Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 Feb 25 - 2000+ Videos का संक्षिप्त अर्थ! मैं शरीर हूं, इस illusion को मिटाने का अद्भुत Formula.
Transcript
- 0:21प्रणाम बाबा जी अश्विनी कुमार जय श्री शंकराचार्य ने महावाक्य की
- 0:37उद घोषणा की ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या।
- 0:45चारों वेदों में महा वाक्य लिखें सभी महान पुरुषों के कुछ ना कुछ
- 0:58महा वाक्य हैं बुध का अपदीप हो भवा?
- 1:08क्या आप भी कोई महावाक्य बताना चाहेंगे?
- 1:14हाँ, बिल्कुल चारों वेदों में। महावाक्य है संवेद में तत्व मत से
- 1:38रघुवेद में प्रज्ञानम् ब्रह्मा। यजुर्वेद में अहम ब्रह्मस्म और
- 1:50अथर्ववेद में एम आत्मा पृम महावाक का अर्थ है जो इस पुस्तक में लिखा
- 2:02गया। उसका सार क्या है, रस क्या है?
- 2:09जैसे हम कहानी के आखिर में लिखते हैं।
- 2:11मोरल तो मैं जो? बोला, उसका मोरल क्या है?
- 2:20कहानी तो कहानी है। मोरल उस कहानी का एक्सट्रैक्ट है,
- 2:27रस है निचोड़ लिया हमने इस कहानी में ये अर्थ है मैं जो बोला।
- 2:41उसका अर्थ क्या है? संक्षिप्त रूप में लिया जाए तो
- 2:50क्या अर्थ निकलता है उसका, यानी संक्षेप में कुछ शब्दों में
- 2:57एक्सट्रैक्ट को बता देना महावाक्य कहलाता है।
- 3:04सुनिए मेरा महावाक्य लिख लीजिये हरदा के डायरियो पे शंकर ने कहा
- 3:13ब्रह्म सत्यम जगत मैं कहता हूँ ब्रह्म सत्यम।
- 3:19जगत सत्यम ब्रह्म, सत्यम जगत, सत्यम ब्रह्मम मिथ्या ब्रह्म भी
- 3:34सत्य है, जगत भी सत्य है ब्रह्म मिथ्या।
- 3:40ये जो वहम तुम्हे हो गया है ये जो इल्ल्यूसन तुम्हे हो गया है वह
- 3:48नहीं है वह मिथ्या है। ब्रह्म सत्यम जगत सत्यम ब्रह्म
- 4:01मिथ्या। ब्रह्म मिथ्या है, रस्सी तो है,
- 4:09सर्प भी होता है लेकिन रस्सी सर्प नहीं है।
- 4:15अगर तुमने यह भ्रम पा लिया कि रस्सी में सर्प है तो यह भ्रम है।
- 4:23और यही तुम माने बैठे हो और सभी वेदों का सार जो चारों वेदों का
- 4:33मैंने महावाक्य आपको बताया शंकराचार्य का महावाक्य आपको
- 4:40बताया। बुद्ध का महाभाग्य आपको बताया अप
- 4:47दीपो बाबा महावीर का अहिंसा परमो धर्म महाभाग्य है।
- 5:01सार क्या है? क्या कहना चाहते हैं तो मेरे
- 5:07महावाक्य को लिख लीजिये ब्रह्म सत्यम जगत सत्यम सृजन भी सत्य
- 5:15सृजन हारा भी सत्य। ब्रह्म असत्य इल्लुसन असत्य वह
- 5:25भ्रम है, वह मिथ्या है, वो है न इसलिए किसी को कोई रोग हो जाए।
- 5:35तो दवा दारू से ठीक किया जा सकता है, लेकिन किसी को भ्रम का रोग हो
- 5:40जाए, वह रोग होता ही नहीं है। भ्रम का कोई इलाज नहीं है।
- 5:48भ्रम की कोई दवा नहीं है, तुम्हें भ्रम हो गया है।
- 5:54इसलिए मैं कहता हूँ हमारा बोलना एक कतल पे जाके बेकार है क्योंकि
- 5:59वह बोला नहीं जा सकता बोलते हैं करना पक्ष बोलते हैं बोलना बिमारी
- 6:11भी नहीं है। बोलना किसी गहरी करुणा से आता है
- 6:22शायद तुम्हारे भीतर उतर जाएगी ये बात।
- 6:32और तुम उस तल पे पहुंचाओ जहाँ ब्रह्मों की निवृत्ति होती है,
- 6:37समाधान होता है, समाधि तक पहुंचाओ तुम्हारी सारी समस्याओं का निदान
- 6:45हो जाये तुम्हारी सारी दुख तकलीफों का निधन हो जाये।
- 6:53बस यही है। मैं यही कहना चाहता हूँ र स्वरूप
- 6:58में अगर तुम सभी वीडियो का एक्सट्रैक्ट निकालोगे तो तुम्हें
- 7:07यही मिलेगा। ना ब्रह्म मिथ्या है, ना जगत
- 7:14मिथ्या है ब्रह्मा मिथ्या है, इल्यूजन मिथ्या है, इल्यूजन गलत
- 7:22हो गया तुम्हें तुम गलत समझ बैठे रज्जु में सर्प।
- 7:28है नहीं। चारवाक ने कहा ऋणम कृतवा ग्रंथम
- 7:36पे बैठी यता जीवित सुखी जीवित बस सुखी रहना सीखो।
- 7:49जब तक जियो सुख पूर्वक जियो बस में भूतस्य देहस्य पुनर्आग में
- 7:56नाम कोतह तर्क बड़ा शानदार है। जो एक बार खाक हो गया, उसने ऋण
- 8:04दिया था या ऋण लिया था, वह सब चूक जाता है।
- 8:08कोई मर जाता है तो बनिया क्या करता है, उस पे लकीर मार देता है,
- 8:23लिख देता है जो मर गया। वह कैसे चुकाएगा?
- 8:30बसवा भूत से देह से पुनर आगमन कुतह वो आएगा ही नहीं।
- 8:48इसलिए जो पैसा नहीं, रिटर्न होता, बैंकरों वाले उसे बट्टे खाते डाल
- 8:54देते हैं यानी मृत घोषित कर देते हैं।
- 8:59यह आय का नहीं, कुछ लोग जीते जी ही ऐसे होते हैं।
- 9:14जो कहते है ऋण उठाओ ऋण कृत्वा गर्दम पीवे तो घी मत पियो, दारु
- 9:20पी लो कुक्कड़ खालो। मैंने ऐसे लोग देखे हैं, मैंने कल
- 9:29भी चक्कर किया था। ऐसा मत कर।
- 9:50दीवानों से ये मत पूछो दीवानों पर क्या?
- 10:04गुजरी है गुजरी है दीवानों से? रोहित जी से पूछो रिणम कर तू आ,
- 10:20गर्दन भी बैठ। उनके साथ बीती है।
- 10:27कोर्टों के चेहरियों के चक्कर लगाए जीत गए और बात अलग है लेकिन
- 10:35चार वा के किसी एक काल में पैदा हुआ है।
- 10:38ऐसा नहीं चार वा के सभी कालों में पैदा होते हैं।
- 10:54प्रणम कर्तवा दारू पी वेद कुक्कड़ खा वेद मैंने रोहित से कहा, देखो
- 11:00बेटा अब जो चला गया उसे भूल जा। अब तो इसने कोर्ट के अंदर भी
- 11:16ललकार दिया कि नहीं, मैंने लेने हैं और मैं तो जानता हूँ उसका सगा
- 11:26भाई कहता है किसने दिन तो ऐसे चारवाक किसी एक काल में नहीं
- 11:32होते, आज भी हैं, आगे भी होते रहेंगे।
- 11:37बस घृतम पीवेत की जगह शब्द बदलते रहेंगे।
- 11:44मध्य पीवेत दारू पीवेत आमलेट खावेत।
- 11:57के मुर्गा खावेत ये बदलते रहेंगे। कुछ मजाक भी होना चाहिए।
- 12:14हसन खेलन मणदा चाव। यही कहा गुर गुर खन्ना से हँसी बो
- 12:24खेल बो सारी बोतियाँ। ऐसे हँसते रहो, फिरते रहो और
- 12:30ध्यान में उतरते रहो। जिंदगी आसानी से बीत जाएगी और तुम
- 12:35उस जगह पे उतर जाओगे जहाँ अकारण सुख है, बाहर शकारण सुख है।
- 12:47बाहर तुम सुखी हो तो हो, किसी कारण से लॉटरी लग गई।
- 12:54पत्नी अच्छी मिल गई, पति अच्छा मिल गया।
- 12:57किसी कारण से खुश होते रहो, लेकिन एक तल है।
- 13:05जहाँ अकारण खुशी मिलती है, कोई कारण नहीं है, सिर्फ उसका होना ही
- 13:12कारण है। उसके होने से ही खुशी मिलती है।
- 13:18उस स्तर पर पहुंचना होता है बाहर पदार्थों को।
- 13:25भोगने से खुशी मिलती है, अच्छे डेवलप के पिल्लों में जाएं उनके
- 13:32ऊपर रात 100 खुशी मिलती है श कारण खुशियां हैं ये संसार की सभी
- 13:38खुशियां श कारण। लेकिन एक तल हमारे भीतर ऐसा भी है
- 13:48जहाँ ये कारण खुशी है। कोई कारण यहाँ किसी ने आना भी
- 13:56नहीं है, लेकिन इंतजार भी है। कोई नहीं है फिर भी है मुझको, न
- 14:16जाने किसका है इंतजार। हो कोई नहीं है फिर भी है मुझको।
- 14:39ना जाने किसका इंतजार। पूछो मीरा से पूछो यशोधरा से, यह
- 14:58विरह की मारी बेचारी, इनको किसका इंतजार?
- 15:07है तो कोई नहीं और थोड़ा सा आहट होती है।
- 15:21ज़रा सी आहट होती है। तो दिल सो जाता है, कहीं ये वो
- 15:40तो? नहीं कहीं।
- 15:45ये वो तो नहीं। कहीं ये वो तो नहीं कहीं ये वो तो
- 15:59नहीं कहीं ये वो तो नहीं कौन? तुम्हें भी इंतजार है किसी का कब
- 16:13आएगा किसका इंतजार पता नहीं, लेकिन संसार के प्रत्येक मनुष्य
- 16:26को। किसी न किसी का इंतजार ये नहीं
- 16:33पता कि तुम्हें इंतजार है किसका है तो कोई भी नहीं मेरे पास रोज़
- 16:41रुक आ जाते हैं। बाबा सब हैं।
- 16:45सब है कमी कुछ भी नहीं, लेकिन फिर भी भीतर किसी का इंतजार है।
- 16:56वो आया नहीं, वो कौन है? बस इसी की तलाश करना, अध्यात्म की
- 17:12तलाश करना, मज खपाई करना अध्यात्म नहीं होता, मुझे लोग कह देते हैं
- 17:24आओ बाबा शास्त्रार्थ करें। बहस करें काहे की भाई परमात्मा?
- 17:34की। नहीं, नहीं, मैं नहीं बहस करूँगा।
- 17:40क्यों बाबा बहस सदा उसकी होती है। जिसका शक होता है आई हॅव नो डाउट
- 17:54दर्शन के बाद बहस करने का कोई मतलब नहीं बचता।
- 18:04मैंने देख लिया है। नग्न नेत्रों से देख लिया है और
- 18:10जो देख लेता है वह भ्रम मुक्त हो जाता है।
- 18:16उसका इल्यूज़न भंग हो जाता है। वह फिर तत्व मसीह कहे, वह फिर एहम
- 18:22ब्रह्मसमा कहे। हैं।
- 18:24चारों वेदों का कोई भी भ्रम वाक्य कहे भ्रम मुक्त हो जानी चाहिए, बस
- 18:46यही है तमन्ना। यही है तमन्ना तेरे घर के सामने।
- 19:05मेरी जान जाए मेरी जान जाए आए यही है तमन्ना तेरे घर के सामने।
- 19:26मेरी जान जाए मेरी। जान जाए यही है तमन्ना तेरे दर पे
- 19:38चलता हूँ वो, काबा हो वो तीर्थ हो?
- 19:46मुख हो तेरे घर के सामने तू चलता चलता उस राह पे खो जाओ प्राण
- 19:56न्योछावर कर तुम निकल जाए प्राण यही है तमन्ना।
- 20:04वो हज करता हूँ या तीर्थ करता हूँ या प्रेमी के दरवाजे पे जाता हूँ
- 20:11तेरे घर के सामने मेरी जान जाए जब उसकी।
- 20:21मार्ग पे चलता पर्ण त्याग देता है, वह मुक्त हो जाता है।
- 20:30डरना मत भै आड़े आएगा मृत्यु का भै आड़े आएगा तुम्हें चलने से
- 20:38रोकेगा। 1000 1000 तुम्हें दर्द खायेगा,
- 20:42लेकिन तुमने भयभीत नहीं होना वैसे तुम महा वाक्य पूछते हो कौन सा
- 20:54ऐसा शब्द है? मेरे प्रवचनों में जो महा वाक्य
- 20:57है सभी तो महा वाक्य हैं। किसी भी शब्द को पकड़ लो महा
- 21:06वाक्य है वो ये चलता हुआ अना हतनाथ इसका एक छोर पकड़ लो, यह
- 21:12महा वाक्य है वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ उदगाम स्थल है इसका।
- 21:25और उस दरवाजे पे तुम्हारी जान चली जाए तो चिंता मत करना क्योंकि
- 21:30आखिरी पड़ाव यही होगा तो मैं पहले से तैयार किए देता हूँ।
- 21:43मृत्यु कब है तुम्हें? कपायेगा प्राण व्याकुल होंगे शरीर
- 21:49थर थर कांपेगा तमन्नाएं खो खो जाएँगी वह सुनाएं, अधूरी रह गईं
- 21:59तुम्हारा जीरा कंपेगा। मस्जिद कोलो जोड़ा ढर्रा मस्जिद
- 22:08में जाएंगे तो तमन्नाए अधूरी रह जाएंगे जाट्ठा कर दे डेरे,
- 22:19बढ़िया। तो हमें पता नहीं है जहाँ भी
- 22:23जाओगे सभी उसका निवास है। कौन सा स्थान है जहाँ वो है नहीं,
- 22:29मच्छी से डर जाओगे, ठाकुर के डेरे में मंदिर में जाओगे, अपने भीतर
- 22:37ले जाओगे। वह ठाकुर का ढीरा भी है।
- 22:43वह मस्जिद का मुख्य द्वार भी है। वह चर्च का गेट भी है, वह
- 22:50गुरुद्वार भी है। इसीलिए हमने गुरुद्वारा को
- 22:54गुरुद्वारा कहा। हाँ प्राणी चले जाए, चले जाए
- 23:05बिल्कुल चिंता मत करना आखिरी चिंता मृत्यु की चिंता ही होती है
- 23:17इसे रोज़ मजबूत करते रहना। जीस तरह तुमने इस संस्कार को
- 23:23मजबूत किया। मैं शरीर हूँ, मैं मन हूँ दोहराते
- 23:29चले गए, दोहराते चले गए। यह संस्कार घनी भूत हो गए और
- 23:34सुमेरु पर्वत जैसे हो गए। ऐसे ही इनके पैरेलल इस सुमेरु
- 23:43पर्वत को खड़े करते जाना रोज़ एम आत्मा तत्व मसीह अहम् ब्रह्मस्म।
- 24:07उसके पैरलल इसको खड़े करते जाना तुम पाओगे बहुत जल्दी ये स्मेरू
- 24:14को पर्व कर जाएगा और स्मेरू गिर जाएगा।
- 24:20इसे ही कहते हैं इलूशन को मिटाना, भ्रम के पैरलल श्रद्धा को पैदा
- 24:31करना, तुम श्रद्धा करना मैं वो विश्वरूप चेत हूँ।
- 24:43मैं शिव स्वरूप हूँ शिवो अहम मैं चेतन ब्रह्म हूँ, एम आत्म ब्रह्म
- 24:52हूँ, मैं ही ब्रह्म हूँ, एहम ब्रह्म स्वरूप बराबर खड़े करते
- 24:59रहना इसको। जैसे तुमने अंबार लगा दिए सोने
- 25:04रोके जन्मो जन्मो से यह मान करके, मैं शरीर हूँ मैं मन, वैसे ही
- 25:13इसके पैरल अंबार लगा दो, मैं न मरूँ।
- 25:20मरे संसारा, मैं ना मरूँ, मरे संसारा, ना ओह मरे, न ठगे जा,
- 25:33इनके राम बसे मनमा। तुम कभी ठगे नहीं जाओगे, न तुम
- 25:44कभी मरोगे, तुम अमर हो, तुम अजर हो, यही कहते हैं कृष्ण तुम कट
- 25:56नहीं सकते। तुम गल नहीं सकते, जल नहीं सकते,
- 26:00मर नहीं सकते तुम अदर हो, अमर हो कोई बाड़ तुम्हें बहती नहीं, कोई
- 26:08तूफ़ान तुम्हें उड़ाता नहीं नैनम छद्म तिशास्त्रणी नैनम दाहती बाबा
- 26:13कहा। मैं चैनम गले धन त्यापोना सो सती
- 26:18मारो तहा मेरा महावाक्य, याद रखना तुम्हारे
- 26:41माने हुए संस्कारों के साथ पैरलल दूसरी पटड़ी बिछा देना।
- 26:50और दूसरी पटड़ी हो हे महात्मा ब्रह्मा तत्व मासी और उसको रोज़
- 27:01गहरे करते रहना, रोज़ गहरे करते रहना।
- 27:09इसको इतना गहरा कर देना यह तुम्हारे सभी ब्रह्मों को काटते
- 27:15हैं और जश्न तुम अपने नैनों से निहार लो गए बस उस चीज़ की होती
- 27:26है जहाँ संदेह होता है। और जब तक संदेह रहेगा तब तक तुम
- 27:32शास्त्रार्थ करने के योग्य नहीं और जिसका संदेह मिट जाता है वह
- 27:39शास्त्रार्थ करता नहीं और दोनों ही स्थितियों में तुम शास्त्रार्थ
- 27:45करते नहीं करना नहीं चाहिए तुम्हें।
- 27:50एक स्थिति में तुम जानते नहीं कि वो है भी कि नहीं।
- 27:57अगर ईमानदारी से देखोगे तो साथ रद्द करने वाला अपने भीतर उतरे।
- 28:03सबसे पहले ये जानें कि क्या मैं जानता हूँ।
- 28:08क्या मैंने खोजा है बस सोमवार कस में यही कमी रह गई, उसने खोजा
- 28:13नहीं था, कह दिया परमात्मा नहीं नीचे से फूंक के नहीं आया था
- 28:19परमात्मा को कह दिया परमात्मा मर गया गॉड इस डाइड।
- 28:29और जो आस्तिक हैं, मंदिर जाते हैं, उन्होंने देखा नहीं, एक ने
- 28:37खोजा नहीं, एक ने देखा नहीं। दोनों मूड हैं, लेकिन बेहतर कौन?
- 28:44बेहतर वो? जो यह मानता है कि परमात्मा है
- 28:50क्यों? क्योंकि यह सत्य के करी पड़ता है,
- 28:55ए अनार होता है, ए खरगोश नहीं होता तो बेहतर कौन ए अनार होता
- 29:06है? है ये खरगोश होता है इन दोनों में
- 29:12बेहतर कौन? ये अनार होता है क्योंकि ये अनार
- 29:18होता है। यह सत्य के करीब है।
- 29:23ये ठीक। बाद में जब तुम पीएचडी करोगे,
- 29:27मस्ट डिग्री लोगे, बैचलर डिग्री लोगे, तुम्हें पता चल जाएगा ए
- 29:33सिर्फ अनार का नहीं होता, आज सिर्फ आम का नहीं होता।
- 29:43वो तुम्हें खुद ही पता चल जाएगा, लेकिन जो सत्य के करी पड़े उसे
- 29:49मान लेना जो सत्य से विपरीत पड़े, उसे मत मानना और ये बताएगा कौन यह
- 29:59बताएगा संत जिसने देख लिया अपनी आँखों से।
- 30:03जो दावा करता है मैं कहता आँखों देखी मुझसे पूछो मेरी आँखों में
- 30:11झाँको मेरी दंजिया देखो क्यों बैठा हूँ एक स्थान पर मुझे लगवानी
- 30:19होगा। अभी तक ठीक ठाक तुम कसते हो, ये
- 30:35बात अलग है कुछ लोग। ये प्रार्थना करते हैं कि मुझे हो
- 30:40जाए तो हो जाए तो हो जाए तो जीसको होगा, वो मैं नहीं हूँ।
- 30:47जानने के बाद सब दुखड़े वहीं मिट जाते हैं।
- 30:52जिसने जान लिया उसके संदेह मटे और उसका दुख भी मट गया।
- 30:57उसका दर्द भी मट गया। उसके रोग भी मट गए।
- 31:02फिर लोग कहते हैं मुझे कैंसराइटिस हो गया है कोई दवा, मैंने कहा खुद
- 31:09को जान लो। इससे बड़ी कोई दवा होती ही नहीं।
- 31:14कैन्सराइटिस का इलाज भी करो, लेकिन खुद को भी जानो, खुद को
- 31:23पहले जान लिया तो कैन्सराइटिस का इलाज करो या न करो, कोई फर्क नहीं
- 31:28पड़ता क्योंकि जब तुमने जान लिया। ये नाखून जो बढ़ गए हैं ये मैं
- 31:37नहीं हूँ तो तुम काट देते हो, अपने हाथों से काट देते हो, लेकिन
- 31:42अंगुली को नहीं काटते, ठीक है, निकल जायेगा ओह नर्व टूटी?
- 31:52से लापडोगे लेकिन उसी को जो तुम्हारे शरीर का अंग है ना खून
- 32:02को काट देते हो, तुम्हें दर्द नहीं होता बस ऐसे ही तुम्हें दर्द
- 32:07नहीं होता। तुम छेदते नहीं, तुम कटते नहीं
- 32:11नैनं छेदन तीर्थशस्त्रण नेल कटर तुम्हारे बड़े हुए नाखूनों को काट
- 32:17सकता है और तुम्हें दर्द नहीं होगा।
- 32:25बस ऐसा ही संत होता है। उसे ये फासला समझा आ जाता है।
- 32:33जो कटता है, वो मैं नहीं। फिर शरीर तुम्हारे लिए उस बढ़ी
- 32:38हुई नाखून की तरह हो जाता है जिसके कट जाने से तुम नहीं कटते।
- 32:49मेरी उदाहरणों से ठीक ठीक सबक लिया करो इसको बहस का विषय मत
- 32:56बनाया करो, हाँ समझता हूँ मैं। उदाहरणों को बहस का विषय न बनाया
- 33:07होगा। संत जानता है मैं कौन जैसे तुम
- 33:22जानते हो, बड़े हुए नाखून मैं काट दूंगा तो मैं नहीं कटूंगा मुझे
- 33:26दर्द नहीं होगा। ऐसे ही संत जाके केंद्र पे बैठ
- 33:31जाता है परिधि से बहुत दूर कल ही मुझे रोहित कह रहा था, किसी बात
- 33:41को मैंने कहा देखूं। आग लगी है।
- 33:51संत आग को जलते हुए देखता है, बहुत दूर पर भी है और असंत आग में
- 34:01खुद जलता है। यही फर्क है संत और असंत, ज्ञानी
- 34:07और अज्ञानी। आग वही लगी है, आग लगी है परिधि
- 34:10में सफियर भी आग लगी है, लेकिन जो सफियर से के केंद्र में उतर गया
- 34:21वह शांत हो गया। वह जानेगा कि कहीं दूर।
- 34:28कहीं तो आग लगी है, वह प्रभावित नहीं होता।
- 34:37जैसे रात को कोई चोर उचक का तो हमारे पास से निकल जाए।
- 34:42जैसे रात को कोई बंदूक लेके तलवार लेके तुम्हारे पास से निकल जाए तो
- 34:47तुम्हें भय नहीं लगेगा दूर निकल गया कोई तुम सोये पड़े रहो
- 34:54तुम्हें पता नहीं चलता ऐसी ही आग कहीं दूर लगी होती है।
- 35:03तुम तक उसका शेक नहीं पहुंचता। तुम बस सिर्फ देखने वाले होते हो।
- 35:15मिर ऑब्सर्वर है तुम सिर्फ ओब्सर्वर हो तुम धृष्टता हो तुम
- 35:20देखते हो। तुम देखने वाले रह जाते हो संत
- 35:27वहाँ से कूद जाता है जहाँ आग लगी है वहाँ पहुँच जाता है जहाँ आनंद
- 35:35है जहाँ सफेर की आग पहुंचती नहीं बस कृष्ण यही कहना चाहते हैं।
- 35:44सिफियर पर लगी प्रत्येक आग केंद्र को प्रभावित नहीं करती।
- 35:50सिफियर पर हुई प्रत्येक घटना केंद्र तक नहीं पहुंचता।
- 35:54उसका सैक इसे ही संत कहते हैं, जो जान लेता है।
- 36:05उसके भ्रम की नवृत्ति हो जाती है। ब्रह्म सत्यम जगत सत्यम भरम,
- 36:17मिथ्या ब्रह्म मिथ्या है और वास्तव में मिथ्या है।
- 36:22तुम देखो इलिवसन मिथ्या हित होता है।
- 36:27बहम की बिमारी को ठीक कर सका है, मैं अक्सर एक कहानी सुनाया करता
- 36:38हूँ एक ग्रामीण औरत को उसका बेटा ले गया, डॉक्टर से दवाई डाला
- 36:49बेमार थी बहुत दिनों से। बिरजो औरतें क्या करती हैं?
- 36:55बैठी बैठी चरखा चलाती हैं, पुराने जमाने की बात है रुई को कातती हैं
- 37:05चरखा। और धागा बनाती हैं, उस धागे से
- 37:12कम्बल बनाती हैं, चादरियां बनाती हैं जो कबीर काम करते हैं जीनी
- 37:19जीनी सी चादरियां पूर्ण देते हैं। कई दिनों से ये बीमार थी, चरखा
- 37:28नहीं खा रही थी, मन बड़ा करता था लेकिन नहीं चरखा रही श्रद्धा से
- 37:35तो पुत्र कहने लगे माते चलो तुम्हें किसी डॉक्टर से दिखा लूँ,
- 37:40क्या बिमारी है, दवा दे देगा। रास्ते में जाता हुआ उसने सभी
- 37:55स्थानों को क्रॉस किया। डॉक्टर से दवा लेके वापस आ गया,
- 38:06फैक्टरी थी, दुकानें थी शोरूम थे। दवाओं की दुकान थी, डॉक्टर्स की
- 38:14दुकान थी, जेनिंग एंड प्रोसेसिंग फैक्टरी भी थी और रुई का ढेर लग
- 38:22जाए बड़े बड़े ढेर। वो प्रोसेसिंग होती है, बनौना
- 38:29निकलता है। फिर रूई बनती है फिर वो कथकती है,
- 38:36गांठें बनती हैं, गांठें बाहर सप्लाई होती हैं, वो फैक्टरीस में
- 38:43जाती हैं और उनका कपड़ा बनता है और कपड़े से पोशाकें बनती हैं।
- 38:51तू समृद्ध औरत ने देखा, इतने बड़े पहाड़ रोई के कुछ तो बीमार थी।
- 39:05कमजोर मान जल्दी शिकार हो जाता है।
- 39:08ब्रह्मों का इस शब्द को भर सुन लो।
- 39:15बहुत लोगों के काम आएगा। कमज़ोर मन बहुत जल्दी शिकार हो
- 39:20जाता है भ्रमों का इसलिए ये जो टोपी वाले खिलाड़ी हैं ना क्रस्ती
- 39:26नमन टोपी यह कमजोर मनों को अपने वश में कर लेते हैं।
- 39:32ऐसे ही एक जगह स्नान करने के लिए इतनी भीड़ नहीं लगा करती।
- 39:38कुछ न कुछ तो फैलाना ही पड़ता है। इनको खुद नहीं पता इस विज्ञान का।
- 39:50ज्योतिष विवेक विज्ञान है। वे सूक्ष्म से प्रश्न कर रहे हैं
- 39:57अपने चार वेदों की बात बोले छः शास्त्रों की बात नहीं, बोले आप
- 40:02अक्सर कहते हैं चार वेद छः शास्त्र में बात मिलतः है दोए।
- 40:08अब इस बात को भी ध्यान से समझ लेना ये कर्मशास्त्र का विधान है।
- 40:14यह रस है, एक्सट्रैक्ट है, निजोड़ है, चार वेद, छः शास्त्र में बात
- 40:21मिलत है, दोय दो बात कौन सी सुख देने सुख होत है?
- 40:28अगर सुख दोगे तो सुख ही मिलेगा जैसे भोग गे वैसा काटोगे आम भोग
- 40:35ज्ञान, बबूल, बोगे, बबूल, सुख, दीन सुख होते हैं।
- 40:44दुख दीन दुख हो बस। ये दो ही बातें हैं।
- 40:50यह एक्सट्रैक्ट निकल गया चार वेदों का छह शास्त्रों का चार वेद
- 40:56छह शास्त्र में बात मिलत है, दो दुख देने दुख होता है सुख देने
- 41:03सुख होय। छः शास्त्र कोंण से कल्प,
- 41:10व्याकरण, छंद, ज्योतिष और छटा नेरोक्ता ए शास्त्र।
- 41:24जो ज्योतिष से भी एक शस्त्र है। सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति जब
- 41:34किसी खास स्थान पर होते हैं तो एक तारात्म्य बनता है।
- 41:47और पृथ्वी पर उसके किरणें गिरती हैं।
- 41:51एक छंद बनता है, आपस में गुथ जाती हैं।
- 41:56सारी तरंगें एक कॉम्बिनेशन होता है, एक गीत।
- 42:05जैसे अक्षरों को जोड़ के गीत बना देते हैं, एक कम्यूनिकेशन होती है
- 42:15सभी के भीतर और उस वक्त सभी भ्रमण से कुछ विशेष तरह की बेटा।
- 42:26अल्फा बीटा फमा रेज निकलती हैं, बस वह ज्योतिष बता सकती है।
- 42:38ज्योतिषीय गणना ब्रेबू को क्यों सर्वोच्च माना गया?
- 42:44भगवान कृष्ण कहते हैं, महर्षियों में मैं बेगो ऋषि हूँ।
- 42:50क्यों उसने खोज की थी? यह एस्ट्रोलॉजिकल सिस्टम सारा
- 43:02कैसे काम करता है? बहुत बड़ा वैज्ञानिक था, इसलिए वो
- 43:08ऋषि ऋषियों से बड़ा महर्षि महर्षि में मैं भृगु ज्योतिषिक शास्त्र
- 43:16है, महाशास्त्र है। लेकिन इनको कोई पता नहीं।
- 43:26कमजोर मन जो जानते नहीं, जो तुष की बात है और जिनके मन हल्के हैं
- 43:34उनको जल्दी हिप्नोटाइज़ किया जा सकता है।
- 43:41बस ये एक बात कहें। आओ आके रुद्राक्ष ले जाओ और
- 43:49करोड़ों की भीड़ जो 10 पीसे का है रुद्राक्ष नेपाल में गिरे पड़े
- 43:55हैं जीतने चाहे चोकलो। और करोड़ों की भीड़ जुट जाएगी।
- 44:05भगदड़ मच जाएगी। आदमी का लोभ कहाँ कहाँ ढूंढता है?
- 44:11उसे आदमी का लोभ उसे कहाँ कहाँ ढूंढता है धन में?
- 44:21पूजा में, पदार्थ में आराम में कहाँ कहाँ ढूंढता है उसे पत्थर
- 44:29में? लेकिन मिलता कहाँ से मिलता है
- 44:37अपने में? हंसपा ताल तलैया हंसपा।
- 45:00मानसरोवर ताल तलैया क्यों डोल ताल तलैया क्यों डोल?
- 45:19मना। मस्त।
- 45:21हुआ तो क्या बोले? मन मस्त।
- 45:29हुआ तो क्या बोले? मस्ती को ढूंढ़ते हो तुम सब है।
- 45:42और कोई आस पास भी नहीं है, लेकिन फिर भी किसी का इंतजार है उससे
- 45:50पूछ लेते हैं, दुखी रोग बाबा सब हैं, अब बताओ मेरे पास क्या नहीं
- 45:55जो लोगों ने कहा वो सब इकट्ठा कर लिया।
- 46:00लेकिन फिर भी किसी का इंतजार है, कोई आता हुआ भी नहीं दिखता।
- 46:08दूर दूर तक राहें सोनी पड़ी हैं। कोई नहीं है फिर भी है मुझको, न
- 46:26जाने किसका इंतजार। वो कोई नहीं है फिर भी है मुझको,
- 46:48ना जाने किसका इंतजार। किसी का इंतजार है तुम्हारे
- 46:55प्राणों को, तुम्हारे अस्तित्व के गहरे तलों को किसी का इंतजार है
- 47:03और वो किसका इंतजार है ये मस्ती का इंतजार है।
- 47:11आनंद का इंतजार है। आनंद नहीं मिला तुम्हें न प्रार्थ
- 47:17में, न सुख में, न सुविधा में, न साधनों में, न पैसे में, न ऊंची
- 47:23पदभुओ में न मान सम्मान में, संसार की किसी वस्तु में तुम्हें
- 47:29सुख नहीं मिला सुख संसार से। वो सुख जिसकी बात मैं आनंद करता
- 47:35हूँ, देखिये शब्दों की बात है, क्या करें आराम को तुम सुख कहते
- 47:46हो, सुविधाओं को तुम सुख कहते हो? लेकिन संत कहता है ये सुख नहीं है
- 47:55जिसे तुम महा सुख भी कहते हो वो भी सुख नहीं है।
- 48:02सुख और आनंद में देर इस ए क्वालिटेटिव डिफरेंस बिटवीन दी टू
- 48:09मैंने बहुत बार पहले भी बताया। नॉट क्वांटिटेटिव डिफरेंस, तुम
- 48:15मात्रात्मक फर्क समझो महा सुख महा महा सुख हो जायेगा तो वह आनंद हो
- 48:23जायेगा न क्वालिटेटिव डिफरेंस गुणात्मा को फर्क है।
- 48:34सुख का विपरीत होता है दुख तुम उस सुख की बात करते हो जो कभी भी दुख
- 48:41में तब्दीर हो जाता है। संत कहता नहीं मैं इस सुख की बात
- 48:46में कर रहा हूँ। मैं उस सुख की बात कर रहा हूँ
- 48:50जिसका कोई विपरीत छोर नहीं होता, जिसका एक ही पहलू होता है, दूसरा
- 48:56पहलू नहीं होता। सिक्के के दो पहलू हैं, लेकिन
- 49:04आनंद का दूसरा पहलू नहीं होता है। आनंद का विपरीत कुछ नहीं होता
- 49:13आनंद तो बस आनंद है कॉल इट टेटो डिफरेंस बिटवीन दत्तो शब्द है ना
- 49:23शब्दों की सीमा है। शब्दों के बोलने के ढंग हैं इसलिए
- 49:30व्याकरण को भी शास्त्र मान लिया गया।
- 49:34छंद को भी शास्त्र मान लिया गया। ज्योतिष को भी शास्त्र मान लिया
- 49:41गया। ये छः शास्त्र मान लिए गए, चार
- 49:44वेद मान लिए गए। वैसे तो प्रत्येक शब्द जिससे तुम
- 49:49भीतर उतर जाओ, वह वेद है। मैं वेद उसे ही कहता हूँ जिससे
- 50:00तुम अंतःस्तर को छू जाओ वह वेद। वह महा वाक्य जिससे तुम छू जाओ,
- 50:08अपने ही उस भीतरी तल को फिर तुम ताल तलैया में नहीं डोलोगे तुमने
- 50:19मानसरोवर पा लिया। ये सिर्फ इशारे हैं, संत और कर भी
- 50:25कह सकता है, संत दो ही बात कह सकता है।
- 50:30एक तो यह कि मैं झूठ नहीं बोलता, मैंने देखा है अपनी आँखों से देखा
- 50:35है, मैंने माना नहीं है सिर्फ कभी माना था, लेकिन मान के जाना भी
- 50:41है। शुरू मानकर ही किया था।
- 50:49पहुंचा जानने में जब मैं चला तो मैं अंधा था, जब मैं पहुंचा तो
- 50:57मेरी आँखें मुझे मिल गई थीं। मैं अकेला ही चला था।
- 51:10जाने बे मंजिल मगर मैं अकेला ही चला था जाने बे मंजिल मगर लोग
- 51:18सताते गए और कारवां बनता गया बस मानकर ही चला था।
- 51:28ये नहीं पता था कि यह सत्य हो जाएगा।
- 51:35मानकर ही चलता है, संत भी और जान लेता है, नग्न आँखों से निहार
- 51:44लेता है। उसे ही मैं कहता हूँ ब्रह्म
- 51:49मिथ्या है, वह है संत तुम्हें यही विश्वास दिला सकता है और तुम्हारी
- 51:59श्रद्धा यहाँ काम करती है, कुछ कहेंगे नहीं?
- 52:05हम नहीं मानते मत मानो कोई दबाव नहीं है।
- 52:10संत डिक्टेटर नहीं है, संत तानाशाह नहीं होता, संत विवेकानंद
- 52:18के सिर पर हाथ रख देते हैं नरेन्द्रदत्त के और वह गहरी।
- 52:24खाइयों में खोना शुरू हो जाता है बहुत गहरे जहाँ जाकर बस थोड़ी सी
- 52:30चलाओ कब जाता है बड़े से बड़ा सूरमा कब जाता है?
- 52:40वहाँ छाती का साइज काम नहीं करता। वह हौसला चाहिए, साहस और गुरु की
- 52:47आवश्यकता पड़ती है। प्रथम मिलाप था, इतनी श्रद्धा
- 52:55नहीं थी, श्रद्धा तो यही थी। जे बी जे यही कहेगा हाँ देखा है।
- 53:02तो मैं दिखा सकता हूँ बट यू विल हॅव टु अंडरगो सम प्रोसेसेस तो
- 53:10मैं कुछ साधनाएं करनी होगी। यह नहीं पता था कि यह है व्यक्ति
- 53:16मेरे सर पर ही आथरा को दिल का है अनपेक्षित घटना थी।
- 53:24लेकिन गुरू जैसे देखता है कि बस एक धक्का और ये चला यह तो पहुँच
- 53:31गया, मैंने बहुत से लोगों को पूछा मुझे गुरु बनओगे कीर्तन मैं चुप
- 53:41हो जाता हूँ। क्यों कहता हूँ मैं उन्हें
- 53:45क्योंकि मैं जानता हूँ बस इसे एक पुश की जरूरत है, लेकिन इतना
- 53:55तानाशाह नहीं होता गुरु कि तुम्हें धक्के से मुक्ति दिखाते
- 54:00हैं। धक्के से मोक्ष नहीं दिलाया जा
- 54:04सकता और ऐसा मोक्ष लेना भी मत। वह भी बंधन का कारण होगा जो
- 54:16तुम्हें तुम्हारी खुशी से विपरीत मिले।
- 54:20वह मोक्ष नहीं होता, मोक्ष होता है जो तुम्हें अपनी इच्छा अनुसार
- 54:24मिले। नरेन्द्र दत्त चिरलाए हैं स्वामी
- 54:32जी मेरे माँ बाप भी हैं, भाई बहन भी हैं।
- 54:41रामकृष्णा ने हाथ उठा लिया। अच्छा ठीक है, भाई बहन भी हैं,
- 54:49माँ बाप भी हैं तो बाहर आ जाओ। संत इतना भी तानाशाह नहीं है।
- 54:58के मुझको मान दो मुझको सम्मान दो मुझको पैसा दो मेरे शीवर अटेंड
- 55:03करो, नहीं बोलना भाई सिर्फ तुम्हें हुक्का देगा, वो कहेगा
- 55:11मैंने जान लिया बस? अहम् ब्रह्मस्म सिर्फ यही कहेगा
- 55:19तत्व मसीह यही कहेगा एम आ तम ब्रह्म वो सिर्फ अपनी देखी बताएगा
- 55:29तुम कहते का गदके देखी और मैं कहता अखन देखी आगे तुम्हारा काम
- 55:35है। तुम्हें चाहिए तुम वहाँ चले जाओ
- 55:41फिर जैसे योग्य होगे वैसा ही गुरु तुम्हारे से व्यवहार करेगा।
- 55:48मैं जहाँ अंगूठा लगाता हूँ, कुछ लोग स्टेल हो जाते हैं, मूर्ति मत
- 55:53हो जाते हैं। सभी प्रयास करता हूँ नहीं जागते
- 55:57आखिर उन्हें झिंझोड़ना पड़ता है। दूसरे व्यक्ति उन्हें झिंझोड़ते
- 56:04हैं तो फिर उन्हें जाग आती है। मैं कहाँ गया था, कहाँ खो गया था?
- 56:12कुछ व्यक्ति हैं जिन्हें कुछ भी नहीं होता होगा।
- 56:16दोनों प्रकार के लोग हैं, कुछ ऐसे तैयार होते हैं जैसे लाउसे तैयार
- 56:25था। बस एक पेड़ से पत्ता गिरा।
- 56:32सू का पत्ता टूटा, स्वयं से टूटा पतझड़ का मौसम और वह कपता कपता
- 56:41कपता कपता नीचे आया और लाव से उसे देखकर बस इतनी सी जरूरत थी उसे
- 56:49प्रबुद्ध हो जाते हैं। बुध भोर का तारा देखते हैं।
- 56:56डबता हुआ इतने से आप्रभुत्त हो जाते हैं।
- 57:02बस इतने ही जरूरत थी वह बिल्कुल तैयार थे।
- 57:10कुछ लोग ऐसे भी होते हैं ऐसे लोग जो होते हैं।
- 57:18अब तक ऐसे लोग 19 हो गए हैं। संख्या 20 माह करीब है।
- 57:34कुछ लोग ऐसे हैं जिन पर बड़ी मशक्कत करनी होती है।
- 57:40करत करत अभ्यास के जड़ मती होत सुजान जड़ मती को सुजान करना होता
- 57:46है। रसरी आवत जात तहसल पर बुढ़त
- 57:50निशान? बार बार बार बार उनके संस्कार
- 57:54इतने गहरे होते हैं, कहीं टूटे से टूटते हैं।
- 57:59लोग कहते हैं नहीं, मैं को नहीं मानूं नहीं मानूं तो नहीं मानूं
- 58:04और क्या हो सकता है? पर यही हो सकता है गुरु तानाशा
- 58:08नहीं होता। है।
- 58:12गुरु बड़ा द्रविद ह्रदय होता है, संत ह्रदय नवनीत समाना पे कह जाता
- 58:24है थोड़ी सी बात है करूणावान होता है।
- 58:29तुम्हारे दुखों को देखकर पे कर जाता है, चाहता है अभी प्रबुद्ध
- 58:34हो जाओ लेकिन क्या करें पत्थर हो तुम रसरी आवत जात कर सिर पर पड़ते
- 58:43निशान रस्सी बहुत बार घूमाने पड़ेगी, फिर कोई निशान पड़ेगा?
- 58:50एक बार की टूटोगे नहीं तुम लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं ये बस ज़रा
- 59:01गर्दन झुकाई देख ली गर्दन को झुकाना ही होता है।
- 59:07परमात्मा रोज़ इशारे करता है परमात्मा तुम्हें रोज़ कहता है
- 59:14झुक जाओ तुमने देखा हुआ जो बहुत व्यक्ति वृद्ध हो जाते हैं उनकी
- 59:20कमर झुक जाती है ये सीताराम जी शांत थे, कितने झुक हुए थे?
- 59:28तुम रोज़ उसे देखते थे, कोई सबक सीखा, कोई किसी ने सबक सीखा?
- 59:38बस यही सब सीखा कि यह बूढ़ा हो गया है।
- 59:41बुद्ध ने भी यही सीखा कि बूढ़ा हो गया है कमर झुक गई।
- 59:49नहीं सीखने वाले कुछ और भी सीख लेते हैं इसमें से वह कहता है झुक
- 59:59जाओ जैसे बाहर से मैंने झुका दिए तुम्हें।
- 1:00:04ऐसे ही भीतर से वे झुक जाओ जैसे तुम्हारी कमर तीर कमान की तरह झुक
- 1:00:10गए। ऐसे ही झुक जाओ अब तो तुम बाहर से
- 1:00:19भी झुक गए, इसके बाद कब झुकोगे? अब तो झुके जाओ, वह तुम्हें अगाह
- 1:00:31करता है पल पल वह सर्जन हारा वह सृष्टि का निर्माता तो शंकराचार्य
- 1:00:41कहते हैं। ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या मैं कहता
- 1:00:47जगत भी ब्रह्म की सृजना है और उस सृजना के भीतर कण कण में वह समाया
- 1:00:55हुआ है तो वह म्य्थ्या कैसे हो सकता है?
- 1:01:02जब वह कण कण में विद्यमान है। जेता कित्ता तेतता?
- 1:01:07नाउ बिन ना में नाहीं कोठाऊ तो कोई स्थान ऐसा नहीं जहाँ वह नहीं
- 1:01:14तो वह मिच्छा कैसे हो सकता है? तो मैंने तुम्हें आज महामंत्रा
- 1:01:20दिया है महावाक्य। ब्रह्म सत्यम जगत सत्यम छोड़ दो
- 1:01:29शंकराचार्य के इन शब्दों को एक नया शब्द ये मैं दे रहा हूँ तो
- 1:01:35भ्रम क्या है? भ्रम कुश तो है, हाँ ब्रह्म
- 1:01:40मिथ्या है? ब्रह्म, सत्यम जगत मिथ्या जगत,
- 1:01:46मिथ्या, ब्रह्म, सत्यम जगत, सत्यम ब्रह्म मिथ्या ब्रह्म मिथ्या है।
- 1:01:52भ्रम टूटेगा, भ्रम टूट सकता है, जगत नहीं टूट सकता, ना?
- 1:01:58भ्रम टूट सकता है जगत के ही। जगत ब्रह्म की ही उत्पत्ति है।
- 1:02:06जगत के कण कण में ब्रह्म समया हुआ है और यही उपनिषद में लिखा है ईशा
- 1:02:17वश्य मिदं, सर्वम यत किंच जगतयाम जगत।
- 1:02:21जगत के कण कण में ब्रह्म विद्यमान है, पर वह कैसे भ्रम हो सकता है?
- 1:02:29वह कैसे मिच्छा हो सकता है? जब हर जगह वो है तो यहाँ मैं शंकर
- 1:02:35हाचार्य को गलत साबित करता है। आई नेगलेक्ट शंकराचार्य आई
- 1:02:46रिजेक्ट शंकराचार्य तुम दुखी हो, तुम अप्रसन्न हो, तुम्हारी मर्जी
- 1:02:56है। लेकिन मैं देख कर बोल रहा हूँ मैं
- 1:03:02कहता आंखन देखी शंकराचार्य तुम बोलते हो कागज की लेखी और मैं
- 1:03:13कहता आंकलन देखी आज शंकराचार्य को, मैं काट रहा हूँ आई रिजेक्ट।
- 1:03:19आई निगलेक शंकराचार्य परम सत्यम जगत सत्यम क्योंकि जगत ब्रह्म की
- 1:03:31ही उपस्थिति का परिमाण है, परिणाम है।
- 1:03:41वह झूठ कैसे हो सकता है? वह भ्रम कैसे हो सकता है?
- 1:03:45ज़रा मारू ना दीवार को, सिर लघु निकलेगा ना दर्द होगा ना तो मच्छर
- 1:03:52कैसे होगा? आज से नया महामंत्र ले लो,
- 1:04:00शंकराचार्य के महामंत्र को काट दो, मैं काटता हूँ ब्रह्म, सत्यम,
- 1:04:08जगत, सत्यम ब्रह्म मिथ्या, इटलूजन मिथ्या है।
- 1:04:13इल्ल्यूशन गलत है, इस इल्ल्यूशन को तोड़ना है, जगत को नहीं तोड़ना
- 1:04:19जगत से कोई बैर नहीं पालना शंकराचार्य ने गलत बैर पाल दिए,
- 1:04:27एक पूरे का पूरा षड्यंत्र रच दिया।
- 1:04:31नास्तिकों का। इन तथाकथित आस्तिकों का जो वास्तव
- 1:04:36में नास्तिक है। यह शंकराचार्य की देन है।
- 1:04:42मैं आज काटता हूँ, इसे मैं आज रिजेक्ट करता हूँ इसे मेरा
- 1:04:48महावाक्य फिर नोट कर लो। ब्रह्म, सत्यम, जगत, सत्यम ब्रह्म
- 1:04:57मिथ्या। श्रीकृष्ण गोविंद हरे मोराई।
- 1:05:13हे नाथ नारायण वासुदेव? श्री कृष्ण।
- 1:05:29हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव पितु मात स्वामी।
- 1:05:49सखा हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे।
- 1:06:04हे नाथ नारा यन वासुदेव हे नाथ हनारा यन वासुदेव।
- 1:06:27श्रीकृष्ण? गोबंद हरी मुरारी मुरारी।
- 1:06:44श्रीकृष्ण, गोविंद हरे मुरारी हेनाथ नारायण।
- 1:07:02वासुदेव ओके बेले को नहीं न। बागुल वीर नम।
- 1:07:23ओख वेले को नहीं न बाबुल वीर, न मामा सबे तक।
- 1:07:36दे। म दे कोई न पकड़े मा।
- 1:07:44सबे तक का। दे।
- 1:07:47बदे कोई ना पकड़े वावा कोई ना पकड़े वावा रखिये।
- 1:08:00चरना दे कोल मेरा वालिया मेरा वालिया सांय की चरना दे कोल।
- 1:08:19मेरा वालिया साईयाँ मेरा वालिया फिर तो मात स्वामी, तुम हो सखा
- 1:08:35हमारे। पितृहात स्वामी सखा हमारे हेनाथ
- 1:08:48नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद।
- 1:08:55हरे मुरारी हे नाथ नारा जन वासुदेव।
- 1:09:05हर एक। कृष्ण गोविंद करे मुरा हे नाथ
- 1:09:12नारायण। वासूर्य पितु मात स्वामी सखा
- 1:09:25हमारे तमेब माता के पिता तमे? तमेव बंधु शशखा तमे तमेव विद्या
- 1:09:44चद्रमं तमेव तमेव सर्वं। ममदेवरा कितुमात्र स्वामी सखा
- 1:10:03हमार हे नाथ नारायण वासुदेव। श्री?
- 1:10:11कृष्ण, गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:10:21श्री कृष्ण। गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण
- 1:10:29वासुदेव। धन्यवाद।