Latest / Baba ji Vijay Vats / 28 Mar 25 - ईश्वरीय तल से बोला गया: ध्यान पर अब तक का सबसे गहन और Practical प्रवचन! ध्यान के सूत्र!
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- 0:05बाबा जी, प्रणव आपके कहे अनुसार इकट्ठा करोगे तो भोगोगे।
- 0:20भोगने से दुख मिलेगा, दुख मिलेगा, भक्ति आएगी, भक्ति आएगी, मौमुक्षा
- 0:33का जन्म होगा। और फिर मुक्ति आएगी।
- 0:42क्या इसका मतलब ये है कि मैं समझूँ के बिना इकट्ठा किये जंक्चर
- 0:52पॉइंट पे नहीं पहुँच पाऊंगा? भगवान क्या कोई ऐसा हुआ है जो
- 1:05बिना भोगे ही इस जंजाल को समझ के अपने आप को मुक्त कर लिया हो?
- 1:17बिना भोग के जंजाल में फंस के श्रेयांश आज क्षमा चाहूंगा।
- 1:46बहुत दर्द से इंतजार कर रहा था। सुरती सहस्रार से नीचे आ नहीं रही
- 1:59है। शब्दों का कोई तालमेल बिगड़ जाए।
- 2:06तो अग्रिम क्षमा प्राप्त पूछा और पूछने वाले ने शायद मेरा प्रथम
- 2:27वीडियो नहीं सुना। मत ढूंढो भगवान को वह एक मामूली
- 2:37कारीगर दयानंद जो कोरोना काल में अपने घर के भीतर बैठा प्रश्न कर
- 2:47रहा था कि बाबा क्या करें? और जो जब कभी किसी को को काम नहीं
- 2:57होता तो उसके मन में ऐसा ही विचार आता है कि मैं क्या करूँ?
- 3:05चलो फिर राम राम कर लेते है। चलो फिर ध्यान कर लेते हैं।
- 3:15इसको सदा ही फालतू का काम समझा गया और मैंने उस वीडियो में
- 3:24विस्तार से बताया। और आपने शायद मेरी वो वीडियो सुनी
- 3:30नहीं। काश वो अकेली वीडियो आपके हृदय
- 3:35में उतर जाए तो आज ये प्रश्न ना उठता।
- 3:45और मैंने कहा कि अगर तुम्हारी समझ में नहीं आया तो फिर कोई और उपाय
- 3:54करेंगे। उपाय करना ही पड़ा।
- 4:01और 2000 से ऊपर के लंबे लंबी वीडियो खोल दी गई।
- 4:06फिर में कोई सार न था। मैं तुम्हें कहता हूँ अगर सार
- 4:15तुम्हें प्रथम वीडियो में मिल जाए तो आग लगा देना बाकी के वीडियो
- 4:22को। वो किसी काम की नहीं रही।
- 4:29गंतव्य पे पहुँच के रास्ते भूल जाया करते।
- 4:48समझ क्या कोई ऐसा रास्ता नहीं बिना इकट्ठा किये बिना भोग सिर्फ
- 4:58समझ के ही उस घंटे को सथरे पे पहुँच जाऊं।
- 5:07अब आप समझो मेरी बात का भोग के दुख पा के समझो या सीधा सीधा समझो
- 5:24बात समझ की है। और अगर भोग के भी समझ न आई तो फिर
- 5:32भोग का भी कोई अर्थ नहीं बात समझ के तुमने पूछा पुत्र क्या ऐसा कुछ
- 5:47भी नहीं? कि बिना भोंगा, बिना इकट्ठा किया,
- 5:55बिना दुख उपाय बिना बैरा के और महमुकसा के जन्म के मैं पहुँच जाऊ
- 6:05यह समझ में आ जाए बात। बात तो समझ की है।
- 6:15इकट्ठा भी करलो बड़े मूड आज इकट्ठा करलो, भोग के साधन भी जुटा
- 6:24लो। बहुत से मूड ऐसा कर रहे है।
- 6:28तिजोरियां भर देते हैं। उनके सामने गरीब व्यक्ति भूख से
- 6:32मर जाता है। कहाँ दया आती है उन्हें?
- 6:40और जिन को दया आती है बाबा नानक को?
- 6:46उनको तो पिता देते हैं, कारोबार के लिए पीसा और वो बौखिक संतो को
- 6:56खिला देते हैं खाना अंततः बात समझ के।
- 7:09लेकिन ऐसे वरले होते हैं अगर मेरी प्रथम वीडियो को आप समझे जाते हैं
- 7:19और मैंने कहा कि समझ नहीं आई। तो फिर आगे कोई इंतजाम करना
- 7:27पड़ेगा और इंतजाम करना ही पड़ा और इता इंतजाम करना पड़ा कि आज तक
- 7:37बोले ही चला जा रहा है। मैंने समझा था।
- 7:45कि समझे जाएंगे लोग? नहीं समझे बात तो समझी है तुमने
- 7:54पूछा सिराज अगर बिना इकट्ठा किये बिना दुख होगे।
- 8:03समझ में आ जाये तो फिर क्या बात है?
- 8:07फिर इकट्ठा करने की दुख भोगने की व्याख्या खत्म हो जाएगी।
- 8:17आपा धापी मिट जाएगी, भाग दौड़ने करो।
- 8:23बात समझ गया और अगर इकट्ठा करके गद्दियों पर बैठ कर भी कुछ मोरू
- 8:32कसम ज कहा पाते क्या गद्दी में कुछ?
- 8:38फिर फिर वो भिक्षा पत्र उठा लेते हैं कि एक बार और बना दो मज़ा तो
- 8:46आया लेकिन थोड़ी कम ही रह गई। फिर कृपा ही की है तो और कर दो
- 8:56बात समझी की है। धान इकट्ठा करो, पद इकट्ठा करो,
- 9:04मान सम्मान इकट्ठा करो, द्रव्य इकट्ठा करो, भोग के साधन जुटाओ
- 9:11लेकिन भोग भोग के भी दुख पा पा के भी वैरग्य न जन्मा।
- 9:18मौमुक्षा न जन्मी, भोग व्यर्थ गया, इकट्ठा करना व्यर्थ गया सभी
- 9:26जन्मो से तुम यही किए जा रहे हो और इस्लाम ने।
- 9:35और ईसाईयत ने इसी कारण से इस प्रणाली को ध्वस्त कर दिया।
- 9:42नहीं अगला जन्म होता ही नहीं, वो जानते हैं अगला जन्म होता है हदर
- 9:52से कुछ नहीं छिपा। दिशा से कुछ नहीं छिपा भरी भाँति
- 9:56जानते हैं अगला जन्म होता है बिना पिछला जन्म जाने मुश्किल है।
- 10:20क्योंकि वो सारे जो भोग तुमने भोग लिया वो व्यर्थ मालूम पड़ जब तुम
- 10:28पिछले जन्म में अतीत के जन्मों में जाओगे तो तुम पाओगे यही कुछ
- 10:32तो किया है। यही आपाधापी, यही मारकाट, यही
- 10:41शतरंज की मोहरिया बिछाई गई, यही कॉम्पिटिटर्स को दुश्मन समझा गया
- 10:55मिटाया गया। रास्ते से हटाया गया और उच्चस्त
- 11:04पदवी पर आसीन हो गए। लेकिन तुम भी कितनी देर टीक हो
- 11:09गए? मौत धीरे धीरे सरक रही है
- 11:18तुम्हारी तरफ। और तुम्हें उसके आते हुए
- 11:24पगधुनियों की आहट सुनाई नहीं पड़ती, तुम बहरे हो जानते हो?
- 11:39तो इन दो धर्मों ने कहा कि अगला जन्म होता ही नहीं ना कोई दूसरा
- 11:43जन्म था बस ये एक ही जन्म है। उसका कारण था हम शब्दों से चिपक
- 11:56जाते हैं, शब्दों के भीतर का रस क्या है?
- 12:02उसे खोज नहीं पता। आगे भी जाने ना तो।
- 12:19पीछे भी जाने ना तो जो भी है बस यही एक पल है।
- 12:39जो भी है बस यही एक कपल है। आगे भी जाने ना तो पीछे भी।
- 12:58जाने न तू बताओ, तुम्हें पता है आगे क्या होगा?
- 13:06हर एक व्यक्ति उत्सुक है भविष्य को जानने में और पीछे भी तुम्हें
- 13:12पता नहीं क्या हुआ। बस इस जन्म की धुंधली धुंधली
- 13:16समृतियाँ सी तुम्हारे भीतर होती है जो भी है बस यही एक पल है।
- 13:29यह एक पल है। यही प्रयास था ये बातें कहने का
- 13:35और तुम रस्कू चूक जाते हो इसके भीतर छिपा क्या है?
- 13:44ये चूक जाने में तुम दक्ष हो। ये दोनों धर्म इसलिए ईजाद हुए कि
- 13:54तुम पहुंचोगे तो अभी पहुंचोगे अभी इसी पल ना कोई फिसला जन्म होता है
- 14:04ना कोई अगला जन्म होता है तो मत वटको।
- 14:11ना ही अतीत, ना ही भविष्य वश जो है वो वर्तमान है और तुम वर्तमान
- 14:17में ठहर जाओ। इनसर्ट कंप्लीट्ली इनप्रेस्ड
- 14:25योरसेल्फ। इनवॉल्व कंप्लीट्ली इन प्रेसेंट
- 14:32योरसेल्फ पूर्व कहा प्रेसेंट में विलीन हो जाओ धस जाओ फना हो जाओ,
- 14:47मिट जाओ। उस परवाने की तरह जो कल नहीं
- 14:52देखता, जो क्षमा में वसंगभूत हो जाता है, बिलकुल उस परवाने की तरह
- 15:05मतलब तो यही था। तुमने ओर ओर से बहुत मतलब पकड़
- 15:11लिया और वो सब बेकार थे। मतलब यही था कि जब भी मिला जिससे
- 15:21भी मिला। जिससे भी मिलेगा।
- 15:27वो न भूत में मिला नबीश में मिला मिलेगा तो आज मिलेगा नहीं तो नहीं
- 15:33मिलेगा तुम सेंस को चुग गए, तुम रस को चुग गए, कहानियों में उलझ
- 15:47गए और कहानियों सदा उल जाती हैं। प्यारी होती है, प्रीतिक कर होती
- 15:54है मीठी होती है, लेकिन उलझाती है तो पूछा पुत्र बात समझ गया है उसे
- 16:14भोग के समझो। बिना भागे समझो जरूरी है दुर्घटना
- 16:22करवा के पांव तुड़वा के बिस्तर पर लेट के साल 2 साल टाँगड़ी तुड़वा
- 16:28के फ्रैक्चर करवा के उस दुख को झेलकर फिर ही समझना है।
- 16:35ज्यादा अच्छा ना होगा कि जिसका फ्रैक्चर हो गया है ऐक्सिडेंटली
- 16:42उससे ही कुछ सीख लो। दो चीजें थी एक प्रत्यक्ष एक
- 16:55प्रमाण। जरूरी नहीं है कि भोग भोग जाए और
- 17:03दुखी हुआ जाए। ये तो फिर प्रत्यक्षीकरण हो गया,
- 17:12एक दूसरा भी रास्ता है प्रमाण। तुम्हारे सामने कोई टकराया, टूट
- 17:24गया उसका हार्ड पांव और वह चिल्ला रहा है मैं उठ नहीं सकता हॉस्पिटल
- 17:33ले जाओ। उसके दर्द को उसे कराहते हुए अगर
- 17:41तुम शिक्षा नहीं ले पाते, फिर वो तुम्हारे साथ हो जाएगा, फिर भी
- 17:46तुम शिक्षा नहीं ले पाओगे, प्रमाण काफी है।
- 17:55और प्रमाण मिल जाये तो प्रत्यक्ष वो ही जाया करता है।
- 18:03बस एक तरह से प्रमाण प्रत्यक्ष का दूसरा पहलू है।
- 18:11यही तो मेरे साथ हुआ। लोग मानेंगे नहीं मुझे पता मैं भी
- 18:18कहाँ मानता क्योंकि विज्ञान का विद्यार्थी था ये विश्वास वगैरह
- 18:27करना मैंने सीखा नहीं था। और कभी मैं भी न मानता अगर किसी
- 18:33के साथ ये घटना घटी होती तुम अगर न मानो तो बिलकुल ठीक हो।
- 18:42इसमें ज़रा भी त्रुटि नहीं है तुम्हारे में लेकिन ये बात तो
- 18:47सत्य है। मेरे अनुभव को मेरी बातों को मेरे
- 18:53साथ क्या बीता, मैंने क्या देखा इसको तुम इनकार नहीं कर सकते
- 19:00नज़रअन्दाज़ कर सकते हो और वो तुम कर सकते हो तुम स्वतंत्र रहो।
- 19:12तुम्हें कौन रोकता है संत ताना शुरू नहीं होता, संत अपना अनुभव
- 19:20बता देता है और उसके अनुभव बताने को भी मत रोकना क्योंकि कुछ लोग
- 19:28हैं जो अनुभव के प्यासे। कुछ लोग हैं, हमें कोई विश्वास
- 19:33दिला दे के वो है हम चल पड़ेंगे, प्रत्यक्ष ना हो जाए, सिर्फ
- 19:41प्रमाण के रूप में ही कोई मिल जाए कि वो है और कबीर यही कहते हैं।
- 19:48क्या मैं तुम्हें प्रत्यक्ष तो नहीं दे सकता, लेकिन प्रमाण जरूर
- 19:54बन सकता हूँ तुम्हारे लिए क्या वो है?
- 19:58तुम कहते कागज की लिखी अन्य संत कहते हैं शास्त्र में क्या लिखा?
- 20:09और मैं कहता आँखों देखिये और मैं शस्त्र वगैरह की बात नहीं करता
- 20:17क्योंकि वो फजूल है। शस्त्र एक नहीं अनेक है और सभी
- 20:21शास्त्रों में विविधताएँ हैं बल्कि विरोध भी हैं।
- 20:32इसलिए मैं शास्त्रों के पचड़े में पड़ता ही नहीं हूँ।
- 20:38कबीर कहते मैंने देखा है मैं इस पर मोहर लगाता हूँ और इतना ही
- 20:45काफी है अगर तुम मान लो तो और बहुत से व्यक्ति इस।
- 20:51प्रमाण के प्यासे कि कोई कह दे तो और इस प्रमाण के पीछे चल पड़ते
- 21:01है। एक पूरा झुंड मार्क्स के पीछे चल
- 21:04पड़ा। मार्क्स कहते परमात्मा नहीं धर्म
- 21:09अफीम का नशा है। और आंधी दुनिया उसके पीछे चल
- 21:25पड़ी। पीछे लगने वाले मुर्खों ने ये
- 21:35नहीं सोचा कि इसने खोजा भी है बस ये कव।
- 21:47कोई आचार्य गीता पर बोले उपनिश्चित पर बोले अष्टक पर गीता
- 21:54पर बोले है तुम सुनते हो क्योंकि उसके पास ओके ब्लडी बहुत बढ़िया
- 22:03है। कॉम्पिटिशन लड़े, जीता कुर्सियों
- 22:08को छोड़ के आया तुम्हारे दिमाग में बड़ा मेंहत होता कुर्सियों को
- 22:13छोड़ने का जितना बुद्ध को सुना गया उतना कबीर को नहीं सुना गया।
- 22:22बूथ के पीछे तो लोग पागल हो गए। 50,000 लोगों को घरबार छोड़कर
- 22:30पुत्र पत्नी को छोड़कर बच्चों को छोड़कर धन सम्पदा को छोड़कर उसके
- 22:36साथ हो गया। इतना प्यारा व्यक्तित्व है उसका।
- 22:44जो जितना ज्यादा छोड़ के आता है, याद रखना, वह उतना ही बड़ा शांत
- 22:51हो जाता है क्योंकि तुम सोचते हो त्याग से भारी पितृ का त्याग
- 22:59किसने देखा है? वेतर का त्याग करते हैं कबीर,
- 23:07नानक और धर्म तो बनते हैं उनके, लेकिन इतनी मात्रा में उनके होते
- 23:16हुए रहते वो अकेले हैं। नानक के साथ मर्दाना बस और बुद्ध
- 23:32के साथ 50,000 की संख्या ऐसा ही महावीर के साथ, क्योंकि वो भी
- 23:37राजा। तुम बाहरी त्यागों से प्रभावित
- 23:44होते हो। भीतर के त्याग का तुम्हे पता ही
- 23:47नहीं है, नेचुरल है तुमने बाहर का त्याग देखा है, लेकिन कबीर के संग
- 23:59कोई नहीं होता। लेकिन।
- 24:02कभी चिरिन जी भी हैं। बड़ी देर तक जिंदा रहे।
- 24:12उनका अनुभव गहरा है, उनका अनुभव पार से भी पार जो है।
- 24:21साक्षी का भी जो साक्ष्य है, वहाँ तक जाता है।
- 24:27बुध का नहीं जाता, बुध उथले उथले से रह जाते हैं।
- 24:35ओषो उथले उथले से रह जाते हैं। महावीर उस स्थल तक पहुँच जाते
- 24:46हैं, इसलिए महावीर के पास जैनियों की संख्या कोई ज्यादा नहीं रही।
- 24:55बुद्धों की संख्या पूरे विश्व में फैल गई।
- 25:02कबीर के फलोवर की संख्या कोई ज्यादा बढ़ नहीं पाई।
- 25:06देश नहीं बना पाई। तुम बाहरी त्यागों से प्रभावित
- 25:13होने वाले लोग हो वो ठीक भी है। क्योंकि तुम्हें दिखता है कि यह
- 25:23व्यक्ति इतना छोड़ के आया समझ आता है और तुम समझ के गुलाम हो, जबकि
- 25:31वह समझ में नहीं आता जिसके समझने से जिसके मिल जाने से मिल जाता
- 25:40है। वह समझ में कभी आता नहीं प्याली
- 25:52कहे कि मुझमें समुद्र समाज आया है, प्याली समुद्र को सहन कर
- 26:00पाएगी। प्याली को ही समुद्र में खोना
- 26:04पड़ेगा। बूंद कहे समुद्र मेरे में मिल जाए
- 26:11नहीं, बूंद को ही समुद्र में मिलना होगा।
- 26:15ये एक का है, हम प्रश्न भी आ जाए। तो क्या मुझे इकट्ठा करना पड़ेगा,
- 26:33दुख झेलना पड़ेगा बैराग आएगा मोमोक्षा जन्मेगी फिर मुक्ति होगी
- 26:42फिर पी सकूंगा उस महा आनंद के सरोवर को नहीं, ऐसा नहीं।
- 26:49भोग कर भी समझ आनी चाहिए। बहुत से लोग भोग कर ना समझे रह
- 26:55जाते हैं। उनके भोगों का भी कोई अर्थ नहीं
- 27:00है। लेकिन भोग के बिना अगर समझा जाए
- 27:04तो क्या बात है? कबीर के पास कोई ज्यादा भोग नहीं
- 27:11होते हैं। कहाँ होते हैं सुकरात के पास
- 27:17ज्यादा भोग? लावसी के पास भी ज्यादा भोग नहीं
- 27:21होते हैं। चौंगस्सी के पास भी ज्यादा भोग
- 27:24नहीं होते। थोड़े से भोग होते हैं, लेकिन भोग
- 27:33होता है। समझ समझ क्या समझ भोगने से दुख
- 27:41मिला कहाँ? दुख से व्रक्ति होगी और संसार से
- 27:49व्रक्ति होगी तो दूसरा पक्ष देखना पड़ेगा।
- 27:52मजबूरी है नेसेसिटी इस दी मदर ऑफ इन्वेंशन जरूरत।
- 28:03काढ़ की माता है जरूरत पहले उत्पन्न होती है, भूख पहले लगती
- 28:13है, भोजन बाद में खोजना पड़ता है। प्रत्यक्ष के बिना चल जाएगा
- 28:31प्रमाण से शुरू कर लो और सच पूछो तो प्रमाण से अगर शुरू करोगे तो
- 28:37ज्यादा बढ़िया है बड़े मज़े की बात है।
- 28:47वो सब मुझसे कहते हैं, देखो मैंने जाते जाते कहा कि कैटेलिटिक एजेंट
- 28:54के जाते ही दूसरा कैटेलिटिक एजेंट खोज लेना।
- 29:00लेकिन ये मूड है कि अपना रजनीशपुरम बना रहे हैं।
- 29:07अब मैं तो इनको नहीं जानता कौन है ये इनको उसकी बात समझ आई या अपनी
- 29:17ही वृत्तियों के गुलाम? क्यों बखेड़ा बखेर जिसका बखेड़ा
- 29:28सा छोड़ छाड़ के चला गया चुपचाप ज़रा गया ज़रा भी हो हल्ला नहीं
- 29:34किया इतना भी हो हल्ला नहीं किया। अब किसी को गति का वारिस बनाया
- 29:43जाता हूँ। यह तो जो कहानी है अनसुनी है,
- 29:48अनसुलझी है, लेकिन मैं जानता हूँ मेरे जाते ही यह भी खत्म हो
- 29:55जाएगी। यह राज़ मेरे पास है।
- 30:00क्या हुआ, कोई नहीं जानता और जो जानता है वह बताए या नहीं?
- 30:05मैं जानता हूँ मैं बता न सकूंगा। ने कहा, मेरे जाते ही दूसरा गुरु
- 30:21खोज लेना मेरी मौजूदगी में हो रही थी सारी क्रियाएं।
- 30:27कैटालाइटिक एजेंट की मौजूदगी में ही होती हैं सारी केमिकल
- 30:32रिएक्शन्स कैटालाइटिक एजेंट ही चला गया रिएक्शन कहाँ धरी पड़ी
- 30:42है। अब वहाँ समूह इकट्ठा करना मूर्खता
- 30:53से अतिरिक्त और कुछ भी नहीं इकट्ठा किये जाओ।
- 31:02और अगर किसी को आनंद मिल जाए, अगर कोई उस स्तर पर पहुँच जाए तो मुझे
- 31:08जरूर बता देना, लेकिन काश ऐसा हो पाता, ऐसा होगा नहीं, मैं जानता।
- 31:21और अगर ऐसा हो जाये तो मुझे जरूर बता देना।
- 31:27मेरे जीते जी मुझे हो गया हो नहीं पायेगा क्या मैं चाहता हूँ।
- 31:43ज़रूरी नहीं है कि जब तुम्हारे साथ ही कोई घटना घट जाए तो तुम
- 31:52खोजो नहीं। कई बार प्रमाण भी बड़े सुंदर होते
- 32:00हैं। कबीर बड़े सुन्दर प्रमाण हैं,
- 32:07नानक बड़े सुन्दर प्रमाण हैं, कृष्ण बड़े सुन्दर प्रमाण हैं।
- 32:14हमारा तो इतिहास बराबर है ऐसे ही लोगों को।
- 32:22जिनके या तो पीछे आप हो लेते हो या उन्हें पागल करार दे देते हो।
- 32:31बात समझ की है पुत्र अगर बिना भोगे समझ आ जाए।
- 32:41के भोग में कुछ नहीं दुख मिलेगा तो फिर भोखों की कोई आवश्यकता
- 32:46नहीं। फिर मत इकट्ठा करना ये आपाधापी
- 32:49तुम्हारा वक्त बर्बाद कर देगी, वो ही वक्त तुम लगाना, ध्यान खोजना
- 32:58वो है। जब के ये लोग अपना वक्त बर्बाद कर
- 33:03रहे है ऐसा तो कोई एक पीरियड भी बिना मुआवज़े के तो नहीं?
- 33:16कौन लगाता है शिवर? नहीं शुल्क शिविर कहाँ लगते हैं
- 33:26और ये वर्षों वर्षों तक बोलते जाते हैं कबीर नानक क्या इनकी
- 33:33खोपड़ी खराब है? ऐसा लगता तो नहीं?
- 33:39समझदार मालूम पड़ते हैं, कुछ हमसे ज्यादा ही लगता है तो ऐसा भी
- 33:46नहीं। फिर क्या हुआ, इन्हें कुछ मिल
- 33:50गया। हमारे हरियाणा में एक कहावत है
- 33:59कोई ज्यादा उछल कूद करने लग जाए तो उसे कहते हैं भाई इसे या तो
- 34:03कुछ मिल गया या तो कुछ मिल गया भाई या इसका जाण गिड़ा हो गया, ये
- 34:12दो ही बात है। यस के 2 दिन आ गए।
- 34:17यस को कुछ मिल गया तो संत को कुछ मिल जाता है।
- 34:26बुरे दिन तो उसके लिए बुरे दिन होते ही है, उसे पता चल जाता है।
- 34:312 दिन नामक कोई चीज़ होती है। जो होता है अच्छे दिन ही होते
- 34:38हैं, बुरे होते हैं। अगर तुम्हें समझ आ गया तो इकट्ठे
- 34:49मत करना यह कवाये तो मूर्खों के लिए बोला मैंने।
- 34:57तुम्हारे लिए ये पुत्र मैंने नहीं बोला अगर असाम आज आए तो फिर फिर
- 35:07तुम अपने भीतर उतरने की चेष्टा में संलग्न हो जाए सारे विषाद
- 35:14बिछाना। अपने भीतर जाने के सारे विशाख
- 35:18पैदा करना, फिर बोगो की सामग्री इकट्ठी मत करना, फिर अपने भीतर
- 35:25जाने की सामग्री इकट्ठी करना, आँख पे पट्टी बांध लेना है, कानों को
- 35:32बंद कर लेना है। यूबा को बंद कर लेना, सभी
- 35:38इंद्रियों को विश्राम दे देना और अपने भीतर उतर जाना सारी ऊर्जा
- 35:46बाहर से खींच लेना, जहाँ जहाँ तुमने इन्वेस्ट की है।
- 35:51और इकट्ठी करके अपने भीतर उतर जाना कछुए की तरह हमने कछुए का
- 35:57अवतार कहा। कच्छप अवतार सभी इंद्रियों को
- 36:08निष्क्रिय यानी बंद कर देना, एक बार काम मत लेना।
- 36:15आँखों को बंद करने के लिए भगवान ने पलकें दीं क्योंकि सबसे ज्यादा
- 36:20शक्ति यहीं से वह होती है और यह उन्मुख साधन है शक्ति को व्यय
- 36:27करने का। इसलिए आँखों को बंद करने के लिए
- 36:32भगवान ने पहले ही शटर लगा दिया। कानो पे शटर नहीं लगाया क्योंकि
- 36:38बहुत कम उर्जा जाती है। बहुत कम अति कम जबान के ऊपर भी
- 36:46लाकर लगा दिया औंठ। यहाँ से भी शक्ति बड़ी खराब होती
- 36:52है। मून रहना, आँखों को बंद करना,
- 36:56कानों को बंद करना, सुराखों को बंद करना, गुप्ते के सुराखों को
- 37:04मत काम लेना इनसे कोई? भोग के लिए फिर बैठ जाना, सुख आसन
- 37:20में बैठ जाना। इस शरीर को हड्डी को सीधी करके इन
- 37:26मूर्खों की बातों को मत मानना। शरीर ने तुम्हारा कुछ नहीं
- 37:32बिगाड़ा? इसने कोई पाप नहीं किया।
- 37:36ये तुम्हारा घर है। इसको सजा समझ के रखना, बड़े प्रेम
- 37:42से बुझकार के रखना, पौष्टिक भोजन देना, चाउ मन चुग्गा ना देना इसे।
- 37:53पेट को मत फूलाना पौष्टिक भोजन अल्पाहार अल्प मात्रा में जिससे
- 38:00तुम्हारा जीवन चले, बस जीवन। ये मैं प्रैक्टिकल बोल रहा हूँ।
- 38:11ध्यान से समझ लेना अल्पाहार इतना कि शरीर चल जाए से मर भी ना जाए,
- 38:24क्योंकि ज्यादा अति करोगे। तो फिर वो संथारा हो जाएगा, वो ही
- 38:33मत करना, शरीर को चलने का उपाय पर देना हृदय धड़कता रहे, फूस फूस
- 38:41स्वास्थ्य लेता है। शरीर के सारे अंग पतंग भारी भीतरी
- 38:49विधिवत काम करते रहे। अब मैं अपने भीतर जाने का उपाय
- 38:56बताता हूँ। लोग पूछ लेते हैं अपने भीतर कैसे
- 39:00जाए? मुझे बड़ी हैरान नहीं होती।
- 39:08तो ऐसा समझो जैसे रात को तुम कहो कि निद्रा में कैसे जाए?
- 39:18तुम्हें मालूम है एक करना धरना सब छोड़ दो, बाहर से सारी शक्ति को
- 39:25एकत्र करो वही जो मैंने ध्यान की प्रोसेसर बताई आपको।
- 39:33आँखें बंद करके आराम से लेट जाओ, कुछ ना करो भीतर जाने का प्रयास
- 39:42भी ना करो तुम कभी करते हो कोई भीतर जाने का प्रयास नींद के लिए
- 39:48नहीं करते ना? बस ऐसा ही हो जाओ आँखें मूँद लो
- 39:54रिलैक्स यूरसेल्फ़ कंप्लीट्ली अपने आपको पूर्णतः शीतल कर दो।
- 40:04रिलैक्स, रिलैक्स, रिलैक्स और धीरे धीरे शीतल होते होते होते
- 40:12तुम्हे नींद आ जाएगा, यही नींद का सूत्र है और नींद आ जाएगी गहरी
- 40:21तुम में पहुँच जाओगे और सारी रात मज़े से कटेगा।
- 40:29सुबह उठोगे तरो ताजगी से नहाये हुए नींद अनोखी है।
- 40:47जब तुम ये सारी प्रोसेसर नींद के लिए करते हो तो थके होते हो।
- 40:55तुम्हारे पास शक्ति ही नहीं होती इसलिए एक बात तुम्हे बता दूँ कि
- 41:03जाते जाते नींद में तुम्हे सपन नहीं होता।
- 41:09शब्द कहा बोले शाह ने उसका अर्थ गलत ले लिया, राती नींद न आवे उन
- 41:18जड़े अल्लाह बारे को जब तुम परमात्मा की तरफ।
- 41:25उस तरफ़ जाना शुरू होते हो और शिथिलता में आ जाते हो तो तुम्हें
- 41:33सोपन नहीं आता। बस ये मतलब था इसका नींद में जाते
- 41:38हुए तुम्हें सोपन नहीं आता। क्योंकि शक्ति नहीं होती, स्वप्न
- 41:45को देखने के लिए ऊर्जा चाहिए जैसी फ़िल्म को देखने के लिए ऊर्जा
- 41:50चाहिए अन्यथा तुम सो जाओगे। ऊर्जा आवश्यक है और दिन के थके
- 41:58मांदे वक्त के थपेड़े मुशक्कत तुम्हारे टिश्यूज़ थक जाते हैं,
- 42:05शरीर के भी और दिमाग के नुरोंज भी थक जाते हैं।
- 42:13गहन थकावट में होते हो तुम और आँख ही बंद करना होता है।
- 42:21तो जाते जाते तुम्हें नहीं आएगा, तुम्हें पता ही न चलेगा तुम कब
- 42:27खिसक गए, बाहरी वातावरण से कब तुम भीतर चढ़ेगा और वो क्या था कहाँ
- 42:37से गुजरे? क्योंकि बेहोश थे।
- 42:43देखने के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- 42:48नजारों को देखने के लिए एक और देखने वाला ओब्जर्वर है।
- 42:55उसे किसी ऊर्जा की जरूरत नहीं है। वो तो दिन भर रात सैपम।
- 43:00अपनी ही ऊर्जा से प्रकाशित देखने में समर्थ है, वह तो निरंतर चुकता
- 43:06नहीं। कभी वह लाजवाब है जब तुम आँखें
- 43:16मूँद लोगे, रिलैक्स हो जाओगे। ध्यान से समते रहना और हो सके तो
- 43:23करते भी रहना, लेकिन मुझे पता तुम सो जाओ।
- 43:29लोग मुझे कहते हैं कि हम ध्यान में बैठते हैं बाबा नींद आ जाती
- 43:33है। यह होती तो योग निद्रा है, लेकिन
- 43:36तुम ठीक से सोये नहीं होते। तुम्हें पता नहीं, प्रत्येक
- 43:41व्यक्ति के भीतर बहुत सी निद्रा अभी बाकी है, तुम ठीक से सोये
- 43:47नहीं अपनी पूरी ज़िन्दगी में वो नींद भीतर बाकी बोलती है तो ठीक
- 43:53से सो लेना यह अत्यंत आवश्यक सूत्र है।
- 43:57याद रखना, उन संतों की बात मत मानना जो आपको एक डेढ़ बजे रात को
- 44:07जगा के अपने पार्थिव पंचभूत के शरीर का दर्शन करवातें हैं।
- 44:11वे मूर्ख हैं, आज पागल हैं, कल को महा पागल हो जाएंगे।
- 44:18तुम्हें भी पागल कर देंगे, इनसे बच के थोड़ा भीतर जाओगे थके मांदे
- 44:29होगे, स्वप्न नहीं आएगा यही कहा उपले शाह ने राति सपन नवे न जड़े
- 44:36अल्लाह वाले हुए जो अल्लाह की तरफ जाना शुरू हो गए।
- 44:42उनको जाते जाते वो सपने नहीं आएगा और जो गहरे गहरे में चले गए उनको
- 44:49सारी रात से सपना नहीं आता जब तक तुम में होते हो कहाँ सपना होता
- 44:54है तुम्हें? तुम विश्राम की घोर अवस्था में
- 44:58होते हो सुंदर, तृप्त। लेकिन आखिर में जो तल तुम छूते हो
- 45:04वो होता है सुसुक्ति और सुसुक्ति जागृति का नाम नहीं, ध्यान से
- 45:12सुनते रहना यहाँ सुनने की जरूरत है।
- 45:19तुम अंतिम ताल जो छूते हो वो होता है शुशुपति और शुशुपति होती है
- 45:24बेहोशी उस शुशुपति को भी कोई जागता हुआ तत्व देख रहा होता है
- 45:34उस वक्त। और तुम सारी रात उस में पड़े रहते
- 45:40हो और कोई तत्व लगातार जागे जागे तुम्हारी उस अवस्था को निरंतर
- 45:46सारी राह निहारता रहता है, उसे शक्ति की जरूरत नहीं होती।
- 45:53अब यहाँ फर्क समझ लेना। एक शक्ति तो तुम्हें चाहिए जब तुम
- 46:00अपने भीतर जा रहे हो तब तुम शक्तिहीन होते हो, शक्ति लेने जा
- 46:11रहे हो, जैसे पुराने जमाने के इंजन पानी भरने के लिए जंक्शन्स
- 46:17में ठहर जाते थे। आजकल वो नहीं आज फ्यूल भराने के
- 46:21लिए ठहर जाते हैं। भीतर जाओगे सुश्रुति मोर्चा है वो
- 46:35उस मोर्चा में भी एक जागृत तत्व। निरंतर सारी रात तुम्हें निहारता
- 46:43रहेगा, वही बताएगा कि रात को स्वपन नहीं आया बहुत बढ़िया नींद
- 46:51आई यह बताएगा कौन जिसने देखा सारी रात तुम्हें सुसुति में बड़े
- 46:58आनंदमग्न। सोए हुए लेकिन सोए थे तुम याद
- 47:02रखना तुम जगह नहीं थी एक जगह हुआ तत्व जिसे हम अवेयरनेस कहते हैं,
- 47:10चैतन्य कहते हैं और उस चेतना को एनर्जी की आवश्यकता नहीं होती।
- 47:17यहाँ मैं फर्क बताता हूँ तुम्हें। चेतना स्वयंभू है।
- 47:24वह चेतन भी है और ऊर्जा का समूह भी है।
- 47:28दोनों चीजें संग्रहित हैं। उसमें उसमें देखने की क्षमता भी
- 47:35है और वो शक्ति का भंडार भी है। वह ओमनी पोटेंट भी है और वह
- 47:43चेतन्य भी है। दोनों चीजों का संग्रह है इसलिए
- 47:48उसकी शक्ति कभी चुकती नहीं। चेतना स्वयं में एक शक्ति है,
- 47:54इसको ऐसा समझो। देखने की शक्ति है ओब्सर्वर और
- 48:00उसे कहीं बाहर से नहीं लेनी पड़ती और कण कण में उसकी शक्ति मौजूद
- 48:05है। जेता कित्ता तेता नाव का?
- 48:09अर्थ नाम का अर्थ? यह वो शक्ति जो चेतन है और जो
- 48:18शक्ति चेतना से भरपूर है, बिन नावें ना ही कोठा प्रत्येक कण कण
- 48:25में वो मौजूद है, चेतन भी है और शक्ति भी है।
- 48:29अब दोनों का संग्रह है, इसको शक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ती।
- 48:35बड़े गहरे वाक्य हैं। बार बार सुनोगे तो समझ में आ
- 48:38जायेगा और एक यह भोजन ही आपको काफी है, तुम वही समझते हो, रात
- 48:52को बड़ा आनंद आता है, आनंद नहीं आता सिर्फ थकान मिटती है।
- 49:00आनंद तो तुम्हें निहार रहा होता है आनंद तो तुम्हारे करीब बैठा
- 49:04होता है जैसे तुम बगीचे में बगीचे के करीब बैठे हो तुम कहो, बड़ी
- 49:09सुगंधा है मेरे में नहीं तुम्हारे में कहाँ सुगंधा है सुगंध तो
- 49:16बगीचे में। तुम बगीचे के पास फूटो तो बगीचे
- 49:21के पास बैठे होने के कारण उसकी सुगंध तुम्हारे नशा पोटों में
- 49:29प्रवेश कर जाती है और तुम समझते हो ये सुगंध मेरी है ने।
- 49:36यह सुगंध उसी चेतना की है, बस वो तुम्हारे क्रीब बैठा है।
- 49:43उस क्षण में शक्ति के बड़ा क्रीब होता है चैतन्य, प्रत्येक बातों
- 49:51को गौर करके नोट कर लेना। तो ये दो तल मैंने गना दिए एक
- 49:59शक्ति का एक ओबजर्वर का जो दृष्टा है, जो चेतना है और चेतना के साथ
- 50:09साथ शक्ति का सागर है भंडार उसकी चेतना।
- 50:14के साथ शक्ति कभी खत्म नहीं होती। देखना उसका स्वभाव और शक्ति उसका
- 50:21स्वभाव सो वो सैब हम जो अपने ही प्रकाश से प्रकाशित और जो अपनी ही
- 50:29एनर्जी से आलोकित। उसको किसी दूसरे की आवश्यकता
- 50:35नहीं, वह परिपूर्ण है। इसने कहा उपनिषद में पूर्ण में से
- 50:42पूर्ण को निकाल लिया जाए तो शेष पूर्ण ही बचता है।
- 50:48पूर्णमदः पूर्णमेदम पूर्णमदक्षकते।
- 50:52पूर्णस्य पूर्णमादाएं पूर्ण मेवा वशिष्यतें अब तुम भीतर आराम में
- 51:05बैठे हो, लेकिन आराम में तो हो परमोषित हो, इतनी से बस नहीं
- 51:14होती। यह तुम्हारा लक्ष्य नहीं है, यह
- 51:18तो प्रकृति तुम्हें दे देती है रोज़ तुम्हारा लक्ष्य कहाँ जाके
- 51:24खत्म होगा वह तत्व जो तुम्हें लगातार निहारता है।
- 51:31और जिसके होने से तुम सुगंधमान हो जाते हो और जिसके होने से तुम
- 51:37शक्तिमान हो जाते हो, जिसके होने से तुम रिलैक्स हो जाते हो और
- 51:43खुशी को प्राप्त होते हो और बाहर आके कहते हो बड़े मज़े की नींद
- 51:47आई। तुम्हें समझ नहीं आती थी तो वो
- 52:04ऐसी अवस्था जो जागृत नहीं थी। जो बेहोशी की व्यवस्था थी।
- 52:13सुसुक्ति एक बेहोशी है और क्योंकि तुम गरीब प्रिय शक्तिहीन हो के
- 52:21जाते हो इसलिए उस शक्तिमान के पास।
- 52:29उस आनंद के सागर के पास बैठे हुए तुम्हें जो सुगंधी प्राप्त होती
- 52:34है, उसको लेकर बाहर आ जाते हो, लेकिन तुम अभी तक जागृत नहीं हुए,
- 52:45तुम स्वयं उसके भंडार नहीं बने? तुम चेतन नहीं हुए और तुम
- 52:51शक्तिमान भी नहीं हुए, बस तुम शक्तिमान और चेतन का सांनिध्य
- 52:57करके आ गए, सारी रात बैठे रहे और ये तुम रोज़ करते हो?
- 53:02रोज़ प्रकृति तुम्हें उस स्थल पर ले जाकर तुम्हें उसे साक्षात
- 53:06कराती है। उसका कुछ अर्थ होगा जो तुम समझ
- 53:12नहीं पाए उसका अर्थ इतना ही है प्रकृति का कि ये जो गरीब बैठा
- 53:18है, तुम्हें सुगंध मान कर रहा है, इसमें विलीन हो जाओ, ऐसे ही हो
- 53:24जाओ। और ऐसा ही कब होगे जब बूंद समुद्र
- 53:29में समा जाएगी और समुद्र ही हो जाएगी?
- 53:35तुम हो तो बूंद हो तो उसके अंश। लेकिन चिकड़ में कीचड़ में लिपटे
- 53:45लिपटे तुम्हारी आभा बाहर प्रकट नहीं होती, बुखार फेंको।
- 53:55इन सब मान्यताओं को ये तुम्हारे हीरे के ऊपर कीचड़ की तरह जमे हुए
- 54:02हैं। इनको खुर्च डालो या गुरु जब
- 54:08खुर्चने लगे तो कृपया करके चुप रह जाओ।
- 54:14गुरु बड़ा कर्णाबान है, वो जानता है लेकिन तुम तो गुस्सा हो जाते
- 54:19हो, गुरुओं को सूली लगा देते हो। गुरुओं को तुम जहर का प्यारा पीला
- 54:25देते हो, गुरुओं के हाथ फँट लेते हो, गुरुओं से कैसे, कैसे
- 54:31दुर्व्यवहार करते हो? भीतर श्रुति में तुम पहुँच गए
- 54:49यहाँ तक मैंने बोल दिया कैसे पहुंचे ये भी बोल दिया तुमने कुछ
- 54:57नहीं किया तुम सिर्फ अपने आप को छोड़ो और छोड़े और परिपुरण छोड़े।
- 55:05कंप्लीट्ली रिलैक्स हुए तुम अब तुम कहोगे फिर ध्यान में कैसे
- 55:12जाए, कैसे हो जाए वह सागर। कि वह सचेयारा हुई है कि वह कूड़ा
- 55:29तुट्टे बाल हुक मर जाई। चल नानक लिखया नाल कैसे अहंकार की
- 55:40तड़ टूटे, कैसे इसका कूड़ा हटे? मैं बहुत सीखा रहा हूँ तुम्हें,
- 55:50ये तो प्रकृति रोज़ कराती है अब असली मसले पे आ जा जैसे प्रकृति
- 56:02तुम्हें रात। रिलैक्सेशन में ले जाती है।
- 56:10बिल्कुल वही प्रक्रिया अपनाना लेकिन ऊर्जाहीन होके नहीं इसलिए
- 56:16मैं कहता हूँ ब्रह्मचर्य बड़ा आवश्यक है।
- 56:24तुम कहते हो डॉक्टर कहते हो। पाश्चात के सारे वैज्ञानिक कहते
- 56:30हैं बजाएं बाड़ में पाश्चात के वैज्ञानिक को परमात्मा से लेना
- 56:36चाहिए, उन्हें मौज मस्ती चाहिए। अभी अभी गधे की यूं से बाहर आये।
- 56:47तो उन्हें कर क्यों रोकते हो? भाई जो भोगना चाहता है उन्हें
- 56:55भोगने दो, न तो को फंसा फसाते हो, उसमें भोग कर ही तो रखती आएगी।
- 57:06तो ये काम भी मत करना, किसी को भोगते हो को रोक मत लेना भोग अगर
- 57:15किसी के जज गई ये गद्दी में सुख है, दान में सुख है।
- 57:25मान सम्मान में सुख है या किसी साधन में सुख है तो उसे इकट्ठा
- 57:32करने दे न तुम बीच में रोड़ा मत अटकाना, तुम खुद को उस स्तर पे ले
- 57:41जाने के चेष्टा में संलकन होना। औरों के घर के झगड़े, नाहक न छेड़
- 57:49तुम औरों के घर के झगड़े, नाहक न छेड़ तुम तुझको पराई क्या पड़ी
- 57:58अपनी न बैठ तुम बात तो तुम्हारी है।
- 58:04तुम कैसे उस आनंद में मगन हो के खेल जाओ, तुम्हारी कैसे कड़ी फूल
- 58:09बन जाए तुमने अपना घर देखना है दूसरे के घर में क्या हो रहा है
- 58:25ये तांका झांकी बंद कर? अपनी दीवारों में सुराखों को बंद
- 58:30करता हूँ हंसो मत अपनी दीवारों में सांझी दीवारों में, सुराखों
- 58:41को बंद करता हूँ परले पार क्या हो रहा है इसमें कोई मज़ा नहीं है जब
- 58:47परले पार रहने वाला व्यक्ति मज़े में नहीं।
- 58:50तो तुम देखने वाले कैसे मज़े में अब जाओ तो अपने घर में आ जाओ,
- 59:02बिल्कुल वही प्रक्रिया, लेकिन श्रुति में जाते वक्त तुम थके
- 59:08होते? अब तुम रात को शक्ति संपन्न हो के
- 59:15बाहर आये हो, इसलिए ब्रह्मवेरा को बड़ा सुंदर बताया गया ध्यान के
- 59:20लिए कारण कारण यही था, रात को सोए सोए थे, थके बांधे थे।
- 59:26ध्यान के लिए उपयुक्त ना था वो क्योंकि ध्यान के लिए बड़ी ऊर्जा
- 59:32की आवश्यकता होती है इसलिए सभी संतों ने ब्रह्मचर्य पर ज़ोर दिया
- 59:38और कोई कारण नहीं अगर तुम संसार में अभी बहकना चाहते हो।
- 59:45तो तुम्हारी मर्ज़ी है कौन रोकता है संसार बनाया किस लिए है देखने
- 59:52के लिए भी बनाया भोगने के लिए भी बनाया, लेकिन अगर ऊब गए हों तो
- 1:00:03फिर दूसरे पर ले। पर डे दो होते हैं उस तरफ आ जाओ
- 1:00:14ध्यान में जाना है, तो प्रक्रिया तो वही होगी जो तुम शशुक्ति में
- 1:00:20जाने के लिए रात को नींद में जाने के लिए प्रयोग किया क्या?
- 1:00:27रिलैक्स कंप्लीट्ली यूरसेल्फ़ छोड़ दो सब कुछ और रात को और अब
- 1:00:37को ये दोनों प्रक्रियाएं सेम प्रक्रिया करने का फर्क है।
- 1:00:42रात को एनर्जी। लसनेस की अवस्था में तुमने यह
- 1:00:45प्रक्रिया की, इसलिए शिशुक्ति तल के अंतराल में जाकर तुम वापस लौट
- 1:00:55आये और दिन में ध्यान के वक्त तुम संपूर्ण।
- 1:01:02शक्ति से युक्त हो करो ताजा ताजा ताजा खिले फूल के समान अब तुम
- 1:01:13शक्ति संपन्न हो रात को शक्तिहीन यह बड़ा फर्क है मैं क्यों यहाँ
- 1:01:20अटका खड़ा हूँ काफी देर से। क्योंकि ये महत्त्व है।
- 1:01:26महत्त्व अपूर्ण मसला रात को जब गए इस शक्ति में तो तुम थे थके थके
- 1:01:35अब तुम हो ताजा ताजा? भ्रम मूर्त को इसलिए इतना महत्त्व
- 1:01:45दिया गया, लेकिन भ्रम मूर्त की मैंने परिभाषा क्यों बदल दी?
- 1:01:52अगर तुम नींद पूरी नहीं हुई, इसी को तो तुम मरीज हो।
- 1:01:59अगर नींद पूरी नहीं हुई तो तुम शक्ति हीन ही रहो।
- 1:02:02पहले नींद तो तुम्हें शक्ति देती है शशक्ति में वह तुम्हारे करीब
- 1:02:08होता है और शशक्ति में जगा दिया इन संतोने शक्ति तुम्हें मिली
- 1:02:18नहीं रात को। शक्तिहीन ही तुम रहे जैसे रात को
- 1:02:23तुम वैसे ही अब रहे इसलिए मैं कहता हूँ सोन खूब सोनो, तभी
- 1:02:32ब्रह्म मुहूर्त का फायदा है खिले खिले से तुम जा सकते हो उसके पास।
- 1:02:38मुर्दा चेहरों की उसे कोई आवश्यकता नहीं है।
- 1:02:44चेहरे पर 12:00 बज कर 3.75 मिनट और चाहते हो तुम ध्यान की भ्रम
- 1:02:51अवस्था कैसे हो सकेगा? यह नहीं नहीं पूरा पूरा सोना।
- 1:02:58पूरा सोना त्याग दो इन बकवासों को ब्रह्ममूर्त वगैरह कुछ नहीं होता
- 1:03:05है। सबके ब्रह्ममूर्त किसी का
- 1:03:09ब्रह्ममूर्त 2:00 बजे भी हो सकता है निद्रा पूरी हो गई भाई अक्सर
- 1:03:15ग्रामीणों के ब्रह्ममूर्त जल्दी होता है।
- 1:03:19क्योंकि वो रात को 6:00 बजे सो जाते हैं।
- 1:03:25जैन के ब्रह्म मूर्ति जल्दी होते हैं क्योंकि वो रात को जल्दी सो
- 1:03:28जाते हैं। सूर्य से पहले खाना खा लेना है पर
- 1:03:32सो जाना है। अगर तुम भी ऐसा कर सको, तुम्हारा
- 1:03:39भी ब्रह्ममूर्त जल्दी हो जाएगा, लेकिन क्लबों में जाने वाले जो
- 1:03:47सोते ही रात को 12 के बाद हैं, उनका ब्रह्ममूर्त 2:00 बजे कैसे
- 1:03:52हो जाएगा? किते 2 घंटे के अंदर सफिशिएंट हैं
- 1:03:58नहीं सफिशिएंट होते इनको बकवास करने दो पूरा स्लोप तुम्हारी
- 1:04:03प्रकृति तुम्हें बता देगी कि ब्रह्म मुहूर्त हो गया जब
- 1:04:08तुम्हारा ब्रह्म मुहूर्त हो जाएगा तो आँख पटक से खुल जाएगी।
- 1:04:14तो जानो के ब्रह्म हो गया, घड़ी से अलार्म मत लगाओ जब तक कि कोई
- 1:04:20मजबूरी न हो, आंख खुल जाएगी, वही तुम्हारा ब्रह्म मोर्चा है और
- 1:04:30प्रत्येक के ब्रह्म महूर्त अलग अलग होती है।
- 1:04:34सभी के ब्रह्मवर्त 3:40 पे नहीं आता है, मूर्खों की व्यवस्थाएँ
- 1:04:43हैं इन्होंने जाना तो कुछ है नहीं।
- 1:04:49इनके उपदेशों को प्रवचन मत कहकर प्रवचन परा वचन होते हैं।
- 1:04:56परा से आए हुए वचन परा में तो कभी ये छुआ भी नहीं तले हैं, परा के
- 1:05:03वचन आएँगे भी नहीं। इनकी जुबान पर यह प्रवचन नहीं
- 1:05:08होता। यह भौंकना होता है।
- 1:05:12कुत्ते की तरह ऐसे मत करो तो जैसे तुम रात को छोड़ थे, अपने आप को
- 1:05:22कंप्लीट्ली रिलैक्स हुए थे, वैसे ही तुम अब भरपूर शक्ति से।
- 1:05:29जग गए हो और तुम शक्ति से संपन्न हो।
- 1:05:35रात को शक्तिहीन थी तो तुम ज्यादा से ज्यादा सु शक्ति के तल को छू
- 1:05:40पाए। अब तुम शक्ति संपन्न हो।
- 1:05:46तो तुम ज्यादा से ज्यादा उस तल पे चले जा सकते हो जो तल आखिरी तल
- 1:05:52है, जो गंतव्य है तुम्हारा जो मंजिल है तुम्हारी जहाँ पहुंचना
- 1:05:58है जहाँ बागबाँ तुम्हारा इंतजार करता है।
- 1:06:07पलक बावड़े बिछाए रहता है, आ जाओ हमारी बाहों में हम आस लगाए बैठे
- 1:06:18हैं, तुम वादा करके भूल गए वह बुला रहा है।
- 1:06:25तुम्हें तो चलो, लेकिन थके थके से नहीं जा पाओगे।
- 1:06:34मैं फिर कहता हूँ संतो ने ब्रह्मचर्य की बात कही अपने भीतर
- 1:06:41के तनों को छूने के लिए। और ये तुम्हारे फिलॉसोफर तुम्हारे
- 1:06:51पाश्चात्य जगत के फिलॉसोफर दार्शनिक और दार्शनिक बुद्धि से
- 1:06:57हुआ जाता है और संत? से हुआ जाता है आंतरिकता से और
- 1:07:04दोनों में बड़ा आसमान जमीन का फर्क है तो ये तुम्हें पहुंचाना
- 1:07:14चाहते हैं दर्शन तक यानी फिलॉसफी तक मग्ज का।
- 1:07:21वहाँ ब्रह्मचर्य सादों ना सादों कोई बात नहीं वहाँ जो खाये पिए
- 1:07:26उससे ही चलेगा का बस न्यूट्रिशनल डाइट ले लो काफी है बुद्धि को
- 1:07:35जरूरत भी कितनी होती है? लेकिन भीतर जाने के लिए वृहद
- 1:07:42शक्ति की आवश्यकता होती है। वह तुम्हें सब तरफ से कछुए की तरह
- 1:07:49सारे अंग भीतर खींच लेने होंगे, सारी शक्ति को भीतर खींच लेना
- 1:07:54होगा और ब्रह्मचर्य आवश्यक है। क्योंकि शक्ति चाहिए और फिर कह
- 1:08:08देता हूँ, वृहद ऊर्जा के बिना तुम जानो सब होगे बेता।
- 1:08:16अगर वृहद ऊर्जा होती तो तुम रात को ही सुसुक्ति में न जा पाते तो
- 1:08:24रात को ही तुम चले जाते। उस ऊपर जागृति में शक्ति नहीं थी
- 1:08:32तो तुम सुसुक्ति का तल छूके वापस आ गए।
- 1:08:36यही था मात्र एक कारण और इस कारण को मिटा दो मिटाव की कैसे नींद के
- 1:08:42जरिये सबसे पहली नींद और दूसरी सारी शक्तियां को एकत्रित करना।
- 1:08:54कहीं से भी शक्ति लीक ना हो। अब मेरी बात को इशारा समझो तो
- 1:09:00इशारा समझलो और खुल के कहो तो मैंने खुल के बहुत बार बताया
- 1:09:05आँखों को मूंद लो आँखों के ऊपर भगवान ने शटर दिए, कानों को मूंद
- 1:09:12लो ये प्लग डाल दो। बाहर का शोर न सुने, ज़रा भी
- 1:09:20खटबटाहट न होवे, तुम्हे पता ही न चले और फिर तुम ध्यान की अवस्था
- 1:09:27में चले जाओगे तो बाहर चाहे ढोल बजते रहे तुम्हे पता न चलेगा।
- 1:09:31फिर तो तुम भीड़ में खड़े हो। तो भी अकेले हो शोरगुल मच रहा है,
- 1:09:39लेकिन तुम एकांत का रस पी रहे हो। यहाँ बार बार क्यों ठहरता हूँ
- 1:09:47मैं? क्योंकि यह बड़ा बड़ा मूल्यवान
- 1:09:51किस्सा है। सभी प्रकार से शक्तियां को
- 1:09:58सुरक्षित कर लेना ब्रह्मचर्य है। सिर्फ यौन शक्ति को काबू में कर
- 1:10:06लेना ब्रह्मचर्य नहीं। मैं थोड़ी सी परिभाषा को और
- 1:10:11ब्राउड कर दूँ, सिर्फ यौन शक्ति को नहीं आँखों की कानों की।
- 1:10:28बुद्धि की जो जे विचार तुम्हारे तंग करते हो, तुम इस समय भी व्यय
- 1:10:37होता है शक्ति का सभी प्रकार के जे छिद्र इनसे शक्ति निकलती है।
- 1:10:53इन क्षेत्रों को बंद कर लेना, मूल बंध वगैरह उद्यान बंध वगैरह
- 1:10:59जालंधर बंध वगैरह लगाने की आवश्यकता नहीं है।
- 1:11:02ये तो ड्रामा है सर्कस, इन सर्कसों में भी मत फंस जाना।
- 1:11:11बस शरीर को एस इट इस ही रहने देना।
- 1:11:17अब रात को सोए थे, मजबूरी थी क्योंकि शक्तिहीनता थी।
- 1:11:21अब दिन में अगर तुम बैठ सकते हो तो वह भला नहीं बैठ सकते तो फिर
- 1:11:26लेट जाओ लेकिन जागृत हो। रिलैक्स यूरसेल्फ़ कंप्लीट्ली
- 1:11:33जैसे रात को हुए थे छोड़ दो सब कुछ।
- 1:11:37ये समर्पण शब्द बड़ा प्यारा था। समर्पण शब्द का अर्थ ही यही था
- 1:11:42सारी क्लिंगन इसको पकड़ो को छोड़ दो यानी ढीले कर दो, अपने आपको
- 1:11:47रिलैक्स यूरसेल्फ़। बहुत गहरा मतलब इसका ये था तो तुम
- 1:11:59बिना ऑब्जेक्ट के छोड़ नहीं पाते इसलिए भगवान कृष्ण कहते हैं मेरी
- 1:12:04शरण में आ जाओ, वो तुम्हे एक ऑब्जेक्ट दे देते हैं कि तुम याद
- 1:12:09कर मुझे और तुम मेरी शरण में आ जाओ।
- 1:12:13शरण में आने का मतलब तुम शीतल हो जा।
- 1:12:15रिलैक्स योरसेल्फ इन माइ फिट तो कहीं भी तुम समर्पित हो जाओ, वहाँ
- 1:12:25तुम्हें क्लिंगिंगनेस छोड़नी पड़ेगी और मात्र यही है फारूला
- 1:12:31क्लिंगिंगनेस छूटी। तो तुम भी गए कान से और कृष्ण
- 1:12:38बड़ी अच्छी तरह जानता है, बात तो क्लिंगनेस की है तुम्हारी चिपकाहट
- 1:12:46अगर तुमने छोड़ दी फिर तू क्या और मैं क्या पर फिर तो एक रह जाता
- 1:12:53है। जिससे अद्वैत कह लो या एक कह लो
- 1:12:59एक हो अहम् द्वितीय नमस्ते अद्वैत कह लो अहम् ब्रह्मास्मा कह लो कुछ
- 1:13:07भी कह लो, बस एक बजता है बाबा नानक का एक ओंकार कह लो।
- 1:13:13शब्दों की उलट उलट है। इसमें तत्व वही है।
- 1:13:18मतलब वही तो दिन में ब्रह्ममूर्त यानी जग जाओ।
- 1:13:25जब अब तुम शक्ति से भरे हुए हैं, ओतप्रोत हो तभी बैठ जाओ।
- 1:13:33घटना घट जाएगी, धीरे धीरे भीतर जाओगे और वो शक्ति की जरूरत है।
- 1:13:42अब तो तुम लबालब भरे पड़ेगा। राह बात और थे।
- 1:13:51रात गयी बात गयी, अब तुम शक्ति से उत्पन्न हो अब तुम भीतर उतर सकते
- 1:13:59हो तो अब तुम रिलैक्स हो जाओ, अपने आपको छोड़ दो।
- 1:14:07सर्वधर्माण प्रतिज्ञाम एका मिश्रणम वृक्ष।
- 1:14:11कृष्ण कहते हैं कि यह धर्म तुम्हारी कृंगन से तुम्हारी
- 1:14:14चिपकाट इनको छोड़ दो सभी मान्यताओं को छोड़ दो क्योंकि वो
- 1:14:22तुम्हारी चिपकाट है। सभी चपकाहटों को छोड़कर मात्र
- 1:14:28मेरे ही शरण में आजा एक शरण में आजा मेरी अनन्या चिंतन तो माँ ये
- 1:14:34जन परियोपास थे अन्य भाव से तुम मेरे ही शरण में आजा सभी चपकाहटों
- 1:14:43को छोड़ दे। तो क्या होगा?
- 1:14:50जब चिपकाहटें टूट जाएंगी तो क्या होगा?
- 1:14:53तुम जानते हो तुम लुढ़कने शुरू हो जाओगे भीतर जब पकड़ छोड़ देते हो
- 1:14:59दसवीं मंजिल पर तुम। और तुम्हारे हाथ में जो कुछ भी है
- 1:15:03वो नीचे गिरना शुरू हो जाता है। ग्रैविटेशनल फोर्स उसको अपनी तरफ
- 1:15:07खींच लेती है। वो परमात्मा बहुत बड़ा
- 1:15:10ग्रैविटेशनल फोर्स है। उसके मुकाबले में धरती तो खुश भी
- 1:15:16नहीं है। वह तो सारे समूह का संरक्षण है।
- 1:15:22संगरचना उसने की वह कितना बड़ा चुम्बक होगा ज़रा छोड़ो तो उसके
- 1:15:28चरणों में अपने आप को म एकं शरणं वृक्ष।
- 1:15:38मुझे एक ही क्षण में आजा सब चिपकाहटों को छोड़ दो एक बात
- 1:15:43ध्यान में रखना सब चिपकाहटों का मत लो, जो पार्थिव शरीर अपने मुख
- 1:15:51से तुम्हें बता रहा है उसको भी छोड़ देना।
- 1:15:58गुरु की चपकाहट भी ना रह जाए, अगर कोई चपकाहट रह गई तो वो तो चपकाहट
- 1:16:06है फिर वो बाधा बनेगा। और वो तुम्हारी मुक्ति के भीतर
- 1:16:14बाधा बनेगी। तुम आजाद न हो पाओगे और बंधन तो
- 1:16:20बंधन होता है। आँख में अगर कंकड़ छोटा सा कण भी
- 1:16:24पढ़ जाए तो भी तुम न देख सकोगे और बड़ा पत्थर पढ़ जाए तो भी न देख
- 1:16:30सकोगे। बात तो ही।
- 1:16:33जब काटे सब प्रकार से ही छोड़नी है और गुरु को भी छोड़ देना है,
- 1:16:38यद भी मुश्किल लगेगा, लेकिन हिम्मत जुटा के छोड़ देना है और
- 1:16:47फिर तुम धीरे धीरे धीरे धीरे मुझे लोग पूछ लेते हैं।
- 1:16:53बाबा सब छोड़ दिया तेरे चरणों का प्यार नहीं छोड़ पाते, मैंने कहा
- 1:17:01फिर यही बंधन बन जाएगा, ये भी छोड़ दो आज हूँ।
- 1:17:09कल नहीं होऊंगा फिर भी तो छोड़ना पड़ेगा तो अभी छोड़ दे अभी छोड़
- 1:17:23देना उचित रहेगा सब छोड़ छाड़ के एनर्जी से बरफोर ये मेरा
- 1:17:33सिद्धांत। मूल सिद्धांत या आदर करो।
- 1:17:37ये फॉर्मूलेशन पूरे तरो ताज़ा हो जाना है।
- 1:17:45सब छोड़ देना है, तरो ताज़ा होगा और तुम भीतर खिसकने लगोगे, सारी
- 1:17:52मान्यताओं को क्लिंगनेस को छोड़कर।
- 1:17:57और फिर अष्टावकर कहते हैं कि तुम वहाँ पहुँच जाओगे जहाँ जन्मो
- 1:18:04जन्मो से तुम नहीं पहुंचे, और फिर तुम पाओगे, मैं तो सदा से वो ही
- 1:18:13हूँ। जो पहले था वो ही आज भी कहीं गया
- 1:18:24नहीं, दादू दूजा को नहीं। ये अंतिम शब्द है दो जी मन की
- 1:18:30दौड़ ये मन दौड़ रहा था। और तुम उस दौड़ के संग हो लिए थे,
- 1:18:38तो तुम भी वहीं चले गए थे जहाँ तुम्हारा मन चला गया, दादू दूजा
- 1:18:44को नहीं दूजी मन की दौड़ दौड़ गई, शम से गया।
- 1:18:52ठहरना शुरू हो गया। दौड़ मिट गई तो सन से भी मिट गया
- 1:18:58वस्तु ठोर की ठोर जीसको ढूंढ रहे हो वो तो ठोर की ठोर है, वहीं
- 1:19:04बैठा है कभी गिरा भी है रोज़ संत कहते हैं तुम हो, निर्लेप हो।
- 1:19:11कहीं गए नहीं आना जाना होता ही नहीं, बस तुम ही भागे तुम्हें
- 1:19:21दुनिया भागती दिख रही जैसे तुम गाड़ी में बैठे तुम्हें वृक्ष
- 1:19:26भागते दिख रहे जमीन भागती दिख रही चाँद तारिक आसमान भागता दिख रहा
- 1:19:30है लेकिन वास्तव में कौन भाग रहा है?
- 1:19:34वास्तव में तो तुम भाग रहे है जीस यंत्र पे बैठी हो वो भाग रहा उसके
- 1:19:40साथ तुम भाग रहे तो मन भाग रहा मन के ऊपर सवार हो तुम तो तुम भाग
- 1:19:46रहे। और तुम्हें दुनिया भागती हुई
- 1:19:49दिखती है। यही अजूबा है, तो संत कहती हैं,
- 1:19:57इस भ्रम को तोड़ दो, इसलिए मैं कहता हूँ यह भ्रम तोड़ दो, यह है
- 1:20:04नहीं दिखता है। संसार को मथ्या कहने वालों, टक्कर
- 1:20:16मार के देखो लोगों निकलेगा, दर्द होगा इसीलिए मैंने कन्या सूत्र
- 1:20:23दिया ब्रह्म सत्यम ब्रह्म तो सत्य जगत सत्यम ब्रह्म मिथ्या।
- 1:20:30यह ब्रह्म मिथ्या है। जब तुम गाड़ी के ऊपर सवार हो जाते
- 1:20:33हो, मन के ऊपर सवार हो जाते हो तो तुम्हें वृक्ष भागते हुए रखते हो।
- 1:20:38क्या वृक्ष वाकई भागते हैं? क्या धरती, आसमान, तारे यह
- 1:20:44वातावरण सब भागता है? नहीं भागता है तो भागता कौन तुम?
- 1:20:51यह मिथ्या है। बस तो कोई भी नहीं भाग रहा था ना
- 1:20:57तुम भाग रहे थे तुम भी आराम से बैठे थे, तुम भी आराम से बैठे थे,
- 1:21:04ना पेड़ भाग रहे थे, ना चाँद तारे भाग रहे थे ना जमीन भाग रही थी।
- 1:21:10लेकिन भागता हुआ दिखाई पड़ता था। यह क्या था?
- 1:21:14यह भ्रम था, यह गलत था, इसको तोड़ दो, बस मैं यह कहता हूँ ब्रह्म,
- 1:21:23सत्यम, जगत सत्यम इस सब पॉलिसी ने हजारों मारे।
- 1:21:30शंकराचार्य तो वारसौ साल पहले भूर गए, हजारों लोगों के घर उजाड़ दिए
- 1:21:36इसने ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या जगत कैसे मिथ्या यह कमाल है जगत
- 1:21:44मिथ्या तो ये बीपी हाईलो होता है। ये ब्रेन हेमरेज हो जाता है तो
- 1:21:49क्यों जाते हो? फिर ये क्लॉट को निकलवाने के लिए
- 1:21:56फिर एम्स क्यों ज्यादा आता है? फिर अपोलो क्यों ज्यादा आता है?
- 1:22:03अगर जगत मिथ्या है। तो मैंने एक बड़ा सुरक्षित
- 1:22:12सिद्धांत दिया। ब्रह्म, सत्यम, जगत सत्यम ब्रह्म
- 1:22:17तो सत्य वो तो कहीं जाता नहीं, तुम पाओगे भीतर जाके, वो कभी नहीं
- 1:22:22कहीं गया। दौड़ मिटी दौड़ था, तुम दौड़ रहे
- 1:22:29थे, गाड़ी के साथ दौड़ मिटी, संशय गया वस्तु ठोर के ठोर वस्तु तो
- 1:22:37वहीं है, जीसको ढूंढ रहे है वो तो वहीं है, वो भी वहीं है।
- 1:22:43पर दौड़ कौन रहा था, दौड़ कौन रहा था?
- 1:22:49बताओ दौड़ मिथ्या थी, दौड़ भ्रम था ये, भागते हुए वृक्ष ये चाँद
- 1:22:58तारे, ये धरती ये स्टेशन। भाग रहे थे।
- 1:23:02देखते है ना देखते है ना बस ये भ्रम है ये है गलत है ये है नहीं
- 1:23:10दौड़ रहे थे भाई सत्य तो ये है और तुम अपने भीतर चले जाओगे।
- 1:23:19जागृति में, पूरी शक्ति सम्पन्नता में अगर तुम वो ही क्रिया कर लो
- 1:23:29जो रात में नींद के वक्त तुम्हें प्रकृति सिखाती है।
- 1:23:33कंप्लीट्ली रिलैक्स यूरसेल्फ तो तुम ध्यान के उन।
- 1:23:38अतल गहराइयों में पहुँच जाओगे एंड जहाँ मा लिख तेरे अंदर वस दा मा
- 1:23:52लिख तेरे अंदर वस दा। तैनु नजर न आवे 10 की की ता ज
- 1:24:04मालिक तेरे अंदर बस दा तैनु नजर न आवे 10 की की ता ज।
- 1:24:17मालिक तुम्हारे भीतर है, तुम जाके देख लो, बिल्कुल है मिलेगा कैसे
- 1:24:26मिलेगा तुम्हें सारी तकनीक बताती क्यों नहीं मिलता रात को वो भी
- 1:24:29बदला दिया बाकी काम तुम्हारा है। हम बोल चले, तुम इसे सुरक्षित
- 1:24:39रखना बिलकुल मिलेगा बात समझ की है।
- 1:24:52समझ ही तो नहीं आती भोग कर भी दुख झेल कर भी वह कि कहाँ आता है अगर
- 1:25:01तुम समझ जाओ के भोगों में सुख नहीं तो फिर भोगने की आवश्यकता
- 1:25:08नहीं। राधे राधे, राधे राधे।
- 1:25:28राधे राधे श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हर राधे राधे श्याम मिला
- 1:25:45दे। गोबिंदा गोपाल हर मेरी नैया आर
- 1:25:54लगा दे गोबिंदा गोपाल हर राधे राधे।
- 1:26:06शाम मिला दे गोविंद गोपाल हरे राधे राधे शाम मिला दे गोविंद
- 1:26:22गोपाल हरे। ओह, धन्यवाद।