Latest / Baba ji Vijay Vats / 15 Oct 25 - विजय वत्स vs कृष्ण vs बुद्ध | मेरे से ऊपर कोई परमात्मा कोई शक्ति नहीं है | Must Listen.
Transcript
- 0:01घनश्याम दास बाबा जी स स्पर्श आप में और बुद्ध में क्या अंतर है और
- 0:22क्या समानता? है।
- 0:292500। वर्षों।
- 0:31के बाद आपने जन्म। लिया।
- 0:42थोड़ा विस्तार से सुलझाने का कष्ट करें।
- 0:47रहस्य की बहुत सी। गुत्थियां आपने खोल।
- 0:53बड़ी से बड़ी रिहर्सरी। की गुत्थी आज।
- 0:59मैं सुलझाने के लिए आपको श्रद्धा पुरो को नमन करते हुए।
- 1:09इस प्रश्न का उत्तर मांगता हूँ। गजमदास समानता?
- 1:21यह है बुद्ध कहते हैं कि परमात्मा।
- 1:28नहीं है मैं भी। कहता हूँ कि परमात्मा।
- 1:35नहीं है। दोनों के समानता है।
- 1:45बुद्ध कहते लार्ज अरे सुफ्फिसिएंट लेकिन मैं नहीं कहता कि लार्ज अरे
- 1:53सुफ्फिसिएंट। यह असमानता है।
- 2:01बुध कहते नियम ही काफी है। नियंता की क्या नियामक की क्या
- 2:07आवश्यकता? है।
- 2:17मैं भी कहता हूँ कि परमात्मा नहीं है, दोनों का फर्क समझिए, बड़ा
- 2:26बारीक फर्क है। बुध कहते हैं परमात्मा नहीं, मैं
- 2:33भी कहता हूँ परमात्मा नहीं। लेकिन।
- 2:39मैं कहता हूँ परमात्मा नहीं है, मेरे सिवा परमात्मा नहीं है, मैं
- 2:47ही परमात्मा हूँ, बड़ा भारी फर्क है।
- 2:56समानता। ये है कि दोनों।
- 2:58कहते हैं परमात्मा नहीं बुद्ध कहते हैं परमात्मा नहीं है लाज आर
- 3:05सुफ्फिसिएंट मैं कहता हूँ परमात्मा।
- 3:14नहीं है क्योंकि मैं ही परमात्मा हूँ।
- 3:18मेरे अलावा कोई परमात्मा नहीं है की सर लोग कहेंगे ये तो
- 3:24आत्मशिलाग। होगी।
- 3:35आत्मज्ञान और आत्मशिलाग में बुरा फर्क है।
- 3:44आत्मज्ञान वो होता है। जिसने खुद।
- 3:47का फैलाव चल दिया और आत्मशिलाग वो होती है अपने मुँह मिया में।
- 4:06आप समझ रहे हो? बुद्ध कहते हैं।
- 4:10परमात्मा नहीं है विकास लार्ज आर सफीशियंट मैं कहता हूँ परमात्मा
- 4:17नहीं है क्योंकि मैं ही परमात्मा हूँ।
- 4:20और मेरे अलावा कोई? परमात्मा है।
- 4:27और बुद्ध कहते हैं कि लॉज अरे सुफ्फिसिएंट।
- 4:32मैं कहता हूँ लॉज। अरे सुफ्फिसिएंट, क्योंकि ये
- 4:38बनाने वाला। मैं पूर्ण।
- 4:43पूर्ण अपूर्ण चीज़ को कैसे पैदा कर सकता है पूर्ण पूर्ण की।
- 4:49संरचना की ऐसी नियमावली। गठित की।
- 4:54की वह अपूर्ण। हो ही नहीं सकते इसलिए।
- 4:58कर्म व्यवस्था बड़ी सटीक है। मेरी सृष्टि में सृजना में ज़रा
- 5:07भी चूक नहीं होती। तुम कहोगे आप परमात्म्य।
- 5:26हैं। इससे पहले किसी ने कहा।
- 5:31हाँ, कहा। सारी गीता में कृष्ण ने कहीं नहीं
- 5:38कहा कि परमात्मा है, कृष्ण भी नाश्ती कहीं।
- 5:47से, सर। क्योंकि कृष्ण भी यही कहते।
- 5:53हैं कि परमात्मा नहीं है। ज़रा देखो अगर मैं ये कहूं।
- 6:04सुपोज के विजय वत्स नहीं है। तो आपके द्वार्थ समझ में आएँगे।
- 6:18एक तो समझ में ही आएगा कि विजय वस नहीं है।
- 6:23लेकिन मैं जीस ढंग से बोला कि। विजय वस नहीं है मेरे से अतिरिक्त
- 6:28विजय। वस नहीं है।
- 6:30मैं ही हूँ। पूजा ये।
- 6:39थी बुद्ध में असमानता। और समानता फिर।
- 6:46सुन लीजिए बुद्ध कहते हैं परमात्मा नहीं है, मैं भी कहता
- 6:50हूँ परमात्मा नहीं, कृष्ण भी कहते हैं कि परमात्मा नहीं।
- 6:56ये बात आप नई पहली बार सुन रहे है।
- 7:07पर बुद्ध कहते हैं, नियम ही काफी है, नियंता की क्या आवश्यकता है?
- 7:13मैं भी कहता हूँ। नियम ही काफी बनाए।
- 7:18मैंने। और नियंता कभी नियमों में
- 7:26दखलंदाजी नहीं करता। यही कारण है सवाल पूछने वाले की
- 7:32बलात्कार क्यों होता? हत्याएं क्यों होती है?
- 7:36क्योंकि नियंता नियमों में वादा। नहीं डालता लेकिन बुद्ध।
- 7:47और कृष्ण सामान्य। दो पायदान का फर्क है।
- 7:58बुद्ध नीचे के पायदान पे खड़े कहते हैं।
- 8:00परमात्मा नहीं है, सत्य बोलते हैं क्योंकि परमात्मा को जाना नहीं है
- 8:10जो संसार का त्याग इतना कर सकता है भरे पूरे सिंहासन को छोड़ के
- 8:15लात मार के आ सकता है। बस वह भगोड़ा है।
- 8:25भरापुरा साम्राज्य कृष्ण के पास है भरापुरा साम्राज्य मेरे।
- 8:29पास है, लेकिन कृष्ण? लात मारने की जरूरत नहीं था
- 8:41क्योंकि जो कूड़ा है, जो व्यर्थ है उसको लात।
- 8:45भी का है क्या तुम राह? चलते किसी गोबर।
- 8:49के अंदर जानबूझ के लात मारते हो? गलती।
- 8:52से लग जाए बात अलग। समानता और असमानता इसे।
- 9:10तुम आत्मशिलागह कह सकते। हो लेकिन यह आत्मदर्श।
- 9:19है आत्म बहुत है। जब 28।
- 9:25ऑक्टोबर 1985 को मैंने अपना फैलाव देखा, सब भ्रम टूट गया है,
- 9:39इल्ल्यूज़न ध्वस्त हो गया जब देखा कि मैं ही मैं दूसरा कोई है नहीं।
- 9:49तो कैसे कह सकता हूँ कि मेरे से अलग?
- 9:51कोई और सत्ता विद्यमान है। कैसे कह सकता हूँ?
- 9:56मैं के परमात्मा है। दूसरा मेरे से इलावा बुद्ध कह
- 10:00सकते हैं क्योंकि बुद्ध। जीस स्तर पर पहुंचे, वह सीमित है,
- 10:10अभी असीम नहीं हुए है बैराट नहीं हुए और बुद्ध झूठ नहीं बोलता है
- 10:25झूठ कृष्ण जी बोलता है। शायद मुझे तुम।
- 10:32पागल कराट दे सकते हो तो याद। रखना कृष्ण को भी।
- 10:35साथ में पागल कराट देना पड़ेगा क्योंकि मैं वही।
- 10:39बोलता हूँ रे कृष्ण? मतः परतरम।
- 10:47नान्यत किंचित अस्थि धनंजय हे धनंजय इस संसार में मेरे अलावा।
- 10:59और कोई दूसरा है? जैसे मोतियों के माला में।
- 11:06धागा परोया होता। है ऐसे।
- 11:11ही मैं समस्त संसार। के भीतर।
- 11:14धागे की तरह परोया। हूँ।
- 11:17मेरा ही वजूद है हर तरफ। आपने शायद ये बात पहली।
- 11:24बार सुनी होगी। कृष्ण नास्तिक हैं, इस हिसाब से
- 11:32बड़ी मज़े की बात है। गीता की हजारों।
- 11:36टीकाएं हो चुकी हैं पर आपको। समझी नहीं आया कि।
- 11:40कृष्ण नास्तिक। इस दृष्टि से नास्तिक है कि
- 11:47परमात्मा नहीं। है।
- 11:48मेरे अलावा मैं ही परमात्मा हूँ, ध्यान रखना, मैं भी यही कहता हूँ
- 11:56कि मैं ही परमात्मा हूँ। लेकिन एक गलती न खा जाना जो
- 12:03कृष्ण। के मामले में आप।
- 12:05कहाँ गए? जिसने भी कहा।
- 12:09कि मैं ही परमात्मा हूँ, हम ब्रह्मास्म कहने वाले बहुत लोग।
- 12:13थे। कोई एक अकेले कृष्ण ना थे।
- 12:19उनमें से एक कड़ी और जुड़ गई। मैंने भी बहुत पहले कह दिया।
- 12:25कि मैं परमात्मा हूँ अहम ब्रह्मास्मा।
- 12:30मेरे सिवा दुजापुर है? जो कोई जिसने भी कहा।
- 12:42कि मैं परमात्मा हूँ। आपने उसकी पूजा करनी शुरू कर दी।
- 12:56जबकि कृष्ण का कतई। ये मतलब नहीं था कि।
- 13:03कोई मेरी पूजा करे। कृष्ण का बिल्कुल यह मतलब।
- 13:10था। सत्य को बदला और।
- 13:15कृष्ण संघ संघ। ये भी कहते हैं जितना मैं
- 13:21परमात्मा हूँ। तुम भी उस स्थल पे चलो, तुम पाओगे
- 13:29उतने ही तुम परमात्मा हे परंतुप हे धनंजय, इस संसार में मेरे सिवा
- 13:41दूजा कोई। नहीं।
- 13:43मैं एक अकेला। मेरा कोई शरीर मेरा कोई नहीं।
- 13:56मेरा कोई मित्र नहीं, क्योंकि मित्र भी तो दूसरा हो गया।
- 14:02वह भी तो। दूसरा हो गया मुझे।
- 14:03किसी का वह नहीं, वह भी तो दूसरे का होता है।
- 14:10मैं एक हूँ अकेला और सभी संतों ने अलग अलग भाषाओं में यही बात।
- 14:21एक ओंकार एक ही परमात्मा है। इस्लाम ने भी एक इस सईद ने भी
- 14:37यही। कहा।
- 14:43मेरे से। ऊपर कोई परमात्मा, शक्ति या ईश्वर
- 14:52ध्यान रखना मैं क्या। बोल रहा हूँ लेकिन।
- 14:57आएगा अभी कर रहा। हूँ।
- 15:02अतीत से सबक लो। कृष्ण ने कहा मेरी शरण में आ जाओ,
- 15:08मैं भी कहता हूँ मेरी शरण में आ जाओ, बुध नहीं कह पाएंगे, मेरी
- 15:13शरण में आ जाओ। बुध कहेंगे आप दीपक भवा, अपने ही
- 15:17शरण में चला जाओ, अपने दीपक खुद बनो।
- 15:24दूसरों। की राह मत तक को खुद का मार्ग
- 15:31प्रकाश खुद करो अगर मैं कहता हूँ मेरी शर्म में आ जाओ।
- 15:43यह कृष्ण कहते हैं माँ वेलकम शरण और संग संग तुम्हें अगाह भी करता।
- 15:58हूँ। जीस जिसने भी।
- 15:59कहा कि मैं ब्रह्म हूँ। यह एक सत्य था।
- 16:05यह एक पूजा कराने का ढंग। ना?
- 16:12मंसूर ने कहा, अनलहक मैं खुद खुश हूँ।
- 16:17आपने उसकी पूजा करे। ईसा मसीह।
- 16:23ने कहा, मैं एक मात्र। पुत्र हूँ परमात्मा।
- 16:26का प्रिय पुत्र हूँ। आपने उसकी पूजा करनी शुरू कर दी।
- 16:29बोलने का ढंग है। और प्रत्यक्ष रूप से तो वो भी कह
- 16:34रहे हैं कि मैं ही हूँ। मुझसे बढ़कर मेरे से ऊपर मेरा
- 16:44नियंता मुझे आदेश देने वाला कोई दूसरा ईश्वर नहीं है।
- 16:51प्रकृति को आदेश। देने वाला तो मैं ईश्वर हूँ,
- 16:58लेकिन मुझे आदेश देने वाला कोई। मैं सर्वो पर ही, मैं नियंता हूँ
- 17:06मैं नियामक मैं सर्जन हार बोलने के दो धर्म है।
- 17:16नानक भी ऐसा बोलते हैं। पल्टु भी ऐसा होता।
- 17:23है। एक कहता है मैं ही मैं हूँ पल्टु
- 17:30कहते हैं, तू ही तू है। मतलब दोनों का एक है, तुम नहीं
- 17:35समझ सकोगे। क्योंकि बुद्धि बड़ी शुद्र।
- 17:39है। शुद्रता से ही सोचती है।
- 17:45शुद्रता से ही समझती है। शुद्र में विराट समा।
- 17:52नहीं हो सकता पल्टु। कहते हैं तू ही तू है।
- 17:57नानक कहते हैं। तो ही तू कृष्ण?
- 18:00कहते हैं मैं हूँ अन्य न्यास्युनतेन तो मम यह जनपरिवास्त
- 18:06है दीक्षाम नित्यभक्त नाम योग श्य मम।
- 18:17जो अनन्य भाव से मेरे क्षण में आ जाता है, मैं उसका सब भार भर लेता
- 18:25हूँ। मैं उसे निर्भार कर देता हूँ।
- 18:32और मैं उसकी सभी जरूरतों को पूरा करता हूँ योग।
- 18:36खेमा यही नहीं रुकते। हर कृष्ण कहते हैं इन सभी धर्मों
- 18:45का त्याग करते हैं क्योंकि यह मेन मेड है।
- 18:52मनुष्य के द्वारा। बनाए गए सभी धर्मों।
- 18:55का त्याग करता है। तुम मुझे एक ही।
- 19:00शरण में आ जाओ। मैं तुम्हारी जरूरतों तो पूरी
- 19:07करूँगा करूँगा। अगर तू मेरे ही शरण में आ गया तो
- 19:13मैं तुम्हारी जरूरत पूरी करूँगा। मैं तेरे सारे पापों को।
- 19:24भी हार दूंगा। सर्वधर्म परितज्य माँ में कम शरण
- 19:33परच अह। सर्व पापों पर मोक्ष श्याम माँ
- 19:39पूजा। तू मेरी क्षण में आजा तू सब
- 19:49पापों। से मुक्त हो जाएगा।
- 19:50मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा।
- 19:56मैं पर ज्योर है, पल्टू का तुम पर ज्योर है।
- 20:03लेकिन बात एक ही है। दोनों का ज़ोर एक।
- 20:07पर है। एक को अंक।
- 20:11देती हो या नाश्ते बस एक मैं हूँ, दूसरा कोई है?
- 20:24तुने पूछा घनश्याम 10। बुद्ध और आप।
- 20:31में का फर्क है बहुत नास्तिक है, मैं भी नास्तिक।
- 20:41हूँ। बुद्ध।
- 20:45नियंता को इंकार करते हैं। मैं नियंता को स्वीकार करता हूँ
- 20:52नहीं, मैं नहीं, नियंता बुद्ध कहते।
- 20:58हैं। नियम ही काफी।
- 20:59हैं। मैं कहता हूँ बिल्कुल काफी हैं।
- 21:02क्योंकि मेरी सृजना का कोई भी अधूरण सब परिपूर्ण यहाँ न पाप
- 21:12चलता है न। ठगी न ठोरी।
- 21:14कुछ नहीं चलता जैसा। करोगे बिलकुल वैसा भरोगे।
- 21:23बिलकुल ज़रा भी ज्यादा। नहीं ज़रा भी कम।
- 21:29नहीं बस ऐसा है। अलग अलग घरों में करो।
- 21:45अभी वैज्ञानिक कहते हैं कि मनुष्य की उम्र।
- 21:47बढ़ा दी जाएगी। कोई बात नहीं।
- 21:51तो फिर एक ही जामे में सारे भोग भोग लेगा घर बदलना नहीं पड़ेगा।
- 22:00भोग तो भोगले पड़ेंगे। कर्म तो पैरालल करने ही होंगे
- 22:12समानता? ये।
- 22:14बुद्ध कहते हैं कि। ईश्वर?
- 22:20कृष्ण भी कहते हैं ईश्वर। लेकिन बातों में बड़ा फर्क है।
- 22:31कृष्ण कहते हैं मेरे। सिवा कोई दूसरा परमात्मा।
- 22:34नहीं है मैं यही परमात्मा। बुद्ध नियमों को परमात्मा कहते
- 22:41हैं। लार्ज और सफीशियंट।
- 22:45मैं नियमों को पर्याप्त नहीं करता, मैं नियमों को मात्र संसार
- 22:51को चलाने के। एक संविधान की तरह।
- 22:57करता। विधान है।
- 23:01नियमों। को संसार को चलाने का विधान।
- 23:06ढंग उनको हम नियम। कहते हैं, लेकिन नियम काफी नहीं
- 23:12है। तुम सैभम मानते हो?
- 23:22बुद्ध सैभम मानते हैं, प्रकृति को मैं सैभम मानता हूँ शाम को।
- 23:37बुध परमात्मा को जानते नहीं इसलिए कहते हैं बस।
- 23:44लार्ज अरे सुफ्फिसिएंट मैं भी कहता हूँ।
- 23:47प्रकृति बिलकुल परिपूर्ण। बनाई मैंने ज़रा भी।
- 23:50तो कोर्ट ने। ज़रा भी तो कमी नहीं।
- 23:55पूर्ण में से पूर्ण निकलेगा तो अपूर्ण कैसे?
- 23:59निकलेगा पूर्ण से। पूर्ण ही तो आएगा तो पूर्ण से जो
- 24:08प्रकृति प्रकट हुई वो पूर्ण। है अपूर्ण नहीं है।
- 24:13इसलिए लार्ज और सुफ्फिसिएंट। बिल्कुल ठीक है, लेकिन एक ढंग से।
- 24:23जो बुद्ध कहते हैं। कि नियंता नहीं।
- 24:26है यहाँ पर फर्क पड़ जाता है यहाँ असमानता हो जाती है वहाँ तक
- 24:30समानता रहती है। जहाँ वो कहते हैं कि।
- 24:35ईश्वर नहीं है यहाँ आके असमानता आ जाती है, मैं भी कहता हूँ ईश्वर
- 24:43नहीं है, कृष्ण भी कहते हैं, ईश्वर नहीं है।
- 24:46शायद ये शब्द आप पहली बार सुन रहे हो यह।
- 24:51सुना होगा बहुत बार आपके। वर्धा में उतरा नियमों से परे मैं
- 25:05नियम को नियमों। से परे मैं नियम तो कृष्ण भी बोले
- 25:18कृष्ण। जब 5000 साल।
- 25:20पहले बोल रहे थे। तब कोई तो साक्ष्य सर अर्जुन
- 25:30साक्ष्य। आज मैं 56000 साल बाद बोल रहा।
- 25:37हूँ। तो तुम साक्ष्य हो।
- 25:48मैं ही परमाता तुम बाहर से मत। देखो एक।
- 26:03अदर के कपड़े वैजयंती माला नहीं है।
- 26:09मोरू मुकुट नहीं है सोने चांदी की।
- 26:14मुकुट नहीं हीरे द्वारा मोती मनिया गले में नहीं है।
- 26:22लेकिन यह तो मेरी। बनाई हुई सरजना है।
- 26:25मैंने दारण करूँ ना करूँ? किसको इतराज?
- 26:34किसी को। ऐतराज़ नहीं होना चाहिए।
- 26:39मेरी सृजना को मैं धारण करूँ या न?
- 26:43करूँ इस। पंचभौतिक शरीर के ऊपर यह और भार।
- 26:51मैं घराऊं या न घराऊं। यह मेरी इच्छा है।
- 27:00जितना आपकी समझ में आए उतना समझ लेना, बाकी छोड़ देना धीरे धीरे
- 27:09समय जाओगे। जैसे गीता रोज़ पढ़ते हो वैसे
- 27:13रोज़ मेरे। को सुनना।
- 27:19जो कवि कृष्ण बोले थे वहीं जदा जदा ही धर्मश्य।
- 27:27गलानेर भक्ति भारत अभ्युथनम अधर्वश्य तदात्म सज्जा मेंहम
- 27:34पृत्राणय साधु नाम। जो सत्य है।
- 27:40उसको बचाने के लिए आज सत्य दूषित हो गया।
- 27:47बिना शायद के दुष्क्रितान। जो तुमने मान्यताएँ घेर ली।
- 27:55हैं जड़ ली हैं। अपने मस्तिष्क में अपनी वृद्धि
- 28:03में उनका हनन करने के लिए वृत्र नय साधु न?
- 28:12वस्तु को बताने के लिए। वस्तु को बताने के लिए शक्ति को
- 28:23बचाने के। लिए विनाश से दुष्कृतम् यह जो
- 28:28मान्यताएँ तुमने गठरी उनका विनाश करने के लिए धर्म संस्था बना
- 28:36अर्थाई। तुम्हारे धर्म नहीं, इनको तो भूल
- 28:39जाओ। बस एक की।
- 28:47स्थापना करने हेतु एक मैं जो कण कण में स्वयं।
- 28:57उसकी स्थापना करने हेतु। संभवमी युग युग मैं युग।
- 29:02युग में प्रकट होता। हूँ आज।
- 29:06प्रगति कर रहा हूँ। क्या कभी कृष्ण करू?
- 29:11मैं प्रगट हुआ कभी परशुराम राम के रूप में प्रगट हुआ।
- 29:17कभी। आज इस देय के रूप में प्रकट हो यह
- 29:21रूप है, लेकिन इस रूप से पार। मैं।
- 29:25रूप हूँ। यह है साकार लेकिन इस साकार।
- 29:30से परे मैं निराकार। यह शगुन है, लेकिन इस शगुन से
- 29:42परे। मैं शगुन से गुणों से पार हूँ।
- 29:45गुणाहती तो निर्गुण। नहीं हूँ ये समझ लेना, यहाँ गलती
- 29:51मत खा जाना। मैं निरगुण नहीं हूँ गुणों से पर।
- 30:07यह सृष्टि मेरी बनाई। हुई है अपनी सृष्टि।
- 30:15में तरह तरह के रंग भर। के पशु पक्षी।
- 30:27फूल बूते ये मैंने बनाई भी। भिन्नता है।
- 30:41कहीं भी इस। रचना में तुम्हें एकता नहीं
- 30:45मिलेंगे। सब जगह भी भिन्नता।
- 30:48है। और विभिन्नता ही मेरे।
- 30:50होने का सोच है। भीतर से इस विभिन्नता को सूत्र
- 31:02में रोया हुआ मैं। विद्यमान हूँ।
- 31:07ये सारी सृजना को सूत्र में रोकर एकाकार दिया हुआ।
- 31:23मैंने सारी सृजना बनाई, पशु पक्षी, वनस्पति रोग बनाई, दवाईयां
- 31:34बनाई। देवी।
- 31:39देवता। ये सब मेरी क्रिश।
- 31:46और ध्यान रखना, मेरे सेवक कोई ऐसी देवी देवता।
- 31:55नहीं जो मेरे। पे हुक्म कर सके।
- 32:03सभी देवी देवता ऊर्जा करो और मैं चेतना और ऊर्जा कसमूँ देवी देवता
- 32:19ऊर्जा करो। ये अलग अलग रूपों में प्रकट होती
- 32:26है। इनकी शक्ति एनर्जी जैसे विद्युत
- 32:34विद्युत, पंखे। में जाके गोल गोल घूमते हैं।
- 32:40एयर कंडीशन। में जाके ठंडी हो जाती है, हीटर
- 32:44में विद्युत जाके। गर्म हो जाती है।
- 32:47और गीजर में विद्युत जाके। पानी को गर्म कर देते है।
- 32:54आइस फैक्टरी में विद्युत जाके बर्फ़।
- 32:57जमा देते है। विद्युत पानी को वाष्प में तब्दील
- 33:02कर देते। हैं ऐसे ही विद्युत।
- 33:13देवताओं के भीतर आकर मेरी सेवा करते हैं।
- 33:22ये मेरे मालिक है। सभी देव देवता है, मेरे बाल बच्चे
- 33:28हैं। मैं बहुत बार पहले ही बोल।
- 33:35मेरे ही बाल बच्चे हैं। मेरे ही सेवक मेरे।
- 33:48हुकुम में चलते हैं सब। चाँद, तारे, ग्रह, नक्षत्र मेरे
- 33:57ही हुकुम से सारा संसार चहक रहा। सारे गुलशन मदमस्त हैं मेरे ही।
- 34:10हुकुम से। मनुष्य ने आज।
- 34:21विकृत कर लिया सबकुछ। अपनी मान्यताओं को सत्य के योग पर
- 34:29थोप। कर विकृत कर।
- 34:30लिया। यह ठीक है ना?
- 34:41जैसे ही तुम एक को विकृत करके अनेक में ले जाओगे।
- 34:48तो झगड़े, द्वेष लड़ाई। ये सब प्रकट हो।
- 34:56गए और हो रहा। है।
- 35:07आकाश प्रकार सभी जगह जरे जरे में मेरा ही वजूद है।
- 35:18सभी। प्राणियों में जड़ में।
- 35:20और चेतन में। मैं ही।
- 35:32मेरे सिवा कोई दुजा नहीं है। सभी मान्यताओं को।
- 35:42तोड़ते हैं। यही कृष्ण?
- 35:47कहते हैं, सर्वधर्माण प्रत्यक्ष जो मान्यता है तुमने मान।
- 35:55उनको तोड़ दे माँ एकम शरण सत्य। की शरण में आजा।
- 36:02मान्यताओं को तोड़कर जो। है।
- 36:08उसकी शरण में आजा। और मान्यताओं के टूटने पर दुखी।
- 36:16ना? क्योंकि मान्यताएँ एक कोरी।
- 36:22कल्पना होती है। मान्यताओं का वजूद नहीं।
- 36:26होता सपनों का कहीं वजूद। होता है।
- 36:35सभी। धर्मों का प्रत्याग कर।
- 36:37दे धर्मों। के बिना भी तुम जीवित रह सकते हो
- 36:47ज़रा सोचो। जन्म लेता है, बच्चा।
- 36:57धर्म साथ नहीं लेके आता धर्म तुम थपते हो धर्म तुम्हारी बनाई हुई।
- 37:05चीज़। धर्म तुम्हारी मान्यता और
- 37:12तुम्हारी मान्यता गलत। है।
- 37:16इसलिए मैं तुमसे। कहता हूँ मान्यताओं को छोड़ दे।
- 37:22एक। ही शरण में आज।
- 37:26जिसके बारे में तू मान्यता। करता है वो मैं।
- 37:35लेकिन मिलूंगा तुम्हारी मान्यताओं के टूट जाने के बाद तुम्हारी
- 37:43मान्यताओं के रहते रहते ना मिलूंगा।
- 37:51जीस वक्त तुम्हारी मान्यता टूट गयी, तुम पाओगे सब जगह में।
- 37:59और तुमने अनेकों अनेकों मान्यताएँ थोक रखी।
- 38:08हैं। इन मान्यताओं को तोड़ दो उखाड़।
- 38:11फेंको और तुम पाओगे। तुम भी वही हो, जो प्रश्न तुम भी
- 38:22वही हो जो मैं हूँ, वहीं जाकर ऋषि कहता है अहम ब्रह्मस्म मैं ही
- 38:30परमा वहीं। जाकर तुम भी कह।
- 38:34पाओगे? मैं ही परमात्मा।
- 38:39वह जो भी चला। गया।
- 38:42वह कहेगा मैं ही परमात्मा एक गलती मत खा जाना।
- 38:50कृष्ण ने बिल्कुल सत्य। सत्य कहा तुमने।
- 38:54कृष्ण की पूजा करनी शुरू मैंने। बिलकुल सत्य सत्य कहा।
- 39:06तो मेरी। पूजा करनी शुरू कर देना मैं पूजा।
- 39:09करने के कारण से। यह बात नहीं।
- 39:12बता रहा हूँ मैं सत्य संभाषण कर। इसलिए।
- 39:18नहीं कि तुम मुझे पूछना शुरू करता हो।
- 39:21इसीलिए। कि तुम अपने आप को जानना शुरू
- 39:24करता हो क्योंकि मैं तुम्हें कहता हूँ जो कृष्ण है वो ही मैं और वो
- 39:34ही तुम। जैसे कृष्ण ने अपने।
- 39:38भितर जा के पाया वैसे ही मैंने अपने भितर जा के पाया।
- 39:43और वैसे। ही तुम अपने भितर जा के पालो।
- 39:51कोई भी तोडच नहीं है। क्यों मान्यताओं को थपे?
- 39:57बैठे हो? जब दर्शन।
- 40:00उपलब्ध हैं तो मान्यताओं। को क्यों थोपे?
- 40:04भरते हो हटाओ मान्यताओं को। इन झरनों के ऊपर।
- 40:13पड़ी हुई मान्यताओं के पत्थर को एक तरफ रख दो।
- 40:20और तुम पाओगे झरना झर झर करके बाहर निकल आया तुम आनंद हो मैं भी
- 40:36आनंद हूँ कृष्ण भी आनंद हैं बुध भी आनंद।
- 40:47लेकिन तुमने ये जो मान्यताएँ हैं, अपने हीरे के ऊपर कीचड़ के रूप।
- 40:52में ढक ली यह। दुर्गंत फैलाती है और फिर तुम
- 41:01कहते हो कि दुर्गंत कहाँ से आ रही है।
- 41:04मैं दुर्गंध हूँ, तुम कहते। हो नहीं दुर्गंध नहीं तुम परम
- 41:09सुगंध हो, सुगंध पृष्ठ वर्धन ध्यान से सुनो।
- 41:26मान्यताओं को इतना न खींचो। कि मान्यताएँ टूट जाएं।
- 41:36आज ऐसा ही। कालखंड आ गया है।
- 41:40तुमने एनर्जी के रूप। में बना लिए हैं।
- 41:44तुमने शक्ति के रूप में बना लिए हैं शक्ति का कोई रूप थोड़ी होता
- 41:51है। विद्युत का क्या होता है?
- 41:56विद्युत पंखे में जाएगी तो घूमेगी रेफ्रीजिरेटर में जाएगी।
- 42:03तो ठंड करेगी। हीटर में जाएगी।
- 42:07बिलकुल वही विद्युत। गरमाई स्पेक गीजर में जाएगी गरमाई
- 42:17स्पेक विद्युत एक है इसको आकार मत देना।
- 42:29इसके कारण आकार काम करते हैं। देवताओं की पूजा न करना ये
- 42:38विष्णु, ये ब्रह्मा या महेश ये तुम्हारे 33,00,00,000 देवता
- 42:45तुम्हारी। सेवा कर लिया।
- 42:48पूजा के लिए पूजा। के लिए तो सिर्फ।
- 42:54एक में एक में मात्र में मेरे अतिरिक्त।
- 43:04कोई पूजा के योग्य। है।
- 43:12देवी देवता तुम्हारे भी। सेवक हैं अगर इनकी पूजा करके
- 43:22तुमने ये मान्यताएँ गढ़। ली तो तुम गुलाम बन गए।
- 43:28यह तुम्हारी सेवा के लिए बनाई, मैंने बनाई यह तुम्हारे।
- 43:37सेवक हैं, इनसे काम लो जैसे तुम विद्युत से काम।
- 43:41लेते हो पंखे की जरूरत तो पंखे का बटन ऑन कर देते हो।
- 43:47एसी की जरूरत तो एसी का रिमोट। गीजर की तो गीजर का, रेफ्रीजिरेटर
- 44:03का तो रेफ्रीजिरेटर का बटन ऑन कर देते है।
- 44:06इससे काम लेना है। देवी देवता तो हमारे सेवक सेवका
- 44:11ही है ये तुम्हारे मालिक में। इनकी पूजा को त्याग दो।
- 44:26कोई भी देवी देवता पूजा। करने की यज्ञ मेरे सिवा और मैं जो
- 44:34हूँ वो तुम भी हो। जो वक्त तुम पूजा में व्यर्थ कर
- 44:43रहे हो वो। वक्त आत्म अन्वेषण में लगा दो।
- 44:56परिणाम यही आएगा। जो मैं बोल रहा हूँ।
- 45:01जो वक्त इन पूजाओं में तुम। लगाते हो वह वक्त आत्म अनुसंधान
- 45:08में लगा तुम पाओगे। परिणाम वही आया जो मैं बोल रहा
- 45:19हूँ तुम पाओगे हम ब्रह्मास्त्र। दूसरा कोई पूजा करने योग्य है कि
- 45:28नहीं किसकी पूजा करोगे? तुम सेवकों की पूजा करने लगे हो
- 45:40बनाए गए थे ये तुम्हारी सेवा करने के लिए जैसे विद्युत तुम्हारी
- 45:47सेवा। करने के लिए बनी।
- 45:50इससे सेवा का काम लो। हवा चाहिए, पंखा चलाओ, ठंडी हवा
- 45:56चाहिए एसी चलाओ, गर्म हवा चाहिए हीटर चलाओ, चीज़ को सुरक्षित रखना
- 46:02है, रेफ्रीजिरेटर में रखो, पानी गर्म।
- 46:05चाहिए गीजर में रखो। इससे सेवा का काम लो इसकी।
- 46:13पूजा ना करो। विद्युत पूजा के लिए नहीं और सभी।
- 46:18देवताएं ऊर्जा का स्वरुप। है।
- 46:22वह विष्णु, वह महेश। यह तुम्हारी सेवक है।
- 46:31यही गलती? खा गया मानव जब तुम अपनी।
- 46:39बड़ाई को भूल कर अपनी। असीमता को अपनी व्याराथता को।
- 46:44विशालता को भूल कर। खंडित हो गए।
- 46:51अपने स्वरूप को भूल गए। तभी तुम दुखी हो।
- 46:58गए कैसा? लगेगा अगर तुम इस।
- 47:08हवा देते हुए पंखे की पूजा करना शुरू कर दिया।
- 47:13कैसा लगेगा? ठंडी हवा देने वाले।
- 47:16इस एसी की सूड़ सूप चार पूजा करनी शुरू कर दी।
- 47:28नहीं पागलपन मेरे अतिरिक्त। कोई पूजा करने के।
- 47:37योग्य ही नहीं है। तुम जो वक्त।
- 47:44जिनकी पूजा नहीं करनी चाहिए उनकी पूजा करने में तुम।
- 47:50व्यर्थ हो, समय को खराब कर। रहे हो?
- 47:58भला विद्युत पूजा करने के लिए होती है।
- 48:04लक्ष्मी भोगने के लिए होती है। लक्ष्मी पूजा करने के लिए थोड़ी।
- 48:10यह सारा संसार। भोगने के लिए है।
- 48:14इस। सारे संसार और संसार।
- 48:16की उर्जाएँ? जिन्हें तुम देवी देवता कहते हो
- 48:20यह भोगने के लिए है ना की पूजा करने के लिए।
- 48:28पूजा में जो वक्त। तुम खराब करते हो, वह वक्त आत्म
- 48:34अनुसंधान में गुजारते हो, आराम से बैठ जाओ।
- 48:41चुप हो के बैठ जाओ। अपने अंत में उतर जाओ पर मौन।
- 48:47के उस केंद्र को छू लोगे। जहाँ तुम पाओगे अहम ब्रह्मस्व मैं
- 48:54ही। व्यर्थ के क्रियाकलापों।
- 49:03को छूट दो कोई। देवी देवता तुम्हें नहीं कहता
- 49:11मेरी पूजा करो। किसी देवी देवता ने?
- 49:15किसी को। भी आज तक नहीं कहा कि मेरी पूजा
- 49:18करो। मैं तुमसे कहता हूँ।
- 49:24ये देवी देवता, मेरे बाल। बच्चे हैं, तुम्हारे भी बाल बच्चे
- 49:28हैं तुम इनकी। शोर्ट शोर्ट प्यार पूजा करने का
- 49:34कष्ट। न करो।
- 49:36तुम भोगने के लिए हो। अपनी ही सृजना को।
- 49:41भोगो पूजा न करो और सही सही पुजारी वो होता है जो पूजा नहीं
- 49:53करता। पुजारी का सही।
- 49:55शब्दी का अर्थ देखोगे? तो पूजा अरि जो पूजा का दुश्मन।
- 49:59है। तुम पुजारी को पूजते हो, लेकिन
- 50:04पुजारी का अर्थ नहीं समझा पुजारी जाने पूजा का अरि है जो अरि
- 50:11दुश्मन। अरि हंत दुश्मनों को मारने वाला।
- 50:23वक्त जितना खराब करते हो। व्यर्थ की बातों में बना ये
- 50:30सार्थक बातें हैं। तुम्हें लगता है के इसी की पूजा
- 50:36होनी चाहिए तुम्हें लगता है रेफ्रिजरेटर?
- 50:41ओवन की पूजा होनी चाहिए। हीटर, गैजर की पूजा होनी।
- 50:45चाहिए पंखे। की पूजा होनी चाहिए।
- 50:48तुम्हें लगता है और यह पागलपन तुमने कभी किया?
- 50:53फिर देवी देवताओं को। क्यों पूछते हो यह सेवा के लिए है
- 50:57तुम्हारे? मैंने इन्हें तुम्हारी।
- 51:02सेवा के लिए उत्पन्न। किया है।
- 51:07ध्यान रखो जैसे तुम चलके कहीं जाते हो, चलते तुम्हारे पांव तुम।
- 51:21चलके कहीं जाते हो? पांव ने तुम्हारी वहाँ जाने के
- 51:25लिए सेवा की। क्या तुम पांव को पूजना शुरू कर
- 51:30दो? तुम हाथों से कोई चीज़ उठाते हो
- 51:39हाथों ने चीज़ उठाने में तुम्हारी।
- 51:43सेवा की तो क्या तुम हाथों की पूजा करना शुरू?
- 51:50तुम्हारे मस्तिष्क में कोई बात आती है।
- 51:54तुम कुछ कला विद्या में निशृणात और निपुण हो जाते हो।
- 52:00क्या तुम अपनी बुद्धि की पूजा करते हो?
- 52:07तुम बोलने में प्रवीण। हो दक्ष क्या तुम अपनी जीवा और
- 52:13कंठ की पूजा? करते हो?
- 52:15यह है सेवा के लिए इनसे। काम।
- 52:20लो। इनसे सेवा।
- 52:21करवाओ तुम मालिक हो। लेकिन बदनसीबी।
- 52:25ये है कि तुमने आज सेवकों को मालिक बना लिया इंद्रिया तुम्हारी
- 52:33सेवक हैं गुलाम और देख लो। तुम हुकुम करते हो तो ये चलते
- 52:39हैं। इंद्रिया तुम्हारी सेवक है, लेकिन
- 52:46आज। तुम्हारी मालिक बनी बैठी है।
- 52:51तुम्हारी। ही गलती के कारण।
- 53:00आज तुम्हारा मन जो तुम्हारी। सेवा करने के लिए।
- 53:05बना था आज तुमने? उसका आधिपति स्वीकार कर लिया है।
- 53:13आज तुम। अपने मन के गुलाम।
- 53:15हो गया। बनाया था मैंने तुम्हारी।
- 53:19सेवा करने के लिए बन गए तुम सेवक। खुद नहीं मन तुम्हारा।
- 53:35सेवक है। मन को आज्ञा दो और मन इन्द्रियों
- 53:40का मलक। उसे ही इन्द्र?
- 53:43कहते हैं जो इन्द्रियों। का मालक हो, इन्द्रियों का मलक मन
- 53:50मन। इन्द्रियों का राजा है।
- 53:55लेकिन तुम मन के गुलाम हो गए इसलिए तुम आज इन्द्रियों के भी
- 54:00गुलाम इन्द्रियों के गुलाम होते हो।
- 54:06तुम रसीली चीजें खाना शुरू कर। दिया।
- 54:12तुमने ऐसे दृश्य देखकर तुम उनके गुलाम।
- 54:15हो गए तुमने सुन्दर संगीत सुनकर तुम उनके गुलाम हो गए।
- 54:23तुम भोगों के गुलाम। हो गए तुमने?
- 54:26स्वादिष्ट पदार्थ खाये तुम। स्वाद के गुलाम हो गए।
- 54:35ये तुम्हारे सेवक है। बताने के लिए है जीवा ये कड़वा।
- 54:40है। ये मीठा है, ये खट्टा है ये
- 54:46तुम्हारी सेवा। करने के लिए बनाई।
- 54:49गई तुम्हारी गलती ये। कि तुमने इन्हें मालिक बना लिया
- 54:58और जब भी तुम गलती में होते हो, तुम दंडित होते हो और दंड क्या
- 55:04होता है? दुख आज अगर सारा संसार दुखी।
- 55:11उसका मात्र कारण यह है। कि वह गलती पर है।
- 55:16गलती क्या है? जिससे सेवा लेनी चाहिए उसकी सेवा
- 55:24करने में व्यर्थ। वक्त गवाने ना।
- 55:32जिससे सेवा तुम्हें लेनी। चाहिए आज तुम।
- 55:36विद्युत से सेवा ले रहे हो लेकिन विद्युत रूपी देवी।
- 55:43देवगम की। पूजा कर रहे हो?
- 55:46वह सेवा के लिए बनाए गए। तुम उनकी पूजा क्यों?
- 55:50कर रहे हो? नहीं।
- 55:55इन पूजाओं को छोड़ दो। इंद्रिया तुम्हारी सेवा के लिए
- 56:02है। जहाँ जाना है वहाँ हुकम करो,
- 56:04तुम्हें पूजा देंगे। हाथ पांव तुम्हारी सेवा।
- 56:09करिए जीवा तुम्हारी सेवा करिए, आँखें तुम्हारी सेवा करण तुम्हारी
- 56:15सेवा करिये, चमड़ी तुम्हारी सेवा करिये, लेकिन आज तुम इनके गुलाम
- 56:20होगे। तुम सेवकों के भी।
- 56:25सेवक हो गए हो। इसलिए दुखी हो अपनी मलकियत को
- 56:32पहचान, अपने अस्तित्व को जान ये तुम्हारी सेवक है।
- 56:45इनको सेवक ही रहने दो इनके सेवक मत बनो इंद्रियों के भोगों के
- 56:51गुलाम न बनो इन्द्रियां तुम्हारी सेवा करने के लिए इनसे।
- 56:57काम करो, इनके गुलामी न करो, तुम तो इंद्रियों के गुलाम हो गए।
- 57:06खाने के तुम गुलाम। सुनने के तुम गुलाम।
- 57:12देखने के तुम कलाम स्वादिष्ट कल्पना करने के तुम गुलाम, अच्छे
- 57:20अच्छे। दृश्यों की कल्पना करते हो?
- 57:25भोगेंद्री हो के तुम गला बने थे तुम्हारी सेवा करी काम तुमने
- 57:34उल्टा शुरू कर दिया। तुम सेवकों को सेवकाई में ही रहने
- 57:42दो, मैंने इन्हें तुम्हारी सेवा के लिए ही उपजाया है।
- 57:53जैसे आज विद्युत से अपनी सेवा करा रहे।
- 57:56हों। वैसे ही इन देवी देवताओं से अपनी।
- 58:00सेवा करो विष्णु सेवक। हैं।
- 58:03तुम्हारे ब्रह्मा सेवक हैं, तुम्हारे महेश सेवक हैं तुम्हारे
- 58:16तुम। दुखी क्यों हो?
- 58:18क्योंकि तुम इनके सेवक बन करो तुम्हें इनकी।
- 58:24पूजा नहीं करनी चाहिए तुम्हें इनका मालिक बनना।
- 58:29चाहिए इनको हकुम करो। जैसे तुम पंखे को हुकुम करते हो?
- 58:36यहाँ से रिमोट दबा देते हो आज 2 दिन चले गए जब आदिमानव आसमान।
- 58:47में बिजली कड़कती थी और डर। चाहता था के इंद्रप्रोपित हो गए
- 58:52आज। वो वक्त चले गए।
- 58:55आज। धरती से संदेश भेजे।
- 58:57जाते हैं। रैकेट्स को यानों को और उनकी दिशा
- 59:02को मोड़ दिया जाता है। इनसे काम लिया जाता है, इनसे सेवा
- 59:10ली जाती है, इनकी सेवा की नहीं होती।
- 59:14आज वो वक्त आ गया है। तुम्हें बुद्धि भी है।
- 59:20सोचने के लिए तुम इस बुद्धि से काम ना हो, अपना समय व्यर्थ न
- 59:31करो, इनकी पूजा करो। वरन उस वक्त को।
- 59:37आत्म अनुसंधान में गुजार दे बेहतर।
- 59:42होगा अगर तुम आत्म। अनुसंधान नहीं कर सकते।
- 59:46तो प्रकृति का अनुसंधान। कर लो।
- 59:52जैसे आज तुम्हारी सेवा के लिए ये पंखा, ये एयर कंडीशन, ये बल्ब रात
- 1:00:01को भी तुम्हें रोशनाई देता है। हर चीज़ आज प्रकृति तुम्हारी सेवा
- 1:00:09में उपस्थित है बनी रीती से। तुमने सही काम देना शुरू कर दिया
- 1:00:14प्रकृति से। लेकिन चुक गया देवी देवता की सेवा
- 1:00:22के लिए ही मैंने तुम्हारी बनाई थी तुम यहाँ क्यों लेज गए?
- 1:00:30क्या हुआ? तुम क्यों गुलाम हो गए, किसने
- 1:00:37गुलाम बना दिया उनको पहचान जिसने तुम्हें?
- 1:00:47ऐसी मनोवृत्तियाँ देकर गुलाम बना। दिया।
- 1:00:51ये तुम्हारे गुलाम है, तुम इनके गुलाम नहीं हो, ये तुम्हारी सेवा
- 1:00:56के लिए है। तुम इनकी सेवा के लिए नहीं ध्यान
- 1:01:02रखो, भक्त बड़ा। इस वक्त को देवी देवताओं की पूजा
- 1:01:15में व्यर्थ ना करो। पर इसका कोई अर्थ?
- 1:01:18भी नहीं होगा। देखिए एयर कंडीशन तुम्हारी सेवा
- 1:01:23करा। सर्वस्व प्रवक्ता मत्यह पर्वत मैं
- 1:01:39ही सर्वज्ञ का आदिकरण मैं ही मध्य हूँ मैं ही।
- 1:01:50मैं ही। इनका कारण हूँ मध्य भी में ही
- 1:01:56हूँ, अंत भी में ही मेरे सिवाय। कोई दूसरा परमात्मा है, ऐसा जाना
- 1:02:15तो तुम समय। को व्यर्थ मत करो।
- 1:02:24के मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च इनमें।
- 1:02:33जो तुम करते हो? उस समय व्यर्थ करते हो?
- 1:02:39घर ही तुम्हारा मंदिर। वहाँ।
- 1:02:43बैठकर अपने ही भीतर। जाकर सर्व आपका कल्याण।
- 1:02:47करो, वहीं। से रास्ता निकलेगा।
- 1:02:53सर्व में समय जाने का 12 घंटे घड़ियाँ धड़काने में मत रहो।
- 1:03:02यह तुम्हारा समय की बर्बादी के अलावा और कुछ भी नहीं यह भी ध्यान
- 1:03:13रहे सेवक को मालिक न बनाएं ये इंद्रिया ये मन यह तुम्हारी सेवा
- 1:03:20के लिए तुम्हें दिया गया। आज तुम इनपे गुलाम हो गए।
- 1:03:33तुम फिर से इसके? स्वामी हो जाओ, ये तुम्हारी सेवा।
- 1:03:41करने के लिए ही तुम्हें। प्रदान किए गए और।
- 1:03:45इनका जो काम है। सेवा करलो, सेवा लोन्स।
- 1:03:51ये सारा संसार तुम्हारी सेवा में समर्पित है मेरी सारी सजना का कण
- 1:03:57कण तुम्हारे लिए है। तुम्हारे लिए है सारा कण कण
- 1:04:07तुम्हारे लिए है। पूजा करने के लिए नहीं।
- 1:04:10भोगने के लिए पदार्थ। खाने के लिए पदार्थों की पूजा
- 1:04:20करनी शुरू। तुम कर दोगे तो मूर्ख ही कहलाओ।
- 1:04:26जैसे पदार्थों का तुम। वैसे ही देवी देवताओं।
- 1:04:32का भक्षण करो। यह सेवकाई में इन्हें रहने।
- 1:04:40दो, इन्हें हुक्म करो। इनकी शरण में मत जाओ।
- 1:04:45शरण में आनी है तो मेरे आ जाओ, यही गलती तुम खा रहे हो इसलिए तुम
- 1:04:53दुख। संभवामी युगे युगे युग में मैं
- 1:05:01फिर फिर से जन्म लेता हूँ तुमको राह के ऊपर पड़े हुए लोगों को सही
- 1:05:07राह पे डालेंगे। प्रणाम ही करना है तुम मुझे कर।
- 1:05:19लो। एक मात्र मैं ही प्रणाम करने के
- 1:05:24योग? अपने भीतर उतरो, पूजा में, आरती
- 1:05:39में, व्रत में, उपवास में, इन कहानियों में गाथाओं में, कथाओं
- 1:05:47में। वक्त खराब न हो।
- 1:05:52वक्त की बर्बादी है। वक्त को बर्बाद न करो, आबाद करो
- 1:06:04वक्त से काम आत्मा। अन्वेषण।
- 1:06:09में चले जाओ, एकांत में बैठो। और एकांत के गहरे में उतर जाओ
- 1:06:17जहाँ मौन परमौन मैं विद्यमान और तुम मेरा स्पर्श पा के निहाल हो
- 1:06:24जाओगे। तुम मेरा स्पर्श।
- 1:06:28पा के आनंदित हो जाओगे। खुमारी में डूब जाओगे?
- 1:06:32रस बहोर हो जाओगे। नाचने लग जाओगे।
- 1:06:38क्या वो इन व्यर्थ की पूजाओं को सच्चे बनो?
- 1:06:51मान्यताओं के अधीन ना? हो?
- 1:06:57सत्य के अधीन सत्य को स्वीकार करो सत्य को।
- 1:07:01खोजो आत्म अनुसंधान करो आत्मदर्शन करो और तुम पाओगे।
- 1:07:13वही जो मैं कह रहा हूँ वही तुम पाओगे, कृष्ण ने भी यही पाया,
- 1:07:22मैंने भी यही पाया तुम भी यही पाओगे।
- 1:07:27जैसे ये इंद्रियाँ तुम्हारी सेवा की यह प्रकृति तुम्हारी सेवा के
- 1:07:31लिए। ये देवी।
- 1:07:33देवता भी तुम्हारे। ये ऊर्जा, इनकी पूजा।
- 1:07:37करके समय बर्बाद न करो। ये कोई तुम्हें आशीर्वाद नहीं दे
- 1:07:45सकते। ये सेवक सेवक कभी आशीर्वाद दे
- 1:07:48पाता है। सेवक सेवा के योग्य होता है।
- 1:07:52और सेवक का काम भी सेवा ही करना। होता है जैसे प्रकृति से काम लेते
- 1:08:01हो। सेवा का देवता।
- 1:08:03भी तो प्रकृति का रूप है। ये तुम्हारी सेवा के लिए ही
- 1:08:08उत्पन्न किया गया है। इनकी पूजा करने में समय।
- 1:08:12खराब है अपने भीतर उत्तर पुस्तकों को।
- 1:08:25पढ़ने में समय। बर्बाद न करो तुमसे।
- 1:08:28बड़ी पुस्तक। ग्रंथ कुछ है ही नहीं।
- 1:08:33अंत तुम पुस्तक तुम हो जो तुम पढ़ सकते।
- 1:08:38हो तुम्हारे से बड़ा ग्रंथ कोई है तुम्हारे से बड़ी।
- 1:08:43पुस्तक कोई है तुम पुस्तकों से। कुछ न सीखो।
- 1:08:48तुम पुस्तकों से कुछ न पूछो। अपने भीतर चले जाओ।
- 1:08:54पूछने के बजाय तुम देखो। यही आशीष है।
- 1:09:02तुम्हें यही कथन है मेरा तुम्हें। मेरे शरण में आ जाओ, मैं तुम्हारे
- 1:09:13भीतर ही बैठा मिलूंगा डूब जाओ उस आनंद के रस में और फिर तुम पाओगे।
- 1:09:25सारी प्रकृति। तुम्हारे भोगने के लिए।
- 1:09:34तुम प्रकृति के गुलाम हो गए वाज वास्तव में तुम मालिक हो।
- 1:09:40अपनी मलकीत को फिर से कायम कर लो इंद्रियों के गुलाम मत बनो,
- 1:09:47इंद्रिया तुम्हारी गुलामी इनसे काम।
- 1:09:51मन तो मैं गुलाम। इसको गुलाम की तरह ही व्यवहार
- 1:09:57करो। इसको हक्म मत बनाओ, इसको हुक्म
- 1:10:04दो। यही मैंने तुमसे कहना।
- 1:10:13था आज। तुम गलत दिशा।
- 1:10:18पे निकल। गए।
- 1:10:23मेरे पास यही माध्यम था तुम्हें बताने का।
- 1:10:28पर मैंने इसी माध्यम के जरिये से तुम्हें बता दिया, भोगों में
- 1:10:32संलिप्त होकर। भोगों के अधीन ना हो भोग तुम्हारे
- 1:10:44मालिक ना। बन जाए इस बात का ध्यान रखें।
- 1:10:47क्योंकि जब भोग। तुम्हारे मालिक बन जाएंगे।
- 1:10:51उपभोग करने वाली इन्द्रियों के तुम गुलाम में जाओ।
- 1:10:56जबकि इन्द्रियां तुम्हारी सेवा करने।
- 1:10:58के लिए है सारी सृजना सारी सृष्टि का कणकण तुम्हारी सेवा के लिए
- 1:11:05प्रस्तुत है। हर वक्त हाजिर है।
- 1:11:10कुछ ऐसा न करो। जिससे तुम्हारे आत्मा अनुसंधान
- 1:11:16में बाधा बने तुम्हारे से उच्च खुश विभक्त।
- 1:11:22करने की प्रथा को। समाप्त कर दो।
- 1:11:29भेद बुद्धि को त्याग। दो न कोई श्रेष्ठ है, न कोई
- 1:11:33नक्कर्ष्ठ। है सब बराबर हैं सब।
- 1:11:37एक हैं और वो ही हैं जो एक है, वो सर्वज्ञ है, कोई श्रेष्ठ नहीं,
- 1:11:46कोई नक्कर्ष्ठ नहीं। सेवक को सेवा करने दो, मालिक को
- 1:11:55मल्कियत करने दो। तुम इस मंच से पार।
- 1:12:03हो उन मुनी। अवस्था में चले जाओ।
- 1:12:06जहाँ विचार न हो, जहाँ वास न ही न हो।
- 1:12:10जहाँ। विषय न हो जहाँ विकार न।
- 1:12:13हो और तुम सबसे। ऊपर हो।
- 1:12:21उन मुनि अवस्था मन से ऊपर उठ जाऊं।
- 1:12:29तुम मन के अधीन हो आज छोड़ो। इस प्रथा को ये एक मान्यता है।
- 1:12:44तुम सत्य। में आ जाओ, सत्य में तुम पाओगे,
- 1:12:46तुम मानो सारी सृजना तुम्हारी सेवकाई के लिए।
- 1:12:53तुमने इन्हें मालिक बना दिया है। गलत सबक सिखाने वालों को तुम मानो
- 1:13:02मत, उससे ही मानो जो तुम्हें सत्य का मार्ग दिख है।
- 1:13:10और फिर आपसे मैं बता दूँ। तुमने एक गलती पहले।
- 1:13:14कर ली जिसने कहा मैं ही हूँ। परमात्मा तुमने उसकी।
- 1:13:19पूजा शुरू कर दी। आज मैं कहता हूँ मैं ही हूँ
- 1:13:22परमात्मा मेरी पूजा मत शुरू कर देना, मैं इसलिए बोला हूँ।
- 1:13:28कि तुम अपने भीतर जाके आत्म अनुसंधान करो और जानो तुम ही
- 1:13:34परमात्मा, तुम खुद खुदा। हो?
- 1:13:42तुम ही हो ओमनी पोटेंट ओमनी शिएंट ओमनी प्रेसिडेंट।
- 1:13:47तुम्हारे सिवा और कुछ नहीं, तुम्हारे सिवा कोई मालिक नहीं, एक
- 1:13:54ही मालिक? है और तुम धन्यवाद।