Latest / Baba ji Vijay Vats / 6/5/26 - विरह की आग और आनंद का सागर: क्यों दशरथ की मृत्यु साधारण शोक नहीं, बल्कि 'संबोधि' थी?
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- 0:15पुष्पुंजली प्रयागराज बाबाजीपुरम आप कहते हैं कि परमात्मा की लीला,
- 0:39उसकी पथ कथा। उसकी सारी फ़िल्म उसने खुद ही
- 0:51लिखी है। वह अपनी ही बनाई हुई सर्जना से
- 1:04ऐसा ही खेलना चाहता है। बाबा आपने आज तक?
- 1:19प्रसिद्ध गाथाओं में सबसे मार्मिक पठकथा कौन सी सोनी मानी कृपया
- 1:40हमें बताइए। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरक्ष
- 2:15मैथिलीशरणगुथ की एक रचना हाय अबला नारी।
- 2:26तेरी यही कहानी आंचल में है दूध और आँखों में पन प्रकृति की वो
- 2:41निष्ठुर पटकटी मुझे मेरे। गहरे अंतःस्थल तक भावुक कर जाती।
- 2:57रोला जाती यह लीला उसने क्या लिखी गजब कर दिया।
- 3:12किसने सुना, मंत्रमुग्ध हो गया जो उसने लिख दिया पटकथा वैसे ही
- 3:31फ़ल्माई जाए। संत के कहने का कुल मत वेतन होता
- 3:38है जो वह करता है ठीक करता है, भले के लिए करता है मतलब यह पटकथा
- 3:53उसने लिखी। अपनी ही लीला से वह खेलता है
- 4:05जीसको उसकी लीला से ऐतराज होता है, वह दुखी होता है।
- 4:12जीसको उसकी लीला से सहमति होती है, वह प्रसन्न रहता है तो
- 4:19तुम्हारे हाथ में यही कुछ है। उसकी लिखी हुई पटकथा से तुम नाराज
- 4:27हो, शिकायत करते हो? और उसकी लिखी हुई पटकथा को बदलना
- 4:33चाहते हो तो फिर तुम अज्ञान अगर उसकी लिखी हुई पटकथा को तुम पूर्ण
- 4:45हृदय से स्वीकार कर लेते हो तो तुम ज्ञानी।
- 5:00प्रकृति को वह निष्ठुर पटकथा मेरे अंतस।
- 5:09को चीर जाती है एक राजा के। राज़ दुलार बन बन फिरते, मार मार
- 5:35इक राजा के। राजदुलार बन बन फिरते मारे माँ,
- 5:51होनी हो कर रहे करम गति। तरइना का हो के टा
- 6:17जन जन के दुःख हर नेवार जन जन के। हे दुःख हरने बाल कष्ट उठाते हैं
- 6:42जन जन के प्रियराम। लखन सिया बन हो जाते हैं।
- 6:59हो वेदना दे रे लेख किसी। समझ न आते हैं, समझ न आते हैं।
- 7:24ऐसी प्रकृति की निष्ठुर पटकथा। भक्त के हृदय को विदेह कर जाती है
- 7:41और संत के हृदय को अष्वपूरित कर जाती है।
- 7:48नृत्य संयम हो जाता है। सबसे सुन्दर पटकथों में से
- 7:57परमात्मा की सृष्टि में मुझे यह पटकथा सबसे सुंदर लगी।
- 8:08राजा का बेटा राजा की बेटी को ब्याह के ले गया।
- 8:20एक राजा एक स्त्री से प्यार ज्यादा करता है।
- 8:31इस पटकथा में मानव के चरित्र की दुर्बलताएं भी बताई गई।
- 8:42राजा को। किसी स्त्री से स्नेह विशेष नहीं
- 8:48होना चाहिए, लेकिन समझदार सबसे कौशल्या से सुंदर सबसे।
- 9:03के के में त्याग का मादा बिछा 353 धर्मपत्नियां थीं।
- 9:18दशक तीन ऑथेंटिक। और 350 दासी, लेकिन वह स्नेह करता
- 9:36था तो सबसे ज्यादा स्नेह करता था। और प्रकृति की निष्ठुर गाथा देखी
- 9:52है माँ अपने बच्चे को ज्यादा प्रसन्न देखना चाहती है स्वभाव।
- 10:09इसलिए टीके ने राजतिलक बर्दाश्त नहीं किया।
- 10:15राम का वह अपने पुत्र को राज़ गद्दी पर शिक्षित होना चाहती थी।
- 10:21उसका कारण यह नहीं कि पुत्र राजा हो जाए।
- 10:25तुम भ्रांति में हो जाता। उसका कारण अहंकार था।
- 10:31कैतिक मैं महारानी कहला हूँ, असल में बहुत ही चीजें तुम समझ नहीं
- 10:39पाती। उनका ओरिजिनेटेड प्वाइंट कोई और
- 10:45होता है? तुम समझ को छोड़ लेते मंत्रा ने
- 10:53केकई के उस अहंकार को जगाया कि कौशल्या महारानी क्यों बने, तुम
- 11:01क्यों नहीं राजा की चहेती हो? राजा के लिए बलिदान किया है
- 11:06तुम्हें? और दो वर्ग भी तो है तुम्हारे पास
- 11:13मूल व्यक्ति को गलत बाते जच्ची जाया करती है और प्रकृति यहाँ
- 11:23अपना निष्ठुर खेल खेलना शुरू कर देती है।
- 11:30राम भवन गवन करते हैं, सीता संग जाती है
- 11:49और यहाँ से राम की तपस्या शुरू होती है उससे पहले राम।
- 11:59साधारण राजा के पुत्र हैं। अब से शुरू होती है राम की वह
- 12:10गाथा जो राम को पुरुष उत्तम बनाते है, मर्यादा पुरुषोत्तम बनाते है।
- 12:22सीता को ऐसे विशेषणों से युक्त करके के इतिहास में कोई नारी सीता
- 12:38जैसे कष्ट सहन नहीं कर सके। अपनी नारी सुलभ विश्वास के का
- 12:55नारी विश्वास कर सकती वह एक। भगवा वस्त्र धाई राक्षस के शिकंजे
- 13:11में फंस गए। ध्यान रखें यहाँ पग पग पर।
- 13:28राक्ष शून्य बग्वा वस्त्र पहन। लिया।
- 13:36होशियार यार, जाने ये रास्ता। यहाँ ज़रा न इधर चुकी तो माल
- 13:45दोस्तों सीता ने तो एक बार अपनी परीक्षा दी थी, लेकिन मैं हैरान
- 14:01हुआ करता हूँ। लेकिन सीता को तो सिर्फ एक ही
- 14:16फिकर था, सीता ने तो अपना सतित्व बचाना था और कुछ नहीं वह वो बचा
- 14:25गई। कितने वात राम के राम के दिमाग के
- 14:37ऊपर कितने पहरे छ कितने जंजा वात आए।
- 14:46और उसे सबकी सुननी पड़ी इस क्रूर नीती निष्ठुर नीती ने तिल तिल पर
- 15:04राम की परीक्षा की। जैसे ही राम को बुलाया गया, केके
- 15:12को पवन में बैठे केके ने वरदान मांगे।
- 15:21दशरथ गच खाकर कर पड़े। अगर वो केके से।
- 15:29प्रेम करते थे तो राम से बहुत ज्यादा।
- 15:32प्रबंध थे। राम लखन सिया बन गए देखत दशरथ ने।
- 15:55भारत ने जो हसमन्त की, तड़पती छोड़े, छ।
- 16:13जाते हुए देखते हैं ना अपने प्राण, राम दशरथ के प्राण और
- 16:29देखते देखते ना दिन में ना रात में।
- 16:35अगरे लारा पशु बनकर नैनो से प्रस्फुटित होती है सुमंत की वाट
- 16:46ज्योति ने सुमंत को समझाया था, देखो इन्हें समझा बजा के किसी तरह
- 16:53लिया ना? ये मान जाएंगे कोमल चित अति दीन
- 17:04दयाला कोमल चित अति दीन दयाला। कारण बिन रघु नाथ के पाल एको में
- 17:21जपिश। बाप की नजरों में बच्चा बहुत दशरथ
- 17:32ने भी यही सोचा। के भोला बच्चा समझाने से समझाक तू
- 17:43किसी तरह से भी लेके आ गया। मुझे विश्वास है कि राम आजाक चित
- 17:53कोमल है उसका। जब मेरी दीनता की व्याख्या करोगे
- 18:09तो राम का हृदय पिघल जाएगा और भावना के साथ वर्षी भूत हुए।
- 18:20प्रेम के वश में राम वापस आ जाएंगे।
- 18:25तू चौकना मत समंत ये सभी तीन मेरे प्राण हैं, इनको छोड़ के मत आ
- 18:39जाना। बाटन जोह सुमंत की मूँद लिए हैं
- 18:59लेकिन। बात जोते जोते हैं?
- 19:03राम नहीं हैं। रोते रोते तड़पते तड़पते हरम हेरा
- 19:20दशरथ प्राणविहीन हो गए बड़े तर्क। यह एक ही वे शिक्षा देती है।
- 19:44मोह सबसे बड़ी अर्चन है मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी अर्चन अगर कोई
- 19:53है मुकाम, क्रोध, लोह अंक। मोह।
- 20:01है। अगर मोह को निकाल दिया जाए तो
- 20:11ज़िन्दगी निराश हो जाती है। यही मोह है जो ज़िन्दगी को
- 20:15रहस्यमय बनाता है और यही मोह है। जिसके कारण व्यक्ति उछड़ जाता है।
- 20:34यही दशरथ ने देखा था। मेरा पुत्र बड़ा होगा, मैं उसे
- 20:41राज्य दरबार में आसीन करूँगा। राज़ तिलक करूँगा।
- 20:48लेकिन सब अरमा उजड़ गए। बचपन के सपने अरमानों।
- 21:06की शाम घरे उजड़ गए बचपन के सपने। अरमानों के शाम ढले यहाँ जले दशरथ
- 21:39का हीरा। वहाँ ये ऐसे के प्राण चले राम
- 21:59क्या गए? दशरथ प्राणविहीन हो गए।
- 22:04यह है मात्र पंचभौतिक तत्व का पुतला पंचभौतिक तत्व का पुतला
- 22:09रहते शून्य अवस्था में अचेत अवस्था में गिर गए।
- 22:18वह। इस प्रेम को तुम प्रेम करते हो,
- 22:36वह प्रेम नहीं मोह जब मोह को तोड़ना इतना मुश्किल हो जाता है
- 22:47कि मोह टूटे से टूटता है। तो तुम्हारे पास एक ही रास्ता
- 22:54रहता है अभी से ठीक से समझ लेना उछड़ गए बचपन के सपने अरमानों के।
- 23:21सांभल कहीं जले चले बारात किसी की।
- 23:38कहीं किसी का प्यार जल कहते कोई न करे यहाँ प्यार कह दो कोई न।
- 24:00करे यहाँ प्यार इसमें खुशियां हैं कम बेशुमारू हैं, गम एक हँसी और
- 24:16हैं आंसू। हर्जा कह दो, कोई न करे यहाँ
- 24:28प्यार, हमने तो सोचा। के फूल खिले चुन चुन के देखा तो
- 24:46कांटे मिले यह अनोखा जहाँ हरदम तो खा यहाँ।
- 24:58इस वीराने में कैसी बाहर कह दो कोई ना करे यहाँ प्यार।
- 25:14इसमें खुशियां हैं कम बेशुमारू हैं, गम एक हँसी और हैं आंसू 1000
- 25:30कह दो कोई ना करे। यहाँ प्यार प्रीत पतंगा दिए से
- 25:44करी, उसके हीलों में वो जल जल मरे।
- 25:55प्रीत पतंगा दिये से करे, उसके हीलों में वो जल जल मरे मुश्किल।
- 26:12राहें यहाँ अश्कुर आंही यहाँ इस में चैन ना नहीं ना करा कह दो कोई
- 26:30ना। करें यहाँ प्यार इसमें खुशियां
- 26:38हैं कम बेशुमाल हैं गाँव एक हँसी और हैं आंसू।
- 26:48हर जा दो कोई ना करे यहाँ प्यार। बाबा जी पण आग देह को जलाते।
- 27:10लेकिन किसी से सच्चा प्रेम हो जाए और बिरहा हो जाए तो बिरह के पल पल
- 27:20पल प्राण उसकी आस में जलता है। किसी गली में मोड़ते वक्त कहीं
- 27:29आते जाते बस ऐसा लगता है कि बस अब एक बार दिख जाए।
- 27:42पूरे जीवन का केंद्र बिंदु ही वही हो जाता है।
- 27:47जिसके इर्द गिर्द दुनिया घूमने लगती है।
- 27:53इसके बाद दुनिया में उसके सिवा और कुछ भी अच्छा नहीं लगता है।
- 28:01बाबा जी क्या प्रबुद्ध था। इस बिरहा को समाप्त करवाती है।
- 28:10आपने बताया था बाबा जीके 1975 में शिव भगवान से आपने प्रेमिका को
- 28:16मांगा था क्या? प्रबुद्धता के बाद या बिरहा
- 28:23संपूर्णतः समाप्त हो गया। बाबा जी, आपके गाये हुए संगीत में
- 28:31मुझे आज भी आनंद के साथ साथ बिरह की अग्नि का आभास क्यों होता है?
- 28:39श्री यश गोरा। यही समझाने जला था काश दशरथ उस
- 28:59सतल पर पहुँच जाते जीस सतल पर प्रबुद्ध हो जाता है जीस सतल पर
- 29:05राम। राम ने जो कष्ट उठाये उसकी गाथा
- 29:19अगर इस पंच भौतिक तत्व के हिसाब से देखी जाएगी तो तुम अपने आंसुओं
- 29:24को रोक नहीं पाओगे। और अगर राम की यह गाथा उसके अंत
- 29:36है, स्रोत से देखी जाएगी जहाँ मात्र वो साक्षी है और घटनाएं
- 29:43मात्र गठित हो रही हैं। आकाश में बादलों की तरह आती हैं,
- 29:48ठहरती हैं, चली जाती हैं तो फिर तुम कृष्ण का मर्म भी समझ जाओगे।
- 29:56राम के चरित्र में दोनों चीजें समाहित।
- 30:06मोह की दृष्टि से देखोगे तुम तो तुम्हें दशरथ का विवाह नजर आएगा
- 30:17वह तड़पता हुआ जीरा, वह तड़पता हुआ जीरा किस तरह एक बार?
- 30:26सुमंत इन्हें वापस ले आओ, मेरे प्राण राम में बसते।
- 30:44राम राम करने वालों, काश तुमने दशरथ की तरह राम राम किया होता
- 30:54राम के वापस न आने का कारण? जीस तरह से तड़प तड़प के दर्शक
- 31:00प्राण विहीन हो जाते हैं। काश तुम वैसे राम राम के होते
- 31:06पूरे प्राण तुमने झोंक दिए होते और पूरे प्राण तुम्हें तुम्हारे
- 31:12राम के दर्शन के लिए आत्र हो जाते।
- 31:16तो दशरथ भी प्रभुत्व हो के मृत्य, यह तुम्हें शायद किसी ने बताया
- 31:22नहीं होगा। दशरथ का राम राम जबना जीस अधार
- 31:32शिला से आता है। वो आधार शीला तुम्हारे पास नहीं,
- 31:41तुम मातृ खुपडिया से राम राम झपते हो और तुम्हारी खुपडिया गंडती है,
- 31:50लेकिन ज़रा पूछो राम के हताश। दशरथ के हृदय से पूछो ये कितनी
- 32:01माला जपली तो क्या दशरथ बता पाएंगे नहीं दशरथ का राम राम
- 32:13जपना। जाप नहीं रेपुटेशन हृदय की आग में
- 32:21बिरहा की आग में जलती हुई वह याद है, वह स्मरण है जीसको संतों ने
- 32:29कहा कि स्मरण करना रेमेम्बेर यूरसेल्फ़।
- 32:36लेकिन आज हमने हर चीज़ को दिखावा बना दिया है, जो उस सत्य को
- 32:50दिखावे में परिवर्तित कर देगा। वह मात्र अभिनेता होगा।
- 32:57अभिनेत्री होगी बिरहा की आग जो दशरथ को जला गई।
- 33:13वह बिरा की आग तुम्हें नहीं चलाते इसलिए तुम में रूपांतरण नहीं
- 33:20होता, इसलिए तुम बचे रहते हो और वर्ण ज्यादा बलि होकर बचे जाते
- 33:28हो। तुम्हारा अहंकार राम राम करने से
- 33:31बड़ता है। दशरथ अहंकार शून्य अवस्था में
- 33:39प्राण विहीन हो जाते हैं। उनकी चेतना शरीर को छोड़ देती है।
- 33:44उनका देही गल जाता है इस बिरहा में।
- 34:09प्रीत के दुख हो नगर डंडोरा। रीत नकरियों को जीस से विवाह की
- 34:42आग में जलता हुआ राम का पिता दशरथ।
- 34:50उसका देह ही गल जाता है। यह एक बड़ी सुंदर हमारे ऋषियों ने
- 35:03वेटुलिवरेट बनाया था। हमने उसको नकल में डाल लिया।
- 35:11अगर इस तरह कोई मरेगा तो वह राम में हो जायेगा।
- 35:18लेकिन कौन मरता है इस तरह तुम्हारा अहंकार तो राम राम करने
- 35:26के बाद? राधे राधे करने के बाद और ज्यादा
- 35:31बढ़ जाता है और तुम मन को समझा लेते हो के राधे राधे करते डूबे
- 35:38हैं मोक्ष मिल गया हो गया तुम गलती में ये और ज्यादा दुख में।
- 35:49गर्व को कृण करें क्योंकि इन्होंने मूलता करते करते प्राण
- 35:55त्याग। यह दुनिया में आज जो संकट है दुख
- 36:04का दर्द का। वो बिरहा का नहीं बिरहा का दर्द
- 36:11अलग होता है जो मीरा को होता है और रेपुटेशन में तुम्हारा अहंकार
- 36:21पड़ता है। तुम कहोगे मैं कोई माँ मूली
- 36:27व्यक्ति नहीं मैंने एक अरब राधे राधे किया है अभी तो ऐसे मूर्ख इस
- 36:35धरती पे विराजमान हैं जो कहते हैं आठ गोठ जप कर।
- 36:45साक्षात हो अधिष्ठात्री देवी और शिव तत्व तुम्हारे सामने खड़े हो
- 36:56जाएंगे। आखिर हमने देखी है जन्नत की
- 37:01हकीकत। लिखनी दिल के बहलाने को गालिब ये
- 37:05ख्याल अच्छा है अरे इसको भी आज खोल दूँ बाबा जी आपके गाये हुए
- 37:17संगीत में? मुझे आज भी आनंद के साथ साथ बिरहा
- 37:22की अग्नि का आवाज क्यों होता है जो बिरहा में आनंद आए?
- 37:37वो अंतः के मूल स्वरूप से उठा होगा और जीस बिरहा में दुख हो, वह
- 37:47बुद्धि से उठा मीरा का और दशक का बिरहा।
- 37:59उदगम स्रोत से आता है जहाँ वो प्रेम का सागर बहता है जिसकी
- 38:12अनवरत रंगों से उठा हुआ वो एवपोरटीओन प्रेम बनकर बरसता है।
- 38:26इसलिए मेरा गाती तो है, नानक भी गाते हैं।
- 38:38और। कबीर भी सोनीत कलारी भली मतवारी
- 38:49मतवारी हो जाती है सो मदवापी गई। बिन तोले जन्म जन्मो के प्यासे जब
- 39:03तुम उस व्यासी सूरत को लिए उसके पास जाते हो, जो प्रेम का समुद्र
- 39:10है, खजाना तो तुम वहाँ हाथबड़ाके पड़ते हो।
- 39:18माँ तुम्हारा मन करता है कि अगस्त की तरह सारा समुद्र ही गटक जाऊं,
- 39:28इसलिए तुम खूब पीते हो, खूब पीते हो और इतनी पीते हो कि फिर तुम
- 39:37पीते, पीते उसी में उतर जाते हो। अठखेलियां करने लगते हो उस आनंद
- 39:43के समुद्र में लेकिन फिर जब तुम्हें बाहर आना पड़ता है तो तुम
- 39:58उस तल से जहाँ अग्नि नहीं पहुँच सकते।
- 40:02नैननम छद्म ती शस्त्र प्राणी नैननम दाहती पाल का न चैनम के लिए
- 40:08धनत्यापों न उस मूल तत्व से ऊपर उठते हो और कलेक्टिव अनकॉन्शस में
- 40:23प्रवेश कर जाते हो। तुम वहाँ तुम्हें आस पास की
- 40:28तिरंगें प्रभावित करती हैं और उन तरंगों में दुख है उन तरंगों में
- 40:35बेहरह वो तरंगें तुम्हें अपनी लपेट में ले लेती हैं।
- 40:43ध्यान रखना किसी संत का शरीर भी राजस्थान के गहराती लोगों से बच
- 40:50नहीं सकता। शरीर तो अपना धर्म निभायेगा ही,
- 40:56आत्मा अपना धर्म निभायेगा, शरीर अपना धर्म निभायेगा।
- 41:03तुम ये मत सोचना ये प्रहलाद जो जलते नहीं, यह तो गार्थने हैं,
- 41:10सिम्बोलिक अब्रीविएशन हैं, इनको समझने की आवश्यकता है, सत्य इनके
- 41:16भीतर रस की तरह छिपा हुआ है, कोई उद्घाटित करने वाला होना चाहिए।
- 41:25जब तुम उस तल से ऊपर उठोगे, जीस तल पर चिंता की आग नहीं पहुंचती
- 41:32चिता की आग ही नहीं पहुंचती। फिर पहुंचती हैं कोलेक्टिव
- 41:41अनकॉन्शियस मेंड में तुम्हारे प्रवेश करते ही मैं तुम्हें पहले
- 41:48भी बताया यह सारा अस्तित्व ब्रमंड।
- 41:57गुथः हुआ है। आपस में कड़ियों की तरह ज़ंजीरों
- 42:02की तरह इंटरमींगड जब तुम उस क्षेत्र में प्रवेश किए तो सारे
- 42:16संसार से आती हुई तरंगें तुम्हें घेरती हैं।
- 42:23और वह तुम्हें व्यक्षित कर जाते हैं, इसलिए मैंने कहा मांसाहारी
- 42:29छोड़ दो, पाप करना छोड़ दो। संत तुम्हें सदा कहते हैं यह मूल
- 42:36है दुःख का पुण्य करो। लुटाओ दान करो बे शर्त लूटो बे
- 42:52शर्त लुटाओ अपने खजाने और संत यही करता है।
- 43:03संत अध्यापक जो 3040 मिनट के प्रवचन का आपस्य महाव्या ले संत
- 43:12कोई कथावाचक भी नहीं होता, जो अपनी फीस पहले तय करते।
- 43:19संत तो बांटता है, संत लुटता है क्योंकि वो इतना भर गया है, उसकी
- 43:26गागर इतनी भर गई है? छल के बिना वो हल्की होगी नहीं।
- 43:32उसे झलकना नहीं पड़ता। वह छल के जाया करती है।
- 43:38क्योंकि और स्थान नहीं गले तक पूरी भर गई है।
- 43:48एक बूंद भी समाने को वाकई इतना भी स्थान नहीं।
- 43:54इतना भी स्पेस में। फिर क्या घटित होता है?
- 44:00फिर वो छलकती है, क्योंकि गगन मंडल से तो निरंतर हर घड़ी, हर पल
- 44:09वह संत का शरीर चाहे सोया चाहे जगा।
- 44:14वह झलकता ही रहता है इसलिए रात को वह बांटता है।
- 44:23बांटने वाला उपकरण सो जाता है इसलिए सारी रात वह पीता है उस रस
- 44:33को। और सुबह सुबह उसकी वाणी में जोरस
- 44:38होता है वो तुम साफ साफ महसूस करोगे।
- 44:46उसकी वाणी में जो प्यार होगा वह तुम सुबह सुबह महसूस करोगे।
- 44:50एक दर्द भी होगा। एक बिरहा की आग की झलक भी तुम्हें
- 44:56मिलेंगे वह सब वह है जैसे तुम मेरे पास आते हो आसानी तरंगें
- 45:07तुम्हें मिलती हैं यहाँ, लेकिन तुम लेके आते हो बाजार से लासानी
- 45:11तरंगें। और मैं तुम्हें बाहर थोड़ी देर
- 45:13बैठा देता हूँ क्योंकि अगर तुम वैसे ही चले आए तो लासानी और
- 45:22आसानी दोनों मिल जाएंगे। तुम्हें वो आनंद नहीं आएगा
- 45:26तुम्हें पता नहीं चलेगा। थोड़ी देर बाहर बैठकर तुम स्नान
- 45:33कर लेते हो। वो जो लासानी तरंगे तुम अपने साथ
- 45:39धूल के रूप में लेके आए थे, वो इपोरेट हो जाती हैं, उठ जाती हैं
- 45:44वातावरण में और तुम शुद्ध स्नान किए व्यक्ति की तरह हो जाते हो।
- 45:51क्योंकि वो बाहरी थी, वो तुम्हारी अपनी नहीं थी, बाजार में थी इसलिए
- 45:59मैं बाजार में निकलता नहीं, यह कोई तप नहीं है मेरा मैं उस रस को
- 46:13और पीना ही चाहता हूँ। इतना पीना चाहता हूँ कि मैं जितना
- 46:22ज्यादा हो सके तुम्हें बांटो। यह बांटने की यह भी एक बात सुना
- 46:32है। पाटन की वासना भी एक वासना है।
- 46:46इस को ऋषियों ने नाम दिया करुणा का तो बुद्ध के पास एक वासना रह
- 46:52जाती है। करुणा।
- 46:55करुणाबतारम संसार सारु भुज केन्द्रकारम सदा वसंतम
- 47:00हृदयरविनदेव पवम्भवानी सैतंग नमा यह करना भी एक वास है।
- 47:10बांटने की इच्छा थी। और यह जगी तुम्हारे दुखड़ों से जो
- 47:19भी आया दुख और दर्द की आग से लपटे हुआ है और संत जब देखता है
- 47:27तुम्हें लहू लोहान हुए संसार की। चाकुओं ने तुम्हें गोद डाला संसार
- 47:37की इच्छाओं ने वासनाओं ने तुम्हें भेद डाला, तुम्हारा ज़रा ज़रा
- 47:43जख्मी है तो तुम्हारी जख्म देकर संत।
- 47:51व्याकुल हो जाता है। उसके तल पर कहा गया संत हृदय
- 48:00नवनीत समाना संत का हृदय माखन की तरह होता है।
- 48:12वह देखता है तुम जगह जगह से गुदे हुए लहू लोहान हो।
- 48:17तुम्हें चैन कैसे आता होगा? वह चौबीसों घंटे उस चैन में डूबा
- 48:26हुआ आनंद का रस्पान करता हुआ व्यक्ति।
- 48:29ज़रा सोचिए कि तुम्हारी इस व्यथा को देखकर उसके दिल पर क्या
- 48:34बिगड़ती होगी? तुम्हारे गांव को देखकर संत हृदय
- 48:50तड़प जाता है। तड़पे हैं सदा।
- 48:59तड़पे है सदा अपनी कसम, आपकी खातिर तड़पे है सदा अपनी कसम।
- 49:17आपकी खातिर ये जान भी जाएगी सनम, आपकी खातिर ये जान भी।
- 49:35जायेगी। सना आपकी खात क्या क्या ना सहे?
- 49:48संत को बोलना पड़ता है, संत को झलकना पड़ता है।
- 49:53क्या करे? और कोई चारा नहीं बचता।
- 49:58तुम प्यासे हो और संत के पास अकूत सम्पदा है, फिर भी अगर तुम प्यास
- 50:07मटाने की जगह खोपड़ी की संकेय मटाते रहो।
- 50:15फिर शांत करें तो क्या करें? मैं तुम्हें रोज़ कहता हूँ, प्यास
- 50:27को मिटाने की प्रश्न करो, तुम प्रश्न करते हो शंका को मिटाने
- 50:36का। और शंका को मिटाना और प्यास को
- 50:41मिटाना यह बिल्कुल भी बढ़िया बात है।
- 50:48आपको कोई विश्व में नहीं होना चाहिए।
- 50:50अगर मैं आपके अंगूठा लगा दूँ तो जब आप अंगूठे पे ही स्वर उठाना
- 50:57शुरू फिर ये प्रश्न नहीं है ये शंका और शंका जहाँ आई वहाँ तुम
- 51:05शिष्यत्व के योग नहीं रहे, वहाँ तुमने शिष्यत्व की कैपेबिलिटी खो
- 51:12दी, फिर मैं समझ गया। फिर मैं तुम्हारे ब्लॉक करूँगा,
- 51:19ये करूँगा तुम जाओ अभी तुम योग्य नहीं हुए आ जाना जब तुम्हें प्यास
- 51:26जग मैं फालतू हूँ जब तक तुम्हें मैं समझा सकता हूँ।
- 51:38यह पंचभौतिक तत्व का पुत्र उपकरण बोलने के योग्य है।
- 51:45बोलेंगे जब यह नहीं बोलेंगे तो फिर मेरी तस्वीर बोलेंगे, मैं उस
- 51:53समय प्रतिष्ठित हो जाऊंगा। वह बूंद उसमें समाहित हो जाएगी
- 52:00क्योंकि परमात्मा जिसमें उतरनी है बूंद वह समुद्र जिसमें यह बूंद
- 52:06उतरेगी। लाइबरेट होकर वह सब जगह मौजूद है
- 52:11ही इस ओमनी प्रेसिडेंट। फिर तुम वहाँ करो ना मैं बोल तो
- 52:22ना पाऊंगा क्योंकि माटी की पुतली कभी बोलते नहीं लेकिन सुन जरूर
- 52:28पाऊंगा। विकास एम प्रेसेंट ऑफ दी बैग एम
- 52:32ओमनी प्रेसेंट तो तुम्हारी व्यथा को सुन सकूंगा।
- 52:38बहुत अच्छा अच्छा मैं इसीलिए कहता हूँ इसीलिए ओशो कहते कहते मर गए
- 52:46मेरे प्रस्थान के बाद जीवित गुरु को तलाश लेना, लेकिन तुम अंधे हो
- 52:50के बह रहे हो क्या तुमने? जीवंत गुरु को तलाश नहीं हम उसके
- 53:03भाई के पास चले गए। शैलेंद्र जो पहुंचे इसीलिए कि वह
- 53:12उसका डीएनए। डीएनए का मतलब पहुंचे जाना नहीं
- 53:18होता। डीएनए तो गुरु नानक देव का भी था,
- 53:23लेकिन उन्होंने गद्दी अंगद देव को दी।
- 53:28यह मसला डीएनए का तो नहीं है यह मसला?
- 53:34खुद को जानने का है और खुद के विस्तार को जानने का है।
- 53:42उसने जो वह विराट का तल छू दिया होगा, वह किसी हजूर को नहीं
- 53:48पकड़ेगा, इधर उधर से वह उसे बुलाएगा।
- 53:53प्रेम पूर्व वहाँ बिठायेगा अब आज के बाद यह दायित्व तुम संभालो,
- 54:03मेरा यह उपकरण थक गया है अब नहीं बोला जाता और खुद करतारपुर में।
- 54:14प्राण त्याग देंगे जिसने समुद्र को पी लिया अगस्त की तरह वह सदा
- 54:28ही बांटता रहता है क्योंकि घड़े चुक जाया करते हैं, समुद्र कभी
- 54:34चुका नहीं करते। सदा ही बिखरता रहेगा, एवपोरट होता
- 54:42रहेगा यह युगों युगों तक युग आएँगे, बदलेंगे बीतेंगे फिर आएँगे
- 54:50बदलेंगे बीतेंगे लेकिन यह एवपोरटीओन जारी रहेगा।
- 54:56क्योंकि इसने समुद्र पी लिया। इस चेतना ने समुद्र पी लिया।
- 55:01यह जो चेतना का एक अंश चला था, पाथर के योनी से यह परिपूर्ण हो
- 55:12गया 100% और बूंद समान ही समुद्र में बूंद मर्ज हो गई समुद्र में
- 55:21और समुद्र ही हो गई ध्यान रखना शब्दों से तुम नहीं समझ पाओगे मैं
- 55:28जानता हूँ। लेकिन फिर भी इसे मान लेना
- 55:34क्योंकि यह सत्य है। सत्य को मान लेने का कोई हर्ज
- 55:39नहीं होता, बशर्ते के वह काजी लफ़ाजी दिखावे बाजी का न हो।
- 55:50सत्य से प्रकट हुआ हो, उसे मानने का कोई हर्ज नहीं है।
- 55:56बस यही शिष्यत्व होता है और मैं रोज़ देखता हूँ तुम शंका समाधान
- 56:03के लिए आते हो, तुम प्यास बजाने के लिए आते कहाँ हो?
- 56:17यह भी शंका ही है तुम्हारी तुम जब भीतर जाओगे तो देखोगे बाबा जी
- 56:23मेरे पर शक्ति बात करते हो, तुम गलत हो जो कहते हो कि मैं प्यास।
- 56:33मैं जब देखता हूँ तुम्हारे भीतर तो मैं तत क्षण जान लेता हूँ, यह
- 56:40व्यास नहीं है, यह शंख का समाधान और जीसको शक हो गया उसे नहीं
- 56:47मिलेगा कभी फिर मैं अगर कह दूँ कि तुम तो गए तो गए।
- 56:53क्योंकि श्रद्धा, विश्वास, रूपणों या ब्यान बिना न कुछ अगर श्रद्धा
- 56:59गयी तो सब कुछ गया। अगर शंका आई तो सब कुछ लूट गया।
- 57:12श्रद्धा आई तो फिर तुम्हारा अहंकार गया, शंका आई तो फिर
- 57:20तुम्हारा सत्य गया, एक तो जाएगा ही, अब तुमने क्या कहना है?
- 57:30ये देखो क्या तुम वास्तव में फिर से हो ज़रा एकांत कमरे में बैठ
- 57:38जाना, आँखें मूँद लेना मैंने कर ही कहा भीतर बैठ के देख रहा हूँ
- 57:45क्या प्यास लगी है, बिल्कुल पता चलेगा।
- 57:48क्या तुम्हें भूख का पता नहीं लगता क्या तुम्हें प्यास का पता
- 57:52नहीं लगता? तो यह भी पता लगेगा कोई तत्व
- 57:56तुमसे अभी खोए खोए हैं अभी कुछ लूट रहा है तुम्हारा अभी कुछ तुम
- 58:02रिक्त हो थोड़े से किसी को चूक रहे हो अभी।
- 58:07और वो चूक क्या रहे हो, तुम्हारी बुद्धि उसे खोज नहीं सकती क्योंकि
- 58:11वह जो तुम चुक रहे हो वह बुद्धि के पास बुद्धि कैसे जानेगी?
- 58:17तुम क्या चूक रहे हो, यह तो कोई संत बता आपने बायोग्राफी में
- 58:25बताया था? 1975 में से भगवान से आपने
- 58:29प्रेमिका को मांगा था, मांगा था क्या?
- 58:34प्रबुद्धता की बात वह भी रहा संपूर्णतः समाप्त हो गया वह
- 58:42प्रबुद्धता ही क्या? जो तुम्हारे सभी ब्रह्मों को मिटा
- 58:47न दे सभी वीकरों को लीन ला ले सभी विषयों को सब्जेक्ट्स को नृत्य
- 58:56नबूद न कर दे वह प्रबुद्धता ही क्या?
- 59:02वह रूस नहीं ही गया, जो अंधेरे को गायब न कर दे।
- 59:07मोह एक अंधेरा एक शब्द मैंने थोड़ी देर पहले बोला, तुम्हारा
- 59:18प्रेम प्रेम नहीं? तुम्हारा प्रेम मोह है, दशरथ का
- 59:26प्रेम मोह नहीं, दशरथ का प्रेम उसकी अंतःस्थल के उस हिस्से से
- 59:37आया है। जीसको कृष्ण कहते हैं, सतिप्रज्ञ
- 59:46वहाँ से बरहा की उठती है आग मीरा की तरह और वह आग सब भस्म कर देती
- 59:54है, अकेले मोह को नहीं समस्त विचारों को।
- 1:00:01समस्त वासनाओं को समस्त विषयों को सब चाहतें खत्म हो जाती हैं,
- 1:00:16इसलिए? राम राम सब कोई कहे दहश्रत कहे न
- 1:00:21होए एक बार दहश्रत कहे सो कोटि यज्ञ फल होए राम राम कहने से एक
- 1:00:36यज्ञ का फल मिलेगा। कहानी दोहा कहर दोहा भी कहानी की
- 1:00:43तरह होता है बस पद्य और गद्दी का फर्क होता है राम राम सब कोई कह
- 1:00:53दशरथ कहे न कुछ। एक बार दशरथ कहें, सो कोटि यज्ञ
- 1:00:59पर होय बस तुम यज्ञ की आहुति में, जैसे आहुत हो गए, दशरथ कहने से
- 1:01:07ऐसे तुम आहूत हो जाते हो। दशरथ स्वयं भी आहूत हो गए।
- 1:01:13अगर बिरहा की अग्नि इतनी। तीक्षण जग गई तो वह बीरा की अग्नि
- 1:01:18नहीं प्यास हो गई काश तुम ये प्यास जग जाए यह प्यास ही तो जगती
- 1:01:27नहीं, शंका जगती है। तुम कभी अपने अंत स्थल में एकांत
- 1:01:34कमरे में बैठकर सोचना क्या तुमने जो आज तक प्रश्न पूछे वह शंका
- 1:01:42समाधान से आए या बिरहा की याद से आए तो तुम्हें जोबाब मिल जाएगा?
- 1:01:49मुझे पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
- 1:01:54इसलिए मैं जवाब देता हूँ, इसलिए के कभी कोई एक कभी कोई एक सच में
- 1:02:03प्यासा आ जाएगा और उस सच में प्यासे व्यक्ति के लिए मेरे पास
- 1:02:10पानी है। बस शर्ते के मैं उसके ऊपर
- 1:02:16शक्तिपात करूँ और वह चलाए ना नरेंद्र की तरह विवेकानंद की तरह
- 1:02:25स्वामी जी मेरे माँ बाप भी हैं, मैं तो गया।
- 1:02:31बस यहीं परीक्षा होती है कच्च पकाई ओथेपाई नान के गया जहाँ पे
- 1:02:44वहाँ परीक्षा होती है जब गुरु तुम्हारे सर के उपरांत रखेगा और
- 1:02:48तुम कहोगे ओह मैं गया। मैं आढ़त की दुकान करता था, वह
- 1:02:57मेरे साथ बैठने वाला मेरा पार्ट में मुझे कहने लगा शाम को प्रवचन
- 1:03:03करता था। दो तीन आदमी और होते।
- 1:03:06थे। कि मेरे ऊपर शक्ति पाठ करो, मैंने
- 1:03:14कहा ठीक मैंने शक्ति पाठ किया, लेकिन जब मृत्यु करीब आती है तब
- 1:03:22तुम्हारी छटपटाट देखने की होती है।
- 1:03:29मृत्यु का प्रथम दर्शन तुम्हारे परखच्चे उड़ा देता है तुम्हें खंड
- 1:03:38खंड कर देता है, बिखंड कर देता है, स्केटर कर देता है तो वह उठा
- 1:03:44बागा शटर की तरफ शटर बनता। उसने जल्दी से शटर खोला उठाया और
- 1:03:54भाग्य मैं पुकारना ही रहता। अगर ऐसी ही शंका है तुम्हारी तो
- 1:04:04फिर कोई फायदा नहीं। फिर शंख का समाधान नहीं कर रही,
- 1:04:09यह भी अच्छा है। मेरी वाणी के साथ जो लिपटतेबड़ के
- 1:04:14एक बूंद आया करती है रस की वह भी धीरे धीरे तुम्हारे घड़े के अंदर
- 1:04:19जुड़ती जाएगी और 1 दिन सच में प्यास जग जाएगी।
- 1:04:27पीने के बाद पता चलता है कि कुछ रस ऐसा भी है जो संसार की
- 1:04:35मध्याभान से अतिरिक्त और भी मध्याभान होती है संसार की।
- 1:04:41बेहोशी के अतिरिक्त कोई मदहोशी नाम की चीज़ भी होती है।
- 1:04:47बिना किये तुम्हें क्या पता लेतेगा इसलिए मैं तुम्हें कहता
- 1:04:53हूँ, शराब को छोड़ने का नाटक मत करना।
- 1:05:01शराब तो एक कीमियां हैं, ज़रा थोड़ा सा स्वाद चख लेना, पता चल
- 1:05:08जाएगा कि क्या होता है फिर जब तुम वह असली नशा चखोगे तो समझ आएगा के
- 1:05:19मद्दभूषी। और बेहोशी में फर्क क्या होता है?
- 1:05:26यह वो शराब है जिसका नशा न दिन, न रात, न जगते, न सोते फिर सारी
- 1:05:38उम्र तक। वह चढ़ा ही रहेगा नाम खुमारी नाम
- 1:05:42का चड़ी रहे दिन रात यह एक लक्षण सा क्या तुम जो नाम लेते हो वह
- 1:05:49खुमारी तुम्हारी मृत्यु तक बनी रहती है?
- 1:05:52सच में तो खुमार पैदा ही नहीं होता और बाबा ने तो लक्षण बताया
- 1:05:58था। अगर वो सच में तुमने नाम पी लिया
- 1:06:02अमृत का तो वह सुरूर ऐसा है ना दिन ना रात ना सोते ना जगते, ना
- 1:06:09उठते बैठते ना चलते फिरते ना खाते पीते।
- 1:06:13न कोई क्रियाक्रम करते वह कम नहीं होगा जैसे अन्नथ ना तुम्हारी भितर
- 1:06:18गूंजे तुम बंद करना चाहो तो कभी हो पायेगा यह कुदरत ने एक उदाहरण
- 1:06:29बना दी। तुम लाख की चेष्टा कर दो, लेकिन
- 1:06:36वह बंद नहीं होगा। तुम्हारे बंद करने से इश्क पे
- 1:06:48ज़ोर नहीं ये वो आरती शहर गाले जो लगाए न लगे और बौछाये न बने।
- 1:07:02यह आनंद ना तुम्हारे जगाने से जग तक और जब जग जाएगा तो तुम्हारे
- 1:07:10भजाने से बुझता है ध्यान रखना यह इश्क की तरह।
- 1:07:20इश्क पे जो मेरे पास डॉक्टर लोग आ जाते हैं बाबा यह तो रोग है मैंने
- 1:07:25कहा बिलकुल इश्क भी तो रोग है नहीं नहीं बाबा हम तो वैसे
- 1:07:31शारीरिक रोग हैं, यहीं तो तुम गलती कर गए पत्र।
- 1:07:35शारीरिक रोग है तो उसको ठीक करके दिखाओ।
- 1:07:40मेरे पास डॉक्टर आ जाते हैं। नहीं रुकता ये मैंने का रोके का
- 1:07:47बिज़नेस किया ये वो आतिश है ग़ालिब।
- 1:07:55जो लगाई न लगे और बजाय न बने तुम्हें शुरू किया था।
- 1:08:03बहुत से रोग ऐसे हैं जिसे विज्ञान समझी नहीं पाए, जिसे अध्यात्म
- 1:08:09समझता है। अध्यात्म तो कुछ भी ऐसा नहीं जो
- 1:08:13नहीं समझता। उसमें से एक आनंद नाक भी है, इश्क
- 1:08:21पे ज़ोर नहीं ये वो आती से है गार्ब जो लगाए न लगे और बजाए न
- 1:08:28बने तो पूछा इस से? क्या वह बिरहा का ताक खत्म हो
- 1:08:42गया? वो प्रबुद्धता है क्या?
- 1:08:52वो अमृत ही क्या जो विष के प्रभाव को समाप्त न करते?
- 1:09:02वह जो खिंचाव होता है प्रेमजी से तुम उपाधि देते हो, वह मोह और मोह
- 1:09:11एक विकास अगर इस मोह का ठीक प्रयोग किया जाए।
- 1:09:20और मोह को प्रेम में बदल लिया जाए बिरहा की आग से युक्त कर दिया जाए
- 1:09:30तो फिर वो संबोधि में परिवर्तित हो जाता है, फिर वो तुम्हें आमूल
- 1:09:35चूल परिवर्तित कर देता है। ट्रांसपेरेंसी हो जाती है।
- 1:09:39ट्रांसफॉर्मेशन हो जाती है। एस।
- 1:09:48तू तुम प्रेम को नहीं बुला सकोगे। एस तू तुम प्रेमी प्रेमिका के
- 1:09:57दर्शन करने को हर पल। वो तो शुक्र हो गया रौ के उसकी
- 1:10:06याद। देख जो पखेरु होते पिंजरे में मैं
- 1:10:20रख लेता। दिन जो पखेरु होते पिंजरे में मैं
- 1:10:32रख लेता पालता उनको जतन से। मोती के दाने दे सीने से रहत लगा
- 1:10:56याद न जा। बीते दिनों की जा के ना आए जो दिल
- 1:11:13दिल क्यों भुलाए, उन्हें दिल क्यों भुला?
- 1:11:24याद न जा। काश तुम विचारों को ठीक से भोग लो
- 1:11:34क्योंकि इन विचारों में भी उस परमात्मा की तस्वीर नजर आती है।
- 1:11:41यहीं से यात्रा शुरू करो। मोह में छिपा है प्रेम उस
- 1:11:48परमात्मा काम में छुपा है वह परमपिता परमात्मा।
- 1:11:59तुम्हें उसे देखने का ढंग नहीं आया, सभी का नहीं आया।
- 1:12:04बेकारों से नफरत मत करना, यह परमात्मा तक जाने की सीढ़ियों
- 1:12:10इनका उपयोग कर लो सीढ़ियों की तरह।
- 1:12:14तस्वीर उनकी छुपाक। रख दूँ जहाँ जी जा तस्वीर उनकी
- 1:12:29छुपाक रख दूँ जहाँ जी जाए। मन में बसी वो ओर मन में बसी वो
- 1:12:47ओर लेकिन मची ना मिटा। कहने को हैं वो परा याद न जा बीते
- 1:13:12दिनों की जा के न। आए जो दिल दिल क्यों भुलाए उन्हें
- 1:13:29दिल क्यों भुला? उसे बुलवाने का दिल तो नहीं करता।
- 1:13:41लेकिन जब ये रोग बन जाता है तो तुम उस यात्रा पर निकल जाना जो
- 1:13:50वासनो के पास, लेकिन वासन हमारा फर्स्ट स्टेप बनेगा।
- 1:13:56वासना को भोगकर प्रयासित मत करना, यह प्रयासित में तुम शक्ति को
- 1:14:03व्यय करो, वासना को चख लेना और वासना से पार हो जाना।
- 1:14:13जैसे हम कड़वे नीम को चख लेते हैं, को नीम को चख लेते हैं और
- 1:14:19निष्कर्ष निकालते हैं। यही कहा स्टमक जीवन दुख है पहले
- 1:14:30यह तो जानो। नीम कड़वा है, यह तो जानो अगर तुम
- 1:14:38सीधे सीधे निकल गए हिमालय की कंदराव तो फिर तुमने संसार की
- 1:14:47कड़वाहट को जाना कैसे? संसार की कड़वाहट तुम्हें खींचती
- 1:14:56रहेंगी। ज़रा सी आदत होती है तो दिल।
- 1:15:06सोचता है जब तुम देखोगे किसी राजा को नकली नकली मुस्कान लगों पे
- 1:15:17लाये हुए तो तुम्हारे ह्रदय में शंका आएगी, कहीं मैंने गलती तो
- 1:15:21नहीं करती? ज़रा सी आदत होती है तो दिल सोचता
- 1:15:35है कहीं वो तो नहीं। कहीं ये वो तो नहीं जिसे मैं खोज
- 1:15:45रहा हूँ? कहीं संसार में पीछे छूट तो नहीं
- 1:15:49गया? लेकिन अगर भोंगा होगा तो तुम में
- 1:15:53ये प्रश्न नहीं आएगा, कहीं ये वो तो नहीं?
- 1:16:02कहीं ये वो तो नहीं कहीं ये वो तो नहीं कहीं ये वो तो नहीं?
- 1:16:17इसलिए संसार को भोग लेना। यही अष्टावक्र ने कहा, भोगने से
- 1:16:22दुख मिलेगा, दुख से वैराग्य और वैराग्य से मौमुक्ष और मौमुक्ष से
- 1:16:28तो मुक्त हो जाओगे लेकिन जिसने भोगा ही नहीं संसार की तीर्थता
- 1:16:37चखी ही नहीं नीम की कड़वाहट जिसने।
- 1:16:41वह इस कड़वाहट से बाद उस मिठास को कैसे जान पाएगा?
- 1:16:48पग पग में तुम्हें ऐसा लगेगा कहीं ऐसा तुम्हें जीसको मैं छोड़कर आ
- 1:16:57गया। उसमें ही सुख था और तुम्हें पता
- 1:17:08नहीं संसार दूर से बड़ा लुभावना है।
- 1:17:12ऑल दैट ग्लिटर्स आर नॉट कॉल्ड बड़ी महक बरसाता है।
- 1:17:18बड़ी चमक दमक है इसमें। इसीलिए तो राजनीतिक देखाबा करते
- 1:17:23हैं। इसीलिए तो ये शायद इश्यू का जोड़े
- 1:17:28बाहर जब निकलते हैं भीतर से जूते पटांग हो के आते हैं और चोट लग गई
- 1:17:35तो फिर पाउडर लगा लेते हैं सुंदर नजर आने के लिए।
- 1:17:40दिखावेबाजी में मत पढ़ना ऑथेंटिसिटी में प्रमाणिकता में
- 1:17:46जीना तो तुम 1 दिन पहुँच जाओगे अगर तुम कच्चे कच्चे संसार को
- 1:18:01छोड़ दिए प्रेमानंद की तरह तो राधे राधे ही जपओ करो।
- 1:18:10तुमने इसकी सत्यता को जांचा बरखा नहीं तो कच्चे कच्चे खिलाड़ी
- 1:18:17कच्चे कच्चे आगे भगत पैदा करेंगे, जो डूब भी जाएंगे।
- 1:18:24और तुम भ्रम फैलाओगे क्या? तीर्थ पे मरे मोक्ष मिल गया तो
- 1:18:30चलो तुम्हें भी मोक्ष दिला दो ये जानते हैं कि मोक्ष, मोक्ष कुछ
- 1:18:41नहीं मिलता, इसलिए खुद नहीं मरे। यही तो विडंबना है पंडितों की
- 1:18:53तुम्हें कहेंगे आफा क्या बात यमुना माता में डूबे हो?
- 1:19:06ज़िन्दगी रह गई, दर्द बन के दर्द दिल में छुपा।
- 1:19:27के छुपाए आजू चार तो आंसू भराई मुदतें।
- 1:19:44हो गई, मुस्कुराए आंसू भरा। सोचो इन बाबाओं के मुख को देखो
- 1:20:04इनसे पूछो कि तुम पिछली बार सच में कब मुस्कुराए थे?
- 1:20:11इन्हें वो वेला सिर्फ बचपन का याद आएगा।
- 1:20:16अब जो मुस्कुराहट आई जया किशोरी के चेहरे पर।
- 1:20:21वो झूठ बोलकर जो पैसा कमाया वो सुविधा से आई शांति से नहीं आई।
- 1:20:29सुविधा और शांति में बड़ा फर्क है।
- 1:20:33यह लावण्य और आराम की खुशी है लेकिन यह रहस्य का रस नहीं है।
- 1:20:40बागेश्वर से पूछो पिछली दफ़े तुमका मुस्कराये थे बड़े से बड़े
- 1:20:46राजनीतिज्ञ को पूछो पहली बात तो वो सिर्फ वैसे ही हँसते हैं जो
- 1:20:53बात मेलोने की समझ नहीं आती तो फिर कुछ रिएक्शन तो करना ही होता
- 1:21:00है। दिखावे बाजी तो फिर हंस पड़ती मैं
- 1:21:04लोग नहीं भी हंसती समझ उसे भी कुछ नहीं आया के मोदी क्यों हँसा वो
- 1:21:13भी कुछ बोलती है जाने क्या तुने कहीं?
- 1:21:20जाने क्या मैंने सुन बात कुछ बनी गई जाने क्या तुने कही जाने क्या
- 1:21:33मैंने सुनी। बात कुछ बनी गई जाने क्या तुने
- 1:21:42कही बढ़िया तरीका है इन सभी उपदेशकों से पूछो सर लोगों से
- 1:21:52पूछो। कि सच में तुम कब मुस्कुराए थे?
- 1:21:59वो खिलखिलाहट जो बच्चों के भीतर से आती है, उस तरह सच में तुम कब
- 1:22:10मुस्कुराए थे, मुखौटा लगाए वे ना। और शायद बचपन के लम्हों के सिवा
- 1:22:17तुम्हें कोई घना न सके। 55 के लम्हे ही तुम्हें ऑथेंटिक
- 1:22:28खिलखिला हटते थे, क्योंकि तुम इनोसेंट कहते हो।
- 1:22:35इसलिए ईसा ने कहा ओनली दे विल एंटर इन मैं गार्ड्स किंगडम विल
- 1:22:41बी इनोसेंट जस्ट लाइक ए चार्म तुमने पूछा पुत्र?
- 1:22:55क्या वह जो बाबा जी से 75 में तुमने अपनी प्रेमिका मांगी थी?
- 1:23:02वह मोह था, वह मेरे लिए स्टेप का काम कर गया।
- 1:23:07ये बाबा जी ने पोड़ियाँ नहीं ना? 38 जब जी साथ यह पहली पोड़ी का
- 1:23:13काम कर गया। फिर मैं बढ़ता ही गया, बढ़ता ही
- 1:23:24चला गया, बढ़ता ही चला गया और 1 दिन ना जाने का।
- 1:23:32कोई उमंग न थी, कोई तरंग न थी, शांत मौन सिर्फ चल रहा था और चल
- 1:23:43रहा था और उस परम मौन की अवस्था में वो घटित हुआ।
- 1:23:50बूंद के ऊपर समुद्र बरस गया और सारी आग खाक बसं भी न बच्ची।
- 1:24:09उस वक्त तुम परम प्रसन्नता को प्राप्त होते हो जब तुम्हारे
- 1:24:15अहंकार की राख भी न बचे, तुम पूर्णतया नृत्य नामुद हो जाओगे,
- 1:24:25यहीं जाना है यहीं है मंजल तुम्हारी।
- 1:24:30अगर कोई तुमसे पढ़ा लिखा व्यक्ति जो आईएस की कुर्सी को ठोकर मार
- 1:24:35दे, वो कहे के एनलाइटनमेंट नहीं होता तो मत मानना फिर तो तुम्हारा
- 1:24:44दिमाग उलझ जाएगा फिर तो मार किस कहेगा भगवान नहीं फिर बात क्यों
- 1:24:48करनी? फिर तो तुम पाप करने पर उधारू हो
- 1:24:52जाओगे, क्योंकि चार बाग कहते हैं ऋणम कृत्वा गिरितम विवेक भस्वा
- 1:25:00भूत से देहा से पुनर आगमनम कुतह ठगी मार लो, चोरी कर लो, मुकर
- 1:25:07जाओ। और ठगी मारकर चोरी करके उसको ही
- 1:25:11फिर अदालत में ले जाओ। पश्चिम भूत से रहस्य पुनर्गमनम
- 1:25:16कुतह बस एक ही जीवन होता है, लोग ऐसे भी लाभ उठा लेते हैं।
- 1:25:26फिर लेने वाला देने वाला कोई आता ही नहीं।
- 1:25:28जब दोनों ही भस्म हो गए, बिल्कुल भस्म हो गए, हमने देखे, कर्जदार
- 1:25:37भी भस्म हो गए। लटक कर्ज देने वाला भी भस्म हो
- 1:25:42गया दंडप के बिलों पर। खून की रोगियों करते करते मैंने
- 1:25:47देख कौन बचा गोसी बचा जो स्वेत खोज तो यहाँ बड़ा उल्टा पुटता है।
- 1:26:14अध्यात्म बड़ा उल्टा पुटता है। अध्यात्म में तुम्हें भोग से शुरू
- 1:26:22होता है और तुम्हारा संसार भोग भोगों को भोगते हुए भोगों को
- 1:26:32प्रताड़ित भी करता है। वहीं समाज जो भोगता है रोज़ बंद
- 1:26:40दरवाजे में एकांत कमरे में बंद करके सुहागरात बनती है, उसी काम
- 1:26:47का निंदा होता है। वहरह रोहि तुम रोज़ करते हो क्या
- 1:26:54माजरा है? समाज ईमानदार नहीं, समाज बेईमान
- 1:27:00है। वो वक्त चले गए।
- 1:27:01ऋषि वेला के जब कोई बच्चा नहीं होता था तो रतीसर की घर वाली
- 1:27:08बारिया कहती थी चलो अंगिरा ऋषि के पास चलते हैं, वहाँ से भी रेदान
- 1:27:13लेके आते हैं। और बगीरत क्षमा करना रथीसर के 100
- 1:27:19पुत्र होते हैं। ये क्या है?
- 1:27:26मत घबराना इन समाज के बनाए हुए प्रबंधक से मनेजमेंट से ये गलत।
- 1:27:35ये इंसान की बनाई हुए कपड़े हँसियाते है और ये पूरा नहीं है।
- 1:27:42अगर नियम ही मान्य है तो संत से पूछना नियम जीने का नियम क्या है?
- 1:27:49संत कहे का पहला ब्रह्मचर्य शक्ति को बचाओ।
- 1:27:56फिर अपने जीवन के निर्वहन हेतु काम करो।
- 1:28:02जीवन को बचाने के लिए इस धरा पर बच्चे पैदा करो, लेकिन आरएसएस को
- 1:28:09देने के लिए नहीं। तुम्हारे बड़ा पी का साहस किस
- 1:28:17ज़िन्दगी में गम्भीर मैं बनूंगी पिया?
- 1:28:32जीवन के सफर में तुझको साथी की जरूरत होगी साथी की।
- 1:28:48जरूरत हो दिया। कैसे जलेगा अकेले बाती की जरूरत
- 1:29:04होगी। बाती की जरूरत हो में बनूँगी पिया
- 1:29:19तेरे पथ का दिया दिया पथ पे जलाने।
- 1:29:25दे साथी ना समझ कोई बात नहीं मुझे साथ तो आने दे जीस पथ पे चला।
- 1:29:45जिससे तुम्हारी आसानी तरंगें मिल जाएं, जिसके पास बैठने से सुकून
- 1:29:50मिले। लिव इन में रह लेना सामाजिक
- 1:29:54बंधनों को मत मानना। समाज मूर्ख है, क्योंकि समाज
- 1:29:59अज्ञान है और झुंड सदा ही मूर्ख होता है।
- 1:30:04कम्यून सदा ही मूर्ख होता है। कम्यून कभी भी उस परम तत्व तक एक
- 1:30:09यक् सा नहीं पहुँच पाएगा। मरना होता है अकेले कैवल्य में
- 1:30:20जाता है। व्यक्ति।
- 1:30:23इसलिए महावीर ने उस परम दशा को कैवर्य की अवस्था कहा और भीड़ में
- 1:30:32कभी व्यक्ति के अवेल को प्राप्त नहीं होती, भीड़ तो तुम्हें बाहर
- 1:30:39से शोर मचाकर जगाती रहेंगी। वो द्वालत करती रहेंगी, किसी का
- 1:30:52साथ ले लेना, बच्चे पैदा कर लेकिन किसी मूर्ख संस्था को देने के लिए
- 1:30:59नहीं, तुम्हें भी जरूरत पड़ेगी। जिंदगी में गम भी मिलते हैं हो
- 1:31:14समझौता गमों से कर लो चाहे गंभीर है, कोई बात नहीं, दूसरे का गम ही
- 1:31:24होता है। दूसरा तुम्हारी कॉन्सेंट्रेशन को
- 1:31:28भंग करता है, लेकिन यहाँ समझौता करना होगा क्योंकि कल बुढ़ापा भी
- 1:31:34आएगा। यह जो आचार्य लोग बोल रहे हैं,
- 1:31:39इनकी प्रेमिकाएं यह सहारा है इन्हें थामने की।
- 1:31:46तुम्हें बच्चों का सहारन है तो अपने बुढ़ापे की लाठी अवश्य पैदा
- 1:31:52करे, लेकिन किसी संस्था को पागल संस्था को दान देने के लिए नहीं
- 1:32:00ये मूड है। यह उसे राजनीति करवाएंगे, उसे
- 1:32:05कत्लोग गारित कराएंगे, उसका लघु बिखेरेंगे।
- 1:32:08पूर्व क्षेत्र की तरह धरती लाल करवा देंगे।
- 1:32:13इनके पीछे मत रखना। मैं तुम्हें स्वतंत्र जीवन जीने
- 1:32:19की दशा बताता हूँ। तुम अपना सोचो पहले स्वार्थी हो
- 1:32:25जाओ प्रार्थी तो जब तुम होगे, जब तुम इकट्ठा करके तली फूल बन जाए,
- 1:32:33फिर सुगंध को लुटाओगे क्योंकि सुगंध तो तुमने बहुत पी ली।
- 1:32:38कनी का जब बंद मुँह था, तब वो पी तो ही रही थी, फिर जब तृप्त हो गई
- 1:32:46तो उसने मुख खोल लिया, कलियों ने घूँघट खोल ली, कलियों ने घूँघट
- 1:32:58खोल। हर फूल पे भौरा दो क्या?
- 1:33:08प्यार। का मौसम, गुलजार का मौसम।
- 1:33:17कलिओने घूँघट खोल हर फूल पे भंवराणों तो फिर संत की तरह लूट
- 1:33:30आओ, स्वार्थी से प्रार्थी बनने की कला तुम्हे सीखनी होगी।
- 1:33:39जिसने इकट्ठा ही नहीं किया, कमाया ही नहीं, वह बांटी गाकर खाओ, पहले
- 1:33:47स्वार्थी बनो, इकट्ठा करो, इकट्ठा करके बांटने के योग्य हो जाओ।
- 1:33:53और जैसे कधी अपना मुख खोल के फूल की बंकड़ियाँ खिल जाती हैं और
- 1:33:58भंवरी दौड़ते हैं, फिर साधक तुम्हारे आसपास आए तुम्हारी सुगंध
- 1:34:04को चखेंगे, उनके नासा पुट सुगंध से लबालब हो जाएंगे।
- 1:34:08उनका रोवां रोवां तृप्त हो जाएगा। तुम्हारी बात सुनकर तुम्हारी
- 1:34:12सुगंध को चखकर भिखारों को स्टेप की तरह प्रयोग करो।
- 1:34:22भिखारों को हीन भावना से मत देखो ये ऊर्जा के परिवर्तित रूप हैं।
- 1:34:30कोई भी विकार निंदा योग्य नहीं है।
- 1:34:33परमात्मा की इस सृष्टि में निंदनीय कुछ भी नहीं मात्र आलोचना
- 1:34:45नहीं है। गलत रास्ते तो हैं, सही रास्ते भी
- 1:34:48तो हैं। सही रास्ता चुन लो सही गुरु के
- 1:34:59करी पर बैठो गुरु की हवाओं को चख गुरु की शीतल मंद मंद मुस्कान।
- 1:35:08को देखो, पियो उसकी सुगंध को तुम्हारा रुआ रुआ निहार हो जाए और
- 1:35:17उसके बाद जब तुम तृप्त हो जाओ तो फिर बंट तो जाएगा ही, बांटने की
- 1:35:24जिक्र मत करो। वह तो कली का मुख खुल जाता है खुद
- 1:35:28बखुद जब कली भर जाती है भीतर से सुगंध से फिर उसे मुख खोलना नहीं
- 1:35:34पड़ता, फिर तो खुल ही जाया करता है।
- 1:35:36पंखुड़ियां सह शराब की तरह खुल ही जाया करते हैं।
- 1:35:49जब तुम वहाँ पहुंचोगे वे सतल की बात संत करते हैं जहाँ जाकर तुम
- 1:35:55कहते हो अहम ब्रह्मस्व अभी तो तुम्हें उस बात का पता है इसलिए
- 1:36:03याद कराते हैं स्टबक इसलिए याद कराती हैं उपनिषद।
- 1:36:08वेद तत्वों में स्वेत के तुम ही हो किसी गैर को नहीं खोजना है।
- 1:36:19पदार्थ गैर और पदार्थ में रश्ने। श को खोजना है उसका लक्षण है रस
- 1:36:32तर्क नहीं जो तुम्हें तर्क सखाएं वहाँ से वाचन जो तुम्हें रस से
- 1:36:42पिलाई वहाँ बैठ जाओ, बैठ ही जाओगे।
- 1:36:47क्योंकि रस मजेदार है इतना और ज़रा सीधे देसाती और ज़रा सा कैसे
- 1:37:00रहूँ चुपके मैंने? ओह छवि तक है वह कवि वो ज़रा सी
- 1:37:11दे दे साकी और ज़रा सी।