Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 Mar 25 - गंगा मैं हूँ और गंदा नाला भी मैं हूँ! बाबा आप खुद Multidimensional हो, कभी कुछ कहते हो और कभी कुछ!
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- 0:07अडवोकेट रिपुदमन बाबा जी, तुम खुद ही मल्टीडाइमेंशनल हो।
- 0:29मल्टीडाइमेंशनल होने की निंदा करते हो, तुलसीदास को नीचा दिखाने
- 0:38की कोशिश करते हो और तुलसीदास के ही दोनों का इस्तेमाल करते हो?
- 0:58एक तरफ कहते हो कि जर्रे जर्रे में परमात्मा है प्रणाम भी करते
- 1:05हो सिया राम मैं सब जग जानी करम प्रणाम जोर जुगपानी।
- 1:17और दूसरी तरफ संतो की घोर बेइज्जती भी करते हो।
- 1:24ऐसा कौन सा शब्द होगा जो आपने हमारे परम पूज्य संतो के लिए
- 1:30इस्तेमाल न किया? हो?
- 1:39सच पूछो तो निंदा ही निंदा, निंदा ही निंदा सुनकर हमने आपका चैनल
- 1:49छोड़ दिया था, लेकिन क्या करें, बाहर भी तो कुछ नहीं मिलता।
- 1:58फिर से आना पड़ा। हमारी इस शंका का समाधान कर
- 2:04दीजिए, आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। आप कहते हैं सब वो ही है।
- 2:15तो फिर संतों की निंदा क्यों करते हो?
- 2:19जीस तुलसी को गलत कहते हो, उस तुलसी के दोनों का इस्तेमाल क्यों
- 2:24करते हो? रिपु दमन।
- 2:37बहुत सुंदर शब्द है, लाजवाब प्रश्न है, पूछने चाहिए था इसलिए
- 2:45पहली बात तुझे की मैं आपको ब्लॉक नहीं करूँगा क्योंकि ऐसे सुंदर
- 2:52प्रश्नों को पूछने वालों को। ये तो मेरी जरूरत है बात को
- 3:07समझना, असत्य को असत्य कहना और सत्य को सत्य कहना अपराध नहीं
- 3:23होता। सत्य को शक्ति कहना जीस दिन अपराध
- 3:33हो जाएगा, उस दिन प्रलय आ जाएगा और तुम्हारे डिक्टेटर यही काम
- 3:42करते हैं। फिर मैं मल्टीडायमेंशन हूँ आपके
- 3:53सबूतों के आधार पे लेकिन झूठा तो नहीं हूँ तुम्हारे मीडिया की तरह
- 4:03छुपता तो नहीं कोई बात? तुम्हारा मीडिया तो ऐसा कि गाँधी
- 4:12जी को गली निकालता और सारी बातें झपता गाँधी जी ने अपना कोई पाप
- 4:17नहीं छिपाया, सत्य के प्रमुख में उन्होंने सब कुछ बता दिया।
- 4:30सरे राह। वो जवान लड़कियों के साथ कंधों पे
- 4:37सहारा दे के चलते है। तुम कह सकते हो कि लड़कों के
- 4:45कंधों का भी सहारा ले सकते थे, बिल्कुल यह सिर्फ तुम्हारी
- 4:49मानसिकता को दर्शाती है। और उसमें कुछ भी नहीं आया जिसके
- 4:58लिए लड़के और लड़की का भेद मिट गया हो या फिर किसी का सहारा ले
- 5:07छुपाना पाप है। आपका ये प्रश्न छुपाने योग्य था।
- 5:13मीडिया के हिसाब से मीडिया छुपा लेता है।
- 5:15उस प्रश्न को छुपा दो यही पाप है और ये पाप करने वाले।
- 5:28मेरी बात को ध्यान से सुनना ज्यादा देर तक रहेगा नहीं, आग की
- 5:37चिंगारी अगर फैलने दी जाए तो वह बवंडर बन जाती है।
- 5:45तुम्हें पता नहीं ये चिंगारी जो दबा दोगे ये भीतर भीतर सुलग के?
- 5:51एक बवंतर का रूप ले लेगी तुम्हें तब पता चलेगा जब खाक हो जाएगा
- 5:57तुम्हारा महल बड़ी से बड़ी पापों की श्रेणी में छुपाना आता है।
- 6:13ऐसा मूर्ख नहीं थे जिन्होंने कहा मान लेना प्रकट कर देना, कन्फेशन
- 6:18ऑफ़ एरर्स मान लेना जो तुमने पाप किया है, छुपाना मत छुपाओगे तो
- 6:26ब्लास्ट होगा, छुपाने से चीजें बढ़ती हैं।
- 6:31दोष भरती हैं, प्रकट करने से दोष समाप्त हो जाते हैं अब आइए प्रसंग
- 6:44पे आइए मल्टीडायमेंशनल आपकी बुद्धि के हिसाब से बिल्कुल ठीक
- 6:54है। मैं ये भी कहता हूँ कि सब कुछ
- 6:58परमात्मा है, फिर ये निंदा परमात्मा क्यों नहीं?
- 7:07निंदा भी परमात्मा है। मैं इन संतों को भी प्रणाम करता
- 7:13हूँ जो झूठ बोलते हैं झूठ भी मैं हूँ तुम्हारी समझ पड़ेगी आगे चलो
- 7:28सत्य भी मैं हूँ झूठ भी मैं हूँ। जब कण कण मैं हूँ तो झूठ कहाँ
- 7:37जाएगा? गंदा नाला भी मैं हूँ, पुष्प
- 7:41वाटिका भी मैं हूँ खेत खलिहान भी मैं हूँ।
- 7:52जहरीला सर्प भी मैं हूँ अमृत भी मैं हूँ विश्व भी मैं हूँ मेरे से
- 8:04बाहर कुछ। एक शब्द कर ये भी आता है हुक्म
- 8:16परमात्मा को कहते है हुक्म को हुक्म भी कह देते है हुक्म अंदर
- 8:22सब को बाहर हुक्म न कोय हो परमात्मा सब के भीतर।
- 8:30और सब परमात्मा के भीतर समाया हुआ है।
- 8:34ईशा मास में दम सर्वमम, जेत्त, केच जगत या आम जगत सब उसके भीतर
- 8:41हैं। गंदा नाला भी वही है, फूलों की
- 8:47सेज भी वही है। फूलों से खिले हुए उद्यान भी वो
- 8:51ही है उसके सिवा कुछ भी है दूषित है तो मैं हूँ बाहर है, तो मैं
- 9:01हूँ फिज़ा है, तो मैं हूँ फिज़ा है, तो मैं हूँ।
- 9:10मेरे से बाहर कुछ नहीं आइए हम भगवान कृष्ण की तरफ चले क्योंकि
- 9:33इन्होंने बहुत लम्बा जोड़ा प्रश्न किया है।
- 9:37बीच बीच में से शब्दों को उठाता रहूंगा और उसका स्पष्टीकरण देता
- 9:44रहूंगा। लेकिन भगवान कृष्ण के इन शब्दों
- 9:55को तुम्हारे तथा कथित विद्वान बिल्कुल ही नहीं समझ पाए।
- 10:03बड़े से बड़ा विद्वान भी इसको नहीं समझ पाया।
- 10:05हार गया वो उसने अपने ही तरीके का अर्थ कर लिया।
- 10:19कृष्ण कहते हैं, अक्षरों में मैं इंकार हूँ।
- 10:31महर्षियो में विगो शब्दों में एक अपरणव ओंकार मैं हूँ यज्ञों में
- 10:49मैं जप यज्ञ हूँ। स्थिर रहने वालों में मैं हिमालय
- 11:03हूँ, भगवान कृष्ण के इन शब्दों को अक्सर लोग सूख जाते हैं, बड़े
- 11:17कठिन शब्द हैं। क्योंकि सीधा सा प्रश्न बुद्धि
- 11:21उठाती है अगर वृक्षों में पीपल तुम हो तो क्या होगा, नीम का क्या
- 11:31होगा? तुलसी का क्या होगा बबूल का?
- 11:40शी शंका? इन सभी वृक्षों को लाखों लाखों
- 11:46तरह की प्रजातियां हैं वृक्षों की और अगर वृक्षों, पीपल भगवान हैं
- 11:53तो बाकी। समझिये।
- 11:57बात को यहीं चूक खा जाते हो तुम अब इसको ऐसे उदाहरण से लीजिए आप
- 12:15जैसे कहें कि जीवंतता में योणियों में मानव योणि मैं श्रेष्ठ हूँ।
- 12:24मैं हूँ, मैं का मतलब श्रेष्ठ हूँ और वैसे तो जीवन तथा पत्थरा में
- 12:35भी होती है, लेकिन नेगलिजबल होती है नगण्य होती है तो मैं पता भी
- 12:43नहीं चलता लेकिन भूल मत जाना। चेतनता पत्थर में भी होती है, तभी
- 12:51तो प्रकट हो जाती है, धन्ना को प्रकट हुई, पत्थर में प्रकट हुई,
- 13:03वृक्षों में भी है चेतनता। और सभी पदार्थों में सबसे ज्यादा
- 13:11चेतनता पानी में है, ये चेतनता की मात्राएं पदार्थों में सम नहीं है
- 13:25कम ज्यादा है। सबसे ज्यादा चेतन है पंडित, लेकिन
- 13:35तत्व तो पांच पदार्थ तो पांच है, अग्नि है, आकाश है, वायु है, जल
- 13:44है। पृथ्वी है, लेकिन पानी में चेतनता
- 13:56सबसे ज्यादा होती है आज हमारे पास।
- 14:04सिंबल्स बच गए हैं। सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स
- 14:10प्रतीकात्मक किचन आपने देखा होगा मूवीज़ देखते हुए आप फिल्मों में
- 14:21जब कोई ऋषि शराब देते थे। तो जल को साक्षी कर लेते थे कारण?
- 14:31क्योंकि जल में सबसे ज्यादा मेमोरी है जल उस श्राप के तिरंगों
- 14:38को शोषित कर लेता है। और वह व्यक्ति जो प्रकोप की भावना
- 14:51से बोलता है जल के भीतर अवशोषित हो जाती हैं।
- 14:59ऋषि फेंकता है उस व्यक्ति के ऊपर। और।
- 15:06मेमॅरि है जल में मेमॅरि सारी की सारी उसके में चली जाती है, फिट
- 15:14हो जाती है, ऐसे करता है श्राप काम।
- 15:24आज नहीं, कल विज्ञान खोज लेगा। थोड़ी थोड़ी संभावनाओं प्रकट होनी
- 15:32शुरू हुई, लेकिन आज नहीं कल परिपूर्ण रूप से विज्ञान खोज
- 15:38लेगा। कि पानी में चेतनता बहुत ज्यादा
- 15:44है। यही कारण है कि इस धरती का 70% जल
- 15:52है और यही कारण है मानव का शरीर इतना ज्यादा चेतन संवेदनशील होने
- 15:59का यही कारण है। के इसमें 70-75 प्रतिशत तक जल
- 16:05होता है। जल की मात्रा जाने ज्यादा होने का
- 16:13मतलब चैतन्य का ज्यादा होना है। स्थिरता में मैं हिमालय पहाड़ तो
- 16:29और भी हैं, सुमेरु है और बड़ी श्रृंखला में हैं।
- 16:38लेकिन हिमालय ही क्यों? बाकी क्या हुआ जी दूसरी स्टेप
- 16:45बताते हैं तो बाकी जो है उनको नेगेलेक्ट नहीं करते हैं।
- 16:49यह समझ लेना श्रेष्ठ सत्ता को बता रहे हैं।
- 16:59लेकिन बाकियों में भी मैं हूँ, बाकी भी मैं हूँ और जर्रे जर्रे
- 17:09में क्योंकि वही समाया हुआ है इसलिए बाकियों में भी मैं हूँ।
- 17:18कहने का ढंग है, समझ नहीं पाए। अब आज समझ लीजिए तो हमारी सब
- 17:24गुथियाँ खुल जाएंगी। अक्षरों में ओंकार एकाक्षर,
- 17:35प्रणब। देखिए अभी नमहाशय ने क्वेश्चन
- 17:47पूछा है मुझे गालियां भी बहुत निकालनी हैं, कोई रास्ता ही नहीं
- 17:55छोड़ा ही नहीं। माँ, बहन, बेटी सब बराबर करती है।
- 18:03बड़े क्रोध से प्रश्न पूछा गया होगा अरे भाई इतना क्यों जलेगा?
- 18:10थोड़ा शांत हो लेते, फिर पूछ लेते, लेकिन मजबूरी है।
- 18:16क्योंकि शांति तुम्हारे स्वभाव में अगर होती तो ऐसे प्रश्न नहीं
- 18:22नाखड़े होते, शांति तो अचीवमेंट है।
- 18:28ओम शांति, शांति तक तो पहुंचना होता है।
- 18:35वह जहाँ ओंकार का नाम हो रहा है, वहाँ शांति है।
- 18:39उसके अलावा कुछ भी नहीं कहीं भी नहीं।
- 18:46तुम उच्चारण करोगे ओम शांति का शांति नहीं आएगी।
- 18:51इन ओम शांति कहने वालों के घरों में जितना उपद्रव मैंने देखा उतना
- 18:59गृहस्थों के घरों में उपद्रव होता ही है।
- 19:05जितनी जितनी कठिन परिस्थितियों में से ये लोग मुझे गुजरते दिखे।
- 19:13जितनी दुविधा में इन्होंने जीवन जिया, ओम शांति कहने वालों में
- 19:20उतना कठिन जीवन कांपता हुआ जीवन मैंने किसी का भी नहीं देखा।
- 19:28शायद इसलिए ओम शांति का प्रचार शुरू किया पानी तो वहीं छिड़केगा
- 19:34न जहाँ आग लगी हो तो ओम शांति कहने से वो लगी हुई आग शांत हो
- 19:44जाती है। अगर क्रोधित होता है तो हम उसे
- 19:48क्या कहते हैं? रिलक्स रिलक्स रिलक्स ये जलते हुए
- 19:59लोग हैं जिनको शब्दों का सहारा काफी है।
- 20:09इसलिए ओम शांति का उच्चारण करना इनके लिए जरूरी है और इनको जच भी
- 20:15जाता है। जचना चाहिए भी क्योंकि ये इनकी
- 20:18दवाई है। हाँ, बिल्कुल मैं कहता हूँ जरे
- 20:25जरे में मैं हूँ। और मेरे हुक्म के बिना पत्ता नहीं
- 20:29हिलता और तुम्हारे अहंकार को चोट लगती होगी, क्योंकि तुमने नकली
- 20:39मैं खड़े कर लिए हैं अस्तित्व के मैं के अतिरिक्त जो भी मैं को
- 20:46खड़ा करेगा। वह नकली होगा और वह दुख देगा।
- 20:50नकली चीज़ हमेशा दुख देती है, उसमें से सुगंध नहीं होती तो पूछा
- 21:01गंदा नाला भी मैं हूँ, बिलकुल मैं हूँ मतलब मूत्र भी मैं हूँ बिलकुल
- 21:09मैं हूँ। तो फिर गंदे नाले में जा के स्नाम
- 21:14कर लिया करो, विष भी मैं हूँ अमृत भी मैं हूँ फिर विष पी लिया करो
- 21:27यही समझा रहे हैं कृष्ण। हूँ तो लेकिन ये स्नान करने योग्य
- 21:40नहीं है। गंधनाला बस यही बताना चाहते थे
- 21:48तुमने गालियां निकालीं। रेपो धवन स्वीकार करता है।
- 21:53मुझे बड़ी भद्दी भद्दी गालियां निकाल मैं कहता हूँ शब्दों में
- 22:03मैं उंकार हूँ और तुम्हारी गालियां भी मैं हूँ।
- 22:09लेकिन मैंने क्यों नहीं कहा? रिपु दमन की गालियाँ भी मैं हूँ,
- 22:14हूँ तो हूँ, लेकिन श्रेष्ठ क्या हूँ?
- 22:18श्रेष्ठ हुंकार, गालियाँ भी मैं हूँ निश्चित लेकिन अक्षरों में
- 22:32श्रेष्ठ क्या हूँ? शब्दों में श्रेष्ठ क्या हूँ?
- 22:36प्रणब ओंकार यह मत समझना कि अगर तुमने गालियाँ निकाल दी, मुझे तो
- 22:46वह मैं नहीं हूँ नहीं नहीं हूँ वो भी माँ ऍम।
- 22:56कृष्ण यही बात समझाना चाहते हैं, जड़ भी मैं हूँ चेतन भी मैं हूँ
- 23:05और इनके बीच का सब मैं हूँ। मुझे प्रश्न आया था कुछ दिन पहले
- 23:12कि भगवान कृष्ण ने सर्वोच्च को। और नेमन को अपना स्वरूप बताया तो
- 23:18मध्य को क्यों निषेध कर दिया? नहीं निषेध ने किया।
- 23:27जब दो छोर पकड़ लिए जाते हैं तो सारा धागा पकड़ लिया गया।
- 23:31यह समझ लो। जब उत्तर दक्षिण दोनों छोर पकड़
- 23:36लिए पूर्व पश्चिम दोनों छोर पकड़ लिए तो धागे का मध्य भाग तो बीच
- 23:42में आ गया। सारे का सारा ग्रहण हो गया।
- 23:49नेपाल से प्रसन्न आई। और इतनी बात तो समझा आ जानी चाहिए
- 23:56थी लेकिन नहीं आती। कृष्ण के शब्द बड़े गहरे हैं,
- 24:01उनके लिए गहरे हैं, जो समझ से समझना चाहते हैं उनके लिए गहरे
- 24:07नहीं। जो अस्तित्व में चले जाते हैं,
- 24:09उनके लिए तो सुलझे सुलझाएं। इसलिए मैं कहता हूँ कृष्ण के तल
- 24:17पर ही कृष्ण के शब्दों को बोला जाता है, बोला जा सकता है, समझा
- 24:24जाता है और समझा जा सकता है। अब रिषित और भी बहुत हैं, अत्री
- 24:34हैं, पाराशर हैं, भारद्वाज हैं, ऋषि कोई कम नहीं है, लेकिन भृगु
- 24:45ही क्यों हैं? श्रेष्ठ ऐसा कुछ कह के दसवें
- 24:57अध्याय के ये सारा भरा पड़ा है ऐसा कुछ कह के कृष्ण ये कहना
- 25:04चाहते हैं कि सृष्टि में तो मैं हूँ।
- 25:13लेकिन जड़ता को नकार मत देना, वो भी मैं हूँ सिर्फ चेतनता को अपना
- 25:25मत लेना, वो भी मैं हूँ और इन दोनों के बीच की परिस्थिति भी मैं
- 25:33हूँ। जड़ से चेतन तक की सारी ग्रोथ मैं
- 25:38हूँ समेत जाइएगा धीरे धीरे आपको समझा जाएगा
- 25:59गंदा नाला मैं हूँ, गंगा भी मैं हूँ।
- 26:04लेकिन हम गंदे नाले में कभी सनान नहीं करते हैं।
- 26:11गंगा में स्नान करते हैं और वो भी संगम में।
- 26:19और ऐसे मुहूर्तों पे स्नान करते हैं जो कभी कभार आते हैं, फिर
- 26:27मारे जाना कभी कोई अफसोस नहीं होता, मर जाएंगे कोई?
- 26:30बात नहीं भावना है। गंगा जी का तट हो, यमुना का वंशी
- 26:50वट हो, मेरा सावरा निकट हो। जब प्राण तन से निकले, इतना तो
- 27:13करना स्वामी। तो अगर धीरेन्द्र शास्त्री कहते
- 27:20हैं जो वहाँ मर गए वो मोक्ष को चले गए।
- 27:27वो अपने ढंग से बोलते हैं लेकिन सच पूछें तो कुछ लोगों की ये बात
- 27:34गंभीर। वो तो अक्सीडेंट का शिकार हुए गलत
- 27:40हुआ, वो तो भगदड़ में व्यवस्था ठीक नहीं थी हो जाता है, इतने
- 27:48करोड़ों की भीड़ हो हो जाता है। सिर्फ मात्र दोषी उन लोगों को
- 27:55नहीं करार दिया जाना चाहिए। जो की व्यवस्था नहीं कर सके।
- 28:00अब सब जगह आके योगी थोड़े ही संभालेंगे, उनके लोग ही तो
- 28:06संभालेंगे और किसी का भी राज़ हो वो खुद तो वहाँ जाता नहीं, वो तो
- 28:12सिर्फ मैं नहीं जी करता है। और कहीं कहीं मनेजमेंट में कोई
- 28:16चुक रह जाती है, रह सकती है। बहुत बार ऐसे इंसिडेंट हुए हैं
- 28:23जिन्हें हम अक्सीडेंट कह सकते हैं।
- 28:25बहुत बार लोग मारे गए हैं। हजारों हजारों कुंभ में ऐसा नहीं
- 28:30है कि प्रथम बार हुआ है। लेकिन ये बात गलत है।
- 28:35जो एक्सीडेंट में मर जाए वह मोक्ष को चला गया।
- 28:39नहीं मोक्ष को वह जाएगा जिसकी भावना हो।
- 28:48श्री गंगा जी का तट हो यमुना। आका वन सी वट हो, मेरा सावरा निकट
- 29:03हो जब प्राण तन से निकले। इतना तो करना स्वामी।
- 29:23भगदड़ में मर जाना, अक्सीडेंट में मर जाना और स्वेच्छा से मर जाना
- 29:29वो तो भावना पूरी हुई। बड़ी प्यारी भावना है, खुद को
- 29:35न्योछावर कर देने की भावना, इससे सुंदर भावना नहीं हो सकती।
- 29:41मलमूत्र भी मैं हूँ फिर तो हाँ, हाँ बिलकुल मलमूत्र भी मैं हूँ तो
- 29:47उसका लक्षण कर लेना चाहिए। बिलकुल मैं करता भी हूँ।
- 29:52चौंकरा मत जीसको तुम अवतार के रूप में पूजते हो वराह अवतार मैं वह
- 30:02अवतार धारण करके मल का भक्षण भी करता।
- 30:06हूँ। मल मूत्र भी मैं हूँ मराज जी
- 30:15देसाई बनकर मूत्र का अपान भी मैं ही करता हूँ और सो सारे जिंदा भी
- 30:23रहता। हूँ।
- 30:31जो कि वेदों में मान ने प्रार्थना की है।
- 30:37मैं 100 वर्ष तक जी हूँ। दसवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक
- 30:47में वान कृष्ण ने कहा कि मैं वृक्षों में पीपल हूँ।
- 30:54आप अपनी बुद्धि से सोचोगे तो ऐसे ही फल निकलेंगे इसलिए मैं रोज़
- 31:01कहता हूँ बुद्धि को छोड़ दो ये गीता।
- 31:03है ये? भगवान का गाया हुआ गीत है।
- 31:10इसको तुम क्या गाओगे क्या समझोगे, इसे उसका एक कण भी तो नहीं समझ
- 31:16पाते और बनाने की बात तो बिल्कुल ही छोड़ दो, लेकिन तुम इस बुद्धि
- 31:23से सोचने की फिराक में हो और तुम्हारी?
- 31:30यह भावना कभी सम्पूर्ण नहीं होगी। बुद्धि से कभी वह समझा आएगा नहीं,
- 31:37कितनी भी चेष्टा कर लूँ। दशम अध्याय के छब्बीसवें श्लोक
- 31:51में मैं वृक्षों में पीपल। चलो कह देते हैं यज्ञों में जब
- 32:07जग्य हूँ, फिर आप जब का क्यों निरादर करते हो?
- 32:11नहीं करता मैं तो निरादर मल का भी नहीं करता भाई मैं पुत्र का भी
- 32:23नहीं करता मराज जी दसाई पीते हैं। और मलकावक्षण भी मैं करता हूँ
- 32:31बरहा अवतार बनकर मलवक्षण करता हूँ, वो मैं ही तो हूँ और कौन?
- 32:40और अगर पीपल मैं हूँ तो वो भी मैं हूँ।
- 32:44गंगा मैं हूँ तो गंदा नाला भी मैं हूँ अमृत मैं हूँ तो विष भी मैं
- 32:50हूँ लेकिन ये बात ध्यान में रखना फिर अगर गंदे नाले में स्नान
- 32:59करोगे तो दूषित है वो। नहाने के योग्य हूँ हूँ मैं विष
- 33:10पीओगे तो जिंदा नहीं रहोगे लेकिन हूँ मैं अगर जिंदा नहीं रहना
- 33:17चाहते जो लोग वो विस्वाण करते हैं।
- 33:20सभी की व्यवस्था का इंतजाम किया हुआ है।
- 33:24मैंने तो नहीं जीना चाहते मरो जहर पैदा कर दिया था मेरे लिए और यह
- 33:32सभी कुछ समुद्र मंत्र में तुमने कहानी में पढ़ा होगा।
- 33:37विष भी निकला, अमृत भी निकला। भगवान धन्वंतरि आखिर में अमृत कलश
- 33:43ले के आए। ये सब सिंबल हैं।
- 33:51इनको समझलो किसी चीज़ से मैं इंकार नहीं करता।
- 34:00मैं सब हूँ और इन दोनों के मध्य जो है वो भी मैं हूँ जड़ता में
- 34:06अव्वल पत्थर भी मैं हूँ चेतना में अव्वल मानव भी मैं हूँ।
- 34:15और इन दोनों के बीच में जो रह गया वो सब मैं हूँ, मेरे अतिरिक्त भला
- 34:22है क्या कुछ नहीं तुम निकाल लिया निकाली रिपुदमन, वो भी मैं हूँ
- 34:31लेकिन उनमें श्रेष्ठ अक्षरों में श्रेष्ठ प्रणब मैं हूँ।
- 34:36ओंकार मैं हूँ गालिब है मैं हूँ, तुमने गालियां निकाली, आत्मसात कर
- 34:45लिया। बुध को लोग गालियां निकाल देते
- 34:48हैं, बुध आत्मसात कर लेते हैं, बुध पर लोग थूक जाते हैं।
- 34:54थूक बुरा थोड़ी होता है, थूक भी मैं हूँ बुध उसको पूछ लेते हैं
- 35:09राक्षस भी मैं हूँ देवता भी मैं हूँ आप यहाँ समझ लेना बात।
- 35:18जो मुख्य बात कृष्ण। बताना चाहते हैं अब उसकी जड़ में
- 35:22आ जाऊं ये तो मैंने समझा दिया। आप समझ गए होंगे।
- 35:27कि गंदा नाला भी मैं। गंगा भी में लेकिन गंदे नाले में
- 35:31स्नान करोगे। तो सब दूषित हो जाएगा।
- 35:35एक वक्त ऐसा था जब शुरू शुरू में संबोधि को प्राप्त हुआ तो तुम
- 35:40जिसे हमारे शहर में सूअर बड़े फिरा करते थे, पहले बहुत होते थे,
- 35:46अब नहीं बता क्या मैं बाहर नहीं निकला?
- 35:53तो मैं जब घर से। बाहर जाने लगा तो एक सूअर रास्ते
- 35:56में दिख गया। लेकिन सब वह ही।
- 36:00वह प्रेम ही प्रेम नज़र आता है। तो नाले बड़े होते।
- 36:08थे तब की। बात है अब तो वो।
- 36:11नाले ढकती है गए। उस नाले में से बैठा।
- 36:16हुआ सुअर बाहर आया गंदगी में लिपटा तिपटा।
- 36:21और मैंने जाकर उसे गले से लगा लिया।
- 36:27कुछ लोग उसे पकड़ने आए थे जो उसके मालिक थे जिन्होंने वो पाला था।
- 36:33उन्होंने जब मेरी जो हरकत। देखी तो मुश्किल मेरे को वहाँ से
- 36:37ही छुड़वाया। घर छोड़ के आये नहलाया तो लाया।
- 36:47ये सिर्फ कहने की बातें। नहीं हैं।
- 36:51और संत मुझे कहने। लगे आप परमहंस हो गए।
- 36:58तो सुअर को गले लगाया। श्वेत वस्त्र तब भी पहनता था आज
- 37:02भी पहनता हूँ वही कुर्ता फजमा। कौन कहता है के सुवर?
- 37:15में मैं नहीं हूँ कौन कहता है के मलमूत्र में मैं नहीं हूँ।
- 37:20सब में मैं हूँ। और वरहा अवतार का जिक्र करके
- 37:24सनातन ने बड़ा अपकार किया है। इसलिए सनातन।
- 37:31सर्वश्रेष्ठ है। सनातन मल को।
- 37:40भी भक्षण करने वाला वराह को भी अवतार मानता है।
- 37:46अवजार की तरह पूजता। है।
- 37:53उसने ही अपने दांतों। से वराह नहीं हुई।
- 37:58पृथ्वी को उवारा। वहाँ से अवतार कहलाया ये कहानियों
- 38:03हैं। इनमें फंस मत जाना।
- 38:06ये सिंबल्स हैं, जैसे एच टू वो पानी नहीं होता।
- 38:12पानी का सिंपल जरूर। होता है ऐसी ये कहानियों इनके
- 38:17भीतर कुछ तथ्य छपे हुए हैं। लेकिन एच टू ओह ब्लैक बोर्ड पे
- 38:22लिखा हुआ पानी नहीं, प्यास नहीं बुझाएगा आपको सारा दसम अध्याय
- 38:34ग्यारहवें अध्याय में तो। अर्जुन कहने लगा आपकी सभी बातें
- 38:39मैं समझ गया और यहाँ बड़ी भेद समझाया भगवान ने।
- 38:46भगवान आपको ये। समझाना चाहते हैं।
- 38:51डायरेक्टली? इनडाइरेक्टली।
- 38:55कि जिसे तुम भेद की। तरह देखते हो वो?
- 38:58भेद नहीं है। वो मेरा ही स्वरूप है।
- 39:02अब आइए बात पर जहाँ भी कहाँ आपको भेद दिखता है वो मैं हूँ और उसको
- 39:12स्वीकार करना। ये एक अनूठे।
- 39:18प्रकार का आध्यात्मिक प्रयोग है। लेकिन भेद को आप स्वीकार।
- 39:26नहीं कर पाते इसलिए दुखी हूँ। और कृष्ण तुम्हें यही?
- 39:33समझाते हैं, संत। भी तुम्हें यही।
- 39:36समझाते हैं। कि भेदों को एक्सेप्ट।
- 39:39कर लो। अब उनके कहने की तकनीक और है।
- 39:44आप नहीं समझ पाते कृष्ण की तकनीक और।
- 39:50नानक की तकनीक और। कबीर की ओर तकनीकों का फर्क है।
- 39:56बात उसी की कर रहे। महिमा उसी की गाल।
- 40:03कृष्ण कहते हैं। भेद वेदों में मैं छिपा हुआ हूँ
- 40:07कैसे? जैसे आप मान पाकर।
- 40:10खुश हो जाते हो। अपमान कोई कर?
- 40:14जाये तो दुखी हो जाते हो। लेकिन कृष्ण कहते हैं।
- 40:18मान अपमान इनके वेद को समाप्त कर दो क्योंकि ये दो छोर हैं एक ही
- 40:26धागे के। जब एक धागे का छोर पकड़ लिया तो
- 40:31धीरे धीरे खिसकते खिसकते आप दूसरे छोर पर पहुँच जाओगे।
- 40:36सिक्के के दो पहलू। हैं।
- 40:43इन दोनों को स्वीकार कर। लो दोनों में मैं हूँ।
- 40:51लेकिन आप। वेद को शिकार नहीं कर पाते, आप
- 40:55सुख को स्वीकार करते हो, दुख को स्वीकार नहीं करते कुम्ती भगवान
- 41:00से दुख मांगती है, बस यही सीखाना चाहती है आपको।
- 41:06कि आप तो सुख मांगते। हो?
- 41:11मैंने दुख। मांगा और जो दुख मांगेगा उसने दुख
- 41:16स्वीकार पहले से ही कर लिया। तभी तो।
- 41:20मांगेगा, अन्यथा मांगेगा क्यों? आप तो भागोगे।
- 41:26जीवन मृत्यु। मृत्यु भी मैं हूँ मृत्यु को
- 41:30स्वीकार कर रहा हूँ। आप जीवन को स्वीकार करते हो, आप
- 41:34किस तरह जीना चाहते हो? किसी तरह घिसट पिसट के?
- 41:39जीना चाहते हो? चिपके हुए लोग हैं।
- 41:47जीवन से इतना चिपट। गए हो, मृत्यु से बह खाते हो।
- 41:52भगवान कहते हैं दोनों। ही मैं हूँ।
- 41:59तो काल बनकर। मैं भक्षण कर रहा हूँ अर्जुन डर
- 42:03जाता है देख कर काँपता है भगवान। हटा ले अपनी व्राट को।
- 42:14मुझे बड़ा भय लग रहा। है ये तेरा व्राट मृत्यु के मुँह
- 42:20में जाते हुए यह सब महारथी। देख अर्जुन काल।
- 42:27भी मैं हूँ। और काल से तो डर।
- 42:30लगता है सदा ही मृत्यु से डर लगता है।
- 42:33आज भी मृत्यु से ही तो डरता है जो कंप रहा है।
- 42:41और बात को मोड़। देता है, भटकाता है।
- 42:47मेरे प्यारे हैं। मेरे।
- 42:50भाई हैं, मेरे गुरु हैं। मेरे पिता में हैं।
- 42:56बुर्की बुर्की देखे पाला। लेकिन ये?
- 43:02बात को सत्य को मोड़ देने की बात है।
- 43:06ध्यान। भटकाने की।
- 43:07बात है, कृष्ण जैसे लोगों का ध्यान भटकाया नहीं जा सकता।
- 43:14कैसे भटकाओ गया आप? हमारे ध्यान को हमारा ध्यान स्थित
- 43:22है स्थित हिमालय की तरह स्थित। आप हमारे ध्यान को नहीं।
- 43:31भटका सकते हैं कितनी? ही चेष्टा कर रहे।
- 43:34हो लेकिन दोगले वन से यहाँ भी नहीं जाती।
- 43:43इनकी राजनीति? जी कहते हैं, हे भगवान कबता है
- 43:52मृत्यु? से।
- 43:55ये मारने गए। महारथी हैं, इनसे सीखा हूँ।
- 44:00और देवव्रत जैसा। विषम प्रथम जैसा धनु और धारी।
- 44:04भीष्म प्रतिज्ञा को लेने। वाला संकल्पवान मेरे सामने दुश्मन
- 44:09बन के खड़ा है सब जानता है, लेकिन अर्जुन मौत से भयभीत है रिश्तों
- 44:16से भयभीत नहीं है ध्यान रखना प्रकट करता है कि मैं रिश्तों से
- 44:21भयभीत हूँ। जी मेरे दादा।
- 44:27इसने मुझे टुकड़ी। टुकड़ी दे के।
- 44:31पाला यह मेरा गुरु, इसने मुझे धनुर्पद्या सकाई कैसे मार दूं
- 44:36उनको अरे जब तेरे को मारने के लिए खड़े हैं।
- 44:42तो तू इनको क्यों नहीं मार? सकता।
- 44:44तब तक होते हैं रिश्ते। जब तक रिश्ते निभाने।
- 44:49वाला सामने रिश्ते निभाना चाहता हूँ।
- 44:53जब रिश्ते निभाने वाला। सामने वाला रिश्ते नहीं निभा रहा
- 44:57तो फिर काहे रिश्ता रह गया? रिश्ता तो न रहा।
- 45:03आज तेरे को मारने के लिए वे खड़े हैं और अर्जुन भली भांति जानता
- 45:07है। अर्जुन बात को मोल्ड करना चाहता
- 45:10है, अर्जुन दिशा दे देता है, ध्यान को भटकाने की चेष्टा करता
- 45:15है। ध्यान भटकता नहीं।
- 45:23कृष्ण का ध्यान कभी भटकाया जा सकता है।
- 45:28बुर्के बुर्के देखे। पहला कहते हैं सब जानता हूँ मैं।
- 45:32शस्त्र विद्या सीखा। जानता हूँ मैं ये मेरे भाई हैं सब
- 45:36जानता हूँ मैं। और प्रभु मैं कब रहा?
- 45:42हूँ। बिल्कुल ठीक लेकिन जब विराट।
- 45:50दिखता है। कंपनी फिर भी लगता है।
- 45:57मैं प्राणों को। भरने वाला शिव हूँ।
- 46:02मृत्यु से डर गया। इतना व्याख्यान आग निकल रही है।
- 46:11बसवी भूत हो रहे हैं। निकल रहा है सब।
- 46:15यही स्वरूप है उसका। कभी अमावस्या की?
- 46:22रात को। आँखों को ऊपर आसमान।
- 46:26की तरफ उठा के देखना। आपको जीतने तारे।
- 46:31और गैलेक्सीज़ नजर आएंगी नजर नजर से परहे तो बहुत कुछ है।
- 46:37वो तो आपकी हर्बल भी नहीं देख पाती।
- 46:39जेम्स वेब भी नहीं देख पाती। उसके आगे भी बहुत है।
- 46:46देख हेना कितने तारीख गिनने। नहीं जाती आपसे?
- 46:54इतनी सर्जना है। उसकी तुम्हारी बातों में कैसे आ
- 46:57जाएगा? तुम समझते हो?
- 47:02क्या हम उसे बेवकूफ बना लेंगे नहीं बना सकते भाई?
- 47:07बस एक ही रास्ता। है।
- 47:12बिछ जाओ उसके चरणों। में समर्पित हो जाओ उस विराट के
- 47:17चरणों में लेकिन। विराट तुम्हें?
- 47:20अभी विराट की तरह नजर नहीं आया। तुम्हारा भी कोई किशोर नहीं है।
- 47:25जीस दिन तुम्हें विराट विराट की तरह नजर आएगा जैसे अर्जुन को आज आ
- 47:31गया। पुरोधमामचम सिद्धि पार्थ बृहस्पतम
- 47:44सेनानी नाम सकंध। सरसा?
- 47:52पस्वा सागरः। मैं पुरोधों में।
- 48:04पुरोहितों में बृहस्पति हूँ। तू श्रेष्ठ रूप।
- 48:11को देख। श्रेष्ठ बनने की।
- 48:17चेष्टा कर। बड़े से बड़े।
- 48:23मोटिवेशनल स्पीकर कृष्ण। कृष्ण?
- 48:27कहती हैं तू? श्रेष्ठतम को देख हूँ तो निक्कृतम
- 48:32में। वो भी मैं हूँ और।
- 48:34मध्य भी में हूँ। लेकिन तू देख।
- 48:38श्रेष्ठतम को? जीवन में हूँ।
- 48:43हूँ तो मृत्यु भी मैं। लेकिन तुम?
- 48:49जी बड़ी सुंदर बात है। यह मोटिवेशन है आपको।
- 48:58हूँ तो मैं मृत्यु हुई हूँ तो मैं जीवन भी।
- 49:04और हूँ तो में मध्य कर, लेकिन तू श्रेष्ठतम को देख तू जी क्योंकि
- 49:12जिएगा। तो जीने से तुझे।
- 49:16तेरा गंतव्य मिलेगा बिरोहितों में बृहस्पति मैं हूँ।
- 49:25और सेनापतियों में? सकंध, कार्तिक, मैं हूँ।
- 49:31ये श्रेष्ठतम की? इशानी है।
- 49:34कृष्ण कहते हैं, तू श्रेष्ठतम की तरह जी?
- 49:40ध्यान से समझना। ये धीरे धीरे एक एक।
- 49:45शब्द। आपको आगे आगे ले।
- 49:48जा रहा हूँ। चूक मत जाना।
- 49:53चूकोगे तो गैप बन जाएगा। सेनानियों में मैं।
- 49:58सकंध हूँ कार्तिक्य हूँ। पुरोहितों में, मैं बृहस्पति हूँ।
- 50:08जो सभी को। विद्या देते हैं और जलाशयों में
- 50:14जहाँ पानी का जमावड़ा होता है मैं।
- 50:18सागर हूँ। कृष्ण कहते हैं, तू?
- 50:25जी श्रेष्ठतम की तरह जी हूँ तो निक्कृतम भी मैं?
- 50:36जड़ भी मैं। लेकिन तुम जी।
- 50:40श्रेष्ठतम की तरह अब यह समझने वाली बात है।
- 50:46जड़ भी। मैं हूँ, लेकिन कृष्ण तुम्हें
- 50:51समझाते हैं कि तुम जड़ता से निकल आए हो।
- 50:54कभी पत्थर थे? आज पत्थर नहीं।
- 51:00हुआ तू पत्थर होने की चेष्टा मत कर।
- 51:08तू मृत्यु को मत अपना, तू जीवन की तरफ झांक।
- 51:15क्योंकि मैं जीवन। हूँ।
- 51:20क्या कहा मैंने? मैं जीवन हूँ अक्ले देओ अशोश्यो
- 51:29अक्काट्यों। नैनम चिदंती।
- 51:32शस्त्रणी नैनम भाती बाबा का होन है चैनम के लिए जनता पुनः शशति
- 51:39मारो ता इस तरह जी तुम और डर भी मत क्योंकि मृत्यु भी मैं हूँ।
- 51:56तू हरियाली है, लेकिन? सूख जाएगा।
- 51:59इससे डर मत तू जीवन है, लेकिन मर जाएगा, इससे डर मत।
- 52:08तू जलाशय है समुद्र? है, लेकिन सूख जाएगा इससे डर मत।
- 52:15समझने की चेष्टा कहते। हैं ना?
- 52:20तू हिमालय है? गहन ऊचाइयों पे ठहरा हुआ, लेकिन
- 52:25खाई बन गया डर मत। तू डर मत।
- 52:31और अर्जुन डर रहा है। और उसकी मनोदशा को।
- 52:36वहाँ पर है कसम। अर्जुन कहते हैं उठा ले पान धान।
- 52:44अपना ये विराट मुझसे सहन नहीं होता, जीवन तो बहुत सुन्दर लगाव
- 52:51से। लेकिन जैसे ही शिव?
- 52:55का विकराल रूप देखता है, भक्षण करते हैं सब उसके मुख में जाते
- 53:01हैं। भीष्म भी बड़े बड़े योद्धा बड़ा
- 53:05यहाँ कौन है? ऊंचे से ऊंचा।
- 53:13ऊंचे से ऊंचा कोई भी नहीं बस एक ही है, वो ही एक जीसको बाबा कहते
- 53:22ए कंकार। और कोई?
- 53:30लेकिन जब वो मृत्यु का दर्शन करता हो, भक्षण।
- 53:34करते हुए देखता। है काल बनकर भगवान को।
- 53:39प्रेतांत कर रहे हैं। सारा ये देख ये भी मैं हूँ देखो
- 53:44तुम्हारे योद्धा कैसे मैंने वक्त कर लिया।
- 53:50बहुत डर जाता है हाथ जोड़ लेता है थर।
- 53:54थर कांप रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसे पहला कांपा
- 53:57था, पहले अज्ञान में कांपा था, अब ध्यान रखना ये।
- 54:03बड़ी विरोधी बातें। लगेंगी।
- 54:05पहले अज्ञान से काँपा था, अब ज्ञान का तूफान देकर काँप रहा है।
- 54:16पहले अज्ञानी। था जानता नहीं था, डरपोक था भगवान
- 54:22से प्रार्थना की कार्यपन्य दोषोपह स्वभाव।
- 54:26प्रिशामितम धर्मसमुड़ से कहा जश्न ऐसा अनिश्चित रोहितन में शिष्य से
- 54:34अहम शादी मानतोम पर पनमा। मैं कायर हूँ, कायरता के वशीभूत।
- 54:43हुआ मैं डरा हुआ हूँ। मृत्यु से डरता हूँ।
- 54:49इस विकट परिस्थिति में जब शंखनाद हो चुका है, दोनों तरफ की सेनाएं
- 54:56मरने मारने को उतारू कुरुक्षेत्र के मैदान में है।
- 55:00मुझे डर लग रहा है। प्रभु?
- 55:03मैं भयभीत हूँ, मैं कायर हूँ। पहली दफ़े अर्जुन जो महाबली था
- 55:12बलिष्ठ भुजाओं वाला योद्धा था। पहली बार कन्फेस करता है कर्पण्य
- 55:18दोषो पह स्वभाव? मैं कायर हूँ मैं और जहाँ भगवान
- 55:27ये भी। कहते हैं।
- 55:30कि अगर कायर हो तो? कायरता की तरह स्वीकार करो, खुद
- 55:33को की मैं कायर हूँ। जीस चीज़ से मुक्त।
- 55:38होना है उसको स्वीकार करना सीख लो।
- 55:43यह मंत्र। को लिख लेना स्वीकार भाव बाबा
- 55:48नानक ने भी से कहा उससे मुक्त हो जाओगे, मृत्यु से मुक्त होना है,
- 55:56मृत्यु को स्वीकार कर लो। नुकसान से।
- 56:04डर लगता है नुकसान को स्वीकार करो।
- 56:08ये मंत्र को आजमा। के देखना ये मूल मंत्र है।
- 56:13इस मंत्र को। आजमा के देखना अपना के देखना।
- 56:18आपका मन डरता है? इरादे बांधता हूँ।
- 56:23सोचता हूँ तोड़ देता हूँ, कहीं ऐसा न हो जाए कहीं ऐसा न हो जाए
- 56:29ये मन के भटकन तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ेंगे।
- 56:35मन डरता है कहीं नुकसान? न पड़ जाए।
- 56:39बाबा? आप राय दो क्या करें कृष्ण कहते
- 56:44हैं स्वीकार कर लो। मृत्यु का दर्शन।
- 56:51करवातें हैं और कहते हैं इसे स्वीकार कर ले जैसे ही स्वीकार
- 56:57करेगा पायेगा कि उससे मुक्त हो गया।
- 57:01तुम भी सीखो। इससे कुछ मंत्र?
- 57:06यह श्लोक बड़ा कीमती। है।
- 57:11ये प्रश्न बड़ा कीमती? पूछा।
- 57:15अडवोकेट ट्रिपू दमन। ने।
- 57:21बड़ा सुन्दर सवाल है, स्वीकार करो, स्वीकार करने से तुम उससे
- 57:28मुक्त हो जाओगे। तुम काम से लड़ते हो।
- 57:35क्रोध से लड़ते। हो, लोभ से लड़ते हो, मुँह से
- 57:39लड़ते हो अंकार से लड़ते हो इसलिए लड़ाई में तुम्हारी उर्जा समाप्त
- 57:43हो जाती है। तुम कभी मुक्त नहीं हो पाते।
- 57:46दुश्मन से लड़ोगे तो कभी? मुक्त हो पाओगे दुश्मन बनी है।
- 57:52दुश्मन एक बाली की। तरह है।
- 57:54ये विकार एक बाली की तरह है। अगर इनके सामने लड़ने जाओगे तो
- 58:00आधा बल आपका इसमें चला जायेगा। इन शब्दों।
- 58:04को आप बड़े प्यार से अंतः में उतार लेना।
- 58:12विकार षट। विकार।
- 58:17बाली की तरह हैं। अगर उनसे लड़ोगे सामने जाओगे तो
- 58:21आधा बल। बेकारों में चला।
- 58:24जाएगा और तुम हार जाओगे। इसलिए भगवान एक।
- 58:30सबक सिखाती हैं तुम्हें। कि अगर विकारों को मारना है तो
- 58:37पीछे से मारो। छुप के मारते हैं बाली इसमें बड़ा
- 58:43राज़ है, लोग कहते हैं पाप किया। नहीं पाप किया विकार ऐसे ही मरते
- 58:49हैं। विकार के सामने जाओगे तो विकारों
- 58:55का आधा तुम्हारा बाल विकार खींच लेंगे और तुम अशक्त हो जाओगे।
- 59:04कैसे अब? उदाहरण दे दूँ, तो समझा।
- 59:08जाएगा। मैं सीधा सीधा।
- 59:14विकार को लूँगा उलटा पुलटा नहीं चला करता हूँ तुम्हें।
- 59:18काम का विकार आया सुंदर पुरुष सुंदर।
- 59:23स्त्री पर मोहित हो गया। तुमने उसका रूप।
- 59:26सामने लाना शुरू कर दिया। तुमने उसके अंग प्रत्यंग।
- 59:32सामने लाना ही शुरू कर दिए। बाली के सामने आओगे तो आपका आधा
- 59:40क्या करो, पीठ पे आ जाओ। जगह बदल लो।
- 59:47तुम तो भड़काते हो। तुम तो बी ऐफ़ चला लेते हो तो
- 59:51उससे भड़केगा। बिल्कुल बाली के सामने।
- 59:55आ गए। तुम्हारा बल गया अब।
- 59:59तुम नहीं जीत पाओगे इसको। तो इसको मारने के।
- 1:00:04लिए बाली बेकार हैं। भगवान तरीका।
- 1:00:08सिखाते हैं पीठ के पीछे से मारो, इसको जगह बदलो सामने लड़ो मत,
- 1:00:16इसके पीठ से रह जाओ, जाने बेकरों को देखो देखो और मात्र देखते ही
- 1:00:26रह जाओ। साक्षी और।
- 1:00:29साक्षी मैं ही बने रहूं हैलो मत अपनी जगह से सामने मत आओ, सामने
- 1:00:37आओगे तो फिर वो ही होगा बी ऐफ़ चलाने जैसा भावनाएँ भड़केंगे
- 1:00:41तुम्हारे। भड़केंगे तो तुम्हारे।
- 1:00:45अंग भी उतेजे तो होंगे? फिर जो होगा वो होता।
- 1:00:50है रोज़। नहीं बिकारों को जीतने।
- 1:00:58का एक बड़ा सुंदर तरीका राम ने बताया और राम ने ऐसे ही जीता।
- 1:01:06देखिए 14 वर्ष। वनवास में सीता के साथ रहे।
- 1:01:14लक्ष्मण भी रहे। और राम भी रहे और बुद्ध अपने
- 1:01:18सन्यासियों से घरे रहते हैं हर वक्त।
- 1:01:22और मरे 80 साल तक। 29 वर्ष में महल छोड़ दिया, 35
- 1:01:29वर्ष में पहुँच गए और 35 से ले के 80 इतने वर्ष तक परम ब्रह्मचारी
- 1:01:37का पालन। किया कैसे हुआ?
- 1:01:40ये बाली के सामने नहीं आया वो। बालिका दृष्टा बने रहे।
- 1:01:45दृष्टा यही तुम्हें सिखाया उन्होंने।
- 1:01:50देखो स्वास्थ्य। आती देखो स्वास्थ्य जाती देखो।
- 1:01:53ये सिर्फ स्वास्थ्य के लिए नहीं था, यह तो सिर्फ एक अभ्यास करना
- 1:01:58था यह तो सिर्फ एक तुम्हारे। भीतर संस्कार भरना था कि किसी तरह
- 1:02:06तुम स्वास्थों के साक्षी करने के अभ्यस्त हो जाओ और संस्कार पैदा
- 1:02:11हो जाए। साक्षीत तो का तो फिर तुम विचारों
- 1:02:15के भी साक्षी हो सकोगे और यही तुम्हें तंग करते हैं।
- 1:02:19मन का भटका भी तुम्हें तंग करता है।
- 1:02:21मन के तुम साक्षी होगे तो मन मौन हो जाएगा और मौन?
- 1:02:28उतार देता है तुम्हें। उस पर मौन में ये है सीधा सा
- 1:02:32फॉर्मूला लक्षणों से देखो। और आनंद को यकीन।
- 1:02:42नहीं आता। आनंद कहता है नहीं भाई मैं तेरे
- 1:02:44साथ रहूँगा, देखो भिक्षुक तो तेरा बन जाऊंगा, शिष्य तेरा बन जाऊंगा,
- 1:02:49भाई तो बड़ा हूँ। तो बड़े भाई तो समझदार।
- 1:02:53होते हैं। तुम्हें पता ही है चाहे बुद्धू ही
- 1:02:56क्यों ना हो, अक्सर होते तो बुद्धू ही हैं।
- 1:03:01लेकिन समझदार बनने। के बस ख्याल होते हैं, बड़ा हूँ 2
- 1:03:07साल बड़े होने से कोई बुद्धिमान थोड़ी हो जाता है।
- 1:03:10मैंने 9090 साल के लोग पागलखानों में बंद देखे हैं।
- 1:03:18तो आनंद कहता मैं। आपसे दीक्षा दूंगा।
- 1:03:20शक हो गया। बुद्ध कहते हैं कोई।
- 1:03:24आपत्ति नहीं 24 घंटे आपके साथ रहूँगा।
- 1:03:28बुद्ध कहते कोई आपत्ति नहीं। मरते दम।
- 1:03:36आनंद को विश्वास तो बहुत पहले हो गया था।
- 1:03:401020 साल में हो। गया।
- 1:03:44आगे का समय। तो बड़े समर्पण में गुजरा आनंद का
- 1:03:50और आखिर वक्त में तो परम समर्पित हो गए।
- 1:03:54बुद्ध के बाद मरने। के बाद पहुंचने वाले पहले व्यक्ति
- 1:03:58थे वो महावीर के मरने के बाद पहुंचने वाले व्यक्ति पहले गौतम।
- 1:04:08और बुद्ध की मृत्यु? के बाद पहुंचने वाले पहले व्यक्ति
- 1:04:11आनंद। तो तरीका बताते हैं तो।
- 1:04:24श्रेष्ठ की तरह देखो। हूँ तो मृत्यु भी में।
- 1:04:30हूँ तो जहर भी में इसका अर्थ ये नहीं कि जहर को पी लो।
- 1:04:35लेकिन अमृत भी तो मैं? हूँ।
- 1:04:40एक इशारा कर रहे हैं। कृष्ण तो मैं अदृश्य रूप से के
- 1:04:46अमृत भी मैं हूँ इसलिए अमृत में क्यों नहीं उतर जाते?
- 1:04:52क्यों वासनाओं का जहर? रोज़ पीते हो?
- 1:04:57क्यों क्रोध काम लोग मोह अंकार भै इन वासनाओं का रोज़ जहर पीते हो
- 1:05:02तुम रोज़ मरते हो तुम बुरी मौत मरते हो तुम?
- 1:05:09और शरीर तो देखो। मरेगा जन्म भी बालकपन भी।
- 1:05:16जवानी भी प्रौढ़ भी और वृद्ध अवस्था भी।
- 1:05:21उसके बाद मौत हुई इसर्रिर की अवस्थाएं लेकिन मरो तो ऐसे मरो सब
- 1:05:31पा के मरो, निर्भीक हो के मरो। परम साहसी हो जाओ।
- 1:05:39तो मरने के वक्त साक्षी हो जाओ, यही थी बोर्दों की प्रक्रिया।
- 1:05:45जो तिब्बती लोग लामा। लोग आज भी करते हैं।
- 1:05:50जो कमजोर होते हैं फिर? बाहर से।
- 1:05:53उन्हें इंस्पिरेशन करते हैं कि तुम नहीं हो ये जो मर रहा है तुम
- 1:05:57नहीं हो और जो पहुँच गए हैं वो तो आराम से मर ही जाते हैं।
- 1:06:02उनको इंस्पिरेशन की कोई जरूरत ही नहीं होती।
- 1:06:20पुरोहितों में मैं। बृहस्पति हूँ सेनानियों में मैं
- 1:06:26कार्तिकेय हूँ और जलाशयों में हाँ वो।
- 1:06:31जलाशय तो। तालाब भी होता है, जलाशय तो नदी
- 1:06:34भी होती है लेकिन देखिए नदी को नहीं कहा उन्होंने।
- 1:06:40गंगा नदी को। भगवान कृष्ण ने नहीं कहा के मैं
- 1:06:43हूँ। भगवान कहते के समुद्र।
- 1:06:46में हूँ, जलाशयों में समुद्र में हूँ।
- 1:06:53कहना क्या चाहते हैं? भगवान।
- 1:06:58कहना चाहती हैं कि। मैं शुद्र भी हूँ, विराट भी हूँ।
- 1:07:05क्यों शूद्र की तरफ घसीट जाते हो, विराट में क्यों नहीं उतर जाते?
- 1:07:13विराट भी तो मैं ही। हूँ।
- 1:07:16क्यों मन भक्षण करते? हो?
- 1:07:22सुंदर सुपाच्य भोजन। भी तो मैं हूँ।
- 1:07:28सिर्फ जीना ही तो होता। है।
- 1:07:31खाने के लिए थोड़ा जीना होता है, जीने के लिए खाना होता है।
- 1:07:38मुझे लोग पूछ लेते हैं। पापा, 12 वर्ष हद हो।
- 1:07:42गई नमक नहीं। खाया।
- 1:07:45इसका राज़। मैंने कहा मैं जीने के लिए खाता
- 1:07:49हूँ। खाने के लिए नहीं।
- 1:07:52जीता हूँ। बस।
- 1:07:54जिससे जीवन चल। जाए हृदय धड़क जाए।
- 1:07:59लंग्स? काम करें स्वास्थ को खींचने का,
- 1:08:07फेंकने का। शरीर के भीतरी बाहरी।
- 1:08:11अंग। सुचारु रूप से गति करते रहे।
- 1:08:14बस इतना और मैंने कहीं नहीं जाना। यहाँ जाना है नित्य कर्म स्नान
- 1:08:22वगैरह और कुछ नहीं ना मैंने पूजा करनी ना प्रार्थना करनी मैं अपनी
- 1:08:26शक्ति कहीं खराब ही नहीं करता। इन फालतू के आडम्बरों।
- 1:08:30में ना पूजा करता हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ मैं भक्ति
- 1:08:34करता हूँ, कुछ नहीं करता हूँ, मैं करने की आवश्यकता भी क्या है?
- 1:08:39यही तुम्हें सीखाता हूँ मौज करता हूँ।
- 1:08:45अपने अस्तित्व में उतर जाता हूँ और मस्त हो जाता हूँ तुम भी हो
- 1:08:50जाओ। हो जाओ ऐसा मत करो।
- 1:08:59बहुत बोल लिया। अब तो वक्त देखिए वृद्ध हो गया
- 1:09:04हूँ बोलते। बोलते थक भी।
- 1:09:07गया। अभी कर ही एक व्यक्ति का आया पशु
- 1:09:12बाबा। आपने सब कुछ।
- 1:09:13तो कर लिया। हमारी दृष्टि में आप।
- 1:09:19भगवान हो। लेकिन फिर भी साधना क्यों?
- 1:09:22कर रहे हो मौन? यही यंत्र थक?
- 1:09:26जाता है। भाई बोलता बोलता?
- 1:09:28पांच वर्ष हो गए बोलते को अब थकावट महसूस करता है।
- 1:09:34ये मौन से जैसे। रात को सोने से।
- 1:09:40फ्रेशनेस आती है। वैसे मौन से सभी अंग जो थक गए
- 1:09:44हैं, ये फुर्स से थोड़ी सी एनर्जी ग्रहीत कर लेंगे।
- 1:09:53इसलिए मून हो गया हूँ। अब बोलने का तो वैसे कोई अर्थ
- 1:09:57पहले भी नहीं था अब। भी नहीं है लेकिन ये यंत्र थक।
- 1:10:03गया है। तो इस यंत्र को भोजन।
- 1:10:07भी देना पड़ता है। इस यंत्र को।
- 1:10:13भोजन के साथ विश्राम भी देना पड़ता है नींद।
- 1:10:17और इस यंत्र को। मौन भी देना पड़ता है इसको।
- 1:10:21बरकरार रखने। के लिए।
- 1:10:25अगर मैं मौन हूँ। बाहर का कोई व्यक्ति तंग नहीं
- 1:10:28करता, बातें नहीं करता क्योंकि मुझे पता है आप कैसी बातें करते
- 1:10:34हो, मुझे सब पता है तुम्हारे प्रश्न दो कौड़ी के प्रश्न हैं
- 1:10:40कोई भी हो। और मैं इन प्रश्नों के।
- 1:10:48उत्तर देता देता थक जाता हूँ थक गया हूँ थोड़ी देर विश्राम कर रहा
- 1:10:53हूँ, बस इसी कारण से मैं मौन में उतरा हूँ और मुझे कोई सजा थोड़ी
- 1:11:01हुई है मैं जब चाहे बोल सकता हूँ बोलता ही हूँ।
- 1:11:06प्रवचन नहीं करता हूँ जब। मन में आए तो मौन?
- 1:11:10रह जाता हूँ। प्रवचन भी नहीं करूँगा।
- 1:11:13उस दिन। तो हमारे चैनल।
- 1:11:18कंट्रोलर रोहित हैं, अर्पित हैं। ये आपको पुरानी वीडियो।
- 1:11:23सुन्दर ढंग से पेश कर देंगे। बहुत सी वीडियो है।
- 1:11:31कृष्ण भगवान। ये कहते हैं कि हूँ तो मैं
- 1:11:36निकृष्ट भी, लेकिन तुम सर्वश्रेष्ठ की तरफ जाओ हूँ तो
- 1:11:41मैं जहर भी। लेकिन तुम अमृत की।
- 1:11:44तलाश करो, मैं अमृत हूँ। हूँ तुम्हें दुख हुई, लेकिन तुम
- 1:11:50सुख की तलाश करो। तुम आनंद की तलाश।
- 1:11:55करो तुम्हारे ही भीतर बैठा हुआ मैं सर्व व्यापी भीतर चलो अंतर
- 1:12:06यात्रा करो। वहाँ तक पहुँचो मगन हो जाओगे मगन।
- 1:12:18होना जो सीख। लेता है उसको जीवन का स्वाद आने
- 1:12:22लगता है। पर वो कहीं नहीं जाना।
- 1:12:25चाहता ना मक्का, ना तीरथ। फिर उसके भीतर ही।
- 1:12:36मक्का है, उसके भीतर ही तीर्थ है। एक व्यक्ति ने।
- 1:12:46बना के राम मंदिर। भीतर के भगवान।
- 1:12:51के बनाए मंदिर का उड़ाया है मजाक ये मजाक है।
- 1:13:04उनकी राजनीति है। भगवान का मंदिर जो भगवान ने बनाया
- 1:13:10वो तुम्हारे भीतर है। बाहर का मंदिर ईंट, पत्थर, गारा
- 1:13:16से बना सरिया से बना। भीतर का मंत्र भगवान।
- 1:13:21ने बनाया आदमी उसे बना भी नहीं सकता।
- 1:13:30तो अपने भीतर उतरो, यही कृष्ण कहते हैं।
- 1:13:34निकृष्ट भी मैं उत्कृष्ट भी मैं तुम मरना क्यों चाहते हो।
- 1:13:42उस अमृत के स्वाद। को क्यों नहीं पीना चाहते?
- 1:13:45जब वो हो तुम फिर भी मरो, ये विडम्बना है।
- 1:13:55तुम भीतर उतर जाओ। उस अमृत तत्व तक।
- 1:14:00और फिर देखो जीने का। मन करेगा कि नहीं करेगा जीवन एक
- 1:14:05आनंद हो जाएगा, जीवन एक मस्ती हो जाएगा।
- 1:14:13सुरत? भाई मतवारी।
- 1:14:32सुरत? भयी मदवा पी गई।
- 1:14:50बिना। बोले।
- 1:14:55मदवा। की गई।
- 1:15:01बेना? बोरा मन मस्त हुआ फिर क्या बोले?
- 1:15:14मन। मस्त हुआ फिर क्या बोले मस्त हुआ
- 1:15:24फिर क्या बोले, मन मस्त हुआ, फिर क्या बोले?
- 1:15:35मन मस्त हुआ फिर क्या बोले मदवापी गई बिन तोल बिन तोल मन मस्त हुआ।
- 1:15:54फिर क्या बोले मन मस्त हुआ फिर क्या बोले?
- 1:16:05सूरत। करारी भाई मतवार।
- 1:16:12मदवा। पी।
- 1:16:14गई। बिन।
- 1:16:16तोलै मदवा पी गई बिना बोले मन मस्त हुआ फिर क्या?
- 1:16:29बोले। मस्त हुआ फिर क्यों बोले?
- 1:16:38धन्यवाद।