Latest / Baba ji Vijay Vats / 02 Dec 24 - क्या सिर्फ ‘राधे राधे’ कहना काफी है? जानिए असली भक्ति का मार्ग। Chapter 2, Verse 11.
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- 0:15कल का प्रवचन हमने यहाँ तक रोक दिया था कि कृष्ण मैं युद्ध नहीं
- 0:25करूँगा। ये बात कह के अर्जुन कृष्ण को रस
- 0:32के मध्य भाग में बैठ गए थे एवं उक्तव, ऋषिकेशम गुणा के शह
- 0:42परमत्त्व नयोजक। इति गोविन्दम उथवा तुष्णिम बबुव
- 0:56हे गोविन्द मैं युद्ध नहीं करूँगा।
- 1:03ऐसा कहकर अर्जुन रथ के। मध्य भाग में बैठकर शुरू होते हैं
- 1:17कृष्ण और गीता भी शुरू होती है। दो तीन बातें पहले समझ लीजिए।
- 1:31कृष्ण जो भी बोलते हैं, खुद का अनुभव बोलते हैं तुम्हें ज्ञानी
- 1:43लगें तुम्हें मूर्ख लगें। तुम्हें पाखंडी लगे, तुम्हें झूठे
- 1:52लगे वो तुम्हारी मान्यता है, लेकिन कृष्ण जो बोलते हैं वो खुद
- 2:01का अनुभव बोलता है। बिल्कुल कृष्ण ऐसा लगेंगे जैसे
- 2:11झूठे हैं। आज तो रम गए हैं कृष्ण भारत के कण
- 2:21कण में कृष्ण का वास है। लेकिन पाश्चात में आज भी अगर ऐसी
- 2:28बात की जाती है कि तुम आत्मा हो, परमात्मा हो, तुम विराट हो तो
- 2:38कहेंगे ये झूठ बोलता है ही इज़ इन हैलुसिनेशन।
- 2:45ये भ्रम की स्थिति में आ गया है। ही शुड बी ट्रीटेड इसका इलाज होना
- 2:54चाहिए लेकिन कृष्ण जो बोलते हैं, अपने अनुभव से बोलते हैं और कृष्ण
- 3:07झूठ नहीं बोलते। कृष्ण जो बोलते है, सत्य बोलते है
- 3:14नपितुली भाषा विराट संदेश अब शुरू होते है कृष्ण और तुम्हारे लिए भी
- 3:31ये संदेश। की ये बोला कृष्ण ने तुम इसे लाद
- 3:38मत लेना कृष्ण के खाय से तुम्हारी भूख नहीं मटते प्यास तुम्हे लगी
- 3:48है कृष्ण के पानी पीने से तुम्हारी प्यास नहीं बुझते।
- 3:52वे सिर्फ बता सकते हैं कि प्यास पानी से बुझती है, इसके अतिरिक्त
- 3:59और कुछ नहीं मार्गदर्शन कर सकते हैं।
- 4:02कृष्ण फिर भी अगर तुम पानी नहीं पीओगे तो ये तुम्हारी स्वतंत्र
- 4:09इच्छा है। तो कृष्ण के ऊपर किसी प्रकार का
- 4:17कमेंट करने की आवश्यकता नहीं है। प्रश्न करने की भी आवश्यकता नहीं
- 4:25है। पहले कृष्ण को सुन लीजिए।
- 4:29तुम्हारा मन भागता हुआ मन है, बोलते जाएंगे कृष्ण और तुम बीच
- 4:42में ही प्रश्न कर दोगे अभी पूरा तो हो लेंगे तो?
- 4:48फिर प्रश्न कर लेना तो पहली बात तो कृष्ण जो कह रहे हैं, खुद का
- 4:55अनुभव कह रहे हैं। दूसरा तुम्हें मानने की कोई
- 5:01आवश्यकता नहीं, किसी के पानी पीने से तुम्हारे प्यास नहीं।
- 5:08बुझती खुद को ही पीना पड़ेगा, बस कृष्ण ने मार्ग दिखा दिया।
- 5:16ऐसा स्थान है जहाँ सब दुखों का नाश हो जाता है।
- 5:23इतना ही काफी है। यही उसका पुरस्कार है मानवता के
- 5:28ऊपर तुम मानो जरूरी नहीं अब चलिए क्या कहते हैं पहला शब्द कृष्ण
- 5:43का। सबसे पहला जो प्रतिकार आता है
- 5:54कृष्ण हास्य बात भी हँसने के, अभी तुम ना समझ पाओगे कृष्ण हास्य।
- 6:07हंसकर ये शब्द बोले हे अर्जुन हे पार्थ, शोक न करने वाले लोगों के
- 6:17लिए तुम शोक कर रहे हो? अशोच्चयान वशोचस्वतम प्रज्ञावादश
- 6:36बास से गता सोनम गता सुनश्य नानु शोचन ति।
- 6:46पंडिता है अर्जुन तुमने शोक न करने योग्य का शोक किया है।
- 7:01तुम निराश हुए हो, जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए।
- 7:06उनके लिए तुमने शौक किया है और पंडिताई की बातें कर रहे हो
- 7:16विद्ववत्ता की बातें कर रहे हो। और उनके लिए शोक कर रहे हो, जिनके
- 7:26लिए शोक करना बनता नहीं क्यों? क्योंकि जिनके प्राण चले गए हैं,
- 7:37थोड़े थोड़े शब्द बीच में कृष्ण फालतू भी बोल जाते हैं, तुम्हें
- 7:40लगेगा। लेकिन उन फालतू शब्द में बड़ी जान
- 7:45होती है जो चले गए हैं, जिनके प्राण चले गए हैं या जिनके प्राण
- 7:59अभी हैं। अभी गए नहीं हैं।
- 8:05पंडित जन उनका शोक नहीं करते हैं। नानू सोचनती पंडिता पंडित शब्द का
- 8:17मतलब है जिसने देख लिया है। जिसने जान लिया है अपनी नगन आँखों
- 8:27से निहार लिया है वह पंडित कृष्ण दो बातें कहते हैं कि जो चले गए
- 8:38हैं और जो अभी गए नहीं हैं। पंडित उनका शौक नहीं किया करते।
- 8:52अब जो चले गए हैं इस बात की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन कृष्ण फिर
- 8:58भी बोलते हैं वो तुम्हारे लिए बोलते हैं।
- 9:05क्योंकि तुम जो से ले गए हैं जहाँ से उनके लिए रोते हो, बरसों तक
- 9:13रोते हो जो कभी वापस नहीं आएँगे। चारबाग कहते हैं भस्मभूता से देह
- 9:21से। पुनर आगमनम कुतह जिसका शरीर देह
- 9:29वस्म हो गया है वो कभी फिर से आता देखा है तुमने तर्क है इसलिए कर्ज
- 9:37ले लो, घी पी लो क्योंकि कर्ज लेने वाला और कर्ज?
- 9:43देने वाला ये शरीर जब मिट जाएंगे, भस्म हो जाएंगे तो कौन आता है?
- 9:52मांगने के लिए कोई नहीं आता, आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक कौन
- 10:06रोता है? तेरी जुल्फ के सर होने तक कौन
- 10:12जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक चार बात कहते हैं, अपना अपना मत
- 10:25है मैंने पहले भी कहा। जो जितना जानता है वहाँ तक बात
- 10:30करेगा, उसे आगे कह देगा। ये होता ही नहीं, बड़ी बार मैंने
- 10:37कहा है। आचार्य कहते हैं एनलाइटनमेंट होता
- 10:45ना? तो ठीक है नहीं देखा तो कम से कम
- 10:51ईमानदार तो हैं जो कहते हैं होता नहीं मार्केस कहते हैं भगवान नहीं
- 10:56होता मुश्किल तोप ये शादी अगर मार्केस कहते हैं कि हाँ, भगवान
- 11:01होता है तो वो झूठे होते हैं। और झूठ बोलने वाला जिसने देखा
- 11:10नहीं वो पाखंड होता है। ऐसे पाखंडों की कतार लगी पड़ी है।
- 11:16इसी के कारण आज विश्व में दुविधा की स्थिति भ्रम की स्थिति जन्म गई
- 11:22है। देखा है नहीं।
- 11:26बाषण करना शुरू कर दिया। बस यही में उड़ता है जो
- 11:38अज्ञानियों को फंसा लेती है। अभी कल ही मुझे एक व्यक्ति कह रहे
- 11:47थे कि प्रेमानंद कहते हैं कि जो लोग कहते हैं कि वह राधे राधे से
- 12:00नहीं मिलेगा। वो मूर्ख हैं, बिलकुल मूर्ख हैं
- 12:09क्योंकि तुमने राधे राधे ही किया है।
- 12:14तुम अपने भीतर उतरे ही नहीं, तुमने उस शांति के तल को छूने की
- 12:21चेष्टा ही नहीं की। मैं कहता हूँ प्रेमानंद जी से हम
- 12:29कहते हैं वो मौन से मिलता है, तुम कह दो वो शोर से मिलता है, फिर तो
- 12:37बात हुई ना। एक ही रट को लगाते चले जाना बस
- 12:42राधे राधे बस राम राम यह मूर्खता के सिवा और कुछ नहीं पागलपन के
- 12:48सिवा और कुछ नहीं। हम कहते हैं वह मौन से मिलेगा,
- 12:51बोलने से नहीं मिलेगा, तुम कह दो वो बोलने से मिलेगा, वह शोर से
- 12:56मिलेगा। फिर तो बात की हुई काट।
- 13:00अन्यथा तुम चूक गए, अन्यथा तुम सिर्फ बोलना चाहते हो तुम्हें
- 13:04बोलने की बिमारी और वह मौन से ही मिलता है।
- 13:17वह खुद मौन है। वह खुद पर मौन है और उस पर मौन तक
- 13:27जाने के लिए शुरुआत करनी होगी मौन से और तुम कह दो कि वह शोर से
- 13:35मिलता है और शोर करना ही मैं सिखाऊंगा।
- 13:41और जप एक शोर है हल्का सही तुम जैसे लोगों ने ही ये शोर मचाने
- 13:49वाले जागरण करने वाले सारी रात लोगों को भी जगाते हैं, खुद भी
- 13:54जागते हैं, ये पाप करते हैं। कानून के वर खिलाफ़ हैं।
- 14:02किसी की शांति को भंग करना कानून के खिलाफ़ है, रात सोने के लिए
- 14:13बीमार है, बूढ़ा है बेचारा। नींद की दवा लेके सो रहा है और
- 14:20तुम बड़े बड़े यूनिट लगा देते हो। आज फल का एक आएगा और इतना शोर
- 14:28होता है। बुद्ध जैसे लोग वहाँ टिक नहीं
- 14:33सकते भाग जाएंगे। कि बुध जीते हैं मौन में और तुम
- 14:44जीते हो शोर में बस यही फर्क है। इससे ही सारा कुछ समझ लेना, शोर
- 14:51में जीते हो तो शोर ही सिखाओगे लोगों।
- 14:55जो मौन में जीता है, वह मौन ही सिखायेगा लोगों को और देखिये, वह
- 15:00तो पर मौन है। सत्य को कभी ना नकारा जा सकता है,
- 15:05ना झूठ लाया जा सकता है। तुम कहना शुरू कर दो, कह ही रहे
- 15:10हो और क्या कहोगे? वह शोर से मिलता है और शोर करना
- 15:16ही तुम सिखाते हो, लेकिन नहीं मिलता इसलिए मैं तुम्हें धोखेबाज
- 15:22कहता हूँ। पंडित लोग शोक नहीं करते, जो चले
- 15:32गए हैं उनका। और जो जिनके प्राण अभी नहीं गए
- 15:36हैं, उनका भी शोक नहीं करते। बड़े सुन्दर शब्द पहले पहले शब्द
- 15:44बड़े कोमल शब्द हैं प्यार के उस गहरे तल से उठे हुए शब्द इनके
- 15:51भीतर एक सहानुभूति की झलक भी है। तुम उनके लिए शोक करते हो, जिनके
- 16:05लिए शोक करना बनता नहीं। अर्जुन क्यों?
- 16:09कृष्ण ये बात क्यों कहते हैं? तुम जिनके लिए शोक करते हो?
- 16:19वह शरीरों के मरने का शौक करते हो।
- 16:22अर्जुन और ये शरीर हैं नहीं, कृष्ण ये कहना चाहते हैं तुम रोते
- 16:34हो, अपनी अज्ञानता के कारण? शोक न करने वालों के लिए शोक कर
- 16:44रहे हो, क्योंकि जिन के लिए शोक कर रहे हो वो वो नहीं है जो तुम
- 16:52उन्हें समझते हो, बड़े विस्तार से बोल रहा हूँ।
- 16:56शुरू से ही गीता समझा आ जानी चाहिए।
- 17:00पहले ही शब्द कृष्ण के बड़े प्यारे असोच्यान बसोचस्वतम।
- 17:17प्रज्ञावादश बायसे गथासुनम गथासुनमश नानू शोचनती पंडिता जो
- 17:31चले गए और जो अभी नहीं गए। सर हम जाएंगे उनके लिए, पंडित कभी
- 17:40शोक नहीं करते। क्यों शोक नहीं करते क्योंकि ये
- 17:46सूत्र हैं कृष्ण के और मैं खोल रहा हूँ उसको।
- 17:56इसलिए शोक नहीं करते कि तुम इनको शरीर समझते हो और ये शरीर है
- 18:04नहीं। तुम भीष्म, पिता, माँ, गुरु,
- 18:08द्रोण और इन सभी को कृपाचार्य अश्वथा माँ।
- 18:15इनको शरीर समझते हो क्यों? क्योंकि तुम खुद को शरीर समझते हो
- 18:25ध्यान से सुनते जाना एक एक पर्दा प्याज की उगड़ेगी।
- 18:32और देखते जाना इन उखड़ती हुई बर्तों को तुम भीषण के लिए शोक
- 18:44करते हो कि ये शरीर है लेकिन ये शरीर है नहीं, पार्थ ये कुछ और
- 18:54है। और तुम इनको शरीर समझते हो?
- 19:00कारण क्योंकि तुम अपने आप को शरीर समझते हो।
- 19:08इस भ्रम के कारण इस अज्ञानता के कारण तुम उनको भी शरीर समझ रहे
- 19:16हो, यही तुम्हारी गलती है। पार्थ इनके लिए शोक नहीं करना
- 19:24चाहिए। ये भीष्म पितामह तुम्हारे पितामह
- 19:32नहीं, ये वो नहीं जो तुम इन्हें समझते हो और जो तुम खुद को समझते
- 19:39हो। इनके लिए शोक करने का कोई कारण
- 19:44नहीं बनता क्योंकि शोक तुम करते हो शरीरों के लिए और ये शरीर है
- 19:53नहीं तो तुम्हारा शोक करना उचित नहीं है।
- 19:58पार्थ। यह अनुचित है।
- 20:01पंडित लोग ज्ञानीजन जिन्होंने देख लिया वो शोक नहीं करते हैं।
- 20:11जो चले गए उनका और जो चले जाएंगे उनका।
- 20:21कृष्ण का एक एक शब्द बड़ा गहरा सुत्र रूप में पिरोया गया और
- 20:29कृष्ण को खोलने की आवश्यकता है। मैंने कारण बताया।
- 20:39शोक क्यों करता है अर्जुन? क्योंकि शरीर समझता है उनको और
- 20:48उनको शरीर क्यों समझता है? क्योंकि खुद को भी शरीर समझता है
- 20:54और ध्यान रखना पूरी गीता? चलेगी और कृष्ण बड़ी कोशिश करेंगे
- 21:06कि अर्जुन समझ जाए, लेकिन अर्जुन नहीं समझेंगे जो बात।
- 21:16जन्मो जन्मो से एक असंसाकार बन गई है, मैं शरीर हूँ, मैं शरीर हूँ,
- 21:24मैं शरीर हूँ जन्मो, जन्मो से जीस, चीज़ की तहे बिछाई।
- 21:28हमने हमें पता भी नहीं होता कि यह किसी दिन हमारे जी का जंजाल बन
- 21:35जाएंगे। यह सोच कि मैं शरीर हूँ, यह
- 21:41तुम्हारा संस्कार बन गया और फिर तुम जितनी देर जियोगे तुम अपने
- 21:48आपको शरीर ही जानोगे शरीर ही मानोगे?
- 21:53शरीर से पार कुछ जाना नहीं, शरीर से पार कुछ देखा नहीं, शरीर से
- 21:58पार कुछ ढूंढा नहीं, इसलिए तुम वहीं टिके रहोगे, जहाँ हो और तुम
- 22:04अपने आपको शरीर ही समझते रहोगे। बस यही कृष्ण कहते हैं अर्जुन।
- 22:11जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए। तू उनके लिए शोक कर रहा है, क्यों
- 22:18कर रहा है? क्योंकि तू इनको शरीर समझ रहा है
- 22:22और इनको शरीर तू क्यों समझ रहा है, क्योंकि तू खुद को शरीर समझ
- 22:27रहा है? तो इसका उपाय क्या है?
- 22:37इसका उपाय यही है कि तुझे पता चल जाए कि तू शरीर नहीं।
- 22:45और अंत तक कोशिश करते हैं। कृष्ण प्रश्न उठते चले जाते हैं।
- 22:52अर्जुन के मन में प्रश्नों का उत्तर देते रहते हैं।
- 22:57कृष्ण शंख बज चुका है, वक्त न के बराबर है।
- 23:05उस तरफ से कब तीर शुरू हो जाए, कोई पता नहीं और अर्जुन कॉलेज गया
- 23:13है। दुविधा में संशयग्रस्त हो गया है
- 23:19और संशय के पीछे कारण क्या है? का कारण?
- 23:23अज्ञान है। खुद को शरीर समझना लगातार चलता
- 23:31रहेगा। यह प्रश्न उत्तरों का सलाह और जब
- 23:38कृष्ण देखेंगे तो नहीं समझ पा रहा है अर्जुन।
- 23:42क्योंकि वह समझ में आता नहीं तो फिर कृष्ण अंतिम जो गुरु के पास
- 23:51अंतिम हथियार होता है उसका प्रयोग करेंगे।
- 23:55वही जो कह रहा है विराट दिखाया। कृष्ण ने रूप दिखाया, विराट फिर
- 24:04उसका प्रयोग करेंगे। फिर विराट को दिखाने के बाद तो
- 24:10व्यक्ति समझ ही जाया करता है। शक्तिपात किया कृष्ण ने नहीं समझ
- 24:19रहा है ये। और खोपड़ी से समझा जाता भी नहीं।
- 24:23वो इसलिए शक्तिपात करना ही एकमात्र ढंग है इसको समझाने का
- 24:30क्योंकि हम घर में नहीं बैठे। हम किसी राजदरबार में बैठे बहस
- 24:37नहीं कर रहे। हम युद्धक क्षेत्र में खड़े हैं
- 24:40और शंखनाद हो चुका है। तो कृष्ण ने अपना अंतिम हथियार
- 24:51प्रयोग किया, शक्तिपात किया, शक्तिपात किया।
- 24:59और अर्जुन अपने भीतर उतर गया। उस तल पर जीस तल पर पता चल जाता
- 25:04है कि मैं हूँ कौन और जब जान लिया तो मानना ही पड़ता है।
- 25:18जब जान लिया जब देख लिया मानना ही पड़ता है जो नमक्त धृतराष्ट्र के
- 25:30बीच में था, जो मोह धृतराष्ट्र के बीच में था।
- 25:37वहीं मोह अर्जुन में भी उपज गया और ध्यान रखना यहाँ धृतराष्ट्र और
- 25:44अर्जुन की बात नहीं हो रही। यहाँ सारे संसार की बात हो रही
- 25:50है। जीस सम्मोह में धृतराष्ट्र उलझ
- 25:55गए। उसी मोह में अर्जुन भी उलझ गया और
- 25:59तुम भी उलझे हो यह गीता तुम्हारे लिए है, यह कृष्ण के लिए नहीं, यह
- 26:08गीता धृतराष्ट्र के लिए नहीं है, यह संजय के लिए नहीं है।
- 26:15मैं तुमसे मखाती हूँ यह गीता तुम्हारे लिए धृतराष्ट्र ममतव में
- 26:24उलझे हुए हैं और अर्जुन भी ममतव में उलझ गया, लेकिन दोनों की ममतव
- 26:30का मूल एक नहीं। ये बातें समझनी पड़ेंगी, क्योंकि
- 26:38पृष्ठभूमि में यही बातें कृष्ण राष्ट्र को महमत होता है, लेकिन
- 26:48ध्यान रखना महमत्व अपने बच्चों से होता है।
- 26:53धृतराष्ट्र अंधे हैं, सिर्फ अपने बच्चों के मोह से अंधे हैं लेकिन
- 27:00अर्जन बिल्कुल समान रूप से अंधा नहीं है।
- 27:08अर्जुन दूसरों के लिए अंधा है, बिल्कुल उलट बात।
- 27:17अर्जुन पांडवों के लिए शोक नहीं कर रहे हैं।
- 27:19ध्यान रखना धृतराष्ट्र अपनों के लिए शोक कर रहे हैं, कोरवों के
- 27:27लिए शोक कर रहे हैं। कि कहीं ये न मर जाएं, कहीं ये
- 27:35सत्ता खोलें। कृष्ण का ममत्व क्षमा करना,
- 27:43अर्जुन का ममत्व और धृतराष्ट्र का ममत्व यक्र सा नहीं है।
- 27:50अलग अलग नहीं बल्कि विरोधी धृतराष्ट्र अपनों के साथ महत्त्व
- 27:56करते हैं विरोधन और स्वपत्र के लिए लेकिन अर्जुन अपने भाइयों के
- 28:03लिए ममत नहीं करते हैं। अर्जन सामने खड़े कौरवों के लिए
- 28:09ममतव करते हैं, अर्जन भीष्म के लिए करते हैं और सभी कौरव सो कौरव
- 28:16के लिए करते हैं, द्रोण के लिए करते हैं, कृपाचार्य के लिए करते
- 28:21हैं, दूसरों के लिए ममतव करते हैं, यह बड़ा गहरा।
- 28:26और भारी का फर्क है। ममत दोनों करते हैं अज्ञान दोनों
- 28:36का नष्ट नहीं हुआ। अज्ञान दोनों में बना हुआ है,
- 28:41लेकिन दोनों अग्नियों में बड़ा विरोधाभास है।
- 28:48धृतराष्ट्र अपनों से मोह करते हैं, ममतव करते हैं कि कहीं इनकी
- 28:53कुर्सी छिन न जाए और अर्जुन दूसरों से ममतव करते हैं कि कहीं
- 29:01यह मर न जाए। बड़ा गहरा अंतराल है दोनों के बीच
- 29:07में। और तुम दोनों के महत्त्व को यज्ञ
- 29:12समझोगे नहीं, ये भरती है। अगर ठीक से कहा जाए तो अर्जुन के
- 29:23महत्त्व में करुणा की लहर है। अर्जुन के ठीक से समझ लो अर्जुन
- 29:32के ममतो में करुणा की लहर है और धृतराष्ट्र के ममतो में।
- 29:45अपनत्व की लहर है करुणा की नहीं। करुणा दूसरों के लिए होती है।
- 29:53ममत्व तो धृतराष्ट्र में भी है, लेकिन अपनों के लिए ममतव है।
- 30:00ममतव अर्जुन के मन में भी है। लेकिन अपनों के लिए नहीं है।
- 30:05दूसरों के लिए इसलिए बड़ा भारी फर्क है दोनों के महत्त्व में और
- 30:12तुम यहीं मार खा जाते हो। बड़ी सूक्षम बातें इसलिए तो यहीं
- 30:19बैठे हो? बड़ी छोटी छोटी बातें, बड़ी महीन
- 30:24बातें तुम्हें बांधे रखती हैं इसलिए जन्मो जन्मो से तुम यहीं
- 30:28बने हुए हो और फिर रोते हो, चिल्लाते हो बाबा मैं मुक्त होना
- 30:34चाहता हूँ। ये बंधन बड़े गहरे हैं, बड़े
- 30:39सूक्ष्म हैं जो देखते भी नहीं। और तुम उनमें बंधे हुए हो और इनको
- 30:45कौन काट सकता है? तुम तो इसे ना काट पाओगे क्योंकि
- 30:52तुम्हें तो ये दिखता ही नहीं। बंधन कटने से पहले देखना चाहिए कि
- 31:00बंधन है? फिर ही तो काटोगे अभी तो तुम्हें
- 31:04तुम्हारे बंधन ही नज़र नहीं आते तो फिर काटोगे कैसे?
- 31:12तो फिर कौन काटेगा तुम्हारे बंधनों को तुम ऐसे ही चिल्लाते
- 31:16फिरते रहोगे? यह इतने जन्मों का संस्कार टूटेगा
- 31:22कैसे हमें दिखाई ही नहीं पड़ता, इसलिए मैं कहता हूँ धृतराष्ट्र
- 31:29वास्तव में अंधें हैं, आँखों से ही नहीं, ज्ञान से भी अंधें।
- 31:37लेकिन अर्जुन सिर्फ ज्ञान से अंधा है, आँखों से अंधा नहीं है, बंधन
- 31:48वो काटा जाता है जो तुम्हें दिख जाए।
- 31:52ये बंधन बड़े अदृश्य हैं। सूक्ष्म है, लेकिन बड़े बड़े
- 31:57जोरावर हैं, ममत्व के बंधन से ज्यादा बड़ा सुदृढ़ बंधन और कोई
- 32:03होता ही नहीं एक कहावत है। कि अगर गाय को वश में करना हो तो
- 32:15उसके बछड़े को ले आना। गाय पीछे बचे चली आ क्यूँ ममत अब
- 32:24मानता है? ममत तो छोटे से छोटे प्राणी में
- 32:29भी है। जहाँ बछड़ा जाएगा पीछे बछेगा ही
- 32:35जाएगा, ये बड़े गहरे बंधन है और तुम कहते हो कि हम खुद से काट
- 32:45लेंगे खुद से ना काट पाओगे। तो कौन काटेगा?
- 33:00कहना नक। कह नानक कह नानक गुरु वंदन काट।
- 33:31कह नानक गुरु बंधन काटे। कह।
- 33:47नानक गुरु बंधन काट। बंधन।
- 33:57काट कह नानक गुरु। बंधन काट बिछुरत आन मिलायो बिछुरत
- 34:18आन मिलायो ठाकुर। तुम सर नाई आयो ठाकुर तुम सर नाई
- 34:38आयो। उतर गयो मेरे मन का संसार, उतर
- 34:54गयो मेरे मन का संसार। उतर गए हों मेरे मन का संसार।
- 35:16जब तेरा दर सन पायो ठाकुर तुम सरनाई आयो।
- 35:36कह नानक गुरू बंधन काटता है, तुम्हें तो दिखते ही नहीं तुम
- 35:41काटोगे कैसे? गुरु की आँखें बड़ी पहनी हैं, भेद
- 35:47देती हैं। गुरु की आँखें तुम्हारे सूक्ष्म
- 35:52बंधनों को देखती हैं। जिनको तुम कभी न देख पाओगे, गुरु
- 36:01उनको देख लेता है और गुरु ही सक्षम है क्योंकि गुरु को देखती
- 36:07हैं तुम्हें तो देखती हैं गुरु कार्ड देता है और देखिए जब तक।
- 36:18तुम्हारे बंधन न कटेंगे तब तक संशय न जायेगा, उतर गयो मेरे मन
- 36:26का संशय तुम दो चिट्ठे नहीं रहते। जिसे कृष्ण कहते हैं शंस्य आत्मा
- 36:33विनय सति तुम सिनसर में नहीं रहते, तुम एक हो जाते हो, अखंड हो
- 36:39जाते हो। इसे ही अखंड कहते हैं।
- 36:42अद्वैत कहते हैं, अद्वैत की परिभाषाएं आजकल आचार्यों ने बड़ी
- 36:47और और से करती हैं। थोड़ा संभल के चलना।
- 36:55ये रास ते हैं प्यारी के चलना ज़रा संभल के ये रास ते हैं प्यार
- 37:09के। चलना ज़रा संभल के।
- 37:19यहाँ। लूटते हैं दिल को।
- 37:25अरमा मचल मचल के ये रास्ते हैं प्यार के चलना ज़रा संभल के।
- 37:42यहाँ। लूटते हैं दिल को अरमा मचल मचल के
- 37:53ये रास्ते हैं प्यार के। चल ना ज़रा संभल।
- 38:02के जो भी इस तरफ से गुजरा, कभी लौट के न आया, तुम लूटना नहीं
- 38:17चाहते। ये रास्ता ही ऐसा है कि जो इस तरफ
- 38:25से निकला कभी लौट के ना आया आया तो साथ अपनी बर्बादियों को लाया।
- 38:37जो घर बारे आपनो चले हमारे साथ जेतों प्रेम मिलन की चाह प्रेम
- 38:48गली प्रेम तलीधर घर में रह आओ अगर चाव है मन में।
- 39:01वो मूक्षा जग गई है, प्यास गहरी हो गई है तो सिर को काट के तली पे
- 39:09रखना होगा। शब्द हैं शब्दों के गहरे अर्थ ले
- 39:15लेना। जो इस तरफ से गुजरा कभी लौट के न
- 39:27आया तो साथ अपनी बर्बादियां ही लाया गुजरे की उम्र सारी पहलू बदल
- 39:36बदल के। कभी इस गुरु के पास चले जाओगे,
- 39:43कभी उस गुरु के पास चले जाओगे कभी इस यूट्यूब चैनल पे चले जाओगे कभी
- 39:47उस यूट्यूब चैनल गुजरेगी उम्र सारी पहलू बदल बदल के जो रास्ते
- 39:56हैं प्यार के चलना ज़रा संभल के। यहाँ अगर एक बार ठगे गए तो फिर या
- 40:06तो या तो भस्म हो जाओगे, वो तो बड़ा शुभ है या बर्बाद हो जाओगे
- 40:15फिर गुजरेगी तुम्हारी पहलू बदल बदल के।
- 40:19कभी उस गुरु को बदल लिया, कभी उसको बदल लिया, कभी उसको बदल लिया
- 40:25ऐसे ही गुजरेगी सारी इस अंजु मन में समझा जीसको चिराग दिल का इस
- 40:36अंजु मन में। समझा जीसको चिराग दिल का देखा
- 40:43करीब से जो निकला वो दाग दिल का यहाँ धोखा देने वाले बहुत हैं।
- 40:55इस अंजुमन से समझा जीसको चिराग दिल का देखा करीब से तो निकला वो
- 41:00दाग दिल का परवाना जो बनेगा। परवाना जो बनेगा।
- 41:14रह? जाएगा वो जलके रह जाएगा, वो जलके
- 41:25के रास्ते हैं प्यार के। चलना संभल, संभल के परवाना जो
- 41:39बनेगा रह जाएगा वो जल के ये रास्ते हैं प्यार के।
- 41:51चलना ज़रा संभल के। जो शीर्ष पे रख ना सके वो प्रेम
- 42:04गली में आए क्यों? इसलिए जो अपने आप को बचा के रखना
- 42:10चाहते हैं वो इस गली में मत आना, देखिए वार्निंग है तुम फिर भी आ
- 42:17जाओ तो क्या क्या बहुत से लोग आ जाते हैं बाबा तुमने क्यों बोला
- 42:24शराब पीनी चाहिए? मैंने कहा तुमको किसने आमंत्रित
- 42:27किया? मेरे चैनल पे आना चाहिए किस उल्लू
- 42:33के पट्ठे ने खेल दिया? यह तो पैकड़ों की महफिल है यहाँ
- 42:42जाम? गिन गिन के नहीं डाले जाते।
- 42:49ये अंजुमन की महफिल है, इसको मरहम का घाव मत समझ लेना, नहीं तो
- 42:59तुम्हारे घावों को और को रेत देना।
- 43:02ताकि तड़पोर जग जाए ताकि गहरी हो जाए जख्म की धारा और तुम तड़प उठो
- 43:13और तुम बे चैन हो उठो बे सबरी के आलम में।
- 43:20तुम सच में दवा ढूंढने लगो जो तुम्हें आराम दिलाते हैं जो शीष
- 43:28तली पे धर न सके, वो प्रेम गली में आए क्यों तुम गलती मत कर लेना
- 43:38तुम गलती कर जाते हो? और फिर तुम सह भी नहीं पाते उसके
- 43:45परिणामों को और तुम ऐसे भद्दे भद्दे कमेंट करते हो।
- 43:52संकोच होता है उन्हें तुम्हें ही बतलाते।
- 44:02नहीं नहीं ऐसा काम ही मत करना वणिक वृत्ति लेके इस राह पे नहीं
- 44:09चला जाता भाई यहाँ तो क्षत्रिय वृत्ति ही काम करती है, वणिक
- 44:17वृत्ति लेके मत चल लो। यह कोई लाभ और हानि का सौदा नहीं
- 44:22है। यह तो मिटने का सौदा है।
- 44:27यहाँ तो राख भी नहीं बचती। यहाँ तो बसम भी नहीं बचती जो तुम
- 44:35गंगा में प्रवाहित कराओ, यहाँ कुछ नहीं बचता।
- 44:48तो कृष्ण कहते हैं हे पार्थ इस संकटकालीन घड़ी में तुझे यह क्या
- 44:55सूझी? क्या तुम वही हो जो कह रहे थे?
- 45:04हे कृष्ण, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलो, बड़ी
- 45:09वीरता थी, बड़ा होश था तुम्हारे शब्दों के भीतर और मैं दोनों
- 45:18धड़ों के बीच में ले आया। और अब तुम कम रहे हो।
- 45:24कंपनी का कारण क्या है? कारण यही जो निकलेगा।
- 45:30गीता को उगाड़ के एक एक पर्त खुलेगी और पहले से ही एक एक पर्त
- 45:37खुलने शुरू हो गए। पंडित लोग।
- 45:41जिनके प्राण चले गए और जिनके प्राण अभी जाने बाकी हैं, उनके
- 45:47लिए कभी शोक नहीं करते हैं, क्यों?
- 45:53क्योंकि दे आर इन इलूशन नाउ वो अभी भ्रम की स्थिति में हैं।
- 45:58उन्हें पता ही नहीं कि वो हो कौन? अर्जुन को तो ऐसा है कि मैं शरीर
- 46:04और जब खुद को शरीर मानेगा तो भीषम को भी शरीर मानेगा।
- 46:09भीषम को आत्मा कैसे माने, भीषम को कैसे माने, नैनम चिदंती शास्त्रणी
- 46:17नैनम धाती। नहीं मान सकता।
- 46:21पहले खुद को मानना होता है और मानना जानने से होता है।
- 46:30मुझे कल ही किसी ने प्रश्न पूछ लिया।
- 46:38ओके बाबा मन में मान लेने से के परमात्मा है, चलना हो जाएगा,
- 46:48मैंने कहा हो तो जाएगा बेटा, लेकिन बड़ी बड़ी कछुए की चाल से
- 46:54लोगे? तुम आँखें पैदा करो।
- 47:06अंधे को मानना पड़ता है कि सूरज है शब्दों पे गौर फरमाना।
- 47:14अंधों को मानना पड़ता है कि सूरज है।
- 47:18सुजाखों को कभी मानना पड़ा है कि सूरज है सुजाखें तो आंख ऊपर उठाते
- 47:25हैं और देख लिया करते हैं कि हाँ, यह जो रोशन आयी, झलक रही है, यह
- 47:36सूरज है। मानना पड़ता है तो अंधों को मानना
- 47:42पड़ता है, लेकिन चलो तुम मान के ही चल पड़ो, क्योंकि सत्य को अगर
- 47:52मान के भी चला जाए, मैं पहले बहुत बार कह चुका हूँ।
- 47:56तो चले तो किसी बहाने चले चले तो इसलिए इस राह पे अगर चलना है तो
- 48:07अगर शीश तली पे न रख सको तो एक बार चलना तो शुरू कर ही देना फिर
- 48:14अंतिम पड़ाव पे तुम्हें। शीश तली पे रखना पड़ेगा।
- 48:21अगर गहरी प्यास है तो तुम अभी रख दोगे शीश तली पे अगर प्यास गहरी
- 48:27नहीं है तो मान के चलो और फिर जब आँखों वाले हो जाओगे।
- 48:35तो मानने की कोई आवश्यकता नहीं रहेंगी।
- 48:38फिर तो तुम आँखों से ही देख लोगे कि हाँ सूरज होता है, फिर तुम्हें
- 48:45कोई प्रेरक प्रसंग कहने की जरूरत नहीं है।
- 48:49फिर तुम्हें कोई नीती अनीति की बात समझाने की आवश्यकता नहीं है।
- 48:54फिर तो तुम देख ही लोगे जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली, बस आँखें ऊपर
- 49:00उठाओगे और देखोगे कि हाँ सूरज है और लाख दुनिया कह के नहीं है सूरज
- 49:07तुम कहोगे तुम पागल हो तुम। आ गया है।
- 49:15मैं देख रहा हूँ तुम कहते हो है नहीं, तुम मानते जाओ भाई तुमने
- 49:22नहीं देखा सच्चे भी हो नहीं होता एनलाइटनमेंट तो नहीं होता नहीं
- 49:30है, परमात्मा तो नहीं है। इसे देखने वाले की श्रद्धा
- 49:40व्याकुल नहीं होती, आहत नहीं होती।
- 49:45जिसने देख लिया उसकी श्रद्धा को कैसे तोड़ोगे?
- 49:52उसकी श्रद्धा कभी नहीं टूटेगी। यह वो श्रद्धा है जो कभी टूट ही
- 49:59नहीं सकती। वो खुद भी चाहे तो नहीं तोड़
- 50:01सकेगा। श्रद्धा, विश्वास, रूपणों या
- 50:07व्यायाम बिना ना। यह वो श्रद्धा है जो देखने से
- 50:15होती है, विश्वास मानना पड़ता है, श्रद्धा देखने से होती है और वो
- 50:24कभी टूटते नहीं। विश्वास अविश्वास में बदल सकता
- 50:28है। क्योंकि देखा नहीं अभी तो इसको आप
- 50:33ठीक से समझ लेना जो अंधे मान के चलेंगे हैं तो वो सत्य है लेकिन
- 50:41वो टूट सकता है। वेश विश्वास अविश्वास में बदल
- 50:45सकता है। और जो सुजा के हो, के देखोगे वो
- 50:49श्रद्धा है, उसको तो वह खुद भी चाहेगा तो तोड़ न सकेगा जिसने
- 50:58आँखें खोल के देख लिया कि होता है।
- 51:06मैखाना होता है जहाँ वो पी जाती है जो कभी उतरती नहीं नाम खुमार
- 51:15विनान का चड़े रहे तन रात जिन्हें नशे जहान दें उतर जान पर बात।
- 51:22जिसने वो मेखाना देख लिया जिसकी पी हुई कभी नहीं उतरती।
- 51:27बस एक बार पीनी होती है, रोज़ रोज़ पीने नहीं होते, फिर तो
- 51:33चस्का लग जाता है, फिर तो तुम्हारे कदम गाहे बगाहे उस तरफ
- 51:40ही उठ जाते हैं। रोज़ रोज़ सदा सदा फिर तुम्हारे
- 51:45लिए एक ही मुकाम है जाने के लिए तुम्हारे बहुत से मुकाम हैं तुम
- 51:52संसार में धन कमाते हो, पदवी कमाते हो, प्रतिष्ठा कमाते हो,
- 51:57नाम कमाते हो, बाल बच्चे कमाते हो।
- 52:01बहुत कुछ कमाते हो, कार बंगले और न जाने क्या अटर पटर तुम्हारा घर
- 52:10घर नहीं तुम्हारा घर कबाड़खाना और अज्ञानी का घर ऐसा ही होता है।
- 52:21ज्ञानी के घर में कुछ नहीं होता। ज्ञानी का घर बिल्कुल सपाट खाली
- 52:25होता है और मैं यही चाहता हूँ कि तुम अपने घर को खाली कर दो।
- 52:31घर का मतलब भी यही है जहाँ तुम आराम से बैठ सको वहाँ कुछ न हो
- 52:37तुम्हारी सेवा। पर बस तुम्हारा ही होना काफी है,
- 52:43घर में तुम्हारा ही होना काफी है, फिर गाहे बगाहे जैसे श्याम होती
- 52:49है। वैसे तुम्हें उसकी याद आएगी और
- 52:53तुम्हारे पांव उस मैखानी की तरफ चलना शुरू हो जाएंगे।
- 53:00फिर तुम हुई शाम। उनका ख्याल आ गया हुई।
- 53:14शाम। ख्याल आ गया बोही जिंदगी का सवाल
- 53:31आ गया बोही? ज़िन्दगी का सभा लग गया होईशाम
- 53:48उनका ख्याल आ गया। एक छोटा सा प्यार हो जाता है
- 53:57तुम्हें स्त्री को पुरुष से और पुरुष को इस तरह से सारी रात
- 54:05चारपाई पे पड़े पड़े करवटें बदलता है कितने हैं सितारे फलक में ये
- 54:13सारी रात गिनते हो? एक छोटी सी प्रेम की झलक मिल जाए
- 54:19तो ज़रा सोचो कि इतने बड़े प्रेम की झलक मिल जाए तो तुम कैसे
- 54:28तुम्हारे पांव रुकोगे उस मैखानी की तरफ जाते हैं?
- 54:35तो ये गुरूर मत रखना के हम उसको बुला देंगे, वह नहीं बुलाया जाएगा
- 54:43या तू यहाँ नहीं भूल पाती। एक छोटी सी कर्ण उतरी थी प्यार
- 54:47की। और उसके लिए तुम रात भर करवटें
- 54:54बदलते हो हमें। तो यही था गुरु।
- 55:08गमे। यार है हमसे दूर।
- 55:18हमें। तो यही था गुरु।
- 55:26घम। जार है हमसे दूँ।
- 55:35वही गम जिसे हम किस किस यत्न से? निकाला था।
- 55:48इस दिल से दूर वो चल के कयामत की चला गया।
- 56:04उछलकर कयामत की चाल लग गया। ओय शा में उनका ख्याल आ गया।
- 56:23वही जिंदगी का सवाल गया, वही जिंदगी का सभा ला गया।
- 56:42होइशाम उनका ख्याल आ गया। थोड़ी सी झलक देख लो उसकी एक छोटी
- 56:58सी प्रेम के कारण। तुम्हारे रातों की नींद छीन रहे
- 57:04तो ज़रा सोच सकते हो उस विराट प्रेम के भीतर जब पढ़ गए तुम तो
- 57:13सांज ढले तुम्हारे कदम उस तरफ न उठेंगे बिलकुल उठेंगे।
- 57:23ये वही प्रेम है जीस प्रेम में तुम अपनी गर्दन काट के अपनी हथेली
- 57:29पर रख लेते हो। वो प्रेम उमड़ जाए तो गर्दन भी कट
- 57:38के हथेली पर आ जाती है। एक छोटे से प्रेम में तुम रात भर
- 57:43करवटें बदलते हैं सारी रात कट जाती है तारें गिनने में और तुम
- 58:00गिनते हो कि आज अब सितारे भी कम निकलते हैं।
- 58:08ऐसी हालत हो जाती है तुम्हारी बाग में, जैसे चाँद भी अब नजर नहीं
- 58:14आता, अब सितारे भी कम निकलते हैं याद में तेरी जाग जाग के हम।
- 58:23रात भर करवटें बदलते हैं तो कृष्ण कहते हैं जिनके लिए शोक नहीं करना
- 58:29चाहिए तो उनके लिए शोक कर रहा है पार्थ और ये तेरा अज्ञान है।
- 58:42तू उन्हें शरीर समझता है क्योंकि तू खुद को शरीर समझता है।
- 58:47आज का अध्याय इसका निचोड़ इन चार शब्दों में ही है।
- 58:55तू खुद को शरीर समझता है इसलिए भीष्म को भी शरीर समझता है।
- 58:59द्रोण को भी शरीर समझता है। यही तेरी नादानी है यही तेरा
- 59:04अज्ञान है इसको छोड़ दे अर्जुन लेकिन अर्जुन प्रश्न पे प्रश्न
- 59:10दागे चला जाता है और आखिर में कृष्ण को वही करना पड़ता है जो
- 59:17गुरु के पास आखिरी हथियार होता है।
- 59:26फिर फिर अर्जुन कहते हैं, नष्टो मोभा समर तिर लब्धा मुझे याद आया
- 59:37हे भगवान मैं भूला हुआ था, मुझे याद आया मैं कौन हूँ?
- 59:46तुम नातों को याद करते हो भूला भूला।
- 59:53फिर है जगत में कैसा नाता है? फूला फूला फिर है।
- 1:00:01जगत। में कैसा नाता है?
- 1:00:07भूला भूला फिर है जगत। में कैसा नाता है?
- 1:00:14फूला फूला। फिर है जगत में।
- 1:00:17कैसा नाता है?