Latest / Baba ji Vijay Vats / 7 Dec 25 - अष्टावक्र गीता के वो रहस्य, जो जीवन बदल दें! इच्छाओं को छोड़ दो—और देखो क्या होता है! Baba Ji Vijay Vats Satsang
Transcript
- 0:23अष्टावक्र गीता का एक शब्द है प्रिया।
- 0:30यदि तू मुझे चाहता है तो विषयों को विश्व के।
- 0:40समान छोड़ दे। हे प्रिय, यदि तू मुझे चाहता है
- 0:48तो विषयों को विष के समान छोड़ दे।
- 0:53इसका अर्थ क्या है बाबा भारतवंशी? आइए इन शब्दों की गहराई में चले
- 1:09हे प्रिय, यदि तुम मुझे चाहता है मैं कौन हूँ।
- 1:18यदि तुम मुझे चाहता है मैं कौन हूँ बिन पग चले सुने बिन काना कर
- 1:40बिन कर्म करें विधि नाना मैं कौन हूँ?
- 1:49जिसे शब्दों में समझाया नहीं जा सकता और जिसे समझा नहीं जा सकता
- 1:56वो मैं हूँ, ये प्रिय यदि तू मुझे प्राप्त करना चाहता है।
- 2:07गहरे से गहरे शब्द हैं। अगर आप इस एक श्लोक को भी समझ
- 2:13लोगे तो बाकी सारे शास्त्रों को गंगा में बहा देना कोई आवश्यकता
- 2:22नहीं। इन शब्दों की इतनी गहराई में उतर
- 2:29जाओ के रसातल तक पहुँच जाओ, तो तुम्हें समझा जाएगा कि मैं कौन।
- 2:44ऐसा क्यों बोलते हैं संत? क्योंकि वह सीधे सीधे समझाया नहीं
- 2:50जा सकता कानों के बिना सुनता है, आँखों के बिना देखता है।
- 3:06हाथों के बिना काम करता है, पांव के बिना चलता है, ऐसा ही समझाया
- 3:16जा सकता है। नेगेटिविटी के हिसाब से
- 3:22पाजिटिविटी के हिसाब से वो समझाया नहीं जा सकता।
- 3:27वह आनंद है, वह सुरूर है, वह प्रेम है, वह खुमारी है, समझाया
- 3:35तो ऐसे भी जा सकता है दो ढंग हैं समझने की, लेकिन तुम वैसे समझते
- 3:45नहीं। वैसे तो तुम लोग खा जाओगे, समझाने
- 3:56की ये व्यवस्था ज्यादा बढ़िया है कानों के बिना सुनता पांव के बिना
- 4:05चलता हाथों के बिना काम करता। मैं वो हूँ ध्यान से समझना एक एक
- 4:23बात को तो तुम्हें दूसरा प्रवचन सुनने की आवश्यकता नहीं है।
- 4:30काश तुमने मुझे एक बार की सुन लिया होता तो तुम किसी को भी
- 4:39सुनना बंद कर देते, सुनने की जरूरत नहीं रह जाती, तुम आज भी
- 4:44सुने जा रहे हो। इसका अर्थ साफ सुथरा है।
- 4:51कि तुम उस स्तर पर गए हैं जो बिना आँखों के देखता बिना कानों की
- 5:00क्षमता बिना जीवा के बोलता हूँ रसास्वादन करता हूँ।
- 5:08बिना हाथों के कर्म करता है, जो अकारण सुखी है, जो किसी कारण से
- 5:20सुखी नहीं धनपति सुखी है। धन के कारण।
- 5:28प्राइम मिनिस्टर सुखी है। गद्दी के कारण मान सम्मान को
- 5:34चाहने वाला सुखी है। मान सम्मान के कारण वह उसे प्यारा
- 5:45लगता है। तुलसीदास ने शब्द कहा है कामि नार
- 5:58प्यार जिम जैसे कामि को स्त्री या पुरुष प्यारा लगता है कामि नार
- 6:06प्यार जिम, लोभ ही अप्रिय जिम दाम।
- 6:11लोग भी व्यक्ति को जैसे पैसा अच्छा लगता है।
- 6:14धन, दौलत, सोना, चांदी हिरज्वारा, तेही रघुनाथ निरंतर प्रिय लाभ
- 6:22मधेराम हे प्रभु बिल्कुल इसी तरह तुम मुझे अकारण ही प्रिय लगो।
- 6:31जैसे कामी को स्त्री या पुरुष प्यारा करता है, लोभी को धन,
- 6:39हीरे, जोहरा, सोना, चांदी प्यारा होता है।
- 6:42हे प्रभु राम तुम मुझे ऐसे ही अकारण अच्छे लो।
- 6:47बड़ा प्यारा शब्द है। अगर गहराई में जाए वह कौन है वह
- 6:59जो अकारण सुखी वह कौन है, जो किसी कारण से सुखी नहीं है?
- 7:07क्योंकि जो कारण से सुखी होगा, वह तो कारण के छीन जाने से दुखी हो
- 7:12जाएगा। प्राइम मिनिस्टर की गद्दी चली
- 7:16जाए, दुखी हो जाएगा क्योंकि गद्दी के कारण वो सुखी था और गद्दी के
- 7:20कारण सुखी है तो गद्दी को बचाने की चेष्टा करेगा।
- 7:27मर बैठेगा, गति को नहीं जाने देगा, ऐसे ही धनपति है दंड के
- 7:35कारण सुखी हैं, धन को कमाएगा। जैसे तैसे कमाएगा पापा वाज न होवे
- 7:44कट्ठी मोय असंग न जावे, इकट्ठी करेगा और फिर चौकीदारी करेगा
- 7:53संभालेगा उसको, क्योंकि उसमें उसकी जान।
- 8:04अकारण सुखी नहीं है वो, वह किसी कारण से सुखी है।
- 8:09धनपति धन के कारण सूखे गद्दी नशीं गद्दी के कारण सूखे।
- 8:21काम ही भोग के कारण सुखी जीसको रस से प्यारा फिर ऐसा आस्वाद से सुखी
- 8:36लेकिन तुम किसी कारण से सुखी हो तो मैं कौन हूँ ही प्रिय?
- 8:42यदि तू मुझे पाना चाहता है तो मैं कौन जो किसी कारण से सुखी हूँ, जो
- 8:53अकारण सुखी हूँ, वह मैं हूँ, कोई कारण नहीं मेरे सुखी होने का।
- 9:02लेकिन मैं सुखी हूँ और तुम 1000 तरह के कारण पैदा कर लेते हो,
- 9:07लेकिन तुम सुखी नहीं होती। देखिए आईएस की यूपीएससी की आईपीएस
- 9:15की कितने बच्चे तैयारी कर रहे हैं?
- 9:18भीतर क्या है अचेतन में? कल को सुखी हो जाएंगे कोई चाहता
- 9:28है मैं सेवा करूँगा देश की कोई चाहता मैं लूटूंगा देश को, लेकिन
- 9:33किसी कारण से सुखी होना चाहती हूँ।
- 9:40किसी भावना के वश में ओतप्रोत होकर वह सुखी होना चाहती हूँ।
- 9:45लेकिन अष्टावक्र यह बात नहीं कहते।
- 9:47अष्टावक्र कहते मैं अकारण सुखी हूँ।
- 9:53हे प्रिय, यदि तुम मुझे पाना चाहते हो, मैं कौन हूँ जो अकारण
- 9:58सुखी हूँ? मैं किसी कारण से सुखी नहीं,
- 10:06क्योंकि अगर जीस कारण से मैं सुखी हूँ वह कारण के खत्म होने पे मेरा
- 10:11सुख भी समाप्त हो जाएगा इसलिए मेरा सुख कभी समाप्त नहीं होता।
- 10:16मेरी अखंड धारा आनंद की कभी कम नहीं होती।
- 10:21कभी समाप्त नहीं होती। मैं सदा सुखी हूँ और बिना कारण के
- 10:26सुखी हूँ तो विषयों को विष के समान छोड़ दो।
- 10:33अगर तुम ये शब्द समझ गए न। और काश तुम ये समझ जाओ तो तुम
- 10:46मुझे भी सुनना, तुम किसी को भी न सुनोगे अगर तुम्हें ये बात समझा
- 10:58गई। यूं तो अष्टवकर गीता फिर बहुत
- 11:04बोले लेकिन वो मूव अज्ञानी और विश्व को अगर खतरा है तो इन लोगों
- 11:19से खतरा है। आचार्य प्रशांत जैसे रोगोज जिनके
- 11:26पास वेकेलब्री हो, अनुभव शून्यएं सद्गुरु जैसे अनुभव जिनके पास
- 11:40अनुभव है ही नहीं। कुछ भी कह देते हैं आदि।
- 11:45योगी वकरा अनुभव के नाम पे कुछ भी एक स्टोरी की मूर्ति है कितने टन
- 11:55की है? ये सभी गडबड घटाले चलते रहेंगे जब
- 12:01तक तुम ना समझोगे छः प्रिय यदि तुम मुझे पाना चाहता है, मैं कौन?
- 12:16इस एक श्लोक में? सारे आनंद के सुन्दर समाचार के
- 12:28सभी वृक्षों को लेखनी बना लिया जाए सारे सुन्दरों को।
- 12:38शाही बना लिया जाए। असत गिरि शमम स्यात के जन्म सिंधु
- 12:42पात्र सुरतर्वर शाखा लेखनी पत्र मुरबे लिखती अधिग्रहीत व शारदा
- 12:49सर्वकालम तदपितव गुणा नमीशपारव ने धरती को का कुछ बना लिया जाए।
- 12:57और तेरी महिमा लिखनी शुरू हो जाएगी तदपी तब गुणाना में
- 13:01शुभारम्भ न याद थी, फिर भी तुम्हारे गुणों की व्याख्या नहीं
- 13:05हो सकती। प्रभु तुम अव्यक्ष है और है।
- 13:16जो लोग कहते हैं वह व्याख्याय हो सकता है, उनके दिमाग का इलाज होना
- 13:22चाहिए। दे शुड बी ट्रीटेड मेंटली या तो
- 13:29अहंकार ही हैं या उनका मस्तिष्क गड़बड़ा गया है, दोनों में कोई
- 13:35बात है। उनके भीतर से कोई रसधार बहतीन और
- 13:43मानवता को सबसे बड़ा खतरा जिन्हें तुम अपना हितैषी समेत हो।
- 13:51जिन्हें तुम पर बुद्धिमान समते हो।
- 13:54सबसे बड़ा खतरा वही जो जानते खुशी शब्दों की व्याख्या की अतिरिक्त
- 14:06और ध्यान रखना। रोटी रोटी कहने से भूख तो मिटकते
- 14:13नहीं पानी पानी कहने से प्यास तो बुझत नहीं, रोटी रोटी कहते रहो
- 14:25किसी की भूख मिट्टी आज तक। रेगिस्तान में तुम पसीना खुशी,
- 14:36दोपहर का वक्त सूर्य प्राकाष्ठ पे आग बिखेर रहा है, तुम चले जा रहे
- 14:44हो प्यास लगी। उस पानी की कीमत क्या है?
- 14:51पानी की कीमत का पता तुम तब चलता है जब तुम रेगिस्तान की भरी गर्मी
- 14:56के अंदर हो दोपहरी के वक्त तब तुम सूरज के तले चलते हो और तुम्हें
- 15:02प्यास लगती है तुम्हारा रोवा रोवा कहता है पानी।
- 15:07वहाँ एच टू वो काम नहीं करेगा, वहाँ पानी पानी का जाप नहीं काम
- 15:12करेगा। कितनी ही मालचपलों राधे राधे
- 15:16बिल्कुल नहीं चलेगा। इन मूर्खों को जेल में डाल देना
- 15:25चाहिए। इनको रेगिस्तान में छोड़ देना
- 15:31चाहिए। तप जमीन के ऊपर छोड़ देना चाहिए
- 15:36भरी दुपहरी गंदा है बिना जूतों के।
- 15:45फिर ये पानी ये कहेंगे पानी तुमको बिल्कुल मिल जाएगा, यह रमाला कहो
- 15:55पानी पानी पानी मिल जाएगा, प्यास बूझ जाएगी।
- 16:04फिर भी इनमें सुधार नहीं होगा। मर जाए क्योंकि ये मूडता इतनी
- 16:11गहराई तक उतर गई है। ये हटाई से हटती।
- 16:26अगर समाज को सभ्य समाज को कोई विकृत कर रहा है या कोई मार रहा
- 16:38है वो ऐसे ही लोग जो गीता की अष्टावक्रिकता की उपनिश्चितों की
- 16:44व्याख्या करें। एक बूंद पानी के स्वाद का इन्हें
- 16:50पता नहीं और चले हैं। समुद्र की व्याख्या का हमारा
- 17:03दुर्भाग्य है। ऐसे रोग पैदा हो गए।
- 17:10यहाँ संत कबीर तो कभी कभी होते हैं यहाँ रैदास तो कभी कभी होते
- 17:18हैं यहाँ नानक के गले से संगीत तो कभी कभी बरसता है यहाँ मीरा के
- 17:28झाँझर से। गंगरू कभी कभी छनकती है यहाँ कभी
- 17:35कभी कृष्ण के श्लोकों का उवाज होता है, अन्यथा ये बुद्धों ने ही
- 17:42डेरा जला रखा है। इन्होंने परेशान कर दिया।
- 17:49तुम्हें जीना हराम कर दिया तुम्हें आज तुम शब्दों में उलझ के
- 17:54रह गए काश इतना आसान न होता पानी पानी कहने से प्यास रोटी रोटी
- 18:06कहने से बोख। मिट जाती है, फिर कौन काम करता
- 18:12मूर्खों कोई सुबह से शाम तक पल्लेदारी करता।
- 18:17क्या अगर शब्दों को दोहराने से भूख मिट जाती है तो फिर तुम काम
- 18:28क्यों करते हो? क्यों दुकान खोलते हो?
- 18:32जो चाहिए उसका गुणगान करना शुरू कर दो वस्त्र चाहिए हो कपडा कपडा
- 18:37कपडा भूख लगी है रोटी रोटी प्यास लगी है पानी पानी कब टूटेगी
- 18:53तुम्हारी ये मूड मानसिकता? और तुम हो तुम इन लोगों को हृदय
- 19:04में भीतर तक उतारे हो। कोई करे भी तो क्या करे?
- 19:13तुम्हारी मूडताओं के आगे संत निर्भर हो जाता है यदि तू मुझे
- 19:25चाहता है मैं कौन हूँ जो बिना किसी कारण के प्रश्न हो।
- 19:38तो विषयों को विष के समान त्याग दे बचपन की बात है।
- 19:49मेरे पिताजी मुझे कहानी सुना रहे थे अपने ही शहर की कहते यहाँ एक
- 19:55सेठ था घमंडी लाल। उसके चार पुत्र थे।
- 20:05मेरे जाम से पहले की बात होगी, पिताजी के काल की बात होगी, मैं
- 20:14बड़े प्रेम से सुन रहा था। पिताजी कभी कभी बोलते थे, लेकिन
- 20:20पूरा तोरते थे कहते वह गमंडी लाल, इतना शानदार मनेजमेंट था उसका।
- 20:37जब वह बच्चों को पुकारता है, चारों में से किसी एक का नाम जीता
- 20:43है। सत्यनारायण तो बस इतना ही नाम
- 20:51सुनते चारों खड़े हो जाते थे। हाँ पिता जी।
- 21:03पिताजी मुझे कहने लगे आप कुछ समझें इस बात से पुत्र मैंने कहा
- 21:13क्या समझी बेटा? पिताजी आपने कहा वो बड़े
- 21:22आज्ञाकारी थे, इसका मतलब यही बनेगा।
- 21:28हाँ वो बड़े डरते थे उससे। गमडी लाल एक बार कहते थे, ये
- 21:36हमारे हमारे शहर की कहानी और सच्ची कहानी और सच्ची कहानी है।
- 21:42पिताजी मुझे सुना रहे थे ये सच्ची बात है।
- 21:51एक बार आके कहलता सत्यनारायण तो चारों उठते हाँ बेटा तुमने क्या
- 22:02सबक सीखा है सर? मैंने कहा पिताजी अगर मेरे पास से
- 22:07रिवॉल्वर होता तो मैं उसको गोली मार देता।
- 22:14हैं। हाँ ऐसे उल्लू के पुट्ठों का लेना
- 22:19क्या ऐसे लोगों को बाप बनने की कब लिए थी?
- 22:28अरे भैंसे कभी पिता हुआ जा सकता है, प्रेम, प्रेम परम पिता
- 22:38परमात्मा को हम इसलिए पूजते हैं, सब उसके बच्चे हैं क्यों?
- 22:43क्योंकि वो सबसे प्रेम करता है, किसी से दुश्मनी नहीं करता।
- 22:50एक को बुलाई तो एक को उठना चाहिए। सत्यनारायण को बुलाए तो
- 22:54सत्यनारायण को उठना चाहिए। ये चारों क्यों उठे?
- 22:58ये बड़ा डरते हैं। सपने में भी अपने बाप की छाया से
- 23:02डरते हैं तो पिताजी कहने लगे कि तुमने क्या शिक्षा ली बेटा?
- 23:06मैंने कमीने की शिक्षा ली, अगर मेरे पास से रिवॉल्वर होता न
- 23:10पिताजी, तो मैं उसको गोली मार देता।
- 23:17पिताजी एकदम से खेले अरे पुत्र तू तो क्रांतिकारी बनेगा।
- 23:24मैंने कहा पिताजी मुझे तो नहीं पता मैं क्या बताऊँ?
- 23:28लेकिन मुझे ये जरूर पता है कि अगर घमंडी लाल सत्यनारायण को बुलाये
- 23:33तो सत्यनारायण ही उठे। इतना खौफ नहीं होना चाहिए पिता
- 23:39का, बच्चों के मन में। यह है खौफ फिर जनम क्यों दिया
- 23:50बच्चों को, तुम बच्चों के हाथों में तो है नहीं जनम लेना सारी
- 23:55प्रोसेसर तो मैंने की बच्चों की कोई आजादी नहीं जनम लेने के लिए
- 24:03सारा काम तो मरा। हो तो बस तुम्हारी उत्पत्ति उन
- 24:11विचारों के तो गले में ढोलक डाल दिया, अब वो ढोलक डाल दिया तो
- 24:15बजाना पड़ेगा। इसी तरह धो लेते हैं जिंदगी को
- 24:20आशा के सहारे। लेकिन ये कोई ज़िन्दगी है, किसी
- 24:28के पास रोटी नहीं है, किसी के पास मकान नहीं है, किसी के पास वस्त्र
- 24:34नहीं है, किसी के पास पीने को पानी नहीं है, ये तुमने इस सृष्टि
- 24:46का हाल क्या कर रखा है? और ऊपर से ऐसे तानाशाही होता।
- 25:01पिताजी थोड़ा घबराए, पिताजी कहते तो बेटा क्रांतिकारी बनेगा।
- 25:06मैंने कहा पिताजी मैं जो भी बनूँगा वो तो वक्त बताएगा लेकिन
- 25:12एक बात साफ है। लेकिन अगर मैं घमंडी लाल का बेटा
- 25:16होता, मैं हूँ कन्हैया लाल का घमंडी लाल का बेटा मैं होता तो
- 25:21मैं उसको उड़ा देता। बड़ी शीतल स्व आप कहते पिताजी
- 25:30कहते नहीं इतनी गर्मी नहीं खानी चाहिए पुत्र मैं समझ गया
- 25:36तुम्हारा। इरादाक रहे, तुम स्वतंत्र रहना
- 25:42चाहते हो। मैंने कहा स्वतंत्र ही तो पैदा
- 25:44किया। परमात्मा में कोई किसी के अधीन
- 25:48रहे, यह तो शास्त्र नहीं होता, यह परमात्मा का शास्त्र नहीं होता।
- 25:56परमात्मा ने हर चीज़ को आजाद बनाया और घमंडी लाल अपने बच्चों
- 26:02का मालिक कैसे हो गया? घमंडी लाल के द्वारा ये बच्चे तो
- 26:07आए लेकिन वह तो अपना शोक फरमा रहा था, पिताजी।
- 26:15पहली दफ़े पिताजी को मेरे सामने गर्त नीचे करना पड़ेगा।
- 26:23पिता कहते तुम सत्य बोले हो बेटा मेरे भी पांच पुत्र हैं।
- 26:32एक पुत्र मेरा स्वर्गवास हो गया। छे भाई से 14 महीने का था वो सुर
- 26:39वासो राम नारायण उसका नाथ सबसे बड़ा सॉन्ग पिता है कर जिसकी
- 26:54परछाई को देख कर तुम डर जाओ। पिता तो वो होता है अगर सपने में
- 26:59भी आ जाए तो तुम्हारा अंत उसका रोम रोम खिल जाये प्रेम से तुम
- 27:08उसको आगोश में ले के छिप के जाओ और रोने लग जाओ अपनी व्यथा को उसे
- 27:13बताओ उससे व्यतीत होने। और उसको देख कर व्यथा के मिट जाने
- 27:21में तो जमीन आसमान का वर्क है, ये तो घमंडीलाल अपने बच्चों को ही
- 27:26दुखी कर रहा है। बहुत से माता पिता ने बच्चों को
- 27:38मेरी वीडियो देखने से मना कर रखा है।
- 27:43लेकिन बच्चे कहते हैं हम कहाँ रुकने वाले हैं, जो हमारे हृदय को
- 27:51चीर कर हमारे अंतस्व में उतर जाती है, हम चोरी छुपेरे सुन लेते हैं।
- 28:00कब तक रोकेंगे? मैंने कहा मैं दुश्मन नहीं बनाना
- 28:04चाहता पिता को मैं पिता के भीतर से ये गंदगी निकाल लेता हूँ कि
- 28:13बच्चा तुम्हारी मलकियत है। हम तो आज सब कुछ चीजों को मलके ही
- 28:18समझ लेते हैं जीसको हम गद्दी पर बिठा देते हैं।
- 28:21वह होता तो मनेजमेंट के लिए बैठाया और बन जाता है।
- 28:24मालिक चीजों को बेचना शुरू कर देता है, देश को बेचना शुरू कर
- 28:28देता है। किसने कहा था भाई, संविधान के
- 28:32किस? आईपीएस की धारा के कौन सी खंड में
- 28:38लिखा है? कौन सी क्लास में लिखा है ये
- 28:40बताओ, एक झगड़ा भी नहीं बेच सकता मैनेजर पर यहाँ तो सब कुछ धड़ाधड़
- 28:52बिक रहा है। वैसे तो मोड़ भी हैं ये लोग।
- 28:58तानाशाह होने के साथ साथ ये लोग मूड भी मूड क्यों?
- 29:02क्योंकि इन्हें पता ही नहीं असली सूख कहाँ असली स्वाद कहाँ
- 29:08पष्टावक्रक बताते हैं असली स्वादकण ही प्रिय यदि तो मुझे
- 29:14पाना चाहता है। अगर तो तू भ्रम में है सोना, हीरे
- 29:21चौहरात मोती माणी कवणियां तू पालेगा और तू सुखी हो जाएगा तो
- 29:26फिर तू आजमाले ये भी मेरा ही बनाया हुआ है।
- 29:33लेकिन फिर आखिर में जब तुम्हें मिले कहानी तो तू भोंक भोंक के
- 29:37मेरे ही द्वार पर आ जा रख तो ये आखिरी शब्द हैं जनक को बोले हुए
- 29:43जनक बड़े तृप्त व्यक्ति हैं संसार की तरफ से।
- 29:51जन कष्टावक्र के पांव में पकड़ लिया।
- 29:55अष्टावक्र कहते हैं, राजन तो और भाव थोड़ा सा और भोगले और वह
- 30:02कंपता है, थर थराता है नहीं, प्रभु नहीं भोगलिया इनमें नहीं है
- 30:07कुछ तू देख ले। देख लिया आपने मुझे तो तुम जीस
- 30:19आनंद में खोये हो जीस खुमारी में तुम चहक रहे हो मुझे वो आनंद
- 30:25चाहिए। बस न बोलते हैं अष्टावकरी शब्द हे
- 30:35प्रिया यदि तू मुझे चाहता है अष्टावकरी तो खुद को जानते हैं वो
- 30:40कौन अष्टावकर ये भी जानते हैं कि मैं कौन हूँ और अष्टावकर ये भी
- 30:50जानते हैं कि जनक भी वही है जो मैं हूँ।
- 30:55तब तो और मत ही फिर तुम भी वो ही मैं भी वो ही।
- 31:14तो विषयों को विश के समान त्याग दे।
- 31:18इसका अर्थ अगर तुम सच से गहरे में ले गए, तो तुम्हें कोई और शास्त्र
- 31:26पठन की आवश्यकता नहीं। तुम्हें किसी और संत को सुनने की
- 31:30जरूरत नहीं। तुम मुझे भी सुनना बंद कर देना
- 31:34फिर क्या आवश्यकता है? अगर तुम सही से समझ गए इस कार को
- 31:42एक शरूप इसलिए कृष्ण की गीता को कहा गया किता।
- 31:50अष्टावक्र की गीता को कहा गया महा गीता कृष्ण की गीता तुम्हें
- 32:04पहुंचा देगी उसी तल पर लेकिन थोड़ा सा घूम घाम के आएगी
- 32:10अष्टावक्र की गीता घूम घाम के नहीं आएगी शॉर्टकट जम्प।
- 32:19एंड फाइन कुदोह और पर हे प्रिया यदि तू मुझे पाना चाहता है, मैं
- 32:31कौन हूँ जो बिना किसी कारण के सुखी?
- 32:36बार बार समझा रहा हूँ ताकि तुम समझ जाओ जो बिना किसी कारण के
- 32:42सुखी हूँ, वो मैं हूँ, कोई कारण नहीं हूँ अन्यथा उस कारण को खींच
- 32:47के लाया जाए तो मैं दुखी हो जाऊंगा।
- 32:58लोग मुझे कह देते हैं बाबा आज तुम्हारी असलियत सामने आएगी।
- 33:06आपने दूसरा चैनल राजनीति का शुरू कर दिया, फिर फिर तुम पद भी पाना
- 33:13चाहते हो और सुखी होना चाहते हो? मैंने कहा नहीं।
- 33:18जीस पथवी के कारण आप सुखी होना चाहते हो या जीस पथवी के ऊपर बैठे
- 33:24हुए व्यक्तियों को तुम सुखी समते हो वह वास्तव में सुखी कांड तुम
- 33:30ज़रा पूछो तो ईमानदारी से बोलो तुम सुखी हो रुकेंगे।
- 33:36अभी मिला नहीं सुख इसीलिए तो ठूठा उठा के तुमसे वोट मांग रही हैं
- 33:41सुख मिल गया होता कोई कोने में बारहण से पड़े होते हैं।
- 33:52जद पाले आपे। कलंदर दा बुहा खुल गया अपने अंदर
- 34:07दा सुखवासी हाँ। उसम।
- 34:13अंदर दा। जितनी चढ़ दी है, है ना लें दी
- 34:24है। जब पाल या बेद पलंतर था वह खुल
- 34:29गया अपने अंदर दा। सुख व सिंह उस मंत्र का जीतते जड़
- 34:34दी है ना लेंगी? फिर जरूरत क्या है?
- 34:38इन गद्दियों की मानसन्वानों की इन छठ प्रकार के अस्वादनों की
- 34:45स्वादों की क्या जांच? जब स्वादों का परम रस रसों का परम
- 34:53रस मिल गया, तुम्हें उसके बाद किसी और रस को पाने की जरूरत नहीं
- 35:03रह जाती। छट के छत रस छी के छी रस।
- 35:09इस में आ जाते हैं। इस लिए उपनिषद में कहा गया
- 35:13रसोवश्य रहा मैं रस्स रूप आइए इस शब्द के अगले पहरे का मतलब है ये
- 35:29प्रिय यौदि तो मुझे पाना चाहता है तो।
- 35:33विषयों को विश के समान त्याग दे यहूदियों की प्राणी ओल्ड
- 35:40टेस्टमेंट में लिखा है, मैं परमात्मा हूँ, मैं बड़ा खूंखार
- 35:47मैं जालु हूँ, मैं तुम्हारी रगों को।
- 35:52खींच लूँगा, तुम्हारी बूटियों को नोच लूँगा, मैं तुम्हें ऐसा दंडित
- 35:58करूँगा कि तुम कहीं के भी न रहोगे, तुम मरने की भीख मांगोगे,
- 36:06मैं तुम्हारे रोम रोम को थर्रा दूंगा, मैं परमात्मा हूँ।
- 36:12ओल्ड टेस्टमेंट एक हिसाब से ईडर ने अच्छा ही किया, क्योंकि ऐसे
- 36:21परमात्मा को मानने वाले उसके बच्चे कैसे क्रूर होंगे?
- 36:26और इजराइल वो देश है। हम सभी इंटरनल को गलत कहते हैं,
- 36:36लेकिन एक पक्ष में आकर वो गलत नहीं है।
- 36:41वो बिल्कुल ठीक है। वो कहती हैं इनका नामो निशान मटा।
- 36:45दो। उनकी पुरानी बाइबल।
- 36:50नहीं भाई, बिल्कुल बड़ा प्रेम का बात सखाती है ईसा तो प्यार के
- 36:55प्रेम के पैगंबर है, बिल्कुल ओलठ लेकिन ये होतियों के ओल्ड टेस्ट
- 37:04हमें कहती है मैं मैडम जली हूँ बड़ा क्रोर निर्दयी।
- 37:10तुम्हें न चलूँगा तुम्हें भक्ष लूँगा, मुझ से डरो, यह परमात्मा
- 37:16नहीं हो सकता तो हिटलर ने ठीक ही किया।
- 37:23इसके अंशों को ही उजाड़ो यह बात सोचने और कहने वाला कोई बचे ही
- 37:29ना? एक हिसाब से बड़े उत्साह का काम
- 37:33किया। उन्होंने बड़ा हौसले का काम किया।
- 37:36उन्होंने ऐसी पनेरी को ही ध्वस्त कर दो, जिसका परमात्मा डर दिखाता
- 37:45है। लेकिन उसी की आगे की पीढ़ी लव इस
- 37:59गोट इसे कहते हैं लव इस गोट मैं प्रेम का सागर हूँ।
- 38:13तुम प्यार का सागर है, तुम प्यार का सागर है।
- 38:28तेरे पिक बूंद के प्यार से हम तो प्यार का सागर है।
- 38:44होता जो दिया तुने लौटा जो दिया। तुने?
- 38:55चले जा लेंगे जहाँ से हम। लौटा जो दिया तुमने चले जाएंगे
- 39:12जहाँ से हम तो प्यार का सागर। वह प्रेम का समुद्र है, यहूदियों
- 39:31का परमात्मा बड़ा खूंखार, इसलिए यहूदी बड़े, खूंखार जैसा तुम्हारा
- 39:38परमात्मा होगा, वैसे ही तुम होगे। इसे एक कैरेक्टर ही समझ लो, बड़ा
- 39:55आनंद में हूँ, बड़ा आनंद में हूँ और मैं चाहता हूँ कि तुम भी इसी
- 40:00आनंद में कड़मस्तियाँ करो, मैं कोई दुख नहीं झेल रहा।
- 40:08ये सब कुछ करके तुम्हें पता ही नहीं है।
- 40:11जो रस्सास्वादन करके तुम तख्तता के अतिरिक्त कुछ हो नहीं पाते, वो
- 40:21मैं इन रस्सों को छोड़कर। बड़े शानदार स्वादों में, रसों
- 40:34में सदा से ही मस्त रहता। तुम ये मत समझना कि मैं बड़ा
- 40:44त्यागी हूँ नहीं मुझसे बड़ा भोगी कोई नहीं।
- 40:50क्योंकि जिसे मैंने त्याग वह शुद्र मैंने चीजों को त्याग दिया,
- 40:55यह शुद्र मैंने रस्सों को त्याग दिया, यह शुद्र और मैंने जीसको
- 41:00भोंगा, वह विराट, वह अखंड, वह असीम उसका कोई और छोर नहीं।
- 41:08तो भोगी मैं ज्यादा बड़ा हुआ या तुम तुम तो शूद्रों को भोंक के
- 41:12राजी हो जाती लेकिन मैं असीम को भोंकता हूँ, मैं अखंड को भोंकता
- 41:19हूँ जिसका और छोर नहीं मैं उसको सदैव हर पल भौंकता हूँ।
- 41:25इसलिए तुम मुझे त्यागी मत कहना मुझसे बड़ा भोगी कोई विराट को
- 41:30भोगने वाला विराट ही भोगी होता है।
- 41:36आइए दूसरे शब्दों पे चले हे प्रिया यदि तू मुझे चाहता है तो
- 41:41विषयों को विश के समान छोड़ दे। त्याग करते हैं।
- 41:47ये शब्द बड़ा गंभीर है। इसके मायने अगर तुमने ठीक से अपने
- 41:53हृदय में बसा लिया तो तुम अभी से संतो को सुनना छोड़ दोगे।
- 42:05अभी से जीस घड़ी से तुमने ये शब्द तुम्हारे अपने अंत में उतारे खाली
- 42:13मन से तुमने अगर मुझे सुन लिया जिसे महावीर कहते हैं श्रावक बन
- 42:17गए सब में के श्रवण तुमने कर लिया।
- 42:20तो तुम अभी से सुनना बंद कर दो, तुम गए उस स्थान पर जिसकी तुम
- 42:29डिमॅंड कर रहे हो अलग अलग चीजों से तुम पदार्थों से उपाधियों से
- 42:35गद्दियों से। सभी विषयों को विश्व की तरह छोड़
- 42:47दें। दूसरे अध्याय का स्टवकर गीता का
- 42:51दूसरे अध्याय का दूसरा श्लोक है। विषय क्या है?
- 43:01तुम विषय को समझती हो? काम क्रोध, लोम अहंकार।
- 43:05मदमत्सर तुम्हारी शिक्षा प्रणाली में यही विषय आती है और तुम कहते
- 43:18हो कि इन विषयों को विचारों को बीज के समान छोड़ दो, लेकिन असली
- 43:24तुम चूक गए। अष्टा वक्र कुछ और कहना चाहते है
- 43:31अष्टा वक्र जहाँ तीर लगाते हैं, वह निशाने पर तुम्हारे बैठता नहीं
- 43:36और जिसके निशान पर बैठ गया वह फिर जो मैंने कहा।
- 43:46पल भर में छोड़ देता है सब कुछ क्योंकि तुम्हारे लिए और भी बड़ी
- 43:55चीजें हैं जो वैल्युएबल हैं। मेरे लिए वह चीजें वैल्युएबल हैं,
- 44:03अष्टावक्र के लिए वह चीजें वैल्युएबल रही और जनक को यही सीखा
- 44:08रहे हैं। वो सभी विषयों को विष के समान
- 44:12छोड़ दे। अब ध्यान से समझेगा विषय तुम
- 44:18जिन्हें विषय कहते हो। वो विचारों को विषय कहते हो,
- 44:25लेकिन ये दो नाम है विषय विकार तुम विषय तो भूल गए बेकारों को
- 44:32छोड़ने की जल्दी होने लगी और तुम रोज़ बोलते हो विषय बेकारों से
- 44:37दूर हट जाओ। विकार विषय दो शब्द हैं तुम
- 44:42विचारों को छोड़ने में तलीन हो जाती हो विषय को छोड़ने में
- 44:48तुम्हारा पता ही नहीं होता विषय है क्या अब समझो चीजों को?
- 44:56ये जो तुम विषय पढ़ते हो सब्जेक्ट ये साइंस है, फिजियोलॉजी है,
- 45:07शिविक है, पॉलिटिकल साइंस है, ये जो आईएसआईपीएस के लोग।
- 45:14बनना चाहते हैं और सर लोग समझा रहे हैं यह विषय विषय तुम कहते हो
- 45:21कौन सा सब्जेक्ट्स लेने हैं तुम्हें और सब्जेक्ट्स को?
- 45:25हिंदी में कहते हैं विषय और विषय को अंग्रेजी में कहते हैं
- 45:28सब्जेक्ट्स। इसकी तरफ हमारा कभी ख्याल नहीं
- 45:35गया, लेकिन इसकी तरफ अष्टावक्र का ख्याल चला गया।
- 45:42अष्टावक्र गीता के दूसरे अध्याय के दूसरे शुभ।
- 45:54सभी सूचनाओं को इकट्ठा करना बंद करो, सभी सब्जेक्ट्स को इकट्ठा
- 46:03करना बंद करो, सूचनाओं को इकट्ठा करना बंद करो।
- 46:15हे प्रिय, अगर तुम मुझे चाहता है तो कोई किंतु परंतु नहीं करेगा
- 46:25क्योंकि तुम्हारी सवाल अगर हल हो गए होते।
- 46:29तो तुम पहुँच ही न जाते ना फिर मेरी जगह तुम बोलते फिर बाबा को
- 46:34मुझे कहने की क्या आवश्यकता थी नहीं है कोई बोलो सभी ऐसे हो नहीं
- 46:47सकते मैं जानता हूँ। कब का बोला हुआ स्टॉक कितने हो
- 46:53गए? तुम चीजों को तोड़ मरोड़ लेते हो
- 46:57और तुम नहीं तोड़ते, तुम्हारे आचार्य तोड़ देते हो, आचार्य
- 47:02भटकाने पर लगे हुए हैं तो किसकी हिम्मत है जो इस भटकाव को रोके?
- 47:10क्योंकि तुम्हें समझ पड़ता है तुम्हारी काम की बात तुम किसी
- 47:16कारण से सुख पाने की मार्ग पे चल पड़े हो और यह किसी कारण से सुख
- 47:23पाने का मार्ग तुम्हें दिखा देते हैं।
- 47:25ये लो मार्ग। इस कारण से मिलेगा सुख यहीं
- 47:29गड़बड़ हो जाता है। इसे फिर समझ लो तुम भी किसी कारण
- 47:37से सुख पाने की फिराक में हो और यह आचार्य और सद्गुरु जैसे लोग।
- 47:45परमानंद जैसे लोग प्रेमानंद जैसे लोग यह किसी कारण से सुख पाने की
- 47:53तुम्हें मार्ग के बता देते है। राधे राधे, छपते रहो या ऐसा कर लो
- 48:00या वैसा कर लो। ये कारण से सुख पाने का ढंग है,
- 48:07मार्ग है और अष्टा वकर कहते हैं कि बेकार है अष्टा वकर कहते हैं
- 48:14ना ये पहुंचे हैं, ना इनके शीशे पहुँचेंगे जितना चाहे ज़ोर लगा लो
- 48:19और कितना पहुंचे हैं जो पहुंचा हो वो आ जाए मेरे पास।
- 48:25मुझे थोड़ी सी सूचना तो दे दे ये जिन्हों को भूतों प्रेतों को
- 48:32निकालने वाले लोग सिर मारते हैं बेचारी स्त्रियां सिर घुमाती हैं,
- 48:38पागल जैसी लगती हैं। वह ऑर्डर करता है, जिनको निकल जाओ
- 48:43निकल जाता है। मैंने कहा थोड़ा सा एक जिन मेरे
- 48:48पास ही है हराम करो इनको मैं सोच लूँ, थोड़ा सा कोई नहीं भाई, कोई
- 48:58होगा तो भाई। कोई पित्रों के नाम पे डरा रहा है
- 49:03तुम्हें भयभीत कर रहा है कोई तानाशाह बन के डरा रहा है कोई
- 49:10कहता है श्राद्ध करो कितने पाखंड हैं तुम्हारे सिर के ऊपर और तुम
- 49:15कितना बोझ ज्यादा ढोए ही चले जा रहे हो, तुम्हें पता ही नहीं।
- 49:19बहुत से लोग मुझे कहते हैं बाबा बचा दिया, मैंने कहा भी कहा बचाओ
- 49:23अभी तो तुम्हारे सिर के ऊपर बहुत सा बोझा पड़ा है।
- 49:30ये पूरी तरह से हटा दो। कचरा साफ कर दो, व्हाइट वास्कर
- 49:36पोछा लगा दो अच्छी तरह से। शीशे की तरह हमारे वर्ष चमक जाए।
- 49:48विषय कोई भी विषय हिंदी हो, पंजाबी हो, अंग्रेजी हो, संस्कृत
- 49:54हो, बायोलोजी हो, जूलोजी हो, बाटनी हो, फिर जैलोजी हो।
- 50:01ये कितने तुमने जी बना रखे हैं बायोलोजी, जलोजी, एस्ट्रोलॉजी ये
- 50:12कितने जी बना रखे है अभी तो फ़ोर जी 5जी सेवेन जी ये बाकी रह गया।
- 50:23और चैट जी सब कोड़ा भरा पड़ा है, तो मैं तुमसे बहुत बार रहा इन
- 50:37अचार्यों से पूछने के बजाय चैट जी से पूछ लिया।
- 50:43बेचारा बिल्कुल निर्लेप हो के बोलता है।
- 50:47संतों की तरह ज़रा पूछो तो विषयों को छोड़ दो।
- 50:55सब्जेक्ट्स को छोड़ दो। किसी मार्ग के द्वारा मिलेगा।
- 51:05इस बात को तो छोड़ दो ही ना तुम किसी कारण से मिलेगा इस धारणा को
- 51:17ही छोड़ दो तुम अकारण सुखी कैसे हो जाओ?
- 51:23कुछ भी ना हो तुम्हारे पास मलंग हो, तुम फकीर हो जाओ।
- 51:32सच्ची आशिकी दा मज़ा हो चखे। जो बे कर्ज होवे बे फर्ज होवे
- 51:45बेगर्ज होवे बे। मर जो होवे अब तुम्हे बेगर्ज कोई
- 51:57ना कोई रोग गिरे रहता है। ताई जीके पांव के हाथर बना मेरे
- 52:02पिता के समान लगाओ पांव के हाथ तुम इतने गर्जमंद हो कि छोटी छोटी
- 52:11चीजों के लिए अपनी गर्ज को पूरा करने के लिए।
- 52:17तुम तलवे चाटना शुरू कर दे देखो आज का मीडिया गर्जमंद है, जो चाहे
- 52:27बुलवा लो, उनसे बस पीसा टेको तमाशा देखो।
- 52:35सब्जेक्ट लेस ने विषय ही न हो जाओ किसी भी विषय को इकट्ठा करने की
- 52:43चेष्टा न करो। और तुम तो सारा दिन तुम्हारी तो
- 52:45सोसाइटी ने सिखाया है कहाँ गए वो? कहाँ गए?
- 53:08जाने कहाँ गए वो दिन, खते थे तेरी याद में।
- 53:25पलकों को हम झुकाएंगे जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी।
- 53:42छ में। छब पूरा बोल दूंगा मुझे थोड़ा
- 53:52स्मृतियों में ले जाने दुःख शब्दों को फिर सब सब्जेक्ट्स को
- 53:58छोड़ दो। हे प्रिय।
- 54:01अगर तू मुझे पाना चाहता है मैं कौन हूँ बिना किसी कारण के जो
- 54:06सुखी है वह मैं हूँ बे न पग चले सुने बे न कान वो मैं बिना किसी
- 54:18कारण के सुखी। बार बार समझा रहा हूँ ताकि एक ही
- 54:24प्रवचन पुथल पुथल मचा दे। प्रलय ले जाए तुम्हारे दुखों को
- 54:34नित्य नबुध करते विषय। विकास, विकास, काम, क्रोध लोग
- 54:43मोमकार लेकिन विषय तुमने कहाँ छोड़ा विषयों को तो गिट्ठा करता
- 54:48है काम, क्रोध, अहंकार के अंदर भी डूबे हुए हो और विषय अलग से है।
- 54:54ये ज्यादा खराब करता है क्योंकि ये विषय उन्नतुरल है, ये तुमने
- 55:00बनाए। काम क्रोध लो मो अंकार ये
- 55:05अननेचुरल नहीं है दीज़ आर नेचुरल भीतर से आता है काम क्रोध इनके
- 55:15ऊपर विजय प्राप्ति का तो एक कला है ढन गया है, फार्मूला है।
- 55:20वो तो मैंने तुम्हें बता दिया साक्षी रह जाओ मन भटकता है भटकने
- 55:25दो उसके साथ मत चलो, उससे लड़ो भी मत, उसके संग भी मत चलो।
- 55:30यह तो विषयों से पीछा छुड़ाने का एक ढंग था बेकारों से और विषयों
- 55:38से। विषय इनको तो तुम अपनाना चाहती
- 55:44हो, जो ज्यादा विषयों में दक्ष है।
- 55:47तुम तो उसकी स्तुतिगान करते हो, यह तो 25 भाषाओं का कहता है तो यह
- 55:52तो फिर ज्यादा पागल है। जो सारे संसार की भाषाओं को जानता
- 56:00है, उससे बड़ा पागल कौन हो सकता है?
- 56:02सारी उम्र खपा दी इसने भाषाओं के ज्ञान में जिससे आनंद नहीं
- 56:07मिलेगा, जिससे सुख नहीं मिलेगा। इसका सारा वीजा भर गया है।
- 56:13सारी न्यूरॉन भर गए हैं। इसके उसका भार इतना ज्यादा है।
- 56:17वह जिएगा। कैसे कब जिएगा?
- 56:21पहले इकट्ठा करने में मशरूम रहा। अब वो इसका बोझा ढोएगा और तुम
- 56:27कहते हो यह तो बड़ा ज्ञाता है, ज्ञाता खाक है।
- 56:32सिर्फ गंदगी की टोकरी इसके सिर के ऊपर रखी है बोझा ढो रहा है।
- 56:37तुम्हारी दृष्टि में ऐसे ही लोग विद्वान होते हैं।
- 56:40आचार्य देश सब जानता है ना गीता आती है, ना अपने शिदाता है, ना
- 56:51महा गीता आती है ना इन्हें कुछ नहीं आता सिर्फ शब्दों के
- 56:55खिलाड़ी। बस इधर थोड़ा सा ज्यादा ऑप्शन था,
- 57:00इधर लोग वहाँ भी पहुंचते और हुक्म भी मानते।
- 57:04श्रोतागण ज्यादा है, बल्ले बल्ले ज्यादा होगी, इन्हें पता नहीं
- 57:08इतने मूर्ख हैं। इन्हें पता नहीं कि 1 दिन धाम से
- 57:12आज नहीं 1 दिन धाम से इस माटी में मिल जाओ।
- 57:17और तुम्हारी संस्था माटी में मिल जाएगी, खंडहर हो जाएगी नालंदा
- 57:22यूनिवर्सिटी की तरह जी इन्हें नहीं पता।
- 57:25अगर पता होता क्यों तांडव करते हैं इतना करने की आवश्यकता है घर
- 57:33में बैठ जाओ, आराम से। लव से कहता है जिसने पा लिया वो
- 57:39जो हो गया हम अगर बोलते हैं तुम्हें चुप कराने के लिए।
- 57:50काश बिना भोले को समझ जाते तो हम चुप ही रहते हैं, लेकिन इनके
- 57:58बोलने का कारण कुछ और है। ये कहते सस्ता का हाथ मजबूत करो
- 58:05और ये हो गया है सस्ता। आज अपन को हो गए हैं अपने झूठे
- 58:15ज्ञान के बुनियाद पर तुम्हें पार्सल बना देते हैं।
- 58:20विषय ये सब्जेक्ट्स बाहरी तुम कितनी नॉलेज रखते हो?
- 58:28सबसे खतरनाक जिद है। यह है नॉलेज यह है डेफिनिशन्स यह
- 58:38सूचनाएं तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मनी अष्टावकर कहते हैं इन्हें
- 58:44छोड़ दे। तुमने विचारों को तो छोड़ने की
- 58:49बड़ी कोशिश की? ये जैन मणि सुबह से शाम तक
- 58:52विचारों को छोड़ते रहते थे लेकिन ग्रंथ पड़ते रहते हैं, भेजा भर
- 58:58लेते हैं नमोवरि अंत अणम नमोवरि अणम बस इससे भेजा भर लेते हैं।
- 59:08नमन करना और बात है जो की जाना और बात है नमाज़ करना और बात है,
- 59:13नमाज़ के शब्दों को भेजेगा। एक अंग बना लेना, ये अलग बात है।
- 59:20तुम शब्दों से भरे भरे फिर तुम कहते हो, हम दुखी हो।
- 59:26शब्दों का भार इतना दुखी कर देगा तुम्हें अब देखिए, मेरे बोलने से
- 59:31पहले ही कॉमेंट्स आ जाते हैं। ये क्या है?
- 59:34भरी खोपड़ी की निचनी सूचना इतनी ज्यादा इकट्ठी कर ली है, इन्हें
- 59:40सुख कैसे मिलेगा? इधर भटक रहे हैं, उधर भटक रहे
- 59:43हैं, उधर भटक रहे हैं। मेरे बोलने से पहले ही शुरू हो
- 59:47जाती करोड़ों की किताब, इन्हे मुक्ति मिलेंगे कैसे?
- 59:54इन्हीं से तो मुक्ति चाहिए, समझिए बात को जीस चीजों से मुक्ति
- 1:00:02चाहिए। वो इन्होंने खुद जोड़ी हैं।
- 1:00:09ये वासनाओं से भी ज्यादा गंभीर वासनाएँ वासनाएँ तो कभी कभी उठती
- 1:00:15हैं, कभी नहीं भी उठती, लेकिन ये सूचनाएं तो सदा ही तुम्हारे दिमाग
- 1:00:20में छाई रहती है। ये सूचनाएं।
- 1:00:25यह नॉलेज यह ज्ञान गीता में क्या लिखा?
- 1:00:29उसमें क्या लिखा उसमें क्या लिखा? यह तो तुम्हारा लहू चूस लेती है,
- 1:00:33तुम्हें सुखी होने ही नहीं देती। बड़ा अजीब बात कहते हैं और सत्य
- 1:00:39कहते हैं इसलिए तुमने पुत्र पूछा। बड़ा गहरा प्रश्न है।
- 1:00:47हालांकि आखिरी मुकाम भी चल रहा हूँ।
- 1:00:50सब कंप्लीट कर दिया। कोर्स मैंने सिलेबस टोटली कंप्लीट
- 1:00:54है, लेकिन फिर भी तुम्हारा प्रश्न बड़ा प्रासंगिक है और नए प्रश्नों
- 1:00:59को मैं बड़ा अधीमान देता हूँ क्योंकि वह रह गए।
- 1:01:05तो इनको भी बोलता चलो सब विषयों को विष के समान छोड़ दो।
- 1:01:15तुमने विचारों को तो छोड़ने की कोशिश की विषयों को तुमने ज्यादा
- 1:01:19अपनाने की कोशिश की। इसका भी मास्टर हो जाऊं एक
- 1:01:24व्यक्ति के अंदर का मैं छींक, छींक सब्जेक्ट्स में मास्टर हूँ।
- 1:01:29मैंने कहा फिर तुम तो कैंसर आई थी सो कैंसर के रोगी हूँ या फोड़ा
- 1:01:35बार लिया, कैंसर का अब कैसे छुटकारा?
- 1:01:41अरे इतना रोग फना करते हैं और कोई कहता राधे राधे कोई कहता रामता
- 1:01:50कोई कहता ओम शांति अरे आंसू। ये सब सूचनाओं के भंडार हैं और
- 1:01:59देखिए इनकी जमातों के अंदर सूचनाओं के आधार पर पीएचडी की
- 1:02:03डिग्री दी जाती हैं और ये अपने आपको बड़ा गौरान भी तो महसूस करते
- 1:02:10हैं। पीएचडी की डिग्री पाने के बाद
- 1:02:14इन्हें ये नहीं पता कि हम ज्यादा पागल हैं।
- 1:02:18जो बड़ा वागल होता है ना मूर्ख वे पीएचडी और डबल पीएचडी कोई तो
- 1:02:23ट्रिपल पीएचडी है मेरे पास आये थे एक मैं के इसके बाद मत आ जाना अरे
- 1:02:32मूर्ख तुम तो मुर्ख ही नहीं है। तू तो तीरे मुर्खों?
- 1:02:36तुम्हारी मूर्खता को मैं कैसे दूर करूँगा?
- 1:02:39मेरे पास लोग आ जाते हैं वापस 10 गुरु बदलिए मैंने कहा फिर तुम
- 1:02:42मेरे पास तो मत आ 10 गुरुओं की तरह मैं भी थोथ ही सा बताऊँगा तुम
- 1:02:48दूर ही रहो भाई तुम तो मत आ जाईयो।
- 1:02:54विषय वासनाओं से दूर हो जाओ। अगर तुम मुझे प्राप्त करना चाहता
- 1:03:00है, तो सुंदर और सिम पर शब्द विषयों से दूर हो जाओ, कुछ इकट्ठा
- 1:03:06करना धन को इकट्ठा करो या शब्दों को इकट्ठा करो।
- 1:03:14वो शब्द फिर जाप हो परमात्मा का राम राम करो राधे राधे करो फिर
- 1:03:20सूचना हो कि कौन सा तारा कितनी दूर द्रव कितनी दूर सप्तर्षि
- 1:03:25कितनी दूर यहाँ से किस गति से चलेंगे चंद्रमा कितनी दूर ये सब
- 1:03:30सूचनाएं? इन सूचनाओं को लिप्त हो जाना इनके
- 1:03:39साथ साथ अब इनको मैं सही आपको ढंग से समझा दू वीडियो तो बहुत लंबी
- 1:03:46हो गई काश। बुद्ध को रहस्य में उतरने की
- 1:03:57थोड़ी सी और छूट मिल जाती। उनका मन उन्हें और बैठने को कह
- 1:04:06देता कि तुम खुद को तो जान लिया हो।
- 1:04:09अब रहस्य में उतर जाओ अगर बुद्ध रहस्य में उतर जाते तो बड़ा
- 1:04:15शानदार दुनिया को तोहफा देके जाते चूक है।
- 1:04:19उन्होंने जल्दबाजी की कि बुद्ध हो गए, खुद को जान दिया, बस खत्म हुआ
- 1:04:24काम अब बांटो। ये बांटना भी काफी ठीक है।
- 1:04:29बहुत से लोगों के दर्द दुख मिटेंगे, कारण मिटेगा, लेकिन अगर
- 1:04:33कहीं रहस्यमय उतर जाते बुद्ध जैसे व्यक्ति तो बा कमाल था तो फिर घर
- 1:04:43छोड़ना नहीं पड़ता, पर अगर छोड़ भी दिया था।
- 1:04:48तो फिर वापस आके गद्दी को संभल लेते हैं?
- 1:04:50कृष्ण की तरह बुद्ध को फर्क पड़ता है।
- 1:04:54अगर आसपास सोने की मटकियां रखी लेकिन कृष्ण को फर्क नहीं पड़ता।
- 1:04:59अगर आसपास कितने भी राज्य साम्राज्य कितनी भी जनता।
- 1:05:05कितनी रानियों, कितने पुत्र, कितना साम्राज्य, कितना सोना
- 1:05:09कितनी अशर्बिया कितने हीरे जोरातों के भंडार कोई फर्क नहीं
- 1:05:16पड़ता। वो जानता है, ये मार्टिन जानते
- 1:05:22हैं। माटी का पुत्र कैसे नचत है कैसे
- 1:05:33नचत है डरियो फिरत है माटी का। वो तेरा कैसे नचित है?
- 1:05:47कृष्ण जानते हैं और काश बुद्ध कृष्ण कैसे हो जाते इसलिए बुध
- 1:05:53घबराते हैं, फिर लौटते हैं कपल वस्त्र।
- 1:05:59लेकिन राज्य नहीं संभाले। कृष्ण अगर ऐसे ही गाय होते तो
- 1:06:05कृष्ण वापस आके संभाल लेते और कृष्ण से बढ़िया राजा और कौन हो
- 1:06:10सकता है बांटनी कितनी जुलती है, अभी रहस्य का पता नहीं।
- 1:06:20और जब तक व्यक्ति खुद ही तक पहुँच गया और रहस्य तक नहीं पहुंचा, खुद
- 1:06:26ही तक पहुँच गया, खुदा तक नहीं पहुंचा, वह अधूरा है।
- 1:06:32जो चाहे कोई भी हो, इसलिए मैं बुद्ध के ऊपर कृष्ण को सदा ही
- 1:06:36बहुत ज्यादा अधिमान देता हूँ। क्यों?
- 1:06:39ओके बुद्ध कभी नहीं कहेंगे कि मेरे समर्पण हो जाओ, वो कहेंगे
- 1:06:46अप्प दीपो भंवर खुद का प्रकाश खुद उत्पन्न कर लेकिन कृष्ण कहेंगे
- 1:06:54तुम मेरे अर्पित हो जाओ। अन्नन्यास चिंतितों माम ये जनम
- 1:06:59परुपास्थि तेशाम नित्याभुक्तानाम योग क्षममं पामं सर्वदृवाणम
- 1:07:05प्रितिज्य मामी का मिश्रणम ब्रज हम तो हम सर्बह पापे भ्रम मुख्य
- 1:07:10श्याम। सूचनाओं को इकट्ठा अगर कर ही लिया
- 1:07:20है तो एक रास्ता बचता है जितना हो सके और सूचना इकट्ठी करने से बचो।
- 1:07:29जो हो गया वो हो गया, अब स्टेप हो जाओ, रुक जाओ और सूचना इकट्ठी न
- 1:07:36करो। अब एकत्रि कद मैं बता देता हूँ।
- 1:07:41सूचनाओं के साथ वही व्यवहार करो जो आप वासनाओं के साथ करते हो।
- 1:07:47सूचनाएं आएंगी, आएंगी, ठहरेंगी लेकिन तुम निर्लेव बने रहो।
- 1:07:56तुम अपने होने में बने रहो, तुम स्थिति पर बने रहो, जानते तो
- 1:08:02कृष्ण भी सभी कुछ है। 64 कलाओं से सुन बोल लेकिन वो
- 1:08:07कलाएं दूर पड़ी हैं। उनकी खोपड़ी में प्रेम दूर पड़ा
- 1:08:13है उनके हृदय में। और वे स्वयं बहुत दूर बैठे हैं।
- 1:08:18सबसे निर्लिप्त प्रेम से भी सूचनाओं से भी इन दोनों चीजों से
- 1:08:23निर्लिप्त बैठे हैं। न सूचनाओं के क्रीब जब जरूरत
- 1:08:28पड़ती है सूचनाओं के क्रीब हो जाते हैं।
- 1:08:31जब रहास जाते हैं तो हृदय के क्रीब हो जाते हैं।
- 1:08:34प्रेम बरसाते हैं और जब किसी चीज़ की जरूरत होती है ज्ञान अर्जुन को
- 1:08:41देना तो बुद्धि के प्रिय हो जाते हैं लेकिन खुद उनका काम कहाँ?
- 1:08:49खुद उनका मुकाम उस जगह पे जो अकारण सुखी है।
- 1:08:54तुमने अकारण सुखी होना है और तुम अकारण ही सुखी हो सकते हो।
- 1:08:58सह कारण तो कभी कोई सुखी हो ही नहीं सकता।
- 1:09:02एक ही ढंग है, एक ही मार्ग है, तुम सुखी हो सकते हो अकारण अगर सह
- 1:09:09कारण सुखी हो गए तो वो कारण के खो जाने पर तुम्हारा सुख भी खो
- 1:09:13जाएगा। इस बात को आप अच्छी तरह से सब चले
- 1:09:26जैसे विचारों के लिए तुम निर्ले बने रहे विकार आए विचार आए तुम
- 1:09:33छिप्टो मत, तुम उनसे झगड़ा मत करो, लड़ाई मत करो।
- 1:09:38वो आए हैं, आने दो, चले जाएंगे, जाने दो, ऐसे ही सूचनाएं आएंगी
- 1:09:45आने दो ठहरेंगी ठहरने दो जाएँगी, जाने दो बिलकुल उनसे भी यही
- 1:09:52व्यवहार करो, जो आपने विचारों के साथ किया वो ही विचारों के साथ
- 1:09:57विचारो। तो यही कृष्ण करते हैं।
- 1:10:01कृष्ण परम प्रज्ञावान है, लेकिन यह तकनीक आ गई है जीसको यह तकनीक
- 1:10:08आ गई, वह अष्टावक्र हो गया, वह फिर जनकों को बढ़ा सकता है।
- 1:10:15वह कृष्ण हो गया। वह अर्जुन को राह दिखा सकता है।
- 1:10:23समझा दे तुम्हें हे प्रिय अगर तुम मुझे पाना चाहता है अगर संसार की
- 1:10:28चीज़ पाना चाहता है तो मेहनत कर ले कमा ले छी न झपटी कर ले पापा
- 1:10:33बाज न होवे, इकट्ठी हो या शंक न जावे।
- 1:10:37अगर तू मुझे पाना चाहता है जाने विश्राम, आनंद, प्रेम, खुमारी,
- 1:10:45आनंद का उल्लास वो प्रेम का प्रस्ताव अच्छा है ना वो अमृत की
- 1:10:52बोलें। वो आनंद का चहुं तरफ से घर जाना,
- 1:10:59वो सागर में अटकेलियां खाना अगर तू ये चाहता है मेरे पास आना
- 1:11:06चाहता है तो सभी विषयों को विष के सामान छोड़ दे जैसे जहर को हम
- 1:11:11छोड़ देते हैं अमृत को हम पी लेते हैं।
- 1:11:15ऐसे ही जहर को तुम विषयों को और विकारों को विषय बराबर रखो।
- 1:11:22तुम विषयों को भूल गए और ये लोग तुम विचारों को तो जैन मुनी हटाने
- 1:11:30के लिए बैठ गए। और विषयों को बढ़ाने में लग गई ये
- 1:11:34आचार्य जैसे लोग और तुम तो मारे गए, बिल्कुल मारे गए, दौड़ इतनी
- 1:11:39भयंकर हो गई। मैं जिधर देखता हूँ सब दौड़ रहे
- 1:11:45एक ग्रामीण दिल्ली चला गया तो जल्दी वापस आ गया तो ग्राउंड वाले
- 1:11:51पूछने लगे भाई। तू गया तो था दो हफ्ते के लिए तू
- 1:11:54आ गया तीसरे दिन कहता वो भी बस आने जाने में वक्त लगा है क्या
- 1:11:59बात तू रुका नहीं दिल्ली गया था दिल्ली तो देखने वाली है दिलवालों
- 1:12:03की है, अरे कहता भाई, क्या बताऊँ? जब मैं दिल्ली में गया तो सब भागे
- 1:12:09ही जा रहे थे। सब जिसके पास जो मिला जिसे स्कूटर
- 1:12:14मिला, स्कूटर पे कार मिला कार बस मिला बस पे रेलगाड़ी मिली,
- 1:12:20रेलगाड़ी पे जीसको जो मिला उसके ऊपर बैठ के भाग रहा है।
- 1:12:25मैंने कहा पता नहीं कौन सी भगदड़ मच गई, यह तो कहीं कोई ना कोई।
- 1:12:30युद्ध चल पड़ा। ये कही कोई कांड हुआ है?
- 1:12:36ये सभी जो भाग रहे हैं तो तुम भी भाग भाग मिल्खा भाग तो मैं तो यूं
- 1:12:44चला वहाँ से मैं तो भागा, जल्दी से ट्रैन पकड़ गयी।
- 1:12:49जान बुझा के किसी तरह आया हूँ बस ऐसी ही सारी दुनिया भाग रही है
- 1:12:54कहाँ जा रही है पता नहीं तुम्हें पता नहीं तुमने जाना कहाँ है
- 1:13:00तुम्हारा मन तुम्हें कहाँ लेके जाता है साथी ना कोई?
- 1:13:11दिया है न कोई महफिल चला मुझे लेके है दिल अकेले कहा।
- 1:13:30साथ ही न कोई अष्टावकर का ये श्लोक पूरा हुआ।
- 1:13:38हे प्रिय अगर तुम मुझे प्राप्त करना चाहता है तो विषयों को विश
- 1:13:45के समान सौपते त्यागते हैं। ये।
- 1:13:51कदम जहाँ पड़े सजदे किए थे यार ने मुझको रुला रुला दिया।
- 1:14:08जाती हुई बाहर न जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी याद में।
- 1:14:27नजरों को हम बिछाएंगे जाने। कहीं भी तुम।
- 1:14:38रहो चाहेंगे तुमको उम्रभर? तुमको न भूल पाएंगे, जाने।
- 1:14:53कहाँ? गए वो दिन अपनी नजर।
- 1:15:02में। आज।
- 1:15:04घर। दिन भी अँधेरी रात है अपनी नजर
- 1:15:15में आजकल दिन भी अँधेरी रात है। साया ही अपने साथ था।
- 1:15:30साया ही अपने साथ है। जाने कहाँ गए वो दिन?
- 1:15:42कहते थे तेरी याद में नजरों को हम भिझाएंगे राधे राधे।
- 1:16:01श्याम मिला दे राधे राधे। श्याम।
- 1:16:08मिला दे गोविंदा गोपाल हरे। राधे राधे श्याम मिला दे गोबिंद
- 1:16:25गोपाल हरे, मेरी नैया पार लगा दे गोबिंद गोपाल हरे।
- 1:16:37राधे राधे श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हरे राधे राधे श्याम मिला
- 1:16:49दे गोविंदा गोपाल हरे। मेरी नैया पार लगा दे गोबिंद
- 1:17:00गोपाल हरे राधे राधे जाम मिला दे गोबिंद गोपाल हरे।
- 1:17:18धन्यवाद।