Latest / Baba ji Vijay Vats / 13 Feb 25 - बाबा आपके कमजोर होने का कारण क्या है?कारण हो तुम, तुम्हारे पाप! मूर्ति पूजा, प्राण प्रतिष्ठा के गहरे रहस्य!
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- 0:11निपुण गुप्ता बाबा आपके जब हम आये, आप बड़े कमजोर लग रहे थे,
- 0:29कृपया अपनी सेहत का ख्याल रखा करें।
- 0:44संत कौन होता है? संत वो होता है जो अपना ख्याल खुद
- 0:58नहीं रखता है, जो बच्चे के समान हो गया है।
- 1:04इनोसेंट जस्ट लाइक ए चाइल्ड। ज़रा देखना बच्चा कभी अपना ख्याल
- 1:14रख पाता है। बच्चे से कहें कि तुम अपना ख्याल
- 1:20रखा करो। तो वह मुस्करा देगा।
- 1:26सर उसे समझ भी नहीं आएगा। संत बच्चों के समान हो जाता है।
- 1:42इसलिए ईशा ने कहा दोज़ हू विल बी इनोसेंट जस्ट लाइक ए चाइल्ड विल
- 1:50एंटर इन माइक और स्ट्रिंगडम मेरे परमात्मा के राज्य में वो ही
- 1:58प्रवेश कर पाएंगे। जो बच्चों के समान मासूम हो गए,
- 2:09जिसने अपने जीवन की बागडोर परमात्मा के हाथों सौंप।
- 2:13दी है वह संत। जिसने परमात्मा को बिना देखे
- 2:28सौंपी। वह समर्पित व्यक्ति है और जिसने
- 2:37परमात्मा को देखकर समर्पण हुआ, वह संत समर्पण दो तरह के होते हैं
- 2:47पहले वाला समर्पण। पहली सीढ़ी है।
- 2:53समर्पण बढ़ता जाएगा, उसके होने की झलकें आपको मिलती रहेंगी और आपका
- 3:04समर्पण बढ़ता रहेगा। ऐसे सभी सीढ़ियों को तुम क्रॉस कर
- 3:11जाओगे और छत पर पहुँच जाओगे समर्पण है पहली सीढ़ी है मान के
- 3:18समर्पित होना कोई अज्ञात सत्ता है यहाँ से शुरू कर दो।
- 3:26जैसे ही तुमने समर्पण किया बिना देखे, तुम्हारे जीवन में कुछ
- 3:33अज्ञात झलके आएँगे। जीवन में कुछ ऐसे इंसिडेंट्स
- 3:38होंगे जो तुम्हारी समझ से बाहर होंगे।
- 3:42समर्पण दिन रात बढ़ेगा। और 1 दिन संपूर्ण समर्पण हो
- 3:48जाएगा। तुम उसके पास पहुँच जाओगे जिसके
- 3:53प्रति समर्पण किया था। तुम्हारा कमेंट लाजवाब है, मोह को
- 4:13दर्शाता है, ठीक भी है, गुरु के प्रति इतनी देखभाल होती है।
- 4:29यह लाजिम है लेकिन एक बात को ध्यान में रखना ये जो माटी का
- 4:45आकार प्रकार तुम्हें दिख रहा है, ये तो 1 दिन खो जाएगा।
- 4:53सदा के लिए ना रहा ना रहे लेकिन मैं रहूँगा।
- 5:05रहे ना रहे हम। रहे न रहे हम महका करेंगे बन के
- 5:25कली बन के सब। बाकी वफा में रहें न रहें, हम
- 5:42महका करेंगे। हम बैठते रहे, बन के कली बन के
- 5:59सबा भागे वफा में रहे ना रहे हम। जब दही समाप्त हो जाता है लग भाग
- 6:21तो इस हृदय को छोड़ देता है कामगार पूरे किए रिटायरमेंट।
- 6:25हुआ तो हम अपना। बोरी बिस्तर उठा लेते हैं, चलो अब
- 6:34आराम करेंगे। और ये दिन सभी प्याता है फिर जिसे
- 6:51तुम मैं समझते हो वह कमजोर दिख रहा था।
- 7:00ठीक कुछ बातें हैं तो मैं समझाती हूँ, मैंने आज ही के प्रवचन में
- 7:10यह बोला। कि गंगा तुम्हारे पापों को ओढ़ती
- 7:20नहीं, क्योंकि गंगा नर जी गंगा को तो बेचारी को पता भी नहीं है कि
- 7:36तुम पापी उसमें स्नान कर रहे हो। वह तो बहता पानी है, लेकिन कुछ
- 7:52खास रंगों से युक्त है। तुम्हारे आम पानी की तरह वो पानी
- 7:58नहीं है और किसी विशेष गृहस्थ स्थितियों में।
- 8:07सारे भ्रमण की करणें? उस जगह पे प्रक्षेपित होती हैं तो
- 8:15उसकी गुणवत्ता बदल जाती है, लेकिन कुंभ का महत्त्व था।
- 8:23वहाँ कुछ संत भी आते हैं। प्रोपकार हेतु जैसे करुणावश बुद्ध
- 8:29बोलते हैं, वैसे जीवंत भी आते हैं इसलिए उनको जो आखिरी चरम।
- 8:45छलांग लगाने के करीब थे, छलांग लगा नहीं पा रहे थे।
- 8:51साहस नहीं आ रहा था। उनके लिए एक प्रपोजल था कि तुम
- 8:59ऐसी जगह पर चले जाओ। ऐसी गृहस्थिति में भ्रमण की सारी
- 9:07करणें इस स्थान पर पड़ेंगी और जल भी अवस्थित हो जाएगा और वहाँ कुछ
- 9:17संत भी आएँगे आपका कल्याण करने के लिए।
- 9:22वो आपको धक्का देने में समर्थ होंगे।
- 9:27और जो बात ना बन सकी तुम्हारे खुद से।
- 9:39वो वह गुरु आने वाला बता देगा मैं ना देगा आज ज़माना बदल गया
- 9:49प्रथाएँ वही हैं, ज़माना बदल गया संत कहाँ रह के?
- 10:01मैंने पहले के प्रवचन में भी बोला था चार संत आए थे, इतना कूड़ा
- 10:08कबाड़ा देख कर चले गए। नहीं पाया कोई मुख शोक बस पाप
- 10:15धोने वाले पाए। इसलिए हैरानी मत मानना, गुस्सा भी
- 10:24मत करना। वो जो स्नान करने गए थे, उनके
- 10:29भीतर पाप की भावना रही होगी। पापी लोग ही गंगा स्नान करते हैं।
- 10:36शुभ मुहूर्तों में शुद्ध नर्मल आत्मा कहा जाता है, जिनको पाप का
- 10:51भीतर से भान हो रहा है। कि मैंने पाप किया।
- 10:57फिर वो पाप को आसान उपायों से धोने का उपाय करता है, बह जाता
- 11:06है, कुंभा में मौमुक्ष के लिए नहीं जाता।
- 11:12उसके भीतर कोई आग लगी नहीं लगी। वेराहा की मीरा की तरह।
- 11:22लेकिन वहाँ जो लोग आते हैं जिन्हें हम परम संत कहते हैं, वो
- 11:30करुणा बचाते हैं। और उन्हें चाहिए ऐसे मोमूक्ष
- 11:37जिनके भीतर विवाह की आग लगी हो। बस उनकी थोड़ी सी कृपा है।
- 11:51तुम उस परम स्थल पे चले जाओगे। यह उन लोगों के लिए थी जिनका कोई
- 12:02जीवंत गुरु नहीं था। ध्यान रखना अब मैं जो बात से ही
- 12:06बोल रहा हूँ, जिनका जीवंत गुरु नहीं होता।
- 12:14जो खुद से ही साधना करते हैं वो वहाँ जाए।
- 12:26बिरहा की अग्नि जल रही है जैसे मैं मारा मारा फिरता था मैं गया
- 12:32हरिद्वार क्यों? क्योंकि एक घटना ऐसी घट गई थी,
- 12:42भीतर सब उथल पुथल हो गए। हाहाकार मच गया।
- 12:46कौन है ये एक तार्किक मन? कुछ ऐसा घटा?
- 12:57उस अज्ञात शक्ति के प्रति खोज शुरू हो गया।
- 13:06ऐसा व्यक्ति वहाँ जा सकता है। आग लगी हो बिरहा की लेकिन अभी
- 13:12प्रथम पड़ाव पे थी ये आग। 70 की यह घटना और 73 में मैंने घर
- 13:19छोड़ दिया। कच्चा था अभी बिरहा उफान पे नहीं
- 13:27था तो मुझे हनुमान जी ने मोड़ दिया मेरे बायोग्राफी आपने पढ़ी
- 13:34होगी सब। घर जाओ सब घर बैठे मिलेगा अब वो
- 13:48तो जानते हैं जिसे ढूंढने आया। वो हरिद्वार ऋषिकेश नहीं इसके
- 13:58भीतर ही है। मैं नहीं जानता था, मैंने सिर्फ
- 14:03वो घटना देखी थी, मैं चमत्कृत हुआ था, बस उससे थोड़ी आग लगी थी।
- 14:12खोज की। यहाँ से शुरू होती है कहानी और
- 14:18जीवंत गुरु कोई नहीं था आज कहाँ है गुरु आज कहाँ है शिष्य, कहाँ
- 14:33है मीरा जैसी बिरहा। बैराकन सब खो गया, अतीत की बात हो
- 14:48गई ना मुमुक्षु बचा है। न शांत बच्चे जो झूमा करते थे,
- 15:08जिनका जीवंत गुरु है, उनको कंभाषानानों पे जाने की कोई
- 15:19आवश्यकता नहीं। उनका कुम्भ घर बैठा।
- 15:26है अगर तुम उसे। वनों में खोजोगे, पहाड़ों में
- 15:37खोजोगे, तीर्थों पे खोजोगे, मक्का, मदीना, हाजो में खोजोगे।
- 15:43तो यही तो संत कहते हैं वो तो न मिलेगा और तुम्हारी इस मनो स्थिति
- 15:54में तो बिलकुल नहीं मिलेगा क्योंकि कोई व्यारा की अग्नि जली
- 15:58न हो। आग लगी नहीं, बैरागुन बनी रही।
- 16:09आज हूँ न आए बालमा सावन भी ताजा। आज हूँ ना आज हूँ ना आए बालमा।
- 16:43हवन बी ताजा हवन बी ताजा। ऐसी बिरहा की आग लगी हो अजहुना आय
- 17:00बालमा सावन बी ताजा। ये जीवन बीता जाता है बलम आय नहीं
- 17:11और प्राण व्याया नहीं, उसके कहीं झलकने ऐसा व्यक्ति वहाँ जाए,
- 17:18जिसकी सुधा शांत करने वाला कोई जीवंत न हो।
- 17:24लेकिन जिसका जीवन तो गुरु है उसको वहाँ जाने की जरूरत नहीं, लेकिन
- 17:31आज जो हो रहा है उसको मैं सही ठहरता हूँ।
- 17:38क्यों? को किन्ना तो तुम्हारे भीतर वृह्
- 17:42की आग कहाँ तड़पे तुम प्रभु के बिना वरना आग बजाने वाला भूषण था
- 18:00मैं फिर दोहरा दूँ चार आए थे। तुम्हारे लटके हुए चेहरे देख के
- 18:07चले गए। वह मक्षा नहीं है और वह मक्षा
- 18:15नहीं है, तो वो डिक्टेटरशिप होगी। तुम्हें मुक्ति दिलाना फिर मुक्ति
- 18:21भी तुम्हारे लिए कबूजा हो जाएगा। तुम कहोगे नहीं।
- 18:27हमें तो संसार अच्छा लगता है, मेरे पास लोग आ जाते हैं, मैं
- 18:34पूछता हूँ क्या चाहिए? संसार चाहिए, परमात्मा चाहिए, वो
- 18:39कहते नहीं, परमात्मा नहीं चाहिए, अभी तो संसार को भोगना है।
- 18:45बड़े प्यारे लोग हैं, ईमानदार हैं, तुम्हें चाहिए संसार वर्णन
- 18:57करते हो के परमात्मा चाहिए तुम खुद ही दुविधा में हो।
- 19:03और दुविदा में तो दोनों गए, माया मिली नारायण दूसरा ये आकार प्रकार
- 19:22जो तुम देख रहे हो 1 दिन आएगा। यह नहीं होगा, लेकिन यह मत सोच
- 19:34लेना कि मैं कहीं चला जाऊंगा, शारदा थाली लेके गई है रामकृष्णा
- 19:47के पास। रामकृष्णा ने थाली की तरफ देखा,
- 19:58भोजन के साथ बंधे थे, बड़े सुस्वादु भोजन खाया करते थे, बंध
- 20:05गए थे, अपने जीवन की जीव वैष्णव भोजन के साथ बंध लेटे।
- 20:16और शारदा 1 दिन तंग आ गए। आप भी कैसे ज्ञान देते हो, लोगों
- 20:25को ब्रह्म चर्चा करते करते आने चर्चा में आ जाते हो?
- 20:29रसोईगढ़ में शारदा। जल्दी से बताना क्या बनाया सुगंधी
- 20:37तो बढ़िया आ रही है तो रामकृष्णा बोले सार गए जीस दिन तुम थाली
- 20:54लेकर आई और मेरा नाक उमड़ गया। मैंने मुँह फेर लिया, बस मेरे 72
- 21:04घंटे हो गए, उसके बाद जीवन मैं विदा हो जाऊंगा बस इसी चीज़ से
- 21:11बंधा हूँ, करुणा वश बंधा हूँ, दो तरह के व्यक्ति होते हैं।
- 21:22एक के पास गहरे अनुभव होते हैं, वाक्य शैली नहीं होती, अनुभव बड़े
- 21:30गहरे होते हैं, वो रामकृष्णा परमहंस जैसे लोग होते हैं और भी
- 21:35बहुत लोग होते हैं। जो बिना बताए चले गए कुछ करके
- 21:41उनकी भनक भी न पड़ेगी। इसके कानो में अनुभव गहन से गहनतम
- 21:51तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब वो जानते है, लेकिन पता नहीं।
- 21:57नहीं सकते। उनके पास वोका बेलरी नहीं है।
- 22:01शब्दकोश उनके पास नहीं है। एक दूसरे भी होते हैं जिनके पास
- 22:10अनुभव तो कम है, लेकिन वाक शैली बड़ी चात्र है।
- 22:20वाक्य शैली इतनी के फिलॉसोफी के भी है फिलॉसोफी के में, लेकिन
- 22:29अनुभव इतना नहीं है राम कृष्ण जतिन एक तीसरे भी तरह के लोग हैं।
- 22:42जिनके पास वाक्य शैली तो बहुत है, बहुत है अनुभव के नाम पे 03 तरह
- 22:50के लोग होते हैं पहली तरह के रामकृष्णा दूसरे तरह के वश है।
- 22:58मुझे कोई संकोच नहीं होता। और तीसरी तरह के ये लफंडर जो आज
- 23:08बिना कुछ जाने बिना कुछ देखे कुछ भी बोल देते हैं।
- 23:21जो आज रावण हैं नहीं, उससे फ़ोन मिलाने लग जाते हैं।
- 23:26कोई क्या कहे ना? निपुण ने पूछा कि हम अब के आये
- 23:40बाबा तुम बड़े कमजोर लग रहे थे। अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखा कर
- 23:59जवाब तुम्हें दे दिया है पुत्र बच्चा अपना ख्याल नहीं रख सकता और
- 24:06संत भी अपना ख्याल नहीं रख सकता, क्योंकि बच्चे के समान हो जाता
- 24:10है। प्राकृतिक घटनाएं भूख लगेंगी।
- 24:23खालेगा जो अच्छा लगता है खालेगा नहीं खायेगा नहीं खायेगा लेकिन
- 24:33मस्ती में जीवन बीत जायेगा बटके का नहीं।
- 24:39इन लक्षणों से तुम पहचान के रहा करना।
- 24:45रहे न रहे हम। बन के कली बन के सबा भाग्य वफा
- 25:11में। रहे न रहे।
- 25:17हम महका करेंगे बन के करे बन के सब बाकी वफा में हमने बेवफाई कभी
- 25:32नहीं की। हम रहें या न रहें, ये मेरे पर
- 25:40निर्भर न कर जीस दिन से बच्चा हुआ।
- 25:46मैं स्वयं बच्चा हुआ। उस दिन से खुद की परवाह छोड़ती
- 25:54होती है ना और मस्ती चारों ओर से तूफान की तरह घेर लेती है और दिन
- 26:02भर रात यहीं बैठा रहता हूँ। बस यह यह कमरा, यह मेरा जीवन है।
- 26:16यहीं तरंगे दिन भर रात आनंद के और एक और बात बता कमजोर होना
- 26:34स्वभाविक है। मनोवैज्ञानिक रूप से तुम अपने पाप
- 26:41छोड़ आते हो गंगा में, लेकिन मनोवैज्ञानिक रूप से सच में तो
- 26:47तुम्हे भुगतना ही पड़ेगा। भुगतते हो ज़रा देखना गौर से
- 26:54जागकर देखना कुम्भ स्नान करने के बाद भी।
- 26:59तुम्हें पाप पुण्य भोगने पड़ेंगे। देख ना अब तुम कम कर रहे हो।
- 27:08बहुत से लोगों को कह रहा हूँ जो कुंभ कर के आए हैं सब होगा।
- 27:15तो फिर कुंभ स्नान का अर्थ क्या हुआ?
- 27:21क्यों गया? मैं कहता हूँ यह प्रथा है रिवाज़
- 27:29बन के रह गया एक मेला बन के रह। मैं तुम्हारी आजादी को नहीं जीना
- 27:37चाहता, तुम जहाँ चाहते हो जा सकते हो, लेकिन तथ्य को मैं प्रकट कर
- 27:46सकता हूँ यह मेरा अधिकार है और तथ्य ही प्रकट कर रहा हूँ।
- 27:59लेकिन जीसको गवा चुन लेते हैं मेरे द्वारा गंगा नहीं उठाती
- 28:06तुम्हारे पास, मैं उठा लेता हूँ तुम्हारे पास एक कमजोरी का दूसरा
- 28:14कारण। अन्यथा इतने हिरस्य पुष्ट बलशाली
- 28:21शरीर थोड़ी सी इस वक्त में कैसे कमजोर हो गया?
- 28:36जब अंगूठा लगा तुम्हारे बाप मैंने खीच लिए, तुम्हारे पुण्य भी मैंने
- 28:44खीच लिए, तुम्हारे बाप भी मैंने खीच लिए, तुम मुक्त हुए उसी घड़ी
- 28:48से ओनली प्रोसेसिंग रिमेंस। प्रोसेसिंग वाकई रह गई सिर्फ तुम
- 29:00मुक्त हो गए पक्का मेरे पास एक शिष्य आई जब मैंने दीक्षा दी
- 29:14भावना। मुझसे पूछा बाबा पक्का मुक्त हो
- 29:19जाउंगी मैंने कहा अब भी शंका रह गए, तुम नहीं शंका नहीं रहनी
- 29:27चाहिए तुम फिर आना नहीं, शंका हो के जाना।
- 29:34अभी थोड़ी शंका बाकी है जो प्रश्न पूछ ही लिया संतुष्टि का भाव मैं
- 29:43बिलकुल साफ साफ देखा अंगूठा रखते ही आँखों में असुधारा बहती है बस
- 29:51भीतर उतर गई यह भावना। अहं तो हम सर्व पापे भी मोक्ष
- 29:57स्वामी माँ सुचा कृष्ण ने तुम्हारे सभी पाप हर लिया गंगा
- 30:07नहीं हर पाएगा जाओ। न जाओ ये तुम्हारी मोक्ष तुम
- 30:17स्वतंत्र हो, लेकिन पाप गंगा नहीं छीन सकते ये पक्का पाप छीने का
- 30:27संत। और जब वो मेरे बीच में से गुजरती
- 30:33हैं तो निश्चित है। जीस स्थान से गंदा नाला बहता है,
- 30:44वो गंदा नाला चाहे गुजर जाए लेकिन वो स्थान भी तो विकृत हो जाता है।
- 30:50मेरी बात को गहरे से समझने की कोशिश करना।
- 30:56जीस स्थान से गटर बहता है, वह गटर सूख भी जाए, लेकिन वह स्थान गंदा
- 31:06हो जाता है। वह स्थान में से दुर्गंध आनी शुरू
- 31:11हो जाती है। तब कमजोरी का एक दूसरा कारण ये
- 31:15पूछा तुम्हारे किए हुए पाप मेरे भीतर से क्रॉस करके जाते हैं और
- 31:24पता नहीं तुमने क्या कुछ किया है ये ठीक?
- 31:29मुक्त करेंगे बाबा लेकिन गुजरे तो मेरे बीच में से माध्यम तो मुझे
- 31:34ही बनाया तो उस स्थान का दूषित होना स्वाभाविक है तो इस देह की
- 31:46इतनी फिक्र मत किया करो। संतरेदास ने कहा है।
- 31:54माटी का वो तूरा कैसे हो न चत? माटी का पुतरा कैसे नचतू है?
- 32:24डरियो फिरत है कैसे नचत है डरियो फिरत है।
- 32:41माटी का पुत्र। कैसा नचतू ये माटी का पुत्र
- 32:52नाश्ता है उस चेतना के कारण जिसे तुम राधा कहते हो।
- 33:04राधा कारण है इस देह को न जाने में अगर राधा ना हो तो यह देह
- 33:13नाचे नहीं, राधा प्राण है। और ध्यान रखना राधा कभी गुस्सा
- 33:23नहीं करते, कभी पावर गुस्सा करती है, पावर तो सिर्फ जगमग करती है।
- 33:38तुम्हें ठंडी ठंडी हवा देती है गर्मी में और तुम्हें गर्म गर्म
- 33:45हवा देती है सर्दी तुम्हारे सुख के लिए।
- 33:55सदा मौजूद है। अब जो बात मैं तुम्हें कहूंगा
- 34:04उससे तुम्हारा मूर्ति पूजा करने का सारा विज्ञान खुल जाएगा
- 34:10तुम्हें। हमने संतों को दफन करने की प्रथा
- 34:22इजाद की। बहुत बड़ी क्रांति थी क्योंकि
- 34:27हमने खोज लिया था के एनलाइटनमेंट की घटना के भीतर इतनी मात्रा में
- 34:35उन रंगों को सींच लिया जाता है। जो लाखों साल तक बनी रहती हैं,
- 34:44बढ़ती रहती हैं, सुपुर्दित होती रहती हैं, प्रसारित होती रहती।
- 34:53हैं। इसलिए हमने एक स्थान में।
- 34:57उनको दर्पण किया और ऊपर उनकी समाधि बना दी।
- 35:02हमारे यहाँ भी सिद्ध बाबा गंगाराम जी की समाधि बनी हुई है।
- 35:10उसके ऊपर उनकी प्रतिमा स्थापित कर दी जाती है।
- 35:15अब ये सिद्ध स्थान है। अब आज मैं ये रहस्य को खोलूंगा।
- 35:21वक्त आने पर सभी रहस्य खोल देने चाहिए।
- 35:25वक्त आने पर क्यों? क्योंकि उससे पहले तुम समझ नहीं
- 35:28सबको आज तुम्हें समझना आसान हो जाएगा।
- 35:38हमारे बाबा गंगाराम जी यहाँ दफन है समाधि और ऊपर समाधि बनी हुई
- 35:46है, उनकी मूर्ति है अब इसका विज्ञान तो मैं समझाता हूँ।
- 35:56तुमने तो नकली फूल खिला दिए, ये जो है नहीं ये शेरम वाली ये काली,
- 36:07पीली ये है नहीं, ये तुमने बना दिया ये तुम्हारे मन की खोज है।
- 36:13कर प्रण लेकिन इनमें प्राण नहीं डाला जा सकता।
- 36:18यद्यपि तुम्हारे पुजारी डालते हैं प्राण किसमें डाला जा सकता?
- 36:26है। प्राण डालने का कुछ वक्त होता है।
- 36:36अब आज इस मूर्ति विज्ञान को अच्छी तरह से इसके गहरे रहस्यों को समझ
- 36:41लेना जब इस जेह को मैं छोड़ दूँ। तो इस देखने जो 28 अक्तूबर 1985
- 36:55को जो निगल गया था, सारे ब्राह्मण में और फैल गया था।
- 37:02सारे ब्राह्मण में सारे ब्राह्मण की तरंगें फैलती रहेंगी।
- 37:10क्योंकि आविष्टित हो गया है वह यह शरीर आविष्टित हो गया है।
- 37:17इसका रोवा रोवा लाखों सालों तक बिखेरता रहेगा।
- 37:22पहले भी मैंने ये बात बताई आपको लेकिन आज वक़्त है बताने का।
- 37:28क्योंकि आपने सवाल पूछा दफन करना दफन करके मूर्ति स्थापित कर देना,
- 37:49अब तुम चौंकोगे सारी उम्र जीस मूर्ति की।
- 37:54मैं खंडन करता रहा और जीस मूर्ति को स्वामी दयानंद ने झोटे के साथ
- 38:02बांध के और काली रगड़ती चली गई। पीछे और काली ने कुछ नहीं कहा।
- 38:16क्योंकि काली तुम्हारी कल्पना है दुर्गा तुम्हारी कल्पना है चंडी
- 38:23तुम्हारी कल्पना है ये जो कल्पना के भीतर तुमने देवी देवता खड़े कर
- 38:28लिए, इनमें प्राण नहीं डाला जा सकता।
- 38:34प्राण किस्में डाला जा सकता है। प्राण डाला तो जा ही नहीं सकता,
- 38:41प्राणों का आवाहन हो सकता है। अब देखिए अब सारी चीज़ को तुम
- 38:47समझोगे। जब मैं इस स्थूलदेह को छोड़ता हूँ
- 38:58स्थूलदेह को दफन करना ये पहला कम है उसके ऊपर मूर्ति को स्थापित कर
- 39:10देना। यही शक्ल जैसे यहाँ हमने बाबा
- 39:19गंगा राम देखे अब आती है प्राण प्रतिष्ठा प्राण प्रतिष्ठा में
- 39:26सिर्फ वो लोक जो प्रिय हैं मेरे। जो अंतर भावना से पुकार सकते हैं
- 39:36वो चुम्बक बनेंगे खींचने का। और तुम उस विराट से प्रार्थना
- 39:44करोगे। इस चैतन्य की बूंद को इसके भीतर
- 39:51उतार दो। चैतन्य की इस बूंद को वैसे भी
- 39:59मैंने सागर में विलीन हो ही जाना है और सागर सब जगह है बूंद जीस
- 40:06सागर में समाएगी। वो किसी एक जगह पर नहीं है।
- 40:12ईशा वस्त्र में दम सर्बम ज्यत के नीचे जगत है।
- 40:15आम जगत सब जगह विद्यमान है जहाँ चाहे वहाँ उस बूंद को खपवा सकता
- 40:27हूँ। स्वतंत्र हूँ।
- 40:30इसी को तो स्वतंत्रता कहते हैं। इसी को मुक्ति और लिबरेशन कहते
- 40:35हैं वो जो देही गल गया और जो मैंने बताया।
- 40:46कारण शेष एक थोड़ी सी छोटी सी चेतना की वो कण कह लें, बूंद कह
- 41:01लें कुछ कह लो। वो उतरेगी सागर में और सागर सब
- 41:06जगह है बिना नावें नाहीं कोठा नाम के बिना को स्थान में सब जगह
- 41:19मौजूद है वो। उसको याद करना होता है कि सब जगह
- 41:26मौजूद है बस इतना याद करना होता है नाम नहीं लेना होता है क्योंकि
- 41:32नाम उसका है नहीं, कोई वह अनामी है, वह अल्लक है, देखा नहीं जाता।
- 41:44तो वो जो प्रेमी जन चुम्बक का काम करेंगे, प्रार्थना करेंगे विराट
- 41:51से जिसका कोई और शोर है तो ना समझ में आया ना समझ में आएगा उसका
- 42:01स्वाद तुम चख सकते हो। संत उसका स्वाद चखते।
- 42:07अगर संत ये कहे की मैं जानता हूँ परमात्मा ने ये सर्जना की, कैसे
- 42:13तो वह मूर्ख है, वह संत नहीं है, संत वो जौहर मान जाए।
- 42:21जो कहे हैं तो सब जगह ये तो मैंने देख लिया लेकिन तेरा और छोर तू
- 42:28कहाँ से आया कहाँ से इतनी सामग्री लेके आया कहाँ से इतने विभिन्न
- 42:34प्रकार के धातुएं एलिमेंट्स? ये कहाँ से लेके आये यह हमें नहीं
- 42:42पता जो हथियार गैर देता है, ग्राह देता है कि नहीं मैं ना खोज पाया
- 42:50ना खोज पाऊंगा मैं असमर्थ हूँ असमर्थता के उस आलम में।
- 43:00यह सत्य है उसको कभी कोई जान न सकेगा।
- 43:07ये मटेरियल कहाँ से ले के आए वे रात कहाँ से स्पेस का निर्माण
- 43:14किया, कहाँ से ये सारे तत्व इकट्ठे किये।
- 43:20कहाँ से ले के आए ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हेलियम, ओजोन ये
- 43:26तुम्हें कभी पता न चलेगा और बनाने की तो बात बहुत दूर रह गई क्रिएशन
- 43:33की तो बात बहुत दूर तुम ये भी न जान सकोगे।
- 43:38यह सारा मसाला यह सारा कंटेंट, यह सारा पदार्थ यह लेके वो कहाँ से
- 43:46आया कहाँ रखा था उसने यहाँ आकर संत हार मान लेता है यहाँ के संत
- 43:56कहता है नैती। नैती नीती, नीती नहीं इतना नहीं
- 44:02नहीं समझ में आएगा नीती नीती नैती नैती इतना नहीं इतना भी नहीं है,
- 44:10इतना भी नहीं है। उस मूर्ति के भीतर उतारना है उस
- 44:21छोटी सी कर्ण शरीर की बूंद को जो चेतना है, जो राधा है कृष्ण कहलों
- 44:31राधा कहलों अर्धनारीश्वर कहलों। तुम्हारी बुद्धि को।
- 44:38समझाने के ढंग हैं। इशारी हैं, लेकिन इशारा कभी
- 44:43परिपूर्ण नहीं होता, ये भी समझ लेना।
- 44:48इशारे किसी छोर। पे जाकर थम जाते हैं मैं कहूं बोल
- 44:52रहा सूरज। लेकिन इशारा रुक गया।
- 44:54यहाँ थम गया यहाँ सूरज नहीं आया कोई।
- 44:59भाग्यशाली घड़ी आ सकती। है जब इसके छोर में स्ट्रेट लाइन
- 45:03में तुम देख लो आकाश में सूर्य छमक रहा है।
- 45:08तो इशारे काम करते। हैं।
- 45:10लेकिन इशारों से समझाया नहीं जाता इशारों से तुम समझ सकते हो अगर
- 45:18कोई भाग्यशाली क्षण तुम्हारे जीवन में आ गया।
- 45:26वो जो पिया शरद। पूर्णिमा की रात।
- 45:32वो बिखरेगा लाखों सालों। तक।
- 45:38और उसके ईद गर्द? सभी शुद्ध आत्माएं मंडराएंगी अभी
- 45:46हमारी। यहाँ बाबा गंगा राम।
- 45:51जी हैं। तुम उतारते हो।
- 45:58इमेजिनरी। शक्तियां में जिन्हें तुम।
- 46:05मानते हो सिर्फ? देखी नहीं।
- 46:08किसी ने जानी और इनमें प्राण। प्रतिष्ठा भी झूठी और तुम्हारी।
- 46:18और उन्हीं को गलत कहते। हैं स्वामी दयानन्द जोटे के साथ
- 46:21बांध देते है। और वह मूर्ति घसीटती।
- 46:26जाती है। लोग कहने लगे ये जो।
- 46:30काली की मूर्ति सांड के साथ चिपकाई थी।
- 46:34उसका शराब ले बैठा दयानंद को 58 साल की उम्र में।
- 46:46एक वेश्या ने जगन्नाथ। को।
- 46:50पिसा हुआ गांच दूध में मिलाकर दे दिया।
- 46:55स्वामी दयानंद को पीला। दिया और उन्हें प्राण त्यागना
- 46:59पड़ा। इस धेह को मिटाने के बड़े।
- 47:06तरीके हैं लेकिन ध्यान रखना जिसने ये को कृत्य किया।
- 47:19उसका हश्र क्या होगा? जब भोंगेगी तब थर्राएगी।
- 47:26वो। स्वामी दयानन्द मूर्ति पूजक।
- 47:33थे। शिवरात्रि की रात्रि को।
- 47:39एक चूहा जो प्रसाद चढ़ाया था। वह भगवान शंकर की।
- 47:47पिंडी के ऊपर चढ़ के प्रसाद खा रहे थे।
- 47:50वहाँ से उनकी धार न टूट गई और मूर्ति भजक हो गया है।
- 47:57पूजक न रह कहानी लंपिक है नन्ही। नाम की एक वेश।
- 48:05उनकी मृत्यु। का कारण जब जोधपुर।
- 48:10उनको बुलाया। राजा।
- 48:12जसवंत ने। तो नन्नी ने।
- 48:21जो रसोइया था जगन्नाथ। कर लिया।
- 48:26उसको कंच पिसा हुआ दे। दिया के दूध में मिला के दे दे।
- 48:32स्वामी दयानन्द दूध बहुत। पी लेते थे।
- 48:415577। 1010 किलो दूध पी लेते थे वो तो
- 48:46मैं जानकर बड़ी हैरानी हूँ। एक बार में और रात को पी के सो।
- 48:54जाते और रात को उठ कर पेशाब करने नहीं उठते वो।
- 49:00इतना शानदार सवस्थ दानु। का?
- 49:05लेकिन नन्ही नामक वैसा। राजा जसवंत सिंह के साथ इतनी
- 49:09प्रगाढ़ मित्रता और श्रद्धा देखकर उसे खफा रहने लगी।
- 49:16मारने का निश्चय कर लिया और मार भी दिया।
- 49:21कंच मिला दूध जगन्नाथ के साथ मिल के।
- 49:26उसको पीला दिया भीतर छलनी हो गया। सब।
- 49:33योगिक क्रियाएं के द्वारा। उन्होंने वो जहर निकालने की
- 49:37चेष्टा तो की लेकिन। खून आने लग गया।
- 49:45वचन न पाए और दीपावली की रात को। भगवान महावीर भी दीपावली।
- 49:51की रात को ही प्राण थे। जैन धर्म के 24 में तीर्थंकर और
- 49:57दीपावली को ही स्वामी दयानन्द। का प्राण थे।
- 50:09मूर्ति पूजा का आंतरिक। रहस्य है वो जो कारण शरीर के एक।
- 50:17बूंद समानी समुद्र। में समुद्र कहाँ है?
- 50:21कोई एक मानसरोवर नामक जगह में समुद्र है।
- 50:26समुद्र तो सब जगह। है बिन नावें नाहीं कोठा सब जगह
- 50:32मौजूद है कहीं। भी हम अपनी बूंद।
- 50:36को उतार देंगे क्योंकि चेतन है जब।
- 50:43देही समाप्त हो। गया।
- 50:45तो देही को शक्ति देने वाली वह। चेतना की एक हल्की।
- 50:50सी बूंद उसको सागर। में विलीन होना।
- 50:53होता है, उसे ही कहते हैं मोक्ष। तो इस मूर्ति के भीतर।
- 51:06प्रेमी जनों की पुकार से वो बनेगी चुम्बक।
- 51:13उनकी पुकार बनेंगी। चुम्बक जब वो।
- 51:18अर्थ स्वर। से अर्थ पुकार करेंगे द्रवित हृदय
- 51:22से। तो उस।
- 51:25बूंद को उतरना। होगा।
- 51:33उस माटी की। तस्वीर में चित्र में है जो आपने
- 51:38मूर्ति बनाई ये था मूर्ति पूजा कर अहस्य।
- 51:42ऐसे किसी भी। मंदिर में किसी भी तरह की पूजा
- 51:45करके। और उसकी पूजा कर लेना बनाके उसमें
- 51:51प्राण। प्रतिष्ठा हो ही नहीं।
- 51:52सकती प्राण प्रतिष्ठा जो कभी जीवित था और अभी जीवित था बस
- 51:59इसको। इस देह में।
- 52:03से देह ही में से। इन शब्दों में थोड़ा।
- 52:08गहरे हैं समझना देही के। साथ जो मैंने।
- 52:12पुराने प्रवचनों में जिक्र किया एक छोटी सी बूँद चेतना की होती है
- 52:20उसे कार्य। शरीर कहते हैं।
- 52:22वो चेतना उतरती है। समुद्र।
- 52:25में और समुद्र हर। जगह है।
- 52:30तो ये दो तुम मूर्ति। बनाओगे?
- 52:31इस मूर्ति के भीतर वो चेतना उतर जाएगी जिसे हम राधा भी कह देते
- 52:36हैं। कृष्णा भी कह देते हैं, राम भी कह
- 52:40देते हैं वो चेतना का नाम है हमारा रखा हुआ।
- 52:47वह पदार्थ जीवंत हो गया। उस समाधि के नीचे मृत्यु शरीर
- 53:01पड़ा है। जिसमें।
- 53:03से निरंतर। बेब्स निकल रही है निरंतर लाखों
- 53:09सालों तक ये। वाष्प विभूत होती रहेंगी।
- 53:14इतना पीया इतना पीया कभी चुकेगा नहीं।
- 53:17ब्राह्मण कभी चुकता है और पूरा ब्राह्मण उतर जाता है उस वक्त।
- 53:23यही तो कृपा है वह व्यक्ति उतर जाता।
- 53:28है। भ्रमण में और भ्रमण उतर जाता है।
- 53:31उस व्यक्ति में यह अजूबी घटना है, लेकिन समझ नहीं आएगी।
- 53:38सिर्फ देखने से ही। इसका अनुभव किया जा।
- 53:45सकता है तो एक। बात मैंने कही कोई?
- 53:49भी व्यक्ति कभी भी कोई भी संत अगर ये।
- 53:53कहे कि मैं। जानता हूँ परमात्मा ने यह सारा
- 53:56तत्व कहाँ रखा था? कहाँ से निकाल के लेके आया तो वह
- 54:00झूठ बोलेंगे? और मैं इस संसार।
- 54:07को एक झूठ सौंप के नहीं जाना चाहता।
- 54:11कोई नहीं जान सकेगा ना? कोई जान पाया है।
- 54:18वह। जाना जा ही।
- 54:20नहीं सकता ये बात के कहाँ से लेके आया वो कहाँ छिपा रखा था कौन से
- 54:28कौन बार कब? उसने सृष्टि की सृजना।
- 54:33शुरू की। लेकिन हमारे पंडित सब भी बता
- 54:35देंगे सब। तो सब झूठ हैं, किसी को कुछ पता
- 54:42नहीं उसके। बारे में।
- 54:45वह अज्ञात है और। यहाँ तक कि वह अज्ञे भी है
- 54:49अननोअबल। तो उसकी तो बात ही मत।
- 54:54करो। यहाँ आके तो तुम हार जाओ, संत हार
- 54:56जाता है और संत। नीती नीती कहता।
- 55:00हुआ उसके भीतर उतर जाता है, प्रवेश कर जाता है।
- 55:05यह था मूर्ति का आंतरिक। विज्ञानं क्रोनोलॉजी रहस्यत्मक
- 55:12रस। कि मूर्ति पूजा क्यों?
- 55:17मूर्ति पूजा सिर्फ ऐसे तुम्हारे बनाए हुए चूहे बंद रहे तुम्हारे
- 55:24बनाए हुए मोर तोते नहीं यह वास्तव में जब कभी किसी शरीर में वो
- 55:30उतरा। और उसी के भीतर उसके।
- 55:36काल्य शरीर के बोध उतारो, तुम उतारो, बहुत ही प्राण प्रतिष्ठा
- 55:44तो मूर्ति बनाकर समाधि को उपर मूर्ति बनाकर।
- 55:51द्रव्य द हृदय से। पुकार की जाए कि हे चेतना की बूंद
- 56:03इस। पदार्थ में उतर जाओ, हम प्रार्थना
- 56:07करते हैं। आपकी प्रार्थना करण से।
- 56:11द्रवित्य हृदय की प्रार्थना करने से वह चेतना जिसे कारण शरीर भी
- 56:17कहते हैं, वह उतर जाएगी और प्राण प्रतिष्ठा हो जाएगी।
- 56:20इसे कहते हैं प्राण प्रतिष्ठा आज सब नकली नकली हो गया है।
- 56:27और नकली के बारे। में।
- 56:29ज्यादा शक्ति गंवाना भी बेकार है। ज्यादा विस्तार करना भी।
- 56:36बेकार है साफ साफ। कंडेंस्ड रूप से बड़े।
- 56:42थोड़े से शब्दों में मैंने आपको समझा दिया।
- 56:47पिछले प्रवचन में देख। लेना।
- 56:49वह कारण शरीर की बूँद क्या है? खैर, यह प्राण प्रतिष्ठा।
- 56:54हो गई। तो निपुण ने पूछा।
- 57:00कि बाबा आप कमजोर लग रहे थे। जिसे आप मैं समझते।
- 57:06हो? वास्तव में।
- 57:08मैं नहीं हूँ। वो मेरा घर है, मेरा ठिकाना है
- 57:15मेरा निवास। मैं तो उसके भीतर।
- 57:20विद्यमान हूँ। लेकिन क्या करूँ?
- 57:27इशारों ही इशारों में बतलाया बहुत बार।
- 57:33आज भी बतला रहा हूँ समझ जाओ। न तुम ये शरीर हो।
- 57:40न मैं। ये शरीर हूँ ये लड़ाईयां शरीरों
- 57:45की। हैं।
- 57:46ये कलह है क्लेश, सरियों के यह कलह है क्लेश मन के।
- 57:53मन और शरीर के पार जो। है।
- 57:57उसमें कोई क्लेश नहीं। अक्ले देओ अछे?
- 58:01देओ अशोष्य। इसे ही भगवान कृष्ण ने कहा।
- 58:13नैनम चिदं तीषस्त्राणी नैनमदाहती पाबका।
- 58:18नचैनम केलधनता। पूनाशो स्यतिमारूता।
- 58:31मैं तो कमजोर। होता ही रहूँगा और।
- 58:351 दिन इतना अशक्त। हो जाऊंगा।
- 58:39तुम कहोगे? बोल बाबा और बाबा?
- 58:48ऊंट फरकानी जितनी भी शक्ति नहीं होगी उसमें।
- 59:01आदमी अकड़ करता है। अभिमान करता है।
- 59:09ओढ़ जान प्राण तेरे। फिर क्यों नहीं?
- 59:17बोल दा। उड़ जान।
- 59:24प्राण तेरे। फिर क्यों नहीं?
- 59:30बोल दा। होममे वाली कुंजिया तुम फिर।
- 59:40क्यों नहीं खोल द। होममे वाली।
- 59:47कुंजिया तुम फिर क्यों नहीं खोल? किथे तेरी।
- 59:56आंकड़ा ते किथे अभिमान हुए। पलड़ा?
- 1:00:06परोसा कोई ना ऐसी तेरी जान हुए। मिट्टी धया बंधया।
- 1:00:20मिट्टी धया। बंधया तुम का आधा करें मान वे।
- 1:00:30पर्दा परोसा। कोई न ऐसी तेरी जान वे मिट गया।
- 1:00:53प्रश्न कीमती है। उत्तर।
- 1:00:56तुम्हें दे दिया यह है सारी। मूर्ति पूजा के भीतर की कहानी
- 1:01:04रहस्यत्मक सारा मूर्ति पूजा का प्राण प्रतिष्ठा ऐसे प्राण
- 1:01:09प्रतिष्ठा ने। मंत्रोच्चारण करके कभी प्राण
- 1:01:12प्रतिष्ठा नहीं होती, वह जो। व्यक्ति, कवि जिसके।
- 1:01:16भीतर पर महात्मा उतरा था। वह विराट उसमें समाया।
- 1:01:22था और वह विराट में समाया था बिना।
- 1:01:26इस घटना के घटित। हुए।
- 1:01:28व्यक्ति में अपहरण, प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती, वह तो फिर जन्म
- 1:01:32पुनः रेता रहेगा आता रहेगा जाता रहेगा।
- 1:01:39कृष्ण कभी नहीं आएगा। कृष्ण इस रूप में आएँगे वो।
- 1:01:46तो कहें। वो तो बूंद समुद्र में मिल।
- 1:01:51गई। राम भी बूंद समुद्र में समा गए
- 1:01:55मीरा। गई।
- 1:01:56दादू गए। नानक गए, तबीर गए, सब गए वो।
- 1:02:01समुद्र में चले जाना। होता है।
- 1:02:03आखिर में कोई इसका भेद नहीं पा सका।
- 1:02:08ये ये भेद कभी खुले घपित। हैं।
- 1:02:14इसलिए बेहतर है कि देश के आगे नतमस्तक हो जाओ।
- 1:02:20झुकालों से सपनों। इसे ही समर्पण कहते हैं।
- 1:02:26जीतने झुके उतना समर्पण जीतने झुके समझना इस बात को परसेंटेज के
- 1:02:35हिसाब से रीलेटिवली जितना झुके उतना समर्पण और जितना पूरे झुके।
- 1:02:45शन पूर्ण समर्पण तुम्हारे। भीतर का अहम।
- 1:02:51खो गया तुम्हारा देह देह ही बस में बहुत हो गया, कुछ न बचा।
- 1:03:02वो ही बचा जो। सदा से है।
- 1:03:05था और रहेगा। फिर ऐसे व्यक्ति के।
- 1:03:11भीतर बस एक कारण शरीर की वो चेतना की बूंद बाकी रह जाती ऐसे।
- 1:03:18व्यक्ति की चेतना। को पदार्थ में उतार देना।
- 1:03:23प्राण प्रतिष्ठा कहलाता है। वह चेतना की रोशनाई।
- 1:03:36की गूंथ कभी मरते नहीं। फानूस बनकर।
- 1:03:41जिसकी हिफाजत हवा करे। फानूस बनकर।
- 1:03:50जिसकी हिफाज़त हवा करे। ओह शम्मा क्या बुझे जैसे रोशन
- 1:03:59खुदा कर। आए।
- 1:04:02वह है जिसकी हिफाज़त। करना शुरू कर दे।
- 1:04:05फानूस बनकर जिसकी हिफाजत हवा करे पुष में क्या बुझा जैसे रोशन खुदा
- 1:04:13करे वह सह पं है, खुद अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है, मैं कभी
- 1:04:22अंधकार में नहीं जा सकता। मैं कभी मरता नहीं हूँ उसको।
- 1:04:27ऐसे प्राण प्रतिष्ठित। कर देना उसको कहते हैं जीवित
- 1:04:32समाधि ऐसी समाधि के आसपास लाखों वर्षों तक तिरंगे उभरती रहेंगी।
- 1:04:40निकलती रहेंगी, ब्रॉडकास्ट होती रहेंगी।
- 1:04:44और उसके करीब। पहुँचकर बैठने से तुम आनंद से मगन
- 1:04:50हो जाओगे। ध्यान में जाओगे अपने।
- 1:04:54गहरे में उस तत्व को पा जाओगे। जिसे कहते हैं।
- 1:05:04तत्व मसीह क्षेत के तो हैं। तत्व मशी श्वेत के।
- 1:05:11तो? सखा?
- 1:05:16हमारे पे तो मात स्वामी सखा? हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव, श्री
- 1:05:39कृष्ण? गोविंद।
- 1:05:43हरे मुरारी हे नाथ नारायण यन वासुदेव श्रीकृष्ण।
- 1:05:58गोविंद। हरे मुरारी हिनाथनाराजन वासुदेव
- 1:06:13पितुमात स्वामी सखा। हमार पितुमातृ स्वामी सखा हमार हे
- 1:06:31नाथनारायण वासुदेव। श्रीगंगाजी का तट हो यमुना कवन
- 1:06:53शिवट हो। श्री गंगा जी।
- 1:06:59का तट हो जमुना कवन से भट हो। मेरा।
- 1:07:14निकट हो मेरा सांवरा निकट हो जब प्राण।
- 1:07:32तन से निकलो। इतना।
- 1:07:39तो कर न स्वाम। जब प्राण।
- 1:07:46तन से निकले गोविन्द। नाम लेकर।
- 1:08:00तब प्राण। तन से निकले।
- 1:08:07श्री कृष्ण। गोविंद।
- 1:08:11हरे मुरारी। हे नाथ?
- 1:08:18नारायण वा सु रे वा पितुमात स्वामी सका हमार पितुमात स्वामी।
- 1:08:31सखा हमारे हेनाथनारा यन वासुदेव श्री कृष्ण कोविंद हरे मुरारी।
- 1:08:50हे नाथ? नारायण वासु देववा हो।
- 1:09:09धन्यवाद।