Latest / Baba ji Vijay Vats / 29 Nov 24 - श्रीकृष्ण की गीता: रहस्य जो आज तक अनसुलझे हैं! गीता के अनदेखे पहलू!
Transcript
- 0:05अभिनंदन पांडे आप कहते हैं बाबा जी शराब को पी के देख लेना चाहिए।
- 0:23उसका स्वाद कैसा है? नहीं जाने शराब को नहीं पिए
- 0:33होंगे। तो शराब के भीतर ही तुम्हें वो
- 0:38मिल जाए जैसे ढूंढ रहे हो। मन अटका रह जाता है।
- 0:46कहीं ऐसा तो नहीं हर कदम पे उन्हें मुड़ के देखा।
- 0:55उनकी महफिल से हम उठ तो आए, शराब नहीं पी कौन जाने ये बात अटकी रह
- 1:03जाए कि शराब में ही होता शायद पी के देख लेते।
- 1:12अपने शब्दों की प्रामाणिकता के लिए भगवान कृष्ण का कोई श्लोक,
- 1:21क्योंकि मैं गीता को बहुत मानता हूँ, मेरे सिर के ऊपर गीता ही
- 1:29झड़ी रहती है। गीता को मैं प्रमाणु रूप में देता
- 1:35हूँ तो क्या कोई स्लोक है? ऐसा बता पाओगे?
- 1:39जिसमें भगवान कृष्ण ने कहा कि शराब का सेवन करके देख लेना
- 1:45चाहिए। हाँ कहा है।
- 1:54तुम गीता के बड़े पुजारी लगते हो, लेकिन लगते नहीं तुम गीता के
- 2:01पुजारी, क्योंकि जिसने ये शब्द नहीं पढ़ा कि भगवान कृष्ण कहते
- 2:08हैं, शराब पियो और भगवान कृष्ण के।
- 2:11सारी औलादें और भगवान कृष्ण खुद राजा थे।
- 2:20उनके बच्चे सांप, प्रद्युम्न सब शराब पीते थे।
- 2:23शराब पी के ही तो झगड़ा करने लगा। मर गया बस और राजा लोग अक्सर पीते
- 2:30हैं। फिर भी तुम किताबों की लिखी मानते
- 2:41हो तो श्लोक लीजिए भगवान कृष्ण की गीता का।
- 2:49है श्लोक बीसवा है क्या कहते हैं भगवान कृष्ण?
- 2:59वो ये नहीं कहते हैं कि एक बार पी के देख लेना चाहिए, वो तो कहते
- 3:03हैं कि पीते ही रहना चाहिए हाँ। और उससे शराब की बात नहीं करते
- 3:11हैं। वो जिससे शराब में खुद डूबे हुए
- 3:13हैं, वह तो शोक के लिए कभी कभी राजा हैं।
- 3:19फार्धि शेख ऑफ सोसाइटी पीनी पड़ जाती है।
- 3:26सब कुछ करते हैं आकर्षण। कुछ नहीं छोड़ते या बुरा कृष्ण को
- 3:33तुम ये न कह पाओगे कृष्ण ये भोगा नहीं सब और कृष्ण तुम्हे क्यों
- 3:41रोकेंगे, जो खुद भोगते हैं तुम्हे क्या रोकेंगे?
- 3:48तुम्हें रोकेंगे कायर पखंडी लालिच लोभी जिनका खुद का स्वार्थ है
- 3:54तुम्हें रोकने में विस्मश्लोक नवमी अध्याय का।
- 4:08त्रय विद्या। तीन वेदों में जो विद्याएँ हैं
- 4:14त्रय विद्या माम सोमपा शराब को पीने वाला व्यक्ति।
- 4:23त्रय विद्या माम सोमपा। पूत पापा यज्ञ रिस्टवा सरगन्ती
- 4:32प्रथ्यनते यह पुण्य वसाध्य सुरेंद्र लोक सुरेंद्र रोग।
- 4:48मुसननती देवयानंद देवबुगाण भगवान कृष्ण कहते हैं सर लास्ट कर दो की
- 4:58जो व्यक्ति जो मनुष्य। तीनों वेदों में कहीं हुए सैकाम
- 5:08अनुष्ठान को करने वाला ध्यान रखना।
- 5:12भगवान कृष्ण के दो शब्द बड़े प्यारे हैं सै काम और निष्काम
- 5:20सरलाथ में मैंने बता दिया कि सै काम।
- 5:23जिससे तुम कहते हो कि मैं करता हूँ उसका पुण्य, फर सुख भी तुम
- 5:30भोगते हो। सहकाम पुण्य करने वाला व्यक्ति
- 5:36पुण्य के फर सुख को भी भोगता है और सहकाम।
- 5:43कर्म करने वाला व्यक्ति पाप का फल दुख भी भोगता है।
- 5:48दूसरा शब्द है उनका निष्काम। निष्काम का मतलब है मेरा कुछ
- 5:55नहीं, कोई इच्छा भी नहीं है। कर्म कर रहा हूँ।
- 6:02तेरा समझ के अभी पिछले दिनों मेरे पास एक सवाल आया कि बाबा दीक्षा
- 6:09हो गई है, अब मैं क्या करूँ? दरबार छोड़ के भाग जाऊं गन्नी
- 6:14बिलकुल नहीं फिर क्या फर्क पड़ेगा दीक्षा से पहले और दीक्षा से बात?
- 6:25मैंने कहा, पहले तुम अपना काम समझ के करते थे, जो भी कुछ करते थे,
- 6:32अब तुम मेरा काम समझ के करना कि जो कुछ कर रहे हैं बाबा के लिए
- 6:38करें। और क्रांति घटित हो जाएगा।
- 6:47तुमने कितने जन्मों तक अपना सोच के कर्म किया?
- 6:52गुरु का यही उद्देश्य है, यही लाभ है, तुम मुक्त नहीं हुए।
- 7:00जब तुम मेरा काम समझ के करोगे कि बाबा का काम कर रहे हो, काम धाम
- 7:07कर रहे हैं, दफ्तर जा रहे हैं, दुकान खोल रहे हैं, झाड़ू बहारी
- 7:12कर रहे हैं, स्नान ध्यान कर रहे हैं, सब मेरा पाप भी मेरा पुण्य
- 7:18भी मेरा। सब है मेरा, मैं उठ लूँगा आम मत
- 7:23आम सर्व पाप के मुख्य स्वामी माँ सुचाह तुम्हारे पाप भी मैं उठ
- 7:28लूँगा, निष्काम भाव से करो तो सहकाम भाव से करोगे तो तुम उठोगे
- 7:37ध्यान रखना। इन दोनों बातों का मैं जिक्र कर
- 7:39रहा हूँ कृष्ण भगवान दो तरह के काम करते हैं श काम श काम में
- 7:45पुण्य भी तुम भोगोगे और पाप भी तुम भोगोगे और निष्काम कर्म करने
- 7:52में पुण्य भी मैं भोगुंगा और पाप भी मैं।
- 7:57उसके लिए तुम जिम्मेदार यू अरे नॉट रेस्पॉन्सिबल फॉर दट, श्रेय
- 8:06विद्या मान सोमपाह तीनों वेदों में लिखे गए।
- 8:17शैखन कर्मों को अनुष्ठान को करने वाला व्यक्ति सोमरश को पीने वाले
- 8:27देखिये क्या शब्द प्रयोग किया भगवान ने?
- 8:30सोम पाहा पूत पाहा। पापों से मुक्त शराब पीते हैं और
- 8:39शब्द देते हैं शराबी को पापों से मुक्त हुए हुए लोग जो शराब पीते
- 8:48हैं, बड़ा प्यारा शब्द है। अगर तुम निष्काम भाव से शराब
- 8:57पीओगे तो तुम मुक्त हो गए। तुम कैसे मिलते हो?
- 9:06जनक शराब नहीं पीते थे। राजा कौन है जो शराब नहीं पीते?
- 9:12राजा को शराबी नहीं पड़ती है भाई कोई बाहर का प्रेसिडेंट आ गया,
- 9:20बाहर कैंप से डर आ गए, बाहर कोई ऐसी मीटिंग आ गई?
- 9:26कई देशों का मिलकर कई रियासतों का मिलकर कोई संवाद घोषणा होनी।
- 9:33तो सभी भी वहाँ बैठकर सोमवस को उस जमाने में कृष्ण के जमाने में
- 9:43शराब का नाम था सोमवस। तो कृष्ण कहते हैं तीनों वेदों
- 9:52में लिखे गए ये कर्म यज्ञाधी कर्म सोम रस का पान करने वाले, पापरहित
- 10:06व्यक्ति। अब तो मैं बड़ा उलट गया।
- 10:09तुम कहोगे शराब पीने वाला तो पाप ही होता है और कृष्ण कहते हैं
- 10:14पुण्य आत्मा बिलकुल पुण्य आत्मा है।
- 10:18वो शराब पीने वाला पापि कैसे हो गया?
- 10:21मांस खाने वाला पापि हो सकता है। शराब पीने वाला पापी कैसे पाप
- 10:33रहित मनुष्य? यज्ञों के द्वारा इन्द्र रूप से
- 10:42मीरा पूजन करके स्वर्ग प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं।
- 10:50इन्द्र से मांगते हैं, भगवान से मांगते हैं।
- 10:53है भगवान हमें स्वर्ग लोक के सुख देते हैं।
- 11:04यज्ञों के द्वारा मांगते हैं कि हमे स्वर्ग लोक के सुख प्रदान कर
- 11:10क्योंकि सभी सुख उसके पास हैं, वे पुण्य के फलस्वरूप।
- 11:23पवित्र इंद्र लोगों को प्राप्त करते हैं पुण्य कर्म यज्ञादि और
- 11:32पुण्य कर्म शराब पी के यज्ञादि पुण्य कर्म जो करते हैं।
- 11:40अब तुम तो बड़े चटक हो गए? ये बाबा ने कैसे वचन के दुरवचन कर
- 11:46दिए? कोई दुरवचन नहीं किया।
- 11:48बिल्कुल बिल्कुल वही अर्थ कर रहा हूँ जो अर्थ भगवान कृष्ण समते
- 11:54हैं, कई अर्थें इंद्रलोक को। प्राप्त करके यहाँ पर इंद्र रहते
- 12:04हैं कि कहाँ रहते हैं इंद्र स्वर्ग में और वहीं है कल्पवृक्ष
- 12:12वहीं है काम धेनुकाय उस स्वर्ग लोक को इंद्र लोक को प्राप्त
- 12:18करके। वहाँ स्वर्ग के देवताओं के दिव्य
- 12:23भोगों को भोगते हैं। स्वर्ग लोगों के दिव्य भोगों को
- 12:32भोगते हैं। ये दिव्य भोग कौन से?
- 12:39दिव भोग हैं परम सुख दिव भोग जो परम उत्तेजना देते हैं तुम्हें वो
- 12:48तुम्हें परम सुख देते हैं तुम्हें कभी पता लगा तुम्हारा दुश्मन
- 12:55जितना दुखी होता है तुम्हें इतना मज़ा आता है?
- 12:59क्यों? क्योंकि तुम उतने ही तो उत्तेजित
- 13:02होते हो, स्टिमुलेटर होते हो, वह धड़कता है?
- 13:07तुम मज़े लेते हो, वह मरता है, तुम तालियाँ बजाते हो।
- 13:18तुम गड़ते डालते हो, तुम नाचते हो, कूदते हो फांदते हो, दुश्मन
- 13:26दुखी होता है तो तुम जश्न मनाते हो क्यों?
- 13:35स्टिमुलेशन सारे स्टिमुलेशन इस पर भाषा को चित्र समझ लेना सुख एक
- 13:44उत्तेजना है और आनंद क्या है? नर उत्तेजना नॉन स्टिमुलेशन।
- 13:56इन दोनों का फर्क मैंने बहुत बार समझाया।
- 14:02अब मैं सुख की ही बात करूँगा। अभी आनंद की बात में सुख का मतलब
- 14:11उत्तेजना। और परम सुख का मतलब परम उतेज जब
- 14:20तुम परम सुख में होते हो तो समझ लो की परम उतेजना में होते हो परम
- 14:27उतेजना के उस क्षण में। तुम परम सुख में होते हो जहाँ
- 14:38जहाँ तुम्हें परम उतेज न मिलते चटपटा चाहिए, नमकीन चाहिए, मिर्च
- 14:42चाहिए, मसाला चाहिए, जितना तेज मसाला होगा उतनी जीव जलेगी।
- 14:51तुम्हारे टेस्ट वर्ड्स उत्तेजित होंगे, घना इतना ही मज़ा आएगा तो
- 15:01मैंने कहा उत्तेजना का नाम है सुख।
- 15:10और जहाँ तुम्हें सुख मिलता है वहाँ उत्तेजना होती ही होती है
- 15:16लेकिन ऋषि को उत्तेजना नहीं मांगता।
- 15:20कृष्ण बड़ी प्यारी बात कहते हैं, कृष्ण कहते हैं कि ये साधक मांगते
- 15:25हैं कि मुझे सुख दे दे। भगवान से इंद्र से यचना करते हैं
- 15:31कि हमें स्वर्ग लोक के सुख दे दे और शराबवादी पीते हैं यज्ञाधि
- 15:37कर्म भी करते हैं यज्ञ कर्म करना, आग जलाना, आहुति डालना।
- 15:48घी डालना ये भी एक नष्ट करने की प्रक्रिया है।
- 15:57घी को नष्ट करते हो, सामग्री को नष्ट करते हो, लकड़ियों को नष्ट
- 16:02करते हो, घड़ियाँ पहले ही बहुत काटी जाती हैं।
- 16:07तुम्हें हवन करने के लिए अब लकड़ियां चाहिए लेकिन तुम्हें सुख
- 16:14चाहिए। हवन सामग्री को जला दो, घी को जला
- 16:22दो। सभी वस्तुओं को जला दो नारियल को
- 16:27जला दो जलेंगे वो सुख आएगा तुम्हें जले के तुम्हारे दुश्मन
- 16:40सुख मानोगे तुम? त्रय विद्या माँ सोनपा पूत पापा
- 16:54यज्ञ रिष्ठव सरगंती प्रार्थनाते। ती पुण्यमा पुण्यमा सत्य
- 17:10स्वरेन्द्र लोका मशनती दिव्यानी देवी देव भव गाना।
- 17:24स्वर्ग लोक में जा के देवताओं के द्वारा जो भोग जाते हैं, दिव्य
- 17:33भोग उनको भोगते हैं एक साथ बिश में बड़ा प्यारा आ गया है उसको
- 17:42गौर से समझ लेना। वो शायद कभी काम पड़े, फिर मैं
- 17:49तुम्हें याद करूँगा के भगवान कृष्ण ने नौवें अध्याय के बींसवें
- 17:54श्लोक में जो ये शब्द एक बोला था, उसका अर्थ क्या है?
- 18:00शब्द सुनिए त्रय विद्या। मॉम ये मॉम शब्द रहता है और मॉम
- 18:09शब्द को कृष्ण ने बड़ी स्थानों पर प्रयोग किया है।
- 18:16कृष्ण कहते हैं जो यज्ञ करते हैं वो इंद्र से जो मांगते हैं।
- 18:23इंद्र स्वर्ग का राजा है, इंद्र सुख दे सकता है, सुख से ज्यादा और
- 18:30कुछ नहीं दे सकता मांगते किस्से हैं त्रि विद्या माँ मुझसे मांगते
- 18:40हैं। जहाँ फर्क तुम्हें साफ लगेगा पता
- 18:46इस स्वर्ग के देवता और स्वर्ग के देवता के अधिराज इन्द्र मालिक वो
- 18:54भी मांगते किस्से हैं परमात्मा से त्रय विद्या।
- 19:00मम सोमपा सोम रस का पान करके शराब का सेवन करके पूतपापा
- 19:11यज्ञरिष्ठ्रा स्वर्गतीं प्रथ्यनते ते पुण्य महासाध्य सुरेंद्र लोक।
- 19:24मश्यन्ती दिव्यान देवी देवभोगन देवताओं के भोग को भोगते हैं
- 19:36इंद्र रोग में जाकर। मांगते किस्से हैं त्रय विद्या
- 19:43माँ मुझसे मांगते हैं ये माँम शब्द रहता है इस माँम शब्द ने
- 19:52गीता में जान डाल दी है। गीता में अर्थ डाल दिए।
- 19:59माम शब्द ने बुद्धि इस माम का प्रयोग नहीं करते, महावीर भी नहीं
- 20:06करते कबीर नानक में नहीं करते कृष्ण के अतिरिक्त माम शब्द का
- 20:15कोई। प्रयोग नहीं करता।
- 20:19सिर्फ कृष्ण ही प्रयोग करते हैं जहाँ देखोगे जहाँ तहां कृष्ण की
- 20:29वाणी में तुम ये शब्द जरूर पाओगे अनन्या चिंतित तो मान।
- 20:35ये चन्हापुर उपास्थय तैशाम नित्यभुक्ता नाम योग क्षेमं वहाँ
- 20:42म्यहम त्रय विद्या माँ सर्वधर्मण प्रत्यक्ष।
- 20:59मॉम एकम शर्म प्रच, ये मॉम क्या है?
- 21:11वेदों को पढ़ने वालो गीता परिषद को पढ़ने वालो।
- 21:18ये माँ क्या है? माँ किसे कहते हैं यहाँ इंद्र को
- 21:23तो अलग से गणा दिया, सुखों को अलग से गणा दिया, स्वर्ग को अलग से
- 21:27गणा दिया माँ शब्द मैं फिर का विवाद करूँगा इस शब्द पे ये एक
- 21:40अकेला शब्द। सारी गीता में जान डाल देता है।
- 21:46माम शब्द अगर निकाल लिए जाए गीता में से तो गीता रस विहीन हो जाती
- 21:56है। गीता में वो नहीं रहता जो
- 22:00उपनिश्चित कहता है। रसो वैसा वह रस रूप है तुमने कहा
- 22:17कि तुम शराब की बात करते हो, पीओ देखो इसमें है।
- 22:24उसमें है या नहीं है ये फैसला करोगे तुम?
- 22:28लेकिन कम से कम इसको पीने से रोकना नहीं चाहिए क्योंकि रोकने
- 22:35से तुम्हारा मन ज्यादा खिंचाव पाता है।
- 22:45जहाँ तो हमारा मन रोकता है वह अहंकार को ठेस लगती है, उसको पाने
- 22:54के लिए अहंकार जिंदगी दांव पे लगा सकता है।
- 22:59अहंकार के लिए वह एक दुष्कर्म बन गया।
- 23:04होता। अति साधारण है अति साधारण स्त्री
- 23:11अगर पुरुष को ये चैलेंज कर दे की तुम मुझे नहीं पा सकते हो, चाहे
- 23:17कैसी भी लड़की हो, इससे कैसी भी हो।
- 23:23कोई न नक्श, रंग, रूप कुछ न हो, बस चैलेंज हो जाए मनुष्य को आदमी
- 23:32को कि तुम मुझे नहीं पा सकते तो वह अपनी सारी शक्ति लगा देगा
- 23:39पुरुष आदमी को दबाने का सबसे। शानदारत्री का अक्सर स्त्रियाँ
- 23:46प्रयोग करती हैं जिसे लुभाना हो उससे दूर दूर उसकी अपेक्षा
- 23:59उपेक्षा। जिससे अपेक्षा उसी की अपेक्षा
- 24:07इंकार में स्वीकार छुपा होता है स्त्री की तरफ से, लेकिन पुरुष
- 24:14थोड़ा सा उल्टा है, पुरुष को चैलेंज कर दोगे करने कतराओगे।
- 24:22तो पुरुष का अहंकार टूटेगा या थोड़ी सी भीतर की साइंटिफिक
- 24:26प्रक्रिया बता दूँ? प्रयोग मत करने लग जा।
- 24:32ऐसा मत कर ये साइंटिफिक प्रक्रिया है कि पुरुष को अगर इंकार कर देगी
- 24:39इस तरह। नहीं नहीं, तुम योग्य नहीं पुरुष
- 24:45का अहंकार दांव पे लग गया, फिर तुम में कितनी भी कमी बेशियाँ नजर
- 24:53अंदाज हो जाएंगी। पुरुष का अंकार ठेस खाया तो जख्मी
- 24:58सांप की तरह पर उठा देगा। और उस स्त्री को पाने के लिए सारे
- 25:05हथकंडे प्रयोग करें। अक्सर स्त्रियों के पास जाण के
- 25:11नीती के अनुसार यही नीती होती है। पुरुषों को बश में करने के लिए
- 25:18पुरुष के लिए स्त्री दुर्लोक बन जाएगा।
- 25:24और अगर आज सारे संसार में स्त्री ने अपना आकर्षण खो दिया है, ध्यान
- 25:31से सुन ना मेरी बात को अगर आज सारे संसार में स्त्री ने अपना
- 25:37लाभन्य का आकर्षण खो दिया है। काफी क्या जमाने थे, चभूषण की बात
- 25:45हुआ करती थी और आज भी क्या जमाने हैं, जाभूषण बेपर्दा नजर आता है।
- 25:59वो भी क्या जमाने थे जब हुसन की बात हुआ करते थे और आज भी क्या
- 26:06ज़माना है जब हुसन बे पर्दा दिखाई देता है?
- 26:18ऋषियों की खोज थी। स्त्रियों को ढके ढूमे रखना चाहिए
- 26:24और इस डके ढूमे होने में ही सारी क्रोनोलॉजी छिपी थी।
- 26:36जैसे जैसे स्त्री उभरती जाएगी, मर्द के लिए गृहणीय नहीं रह
- 26:46जाएगी। इन शब्दों को याद रखें यह संसार
- 26:52के हैं, लेकिन काम कर सकते हैं। अभी थोड़े दिन पहले मुझे प्रश्न
- 27:01आया था कि बाबा मैं किसी से प्रेम करती हूँ, वह मुझसे प्रेम करने लग
- 27:07जाए। कुत्री का कोई मंत्र बता दो
- 27:09मंत्री ही है। जब थोड़ा सा वो झाँके बस तुम वो
- 27:21ही कर देना हम्म हाँ ये तुम्हें ज्यादा पता है तुम नाक बहुत अच्छी
- 27:29तरह से सुखाड़ लेती हो, चिढ़ जाएगा।
- 27:36मर्द के अहंकार को ललकार देना मर्द वश में आ गया।
- 27:52स्त्री ने अगर आज अपना चर्म खो दिया है सारे संसार में तो उसके
- 27:58जिम्मेदार कौन? पाश्चात्य सभ्यता पाश्चात्य
- 28:04सभ्यता ने स्त्री को उगाड़ा। और उगाड़ते उगाड़ते नग्न कर दिया
- 28:16और पुरुष का आकर्षण जो चीज़ उगड़ जाए उससे उगड़ ही जाता है।
- 28:28इसलिए राजस्थान में और हमारे हरियाणा में।
- 28:32एक कहावत है कि औरत स्त्री तो ढकीढोमी ही अच्छी रहती है।
- 28:39इसमें बड़ा गहरा साइंटिफिक कारण था।
- 28:44जैसे जैसे स्त्री अपने आपको अंग प्रदर्शन करने लगेंगी, स्त्री
- 28:49समझेगी। की मैंने पता नहीं क्या किला जीत
- 28:53लिया, लेकिन कोई किला विलेन नहीं जीता।
- 29:02थोड़ी देर के लिए उसके अहंकार को लगेगा।
- 29:09कि कुछ व्यक्ति उसके पीछे है, लेकिन यह फ़िल्म ज्यादा देर तक
- 29:16नहीं चल पाई थी और जो फ़िल्म हमारे हरयाणवी में है और राजस्थान
- 29:22में चलाई जाती है, वह चौहानियों में जाके खत्म होती है।
- 29:29श्मशान घाट में लखनऊ में जाके स्त्री का इतना आकर्षण सिर्फ
- 29:41आकर्षण न देखने के घाट और कोई वक्त था।
- 29:45समझदार थे लोग। लड़के का बाप भी लड़की को देखने
- 29:52नहीं जाता था, ना ही जाते थे। रिश्ता पक्का करा वो तो पुजरो
- 30:01खड़े हो गए कोई लंगड़ी लोली काणी कर दी कोई?
- 30:06तो वहाँ से उपद्रव खड़े हो गए और मृद ने थोड़ा सा अपने हाथ में काम
- 30:10ले लिया। अब तो बाप और माँ के ऊपर भी कोई
- 30:13इतबार नहीं होता। कौन जाने का चोट खाये हुए हैं वे
- 30:21खुद ही का ये आलम? न पूछो इश्क में चोट खाये हुए
- 30:36हैं। इश्क में हम तुम्हें क्या बताएं?
- 30:55किस कदर चोट खाये हुए हैं? इस क में हम तुम्हें क्या बताएं?
- 31:10किस कदर चोट खाये हुए हैं मौत ने हमको मारा है।
- 31:21और हम ज़िन्दगी के सताए हुए हैं। मौत ने हमको मारा है और हम
- 31:35ज़िन्दगी के सताए हुए हैं भाई उलटे।
- 31:43मर्द के अहंकार को ठेस लगेंगी। अहंकार जीतने में जुट जाएगा।
- 31:55कमजोरी बताता हूँ तुम्हें? ये चाणक्य आज अगर स्त्री का
- 32:06लोभान्य खो गया है भूषण कहीं देखने में नजर नहीं आता आज हम
- 32:13सोचते हैं कि मिर्जा साहिबा लैला, मंजूर ये पाप।
- 32:22ये हीर राँझा ये कुछ दिमागी अपसेट करते हैं।
- 32:29इनका इलाज मानसिक उपचार होना चाहिए था।
- 32:33अन्यथा स्त्री में ऐसी बात क्या है रातों रात?
- 32:38वृक्षों को जकड़ के बाहों में जकड़ के लैला लैला पुकारना।
- 32:46मजनू के द्वारा भला ये मानसिक रोग की निशानी नहीं लगती।
- 32:53तुम्हें आज नहीं लगती। आज लगता है वो मूर्ख से और जीस
- 33:07शरीर को गहराई से तुम देख लोगे। मेरे एक शब्द को याद रखना बड़े
- 33:12कीमती है उससे मुक्त हो जाओगे। इसलिए अष्टवक्र कहते हैं के भोग
- 33:19लो, बड़े खोल के कहते हैं, वे बाकी से बोलते हैं अष्टवक्र जीस
- 33:28चीज़ से मुक्त होना चाहते हो उसको अच्छी तरह से भोग लो देख लो, भीतर
- 33:33की तह तक झाँक लो। और तुम पाओगे तुम मुक्त हो गए और
- 33:40मुक्त भी ऐसे हुए कि तुम फिर कोई बांध न सके तुम कुन्कुने कुन्कुने
- 33:48से भौंकते हो कुन्कुने कुन्कुने से गर्म होते हो?
- 33:54तुम उबलना कभी सीखे नहीं। 100 डिग्री पे आना सीखे नहीं और
- 34:00काश तुम 100 डिग्री पे आ जाओ, रूपांतरण हो जाएगा रूपांतरण क्या
- 34:04हो जाएगा? तुम लिक्विड से वाष्प में तब्दील
- 34:07हो जाओगे, ये ही रूपांतरण होता है।
- 34:12कहीं पानी पड़ा था इकट्ठा हुआ और कहीं हवाओं में जाके नाचेगा ऊपर
- 34:18बादलों के भीतर यह रूपांतरण हो गया और कैसे हुआ 100 डिग्री पर
- 34:24हुआ तुम कुनकुने से जीते हो 405060 वर्ष।
- 34:36आज हुसैन ने खुद की अहमियत खत्म कर ली है।
- 34:42उनको पता नहीं था कोई मेरे जैसा राय देने वाला मिला नहीं होगा।
- 34:50मैं राय दे देता हूँ। ये मुसलमानों का बुरका, गहरे
- 34:59लंबे, लंबे घूँघट ये ढकेढोमी और अगर खेर जी को।
- 35:12कहीं महारानी का एक अंगूठा दिख जाता है, पागल लौटता है वो कहता
- 35:23है बस थोड़ी सी एक जलकी दिखाओ और सीधे सीधे नहीं शीशे में धकला दो।
- 35:31क्या हुआ इस पागल को इसको वही जो हर मर्द को रोक होता है?
- 35:40अरे भाई सुनते रहे वो थोड़ा सा ठीक से सुन लियो।
- 35:49मर्द को रोग यही है जिसे छुपाओगे उसके प्रति वो अंधा हो जाएगा तुम
- 35:55ज़रा एक प्रयोग करना तुम जा रहे हो जा रहे हो कुछ भी नहीं एक जगह
- 36:02आ जाती है जहाँ। परदे के ऊपर लिखा है कि इसके अंदर
- 36:05झांकना मना है। तुम उसको देखोगे इसके अंदर झांकना
- 36:11मना है। भाई क्यों मना है?
- 36:14ऐसा क्या है इसके अंदर? तुम दूर तक चले तो जाओगे, लेकिन
- 36:19फिर वापस आ जाओ। तुम्हारा मन चैन से नहीं बैठेगा।
- 36:24देख ही ले भाई ऐसा तो उलझ कर क्या था इसमें शायद इसी को देख के
- 36:30मुक्त हो जाते और मुक्त होने की तमन्ना तो सभी है हिंदुस्तान में
- 36:34तो मैं कहता हूँ भाई भेड़िया तो बताओ।
- 36:44कहाँ है बेड़िया, जिससे तुम बंधे हुए हो?
- 36:48लेकिन मुक्त होने की आंकाक्षा परफेक्ट तुम्हें ठग मिल जाती है।
- 36:55पांच नाम, चार नाम। ठगों की वरवार ऐसे नहीं होती।
- 37:02पहले तुम्हारे भीतर एक भ्रम का जन्म होता है, क्या हम बंदे हुए
- 37:11हैं? यही गलत है।
- 37:17अष्टावक्र सी वरम को तोड़ते हैं अष्टावक्र कहते हैं, भाई कहाँ
- 37:21बंधे हुए हो दखा तो तो वो बंधन जीस बंधन से बंधे हुए हो दखा तो
- 37:28दो कोई सांगली कोई रस्सा, कोई रज्जु, कुछ तो होगा।
- 37:38अब तुम कहते हो नहीं वो दिखाई नहीं पड़ता वो तो जन्मो जन्मो का
- 37:41बंधन है, बस इसी बंधनों में जकड़े जकड़े आचार्य अपना बड़ा विशाल
- 37:53साम्राज्य कर लेते हैं। आचार्य सद्गुरु ये सब अपना विशाल
- 37:58साम्राज्य इकट्ठा कर लेते हैं मुक्त करना है मुक्त करना है
- 38:02किस्से मुक्त करना है भाई बंधन तो दिखा दे किसी ने कोई बंधन देखा
- 38:08किसी के ऊपर हम सभी मोज से चलते हैं, मोज से खाते हैं, पीते हैं,
- 38:14सोते हैं। कोई बंधन देखा तुमने आदमी के ऊपर
- 38:18फिर किस्से मुक्त होना चाहते हो तुम इसी भ्रम को खत्म करते हैं
- 38:23कृष्ण और इसी भ्रम को खत्म करते हैं कष्ट भाई मुक्ति जो है मुक्ति
- 38:33वो तुम्हारी कल्पना है। सच में तुम बंधे हुए हो ही नहीं,
- 38:44सच में किसने तुम्हें बांध रखा है?
- 38:46थोड़ा बंधन दिखाना तो और जब तुम मुक्त हो जाओ ना तब उस बंधन की
- 38:51तुलसी गांठ मेरे लिए वे ले आना। कि जी था बंधन अब मेरे बेटे की
- 38:58पथरी हो गई, पथरी हो गई, दर्द करे वो तो सच में है ना तो जीसको पथरी
- 39:06होती है, दर्द होता है भूषण क्या हो गया अब वो दिखती तो है ना?
- 39:14लेकिन जब निकली तो दिखी ही ना जब निकली तो दिखाई के ये पापा ये थे
- 39:21तो समझा गया तो तुम बंधन से जब मुक्त हो जाओ ना तो बंधन मेरे पास
- 39:26थोड़ी सी गांठ ले आना उसके ताकि मैं भी समझ जाऊं।
- 39:32कि हाँ, बंधन था तुम्हारे भीतर बस वैसे ही वतन है जैसे राम किशन पर
- 39:40मानस के माता का वतन था लेकिन तुम ऐसे पागल हो, मैं कितना ही भोंक
- 39:48रहूँ तुम समझोगे। खुद ही बंधन बनाते हो।
- 39:55रामकृष्णा ने माता को बंधन बना लिया और दो तपुरी कहते है क्या
- 40:01काट दो इसकी कर दो तपुरी बड़ी अच्छी तरह से जानते है ये बंधन
- 40:08इसका खुद का बनाया हुआ है। और वो कब फते हैं और राम किशन
- 40:16परमा से कहते हैं, माता को कैसे काटते हैं, तलवार से काट दो,
- 40:24तलवार से काट दो, तलवार कहाँ से ले के आऊं?
- 40:29जहाँ से माता लेके आये थे अब तोतापुरी तो मास्टर ऑफ मास्टर्स
- 40:35हैं, उनसे क्या प्रश्न करोगे तुम? तोतापुरी कहते हैं, जीस, पागलपन
- 40:43से तुमने माता का निर्माण कर लिया काली का।
- 40:48जीस पागलपन से तुमने मंदिर खड़े कर लिए मस्जिदें खड़ी कर दी चर्च
- 40:52खड़े कर लिए गुरूद्वारे खड़े कर लिए उसी पागलपन से तोड़ दो ये सब
- 41:02पागलपनों की इज़ाद हैं तुम्हारे मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे।
- 41:07इसके अलावा और कुछ नहीं है। गौर से देखोगे तो यही कुछ पांव का
- 41:20है स्त्री ने मैं बोल रहा था अपने आपको खुद ही सस्ता कर लिया है।
- 41:27वो भी भक्त था जब पदमनी के पांव के अंगूठे को देखने के लिए पागल
- 41:36हो गया था कि तुमने पुराने जमाने की।
- 41:46गरीब के जमाने की मुशायरे देखे होते हैं, ये सब पागलपन हैं,
- 41:59जीतने शायर हैं, शेर हैं, ये पागलपन की कांड हैं, खोज हैं।
- 42:15दो तल हैं। एक बुद्धि का, एक हृदय का, बुद्धि
- 42:21का तल हृदय को पागलपन मालूम पड़ता है।
- 42:26और हृदय का तल बुद्धि को मालूम पड़ता है।
- 42:29पागलपन क्यों हृदय बात करता है? बुद्धि उसमें हंसती है और जो
- 42:39बुद्धि बात करती है, हृदय उसमें हंसता है, इनके आपस में कभी बनती
- 42:44है। कभी हरदा की बात करता है और दर्शन
- 42:52शास्त्र बुद्धि की बात करता है और एक दूसरे के शब्द ऐसे हैं कि
- 43:02तुम्हें ऐसे रखेगा। ये पागल तो नहीं हो गया है?
- 43:09ए लहर अपनी मिट्टी से कह दे ए लहर अपनी मिट्टी से कह दे, दाग लगना
- 43:19चाहिए कफ़न को। कफन को दाग न लग जाए, जब मिट्टी
- 43:27में दफन करोगे तो दाग तो लग ही जाएगा लेकिन ये हृदय की बात
- 43:37बुद्धि को समझ नहीं आती है। ए लह।
- 43:43अपनी मिट्टी से कह दे दाग लग न जाए कफन को, आज ही हमने बदले हैं
- 43:58कपड़े। आज ही हम नहाए हुए हैं, आज ही
- 44:10हमने बदले हैं कपड़े आज ही हम नहाए हुए हैं।
- 44:21हृदय ऐसी पागलपन की बातें किया करता है।
- 44:25बुद्धि इनको नेग्लेक्ट कर देती है और बुद्धि जो बातें करती है, हृदय
- 44:34उस पर छुरी फेंक देता है। और दोनों एक दूसरे को पागल जैसे
- 44:40लगते हैं। प्रेमी कहता है प्रेमिका से
- 44:44तुम्हारे लिए तारा तोड़ रहा हूँ, इसके बाप लाख बाप भी इकट्ठे हो
- 44:53जाए ना? तो उसका एक टुकड़ा भी नहीं ला
- 44:58सकते। तरेगा लाखों गुना बड़ा होता है
- 45:02धरती से एक तरह। लेकिन प्रेम में ऐसी बातें होती
- 45:10है। ये उल्टी बातें हैं जो मैं कह रहा
- 45:16था कि स्त्री ने। अपनी तो हिन खुद करा ली स्त्री की
- 45:26अस्मत छुप जाने में बजी रहती स्त्री उभरती गई अस्मत लुटती गई।
- 45:39और इसके लिए जिम्मेदार? इस तरह अगर आज इस तरह की कोई कीमत
- 45:47नहीं है तो वो उसके अपने कर। अन्यथा क्वी का जी जो लंबी अंगूठा
- 46:05भी ना देखने पाए तुम्हारे शरीर का कोई अंग ना देखने पाए।
- 46:14नहीं तो फिर फिर बुद्धि अपना खेल कर देख तेरी जुल्फों के साए के
- 46:27तले आराम कर लो। तेरी जुलफों के साए के तले आराम
- 46:33कर लूँ पर डर लगता है पहली बात हृदय की तेरी जुलफों के साए के
- 46:45तले आराम कर लूँ दूसरे शब्द। बुद्धीक है मगर डर लगता है कि
- 46:54इसमें जुए ना हो। दोनों उलट भाषा के मालिक है।
- 47:07उसको अपनी बात कहने में मज़ा आता है और उसको अपनी बात कहने में
- 47:13मज़ा आता है। ये दोनों उलट उलट बातें हैं।
- 47:20बिल्कुल सच थी हमारे बुजुर्गों की बात स्त्री को डकेडो में ही रहना
- 47:28चाहिए यह उसके खुद की। अस्मत के लिए अच्छा है, छुपाने
- 47:46में ही स्त्री की इज्जत छुपी हुई है।
- 47:55उगाड़ने में तो। फिर वो बेकार हो जाती है।
- 48:02इन शब्दों को गौर से समझ लेना और अगर आज स्त्री का इतना पौधे
- 48:13पालेगी स्त्री लेकिन वो मुकाम कभी ना पाएगी।
- 48:17जो मुकाम कभी था उस मुकाम पे कभी नहीं आएगा।
- 48:26परमात्मा ने जो भक्षी देखी स्त्री को कोमलता की श्रम की।
- 48:39उसने खुद ही तबाह कर ली और आज सहारे ढूंढती है।
- 48:47स्त्री मेकअप के परतें चढ़ाती है। 2020 पोछें, लगाती है बुर्स से।
- 48:56लेकिन कुछ नहीं होता। वो वक्त थे जमाने थे जब सीता जय
- 49:00सीखते का श्रृंगार दिखता नहीं था, श्रृंगार डालती थी लेकिन दिखता
- 49:10नहीं था, श्रृंगार से ज्यादा खूबसूरत सीखा था।
- 49:15श्रृंगार से ज्यादा खूबसूरत द्रौपदी थी।
- 49:21ओह सिर कहाँ है? आज स्त्री ने खुद ही तबाह कर दिया
- 49:31उलट बातों में कई बार। भेद छिपा होता है तो पूछा है
- 49:39कृष्ण के सूत्रों से ही जवाब दिया है।
- 49:41मैंने कृष्ण के सूत्र ही बोलते हैं कि व्यक्ति यज्ञ कर्म को करता
- 49:50हुआ। स्वर्ग के नहीं तो स्वर्ग की
- 49:56कामना के निहित शराब वगैरह का पायन करते हैं।
- 50:04यहाँ शब्द सोम रस पीने वाला आहुति दे रहा है, यज्ञ कर रहा है।
- 50:14लेकिन उसकी मनोकामना क्या है? स्वर्ग के लुत्फ लेलो तो थीम
- 50:21समझना इसका थीम है स्वर्ग के लुत्फ लेलो।
- 50:27जब तक तुम्हारी ये तमन्ना भरना जाएगी, ये तुम्हारा वहम है।
- 50:33कृष्ण कहते हैं यह तुम्हारा वहम है अष्टवक्कर भी यही कहते हैं यह
- 50:39तुम्हारा वहम है और वहम टूटेगा कैसे टूटेगा आँखों देख कर वहम भोग
- 50:48के टूटेगा? छोटी उम्र में भोग लिया बुद्ध ने
- 50:54महावीर ने भर्म टूट गया हीरे जौहरात तख्तोतास मोतीमणियां।
- 51:08मुकुट लाल सब बेकार हो गए। फिर क्या होता है उस तत्व की जब
- 51:16मांग उठ जाती है भीतर से तो तुम्हारे तत्वतास बेकार हो ही
- 51:22जाया करते हैं। जैसे बचपन के डर माँ बाप ने बैठाए
- 51:30किसी कारण से बैठाए माऊ है, अब्बू है, भूत भरता है, जैसे जैसे बच्चा
- 51:42मेच्युर होगा, भूत भाग जाएगा। हाबू माऊ भाग जाएगा, फिर वो अपने
- 51:50बच्चों को उड़राएगा कैसे भागा? मेजोरिटी के साथ भागा जैसे
- 51:58मेच्युरिटी से तुम्हारा हाबू तुम्हारा माँ हूँ, तुम्हारे भूत
- 52:03प्रेत। खत्म हो जाते हैं।
- 52:05भूत प्रेत से तो लोग आज भटकते हैं पर मैंने 1000 दबे कहा कि भूत
- 52:12प्रेत किसी का बुरा नहीं कर सकते। सिर्फ मार्गदर्शन करने की क्षमता
- 52:21है उनमें। यह विषय बड़ा महत्वपूर्ण है, गहरा
- 52:27है और काफी वक्त भी लेगा। इस विषय को अभी नहीं छोड़ूंगा।
- 52:33जब इसे छेड़ूंगा तो पूरी तरह तक ले जाऊंगा, ये मेरी आदत है।
- 52:40तो भूत, प्रेत, पिशाच, चंडाल वगैरह वगैरह वगैरह ये सब क्या है?
- 52:47क्या होते हैं ये सारी चीज़? जब मैं शुरू करूँगा तो फिर इसे
- 52:52पूरा ही अंजाम दे दूंगा। अब इसको छोड़ता हूँ क्योंकि ये
- 52:58विषय। संबंधित नहीं है।
- 53:00इस क्वेश्चन से तो तुम तो बड़े हैरान हो गए तुम तुम्हारे तो
- 53:08विषयों ने कहा है। गुरुओं ने कहा है कि शराब शराब की
- 53:11बोतल को लोग हाथ लगाते हैं ना बाकी दो लेते हैं।
- 53:16क्या हुआ शराब को हाथ लगते? क्या हो गया सर अरे शराब तो
- 53:23तुम्हारे भीतर भी बनती है, थोड़ी सी तुम्हारे भीतर की फैक्टरी खुद
- 53:27ही शराब बनाती है, भोजन को बचाने के लिए क्या होगा?
- 53:32अगर रात रुक गया तो लेकिन वहम का कोई इलाज नहीं होता।
- 53:44कहते हैं कृष्ण के जो व्यक्ति सुख की चाहत में स्वर्ग जैसे सुखों की
- 53:52चाहत में शराब वगैरह का पान करके सौमर्ष वगैरह पीकर।
- 54:04हवन यज्ञा भी कर्म करता है। इंद्र से मानता है सुख सुख इंद्र
- 54:12से ही मांगा जाता है समझ लेना बात को थोड़ा सा गहरा प्रश्न है।
- 54:21तुम्हें सुख देती हैं इन्द्रियों को और इन्द्रियों का राजा है
- 54:27इन्द्र इन्द्र कहते हैं मन को मन इन्द्रियों का राजा है, मन ऑर्डर
- 54:35करता है, मन हाथ को ऑर्डर करता है।
- 54:40हाथ पर लेगा, हाथ पर लेगा। ऑर्डर मन का है और इंद्रियों का
- 54:50गुरु कौन है? मालिक इंद्रों और इन्द्र स्वर्ग
- 54:56का मालिक है। मैंने कर्म भी बोला था मन तो
- 54:59ज्योत स्वरूप है अपना मूल पछा इंद्रियों का भी मार्ग है, लेकिन
- 55:09इंद्र जब पूर्व श्री रम्भा मेनका। इन अफसरों के आसक्ति में आ जाता
- 55:23है तो विकृत हो जाता है के प्रसंग के ऊपर मुझे किसी ने पूछ लिया।
- 55:33ये बाबा फिर तुमने कहा भजन के रूप में और गिलास का उदाहरण दिया नीचे
- 55:41माटी बैठ गई, ऊपर पानी आ गया, ठीक बिल्कुल समझ गए, लेकिन फिर सुबह
- 55:47उठे बिल्कुल फ्रेश उठे सरो ताजा तो फिर जाप का क्या संबंध हुआ?
- 55:53उनका जाप का यही संबंध हुआ कि तुम उस पानी को फिर घिसोत दिया।
- 55:58रात भर की आराम से जो मन पानी गंदगी से जुदा हुआ था, अलग हुआ था
- 56:08उस माटी से, उसमें तुमने फिर गछल मार दिया।
- 56:12वह फिर गंधरा हो गया छातो ज्योत शुरू और सारी रात के आराम के बाद,
- 56:22इसलिए मैं कहता हूँ आराम बड़ी चीज़ है, आराम से कुछ ना करो,
- 56:28आराम से बैठ जाओ। पर वो जैसे सारी रात आराम से लेटे
- 56:33रहने से माटी नीचे बैठ गयी। पानी ऊपर आ गया तुम्हें फर्क साफ
- 56:40पता लग गया लेकिन फिर क्या करें तुम सुबह उठ के फिर वही राते राते
- 56:47गज़ल मार दो उसको पानी में। फिर माटी गुल जाएगी।
- 56:51तुम सारी उम्रों से यही कर रहे हो नाम बदल लिए है तुमने जब राजा
- 56:56नहीं होती थी कुछ और कहते थे जब राम भी नहीं होते थे कुछ और कहते
- 57:03थे लेकिन मनुष्य की मानवता के मन की।
- 57:09धारणा मूड यही है नाम चाहे तुम कोई भी लेते रहो, तुम गजर मारते
- 57:19ही रहोगे, मन को मैला करते ही रहोगे और संत कहते हैं कि मन।
- 57:29तो बड़ा आनंद स्वरूप संगत के कारण बिचारा मारा जाता है।
- 57:39बदनाम हो जाता है जब माटी की संगत मिलती है रात के विश्राम के बाद।
- 57:49जीस संगति में वो उलझाता वह माटी नीचे बैठ जाती है पानी ऊपर आ जाती
- 57:55है बिलकुल साफ हो जाता है। ये मन मैला नहीं था मैल अलग है जो
- 58:04नीचे बैठ गई मन अलग है जो ऊपर पानी।
- 58:11लेकिन फिर तुम पूछते हो कि इससे जाप का क्या संबंध है?
- 58:15जाप भाई गचल है, हलचल है जाप फिर भीतर हलचल मचा देती है तुम्हारे
- 58:23उसी पानी का तुम हाथ गचल कर देते हो।
- 58:27फिर मिल जाता है वही फिर गंधला हो जाता है और यह काम दिनों महीनों
- 58:36से नहीं जन्मो, जन्मो से चल रहा है।
- 58:39एक छोटी सी बात ऐसे ही तो नहीं कह देते बुल्ले शाह तेरा बुदा की
- 58:44पाणा पुत्र पुटना से दुश्मन? तो तुम कहते हो इतनी आसान बात है,
- 58:50बिल्कुल इतनी आसान बात है सुबह अगर पूरी फ्रेश में से तुम उठे और
- 58:57पानी और माटी तुम्हें अलग अलग दिख गई और समझ आ गया फिर तुम मन को
- 59:01गाली निकालोगे। फिर तुम यही बात कहोगे मन तू
- 59:08ज्योत स्वरूप है अपना मूल बचाओ तू देख अब माटी के बिना तू कैसा है
- 59:14शुद्ध माटी तुझे अलग दिख रही है लेकिन फिर पानी का का कसूर, मन का
- 59:23का कसूर। तो फिर उसमें गचल मार दो, कुछ भी
- 59:31करो, जाप करो, पाठ करो, पूजा करो, प्रार्थना करो, अरदास करो उस ठहरे
- 59:37हुए उस ठहरे हुए पानी में फिर से हलचल मार देना, अपनी उँगलियाँ
- 59:43फिरा देना, हाथ मार देना। तुम समित एवं बड़पुंडी का काम कर
- 59:49रहे हो। सुबह सुबह ब्रह्ममूर्त में उठ के
- 59:54भगवान का नाम जप्री है, वाहे गुरु सत्यनाम अकालपुर का नाम जप्री राम
- 59:59राम सीताराम नहीं नहीं तुम गज़ल मार रहे हो।
- 1:00:04तुम उस मन बेचारे को रात भर से बड़ा बा मुश्किल उससे अलग हो पाया
- 1:00:10था, लेकिन तुमने फिर गंध ला कर दिया और फिर गंधला पानी तो यही
- 1:00:19कहेगा मैं दुखी। दुःख के सारे दुख जो नीचे बैठ गए
- 1:00:25थे और सांप दुख रहे थे, दिख रहे थे कि माटी अलग है, दुख अलग है और
- 1:00:33तुम अलग हो, जोत स्वरूप अलग है। वो तुमने फिर मिक्स कर दिया।
- 1:00:41फिर सारा पानी गंधला पानी ही कहेगा कि बाबा मैं दुखी हूँ
- 1:00:48अन्यथा जब पानी और माटी अलग अलग हो गए थे तो पानी देखता इसी को
- 1:00:54दर्शन करते है वह जो माटी नीचे बैठी है वो मैंने।
- 1:01:03वो जो दुख मुझे हो रहा था वो मैं नहीं वो दुख अलग है।
- 1:01:07देखो अलग बैठ गया नीचे जब तक तुम्हारे में बुरा हुआ था तब तक
- 1:01:14वो दुख तुम थे तुम्हारा था अब तुम्हारा नहीं रहा तुम्हारा हो
- 1:01:19गया। लेकिन क्या करें तुम समझते नहीं
- 1:01:28तुम कहते हो, हम ब्रह्मचर्य सा देंगे, हम जीव का स्वाद जैसे बाबा
- 1:01:34आप नहीं खाते पूड़ियाँ किचोड़ियाँ।
- 1:01:38हम भी छोड़ देंगे छोड़ दो भाई, लेकिन वो छोड़ना तुम्हारे लिए
- 1:01:44घातक होगा, क्यों? क्योंकि मन भटकेगा?
- 1:01:51मैंने चटपटा खाना छोड़ा नहीं, मेरा चटपटा खाना छूट गया।
- 1:02:00जब वो रस मिला मीठा है शहद का और उसका स्वाद प्रकट नहीं किया जा
- 1:02:07सकता जो गूंगा गुड़ खाई के कह कौन मुख स्वाद पर वह जब से स्वाद लगा
- 1:02:15है। जीवा के ट्विस्ट बर्ज को और कुछ
- 1:02:21स्वाद लगता है मैंने तो ऐसे ही छोड़ा तुम्हें, वो स्वाद लग गया।
- 1:02:29जीस स्वाद के लग जाने से बाकी सारे स्वाद फीके पड़ जाते हैं और
- 1:02:34बाकी सारे स्वाद। जहर जैसे लगते हैं।
- 1:02:38वह स्वास्थ्य में मिला। अगर मिला तो छोड़ दूँ जीस आनंद
- 1:02:49में ओज की अवस्था में जाकर ब्रह्मचर्य घटित हो जाता है।
- 1:02:56वो ओज तुम्हें प्रकट हुआ। तुम बात की गहराई को जबकि बड़ी
- 1:03:04आसान है। सरल सत्य हमेशा सरल होता है अगर
- 1:03:10तुम्हारा रिप्रोडक्टिव सिस्टम का वीर्य ओज में परिवर्तित हो गया।
- 1:03:18और वह तुम्हें आनंद मंगल करने लगा और इतना आनंद आया, इतना आनंद आया
- 1:03:26तो तुम सुख की मांग करोगे, नहीं करोगे?
- 1:03:34प्राइम मिनिस्टर कभी चपरासी बनने की इच्छा करता है।
- 1:03:39मैं ही करता ना बस जिसने वो स्वाद चख लिया अखंड धारा का समग्र में
- 1:03:49जो फैल गया ऑम्नी प्रेसेंट जो हो गया।
- 1:03:56जो हो गया जो हो गया वह छोटे से स्वाद को क्यों चाहेगा?
- 1:04:05वो स्वाद कोई भी यंत्रियों के द्वारा टेस्ट से लिया गया हो।
- 1:04:08गुप्तइंद्रियों से लिया गया हो, कानों की मधुरता से लिया गया हो
- 1:04:14आँखों की। दर्शनीय क्षमता से लिया गया हो,
- 1:04:19वह स्वाद तुम्हें फीका लगेगा क्योंकि तुमने वो सर्वोत्तम स्वाद
- 1:04:24चक्र लिया है मेरी बात को समझ के फिर चीज़ छूटे।
- 1:04:34वह अलग बात है। मेरी बात को सुनकर तुम वो चीज़
- 1:04:39छोड़ दो, वो बात अलग है तुम अपने गहरे में उतरो, मैंने बहुत बार
- 1:04:49तुम्हें कहा है, भूल जाओ सब बातें।
- 1:04:52भूल जाओ कि कोई और सूत्र आसान मिल जाएगा नहीं कोई सूत्र आसान नहीं
- 1:04:57मिलेगा। ये तुम्हारे चैनल के ऊपर बोलने
- 1:05:02वाले में तुम्हें बहुत बार समझाया है।
- 1:05:06ये व्यूस इकट्ठे करने वाले लालची लोग ही लोग हैं।
- 1:05:10इनको व्यूस चाहिए। यह तुम्हारे अज्ञान से खिलवाड़ कर
- 1:05:16सकते हैं। बड़ी मौत से और खुद यह पहुंचे
- 1:05:23नहीं। क्यों ये पांच इनाम देना?
- 1:05:29ये राम राम का नाम देना ये राधे राधे करना यह किस तरफ इंकित करता
- 1:05:35है? तुम खुद ही समचार ज़रा सोच के
- 1:05:38देखो जो आनंद में मगन हो जाएगा। वह मून का स्वाद चखेगा या राधा
- 1:05:49राधा के बोलने का स्वाद चखेगा जो आनंद में उतर गया है वह पांच नमो
- 1:05:55का स्मरण करेगा या स्वय के स्मरण में डूबकर अपने आनंद के भीतर ठंडी
- 1:06:04हवाओं के। उस मीठेपन का आनंद लेगा उसके लिए
- 1:06:11तुम्हारे राधे राधे और पांच नाम और दो नाम और 1000 नाम सब तित्त
- 1:06:18हैं। तित्त कर एक हमारे भीतर परमस्वाद
- 1:06:24भी है। तुम्हारे बाहर के स्वादों को
- 1:06:28छोड़कर पर्व स्वाद हमारे भीतर है। वह किसी इन्द्रिय से नहीं लिया
- 1:06:33जाता, इसलिए उसको कहते हैं इन्द्रयातीत तुम ये शब्द सभी
- 1:06:39शास्त्र में पाओगे, कृष्ण की गीता में भी है, उपनिषद में भी है।
- 1:06:44सभी शास्त्रों में इन्द्रियां तीर्थ शब्द पाओगे, इन्द्रियों से
- 1:06:48परे फिर जब वह इन्द्रियों से लिया ही नहीं जाता तो तुम इन्द्रियों
- 1:06:53से उसे भोगने की चेष्टा क्यों करते हो?
- 1:06:56तुम क्यों नहीं वहाँ निकल जाते? जहाँ इन्द्रियां दूर छिटक जाती
- 1:07:03हैं? जहाँ तुम रह जाते हो तुम और जहाँ
- 1:07:10तुम रह जाते हो वो फिर वो शराब आ गए ये जो कृष्ण जो बात करते हैं
- 1:07:17ना सोमरस की, ये तो वाकई तुम्हारे ठेके की शराब की बात करते हैं।
- 1:07:23और इसको किए बिना तुम इसको छोड़ भी न पाओगे।
- 1:07:27ये भी ख्याल रखना बड़े समझदार है। कृष्ण कृष्ण खुद भोगते हैं और
- 1:07:34इतना भोगते हैं। अब देख लो कृष्ण कितना भोगते हैं।
- 1:07:41कृष्ण इतना कुछ सुख बोते हैं सब तुम उसका मुकाबला नहीं कर सकते।
- 1:07:5416,108 राणियों के सब के 1010 बच्चे रुक्मणी के 11 बच्चे।
- 1:08:03एक बेटी हुई थी चारुमती है इतना भगवान है राजा है तुमने देखा
- 1:08:15तुमने देखा राजा का खाते पीता है तुम्हें नहीं पता राजाओं को पता
- 1:08:20है। कि तुम्हें वो दूसरों की नजर से
- 1:08:26कैमरे के अंदर जरूर दिखा देते हैं कि देखो हमारे साहब ने ये शराब
- 1:08:33छोड़ दी, लेकिन तुम्हें पता नहीं होता उन्हें शराब पीनी पड़ती है।
- 1:08:40बंद कमरे में जहाँ तुम्हारे कैमरे नहीं आते और जहाँ तुम्हारे कैमरे
- 1:08:44जाते भी हैं तो उनकी फोटो बाहर नहीं आती, इतनी पड़ती है भाई क्या
- 1:08:49करें? मजबूरी है लेकिन वो भी बड़े
- 1:08:55समझदार हैं। उन्हें पता है कि अगर इन्हें पता
- 1:08:58लग गया भक्तों। के शराब पीता है तो फिर नक्शा बदल
- 1:09:03जाएगा, नक्शा बदल जाएगा तो सारा सूत्र जो दिया था वो बेडंगा हो
- 1:09:11जाएगा। सब समझते हैं समझ आ जाती है।
- 1:09:19हमारी पंजाबी में एक कहावत है, उसे समझ जाना सारी बात है, जिद
- 1:09:25करे दाने उदय कमले भी स्याने जीसको कुर्सी का मिल गया।
- 1:09:37वह धीरे धीरे स्याना हो ही जाता है।
- 1:09:40उसको सारे ट्रैक्टर समझ में आ जाते हैं।
- 1:09:42इसी को कहते हैं अनुभव अनुभवहीन व्यक्ति न्याय होता है, पहले
- 1:09:52अनुभव करेगा, अनुभव करेगा, गलतियाँ भी करेगा।
- 1:09:59वह गलतियाँ जो पहला राजा कर चुका है वह फिर से करेगा और फिर कहीं
- 1:10:06जाके परफेक्ट होगा, लेकिन जो पहले वाला राजा है, वह तो गलतियाँ कर
- 1:10:12कर के बड़ी पको हो चुका है। इसलिए मैं कहता हूँ अगर राजा
- 1:10:18पुराना हो जाए तो उसने खाखू लिया जो कुछ खाना फिर अगर वो जागती करे
- 1:10:26तो उसको पटक दो, नीचे कि नहीं ज्यादा लालच नहीं चलेगा इतना काफी
- 1:10:31हो गया और अगर वो उसको छोड़ दे तो उसको बना के रखो।
- 1:10:38छोटा सा सिद्धांत है, मैंने उदाहरण दिया था 250 करोड़ खा लिया
- 1:10:44उसने वो कहता है जी मैं तो दाग गया, अब जीसको लेके आओगे वो पहले
- 1:10:51अपना घर भरेगा, फिर आपके लिए काम करेगा, इससे अच्छा तुम मज़े ही रख
- 1:10:55लो। तो ये जो शराब की बात कृष्ण करते
- 1:11:00है ये उस शराब की बात नहीं करते है।
- 1:11:04उस शराब की भी बात करेंगे, लेकिन इस सूत्र में उस शराब की बात नहीं
- 1:11:09है। इस सूत्र में सोमरस गया है
- 1:11:12उन्होंने। तीनों वेदों ने जो कहे सह काम,
- 1:11:17कर्म और उन सह काम कर्म में अनुष्ठान वगैरह।
- 1:11:21यज्ञादि अनुष्ठान करने से इन्द्र से जो मानते हो तुम शर्क के सुख
- 1:11:30भगवान कृष्ण कहते हैं, वो मैं देता हूँ।
- 1:11:37और वह तुम होम करते हो तह विद्या मान सोमैया सोम को पीने वाला,
- 1:11:49शराब को पीने वाला। तुम तो शराब को पाप मानते हो,
- 1:11:55हमने कहा कि भगवान कृष्ण का कोई शरूप ये लो चलो बोलो उद पापा यज्ञ
- 1:12:02रेष्ट्रा सरगंती राथ्यनते। देव पुण्य साम्राज्य सरेंद्र लोक
- 1:12:12अस्वृत्ति देव्यांद भी देव भगवान देवता जो भोग लगाते हैं देवलोक
- 1:12:22में जो भोग हैं उनको भोगता है कौन?
- 1:12:28जो व्यक्ति सों का पान करके, शराब को पीकर यज्ञाती आहुतियों को देकर
- 1:12:44सब कर्मकांड करता है। वह पुण्य लोक में जाकर सूखों को
- 1:12:53भोगता है। लेकिन ध्यान रखना सुख शब्द कहाँ
- 1:12:57है? यहाँ भगवान कृष्ण कृष्ण बड़े
- 1:13:01समझदार हैं, एक भी शब्द उनका इधर उधर नहीं होता।
- 1:13:10पुलिया पी शराब ते खाकबाब हेट बाल हड्डा दी आग क्या खुलासा करोगे आप
- 1:13:22संतों का कहाँ से बोलते हैं? किस तरह फिर सारा होता है बुलिया
- 1:13:30पी शराब दिखा कबाब हेट बाल आग दी, ठग आग हेट बाल अड्डा दी अग।
- 1:13:44बोल्या पनकर रबदा बोल्या, पनकर रबदा ऐस ठगादे ठगनू ठग पी शराब
- 1:14:01दिखा कबाब। हेठ वार हड्डा दे आग फेर पन कर
- 1:14:09रब्दा ऐसे ठगा दे ठगनू ठग क्या मतलब निकालोगे?
- 1:14:19इसका बड़े उलटे उलटे शब्द है बड़े प्यारे।
- 1:14:25और ये शब्द तुम्हें जीस मुक्ति की चाहत तुम पाले हो और तुम्हें आईना
- 1:14:33दिखाएं दे धन्यवाद।