Latest / Baba ji Vijay Vats / 23 Nov 25 - यह वीडियो राजनीति और अध्यात्म! दोनों के हर रहस्य का परदा खोल देगी! Important Video! Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:10प्रणाम बाबा जी आपने जीवन को जीने के दो तरीके
- 0:28बताये। पहला भोग लो, दूसरा स्वयं को जान
- 0:43लो, उनमें से ज्यादा बढ़िया तरीका कौन सा आप गलत समझ गए बेटा?
- 1:06दो तरीके नहीं एक ही तरीका है भोग लो भोग से वैराग्य उत्पन्न होगा,
- 1:25वैराग्य से मुक्ति की काम न उठेगी।
- 1:33ऑर नेसेसिटी? इस दी मदरफ इन्वेंशन जब भीतर से
- 1:42उबाल आएगा मुक्त होने का तो तुम मुक्त होने के साधन जुटा लोगे और
- 1:51मुक्त हो जाओगे। दो तरीके नहीं के भोग लो या भोगो
- 2:02ना तो जाग जाओ नहीं, एक ही तरीका है।
- 2:14भोग लोग यहाँ से शुरू करना होगा। ईश्वर ने सृष्टि आपके भोगने के
- 2:23लिए बनाई है, धीरे धीरे धीरे धीरे।
- 2:33भौंकते जाओ, भौंकते जाओ तो भोग में आपको दुख मिलेगा, वह सुख जैसा
- 2:40लगेगा लेकिन उसका अंतः प्रणाम होगा।
- 2:47दुख। तष्टा वक्र कहते हैं कि भोग से
- 2:53मिलेगा दुःख तो शुरू तो भोग से हुआ ना जब तुम कोई झिड़ा छेड़
- 3:06लेते हो, झगड़ा कर लेते हो तो फिर दिमाग पर हो जाता है।
- 3:16झगड़ा आगे बढ़ाते हो झगड़ा बढ़ता ही जाता है फिर तुम थाना को उठ
- 3:23कचहरी करते हो। बड़ी मुसीबतें झरनी पड़ती हैं।
- 3:32फिर कोर्ट के चारे की तारीखें और आखिर में तुम थक हार के घर बैठ
- 3:38सकते हो। परिणाम तब मिलता है तुम्हें की
- 3:49झगड़ा करना व्यर्थ है लेकिन अगर तुम झगड़ा ही ना करता है।
- 4:01तो फिर तुम्हें परिणाम भी नहीं मिलना था कि झगड़ा करना व्यर्थ
- 4:05है, संसार व्यर्थ है। यह निष्कर्ष संसार को भोगने के
- 4:16उपरांत करता है। इसलिए जो कहते हैं कि भोग में
- 4:26आनंद है वो ठीक कहते हैं। मैंने कल भी कहा था भोग में।
- 4:42आनंद का वो कलश दूर से निहारा जाता है।
- 4:47यहाँ से शुरुआत होती है तुम भी शुरुआत यही से करना।
- 5:00फिर जब भोग बुद्ध की तरह दुख जैसा लगने लगे तो तुम भोगों को लात मर
- 5:09के भाग जाओगे। और ऐसे भागों के चोरों की भांति
- 5:13भागोगे जैसे वो चोरों की भांति रात को एक छोटा सा प्रश्न और बीच
- 5:26में लेले बाबा आप अपना पीएम का डिक्लेर करोगे?
- 5:3524 तारीख को? या उसके बाद एक दो व्यक्ति मेरे
- 5:46निगाह में आए, उन्होंने इंकार कर दिया ये जानते हुए भी।
- 6:02कि मैं उन्हें पीएम की गद्दी तक पहुंचा सकता हूँ, बखूब भी वो
- 6:07जानते हैं लेकिन इनकार कर दिया। वो समझदार थे।
- 6:21मैंने गधे से पूछा, हमारी चाय की दुकान थी या चाय वाले खतरनाक होते
- 6:28हैं? ख्याल रखा हमारी चाय की दुकान थी,
- 6:33पिताजी दुकान करते थे। ये सच में है, झूठ नहीं।
- 6:37गाँधी चौक के पास हमारी दुकान थी। बहुत वर्षों तक मेरे पिताजी और
- 6:42मेरे बड़े भाई और मैं भी दुकान पे कभी कभी बैठ जाया करता था तो वह
- 6:51सा जी डरे एक रेडियो वाला कुम्हार।
- 6:59आता है, हमारी दुकान के सामने रुक जाता है और बात गौर से सुन ये जो
- 7:07चाय बनाती है चाय छालनी पत्ती से भर जाती है छानते छानते छानते।
- 7:21फिर वह पत्ती को एक डालडा घी की पीपी के अंदर हम जोड़तें रहते
- 7:27हैं। छाड़नी खाली हो जाती है, नए सिरे
- 7:33से फिर छाड़ना शुरू कर देते हैं। सारे दिन चाय बनती रहती है।
- 7:38और सांझ तक वह डालडागी की चार किलो की पीपी भर जाती पूरी और
- 7:49देखिये मैंने खा कर तो नहीं देखी है लेकिन गधे ने जरूर खाई।
- 7:58गधा वहाँ ठहर जाता और गधा बड़े मज़े से हुंकार भरता, मैंने सोचा
- 8:10सारे दिन गधा काम करता है। और सारे दिन उसके चेहरे के ऊपर 12
- 8:21बजकर 3.75 मिनट होते हैं। यहाँ आकर वो खुश दवाई करता है,
- 8:27हुंकार भरता है, कारण क्या है? मुझे समझ नहीं आया बरसों तक फिर
- 8:38मैंने 1 दिन कुमार से ही पूछ लिया, मैंने कहा भाई रेड्डी वाले,
- 8:44ये गधा इतना प्रसन्न क्यों होता है?
- 8:46जामर के। कहता भाई क्या बताऊँ आपको नहीं
- 8:58पता, हमें भी नहीं पता लेकिन इस चाय पत्ती में सारे दिन तुम चाय
- 9:04बनाते हो तो ये चाय पत्ती बहुत मीठी होती है, स्वादिष्ट होती है।
- 9:13इसलिए चाय पत्ती का सारे दिन इंतजार करता रहता है जगद और इसी
- 9:19शोक में काम करता रहता है। मैंने इसकी नब्ज़ पकड़ ली।
- 9:28पहले ये काम नहीं करता था। हंटर मार्क में पड़ता था।
- 9:34डंडे चलाने पड़ते थे। फिर भाग तक अब मुझे फार्मूला पता
- 9:39चल गया। सांज ढले मैं आपकी दुकान के सामने
- 9:44इसे चार किलो की बीपी डाल डाली थी।
- 9:49भरी चाय पत्ती की मीठी होती है, सारी खा जाता हूँ उसके बाद इसको
- 9:56दाना वाना जो खिलाना वो खिला देता है।
- 10:02मतलब सारे दिन इसी शोक में। कि शाम को चायपत्ती मिलेंगे।
- 10:08मिट्ठी और गद्दे को तो पता नहीं यह क्या है, लेकिन इतना पता है कि
- 10:17मीठी है और स्वाद है सीटीसी की चाय पर देते हैं।
- 10:28पिताजी बहुत ही ईमानदार व्यक्ति थे, तो बड़े मज़े से खाता सारी चट
- 10:35कर जाता। मैंने उस गधे से कहा।
- 10:46अरे भाई उसने कान मेरी तरफ किया। मैंने कहा पीएम बनना है क्यों?
- 11:01अरे पीएम, प्राइम मिनिस्टर। मैंने कहती हूँ मैं गधों की भाषा
- 11:09को समझता हूँ। वो कहते हैं इतना बोझा काफी है,
- 11:16इससे ज्यादा बोझा मैं सहन नहीं कर सकता।
- 11:25उसने मुझे समझाया कि कितना भी गदा हो उसे इतना तो पता होता है कि
- 11:34मेरे से बड़े गदे भी बैठे हैं दिल्ली में और पार्लियामेंट हाउस
- 11:41की अगवाई कर रहे हैं। जिससे व्यक्ति को भी ये समझाई
- 11:47जाती है। सारे देश का भार क्यों उठाना वह
- 12:00छोड़ देता है सब कुछ? उसमें वैराग्य की उत्पत्ति होती
- 12:08है फिर वो मुक्ति की चाह में निकल जाता है।
- 12:15गधे को भी पता है कि इससे ज्यादा वो झा मैं सहन नहीं कर सकूँ।
- 12:23मुझे आपने कितनी बार कहा हुआ होगा?
- 12:26आप कृपा कर दीजिए। वैसे भी तो जल समाधि लेने चले थे,
- 12:37अब रुक ही गए हो तो ये काम करके जाइए।
- 12:43मैंने कहा भाई देखो। आपको पता ही है शरीर कमजोर है,
- 12:53वृद्ध भी है। 13 बरसों से चला तो मैं कोई ऐसा।
- 13:04व्यक्ति चुनूंगा, जो ईमानदार भी हो, न्यायकारी भी हो और इस भार को
- 13:13देश के वार को भी उठा सकते हैं। ये बोझा ढोना मेरे बस का काम नहीं
- 13:20है। अनंत जीवनों में इतने बोझे ढोए की
- 13:31इस भार को पटक दो प्राणों का रोमा रोमा चलाने लगा।
- 13:38बोलने लगा इस भार को पटक दो, निर्भर हो जाओ।
- 13:46और आखिरकार इस ज़िन्दगी में मैंने ये बोझा पटक दिया और फिर से तुम
- 13:55लाख कहो मैं ये भोजन नहीं उठा सकूंगा।
- 14:02अब उन लोगों की जरूरत है। जो बोझा उठाने में सक्षम हैं और
- 14:11जो बोझा उठाने को तत्पर है। देखिए मैं इन लोगों को गधा नहीं
- 14:21देता हूँ। यह भी एक प्रकार की देश सेवा है
- 14:30अगर तुमने काम ही करना है अगर तो तुमने संयुक्त हो जाना है बुद्ध
- 14:38की तरह। किन्हीं पर्वतों के किन वृक्षों
- 14:45की इच्छाओं में तुमने बैठ जाना है करना धरना सब छोड़ देना है अपने
- 14:57भीतर उतर जाना है। और उस स्तर पर चला जाना जहाँ कोई
- 15:06बोझ नहीं जहाँ कोई रोग नहीं जहाँ कोई कष्ट करेश तूफान, चिंता,
- 15:13तनाव, कुछ भी नहीं कोई कलहर। फिर हुई एक बात दूसरी बात यह कि
- 15:31अभी आप अगर कुछ भी करना चाहते हो, अभी तमन्ना भरी नहीं।
- 15:43तो दबाना मत तमन्नाओं, को दबाना सबसे बुरा काम है दबाने से अच्छा
- 15:58खूब च रोग हो जाए। हैलो इकबाल, फिर से अजनबी बन जाए
- 16:21हम लोग? चलो एक बार तारफ रोग हो जाए तो
- 16:38उसको। बोलना बेहतर तालुक, वो जीवन जाए
- 16:54तो उसको छोड़ना अच्छा। वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न
- 17:08हो मुमकिन वो अफसाना जिसे अंजाम तक।
- 17:19लाना न हो मोमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।
- 17:37चलो इकबार, चलो इकबार फिर से अजनबी बन जाएं हमलों चलो इकबार।
- 17:59अगर तो संनिष्ट होना है रिटायरमेंट के बाद बुद्ध के मार्ग
- 18:08पर चलना और अंत की तलाश करना। अगर तो बात ही जुदा है, वो तो शुभ
- 18:16है। लेकिन अगर अभी मन भरा नहीं, तो
- 18:27फिर मैं आमंत्रित करूँगा उस सज्जन को और फिर उसके बाद मैं प्रयास
- 18:39करूँगा। कि क्या आप ये दायित्व संभल सकते
- 18:47हैं? देखिए अबोजा है बड़ा अब एक शब्द
- 18:52सुन लीजिए, जिसने काम करना है उसके लिए अबोजा है जिसने जाकट में
- 18:59हाथ डालकर फिरना है। उसके लिए मौज है, शोक है, हिटलर
- 19:06के लिए आदमियों को मारना शोक है और गाँधी के लिए देश को आजाद
- 19:14कराना एक कर्तव्य है, दायित्व है। उसकी एवरेज में गाँधी कुछ मांगते
- 19:22नहीं थे। बड़े कमेंट होते हैं, मुझ पर
- 19:31गालियाँ तक लोग निकाल देते हैं लेकिन वो गालियाँ मुझे बड़ी अच्छी
- 19:38लगती हैं। इसलिए मैं तुम से कहता हूँ किता
- 19:49भी कोई गाली निकालता है देश और प्रेमी व्यक्ति।
- 19:57देशप्रेमकर्ता ही रहेगा, अपने कर्तव्य को निर्वहन करता ही
- 20:04रहेगा। अगर कुछ करना चाहते हो, बोझा
- 20:15उठाना चाहते हो तो कुछ भी करो, मैं बोलता हूँ।
- 20:25लेकिन बोलना मेरे लिए बोझ नहीं है।
- 20:32जैसे गाँधी को देश को आजाद करना बोझ नहीं था, कर्तव्य था, निष्ठा
- 20:39थी। और चाहत न थी, कोई लोभ न था और
- 20:46परिणाम हमारे सामने आया। देश आजाद हुआ।
- 20:52गाँधी नवखली में कोहे टूटे हुए स्लीपर डालकर अपनी लाठी के साथ
- 20:58अकेले चल रहे थे। उनके साथ कोई नहीं।
- 21:04लेकिन यह कोई बात दुःख के नहीं। गाँधी ऐसा चाहते थे कर्तव्य पूरा
- 21:13होने के बाद मैं अपनी कुटिया में बैठ जाऊं।
- 21:25राज़ करना मेरा लक्षण ही सेवा करना मेरा कर्तव्य था जितनी हो
- 21:31सकी की जिसने गाली निकाली निकाल नी गाली निकाल जिसने मूर्ति
- 21:39बनानी। मूर्ति बना लो, हम अपना कर्तव्य
- 21:48निभाए चले अब गाँधी मरने के इंतजार में थे, ये तो बला हो कौन
- 21:59से का अगर गाँधी को बोली एकल की होती?
- 22:04तो गाँधी क्या देते हैं, इससे माफ़ कर दो लेकिन गोडसे के भी दिन
- 22:11खराब थे। तीन गोली से वो मर गए।
- 22:19पहले भी बहुत बार आठ बार अटैक हो गए।
- 22:22गाँधी। दक्षिण अफ्रीका के अंदर भी
- 22:27उन्होंने नस्ली भेद खत्म करने का पूरा प्रयास किया।
- 22:33जीवन भर संघर्ष करते रहे और संघर्ष करने के लिए अपनी बैरिस्टर
- 22:39की वकालत की। पैर वाइफ ही छोड़ दी।
- 22:45बहुत अच्छी बकारी चलती थी यहाँ आ गए भरी सर्दी में दिसंबर जनवरी की
- 22:53ठंडी रात थी और उनके पास होती थी वही एक दो थी।
- 23:00कई बार गाली निकालने वालों से मैं कहता हूँ कि तुम जनवरी दिसंबर की
- 23:06एक रात इस ठंडी में गुजार के दिखा दो।
- 23:10गाँधी के कपड़ों में तो गाँधी को गाली निकालने का हक तुम अर्जुन कर
- 23:17लोगे। तुम तो 1 दिन भूखा रह लेते हो तो
- 23:23सुनाते हो कि मैंने व्रत रखा है, उपवास किया है।
- 23:32यहाँ मैं 13 वर्ष से उपवास कर रहा हूँ।
- 23:37लेकिन उपवास का अर्थ भूकंप भरना है।
- 23:41उपवास का अर्थ है उपवास अपने स्वयं के पास वास कर लेना, फिर
- 23:48अपने स्वयं के पास वास करने से परिणाम जो आते हैं, उन्हें मैं
- 23:55रोक नहीं सकता। आनंद आता है, खुमार आता है मो
- 24:00जाती है सरूर आता है मद होशी की अवस्था आती मद मस्ती की अवस्था
- 24:09आती फिर मैं उसको पीता हूँ। उपवास रखने का मतलब आप कुछ भी
- 24:16निकाल रहे है लेकिन उपवास का से ही मतलब ये है अपनी आत्मा के पास
- 24:23वास करना है जब तुम अपनी आत्मा के पास वास कर लोगे जो तुम वास्तव
- 24:31में हो। अभी तो तुम बात किये हो तुम्हारी
- 24:36मान्यताओं के साथ मैं शरीर हूँ मैं विचार हूँ, मैं भावना हूँ ये
- 24:45धन, मेरा ये पदवी मेरी। ये धनमाल खजाना मेरा ये मित्र,
- 24:56मेरे ये बंधु मेरे ये पुत्र पोतरा आदि ये सब मेरे तो समझो अभी तुमने
- 25:05अपने पास वास नहीं किया, तुम भूखों मरे मैं?
- 25:12ऐसा ही गाँधी क्योंकि अज्ञानी थे। अभी ज्ञान के वो झलक न मिली थी
- 25:18इसलिए भूखों मरे बीसों दिन तक भूखे मरे और बहुत बार भूखों मरे।
- 25:26उन्हें मारने की चेष्टा हुई, लेकिन भीतर से सच्चे अहिंसक।
- 25:33उन्होंने सदा ही कहा इस अपराधी को छोड़ दो क्योंकि इसको दंड देने से
- 25:40कुछ भी नहीं होगा और उसको छोड़ दिया जाता था, नहीं तो गौर से का,
- 25:50बेचारे का। उसकी माता ने उसके शव पर विलाप
- 25:55करना था तो गॉड से की तकदीर बुरी निकली।
- 26:02अन्यथा गाँधी को एक गोली भी न मारता।
- 26:06गाँधी को वैसे ही कह देता था भाई तुम अनशन मत करो, यहाँ बैठ जाओ।
- 26:10चुपके से देश आज़ाद हो गया, ठीक है तुमने कुछ ना तो सत्ता समझली
- 26:15नाराज करना तो गाँधी इतना सा कहने से छोड़ दे गोली एक भी मारने की
- 26:24आवश्यकता नहीं थी और उस बूढ़े। 78 साल जो इतना दुर्बल, निर्बल हो
- 26:37गया है, दो कंधों का सहारा चाहिए उसे चलने के लिए।
- 26:46लेकिन गोडसे के बुरा दिन आ गया था।
- 26:50गाँधी का बुरा दिन। उसने 123 गोली मार दी जो समझदार
- 27:00थे वो भाग गए। सारी आफत ग्रीक और से के ऊपर तो
- 27:08गधे से मैंने पूछा कि पीएम बन? मैंने कहा भैया कारण क्योंकि मैं
- 27:17भी तो गला हूँ व्रत का बोझा ओढ़ें भरता हूँ बोझ में हूँ, आनंद में
- 27:27हूँ रसपान कर रहा हूँ रस खान। लेकिन क्या करूँ स्वामी चांदनी
- 27:41राजे हमें सोने? नहीं देती सुहाने चांदनी रातें
- 28:01हमें सोने नहीं देती तुम्हारे। प्यार की बातें हमें सोने नहीं
- 28:17देतीं सुहानी चंदिन रातें एक कर्तव्य।
- 28:33तुमने पाल लिया ये लटके हुए चेहरे, ये तपते हुए हृदय ये
- 28:44सुलगती हुई आत्मा। जाते जाते इनका भी कल्याण कर जाओ
- 28:53राहुल प्रबुद्ध हुए बुद्ध के पुत्र प्रबुद्ध होते ही प्रण जाति
- 29:03क्यों? इसीलिए?
- 29:08कि अभी बोलने वाला मेरा पिता है, बुद्ध बोल देना, उसके ही मार्ग पे
- 29:17चल के, मैंने अपना स्वय पाया तो मेरी अभी कोई आवश्यकता नहीं है तो
- 29:24वो चला गया। लेकिन जब मैं अपने कंधों पे बाहर
- 29:28देखता हूँ, मुझे भी लगता है जब मुझे दक्षिण अफ्रीका से
- 29:36गोपालकृष्ण गोखले का चिट्ठी गया। भाई आ जाओ, जिसके ऊपर उम्मीद थी
- 29:51वो गलत तरह पकड़ ली उसे 50 वर्ष की कालापानी के सजाव की अब
- 30:00रेहनुमाई करने के लिए कोई नहीं। तुम्हारी सख्त जरूरत है देश को
- 30:06तुम आ जाओ। गोपालकृष्ण गोखले उस वक्त
- 30:13कांग्रेस के अध्यक्ष थे। बड़े अमानदार व्यक्ति थे।
- 30:21कर्तव्यनिष्ठ और परिश्रम वहाँ से सब छोड़ छोड़ के ये होता है देश
- 30:31प्रेम अब तुम जाने के बाद गद्दार बोले चले जाओ, मैं तुम्हें ये
- 30:37भविष्यवाणी करता हूँ। आने वाले वक्त में कोई गाँधी पैदा
- 30:46नहीं होगा। कार मोहब्बत करने बालो का।
- 31:02जो अंजाम देखा है उसे देखा, मोहब्बत छोड़ दी मैंने।
- 31:21अगर निर्लोभी व्यक्ति जो सारी उम्र अपना बैरिस्ट्री का कोर्ट
- 31:26पेंट उतारकर फटे हुए स्लिप में डालकर मेहनत करता रहा, गलत मार्ग
- 31:37न उठाया। और जो काम करेगा वही गलती तो उससे
- 31:44होगी, जो काम नहीं करेगा, चरण चुम्बक बनेगा उससे गलती नहीं
- 31:51होगी, ये पक्का पक्का समझ लेना। गलती होगी, जो जितना वृहद काम
- 31:59करेगा उतनी बड़ी गलती होगी। इसलिए मैं कहता हूँ कि अगर जनता
- 32:09अकल को बागी हो जाए और इस सत्ता को उखाड़ फेंके।
- 32:20तो नए आने वाले व्यक्ति इन लोगों को दंडित मत करना, बस दो चार
- 32:30मास्टरमाइंड चुन लेना, बाकियों को वायदा माफ़ गुहा बना देना।
- 32:36समझा रहे हो की बात तुम्हे थोड़ी सी वकारत तो पूरे हो गए।
- 32:45जैसे हमारी जितनी लोकसभा जितनी विधानसभा सीट है।
- 32:53किस व्यक्ति ने उत्प्रेरक का काम किया, कैटेलिटिक एजेंट का काम
- 32:58किया, बस उनको चुन लेना, क्योंकि अगर वो न होते तो इतना गर्दोग बार
- 33:09न उठता। बाकी जनता को वायदा माफ़ गोआ बना
- 33:15लेना मैं ऐसा ही करूँगा अगर मुझे सही कर्तव्य, निष्ठ व्यक्ति,
- 33:29ईमानदार व्यक्ति मिल गया राज़ करने वाला मैं तुम्हारा भला चाहता
- 33:35हूँ। अध्यात्म में भी मैं तुम्हारा भला
- 33:37चाहता हूँ, इसलिए बोलता हूँ 5.5 वर्ष से लगातार बोल रहा हूँ रोज़
- 33:48और जब तक प्राण में प्राण है बोलता चला जाता हूँ।
- 33:59ऐसा व्यक्तियों का मिर्जा है तो अध्यात्म के अंदर जीतने भी कष्ट
- 34:06क्लेश थे। आपके मैंने उन सब अड़चनों को खत्म
- 34:11कर दिया, सही सही मार्गदर्शना आपका कर दिया।
- 34:17चलना तो आपने और जो दीक्षित लोग हैं उनको मैं पहले ही बता चुका
- 34:26हूँ। जीस तल पर भी आप हो जीस चक्कर में
- 34:30ब्याज बैठे हो मैं जब अंगूठा लगाता हूँ।
- 34:36तो आपको मैं विशुद्धि चक्र पे लिया विशुद्धि चक्र से आगे तुमने
- 34:41थोड़ी सी मेहनत करनी क्रिया योग करते रहो कुछ नए करने में यानी
- 34:50ध्यान में बैठते रहो। वीडियो निरंतर सुनते रहो।
- 34:55अगर किसी दिन मेरी वीडियो न आए तो पुरानी वीडियो बड़ी पड़ी है।
- 35:00मैं देखता हूँ एवरेज क्यूँ डोरशन आधे से भी कम बोलता हूँ 90 मिनट
- 35:10सुनी जाती है 3035 मिनट। तो पुरानी वीडियो को सुन लेना और
- 35:19वैसे भी अगर जिन्होंने सुन रखी है पुरानी वीडियो को वो सुनेंगे तो
- 35:24उन्हें कुछ पुराना नहीं लगेगा। हर बार तुम्हे कुछ नया मालूम
- 35:30पड़ेगा। तुम सुनकर देखो, दसियों बार
- 35:34सुनोगे दसियों बार अर्थ और होंगे। देखिये महा करुणा वश न कछु लेना,
- 35:54न कछु देना कबीरा मगन कबीरी में। लेकिन फिर भी कबीर कबीरी में मगन
- 36:04भी है और आपकी परवाह भी करता है कि कैसे आपके।
- 36:09ये लटके हुए मुखड़े गुलस्ता से झूम जाएं जीस आनंद का रस व्यालम
- 36:19मैं पी रहा हूँ वो तुम भी पीने लग जाओ क्योंकि यह होता है।
- 36:28बस जब तक मैंने पिया न था, तब तक मैं बोला न था, तब तक मैं बोल
- 36:36सकता न था आज मैंने पिया है लाख दुनिया प्रतिकार करें लाख नास्तक
- 36:46मार्कर्स नित से। चार वाक जैसे प्रतिरोध करें।
- 36:52लेकिन क्योंकि मैंने देखा है अपनी नग्न आँखों से, मैं तो बोलता ही
- 36:58जाऊंगा आपको सही मंजिल दिखाता ही जाऊंगा।
- 37:03ये अध्यात्म की बात मेरे बस की है।
- 37:08लेकिन राजनीति की बात मेरे बस की नहीं है।
- 37:12राजनीति में मैं आपको मार्गदर्शन कर सकता हूँ राजनीति में मैं आपको
- 37:19मार्गदर्शन कर सकता हूँ क्योंकि मैं खिलाड़ी हूँ।
- 37:24और मेरा सीधा कॉन्टैक्ट उस सर्वज्ञ के साथ है।
- 37:32कुछ ऐसे फॉर्मूले मुझे भगवान सेवा ने बताये।
- 37:38ये बरत लो जो तुम 20 सालों में न कर सके।
- 37:44वो 30 दिन में करोगे, तुम परिणाम आएगा देश के लिए बस एक बार की तुम
- 37:58कह देते हो बाबा तुम्हारी चैनल को सब्सक्राइब।
- 38:03कहाँ करें? वो ही चैनल है गोल्डन स्पैरो
- 38:11गोल्डन स्पैरो को आप सब्सक्राइब कर दो।
- 38:17जो भी नहीं सब नए व्यक्ति हो गए। पुराने व्यक्तियों में जो ईमानदार
- 38:24हैं जिनको उठने नहीं दिया गया, दबा दिया गया और कायरता के कारण
- 38:33या साहस न होने के कारण या भय के कारण देखिये, सभी व्यक्ति कान हैं
- 38:38मैं जानता हूँ। मैं किसी ईडी को किसी सीबीआइ को
- 38:46किसी आईटी को नहीं भेजूंगा। घर मैं जानता हूँ, सभी कहने हैं
- 38:51इस काने होने की वजह से ही तुम गुलाम हुए हो।
- 38:58मैं बेसिक कास को जान, इसलिए आने वाले उत्तराधिकारी जो होंगे गलती
- 39:09पर वो ज्यादा देर नहीं होगी, जल्दी ही आ जाएंगे।
- 39:20वो दंडित न कर क्योंकि इन्होंने लोभ वश या भय वश उन कुछ गिने चुने
- 39:30लोगों का दामन थामा जो सच में अपराध थी।
- 39:38इसलिए इनका कोई कसूर नहीं। बदहवासी के आलम में इन्होंने उसका
- 39:45दामन थान दिया। क्या करें?
- 39:48मजबूरी को? मैं अच्छी तरह से समझता हूँ तो
- 39:53उनको वायदा माफ़ गवा बना लेना। कुछ ही व्यक्ति ऐसे निकलेंगे कुछ
- 40:06ही व्यक्ति पूँजीपति निकलेंगे। कुछ ही व्यक्ति सियासत जहाँ
- 40:11निकलेंगे और इनकी संख्या कोई ज्यादा नहीं होगी।
- 40:17बस वायदा माफ़ गुआ बना के उन व्यक्तियों के नाम ले लेना पता तो
- 40:21मुझे भी एक एक व्यक्ति के अंत में जाके मैं सबको जानता हूँ।
- 40:42उनको माफ़ कर देना जो वायदा माफ़ गुवा बने और ये ईमानदारी से नाम
- 40:50बोले दंडित करना इनको लेकिन इतना दंडित मत करना के प्राण दंडित।
- 41:02फिर भी रहमों का क्योंकि बोझा ढोया है उपकार भी किया है देश को
- 41:11चलाया है देश का बोझा ढोया है। वह छोटी छोटी पाबंदियां इन पर लगा
- 41:20देना यह मेरी इच्छा है अगर काबिल व्यक्ति जो मेरी निगामी हैं
- 41:32उन्होंने मुझे कह दिया। येस?
- 41:38तो वह काम जो आप कहते हो, 70 साल वह काम मैं आपको 30 दिन में करके
- 41:49दिखाऊंगा, मैं नहीं बैठूंगा। मैं बैठ भी नहीं सकता, अति दुर्बल
- 41:58कंडीशन में है। बहुत लोगों को मैंने ये
- 42:02फॉर्मूलेशन बता दिया है। यह मेरे अकेले तक सीमित है।
- 42:13मेरे चले जाने की स्थिति में वो लोग आपको बताएंगे तो मैं चाहता
- 42:23हूँ राजनीतिक उधार भी तुम्हारा हो जाये क्योंकि यह 20 है।
- 42:29जिसके जीस देश के ऊपर बहुमंजिली इमारत खड़ी होनी है।
- 42:33जब देश भूखे वजन न होय गोपाल ये लो अपनी कंट्री माला मैं अच्छी
- 42:41तरह से जानता हूँ ऐसे ही पगला नहीं गया हूँ मैं।
- 42:48राजनीति में आने का कोई तात्पर्य न था और मैं राजनीति में आऊंगा भी
- 42:54नहीं। मैं सिर्फ आपको मार्गदर्शन
- 42:57करूँगा, जैसे पुरातन के गुरु, ऋषि, मुनि बाहर एकांत में अपनी
- 43:05झोंपड़ी में बैठते और राजा को जब कोई समस्या होती।
- 43:08वो चलकर उसके पास जाता। गुरु जी समस्या आ गई राज्य पर देश
- 43:14पर ये समस्या आ गई। आप बताओ क्या समाधान है?
- 43:17और क्योंकि वो व्यक्ति खाली मन के होते थे दूर दराटे बैठे हुए उनका
- 43:24अचेतन खाली होता था। और उनका सीधा संपर्क उस विशाल
- 43:33विराट के साथ होता था। वो सर्वज्ञति है।
- 43:39तब क्षण उसका हर बता देते थे कि तुम ऐसा कर रहे हो।
- 43:46राजा का चित्त भरम होता है, भरे हुए चित्त में वह सही फैसला नहीं
- 43:53ले सकता। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ,
- 43:59लेकिन इनका उपकार भी है। इतने वर्षों तक इन्होंने देश का
- 44:06बोझा भी ढोया। जब गधा तक तैयार हूँ कहता बस इतना
- 44:11बोझा बहुत है, इससे ज्यादा मैं बोझा नहीं सहन कर सकता।
- 44:19ये सिर्फ बात नहीं है आपको समझाने के लिए।
- 44:25इन्होंने भी गधों की तरह भारत हुआ कितनी बेईमानियां शतरंज बिठाये
- 44:33मोहरे इधर उधर किए जीत गए सारा देश जीत जाएंगे विलासक।
- 44:42बेईमानी से देश जीता जा सकता है। ₹5.47 रोज़ के तुम बिक जाओगे
- 44:5380,00,00,000 जनता। ₹5.47 रोज़ के ₹10,000 ₹5000 ये
- 45:06फॉर्मूलेशन है, कमजोरी पकड़ लो दुखती रग दबा लो, वो चलाएगा और जब
- 45:18चलाएगा तो छोड़ दो। यह है पटेल का फॉर्मूलेशन और
- 45:27मैंने पटेल को बताया था दुखती रक्को दबाओ सही रक्को में दबाओ
- 45:35चलाएगा नहीं। दुखती रखो, दबाओ फिर वो चलाएगा
- 45:41चिल्लाएगा तो छोड़ दो फिर उससे पूछो बोलो फिर दमन वो कहेगा ये
- 45:49कैसी बात होती है, सारी दुनिया को भी जीत लोगे?
- 45:56तो ध्यान रखो बुद्ध पागल नहीं जो भरे पूरे साम्राज्य को हीरे मोती
- 46:05ज्वार से युक्त कपिल अवस्थी को सुबोधन को यह शोधरा को, राहुल को।
- 46:15छोड़कर चले जाते हैं। बिल्कुल कतई बादल नहीं हैं।
- 46:23कहीं ज्यादा समयदार हैं आम व्यक्ति आखिर में सभी के साथ ऐसा
- 46:31होता है। मैं कहता हूँ वो उसे शुरू करना।
- 46:35और जब भोग तुम्हारे लिए दुख का कारण बन जाए बस ये ये है फल भोग
- 46:44से कभी कोई सुखी हुआ है यह सृष्टि का नियम जो मैंने सृष्टि बनाई मैं
- 46:50जानता हूँ। भोग से तुम्हें सुख नहीं मिलेगा।
- 46:57अंततः भोग तुम्हें दुख में ले जाना मन इसी कारण भोगों की तरफ
- 47:07आकर्षित होता है कि उसे गलतफहमी है कि भोग से सुख मिलेगा।
- 47:15लेकिन यथार्थ ये है कि भोग में सुखोतर संत तुम्हारे से ज्यादा
- 47:23समझदार है, इसलिए संत बाहर चले जाते हैं।
- 47:30तुम्हारी आबादियों को छोड़कर। तुम्हारी आसानी लासानी तरंगों को
- 47:36छोड़कर बाहर चले जाते हैं, कोई स्वाद नहीं लेते, कोई संसार की
- 47:48सैर नहीं करते। और अगर सैर कर भी लोग गए सब कुछ
- 47:56संसार का खा पी लोगे, भोग लोगे तो तुम्हें पता नहीं होगा इस शरीर
- 48:04में शरीर तुम हो नहीं। संत ज्यादा समझदार है, जिसने होगा
- 48:12वो तुम हो नहीं यह स्केट हो जाएगा, विखंडित हो जाएगा, 1 दिन
- 48:19वो आज हो जाएगा वो 2030 50 साल बाद हो जाए तो संत साझेदारी से
- 48:28काम लेता। जो कल मौत छिड़वा लेगी उसे
- 48:33समझदारी यही है कि आज अपने होशों हवास में छोड़ दो तो मैंने आपको
- 48:44अध्यात्म की तरफ पूर्ण ईमानदारी और श अनुभव से।
- 48:52जो यथार्थ का रस पिया वो आपको बताएगा अगर आप इस पर चलोगे आप भी
- 48:59यथार्थ का रस पियोगे इसके लिए मैं जिम्मेदार हूँ।
- 49:04यह मानस जन्म की अंतिम उपलब्धि है।
- 49:11प्रेम रस प्रेम रस को कोन नहीं पीना चाहता।
- 49:20हर व्यक्ति प्रेम रस को पीना चाहता है।
- 49:24उन्नास्ती को हो वास्तव को। आपको पता नहीं नीच से बहुत बड़ा
- 49:30नास्तिक था और सबसे बड़ा प्रेमी था तुमने शायद उसकी बायोग्राफी
- 49:37पड़ी ही नहीं। मैं अच्छी तरह से उसकी बायोग्राफी
- 49:40को जानता हूँ। नीच से बहुत बड़ा प्रेमी था लैला
- 49:46मजनू जैसा। शहरी फरियाद जैसा सोनी मेहवाल
- 49:52जैसा हिरलांजे जैसा निस्से बहुत बड़ा प्रेमी था, लेकिन नास्तिक
- 50:00था, नास्तिक खोपड़ी होती है, आस्तिक भी खोपड़ी होती है।
- 50:06प्रेमी होता है हृदय हृदय से निकलता है।
- 50:09प्रेम हृदय जब अटैच होता है अपने अंत से तो वह प्रेम का ईंधन अपने
- 50:16साथ ले आता और खोपड़ी को लूटा देता।
- 50:19ये सारी प्रोसेसर है, हृदय से आता है प्रेम।
- 50:26और हृदय की अपनी पैदाइश नहीं है। प्रेम हृदय भीतर उतरता अंत में
- 50:33प्रेम बिखरा पड़ा। तुम प्रेम के समुद्रों को खजाना
- 50:38हृदय भीतर उतरता। उस प्रेम में डुबकी लगाता और गच
- 50:42मच हुआ बाहर आ जाता। फिर वो हृदय खोपड़ी को पिलाता रस
- 50:50और खोपड़ी दीवानी हो जाती उस रस को पिक।
- 50:59ये तुम्हारा आखिरी अंतिम लक्ष्य है।
- 51:02प्रेम रस पीना देखना, कहीं चौक न जाना, दूसरी बात पर कर लीजिये,
- 51:12लोग पूछ लेते हैं बाबा इतना अच्छा बोलते हो आप?
- 51:18हमें अपने अंतःस्थ तक पहुंचा देते हैं।
- 51:22बड़ी दो घड़ी के लिए हम उस रस को पी लेते हैं तो फिर ये क्यों?
- 51:29मैंने कहा ये भी जरूरी है भूखे वजन न होई गोपाल मैं तो न कर
- 51:36पाऊंगा। क्योंकि अभी मैं मूड न रहा अभी
- 51:41मैं मूर्ख न रहा किसी जमाने में मैं था अज्ञानी ही ज्ञानी बना
- 51:48करते हैं, मूर्ख ही बुद्धिमान हुआ करते हैं।
- 51:55तो किसी जमाने में मैं था, लेकिन बखूबी जनता के भूखे वजन नहीं
- 52:00होते। पेट तो भरना ही पड़ेगा इसलिए यह
- 52:09भावना करुणा की। अध्यात्म में भी पूर्णतय छा गई।
- 52:16सब कुछ बोल दिया और फिर इसका वेश अध्यात्म का है संसार क्योंकि तुम
- 52:24नास्तिक हो, आस्तिक हो, कुछ भी हो, भूख तो लगेंगी।
- 52:33आस्तिक कॉपी लगेंगी ना आस्तिक कॉपी लगेंगी, इसका इंतजाम करना
- 52:40जरूरी है। इसलिए इसका इंतजाम हो जाए जो
- 52:49इकट्ठा किए हैं। और धन कमा जाएंगे छोड़ने के लिए
- 53:01जो गद्दियाँ कमाई हैं वो कमाएंगे गद्दियाँ छोड़ने के लिए।
- 53:09कुछ लोग गद्दी पर ही ढेर हो जाते हैं, मर जाते हैं।
- 53:13शायद अगर मैं गलत नहीं हूँ तो हमारे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली
- 53:18अहमद अगर मैं गलती में नहीं हूँ तो वो गद्दी पर बैठे बैठे ही
- 53:26लुढ़ककर थे। राष्ट्रपति थे।
- 53:33लिखिए, प्रकृति तो अपना काम करेगा और प्रकृति मौत भी देगा।
- 53:41प्रकृति जन्म भी देगा। आप कितना ही ओहदा कमा लो, आप
- 53:46कितना ही धन कमा लो। एक नंबर के अमीर हो जाओ वर्ल्ड
- 53:50में या कि एक नंबर के कंगाल हो जाओ वर्ल्ड में इससे कोई फर्क
- 53:55नहीं पड़ता। प्रकृति अपना काम करेगी मृत्यु
- 53:58सभी को आती है, कंगाल को भी आती है राजा को भी आती है छः हिन चाहे
- 54:04आलम भी खाक हो जाते 1 दिन। इसलिए शमशान से बड़ा कब्रिस्तान
- 54:13से बड़ा समाजवादी और कोई है ही नहीं।
- 54:19वह कंगाल दरिद्र को भी राख कर देता।
- 54:23वह राजा शहनशाही आलम को भी राख कर देता, दोनों को राख कर देता बहुत
- 54:28बड़ा समाजवादी है। बहुत, बहुत समन्वयवादी है, समानता
- 54:34है। उसके घर में समझदार व्यक्ति इस
- 54:37लोक में भी आनंदित होता है। और परलोक में भी आनंदित होता है
- 54:43कि लोक परलोक क्या है? जब संसार में होता है वह यही लोक
- 54:49है। इसमें भी मैं आनंद मानता हूँ और
- 54:56आनंद कौन मान सकता है? जो अपने अंतर के उस तल पर चला
- 55:02गया। मैंने बहुत बार कहा से तुम भी चले
- 55:07जाओ और परलोक परलोक जो उस तल पर विराजमान वह परलोक चला गया।
- 55:16यह कोई सच घटना नहीं है बाहर। भौगोलिक सचखंड कोई है ही नहीं, ना
- 55:22ही भौगोलिक स्वर्ग है, ना ही भौगोलिक नर्क है।
- 55:26अगर होता तो फिर यहाँ हॉस्पिटलाइज्ड दर्द से कराहते हो।
- 55:36जर जर शरीर। बिमारी से ग्रस्त कैंसरराइटस
- 55:43कोरोना में कितने लोग मर्क हैं, यह किस कर्म का फल है?
- 55:50नहीं, यहीं नरक है और प्रसन्न होते हैं।
- 55:57संत प्रसन्न होते हैं। यह भी कर्मों का फल है।
- 56:03मैं परम प्रसन्न हूँ और छुपाता नहीं कुछ और मेरी प्रसन्नता का
- 56:13प्रमाण मेरे जीवन से ले सकते हो। बिना किसी प्रकार की जीवेशना के
- 56:24बिना किसी प्रकार के विकास विचार और विषय के, मैं चौबीसों घंटे
- 56:34आनंद में हूँ। यह इस लोग का आनंद है और जब मैं
- 56:43खो जाऊंगा, यह विखंडित हो जाएगा, स्कैटर हो जाएगा तो मैं तो
- 56:52रहूँगा। नैनम छिदन तीर्थशस्त्रण नैनम
- 56:58दाहती पांव का न चैनम प्लेगन द्यापु न सो श्यति मारूता वह जो
- 57:05रहेगा वह चेतन है और चेतन अपने आप में आनंद है।
- 57:14आनंद का खजाना आनंद का सागर दोनों ही तरीकों से मैं लोक में रहूं,
- 57:21ये लोक है या परलोक में रहूं ये शरीर चला जाए बिखर जाए तो मैं
- 57:28अपने आप में आसीन हो जाऊंगा फिर मैं आनंद स्वरूप हूँ।
- 57:35दोनों ही कालों में यही कहते हैं। शास्त्र दोनों ही कालों में मैं
- 57:42सुखी रहूंगा, आनंदित रहूंगा, प्रेम का प्याला पिता ही रहूंगा।
- 57:51एक छोटा सा प्रवचन तुम्हारे लिए यही संदेश लेकर बनाया मैंने तुम
- 58:01ये मत पूछनी मैं सर्व अंतर्यामीन हूँ सर्वज्ञ हूँ।
- 58:13सर्व आत्मा हूँ सब के भीतर कण कण में वासा है मेरा सर्व शक्तिमान
- 58:23हूँ, सर्व व्यापक हूँ। मैं फिक्र न करूँगा तो और कौन
- 58:30करेगा? लेकिन यह फिक्र तुम्हारी फिक्र
- 58:34जैसा नहीं है। यह फिक्र सिर्फ अपनी सृजना को
- 58:41कर्तव्य निष्ठ होकर उसको चलाने का फिक्र है सिर्फ?
- 58:48मेरे ही आदेश से घूमते हैं पृथ्वीया और चंद्रमा सूरज और ग्रह
- 58:55नक्षत्र मंडल और यह सारी सृष्टियां और यह अनंत अनंत अनंत
- 59:02भ्रमण। तो मुझे फिक्र नहीं है, जैसा आपको
- 59:11है वैसा नहीं। मैं चिंता में नहीं हूँ।
- 59:15चिंता से मेरी रातें काली नहीं होती ना दिन बेचैनी में गुजरता है
- 59:23बड़ी मौत से। देन गुजार देता हूँ बड़ी मौत से
- 59:27रात गुजार देता हूँ, अपने आप की आनंद के रस का प्याला पीते हैं,
- 59:36तुम भी ऐसे ही हो जाओ 24 के बाद मैं घोषणा करूँगा।
- 59:47जीस व्यक्ति ने मुझे यश कह दिया और मेरी कसौटी पर खरा उतरा अब
- 59:57आपके सामने पेश कर दूंगा। अगर किसने यश नहीं कहा?
- 1:00:07अगर किसी ने ये भार ये भार तो है बिना शक ये लोग देश का भार तो
- 1:00:14उठते हैं, इसमें ज़रा भी शक नहीं होना चाहिए।
- 1:00:24ये बोझा तो ढोती है और जीस वेतन के ऊपर ये बोझा ढोती है।
- 1:00:30वो बड़ा सस्ता वेतन है। इतना बोझा उठा रही है दिन भर रात
- 1:00:38का जागना। उस स्टेट में उसने द्रोह कर दिया।
- 1:00:44उस स्टेट में एक व्यक्ति फना पार्टी में चला गया।
- 1:00:49भला ये भी कोई जिंदगी है? गधे को इतना फिकर तो नहीं होता तो
- 1:00:56गधे से बुरी जिंदगी है। सही रूप से देखो गधा सिर्फ वो जा
- 1:01:03ही ढोता है ये बोजा भी ढोते हैं और वो झेल भी होते हैं।
- 1:01:12इनका उपकार तो है मानना पड़ेगा और मानो भी।
- 1:01:18और मुझे समझ नहीं आते जी और लोग गधे बनने को क्यों तैयार हैं, ये
- 1:01:35मुझे कभी समझ नहीं आई। मौत का 1 दिन मोईन है मौत का 1
- 1:01:51दिन मोईन है नींद क्यों रात भर नहीं आती?
- 1:01:58ये क्यों गधा बनने को तैयार है? लेकिन मैं समझता हूँ।
- 1:02:06तुम्हारी मूडतम को बड़ी अच्छी तरह से समझता हूँ, क्योंकि किसी जमाने
- 1:02:11में मैं भी महान ओढ़ता हूँ, मैं भी इन गरीबों बाजारों में से
- 1:02:20निकला हुआ खिलाड़ी हूँ। जिसने वो प्रेम के रस का एक बूंद
- 1:02:26भी नहीं जखा वो बोझ उठाने को सदा ही राजी हो जाएगा और जिसने वो
- 1:02:36प्रेम रस के प्याज है। भर भर सुराइयां पीली हों और
- 1:02:41समुद्र ही पी लिया हो अगस्त से जैसे मैं फिर काम न करेगा क्योंकि
- 1:02:50वो निरबोज हो गया और एक बार निरबोज होने के बाद व्यक्ति
- 1:02:57दोबारा से। बोझ उठाने की जेहमत नहीं करता।
- 1:03:02यह है मुख्य कारण ये जो लोग गधे बनने को तैयार हम हमें
- 1:03:09पार्लियामेंट भेज दो। हमें राज्यसभा भेज दो।
- 1:03:18एम एलए बना दो एमपी बना दो, हमें प्राइम मिनिस्टर बना दो, हमें
- 1:03:21मिनिस्टर बना दो। क्यों गधे बनने को तैयार है?
- 1:03:27बस एक मात्र का प्रेम रस का प्याला तो बहुत दूर की बात है।
- 1:03:34इन्होंने कभी प्रेम रस की एक भूत भी नहीं चखी।
- 1:03:38जीस दिन ये प्रेम रस के एक बूंद चक लेंगे स्वयं के होने का एक
- 1:03:43थोड़ा सा झलक मिल जाएगा। सतोरी का मौत का 1 दिन मयन है
- 1:03:51नींद क्यों रात भर नहीं आती?