाग्यहीनता यह कि ऋषियों का दिया हुआ वो अमृतपान का सूत्र
- 36:40तो भूल गए और बुद्धि को विकसित नहीं कर सके तो न खुदा ही मिला।
- 36:51न बाहर की कोई रिसर्च हो जाए, बस नामों के ऊपर झगड़ा करते रहे।
- 37:01यहाँ किसी का कोई नाम नहीं है। ये सब नाम आपने बनाए?
- 37:11ज़रा देखिये अपने मोलीक्यूल की मैटर की खोज के मैटर में
- 37:17मोलीक्यूल होता है मोलीक्यूल में एटम होते हैं एटम में इलेक्ट्रॉन,
- 37:22प्रोटॉन, न्यूट्रॉन होते हैं। ये नाम किसने दिया?
- 37:29इलेक्ट्रान प्रोटन, न्यूट्रॉन एटम मलेक्यूल ये नाम किसने दिया, ये
- 37:35फॉर्मूलेशन किसने दिया? एच टू ओह एनएसीएल ये कोई नाम
- 37:42परमात्मा ने नहीं दिया, ये आपने अपनी सुविधा के अनुसार बना दिया।
- 37:48मान लिया कि अगर हम एनएसीएल लिख देंगे तो इसको नमक समझा जाए।
- 37:55अगर एच टू ओह लिख दिए तो समझ लेना, इसको पानी समझा जाए, सी ओह
- 38:03टू लिख दिया तो कार्बन डाइऑक्साइड समझा जाए।
- 38:07ये आपके आपसी समझने की बात नहीं थी।
- 38:12ये नाम परमात्मा नहीं रखे, न इलेक्ट्रॉन का, न प्रोटोन का, न
- 38:16कार्बन डाइऑक्साइड का, न पानी का, न नमक का, सभी नाम रखे आपने।
- 38:26लेकिन मज़े की बात है विज्ञान के द्वारा रखे गए नामों पर आप कभी
- 38:32झगड़ा नहीं करते? परमात्मा के नामों पर सिर कट जाते
- 38:42हैं बड़ी से बड़ी मूर्खता। अध्यात्म के नाम पर नाम है एक
- 38:57कहता है वे अल्लाह है, दूसरा कहता है रिकॉर्ड है, तीसरा कहता है वो
- 39:05राम है, चौथा कहता है वो राधा है। बस इसी के ऊपर तुम लड़ो मरे और
- 39:17किसी को कोई नहीं पता कि उसका नाम कोई होता ही नहीं।
- 39:23अलख अनामी हम अलख जगाते हैं न आप संतों को देखना।
- 39:30संत आपके दरबार पे आएगा भिक्षा मांगने के लिए वह कहेगा आरक नरंजन
- 39:38अलख जो देखा न जा सके ऐलख निरंजन जो आँखों से देखना चाहे।
- 39:52अनाम उसका कोई नाम नहीं। इतना पागलपन सिर्फ अध्यात्म के
- 40:01नाम पर ही है। विज्ञान के नाम पे कोई पागलपन
- 40:07नहीं है। विज्ञान के नाम पे कोई नहीं कहता
- 40:11एच टू ओह नहीं पानी है नहीं कहता इतनी समझ है विज्ञानिक में के एच
- 40:18टू ओह पानी है, नीर है जल है, वहाँ कोई दुविधा नहीं।
- 40:26वहाँ कोई सर नहीं करते, कोई खून नहीं बहता, कोई पराये लाड आहूत
- 40:34नहीं होते, कोई झगड़े नहीं होते, धर्म के नाम पर कोई झगड़े नहीं
- 40:39होते क्यों? क्योंकि वो आपके बनाये हुए मोढ़ों
- 40:44के बनाये हुए हैं। इसलिए झगड़े होते हैं।
- 40:52विज्ञान समझदारों की बनाई हुई भाषा है, नई नई उपजी है, इसलिए
- 40:58कोई झगड़ा नहीं सर्वमान्य है। एच टू वो पानी भी है, जल भी है,
- 41:03वाटर भी है। साइंटिफिक भाषा में एच टू है,
- 41:12हिंदी में नीर है, पानी पंजाबी में जल है, किसी और भाषा में, कोई
- 41:21और किसी और भाषा में कोई और। रहस्य अमृत है इस सूत्र में हम आ
- 41:32जाएं शिव कहते हैं पर्दा हटा दो। रहस्य में चले जाओ ये रहस्य आपकी
- 41:51जरूरत है और पर्दा हटाये बिना ये रहस्य का वेद खुलता नहीं।
- 42:03रहस्य रहस्य ही रहता है और जब तक तुम्हें दिखेगा नहीं, तुम उसकी
- 42:10खोज में जाओगे नहीं, तुम बाहर ही भटकते रहोगे।
- 42:20धरती पे इसीलिए आज इतनी असहिष्णुता है, इतने झगड़े हैं,
- 42:26इतनी लड़ाई है। इतनी लड़ाईयां, खून बह जाते हैं,
- 42:35सहनशक्ति है नहीं। कंधे से कंधा भीड़ जाए तो अदालतों
- 42:42में चले जाते हैं और वहाँ कोई ज्यादा समझदार लोग नहीं बैठे।
- 42:54आप जैसे ही मूड हैं वहाँ अध्यात्म के मसले में वह कोई जानकार नहीं
- 43:00है। संसार में कुछ शिक्षाएं उन्होंने
- 43:05ग्रहण कर ली होंगी। कॉम्पटीशन करके वो जीत गए होंगे
- 43:09और कुर्सी ले ली होगी, लेकिन उस रहस्य के बारे में ज़रा भी नहीं
- 43:15जानते। रहस्य के नाम पर गणेश की मूर्ति
- 43:19बनाकर पूजा करने वाले सी जीआइ आपको मिल जाएंगे और ये मूर्खों का
- 43:25काम है। काल्पनिक वस्तुओं पर विश्वास
- 43:35करना, वास्तविक चीजों को गप समझना बुद्धि का काम है।
- 43:42जितना बुद्धिमान व्यक्ति होगा इस रहस्य जो शिव कहते हैं रहस्य में
- 43:50उतर जा बुद्धि, रहस्य को गप समझेगी हमेश इसलिए मार्कश हूँ,
- 43:59चरवा कहूँ? या कोई भी हो, इस तरह का आचार्य
- 44:04हो ये अर्थों को बदल देते हैं है नास्तिक रहस्य की बूझ को इन्होंने
- 44:13पिया नहीं है। अर्थ बदल देंगे और आपकी समझ में आ
- 44:20जाएगा क्यों? खोपड़ी धारी है वो कबलेरी है शब्द
- 44:28ज्ञान बहुदा है, डिक्शनरी भरी पड़ी है इनकी खोपड़ी में, इसलिए
- 44:34बड़ी तरफों से आपको ये सम्मोहित कर देंगे लेकिन ध्यान रखना।
- 44:41मैंने कल भी एक फ़ॉर्मूला आपको बताया था पहचान जीसको सौंधने से
- 44:50आप उसी तल पर न पहुँच जाओ जहाँ कृष्ण बैठे तो समझ लेना वह
- 44:57व्यक्ति अज्ञानी है, आपको मूर्ख बना रहा है।
- 45:04जीसको सुनकर आप अपने अंतश को छू लें, वह ज्ञान जिसकी बातें सधी
- 45:13हुई भी हों और समझ से पार भी हों। इसलिए संतो ने कहा बुद्धि को हटा
- 45:23दो एक पर्दा है, प्रिया को मिलना चाहते हो तो बुद्धिरूपी घूँघट को
- 45:30हटा दो इस घूँघट को डाले रखोगे? तो पिया नहीं मिलेंगे, रहस्य नहीं
- 45:43मिलेगा, रहस्य को नहीं देख पाओगे नहीं देख पाओगे तो चल नहीं पाओगे,
- 45:49नहीं चल पाओगे तो चख नहीं पाओगे और चख नहीं पाओगे तो डूब नहीं
- 45:54पाओगे। और मज़ा तो उसमें डूबने का ही आता
- 45:59है। ज़िन्दगी उस जीने का नाम है जो
- 46:05मस्ती से भरी पड़ी हो, वो तो एक पल भी मिल जाए तो काफी।
- 46:16और पूर्व ने तो उसे समुद्र भर भर के पीया है और पश्चिम गागर लिए
- 46:26बैठा रहा है। पश्चिम को समझ नहीं आती कि बुद्धि
- 46:32में ये परमात्मा रहस्य आता क्यों नहीं?
- 46:38यह रस की बूंद बुद्धि में रहती क्यों नहीं बरता क्यों नहीं है,
- 46:49गागर में सागर समाता, क्यों नहीं यही मुड़ता तुम्हारी ज़िन्दगी
- 47:00खत्म हो जायेगी, तुम छोड़ न पाओगे।
- 47:03तुम इस बुद्धि से समझना चाहते हो तो बुद्धि से जितना समझायेगा उतना
- 47:13ही समझोगे, लेकिन उसमें रस नहीं होगा।
- 47:19अब बिलकुल ऐसा होगा जैसे फलत हो। उसमें रस्नो फोंक हो फोंक बुद्धि
- 47:32कोशिश करती है के घाघर में सागर समाचार ऐसा होता नहीं।
- 47:44ऐसा कभी हुआ नहीं और ऐसा कभी होगा नहीं।
- 47:47आध सच जुगाद सच हेवी सच नानक ओर से भी सच इस बुद्धि में कभी रहस्य
- 48:00नहीं उतरेगा और इस घाघर में कभी समुद्र नहीं समा पाएगा ये निश्चित
- 48:10है। यह सत्य है तो अगर उस रहस्य को
- 48:17पीना है उस रहस्य को पीना है जो वह वह कहते हैं पर्दा हटा दे
- 48:25किसका बुद्धि का? और उस रहस्य में उतर जा फिर देख
- 48:36फिर पियो उस रस को फिर देख तमाशा मेरा घूँघट उठा देती है।
- 48:47राजस्थान में एक गज का घूँघट चलता था।
- 48:53मेरा घूंघटू उठा देती है और नाचती है और लोग कहते हैं, बड़ी विशर्म
- 49:00औरत है, तुम्हें नहीं पता तुम कहानियाँ सुन लेते हो?
- 49:07लेकिन उसके जियरे पर क्या बीती होगी?
- 49:13वो तुमने कभी सोचा नहीं? वो नाचती है, उस आनंद में सुध बुध
- 49:23खो के नाचती है। घूंघट का पर्दा हट जाए, हटने देती
- 49:31है और भीतर से उस रस को पीकर उठती हुई तरंगों से जो नाच उत्पन्न
- 49:38होता है, उसमें तल्लीन हो जाती है।
- 49:48पहली बात तो आप यह समझना कि बुद्धि रहस्य को गप कहती है,
- 49:57इसलिए बुद्धि रहस्य की तरफ आकर्षित होती है।
- 50:02बुद्धि अच्छी तरह से जानती है अगर मैंने रहस्य की यात्रा शुरू कर
- 50:06दी। तो मैं समाप्त हो जाउंगी रहस्य की
- 50:12यात्रा बुद्धि की मौत है बुद्धि का मरण, रहस्य की यात्रा इसलिए
- 50:22बुद्धि कभी रहस्य की यात्रा पर निकलने नहीं देते।
- 50:26बड़ी से बड़ी बाधा बुद्धि है। तुम अपने बच्चे को बर्दाश्त कर
- 50:42सकते हो, वैज्ञानिक ना बने आयास ना करे, आई टी ना करे, आयाम ना
- 50:50करे, ना पड़े कुछ ना करे। लेकिन संत न बने, संत बने पड़ोसी
- 51:03का बच्चा संत बने पड़ोसी का बच्चा मेरा बच्चा संत न बने।
- 51:15ये माता पिता की ख्वाहिश है क्योंकि संत बना तो हमारे काम से
- 51:23तो गया, समाज के काम से गया और देखिये वो अपने आप के काम से भी
- 51:29गया। संत अपने आप के काम से भी चला
- 51:34जाता है। एक शिष्य किसी गुरु के पास गया
- 51:40था, बड़ी सेवा करता था, 1 दिन सेवा करते करते बोला बाबा।
- 51:49मेरा रोका हो गया है, शादी के लिए कितना अच्छा रोका हो गया है तो
- 52:03बेटा फिर तो हमारे लिए तो गया। क्यों बाबा मैं आता रहूँगा सेवा
- 52:12करता रहूँगा कोई बात नहीं लेकिन हमारे लिए गया कुछ महीने बीत गए।
- 52:20उन दिनों में बरसों बाद मुक्लावे होते थे, शादियाँ होती थीं।
- 52:30बस पक्की हो गई तो 1 दिन आया। बाबा मेरी शादी की तारीख बन गई,
- 52:44पक्की हो गई, कहता बेटा अब तू घर वालों की तरफ से हो गया?
- 52:54अच्छा शादी की तारीख होगी तो घर वालों की तरफ से भी गया।
- 53:02अब स्त्री की याद में खोयेगा स्त्री पुरुष की याद में खोयेगा।
- 53:07बस यही काम बाकी रह जाएगा। ऐसा मत करो, फिर वक्त बीतता गया।
- 53:26बाबा ब्याह हो क्या? अच्छा तो बेटा ब्याह हो गया तो तू
- 53:41अपने काम से बिग गया, समझ नहीं आई बाबा क्या बोल रहे हैं तू अपने
- 53:50काम से बिग गया। फिर करता है बाबा 1 दिन आया बाबा
- 53:57मेरे पुत्र हुआ है बेटा हुआ है बाबा बोले बेटा अब तू संसार के
- 54:09काम से गया, अब तू किसी के काम के नारा।
- 54:16ऐसा है संसार बुद्धि जब रहस्य तक पहुंचती है तो किसी काम के नहीं
- 54:22रहते, वो खुद के काम की भी नहीं रहती।
- 54:26वो समाज के काम की भी नहीं रहती इसलिए तुम कहते हो कि भगत सिंह
- 54:32पैदा तो हूँ। उधम सिंह पैदा तो हूँ गाँधी पैदा
- 54:39तो हूँ लेकिन हो पड़ोसी के घर में सुभाष चंद्र पैदा तो होने ही
- 54:48चाहिए लेकिन हमारे घर नहीं। पड़ोसी के घर में ये बुद्धि एक
- 55:02पर्दा है और संतो ने ये गाया के पर्दे को हटा घूंखट के पट खोल।
- 55:16तुझे रस मिलेगा। रहस्य का बुद्धि रहस्य को एक गप
- 55:23समझती है। कोई आश्चर्यजनक बात नहीं अगर बिना
- 55:31खोजे। इंकार कर देते हैं।
- 55:36परमात्मा के अस्तित्व में मार कस चारवाक कर्मचारियों पे विश्वास
- 55:45नहीं करता चारवाक कहते हैं जहाँ कुछ लेना देना नहीं पड़ता, मज़े
- 55:51से खाओ, पियो, उधारी ले लो। कर्जा सिर चिढ़ा लो, कर्जा सिर रख
- 55:58के मर जाओ। यहाँ कोई हिसाब किताब नहीं होता
- 56:02क्योंकि जो मर जाता है वो फिर से उत्पन्न नहीं होता।
- 56:06बिलकुल ठीक है, जीस। अर्थों में ये कह रहा है उन
- 56:13अर्थों में ठीक है वही चेहरा मोहरा, वही बातें वही आवाज़ नहीं
- 56:19आई, लेकिन वो देख ही जरूर आएगा, वह चेतना जरूर आएगी।
- 56:33किसी और शरीर में आएगी, किसी और रूप में आएगी।
- 56:37आएगी तो चार बात अपने ढंग से सही कहते हैं।
- 56:43मार्कर्स अपने ढंग से सही कहते हैं, लेकिन एक बात जो मैं सत्य
- 56:47बता रहा हूँ। बुद्धि रहस्य को गप्पोड़ कहती है
- 56:57रहस्य होता ही बस जो ये कहता होता नहीं, तुम समझना उन्होंने खोजा
- 57:06नहीं। तो के घर खोजोगे और देर अवेर
- 57:12पाहीर हो गए जिन खोजा, लेकिन गहरे बैठ के गहरे पानी मैं बपुरा बुढ़न
- 57:22डरा गयो किनारे बैठ। तुम किनारे पे बैठे बैठे कभी नहीं
- 57:27पहुंचोगे राम राम करते रहो शिवा हम करते रहो राधे राधे करते रहो
- 57:34लेकिन किनारे पे बैठे रहो और गहरे न उतरो तो कबीर कहते नहीं मैं वो
- 57:42पूरा भूड़न डरा डरता रहा। तलहटी में न उतरा, फिर कामना भी
- 57:54मत करना। रहस्य के आनंद की पूर्व रहस्य में
- 58:03डूब गया। पूर्व ने कहा कि इस रोज़ रोज़ की
- 58:08एक एक बूंद को क्या पीना है और वो भी पूरे दिन में एक बल आता है तो
- 58:19उसे पता चल गया कि जब एक ऐसा समुद्र है आनंद का।
- 58:25जो अखंड धारा बहती है, नाम, खुमारी, नान का चड़ी रहे दिन, रात
- 58:35और उस अस्तित्व की खुमारी ऐसी। के दिन भर रात कभी नहीं उतरती
- 58:42चौबीसों घंटे सदा दिवाली सादकी और आठों बहरह आनंद चौबीसों घंटे
- 58:50दिवाली है उसके लिए तुम्हारे लिए कभी कभी आती है तुम्हारे लिए राम
- 58:551 दिन आते हैं अयोध्या में। संत के लिए हर हर घड़ी हर पर राम
- 59:04आते हैं। अयोध्या में यह अयोध्या नगरी राम
- 59:10का निवास यह अयोध्या नगरी राम का निवास।
- 59:20तुम बाहर नकली घर बना देते हो, उसका बनाते रहो, उससे हल कुछ नहीं
- 59:27होगा। तुम 150 साल राज़ कर लोगे।
- 59:30बस इतना ही, लेकिन राज़ से कभी किसी को कुछ नहीं मिला।
- 59:34आखिर तो राजाओं को भी। जनकों को भी अष्टावकरों की शरण
- 59:42में आना पड़ता है, लेकिन तुम्हारे मन की तमन्ना तूफान बैठ जाने
- 59:54चाहिए के राज़ करने में आनंद है। जहाँ जहाँ तुम्हारी चिपकाहट है कि
- 1:00:04यहाँ से आनंद मिल सकता है खंगाल लेना, सभी दरवाजों को अच्छी तरह
- 1:00:11से देख लेना, दरवाजों को तोड़ देना भीतर घुस जाना जाके दिखाना
- 1:00:17कुछ है। अगर कुछ पाओ तो वहीं ठहर जाना,
- 1:00:23लेकिन कुछ मिलेगा ना? कबीर कहते हैं।
- 1:00:35कहत कबीर सुनो भाई सा। सधो कहतू कवि सुनो भाई साधो सा हब
- 1:00:58मिलहें। सब्र में, सब्र में।
- 1:01:07मिलता है साहेब ठहराव में मिलता है, भटकाव में नहीं मिलता।
- 1:01:18लागो मेरो राम फकीरी में फकीरी में।
- 1:01:30बाहर कितने ही द्रव्य इकट्ठा कर लूँ वो बाहर रह जाएगा।
- 1:01:38यहाँ तक के शरीर भी यहीं पड़ा रह जाएगा।
- 1:01:43तो कबीर कहते हैं फकीर हो जाओ फकीर इसके पास कुछ नहीं है एक के
- 1:01:53सवा वो क्या है रहस्य? आनंद है और उस आनंद से सबूरी
- 1:02:06मिलती है, उस आनंद से ही तृप्ति मिलती है, उस आनंद से ही तुम तृप
- 1:02:12होती हो, डकार आती हो तुम कहते हो आह मजार।
- 1:02:20तो बूंद पीनी है तो पश्चिम की तरफ जाओ।
- 1:02:29सागर पीना है तो पूर्व की तरफ जाओ, लेकिन पूर्व में आके बुद्धि
- 1:02:36का पर्दा उठाना पड़ेगा। उस रहस्य की तरफ जाना पड़ेगा, उस
- 1:02:45रहस्य का स्वाद चखना होगा बस फिर तुम्हारे बस से बाहर हो जाएगी बात
- 1:02:51फिर तो तुम्हें उसके भीतर विलीन होना ही पड़ेगा फिर आज नहीं कल।
- 1:02:58तुम उसमें खुद ही समाहित हो जाओगे, जैसे परवाना क्षमा में खाक
- 1:03:04हो जाता है श्री। कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:03:22हेनाथ नारायण वासुदेव पितुमात, स्वामी सखा हमारे।
- 1:03:40विद्मात स्वामी सखा हमारे हे नाथ नारायण वासुदेव हे नाथ नारायण?
- 1:03:59वासुदेव वा। वासन श्रीजिर्णानी यथा विहार
- 1:04:09नवानिगृणाति नरोपरा। तथा श्रीरानी ब्याह जीणाननयाणी
- 1:04:28संयाति नवानी दे। श्री कृष्ण।
- 1:04:35गोविंद हरे मुरारी केनाथ नारायण वसुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे
- 1:04:48मुरारी ए नाथ नारायण। वासुदेव पितुमात स्वामी सखा हमार
- 1:05:05पितुमात स्वामी सखा हमार। हे नाथ नारायण वासुदेव हे नाथ
- 1:05:19नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण।
- 1:05:25गोविंद हरे मुरारी। हे।
- 1:05:30नाथ नारायण वासुदेव हो। धन्यवाद।