Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 Apr 26 - ध्यान और मौन का महत्व: शब्दों के बोझ से आंतरिक शांति की ओर। 'स्थितप्रज्ञ व्यक्ति' vs दुख
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- 0:05शब्द भार हैं निह शब्द उपहार हैं शब्द।
- 0:19चाहे धर्म के हो, चाहे विषयों के हो, विज्ञान के हो या परमात्मा के
- 0:32हो, शब्द भार है। तुमने कोई शास्त्र पढ़ लिया और
- 0:42शास्त्र पढ़ के तुमने छाती फिलाली तुमने कोई ज्ञान सीख लिया किसी
- 0:53विश्वविद्यालय से कोई डिग्री ले ली।
- 0:57और उन्होंने तुम्हें कागज की को डिग्री दी, तुम वो पाकर तुमने
- 1:06छाती जोड़ी कर ली। ये दोनों ही चीजें बाहर हैं।
- 1:15शास्त्र में भी शब्द है। और सब्जेक्ट में भी शब्द है पर
- 1:27मैंने कहा शब्द भार है इसको आप एक विशेष दिल के कोने में रखना शब्द
- 1:38भार है निहि शब्द उपहार है। मौन उपहार है और कोलाहल भार है,
- 1:50कोलाहल अच्छा नहीं लगता और मौन बहुत भाता है।
- 1:56ऐसा लगता है मौन में डूब जाए। ऐसा लगता है मून में अठखेरिय करें
- 2:07और कोलार में शोर में लगता है कि यहाँ से भाग जाए कहीं दूर कहीं
- 2:15दूर निरंजन गंड में। कहीं दूर जहाँ कोई न हो, तुम
- 2:28शब्दों के भार से पीड़ित हो, सारा संसार शब्दों के भार से पीड़ित है
- 2:39अज्ञानी ही नहीं। तुम्हारे तथा कथित ज्ञानी जो
- 2:45तुम्हें मार्गदर्शन करते हैं वो भी शब्दों के वार से पीड़ित हैं।
- 2:58शब्दों का भार सिर्फ तुम्हें ही नहीं सताता।
- 3:03शब्दों का भार उन्हें भी सताता है।
- 3:12शब्द उनकी रोज़ी रोटी है जैसे तुम्हारी रोज़ी रोटी है कोई कला,
- 3:22कोई केमिस्ट्री जानता है कोई फिजिक्स।
- 3:25कोई जूलॉजी, कोई बॉटनी, कोई फिजियोलॉजी, कोई किसी चीज़ की कला
- 3:31से संपन्न है, कोई किसी चीज़ की कला से संपन्न है, वह तुम्हारी
- 3:38आजीविका का साधन है जिसे तुम। मुक्ति होने की चाह में जिसके पास
- 3:49चाहते हो उसके पास अगर शब्द पाओ निपट कोरे शब्द पाओ तो वहाँ से आ
- 4:01जाना। शब्दों से बाहर जाना है।
- 4:11शब्द मन का हिस्सा है उन मुनि अवस्था में जाना है जहाँ मन न हो।
- 4:23मन कोलाहल है, मन शोर है, मन तुम्हे चैन से बैठने नहीं देता,
- 4:36तुम अगर दुखी हो तो अपने मन के कारण दुखी हो।
- 4:46रात को जब घोर नेत्रा में शिशु की काल में शोर नहीं होता, कोलाहल
- 4:55नहीं होता, तुम मन भी नहीं होता और तुम बड़े विश्राम में होते हो।
- 5:05दूसरे शब्दों में कहूं तो जहाँ विश्राम है, वहाँ मन है, जहाँ राम
- 5:16है, वहाँ मन है यहाँ विशराम है। वहाँ राम जहर बन जाता है विश राम
- 5:28वहाँ राम भी जहरीला हो जाता है अगर राम शब्दों से हो तो?
- 5:41अगर राम अवस्था में हो तो थोड़ा सा गहरा है शब्द अगर राम शब्दों
- 5:48में हो तो विषय है अगर राम अवस्था में हो तो अमृत है।
- 6:00तुम्हारे रस्ता दिखाने वाले तुम्हे शब्द ही सिखाते हैं और तुम
- 6:08शब्दों का भंडार मरते मरते दम तक तुम शब्दों का भंडार ही इकट्ठा
- 6:15करना ज्ञान समत। लेकिन भला ये ज्ञान है?
- 6:24मैंने कर ही कहा कि जब तुम मर जाते हो तो अगले जनम में फिर
- 6:31आबासा एबीसी का खाक। यहाँ से शुरू करना होता साथ क्या
- 6:44जाएगा तुमने कितनी डिग्री से ली तुम अपने पिछले जन्म में काश
- 6:53उत्तर होते जो पिछले जन्म में ले जाने वाले।
- 7:00लोग हैं। ये झूठे हैं और जब वो बहुत से
- 7:06झूठे इकट्ठे होकर मीडिया का रूप धारण करें तो उस कलाहल में सत्य
- 7:14की भीने भीने आवाज़ गुम हो जाती है।
- 7:21तुम उस हल्की सी मधुर झंकार को सुन नहीं पाते अगर झूठ का मीडिया
- 7:32उसकी आवाज अधिक तेज होती है। और सत्य की आवाज वीणा की तरह
- 7:39हल्की झंकार लिया होती है। वीणा की झंकार तुम्हें तब सुनेंगे
- 7:49जब बाहर का कोलाहल न होगा। और तुम्हारा मन कोलाहल ढूंढता है,
- 8:03तुम्हारा मन शांति नहीं चाहता, ध्यान रखना तुम शांति चाहते हो,
- 8:12तुम्हारा मन शांति नहीं चाहता। और तुमने मन को ही स्वयं समझ रखा
- 8:19है तुम बहुत तत्व हो जहाँ शोर नहीं जाता है जहाँ कोई आग नहीं
- 8:34पहुंचती। जहाँ कोई दर्द नहीं जाता जहाँ कोई
- 8:40रोग नहीं जाता जहाँ कोई कष्ट क्लेश नहीं जाता कोई चिंता नहीं
- 8:45हो जाती और मन मन इन्हीं के कारण जरूरत है।
- 8:54इसलिए मन अगर तुम शांत करोगे मन को तो मन को घबराहट होगी।
- 9:05कल ही एक मित्र ने मैसेज भेजा कि बाबा जब मैं अपने भीतर गया तो डर
- 9:11गया। झट से बाहर रखा।
- 9:17यह क्या भीतर जाने से मन मरता है? मौन होना मन की मृत्यु है और
- 9:27तुमने मन से मोहन तक जाना है। मन शोर है, मन शांति है, तुम्हारा
- 9:41मन शोर चाहता है, इसलिए तुम खाली नहीं बैठ सकते।
- 9:50और इसीलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि खाली लम्हे पैदा करो, जितना खाली
- 9:56हो जाओगे उतना मन टूटता चला जाएगा।
- 10:02जितना शोर में जाओगे, मन उतना ही प्रसन्न होगा।
- 10:10इसलिए तुम चाहते हो कि और नहीं तो चलो ताश ही खेल लेते हैं, लुद्धो
- 10:15ही खेल लेते हैं और नहीं तो फ़िल्म ही दिखाते हैं।
- 10:20तुम शोर चाहते हो? तुम्हारा मन शौर चाहता है लेकिन
- 10:28तुम्हारा अस्तित्व शौर नहीं चाहता।
- 10:32तुम्हारा अस्तित्व मौन है पर मून है और पर मून मून ही चाहता है।
- 10:46तुम जिसकी तलाश में हो, वह परमौल है और तुम्हें सिखाया जाता है
- 10:57शब्द मैंने कहा शब्द भार है। वो शब्द चाहे अध्यात्म के हों,
- 11:05चाहे विज्ञान के हों, शब्द शब्द बार है, निहि शब्द फल का पन है,
- 11:16शब्द से निःशब्द की यात्रा बड़ी प्यारी है।
- 11:23भगवान कृष्ण का एक श्लोक और मैं आपको वहाँ लिए जाता हूँ।
- 11:31मुझे एक व्यक्ति रोज़ कहा करता था कि मेरा ये काम हो जाए तो बस मैं
- 11:38गंगा न हालू। मैं शांत हो जाऊं, निर्भर हो जाऊं
- 11:47और उसका वो काम हो गया। उसके बाद भी वो गंगा नहीं नहाया।
- 11:58यद्यपि हरिद्वार जाके गंगा एक स्नान कराया।
- 12:04लेकिन भार नहीं होता, भार नहीं खत्म होता, जिंदगी खत्म हो जाती
- 12:13है। जीवन खो देते हो, लेकिन तुम्हारी
- 12:27संसार की गति नहीं होती। तुमने संसार को माशू का समज रखा
- 12:36है उससे चले जाने को। तुम्हारा जी नहीं करता, गल
- 12:44मुक्की, ना गल मुक्की ना। सजन नल मेरी।
- 12:59रबाबे तेरी रात मुकगै गल मुक्की ना सजन नाल मेरी रबाबे तेरी रात
- 13:16मुकगै। ज़िन्दगी खत्म हो जाती है।
- 13:22संसार से तुम्हारी बात खत्म नहीं होती, विश्राम तुम कभी लेते नहीं,
- 13:31जिसे तुम विश्राम कहते हो, वह विश्राम नहीं होता।
- 13:38वह तो सिर्फ थके हुए तंतुओं का आराम होता है विश्राम तो तुम
- 13:46स्वयं हो विश्राम तो तुम्हें स्वयं में मिलता है यम लबधवा चा
- 13:55भरमलाभम। मान्यते न अधिकंभ ततः है थोड़ा सा
- 14:03लाभ हो जाता है तो तुम्हारा मन और लाभ की तरफ चलता है।
- 14:12अकबर कहीं से जा रहा था। अकबर शहंशाह था, सब कुछ था लेकिन
- 14:19मन में पीड़ा थी, वो पीड़ा काहे की थी?
- 14:24अकबर खुद नहीं जानता, तुम भी नहीं जानते कि तुमने पीड़ा कैसे की है।
- 14:30हालांकि तुम्हारे पास सब कुछ है। पीड़ा किस चीज़ की है?
- 14:37अकबर को भी पता नहीं था। पीड़ा किस चीज़ की है तुम्हें भी
- 14:41पता और और की मांग पीड़ा है। इसे अच्छी तरह से समझ लेना, गांठ
- 14:51बांध लेना। और की मांग पीड़ा है और तुम्हारे
- 14:56पास कितना ही आ जाए, आते ही कम पड़ जाता है।
- 15:03आते ही तुम और की मांग शुरू कर देते हो।
- 15:07ये ही भगवान कृष्ण कहते हैं यम। लवधवाचा परम लाभ मान्यते न अधिकम
- 15:14ततः जिसका लाभ होने पर और लाभ होने की इच्छा नहीं रहती, जिसका
- 15:25लाभ होने पर। और लाभ हो जाए ये इच्छा नहीं
- 15:31रहती। बड़ा प्यारा शब्द है।
- 15:33ऐसा क्या तत्व है? हमें तो जब मिलता है एक बार शांत
- 15:39हो जाते हैं लेकिन फिर और लाभ होने की चेष्टा हो।
- 15:44कैसे इसको और बढ़ाएं ये और बढ़ाना ही।
- 15:48तो मैं नरक में ले जाता हूँ, छोटे उदे पे थे बड़े उदे पे कैसे हो
- 15:58जाऊं मिस बल्क मिशनर थे मला कैसे बन जाऊं मला बन गए?
- 16:08तो चीफ मिनिस्टर कैसे बन जाऊं और फिर चीफ मिनिस्टर बन गए तो फिर
- 16:14एमपी कैसे बन जाऊं? और एमपी फिर मैं प्राइम मिनिस्टर
- 16:19कैसे बन जाऊं? लाभ होता जाता है।
- 16:24तमन्ना बढ़ती जाती है। लेकिन कृष्ण बिल्कुल उलटी बात
- 16:29कहता है। कृष्ण कहते हैं जिसका लाभ होने पर
- 16:36और लाभ हो जाए, इसकी इच्छा नहीं रहती।
- 16:43कितना प्यारा शब्द है। तो फिर देखिए ऐसा क्या होगा जिसका
- 16:51लाभ होने पर तुम्हारी और लाभ हो जाए।
- 16:55यह इच्छा वाकई नहीं रहती। यस्मान स्थितो ने दुःखीन।
- 17:04गुरूण अभी विचलित है जिसके शतित होने पर बड़े भारी दुख से भी
- 17:20विचलित नहीं होता व्यक्ति जहाँ पहुँच जाने पर।
- 17:27कितना भी भारी दुख हो जाए, नुकसान हो जाए।
- 17:32कितनी भी भारी ट्रेजेडी हो जाए, कितनी भी भयंकर दुर्घटना हो जाए,
- 17:39लेकिन भगवान कृष्ण कहते हैं कि जब तुम विचलित नहीं होते।
- 17:49कितना भी दुख आ जाए भारी से भारी दुख जो संसार में तुम गिनते हो वह
- 17:56भी क्यों न आ जाए अगर तुम वहाँ पहुँच गए?
- 18:02तो तुम विचलित नहीं होते, दुखी नहीं होते और यही निशानी है
- 18:07प्रबुद्ध व्यक्ति जो महानतम दुखों से पीड़ाओं से विचलित नहीं होता,
- 18:19इस शब्द को भी गांठ बांध ले। भगवान कृष्ण का एक एक शब्द बड़ा
- 18:24प्यार है, एक एक शब्द में इतना भारी ज्ञान इतनी शांति से भरपूर
- 18:34मार्ग भरा पड़ा है अगर तुम उसको खंगालोगे ध्यान से तो।
- 18:43तो कृष्ण कहते हैं जिसके लाभ होने पर मुझे और लाभ हो जाए, इसकी
- 18:50तमन्ना शेष नहीं रहती और फिर तुम वहाँ चले जाते हो, वहाँ स्थित हो
- 18:56जाते हो। जहाँ भीषण से भीषण दुख आने पर भी
- 19:02तुम दुखी नहीं होते, तुम विचलित नहीं होते?
- 19:07उसी को कहते हैं प्रज्ञावान तो अकबर जा रहे थे, सम्राट थे।
- 19:17दास दासियाँ थीं हीरे, मोती रत्न सदा पहने रखते थे, मणियों से
- 19:24जुड़ा हुआ मुकुट और हीरे जो रातों की पोशाक उसके तन बदन पे रहते थे,
- 19:34क्या करोगे? साफ सुथरा कपड़ा पहन लो।
- 19:40क्या वो काफी नहीं है? जरूर ही हीरे, मोती, रत्न जड़ित
- 19:45वस्त्र पहन लेकिन पहनते हो। क्यों तुम दुखी हो शायद?
- 19:52इससे शांति मिल जाए और अगर तुम्हें शांति ना मिले तो कम से
- 19:56कम दूसरे समझें कि तुम कितने अच्छे हो, कितने शांत हो, कितने
- 20:01सुखी हो। यद्यपि कोई हीरों की पोशाक पहनने
- 20:06से शांति को उपलब्ध होता है नहीं होता।
- 20:14चला जा रहा था। खाली जमीन के ऊपर छोटा सा टेंट
- 20:19लगा हुआ था। मन दुखी था।
- 20:27परपाल के भीतर बैठे हुए कुछ व्यक्ति न चरहित।
- 20:33ढोल की थाप पर बगड़ा चल रहा था, गिद्ध पड़ रहा था घुंघरूओं की
- 20:40झंकार रथवान से कहा खबर ने रोको रुक गया।
- 20:51गौर से देखा अभी सूरज डालने को था।
- 20:57थोड़ा सा सूरज अपनी छटा बिखेर रहा था और उस रौशनी में तम्बू के भीतर
- 21:06नाचते हुए लोग स्पष्ट दिखाई पड़ते थे।
- 21:10तब बिजली नहीं होती थी। उसने देखा कि क्या स्त्रियाँ क्या
- 21:17मर्द सब नाच रहे हैं पांव में, घुंगरू बांध के और ऐसे मस्त हो के
- 21:25नाच रहे हैं ऐसा मस्त तो कभी मैं भी नहीं हूँ।
- 21:30मैं शहंशाह आलू अकबर का मन दुखी हुआ ध्यान से समझना इस बात को।
- 21:43अगर दूसरे की प्रसन्नता देखकर तुम्हारा मन दुखी हो जाता है तो
- 21:47तुम समझ लेना कि तुम अहंकारी हो, बढ़िया दोस्त व्याख्या है।
- 21:52अहंकार को अपने से ज्यादा रसीला नृत्य करने वाला सुखी व्यक्ति
- 22:00मान्य नहीं होता। वह मान नहीं सकता और वह देख नहीं
- 22:04सकता। वह तुरंत उस सुखी आदमी को कमजोर
- 22:11करने की श्रेष्टा करेगा। यही अहम्कारी व्यक्ति की निशानी
- 22:14है और अक्सर राजनीति में ऐसे ही लोग होते हैं एक दूसरे की टांग
- 22:19खींचने वाले। मित्रता और राजनीति दोनों यक्सा
- 22:26नहीं चल सकते। रेल की पटरियों के समान राजनीति
- 22:33में मित्र कोई नहीं होता और राजनीति में शत्रु भी कोई नहीं
- 22:37होता इस बात का ध्यान रख लेना। अकबर कूट राजनीतिक है।
- 22:46जब उसने देखा वह हीरे मोतियों की चमक में गुम रह जाने वाला व्यक्ति
- 22:53हर वक्त, हर पल, हर घड़ी सोते सोते भी उसे स्वप्न आते हैं।
- 23:00मैंने फलां क्षेत्र जीत लिया, मेरा साम्राज्य और बढ़ गया।
- 23:05हालांकि साम्राज्य बढ़ने से क्या होता है तुम्हारा अस्तित्व बढ़े,
- 23:11तुम्हारी चेतना बढ़े तो कुछ होता है।
- 23:17लेकिन उनका नाच देकर अकबर का अहंकार बड़ा दुखी हुआ।
- 23:26अहंकार की ये आदत है। अहंकार अपने से ज्यादा सुखी
- 23:31व्यक्ति को देख ही नहीं सकता। इसलिए अहंकारी के पास जितना दुखी
- 23:38व्यक्ति जाएगा, उतना वह भीतर ही भीतर प्रसन्न होगा।
- 23:46वो भीतर ही भीतर सोचेगा, देखो मैं कितना सुखी हूँ और यह कितना दुखी
- 23:52है। अहंकार व्यक्ति अपने से ज्यादा
- 23:56सुखी व्यक्ति का दर्शन भी नहीं करना चाहते।
- 24:00उसके बाद सदा उससे ज्यादा सुखी कोई व्यक्ति न आए।
- 24:05दुखी ही दुखी उसके आसपास हो ऐसी उसकी चाहत होती है।
- 24:13जब उसने देखा कि नाच रहे गिरता डाल रहे ढोल की थाप पर पांव के
- 24:25घुंघरू बज रहे हैं, गिद्ध चल रहा और ढोल बजाने वाला भी नाच।
- 24:34नाच ही नाच खुशी ही खुशी की लहर अकबर तक भी पहुँच रही थी।
- 24:41देखिए जिसके भीतर आनंद होता है, वह आनंद उस तक सीमित नहीं रहता,
- 24:48वह आनंद बाहर बिखर बिखर जाता है। यही संत के संग करने की आज्ञा
- 24:55हमेशा शास्त्रों ने इसलिए दी थी कि संत के भीतर से जो आनंद होता
- 25:01है वह अकेला नहीं पीता। वह आनंद उसके रोम रोम से प्रफुटित
- 25:07होता हुआ बाहर निकलता है। और उसकी जद में जो आ जाता है,
- 25:13उसकी गिरफ्त में जो आ जाता है, वह भी वस्पी ही रहता है।
- 25:17ये समझ लो संत का संघ सत्संग का इतना महत्त्व इसलिए था माना।
- 25:30कि तुम अभी उस स्तर पर नहीं गए के खुद पीने की क्षमता रखते हो,
- 25:35लेकिन जिसने पी ली है उसके पास भी अगर तुम बैठ जाओगे तो हमारे
- 25:42करोड़ों अरबों रोम कूप हैं। और आनंदित व्यक्ति के एक एक रोम
- 25:49से वह आनंद जरेगा हर बात यही तो पहचान है, उसकी तो राग तक है,
- 26:00उसकी तो मजार तक है उसके रोये रोये से।
- 26:05झरेगा आनंद पर इसलिए हमने मसाणियों को मड़ियों को कब्रों को
- 26:14पूजना शुरू किया। हमारे सनातन धर्म में एक व्यवस्था
- 26:19थी जो व्यक्ति उस परम ऊंचाइयों को छू जाता है।
- 26:25उसको हम जलाते नहीं उसके रोम बचना बड़ा जरूरी है एनलाइटनमेंट के
- 26:39वेला में जो उसने अमृत पी लिया। उसके शरीर के भीतर एक एक का अंगना
- 26:49रमा दिया अपने भीतर और वह करोड़ों वर्षों तक प्रशोधित होता रहेगा।
- 26:57विस्तृत होता रहेगा, ब्रॉड कष्ट होता रहेगा।
- 27:00और जो भी उसकी जद में आएगा, जो भी उसकी गर्फ्त में आएगा, जो भी उसकी
- 27:08परिधि में आ जाएगा वह आनन्दित हो जाएगा।
- 27:14इसलिए हमने उसका निर्जीव शरीर भी बचा के रख लिया और कोई कारण नहीं।
- 27:21पता है वह जिंदा नहीं हमको, लेकिन फिर भी हमने उसका मृत शरीर क्यों
- 27:28रखा? क्या वो लोग पागल थे?
- 27:31नहीं, पागल तो हम है। वो बड़े समझदार थे।
- 27:40उन्होंने अध्यात्म की चरम ऊंचाइयों को भी छुआ था और गहरे
- 27:46तलों की जड़ों तक भी पहुंचे थे। वो लोग वो ऐसे शानदार बाकमल लोग
- 27:52थे। उन्होंने आकाश की उचाई और पाताल
- 27:57की गहराई को न प्रिया यम लब्धवा चा परम लाभम् मन्यते न अधिकम ततः
- 28:10यस्मिन सितो न दुख खेम। गुरुणा अपि विचाल्य तेर बड़ा भारी
- 28:17कष्ट आने पर भी जो विचलित नहीं होता जीसको ये लाभ प्राप्त हो
- 28:23जाता है बड़ी सुन्दर व्याख्या की है।
- 28:28कौन सा लाभ प्राप्त हो जाता है धन के लाभ को?
- 28:33पदवी के लाभ को प्राप्त होने पर तो तुम्हारी इच्छा और बढ़ जाती है
- 28:41जो सर्वोच्च पदासीन हो जाता है। वह फिर ये लोग करता है कि मैं
- 28:46डिक्टेटर कैसे बन जाऊं? भला ये भी कोई इच्छा हो?
- 28:55पहले तुमने चाहा मैं म्युनिसिपल कमिश्नर बन जाऊं, फिर तुमने
- 28:59प्रेसिडेंट, फिर एम एलए, फिर सीएम एमपी और फिर पीएम और फिर तुम्हारी
- 29:06इच्छा का मैं डिक्टेटर बन जाऊं मेरे एक इशारे से दुनिया कहाँ पे?
- 29:11क्या हो जाएगा? अगर कॉपी तू रहोगे तो तुम भी कोई
- 29:19आज तक यहाँ रहा है दिखाओ अगर कोई है तो सब चल रहा है।
- 29:29कोई लौट के नहीं आया। कृष्ण जैसे प्यारे लोग राम जैसे
- 29:35प्यारे लोग कभी वापस नहीं आते और उसे पुकारने वाले पुकारना ही रह
- 29:44जाते। हो जाने वाले हो सके तो लोग या न
- 30:02हो जाने वाले हो सके तो। लौट के आना ये घाट तू ये बात कभी
- 30:19भूल न जाना ये घाट। तू ये बात कभी भूल न जाना ओह जाने
- 30:36वाले हो सके तो लौट के आना हम आज तक पुकारना है ऐसे लोग।
- 30:47राम लला आयंक कृष्ण आयंक हमारी इच्छा है कि वो आयें इतने प्यारे
- 30:56थे। बचपन के तेरे मीतू तेरे संग के
- 31:07सहारे बचपन के तेरे मीतू तेरे संग के सहारे।
- 31:19ढूंढेंगे तुझे गली गली सब जे गम के मारे ओछेगी हर निगाह कल ठेरा
- 31:35ठिकाना। ओह जानेवाले हो सके तो लौट के आना
- 31:48ये घाट तू ये भात कभी भूल न जाना। बचपन के तेरे मीत तेरे संग के
- 32:02सहारे ढूंढेंगे तुझे गली गली सब ये गम के मारे राधा ढूंढेंगे,
- 32:10सुदामा ढूंढेंगे ये गोपियां ढूंढेंगे।
- 32:16ये रात रे जाने वाले है निधि वन में मेरा इंतजार करेंगे गली गली
- 32:26ढूंढेंगे लेकिन तुम कहाँ मिलेगा? कहाँ है तेरा ठिकाना?
- 32:36ये पूछेंगे तुम ऐसा गुम गुम मत हो जाना के तेरा ठिकाना ढूंढने से भी
- 32:50न मिले। ऐसे प्यारे लोग धरती पे हैं आते
- 32:59हैं और जब आते हैं तो हम उन्हें सहन नहीं काट पाते हैं।
- 33:08कितनी गालियां दी शिशुपाल ने कृष्ण को?
- 33:15और कितना कांटे की तरह रड़का कह के कह हृदय में राम तू निकल जा
- 33:26जहाँ से मैं महारानी बनूँगी बस तुम्हारे बीच छाये हुए।
- 33:35मैं तानाशाह बनूँगा, धरती पे राज़ का क्या हो जाएगा भाई, धरती पे
- 33:45राज़ कर लेगा तो क्या हो जाएगा? राज़ करना है तो महावीर की तरह
- 33:51अपने इन्द्र में ककर। अपने विषय विचारों के कर अपनी
- 33:58कमजोरियों पे राज़ कर वो कमजोरियां तो चली जाती हैं और तू
- 34:04दुनिया के ऊपर राज़ करना चाहता है।
- 34:07ये राज़ फूका है ये राज़ सच में राज़ नहीं है।
- 34:14कागज का राज़ है जो राज़ सदा न रह सके वो कभी राज़ होता है?
- 34:22राज़ वह जो सदा के लिए राज़ हो जाए और वही तल बता रहे हैं कृष्ण
- 34:30कृष्ण कहते हैं यम। लग्धवा चा परमलाभम मान्यता ना
- 34:35अधिकम तथा जिसके लाभ होने पर और लाभ हो जाए इसकी इच्छा न बचे।
- 34:45क्या तुम्हें ऐसा कभी लाभ हुआ है? नहीं हुआ जब हो जाएगा।
- 34:53तो फिर तुम दर दर के मारे न फिर हो गए, फिर एक छोटी सी कोठड़ी में
- 35:01बैठ जाओगे जहाँ जगह मिली नरजन वन में वृक्ष तले बैठ जाओगे।
- 35:10जहाँ रात हुई वहीं ठिकाने वहीं सो जाओगे, मिल गया खाद नहीं मिल गया
- 35:19रह लोगे क्या तुम्हें ऐसा कभी लाभ हुआ है?
- 35:26ऐसे लाभ की बात करते हैं। कृष्ण बिल्कुल विलक्षण में बात
- 35:29करते हैं। जो देखी न सुने यम लब्ध वाचा
- 35:35परमलाभम मन्यते न अधिकम ततः और अधिक मिल जाए ये इच्छा न हो।
- 35:47यशमिन सितान जहाँ जाकर तुम स्थित हो जाते हो कौनसा है वो मुकाम?
- 35:59न दुख है जहाँ दुख नहीं होता तुम तो सदा दुखी रहते हो।
- 36:07एक समस्या तुम सॉल्व करते हो, दूसरे सर के ऊपर मुँह बाएं खड़ी
- 36:11होती है और भगवान कृष्ण कहते हैं जहाँ जाने से जहाँ स्थित होने से
- 36:21दुख नहीं होता, दुख आता ही नहीं। गुरु नापी बिछाल लेते कितना ही
- 36:29गुरु महत्त्व कितना ही बड़ा दुख क्यों ना हो जाए संसार में बड़े
- 36:34से बड़ा दुख बड़े से बड़ा दुख भी क्यों ना जाए तुम विचलते ना यही
- 36:40निशाने हैं सती प्रज्ञा। एक बातों में एक तीर से कई निशाने
- 36:49कर जाते हैं कृष्ण यही खासियत है कृष्ण और अगर यह खासियत ना होती
- 36:58कृष्ण तो एक गीता के 3000। संस्करण न होते व्याख्यान न होते।
- 37:06प्रत्येक व्यक्ति ने अपने अर्थ कर दिया मा से तुमने अपना अर्थ कर
- 37:12दिया और विद्वुर ने अपना विध व्यास ने अपना अर्थ कर दिया।
- 37:27और तिलक ने अपना अर्थ कर दिया। सभी के अर्थ बिल्कुल अलग है सभी
- 37:33भाषाओं में जहाँ जहाँ गीता जाएगी और जैसे जैसे वर्ष बीतते जाएंगे
- 37:40लोग आते जाएंगे सबकी खोपड़ियां अलग अलग अर्थ कर देंगे गीता।
- 37:48गीता एक आयामी है लेकिन तुम्हारी खोपड़ी उसको बहुआयामी बना देती
- 37:53है। मल्टीडायमेंशनल क्योंकि तुम वही
- 37:57अर्थ करोगे जो अर्थ तुम समते हो और प्रत्येक की खोपड़ी अलग होती
- 38:04है। किसी की खोपड़ी किसी के साथ मिलती
- 38:07है, परमात्मा की यही विलक्षण होता है।
- 38:11दो अंगूठे भी सामान नहीं बनाता तो खोपड़ी एक कैसे अपनातेगा अक्सर
- 38:22मैं सुनता हूँ। आज उसका तलाक हो गया।
- 38:26आज उसके घर में झगड़ा हो गया। आज ये हो गया आज वो हो गया अगर
- 38:32इसको सहज बात समझ लिया जाए कि मानव की खोपड़ी जश्न नहीं होती।
- 38:39दो व्यक्ति मिलेंगे तो मिल ही नहीं जाएंगे।
- 38:44बस एक ही ठिकाना है जहाँ जाकर तुम मिल सकते हो वो तुम जैसा है,
- 38:50कौनसा ठिकाना है वो ही तुम्हारा परम ठिकाना जिससे तुम भी छोड़ते
- 38:58आये हो उसमें तुम पूरे तल्लीन हो जाते हो बूंद और समानी सुन्दर।
- 39:05वहाँ कोई झगड़ा नहीं होता अगर तुम गलत इच्छाएं पालोगे किसी स्त्री
- 39:13को शादी करके ले आए, किसी पुरुष के साथ संबंध जोड़ लिए और तुम कहो
- 39:17कि वो मेरे जैसा हो जाए, असंभव है।
- 39:21ये तुम्हें स्वीकार करते चलना होगा।
- 39:25तुम बंधन में बंधो ये नकली बंधन है चार मंत्रों का उच्चारण कर
- 39:29दिया चार शब्दों से तुम बंध सकते हो क्या अगर शब्दों में इतना बंधन
- 39:34होता अगर शास्त्रों में देवताओं में इतना बंधन होता जिनका गुणगान
- 39:39किया जाता है थपेड़ों के वक्त? तो क्या तुम टूटते इससे क्या
- 39:45सिद्ध होता है? ये पाखंडी पंडित जिनको बुलाते हैं
- 39:52वो हैं ही नहीं, ना गणेश है, ना नारायण है।
- 40:00ये बोलेंगे लेकिन वो है नहीं, ना कोई आता है ना कोई जाता है।
- 40:06बस इन्हीं के मन की कल्पना है। इसलिए मैं कहता हूँ कि फेरे वगैरह
- 40:12सब बंद कर दो। कानून में शादी का विधान है।
- 40:19मैजिस्ट्रेट के सामने जाकर शादी के कागजात पर हस्ताक्षर का तो दट।
- 40:25इस सुफ्फिसिएंट पार्टी वो ही काफी है लेकिन तुम्हें संस्कार घेरेंगे
- 40:36जब मैं कहता हूँ कि श्राद्ध न करो।
- 40:39और अगर तुम वास्तव में इशाद नहीं करते तो तुम्हारा जिया कम हो जाता
- 40:43है। नुकसान नफे तो जिंदगी में होते ही
- 40:47रहते हैं और अगर संयोग से उन दिलों में कुछ ऐसा नुकसान हो गया।
- 40:58तो तुम झट से सो चूके हो, अब के श्राद्ध में क्या वह मर गया?
- 41:03उसने आधे जन्म ले लिया, आगे मर गया, उसने आधे जन्म ले लिया।
- 41:08तुम छः छः पीढ़ियों के श्राद्ध करते रहते हो, कब के मर सके,
- 41:12कितनी बार जन्म चूके, कितनी बार मर चूके?
- 41:18परमात्मा के विधान के अनुसार 13 दिनों के बाद प्रकृति को अनिवार्य
- 41:23रूपेण उसको नया गर्भ उपलब्ध करवाना ही होता है।
- 41:32यही खोजा हमारे ऋषियों ने और तुम अपने ही ऋषियों पर कब विश्वास
- 41:36करते हो? तुम उसको फेर खिलाते ही चले जाते
- 41:42हो, लेकिन तुम नहीं खिलाते। याद रखना ये पंडितों ने तुम्हारे
- 41:47दिमाग में ठूंसा है। ये पंडितों ने तुम्हारे दिमाग में
- 41:51घसोड़ा है। और तुम श्राद्ध करते चले जाते हो,
- 41:57जो श्राद्ध नहीं करते। सिख कोम में श्राद्ध नहीं होता,
- 42:04इसाई में नहीं होता, मुसलमान में नहीं होता, सिर्फ एक तुम ही हो और
- 42:11तुम में भी बहुत से कोमों में नहीं होता।
- 42:16तो उनका क्या बिगाड़ लेते हैं? जी ये जब हैं ही नहीं बिगाड़ेंगे
- 42:19क्या? श्राद्ध का अर्थ था श्रद्धा उस
- 42:24वक्त पे एक व्यक्ति को 1 साल में एक बार याद तो किया जाए ये किसी
- 42:29वक्त ये इस घर का इस श्राद्ध। जब इस घर पे विपत्ति पड़ी तो यह
- 42:34भी दुखी हुआ था। जब इस घर में रौनक आई तो इसके भी
- 42:39होठों पे मुस्कुराहट आई थी श्रद्धापूर्वक उसको याद करना।
- 42:45ये हमारे घर का सदस्य था और आज भी हमारे हृदय में जीवित है।
- 42:50बस यही अथपुर इसको तुमने भगाड़ते भगाड़ते भगाड़ते भगाड़ते जैसे
- 42:58उल्लू व हनी लक्ष्मी बना दी। विश्व में कहीं भी लक्ष्मी की
- 43:02पूजा नहीं मुँह रखे हिंदुस्तान के अलावा।
- 43:09हिंदुस्तान में ही उल्लू वाहनी लक्ष्मी की पूजा होती है और फिर
- 43:13इनके दिमाग को उल्लुओं जैसे ही पूजा होती है।
- 43:19और फिर हम मैंने किसी को उल्लू कह दिया, मैंने किसी को उल्लू का पठा
- 43:24कह दिया। वो कहता है मैं तो अदालत में
- 43:26जाऊंगा, मैंने कहा जाओ। जब उल्लू वाहनी की पूजा करते हो
- 43:32तो तुम उल्लू से कम हो गया, तुम पागलों को इतनी भी समझ नहीं ओम
- 43:44नमो न रयणय कमाल हो गयी। शब्दों से क्या होगा?
- 43:50मैंने पहला शब्द ही बोला कि शब्द भार नहीं है शब्द निर्भार और
- 43:59तुमने निर्भार होना है तुम्हारी आंतरिक इच्छा भी यही है से मैं सब
- 44:04भारों को फेंक दूँ। मैं भार मुक्त हो जाऊं, इसी को ही
- 44:08तो मुक्ति कहते हैं निर्भार हो जाऊं और भार तुम जान बूझ कर रख
- 44:16रहे हो सर पे शास्त्रों का सब्जेक्ट्स का।
- 44:23और गौरान्वित हो रहे हो, मैं इतनी कला संपूर्ण हूँ, मैं बायीं
- 44:28भाषाओं का ज्ञाता हूँ, क्या होगा भाई?
- 44:32सारे मुल्क में सारे विश्व में सभी भाषाएं बोली जाती हैं।
- 44:38सभी लोग कोई भाषा तो बोलते ही हैं।
- 44:42तो अगर तुमने उनमें से 22 सीख ली तो क्या आसमान के पड़ा तुम छोटी
- 44:54छोटी बात कहा? श्रेय लेना चाहते हो ये भी कोई
- 45:00श्रेय की बात है? सीखने की बात है, सारी उम्र लगे
- 45:05रहो, सारी भाषाएं भी सीख जाओ। इसमें कैपेबिलिटी क्या है, इसमें
- 45:11समझ आ रही क्या है? तुम कहते हो, मैं समझदार हूँ।
- 45:19एक व्यक्ति मेरे पास आया। अध्यात्म की साधना सीखन वह समझदार
- 45:26समझता था, अपने आप को जद भी समझदार था तो मैंने कहा बैठ जाओ,
- 45:33ध्यान आँखें मूँद लो। वह जैसे ही अपने भीतर चला गया,
- 45:43उसके भीतर जो था वही दिखेगा। मौत का तांडव नष्ट जगह जगह बिखरा
- 45:51पड़ा था। जो है वही तो दिखेगा वास नहीं भरी
- 45:55पड़ी थी, विचार भरे पड़े थे। अतीत की स्मृतियां और भविष्य की
- 46:00कल्पनाएं, सपने संजोए हुए उसकी आँखों के सामने और मृत्यु मृत्यु
- 46:05का डर जो तुमने दबाया है वही तो आएगा याद रखना अगर तुमने जो दबाया
- 46:12है वह वापस बाहर न फेंक दिया। तो वह दबा दबाया भीतर रह जाएगा और
- 46:18कभी ना कभी तो निकलेगा उसके बिना तो मुक्त नहीं हो सकते।
- 46:24इन स्मृतियों को इन कल्पनाओं को इन दबाए हुए वासनाओं को साथ लिए
- 46:30लिए तो मुक्त नहीं हो सकोगे। और अगर मुक्त हो भी गए तो इनको
- 46:44निष्कासित करना ही होगा जहाँ बही खाते बंद करके जाना होता है।
- 46:50यहाँ बुद्ध भी अटक जाते हैं। जब तक वही खाते उनके सही निपटाए
- 46:57नहीं जाते, कोई उससे ऊँचा नहीं है, कोई विधान से ऊँचा नहीं है और
- 47:04विधान यही है कि जब तुम संसार से जाओगे, सारा लेन देन बराबर करके
- 47:09जाओगे। यहाँ हेरा फेरी जैसी कोई यहाँ ठगी
- 47:13जैसी कोई यहाँ तुम विदेश भाग जाओ मुल्क का पैसा लेके यहाँ ऐसी कोई
- 47:18व्यवस्था नहीं होती सारा मुल्क सारा विश्व उसका मुल्क है निर्भाग
- 47:27होना चाहते हो तो जब वो भीतर गया तो डर गया।
- 47:33यही जो प्रश्न मेरे पास आया था, ऐसा ही कोई व्यक्ति था, समझदार
- 47:39समझता था, शटर बन था लेकिन अब वो जल्दी से उठा।
- 47:47सर्दी का वक्त था, हीटर लगा हुआ था।
- 47:51और पसीना पसीना। वह उठा जल्दी से उसने शटर की
- 47:56किल्ली खोली, शटर उठाया और भाग गया।
- 48:01मैं आवाज देता रहा, और भी थे कुछ लोग के लौट आओ, वापस आ जाओ क्या
- 48:08हुआ? उसने कहा मुझे मुझे भय लगता है।
- 48:19मैंने कहा अब तुम मेरी एक बात को गांठ बांध लेना, समझदारी के साथ
- 48:27साथ। अगर साहस नहीं है, फिर सुन लो एक
- 48:32बात को समझदार तुम कितने भी हो तुम चीफ जज बन कर सुप्रीम कोर्ट
- 48:41के समीदार बेलाशक समझदार हो तुम में अनुभव?
- 48:48लेकिन समझदारी क्या करे अगर फैसला सुनाने का साहस नहीं है?
- 48:56अच्छा भला जानते हो कि ये न्याय है ये अन्याय और फैसला देने में
- 49:02हिचकचाहट कि अगर फैसला सुनाया। तो कही मुझे ही ना मारते और अगर
- 49:08इतना साहस नहीं है तो समझदारी तुम्हारी दो कौड़ी की है।
- 49:16समझ के साथ साथ जीसको भी जज बनाया जाये।
- 49:21उसके साहस की परीक्षा भी अनिवार्य है।
- 49:23आज। ये देश, जनता, तुम्हारी धरती पर
- 49:28रहने वाले, समझदारों की चॉइस करने वाले, चूज करने वाले लोग ये नहीं
- 49:33जानते कि सिर्फ समझदारी ही पर्याप्त नहीं है।
- 49:41समझदारी के साथ साथ कृष्ण जैसा साहस भी होना चाहिए।
- 49:47कृष्ण समझदार भी थे और सास भी थे। है सर तुम्हे पता है कि यह
- 49:56व्यक्ति बिल्कुल गलत है, यह पापी है।
- 49:59इसमें यह कातिल है। यह प्यारा है, यह चोर है, यह
- 50:03लूटेरा है। इसने समाज का इसने देश का धन लूट
- 50:09दिया है और तुम जानते हो और अच्छी तरह जानते हो यह समझ तो तुम्हें
- 50:14है। अंधे बोले को तो कोई।
- 50:18इतनी बड़ी कुर्सी के ऊपर भी नहीं बिठाता, लेकिन अगर वो समझ का तुम
- 50:23प्रगटावा करने का साहस नहीं रखते तो तुम कहाँ समझ जा रहे हो?
- 50:29तो कृष्ण कहते हैं कि समझदारी के साथ साथ साहस का होना अनिवार्य।
- 50:35अगर साहस का अभाव है तो तुम्हारी समझदारी दो।
- 50:38कोढ़ी मायने नहीं रखती। अकेली साझेदारी क्या करेगी?
- 50:43समझ में ये आ जायेगा कि ये है खातिर लेकिन तुम फैसला ना सुना
- 50:50सको कि कहीं ये मुझे ही ना मारते। और अगर इतना साहस नहीं तो फिर
- 50:58तुम्हें अपने पद से त्याग पत्र देना ही उचित है।
- 51:03ऐसे लोगों को मैं यही सुदृष्ट किया करता हूँ कि सर्वोच्च पदासीन
- 51:09होने के पश्चात तुम समझदार हो, इसलिए तुम्हें चुन लिया गया।
- 51:13लेकिन अगर तुम्हें फैसला सुनाने का साहस नहीं है, दुष्टों को दंड
- 51:20देने का साहस है। अगर तुम्हारी वितर नहीं है, तो
- 51:23फिर समझदारी तुम्हारी दो कोड़ी है, मैं तुम्हें एक अध्याय और
- 51:30जोड़ दूँ। समझदार चुनना समझदारी प्रथम
- 51:36योग्यता है, लेकिन समझदारी के संग संग दूसरी पटरी भी आवश्यक है।
- 51:43अन्यथा गाड़ी नहीं चल सके। साहस की पटरी बराबर चलनी चाहिए,
- 51:47बैरल फिर ही समझदारी काम आएगी। अन्यथा साझेदारी कुछ मायने नहीं।
- 51:55रखती दे दे के जे आवाज कोई हर घड़ी बुलाए फिर जाए।
- 52:13जो उस पार कभी लौट के न आए है। भेद ये कैसा कोई कुछ?
- 52:27तो बताना जो मृत्यु के गर्त में समा जाता है।
- 52:33रोज़ जाते हैं लोग कहाँ जाते हैं दुनिया से जाने वाले जाने चले
- 52:46जाते हैं कहाँ कहाँ जाते हैं कुछ बता?
- 52:54लेकिन कुछ लोग जानते हैं कहाँ जाते हैं वही पोल खोल सकते हैं इन
- 53:00ब्रह्मांक जो गरुड़ प्राण में गप ठोक रखे हैं इन्होंने कुम्भी पाक
- 53:08नर्क। जे और उनके बाप उजाले कुंभी पाक
- 53:13नक की सेवा करके आए तो इन्हें अनुभव है दे दे के कोई आवाज तुझे
- 53:25हर घड़ी बुलाए। फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न
- 53:34है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना है, वो जानने वाले हैं बोल सके तो
- 53:41लौट के आना नहीं आएगा, आएगा तो किसी और वेश से आएगा।
- 53:48भगवान कृष्ण ने कहा पितृ अनाय साधु नाम बिना साय से दुष्कर्म
- 53:55धर्म संस्थापना अर्थाई संभवामी जुगे जुगे।
- 53:59और हम तुम तलाश रहे हो उसे वह आएगा नहीं आएगा।
- 54:07आएगा, उस रूप में नहीं आएगा और रूप में आएगा।
- 54:14ज़रा सोचो तुम्हारा कोई अवतार उसी रूप में आए बताओ कोई राम, कोई
- 54:23परशु राम, कोई कृषि उसी रूप में आए?
- 54:29कोई कछुआ, कोई मेंढक, कोई सूअर, कोई मछली कोई उसी रूप में आई नहीं
- 54:36आई तो फिर कृष्ण कैसे आ जाएंगे? फिर राम कैसे आ जाएंगे जब
- 54:42तुम्हारा कोई भी अवतार उसी रूप में नहीं आया?
- 54:46तो कृष्ण कैसे आ जाएंगे? फिर तुम कहते हो कृष्ण खुद कह के
- 54:49गए, बिल्कुल कहते गए कृष्ण जो हैं वास्तव में वो आएँगे, कोई और
- 54:58लबाधार ओढ़ के आएँगे, कोई और एड्रेस, कोई और आभूषण?
- 55:04कोई और पहरावा पहन के आएँगे वो ही मोर मुकटधारी नहीं आएगा और अगर
- 55:15कोई मोर मुकटधारी आएगा तो समझ लेना यह सिर्फ कृष्ण लीला कर रहा
- 55:22है। वह तो तुम हर साल देखोगे मुकुट
- 55:31सजा राम तुम हर साल देखोगे रामलीला में लेकिन राम लला कभी
- 55:37नहीं आएँगे राम लला आएँगे। तो किसी और रूप में आएँगे और तुम
- 55:44उसे पहचान नहीं सकोगे। साईं साईं किसी मस्जिद में पड़े
- 56:00रहते हैं। शरीर के साईं बाबा।
- 56:06किसी मस्जिद में पड़े रहते हैं और कहीं आवास न मिला, कोई ठिकाना न
- 56:12मिला तो मस्जिद में ठहर गए। बाकी जहाँ रुके वहाँ से ठुडे मार
- 56:19के भगा दिए गए तो जहाँ ठिकाना मिला वहाँ रुक गए।
- 56:23वहाँ से किसी ने उठाया नहीं और वो उठे नहीं।
- 56:28लेकिन हीरा कहीं उड़ा हुआ, उसकी आभा से जौहरी तो वंचित नहीं रहता,
- 56:38अंधे वंचित रह जाते हैं। ओह सारा शास्त्रार्थ।
- 56:45अंधों का शास्त्रार्थ अन्यथा जो जानता है वह कभी शास्त्रार्थ नहीं
- 56:51करता। दो जानने वाले लोग पास पास
- 56:57बैठेंगे लेकिन जिक्र नहीं करेंगे। जिक्र करेंगे या तो अंधे अंधों से
- 57:04करेंगे। या फिर वार्तालाप करेंगे।
- 57:09पहुंचे हुए लोग अंदर से लेकिन पहुंचे हुए लोग पहुंचे हुए लोगों
- 57:18से वार्तालाप नहीं करते तो पड़े रहते।
- 57:24पहचानने वालों ने पहचान लिया। एक व्यक्ति रो जाता, उनके पास
- 57:35मंदिर का पुजारी था, मंदिर का पुजारी था, ब्राह्मण था, उसको
- 57:42पहचान गया। अवश्य ही कोई भीतर कीमियां छुपी
- 57:47होगी। दर्शन को उसे पहचान गया और
- 57:53पहचानने के बाद उनके मन के भीतर भाव ना उठी कि मैं इस व्यक्ति के
- 57:58जब तक दर्शन ना करूँगा, पानी भी ना होऊंगा, मर जाऊं दर्शन करूँगा
- 58:05दर्शन के उपरांत मैं। जल ग्रहण करो वह रोज़ लाइन में लग
- 58:12जाता पार्थी लोगों की लाइन लग जाती आज तो पार्थी लोगों की लाइन
- 58:22लगती है खाटू दरबार में साला सरतान में।
- 58:26जहाँ ना तू हनुमान है ना शाम, बाबा मेटल की मूर्तियां हैं, वहाँ
- 58:38लंबी लाइनें मिलेंगी। तुम और सब दुकानदारी है।
- 58:43यहाँ से सेंट जरूर लेके जाना ये दुकानदारी है।
- 58:49मैं रामलीला में राम जी का रोल करता था।
- 58:53यहाँ एक ड्राइवर श्याम जीके मंदिर में खाटू श्याम जाया करते थे।
- 59:00लंबी लाइनों में जाते। और दर्शन करके आते है।
- 59:07मंत खाटू शम शीश के दानी बहुत बली हैं उरज पड़े मेरे साथ।
- 59:21मैं श्याम बाबा का पुजारी हूँ मैं इनका, फिर तो पूजा करो, ये भी कोई
- 59:32अहंकार की बात कहता, वो छक्के छुड़ा देता।
- 59:37मैं किसके तुम्हारे छुड़ा देगा? मैंने कहा रे हूँ र जिसके सिर ही
- 59:46सिर है ही नहीं, वह क्या चिपके चुड़ाई इतनी बात से वो तिलमिला
- 59:52उठा और बताओ भक्तो मैंने कोई झूठ बात कही, ये सिर्फ शेर को ही
- 59:59पूछते हैं। डर तो उसके है ही नहीं और बिना
- 1:00:04धड़ का सिर क्या कर सकता है? बोल भी तो नहीं हो सकता, हार्ट भी
- 1:00:10तो नहीं है, ब्लड सर्क्युलेशन के लिए लंग्स भी तो नहीं है, श्वास
- 1:00:14लेने के लिए कोई यंत्र नहीं है, ना लिवर है, ना किडनी है।
- 1:00:20खा भी नहीं सकता। डाइजेस्ट भी कुछ नहीं होता।
- 1:00:24खा ही नहीं अब अकेला सिर है। मैंने कहा अकेला सिर मेरा क्या
- 1:00:31पूँछ पड़ेगा? कहता देखो ऐसे मत बोलो, मैंने कहा
- 1:00:36और कैसे बोलू, उसके धड़ लगा दो, मैं कह दूंगा, धड़ वाला है।
- 1:00:41जब धड़ है ही नहीं तो बड़ा गुस्सा हुआ।
- 1:00:46झूठे भक्त लोग ऐसा ही गुस्सा हुआ करते हैं।
- 1:00:50सत्य बातों की तरफ उनका ना तो आंख जाता है ना दिमाग जाता है।
- 1:00:57तो उलझ पड़े बहुत कुछ अबैत वह बोल कर चले गए।
- 1:01:02मैंने कुछ नहीं कहा। उन दिनों मैं थोड़ा शांति रहता
- 1:01:04हूँ। कहता बाबा तुझे इस समझे लिखा ये
- 1:01:12कोई 30 साल 2530 साल? मैंने कहा समझ ले तू भी समझ लेना
- 1:01:23और तेरा बाबा भी समझ ले तेरा तो सर भी और धड़वी है उसके तो सर ही
- 1:01:28है। हफ्ते बाद उसकी खुद की मृत्यु हो
- 1:01:35गई तो पांच वो लोग खड़े थे, मुझे कहने लगे बाबा तुमने क्या शराब दे
- 1:01:41दिया? मैंने कहा मैंने?
- 1:01:44मैंने तो सिर्फ यही कहा था कि तेरे बाबा से जो होता है तेरा
- 1:01:48बाबा कर ले तेरे से जो होता है तू कर अब ये मर गया तो उसकी आई थी
- 1:01:54मैं क्या करूँ? मैंने कुछ नहीं ऐसे ऐसे पागल लोग
- 1:02:01कतारों में खड़े हैं। घंटों तक टांगों को तोड़ते
- 1:02:07अंधविश्वास के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
- 1:02:19जब वहाँ कोई चला जाता है, उसका अता पता कोई नहीं बताता।
- 1:02:24नहीं ऐसा नहीं है, उसका अता पता बताने वाले लोग भी हैं।
- 1:02:31लेकिन क्या करें जब कोलाहल के अंदर बांसुरी की हल्की आवाज खो
- 1:02:37जाए तो उस बांसुरी की आवाज का पता नहीं लगता कि यह आवाज भी आई थी आज
- 1:02:46सारी दुनिया डर के मारे बपीत कांप रही।
- 1:02:50और कमाल की बात है। जिंदा लोगों से कांपो तो कांपो
- 1:02:57कुछ तत्व भी भी बनता है, लेकिन मुर्दो से तुम कांपो और उनसे
- 1:03:03कांपो जिनके धड़ भी है भाई हद हो गए।
- 1:03:08तुम तो लोग वृक्षों से ही काँपते हो ये जंड देवता ये खेत्रपाल कैसे
- 1:03:17कैसे दुष्ट उनकी तुम पूजा करते हो और में जब बोलता हूँ तो में
- 1:03:28गुस्सा आता है? मैं जो बोलता हूँ देख समझ के
- 1:03:36बोलता हूँ तुम्हारी तरह बकरे छोड़ने वाला मैं।
- 1:03:51तो भगवान कृष्ण कहते हैं वहाँ स्थित हो जाता है जाकर समझो बात
- 1:03:58को यशमिन सिताम यशमिन सिताम न दुःखीन गुरुण अपि बिछाल।
- 1:04:13वह विचलित नहीं होता। गुरु कहते हैं, भारी भारी से भारी
- 1:04:19दुख भी उसके ऊपर क्यों ना पड़े? वह विसैत नहीं होता।
- 1:04:24जिसे तुम दुख कहते हो, वह उसकी नजर में दुख है या नहीं।
- 1:04:32तुम मृत्यु को दुख कहते हो। तुम मृत्यु को शोक मनाने जाते हो
- 1:04:36उसके घर में लेकिन कृष्ण का कोई शोक नहीं।
- 1:04:40कृष्ण कहते हैं, यह है तो सिर्फ पंचतत्व अलग अलग हुए हैं।
- 1:04:47कभी इकट्ठे हो गए थे, यहीं से इकट्ठे किए थे और यहीं पर हो गई
- 1:04:52हैं। वितीर्ण हो गए हैं, वितीर्ण हो गए
- 1:04:56हैं, सिर्फ टूट गए तत्व तत्व में जा मिला है।
- 1:05:03कृष्ण तो यही बोलेंगे जो जानते हैं और तुम तुम थपेड़ों से डरने
- 1:05:09वाले लोग। तुम पीरों से डरने वाले ख्वाजाओं
- 1:05:14से डरने वाले लोग जो हैं ही नहीं और अगर हैं तो ये कुछ कर नहीं
- 1:05:20सकते। क्या करेंगे?
- 1:05:23जिनके शरीर ही नहीं वो क्या करेगा?
- 1:05:27लेकिन तुम बुद्धूओं को कुछ समझ नहीं आता, मैं रोज़ बोलता हूँ।
- 1:05:35कृष्ण कहते हैं कि भारी से भारी दुख भी उसे विचलित नहीं कर सकता।
- 1:05:42यमलबधवा जा परमलाभम् मन्नते न अधिकम दतः।
- 1:05:51यस्मिन सीताम न दुःखीन वरुणा अभी विशल है।
- 1:06:00तुम थोड़े से लाभ से खुश हो जाते हो और हानि हो जाये तो तुम विचलित
- 1:06:07हो जाते हो। लेकिन कृष्ण बड़ी अद्भुत बात करते
- 1:06:11हैं कि वह वहाँ जाकर विराजमान हो जाता है जहाँ पर बड़े से बड़ा दुख
- 1:06:18भी उसे विचलित नहीं कर सकता। कहाँ जाकर बैठ जाता है इसको?
- 1:06:23भगवान कृष्ण ने कहा अस्तित्व प्रज्ञ हो।
- 1:06:29तो अकबर को उनका नाचना गाना गिड़ता दौ रख के था।
- 1:06:34अच्छी ना रख किसी भी अंहकारी व्यक्ति को अपने से ज्यादा सुखी
- 1:06:41व्यक्ति अच्छा नहीं लगता। मैंने ऐसे भाई देखे हैं।
- 1:06:48भाई देखे हैं जो छोटे भाई बड़े भाई को बड़ा प्रेम करता है, आदर
- 1:06:52देता है और बड़ा भाई कहीं कोई भाई मेरे से ऊपर ना हो जाए, इसका
- 1:06:59बराबर ख्याल रखता है। अपने बच्चों को विदेश भी देता है।
- 1:07:06और उसके बच्चे अपना हक भी न पा सकें, यह प्रेरित करता है।
- 1:07:10छोटों को यह पाप है ऐसे मैंने देखे हैं अहंकार की मूर्ति है,
- 1:07:22मेरे से ऊंचा कोई ना। अकबर की भी यही मन स्थिति थी।
- 1:07:28उसने पूछा अपने महामंत्री से यह इतने प्रसन्न क्यों हैं?
- 1:07:34महामंत्री राजन इनके पास खोने को कुछ है ही नहीं, इसलिए खुश हैं बस
- 1:07:43वह। जिसकी बात कृष्ण करते हैं, वह उस
- 1:07:49स्थिति में जाकर बैठ जाता है जहाँ खोने के लिए कुछ भी नहीं होता।
- 1:07:54जहाँ पाने के लिए कुछ नहीं होता, उसने पा लिया जो कुछ पाना था।
- 1:08:00उसने जान लिया जो कुछ जानना था उसने जान लिया कैंप ओमनेप्रेज़ेंट
- 1:08:06ओमनिशिएंट ओमनिपोटेंट मैं सर्व शक्तिमान हूँ सर्व व्यापक हूँ
- 1:08:11सर्व, फिर घटेगा कैसे खोएगा? क्या जब सब जगह वो ही हुआ है?
- 1:08:20सब जगह वो ही वो है तो खोने को है, क्या उसके पास घटने को है
- 1:08:26क्या उसके पास और जोड़ने को है? क्या उसके पास अगर लाभ हो गया तो
- 1:08:33खुश क्यों होगा? क्योंकि जो जिसका वो मालिक है।
- 1:08:39वो उमनी पोटेंट है। जाने एक कण भी बल्कि उसके अंदर और
- 1:08:45जोड़ा नहीं जा सकता तो वह खुश क्यों होगा?
- 1:08:51और अगर कोई गुम हो जाए तो वह दुखी क्यों होगा?
- 1:08:57नहीं, वह दुखी नहीं होगा। क्योंकि वह जानता है कि सब मैं
- 1:09:02हूँ, आई ऍम मेरा है सब कुछ महामंत्री बोला राजन इसके पास
- 1:09:09खोने को कुछ नहीं है और तुम भी ध्यान रखना, जीस दिन तुम्हारे पास
- 1:09:13खोने को कुछ न रहे उस दिन तुम से हिंसा हो गया।
- 1:09:18और पाने को कुछ न बचे उस दिन तुम शहंशाह हो गए।
- 1:09:24बड़ी अजीब पर भाषा है जीसको कछु ना चाहिए वो ही शहंशाह चाह गई
- 1:09:35चिंता, मिट्टी, मनवा बेपरवाह। चाहे ही नहीं किसी की खो जाए के
- 1:09:41पा जाए और जो सर्व व्यापक हो जाता है, जो सर्व शक्तिमान हो जाता है,
- 1:09:50जो सर्वज्ञ हो जाता है, मैं कुछ पाने की अपेक्षा नहीं रखा पाता।
- 1:09:57चाह गई। चिंता मिट गई और जिसकी चाह मिट गई
- 1:10:01उसकी चिंता भी मिट गई। अगर तुम्हें चिंता है तो समझ लो
- 1:10:05तुम अल्पग्य हो तुम तुम अल्पशक्तिमान हो तुम सर्वव्यापक
- 1:10:14नहीं और मैं तुमसे कहता हूँ। आवाहन करता हूँ तुम सर्वव्यापक
- 1:10:19होने की तरफ कदम उठो, अपने भीतर उतरो, 1 दिन तुम सर्वव्यापक हो
- 1:10:24जाओ, अपने भीतर उतरने की कलह मैंने बहुत सी वीडियो उसमें बोली
- 1:10:31अपने ही भीतर जाने से तुम्हारा कल्याण होगा।
- 1:10:35बाहर कितने ही घूम फिर लो यह हिल स्टेशन है चाह गई चिंता मटी मनवा
- 1:10:44की परवाह जिनको कछु ना चाहिए वो ही सहन कछु चाहिए भी नहीं और कुछ
- 1:10:51गुम हो जाए तो दुखी भी नहीं होती। कुछ भी सब कुछ भी चला जाए, तुम तो
- 1:11:00थोड़ा सा नुकसान हो जाए, तुम्हारा तो चेहरा लटक ही जाता है।
- 1:11:06यम लग्धवा चा परम लाभम मन्यते नादिकम तथा।
- 1:11:14और लाभ की चिंता नहीं और लाभ की इच्छा नहीं तो कबर कहने लगा मेरे
- 1:11:20से सुख है, आज मेरा आंख का टूट गया।
- 1:11:26मैं तो कभी ऐसा नाच ही नहीं सकता। ये तो पूरा परिवार नाच रहा है।
- 1:11:33और हम तो पूरा परिवार इकट्ठा ही नहीं हो सकता, नाचेंगे क्या?
- 1:11:36खाक तो ऐसा करो महामंत्री मैं तो इंडिया नहीं देख सकता या तो इनको
- 1:11:42मेरे देश से बाहर निकाल दो या कोई उपाय करो महामंत्री वो कहता है
- 1:11:48नहीं मालिक मैं उपाय कर दे। दूसरे दिन उसने थैली कर दिया।
- 1:11:58चांदी के 99 सिक्के ऊपर से गिरा दिया।
- 1:12:03तंबू के ऊपर से इन लोगों का तंबू भी ऐसा कटा फटा होता है।
- 1:12:09और जहाँ से थोड़ा सुराग था वहाँ से एक रात और टन टन करके नीचे गए।
- 1:12:18ढोलक की छाप बंद हो गई। घुंगरू का नृत्य बंद हो गया और सब
- 1:12:26टूट पड़े चांदी के सिक्कों की तरफ।
- 1:12:28उसके मेहमान तो जानते ही थे, सब ने इकट्ठे करने शुरू कर दिए वो 99
- 1:12:37में सिक्के उसने फेंके और ढोल वाले ने ढोल मारा चलाकर घुंघरू
- 1:12:44वाले ने घुंघरू खोल दिए। और सिक्के उठाने में व्यस्त हो
- 1:12:49गए। यही राजनीति करते हैं, जो
- 1:12:53घोटालेबाज हैं उनको ऐसे ही कर देते हैं।
- 1:12:57छप्पर पाड़ के दे देते हैं। वो फिर आपस में लड़ना शुरू हो
- 1:13:02जाते हैं। महामंत्री का।
- 1:13:07यह टोट का काम आ गया, सब लड़ पड़ा किसी के हाथ में दो आगे, किसी के
- 1:13:13हाथ में तीन आगे किसी के हाथ में एक भी ना है वो जिसके हाथ में एक
- 1:13:18भी ना है वो लड़ पड़ा, आपस में लड़ लड़ के बैठ गए अच्छा टोट का
- 1:13:25काम आ गया। लेकिन कृष्ण कहते हैं जिसके पास
- 1:13:29खोने को कुछ नहीं बचा और जिसका कुछ भी नुकसान हो जाए उसके मन के
- 1:13:35ऊपर बोझ नहीं आता। वो दुखी नहीं होता।
- 1:13:38तुम ऐसे तल पे पहुँच जाते हो, बाहर से नाचनेगाने वाले लोग उस तल
- 1:13:44पर नहीं। तुम्हें लगता है जो प्रश्न है
- 1:13:48लेकिन प्रसन्न नहीं होते वो नाचने गाने में तब तक व्यस्त हैं जब तक
- 1:13:54उन्हें कोई लोभ नहीं मिलता और जब उन्हें लोभ मिल जाता है तो फिर वो
- 1:14:00लड़ाई के ऊपर भी उतारू हो जाते हैं।
- 1:14:05लेकिन कृष्ण क्या कहते हैं? कृष्ण उस संत की बात करते हैं, जो
- 1:14:11तुम सोना भी बरसा दोगे तो वह इकट्ठा नहीं करेगा तो रोज़ आया
- 1:14:20करता हूँ। शिरडी के साईं बाबा के पास 1 दिन
- 1:14:27देर बड़ी हो गई। करीब करीब सूरज के डलने को हो गया
- 1:14:31और उसने पानी पीना पिया। तो शिरडी के साईं बाबा ने कहा तुम
- 1:14:36कष्ट मत किया करो, तुम्हारा समर्पण कुछ ज्यादा गहरा है।
- 1:14:42मैं ही वहाँ आ जाया करूँगा। ठीक है, बहुत खुश हुआ।
- 1:14:48दूसरे दिन उसने बनाई कड़ाह प्रसाद की देख और बैठ के लेकिन साईं बाबा
- 1:14:58ना आए और साईं बाबा ना आए तो वो पानी के घूँट गया।
- 1:15:04सांझ हो गए, कोई न आया तो एक सुअर आया, सुअर आया गंदगी से ओतप्रोत
- 1:15:13निपड़ा हुआ किसी नाले में बैठा होगा वहाँ से उठ के आ गया और
- 1:15:17मंदिर के भीतर घुसने की चीज़ ठग। तो साईं तो लठ पुजारी तो लठ उठा
- 1:15:24रहा है। उसने कहा ये सूअर कहाँ से आ जाती
- 1:15:29है, कौन छोड़ जाता है इनको? जब बाजार में घूमते फिरते हैं,
- 1:15:33इनको पालने वाले लोग बांध के नहीं रखते हैं।
- 1:15:36उसने लठ बरसा दिए। पांच।
- 1:15:39और से से करता हुआ सूअर बाद में साइन नहीं आए।
- 1:15:47दूसरे दिन और फिर गया भूखा था भूख थोड़ी से होती है, खा पी लिया
- 1:15:54दूसरे दिन फिर गया साइन से आप आए। बड़ा इंतजार किया।
- 1:15:59सूरज डल गया, फिर मैंने खा लिया के तो मैं आया था आया था और ये
- 1:16:08देखो मेरी पीठ के चार लट्ठे बरसा दिए तुमने अब तक दुख रहे हैं, ये
- 1:16:16निशान देखो पड़े। उसने देखा, लेकिन बाबा अब तो नहीं
- 1:16:22आए, मैं आया था सूअर के रूप में सभी रूप मेरे ही तो हैं।
- 1:16:30ये सभी रूप मेरे ही तो हैं। तुम पहचानने में गलती कर जाता।
- 1:16:40ठीक है मैं कल फिर आऊंगा तुम तैयार रखना अपनी देख भड़क दूसरे
- 1:16:47दिन फिर सो गए शिनान ध्यान करके बाबा आएँगे बाबा फिर नहीं आये
- 1:16:54दोपहर ही हो गए। फिर सांज डरने को हुई और वह तो
- 1:17:01इंतजार कर रहा है, लेकिन आया तो कोई नहीं आया तो एक कोड ही आया और
- 1:17:09कोड ही आया। उसके शरीर से मवाद रिस रहा था दूर
- 1:17:14से। गंद की बदबू गंद की बदबू?
- 1:17:21दूर से ही हवाएं उसके साथ ही चमट के नाकों को परेशान करती थी।
- 1:17:28उसने देखा ये गंदगी कहाँ से आ रही है, ये दुर्गंध कहाँ से आ रही है
- 1:17:32देखा सामने से एक लठ लिए। धीरे धीरे एक कोढ़ी चला रहा है।
- 1:17:42उसने बेहतर घुसने की कोशिश की। शंकर ये कहाँ से आ जाते हैं?
- 1:17:48मैं बाबा का इंतजार किया और ये लंगड़े तंगड़े।
- 1:17:55कौड़ी सोढ़ी पता नहीं कहाँ से आ जाते कल सूअर घुसा आज आज सूअर को
- 1:18:02इंतजार कर रहा हूँ आज ये घुस रहा है फिर वो ही लट्ठर लेके आए फिर
- 1:18:07बरसाते हैं बेचारा रोता, रोता बाहर चला।
- 1:18:15फिर अगले दिन क्या बाबा तुम फिर कल नहीं आए मैं आया था पुत्र
- 1:18:23लेकिन तुम पहचान कहाँ पाते हो? रामलला आएँगे, कृष्ण आएँगे।
- 1:18:29लेकिन तुम पहचान कहाँ? तुम उसी रूप में समझते हो के
- 1:18:35आएँगे। लेकिन साईं कहते हैं वही रूप
- 1:18:39कहाँ? वह तो गया, वह तो सरयू में बह
- 1:18:42गया, तुम उसको इंतजार करते हो। वस्मभूतस्य देहस्य पुनर्आधुनिकता
- 1:18:52चरवा का इस बड़ा प्यारा लगता है अध्यात्म के मानने में जो एक बार
- 1:18:57वस्म हो गया वो फिर कैसे दूसरी बार आएगा?
- 1:19:03किसी ने प्रयोग किसी और रूप में किया लेकिन वो पहला शब्द में चूक
- 1:19:07जाता हूँ। वो मैं नहीं बताया करता।
- 1:19:10मैं तो सिर्फ यही से भस्मभूत से देहज से पुनर आगमन।
- 1:19:13कुता फिर कभी नहीं आता। कृष्ण नहीं आएँगे, कभी नहीं
- 1:19:18आएँगे, रामलला नहीं आएँगे, कभी नहीं आएँगे उस रूप में नहीं
- 1:19:23आएँगे, अन्य अन्य रूपों में आएँगे।
- 1:19:25आओगे और तुम पहचान नहीं। यही विडंबना है तुम पहचान नहीं
- 1:19:37पाते हमारा सनातन धन्य था हमारे सनातन ने, सूअर को भी परमात्मा का
- 1:19:46रूप जाना जाना नहीं। मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है।
- 1:19:52मैंने अपनी बायोग्राफी में बोल रखी है।
- 1:19:563 दिन तक मेरे पे ऐसी अवस्था मैं जब घर से बाहर निकला मुझे सब सब
- 1:20:02कहीं, वह नजर आया पारदर्शी अपारदर्शी।
- 1:20:07वह ही है सब जगह और मैंने सूअर को गले लगा लिया, श्वेत वस्त्रधारी
- 1:20:16नए वस्त्र पहने हुए और सूअर परमात्मा नजर आता है गंद गंदगी
- 1:20:24में लिबड़ा हुआ भी मुझे परमात्मा नजर आता है।
- 1:20:27मैंने उसको गले से लगा लिया, मैंने उसका मुख चूमना शुरू कर
- 1:20:35दिया। अब तो मैं तो गिरना ही लेकिन जब
- 1:20:41दिखता ही ऐसा है मैंने उससे प्यार किया।
- 1:20:46गले से काट लिया हाथ फेरे उसके शरीर पे हाथ गंदे हो गए।
- 1:20:51लोग मुझे खींच के ले गए जो सेवक थे सफाई कर्मचारी उन्होंने मेरा
- 1:20:59हाथ पकड़ा और खींच के ले गए। स्नान करवाया जटोल के शाबिन से नई
- 1:21:04वस्त्र पहना। मैं किसी शास्त्र की बात नहीं
- 1:21:11करता, मैं कहता आंखंत, तुम कहते कागज की तुम उस रूप में इंतजार
- 1:21:25कभी मत करना। किसी भी रूप में वो आ सकता है
- 1:21:32लेकिन हमारी दृश्यता ये है कि जीस रूप में वो आएगा उसमें हम पहचान
- 1:21:38सकेंगे क्योंकि वह पहले ही उस रूप में आए।
- 1:21:43हम तो उस मुकुट धारी को पहचान सकते हैं और वो कभी आएगा नहीं।
- 1:21:48इसलिए मैं तुम्हे कहा करता हूँ कि तुम परमात्मा को कभी नहीं पहचान
- 1:21:52पाओगे क्योंकि वो जब भी आएगा अलग रूप में आएगा और तुम उसको
- 1:21:56पहचानोगे। दे दे के ये आवाज कोई हर घड़ी
- 1:22:07बुलाए फिर जाए जो उस पार कभी लौट के ना आए है भेद ये कैसा कोई कुछ
- 1:22:18तो बताना बिल्कुल उसी रूप में लौट के नहीं जाता।
- 1:22:23विलासक लेकिन आता है किसी और रूप में आता है, कोई लबादा और होता
- 1:22:30है, कोई ड्रेस और होती है, कोई वस्त्र और होते हैं और तुम
- 1:22:38वस्त्रों से ही आदमी को पहचानते हो।
- 1:22:42धन्यवाद।