Latest / Baba ji Vijay Vats / 16 Jan 25 - पतंजलि के अष्टांग योग के यम नियम! मैं दृष्टा कैसे हुआ? शब्द और सुरति का मिलान!
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- 0:15जगदेश्वर प्रसाद योग वशिष्ठ का एक शब्द निर्विषय हो जाओ।
- 0:31इसका क्या अर्थ है बाबा? योग विशिष्ट श्रीराम को समझाते
- 0:48हुए कहते हैं, समाधि तक जाने का सूत्र है जाए।
- 1:00विषय शब्द के दो अर्थ होते हैं विषय सब्जेक्ट को भी कहते हैं और
- 1:09विषय वासनाओं को भी कहते हैं। विषय वासनाएं और जो हम सब्जेक्ट्स
- 1:17पढ़ते हैं। जियोलॉजी, बटनी, फिजिक्स,
- 1:22केमिस्ट्री, स्विक्स हिस्टरी ये भी विषय होती है।
- 1:31दोनों ही अर्थ यहाँ पर समान रूप से डूबते हैं।
- 1:38ध्यान रखना अगर तुम विषयों में जाओगे काम क्रोध, लोह मो।
- 1:48अहंकार मधु मत सर और वह तो वहरमुखी हो जाओगे।
- 2:03और अगर आप विषयों को पढ़ोगे केमिस्ट्री, फिजिक्स, जॉलजी,
- 2:13सिविक्स, पैथोलॉजी, साइकोलॉजी। तुम भी बहर्मुखी हो जाओगे दोनों
- 2:26विषयों का अर्थ समझ विषय का अर्थ जो तुम्हें बहर्मुखी करता है।
- 2:41विषयकार्थ दूत में स्वय से वटका दे।
- 2:57अगर तुम कुछ पढ़ोगे तो भी बाहर भटकोगे और अगर तुम कुछ भोगोगे तो
- 3:11भी बाहर भटकोगे। तो गुरु विशिष्ट भगवान श्रीराम से
- 3:18कहते हैं अद्भुत शुद्ध है योग वशिष्ठ का अति उत्तम यह शलोक
- 3:32निरवशा हो जाओ। यानी बाहर न बटको इस संसार में
- 3:45कुछ भी ना त्यागनी योग्य है, ना भागने योग्य है।
- 3:59यहाँ कुछ भी इस प्रति के ऊपर भोग नहीं योग्य कुछ भी नहीं है, फिर
- 4:05भी तुम भोगते हो त्याग नहीं योग्य भी कुछ नहीं है, लेकिन फिर भी तुम
- 4:13त्यागते हो। लेकिन वशिष्ठ कहते हैं कि न तो
- 4:23कुछ त्यागनी योग्य है, न कुछ भोगनी योग्य है।
- 4:31जो तुम्हें बाहर भटकाता है, वह तुम्हें दुख देखा है।
- 4:43और तुम्हारे अंतित की पुकार है सुख बाहर भटकों के मिलेगा दुख दुख
- 4:55कोई चाहता नहीं। कौन है जो बड़ा दुख चाहता है तो
- 5:04वशिष्ट कहते हैं कि सुख की चाहत है, प्रत्येक प्राणी को और बाहर
- 5:14भटकाव है। बाहर स्थिरता नहीं है स्थिरता है
- 5:24भीतर और जहाँ भटकाव है, वहाँ दुख है जहाँ सिरता है, वहाँ शांति है।
- 5:40तो राम से कहते हैं हे राम विषय में मत उलझो विषय हीन हो जाओ।
- 6:00बड़ा अद्भुत शब्द है तुम्हें दो चीजें बटकाती हैं, एक तो तुम्हारे
- 6:10विकार इस सभी जो तुम विकार कहते हो।
- 6:16षट विकार सात विकार भय मैंने और जोड़ दिया।
- 6:23न जाने क्यों चूक गया, वह भी एक विकार है।
- 6:29ये सबसे ज्यादा तुम्हें बाहर निकालता है।
- 6:35मुझे रोज़ मैसेज आते हैं, बाबा भीतर जाता हूँ, भय सताता है, डर
- 6:43के मारे बाहर निकल आता हूँ इस भय को गिना नहीं गया काम, क्रोध,
- 6:51लोभ, मोह, अहंकार। मत मत सर।
- 6:58भय भूल गए जबकि वह प्रमुख हैं। हमारे चेतन्य में 70% तक वह है।
- 7:13जीस प्रकार हमारे शरीर में शत प्रतिशत जल होता है वैसे ही चेतन
- 7:19मन में इतना ही भय है, भय न होता तो तुम कब के पहुँच गए होते हैं?
- 7:34ये व्यय ही है जो तुम्हें भीतर नहीं जाने देता।
- 7:41रामकृष्णा ने कहा विवेकानंद ने पूछा था पर महात्मा है।
- 7:50रामकृष्णा बड़े सरल व्यक्ति थे। अध्यात्म में वो ही व्यक्ति
- 7:56प्रवेश कर सकता है जो सरल हो। ओनली दे विल एंटर मैं गॉड्स
- 8:06किंगडम हू विल बी इनोसेंट जस्ट लाइक कच्चा सरल हो गया।
- 8:13मासूम होंगे, निर्दोष होंगे। सरल हो ना परमात्मा तक पहुंचने की
- 8:24कुंजी है इस कई गोल्डन बर्ड्स। ओनली दे विल एंटर इन माइ गॉड्स
- 8:34किंगडम हू विल बी इनोसेंट जस्ट लाइक ए चाइल्ड सर लहो जाओ लेकिन
- 8:50तुम चाहते हो। हिंदी की मदद से ना सुक परम सुक
- 9:01और तुम रोज़ जटिल होते जाते हो तो पतंजलि ने कहा कि इन 10 चीजों से
- 9:11व्यक्ति जटिल हो जाता है। कौन कौन से दो भागों में विभक्त
- 9:21किया उसने पतंजलि कहते हैं, यम और यम इससे तुम जटिल हो जाते हो, तुम
- 9:30झूठ बोलते हो, जटिल हो जाते हो। इसलिए उसने शुरुआत की।
- 9:39सत्य से सत्य, अहिंसा, अस्त, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह जो हिंसा
- 9:47करेगा याद रखना। वह हिंसा होने से भी डरेगा।
- 9:55जिसने किसी को मार दिया वह इस बात से भी डरेगा कि कोई मुझे ना मार
- 10:02दे। इसलिए पतंजलि ने कहा कि तुम हिंसा
- 10:09बंद कर दो, अहिंसक हो जाओ। और जैन धर्म में तो मोटो ही यही
- 10:15है अहिंसा परमो धर्मा हूँ सत्य अहिंसा अस्थ्य चोरी न करो किसी और
- 10:28लेवल की बात कर रहे हैं बात इंशली।
- 10:33बात तंगली जानते हैं कि दूसरा कोई है नहीं, फिर चोरी भी करोगे तो
- 10:39किस्से खुद से ही तो कोई थोड़ी चोरी करनी होती है।
- 10:44चोरी हमेशा दूसरे से होती है इसलिए बच्चा निर्दोष होता है।
- 10:52बच्चा चोरी भी कर देता है तो बता देता है मैंने आपका रुपये चुराया
- 11:00ब्रह्मचर्य अपने ग्रह ब्रह्मचर्य आज कल।
- 11:10इसके बहुत से अर्थ होने शुरू हो गए लेकिन असली अर्थ है इसका वीर
- 11:23की रक्षा यहाँ से शुरू करोगे तो ब्रह्म याने विराट।
- 11:33विराट जैसा आचरण तब करोगे जब विराट हो जाओगे?
- 11:41सियाराम में सब चेक जान। करो प्रणाम ज़ोर युगबानी।
- 12:02सियाराम में सब जगह जाने सारा भ्रमण उस भ्रमण के भीतर सियाराम
- 12:11समाये हुए। यह जानकर कण कण में वह मौजूद है
- 12:26प्रणाम करता है, ज्ञानी जो जान लेता है।
- 12:34वो ब्रह्म हो गया, उसका विस्तार असीम हो गया, विराट हो गया, वृहद
- 12:41हो गया लेकिन ब्रह्मचर्य का प्राथमिक मतलब वीर की रक्षा।
- 12:56ये बात अलग है आज पाश्चात्य सभ्यता के भीतर गुम हुए हमारी
- 13:09सनातन संस्कृति के लोग। अंधा धुंध वे नाश कर रहे हैं, एक
- 13:20क्षण की उत्तेजना और तुम इतनी शक्ति खराब कर देते हो और।
- 13:31तुम्हें पता नहीं है अभी तो डॉक्टर्स को भी पता नहीं है।
- 13:38अभी वैज्ञानिक भी इस चीज़ की सही सही गणना नहीं कर सके।
- 13:45वो भी है उसपे क्या है? 2 दिन में फिर बन जाएगा।
- 13:53बिल्कुल बन जाएगा, लेकिन तुम्हें पता नहीं यह स्पर्म जितना प्राण
- 14:08होगा। वह ओज में परिवर्तित हो जाएगा।
- 14:15ओज में परिवर्तित हो गया। देखिए इसका स्थान बिल्कुल
- 14:20कुंडलिनी के पास ओज में प्रवर्तित हुआ।
- 14:30और के द्वारा से सरल में चढ़ा सीधा सा मार्ग और बिल्कुल करीब
- 14:38लेकिन तुम नीचे के मार्ग से निकालना श्रेष्ठ समस्या हो।
- 14:52मेरे दंड के भीतर से निकलती हुई सुशमना के भीतर से निकाल के गुजार
- 14:58के इसे सहस्रत में प्रवेश करना तुम्हें आता नहीं हमारे पास शा
- 15:10त्रिशु ने। अद्भुत से दान दिया था।
- 15:15आज नहीं कल एक बात तो सब वीर की रक्षा अगर नहीं करोगे तो सपने में
- 15:29भी। ब्रह्म जैसी चर्या की कामना न करो
- 15:37क्योंकि ये सिर्फ सिर्फ उसी को उपलब्ध हो सकती है जो काम शक्ति
- 15:47को। संग्रहित करता है।
- 15:55अपिग्रह जोड़ता नहीं, जो क्यों जोड़ेगा?
- 16:04जिसका सब कुछ हो गया। जो ओमनी पोटेंट, ओमनी प्रेसेंट,
- 16:12ओमनी शींट हो गया सब कुछ वह है तो वह जोड़ेगा क्या?
- 16:20अगर कोई जोड़ेगा तो स्पष्ट है कि उसके पास कुछ कमी।
- 16:29तभी तो जोड़ता है अब प्रिग्रह प्रिग्रह मत करना तू जीतने भी संत
- 16:43हुए जब भूख लगी। बुद्ध ने मांग लिया इस सड़क के
- 16:51किनारे खड़े होकर परमात्मा से मांगने लगे।
- 16:55भूख लगी है मुझे भोजन दे दो भगवान तभी मांगा जब आवश्यकता थी।
- 17:12ये तो आ गया यम की बात सत्य अहिंसा अस्त ब्रह्मचर्य अब
- 17:19प्रज्ञा है इनसे शुरू करोगे? तो तुम उस मुकाम पे पहुँच जाओगे
- 17:32जो निराला है जिससे तुम दूर छिड़क गए हो, उसी में मिल जाओगे और फिर
- 17:42वो ही हो जाओगे। दूसरा उसने भाग किया नियम
- 17:49पास्तांजलि ने। शोच, संतोष, तप, स्वाध्याय,
- 17:54एश्वर, प्रणिधान, शोच, शुचिता। शुचिता कोई ईर्ष्या नय द्वेष नय
- 18:07मैला न हो मन किसी के साथ वैरभाव न हो, कोई आगजनी न हो, कोई
- 18:14पत्थरबाजी न हो, प्रेम से रहें वसुधैव कुटंबुकम्।
- 18:22जैसे कुटुंब में परिवार में सभी जन्म मिलकर रहते हैं, आज तो
- 18:30परिवार में भी झगड़े होते हैं। सोच सुचिता रहे, तुम कुछ बोलो वो
- 18:43प्रामाणिक को होना चाहिए किसने जो बोला?
- 18:46वह प्रमाणित है, यह कलुषित नहीं बोलेंगे।
- 18:55यह मन में ईर्ष्या, वैर भाव रख के नहीं बोलेंगे।
- 18:59भीतर कुछ और बाहर कुछ और ऐसा दिखावा नहीं करेगा।
- 19:06इसे कहते हैं सोच तुम शरीर को साफ करने को सोच कह देते हो लेकिन
- 19:14इतना सा सोच नहीं होता। ये भी है लेकिन मन की कलूश्ता भी
- 19:20दूर करो, ये ज्यादा जरूरी है। सो सूची का रखो तन से मंच शोज
- 19:32संतोष तृप्त जितना मिल गया उतने में ही सब्र करो।
- 19:44देखिए अगर विराट आनंद को पाना है, कहीं थोड़ा सा तालमेल बिठाना
- 19:51होगा। तुम कहोगे नहीं, हमने तो यह खाना
- 19:57है, हम तो यह खाएंगे चाउ मीन चुग्गा खाएंगे, खाओ भाई कौन रोकता
- 20:04है? पिज़्ज़ा खा लो, चाउमीन चुग्गा खा
- 20:11लो, जो चाहिए खा लो। लेकिन पतंजलि कहते हैं तालमेल
- 20:18बजाना पड़ेगा, संतोष संतोष रखना होगा।
- 20:28जो मिल गया वही नसीब था। जो मिल गया उसी को मुखतर समझ लिया
- 20:47मुखतर समझ लिया। जो खो गया मैं उसको बुलाता चला
- 20:58गया। हर फिक्र को।
- 21:02धुएं में उड़ाता चला गया। जो मिल।
- 21:09गया। उसी।
- 21:11को मुखतर समझ लिया बस। इतना ही था जो मिल गया उसी को
- 21:19मुखतर समझ लिया इसे सब्र करते तुम इतनी जल्दबाजी में हो।
- 21:27तुम इतने अधेरे में हो, जो मिल जाता है उसमें संतुष्ट नहीं होता
- 21:34है। जो खो गया मैं उसको भुलाता चला
- 21:42गया। जो खो जाता है उसे ढूंढ़ते ही
- 21:45रहता हूँ। अफ़सोस ही मनाते रहते हो लेकिन
- 21:51जीने का एक सलीका है, इन अल्फाज़ में जीने का सलीका है सबर सोच
- 22:03संतोष तप। तप का अर्थ है जो भी कुछ करो
- 22:16दष्टा भाव से करो तप तुम्हारा हाथ ही ले।
- 22:27तुम्हें पता चले ये हाथ हिला और ये हाथ हिला, ये मैं नहीं हूँ
- 22:36यहाँ से शुरू करना होगा ये मुँह हलें अल्फाज़ निकले, कंठ में से
- 22:44हवा निकले। जीवा आवाज दे, उलट पुलट हो सब
- 22:50तुम्हें दिखाई पड़े, ये तप है, इससे बड़ा तप कोई नहीं है, तुम इस
- 23:03तपस्चर्य को नहीं करते। लकड़ी का ठूँठ जला के उसके सामने
- 23:09बैठ जाते हो बसु लगा के इसे तप समझ लेते हो एक पांव पे खड़े हो
- 23:14जाते हो इसे तप समझ लेते हो? सर्द दिनों में सो घड़ा पानी से
- 23:23नहाते हो ठंडे से। इससे तप सुमित ये भी तप तो है,
- 23:33लेकिन इसके भीतर अगर 100 घड़ा पानी का गिर है और तुम उस गिरते
- 23:40हुए ठंडे पानी को शरीर के ऊपर नहारते रहो साक्षी भाव से।
- 23:44तो यह भी तो तप है अब आजकल कुंभ चल रहा है।
- 23:52कुंभ का एक मतलब यह भी था कि संत लोग जो पहुँच गए हैं वो आपको
- 23:58विधियों बताती थी ऐसा करो ऐसा करो।
- 24:05लेकिन अंत में निष्कर्ष होता था कि तुम शरीर हो नहीं, मन नहीं।
- 24:10बस इतना ही सीखने जाते थे तुम और इतना ही सिखाने आते थे वो और कोई
- 24:18कोई व्यक्ति अगर तैयार होता यहाँ थोड़ा सा।
- 24:23आराम से सुनना बात को जो व्यक्ति घर पे इतना कर चुका है इतना कर
- 24:32चुका है घर पे के बस करीब है एक छोटा सा झटका।
- 24:44जैसे सुख का पत्ता गिरे, इतनी सी आवाज तुम्हें पहुंचा जाएगी।
- 24:51बस इतनी सी कमी है वहाँ पारखी होते हैं, कोई पारखी देखेगा।
- 25:02बस थोड़ा सा शक्ति बात करेगा ना जाने कहाँ कहाँ से लोग आते हैं
- 25:08तुम एक स्थान बना दिया गया। सामूहिक केंद्र बना दिया गया
- 25:13साधकों के लिए था। पाप करने वालों को पाप धोने का ये
- 25:22मौका नहीं था जो अक्सर तुम करते हो, वहाँ पाप नहीं धुलते हैं पाप
- 25:30धुलते हैं तो किशोर प्रकार से धुलते हैं तुम जो हो।
- 25:41जो मान रहे हो उसे अलग मान रहे हो हो तुम कुछ और मान रहे हो तुम कुछ
- 25:49और यह पाप कहे, यह पाप धुल जाए। यह भ्रम टूट जाए, यह भंग हो जाए।
- 26:02मान्यता तुम्हारी तो पाप धुल गया। अगर ये टूट जाए तो तुम्हारी भ्रम
- 26:12की स्थिति। तो तुम पाप मुक्त हुए भगवान कृष्ण
- 26:18यही कहते हैं हम तुम आम सर्प पापे भ्यवमुख स्वामी माँ शुच मैं
- 26:26तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा।
- 26:28लेकिन एक शर्त पहले कहते हैं। सर्वधर्माण प्रतिजमा में कम क्षण
- 26:34वृक्ष ना तू हिंदू रह ना तू मुसलमान रह ना तू सिख, ईसाई और ना
- 26:40जाने कितने कितने और धर्म हैं, कुछ भी ना रहे कोई इंसान भी ना
- 26:48रहे। सर्वधर्माण प्रतजमा में करने
- 26:53वालों ने तो बहुत अर्थ किया इसका लेकिन एक बात तुम्हें पक्का कह
- 26:59दूँ कि वो स्तर पर पहुंचेगी। तत्व की बात इसमें एक ही है।
- 27:12वो शब्द है मान एकं मुझे एक की शरण में आशा एक को है एक वही जो
- 27:25सभी संतों ने कहा। एको अहं द्वितीय नास्त एको
- 27:35ब्राह्मण द्वितीय नष्ट ये बाबा नानक ने कहा एको कार एक, वह एक
- 27:45कौन है? उसकी शरण में आजा।
- 27:50लेकिन तुम तो अनेकों की शरण में रहते हो।
- 27:53तुम मंदिर भी चले जाते हो, गुरुद्वारा भी चले जाते हो।
- 27:56हालांकि तुम्हारा माथा टेकना नकली होता है।
- 28:04तुम चर्च भी हो आते हो। तुम घर में अखंड पाठ भी खुला देते
- 28:09हो। तुम तुलसी की रामायण भी खुला देते
- 28:15हो। तुम सुन्दर कांड भी खुला देते हो,
- 28:21तुम सहज पाठ भी रुकवा देते हो सुमणी साहब।
- 28:26तुम एक के शरण में नहीं हो, अभी तुम्हें पता नहीं कि वह एक कोण है
- 28:36और बाबा सबसे पहला शब्द बोलते हैं समाधि के बाद।
- 28:46जैसे ही बाहर आते हैं, नदिया से पहला शब्द उनके मुख से निकलता है।
- 28:53जपजी के रूप में एक ओंकार वह एक है जहाँ ओंकार की ध्वनि हो रही
- 29:03है, यह लक्षण है। यह पहचान वहाँ जाना है।
- 29:09तुमने ओंकार ओंकार का जाप नहीं करना है।
- 29:21यह शरीर तुम्हें ओंकार का जाप करने के लिए नहीं मिला।
- 29:26यह शरीर तुम्हें अपने भीतर जाकर उस ओंकार की जहाँ ध्वनि गुंजायमान
- 29:33हो रही है जहाँ से यह ध्वनि उदगम हो रही है वहाँ जाना है।
- 29:42वाजे नाद अनेक अशंका केते बाबन हारे केते राग परिसों कहण केते
- 29:52गाबन हारे वह जहाँ राग अशंक प्रकार के रागणियां।
- 30:04बज रहे हैं। मूल उदगम से ओंकार की ध्वनि प्रकट
- 30:09हो रही है। यह पहचान बताई तुमको वहाँ पहुंचना
- 30:15है और जब तक वहाँ ना पहुंचो, तुम्हारी सब ड्रामे बाजी है।
- 30:22तुम किसी कोने में किसी केंद्र में आध्यात्मिक केंद्र में बैठ के
- 30:27ओम यह करते रहो, कुछ ना होगा फिर तो गाने गा लो या गाने निकाल लो
- 30:35या ओंकार का जाप कर लो सब बराबर है।
- 30:39कोई शब्द जीवा को पवितरण नहीं करता, कोई शब्द जीवा को अपवितरण
- 30:45नहीं करता, मन को पवित्र पवित्र कर जाता है क्योंकि तुमने शब्दों
- 30:53के साथ वस्तुओं को जोड़ रखा है। जब तुम शब्दों का नाम लेते हो तो
- 31:02वो वस्तु सामने आ जाती है, बस वो तुम्हारे मन में इमेज बन जाती है।
- 31:09तुम कहोगे सेव तो सेव आ जाएगा, तुम मरमूत्र का नाम लोगे तो वो आ
- 31:15जाएगा। शब्द तुमने जो प्रयोग किया उसके
- 31:18साथ अटैचमेंट है। तुम्हारी चीजों की वह प्रकट हो
- 31:22जाती है, लेकिन अगर तुम किसी और शब्द के साथ उसे शुरू में अटैच कर
- 31:29लेते और किसी और चीज़ के साथ संस्कार बन जाता तो मेरा उन
- 31:34शब्दों से। तो आज तुम जब वो शब्द बोलते तो वो
- 31:41चीज़ सामने आ जाती। तुमने कद्दू का नाम सेब रख लिया
- 31:46होता तो जब तुम सेब बोलते तो तुम्हारे सामने तस्वीर आती कद्दू
- 31:51के। तुमने सेब का नाम कद्दू रख लिया
- 31:55होता तो जब तुम कद्दू बोलते तुम्हारे सामने तस्वीर आती सेब के
- 32:02ये तुम्हारे संस्कार हैं गहरे होते होते गहरे चले गए।
- 32:07आज तुम्हारे मन में इनकी छवि आ जाती है।
- 32:11शब्दों के साथ इनका घनिष्ठतम संबंध तुमने जोड़ लिया है अन्यथा
- 32:17शब्द अपने आप में कोई अहमियत या अर्थ नहीं रखते।
- 32:26सोच संतोष, तप। तब देखो ये धोना कौन ताप रहा है
- 32:37ऐसा ही कर लो धोनी के सामने बैठ जाओ।
- 32:45तो ये कुंभ की बात मैं कर रहा था कुंभ में तुम जाते हो वहाँ ऋषि गण
- 32:50आते हैं, पहुंचे हुए लोग आते हैं। जिन्होंने आपका जान दिया वो
- 32:55अंतर्दृष्टि रखते हैं। वो तुम्हारे आभामंडल को देख लेते
- 32:59हैं। मैं जाने कहाँ कहाँ से विश्वाभर
- 33:03से लोग आएँगे। और संत भी आएँगे।
- 33:11किसी संत का पता नहीं है तुम्हें क्योंकि आँखें नहीं हैं, अंधे को
- 33:16ना तो सूरज दिखता है, ना दिया जल दिखता है ना तारे दिखते हैं।
- 33:23अंधे को कुछ भी नहीं दिखता। तो न तो तुम्हें शांत दिखेगा, न
- 33:31ही तुम्हें पीपासू दिखेगा मोमुक्षु यह थोड़ी सी चोट से
- 33:37पहुँच जायेगा। उसने अपनी धरा तैयार कर ली है
- 33:42उसने अपनी जमीन। हैलो करके पानी देके खाद देके सब
- 33:49तैयार कर लिया है तो गुरु उसमें बीज डाल देगा।
- 33:56अंकुरित हो जाएगा बीज जब वह संत देखेगा तुम कहीं से भी आए हो।
- 34:08संत तुम्हारी वाणी से तो मैं नहीं पहचानना संत के पास एक और आंख है
- 34:14तुम्हें पहचानने की, वह उस आंख से तुम्हारा औरत दिखता है तुम कुछ भी
- 34:20बोले जाओ। तुम कहो मैं ज्ञानी से ज्ञानी
- 34:28हूँ, तुम्हारे शब्दों की तरफ वो क्या नहीं करता?
- 34:34इसलिए संत अक्सर बहरा होता है। तुम्हारे शब्दों के प्रति।
- 34:40वो तुम्हारी सुनता नहीं क्योंकि शून्य से ज्यादा देखने पर विश्वास
- 34:47करता है। वो जानता है कि जब तुम देख सकते
- 34:51हो इसका ओरा मंडल तो यह क्या कहता है?
- 34:57वो तो गलत भी हो सकता है। इसकी मान्यता भी हो सकती है।
- 35:03ये भ्रम भी हो सकता है और अक्सर तो सारी दुनिया भ्रम में पड़ी है
- 35:08और अगर ये संत नहीं जानता तो फिर कौन जानता है?
- 35:12सारी दुनिया भ्रम में है, संत ये बखूबी जानता है।
- 35:19कि सारी दुनिया मैं शरीर हूँ, ये जानती है जानती बनती कुछ नहीं,
- 35:30मैं मन हूँ। मेरे विचारों को इसने आघात पहुंचा
- 35:35दिया। दावा कर देते हो तुम जाके
- 35:41500,00,00,000 का मेरी मान हानि करती तो ₹500,00,00,000 तो और
- 35:52तुम्हारी कीमत कितनी है? संत कहते हैं जब ये जलाया जाएगा
- 36:00तो इसके भीतर से ₹5 छि आने का माल निकलेगा।
- 36:04कितना कैल्शियम कितना फसफोरस कितना कुछ बचेगा ये ₹5 छि आने का
- 36:11माल है और तुमने डिमॅंड कर दिया। 500।
- 36:21अक्सर ही तुम अपनी वैल्यू बढ़ चढ़ के लगा दिया करते हो।
- 36:25यह स्वभाव है तुम्हारा तो शांत तुम्हारे पे शक्तिपात करेगा जब वो
- 36:35देखेगा यह तो पूछा पूछा और तुम वहाँ से?
- 36:44तीर्थ स्नान करके आओगे, समझ गए हाँ ये होता है तीर्थ स्नान, तुम
- 36:54वहाँ जाओगे, तुम्हें पता भी नहीं है लेकिन हल्की हल्की मंद मंद
- 36:58खुशबू आती है। क्योंकि वह जब करीब होता है तो
- 37:05उसकी करीबी का एहसास होने लग जाता है।
- 37:09कमिंग इवेंट्स कास्ट दे आर शेडोस बिफोर आने वाली घटनाएं अपनी
- 37:15परछाइयां पहले से फेंकना शुरू कर देती हैं।
- 37:20मुझे पूछते हैं लोग क्या पता लगे कि हम पहुंचने वाले हैं?
- 37:24मैंने कहा सुगंध आनंद की सुगंध आनंद की सुगंध आएगी, मन खिला खिला
- 37:32रहेगा। मन फूला फूला रहेगा, आनंद की
- 37:44खुशबू से सराफ और उसके रस को पीता हुआ है और निर्लिप्त होगा।
- 37:56फूला फूला फिर है, जगत में कैसा नाता रह।
- 38:03कोई नाता नहीं उसका। फूला फूला फिर है, जगत में कैसा
- 38:12नाता रह। उसका कोई कुछ नहीं है।
- 38:17बाहर से सब निभाएगा, अंदर से वो निर्लिप्त रहेगा।
- 38:27भीतर की खुशबू उसे निर्लिप्तता देती है।
- 38:33काहे रे? बन ढूंढन जा है।
- 38:42वह जो गट गट का वासी है, वह तेरे संग ही समाया हुआ है।
- 38:59सर्व निवासी सदा अलीबा सबके भीतर रमने वाला रोए।
- 39:09रोए में रमने वाला वह सदा अलीबा सब में रम भी रहा है।
- 39:20और नलिप्त भी है। अब ये शब्दों में बात समझ नहीं
- 39:23आएगी जो तुम समझना चाहते हो न मुझे अक्सर तुम कहते हो समझ नहीं
- 39:29बाबा फिर समझाओ नहीं समझाएगी मैं फिर समझा देता हूँ।
- 39:35लेकिन बखूबी जानता हूँ कि समझ में फिर भी नहीं आएगा।
- 39:41सर्बव्यापी कण कण में मौजूद है, वह सदा अलेपा फिर भी निर्लिप्त है
- 39:51तोहे संग समाई। तेरे भीतर ही है कहाँ ढूंढता है
- 39:58बन मैं? का है रे बन डों।
- 40:17काहे रे बन ढूंढ न जाए सरबया की? सदा अलेपा सर्वव्यापी सदा अलेपा
- 40:45तो है संग समा। तो है संग समाज काय रे रे बन
- 41:03ढूंढन जा। सर्व निवासी सर्वव्यापी सदा
- 41:14अलेप्पा तोहे संग समाये कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन क्या
- 41:24करें? लोभी लालची तुम्हें कुछ शब्दों के
- 41:37भ्रमजाल में फैला कर भ्रम देते हैं कि हाँ बता दिया आपने।
- 41:48उपनिषद बताया तो ये अपने उस अंश के करीब पहुंचेगा।
- 42:00क्यों नहीं गए अपने उस स्तर पे? सारी गीता तुमने समझा दी, लेकिन
- 42:07गीत तो नहीं गाया क्या? अष्टावक्र तो समझा देते हैं यह,
- 42:15लेकिन इनके भीतर वो आठ चक्र बने ही रहते हैं अज्ञान के।
- 42:27मंतव्य कोई और है। कितनी ही कोशिश कर लें बेहद
- 42:35समझाना पाओगे अगर ये इन्हें पता चल जाता।
- 42:42तो पहले हाथ जोड़ लेते कि भाई देखो समझा तो उन्हें पांव का
- 42:48इशारे कर के कोशिश कर लेता हूँ। तुम पकड़ पाओ तो तो फिर बताता है
- 42:56वो रहा चंद्रमा, लेकिन उन्हें पता है जब तुम कहोगे वो रहा चंद्रमा।
- 43:02तुम इसके टॉप को पकड़ लोगे नहीं है यहाँ है नहीं, पक्का है, मेरी
- 43:09आँखें हैं, मैं देखता हूँ यहाँ चंद्रमा नहीं है।
- 43:13अरे भाई ये तो समझाया भी नहीं था कि ऊँगली के टॉप के ऊपर चंद्रमा
- 43:20है। यह तो समझाया भी कहाँ था?
- 43:24समझाया था कि इसकी स्ट्रेट लाइन में देखो ऊपर आसमान में तो दिखेगा
- 43:31चंद्रमा तो तुम समझ नहीं पाते हो तुम कहते हो और तुम समझना चाहते
- 43:40हो? जो समझ में आता है।
- 43:47संतों ने भी कहा आज तो वैज्ञानिक भी कहते हैं इस नॉट ओनली अननोन बट
- 43:53ऑल्सो अननोनबल। लेकिन क्या करें ये सदगुरु इनकी
- 43:58समझ में आ गया। ये बड़े बड़े हैं।
- 44:03व्याख्याकार इनकी समझ में आ गया, इन्होंने जान लिया।
- 44:10संत भी कहते हैं वह जाना नहीं जा सकता और आज तो अल्बर्ट आइंस्टीन
- 44:17भी भूल गया। नहीं जाना जाएगा वो ऐसा नहीं कि
- 44:22वो जाना नहीं गया। ऐसा है कि वो जाना नहीं जा सकता।
- 44:27अननोनेबल तो माथा कपाई करनी बंद कर दो भाई जब वो जाना ही नहीं जा
- 44:36सकता। फिर भी तुम्हारा मन कहता है, शायद
- 44:42शायद ये बता दे, ये कोई नई मिट्टी का बना है क्या?
- 44:47नहीं जाना जाएगा वो, इसलिए तुम सूचनाओं को इकट्ठा करने की चेष्टा
- 44:56न करो। जो तुम्हें सूचनाएं देना शुरू
- 45:01करें, उसके बाबत तो उसे कह दो भाई बी क्विट चुप हो जाओ।
- 45:08हाँ ऐसे मिल जाएगा, समझाने से नहीं मिलेगा, समझ नहीं आएगा।
- 45:17बोलने से उससे बोला नहीं जाएगा और वह खुद नहीं जानता क्योंकि उसने
- 45:23वो रस पिया नहीं। बह रस है रस कभी बोला जा सकता है
- 45:30रस कभी समझाया जा सकता है। कबीर कहते हैं, जों गूंगा गुड़
- 45:36खाई के कहे कौन मुख स्वाद गूंगा गुड़ को खा ले, स्वाद कहे कैसे,
- 45:45बस आँखों की चमक बताये तो बताये उसको तुम पकड़ पाओ तो पकड़ पाओ।
- 45:52नहीं तो वह बताने में असमर्थ है क्योंकि जबान नहीं है, याने शब्द
- 45:57नहीं है और ये शब्दों से ही तुम्हें समझाने की चेष्टा करते
- 46:02हैं। ये कहते हैं शब्द ही सब कुछ है जो
- 46:08कहे कि शब्द ही सब कुछ है, मैं समझा दूंगा तुम्हें।
- 46:13वह अबुल दर्जे का मूर्ख है, इसलिए संत बोलता है, खूब बोलता है,
- 46:26लेकिन ये भी कह देता है कि नहीं बोला क्या इच्छा थी बोलने की?
- 46:33करुणा थी भीतर से कि सब बोल दूं लेकिन एक अंश भी नहीं बोला गया।
- 46:39सब तो बहुत दूर तो क्षमा करना बोला नहीं गया बोला नहीं जा सकता।
- 46:52सोच संतोष तब शब्द है ईश्वर प्रणीधाम शब्द है शय का अध्ययन
- 47:02आखिर तुम हो कौन? हू आर यू?
- 47:09स्वयं का अध्ययन करो, सर्च और सर्व किताबें मत पढ़ो, किताबें
- 47:15नहीं बताएंगे, स्वयं खुद का अध्ययन करो, शास्त्रों का अध्ययन
- 47:21न करो, शास्त्र स्वयं नहीं है, शास्त्र पर है।
- 47:27जब तुम शास्त्र पढ़ते हो और कहते हो स्वाध्याय कर रहा हूँ, तो तुम
- 47:32गलती कर रहे हो। शास्त्र को पढ़ना पराध्यय है पर
- 47:42का अध्ययन है, स्वाध्याय नहीं। स्वाध्याय स्वय का अध्ययन
- 47:49स्वाध्याय के लिए स्वय के भीतर जाना होगा।
- 47:53प्राध्याय के लिए शास्त्र पढ़ लो कोई बात नहीं लेकिन तुम कमाल की
- 48:00बात है, शास्त्र पढ़ते और कहते हो स्वाध्याय कर रहा हूँ।
- 48:06शब्दों में उलझो मत शब्द तुम्हें उलझाते हैं इसलिए मैं कहता हूँ
- 48:14शब्दों को छोड़ दो शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ ऐसे करो।
- 48:22जैसे तुम्हारे पांव में काँटा चूहा और तुमने दूसरे कांटे से उस
- 48:28काँटे को निकाल दिया जैसे ही तुमने काँटा निकाला अपने पांव का,
- 48:35दूसरे काँटे की सहायता से। तो क्या तुम जीस कांटे से तुमने
- 48:42अपना पैर का काँटा निकाला हो वो भी रख लेते हो नहीं उस कांटे को
- 48:49भी फेंक देते हो जो काँटा पांव में था उसको भी फेंक देते हो
- 48:56जिससे निकाला उसको भी फेंक देते हो।
- 48:59बस उसका जितना काम था कर लिया। अब ये बेकार है।
- 49:04अब काँटा निकल गया अब ये भी बेकार है।
- 49:08फोर्स भी बेकार है जिससे वो काँटा खींचा वो भी बेकार है।
- 49:15शब्दों का उपयोग इस तरह कर लो। इसलिए संत कहते हैं मुझे सुन लो,
- 49:24फोर शेप की तरह काम आऊंगा तुम्हारे शब्दों को काटू को मेरे
- 49:34काँटे से। काट दूंगा और फिर मेरे काटे को भी
- 49:40फेंक देना और वह जो तुम्हारे शब्दों का कांटा था, वह भी फेंका
- 49:45गया। दोनों फेंक गए और तुम्हारा दर्द
- 49:48खत्म हुआ। मेरे भी शब्दों को हृदय में संभाल
- 49:54के मत रख लेना। बहुत से लोग लिख लेते हैं।
- 49:59बाबा ने ये बोला ये गलती मत करना क्योंकि तुमने अंतिम उस छोर पे
- 50:06जाना है जहाँ कोई शब्द बचता नहीं, सिर्फ धुन बजती है जो बाबा ने
- 50:14कहा। जो भूले, शाह ने कहा मस्जिद खोलो
- 50:20जीवडा डरया जीब डर गया मस्जिद के पास चारदवारी के भीतर सांस फूलने
- 50:27लगा रुकने लगा मैंने तो भागा मैं तो मस्जिद खोलो।
- 50:33जोड़ा डरया जा ठाकुर दे डेरे बढ़िया ठाकुर के डेरे में चला
- 50:42गया। चित्थे वैदे नाद 1000 ये लक्षण।
- 50:51जैसे तुम्हें बताएं कि अगर तुम वहाँ जाओगे ना, ये माइलस्टोन
- 50:57मिलेगा तुम्हें ऐसा एक वृक्ष खड़ा होगा फला वृक्ष होगा, घना होगा या
- 51:06ये ये लक्षण होंगे तो बस वहीं तुम रुक जाना।
- 51:12वो तुम्हारी मंजिल है, तो सभी शांत तुम्हें उस गंतव्य सतल के
- 51:19लक्षण बताते हैं, ये लक्षण वहाँ आनंद है।
- 51:28वहाँ शांति ही शांति है, कोमलता ही कोमलता है, वहाँ मौन है, कोई
- 51:37शोर न है, ज़रा भी वहाँ उथल पुथल नहीं, कोई लहर नहीं।
- 51:51कोई विचार नहीं होता, न भावना होती है, न विचार होती है।
- 51:56ये दोनों तरंगे हैं और तरंगे उथल पुथल होती है।
- 52:02न कोई विचार बचेगा, न कोई भावना बचेगी शुद्धतम रूप में तुम्हें
- 52:08बचोगे। वहाँ ठहर जाना वहाँ तुम ठहर ही
- 52:13जाओगे, क्योंकि जब रस मिल जाएगा प्यासी रोग को, तो वह तो पीना
- 52:23शुरू कर देगा। जन्मो जन्मो के तुम प्यासे, तुम
- 52:29ऐसे पड़ोगे। उसको जैसे भूखा खाने को पड़ता है,
- 52:35तुम कहोगे थोड़ी सी और दे दे और। ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी
- 52:46और। और।
- 52:50ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और कैसे रहूं चुप के।
- 52:57मैंने पी ही क्या है। होश अभी तक है बाकी और ज़रा सी दे
- 53:07दे साखी। और ज़रा सी और।
- 53:12फिर तुम ऐसे पढ़ोगे जल्दी करो, पैक डाल दो और गटक लोगे।
- 53:19फिर साकी से कहोगे ऑर्डर अभी तो होश बाकी है।
- 53:28अभी तो शुद्ध कोई नहीं और ढालते तू ढालता जा।
- 53:34साथ ही मैं पीता जाऊंगा। आज आज जागरण की रात है।
- 53:46आज नींद नहीं आएगी। आज तो पिलाई जा साथिया, आज हमें
- 53:57नींद नहीं। आएगी, सुना है तेरी महफिल्में।
- 54:05रत जगा है सुना है तेरी महफिल्में रत जगा है।
- 54:14आँखों ही आँखों में रात। कट जाएगी मैं।
- 54:22दुखों की रात कट जाएगी। बस बेला दे अभी होश बाकी है।
- 54:30सुना है तेरी महफिल्में रत जगह है, सुना है तेरी महफिल्में रत
- 54:40जगह है। तो कुंभ का यही मतलब कोई तुम्हें
- 54:50पहला देगा वो होगा तीर्थ स्नान जाते हैं करोड़ों बाद में
- 54:5640,00,00,000 आप में जाएंगे। कोई सौभाग्यशाली वहाँ से तीर्थ
- 55:02स्नान करके लौटेगा, बाकी बैरंग लौट जाएंगे।
- 55:10जो अमृत को जानकर लौटा, जो अमृत को पीकर लौटा वह भाग्यशाली हुआ और
- 55:18ऐसा? कोई एक जो पीने के योग्य होंगे
- 55:25उन्हें फैला दी जाएगी, वो प्यासे वापस नहीं आएँगे।
- 55:33ये कुंभ भरा हो रहा है लेकिन प्यास भी तो आनी चाहिए।
- 55:40ब्यास जगे तो वहाँ जरूर जाना हिल स्टेशन देखने के लिए मत जाना
- 55:47त्रिवेणी संगम को देखने के लिए मचाना वो तो तुम मूर्ति माँ भी
- 55:55देख सकते हो। लेकिन तुम जाना तुम तब जाना जब
- 56:02प्यास लगी हो उस कुंभ में पानी पीने के लिए उस कुंभ में अमृत
- 56:06पीने के लिए है। वह अमृत का कुंभ है जिसे जयंत ले
- 56:11के भागा था। इंद्र का पुत्र कहानियों हैं।
- 56:15कहा तो सब कुछ गया। तुम समझने वाले भी तो होने चाहिए
- 56:19ना वह है अमृत कुंड जो धन्वंतरि महाराज लेके आए भीतर से कलश उसमें
- 56:32अमृत तो भरा है लेकिन तुम्हें प्यास लगी है।
- 56:39अगर लगी है तो तुम्हारी प्यास बूझ जाएगी, अगर नहीं लगी तो जैसे गए
- 56:46वैसे ही सोने सोने आ जाओ तो यहाँ से जाना प्यास जगा के जाना।
- 56:55फिर कुंभ जाना फिर गुरु के पास जाना, कहीं भी जाना प्यास बूझ
- 56:59जाएगी। ये था कुंभ का अर्थ इस ठंडी में
- 57:11बर्फ़ के पानी में तुम खड़े रहोगे तो थोड़ी देर देखना।
- 57:21ठर जाएगा सब कुछ जस से सुक्रात ने कहा कि मेरे पांव सुन हो गए, तुम
- 57:34भी देखना पांव सुन हो गए। सुन्न हो गए तो मैं नहीं पांव मैं
- 57:41नहीं, मैं इन पांवों को देखने वाला हूँ।
- 57:47पांव जब जागृत थे तब भी जागृत रूप में देख रहा था, अब सुन्न हो गए
- 57:52तो सुन्न रूप में देख रहा हूँ। मैं दृष्टता हूँ, मैं साक्षी हूँ,
- 57:56मैं देखने वाला हूँ वेटनेस हूँ बहुत तरीके से वहाँ मिलते थे आपको
- 58:12लक्ष्य बड़ी झलकें मिलती हैं। आनंद की है, लेकिन तुम योग्य भी
- 58:23तो होने चाहिए। फिर तरंगें तो गुजर रही हैं, यहाँ
- 58:30से गीत भी चल रहे हैं। लेकिन अगर तुम्हारे पास
- 58:35फ्रीक्वेन्सी को पकड़ने वाला रेडियो नहीं है तो गीत कैसे
- 58:41निकलेगा, कैसे प्रकट होगा? गीत प्रकट होगा जब तुम्हारे पास
- 58:48वो यंत्र है जो यहाँ से गुजरते हुए।
- 58:57उस गीत को पकड़ सकता है फ्रीक्वेन्सी के ऊपर आकर कमी है,
- 59:04तुम्हारे यंत्र में गुजर तो रहा है यहाँ से तुम्हें क्या पता यहाँ
- 59:11से कितने चित्र गुजर रहे हैं। जीतने चैनल चल रहे हैं, इतने चैनल
- 59:17चल रहे हैं लेकिन तुम्हारे पास यंत्र कहाँ है?
- 59:22इन चैनलों की तस्वीरों को यहाँ तक लाने के लिए यंत्र नहीं है।
- 59:26तुम्हारे पास यंत्र हो तो ये तस्वीरें प्रकट भी हो सकती हैं।
- 59:31बिल्कुल ऐसा ही खुद को यंत्र बनाना होगा।
- 59:36इसे ही मैं तैयारी करता हूँ। खुद को इतना सेंसिटिव बना लो और
- 59:43ये 10 चीजें हैं इनका सहारा लेके है झूठ मत बोलो।
- 59:55अगर राजनीति करनी है तो मजबूरी है, वो तो बोलना पड़ेगा।
- 1:00:01ईमानदारी से राजनीति होती है। बेईमान और झूठे लोग राजनीति में
- 1:00:08जाते हैं। उन्हें झूठ बोलना ही पड़ेगा।
- 1:00:15जैसे तैसे बोलें बोलेंगे मजबूर है क्या कहें?
- 1:00:24लेकिन पतंजलि कहते राजनीति की बात क्या करते?
- 1:00:27पतंजलि कहते हैं। आनंद की तरफ जाना है, उस खुशबू से
- 1:00:34गले मिलना है, उसको आगोश में लेना है तो फिर तुम सत्य बोलो, झूठ मत
- 1:00:41बोलो। सत्य बोलने से व्यक्ति वन
- 1:00:45डायमेंशन होता है। झूठ होल से व्यक्ति
- 1:00:49मल्टीडायमेंशनल होता है और जैसे तुम वॅन डाइमेंशनल नहीं होगे तो
- 1:00:55उस एक के पास नहीं पहुंचोगे। एक होकर ही एक के पास पहुंचा जा
- 1:01:00सकता है। पानी की बूंद होकर ही समुद्र में
- 1:01:03समाया जा सकता है। तुम अगर सोचो कि तुम हो तो नमक।
- 1:01:10और समुद्र में समा जाओगे, समा तो जाओगे, लेकिन रहोगे अलग ही
- 1:01:17एनएसीएल एच टू ओह के बीच में समाहित नहीं होता ध्यान रखना
- 1:01:23एनएसीएल एच टू ओह में घोल जाता है।
- 1:01:27मिल नहीं जाता, लेकिन एच टू ओह एच टू ओह में मिल जाता है।
- 1:01:34पानी की बूंद समुद्र में मिल जाती है, लेकिन नमक समुद्र में घोल
- 1:01:40जाता है। तुम घोल तो सकते हो मिल रहे हैं
- 1:01:44सड़ते और बात तो मिलन की है। जब तक मिलोगे नहीं शब्द और श्रुति
- 1:01:53का मिलान नहीं होगा, तुम्हारी चेतना परम चेतना से मिलेंगे नहीं,
- 1:02:02बूँद समुद्र में मिलेंगे, नहीं तो एक आकार कैसे होगी?
- 1:02:08एकाकार यानी बूंद समुद्र बनेगी। कैसे मिले बिना बूंद समुद्र बन
- 1:02:19नहीं सकते इसलिए नमक का सदा ही घुला घुला रह जाता है।
- 1:02:25मिलता कभी नहीं आनंद नहीं मान सकता नमक समुद्र का आनंद नहीं मान
- 1:02:32सकता, अलग रहेगा सदा अलग रहेगा तुम भी सदा लगो परमात्मा के बीच
- 1:02:40में ही विचर रही हो सारा दिन रात। हर घड़ी हर पल तुम्हारा परमात्मा
- 1:02:48के भीतर ही गुजर रहा है, लेकिन फिर भी तुम दुखी हो क्यों क्योंकि
- 1:02:56मिले नहीं अगर तुम एनएसीएल के बजाय एच टू ओह हो जाओ।
- 1:03:05फिर तुम मिल जाओगे, मुझे एनलाइटनमेंट हुई और मैं घर आया सो
- 1:03:13गया। सुबह जब मैं उठा 9:00 बजे के करीब
- 1:03:17तो मैं घर से दुकान की तरफ जाने लगा।
- 1:03:19मुझे अद्भुत दृश्य दिखाई पड़ा। दो तरह के दृश्य दिखाई पड़े।
- 1:03:26मैं चल रहा हूँ एक तरफ तो मैं चल रहा हूँ और कोई विशाल अस्तित्व
- 1:03:34खड़ा है, उसको चीर कर चल रहा हूँ और दूसरी तरफ।
- 1:03:42मैं विशाल अस्तित्व हूँ और ये शरीर चला जा रहा है जकसा दो चीज़,
- 1:03:50कभी वो कभी वो, कभी वो सारे ट्रक, ये सारी बसें, ये सारे आदमी मुझ
- 1:03:59में चल रहे हैं। हैरान हो गया।
- 1:04:03मैं उस दिन समझ में आया हूँ कि यह अस्तित्व लग नहीं देखने का ढंग
- 1:04:16बदल जाता है। कभी मैं अस्तित्व में चल रहा हूँ,
- 1:04:22कभी अस्तित्व मेरे में चल रहा है, इधर हो जाता हूँ तो अस्तित्व मेरे
- 1:04:30में चलता है, उधर हो जाता हूँ तो मैं अस्तित्व में चलता हूँ, इसे
- 1:04:37ही माया कहा। शंकराचार्य ने बदल जाता है, जो
- 1:04:45थोड़ा सा नजरिया बदलो, तुम अभी पहुँच सकते हो, शिक्षण पहुँच सकते
- 1:04:51हो, ढेर न बस नजरिया बदलना होगा। तो मैं ट्रांसफार्मर में होना
- 1:04:59पड़ेगा। तुम जब तक नमक हो तब तक घूले
- 1:05:03रहोगे, बन जाओ, पानी की बूंद मिल जाओगे, नमक रहोगे तो घूले रहोगे
- 1:05:14रहोगे समुद्र में। आनंदित नहीं होंगे, दुखी रहोगे।
- 1:05:20नमक कभी सुखी नहीं होता। नमक कभी आनंदित नहीं होता।
- 1:05:25क्यों अलग रहता है सदा तुम्हारा अस्तित्व?
- 1:05:30समुद्र के अस्तित्व से अलग बना रहेगा नमक की तरह।
- 1:05:37बहुत से लोग समझते नहीं। मुझे प्रश्न किया, मैं जवाब दे
- 1:05:41रहा हूँ, ध्यान से सुन लें, तुम कहते हो हम संसार में रहते हैं तो
- 1:05:48फिर संसार से अलग क्यों रहते हैं? हम परमात्मा में रहते हैं, चारों
- 1:05:52तरफ परमात्मा। फिर परमात्मा से अलग क्यों?
- 1:05:58बस तुम एनएसीएल की तरह रह रहे हो तुम नमक की तरह हो, घोल तो गए हो,
- 1:06:05मिल नहीं गए यू विल हैव टू ट्रांसफॉर्म।
- 1:06:11फ्रम एनएसीएल टु हेच ए टु तुम्हें नमक से ढलना होगा पानी में फिर
- 1:06:20पानी हो के तुम मिल जाओगे, इसे ही प्रेम कहते हैं।
- 1:06:32जिसे कबीर कहते हैं अगर चाब है ना तुम्हें तो अपना अस्तित्व खो दे।
- 1:06:39नमक अपना अस्तित्व खोएगा तो फिर पानी बनेगा।
- 1:06:46लेकिन अपना अस्तित्व तो खायेगा ना?
- 1:06:49तुम चाहते हो मैं तुम्हारी इच्छा को बड़ी अच्छी तरह से समझता हूँ
- 1:06:54इन गलियों में मैं खेल के ही निकला हुआ हूँ इसलिए गुरु से कुछ
- 1:06:59छुपा न सकोगे तुम क्योंकि गुरु पक्का खिलाड़ी है।
- 1:07:05वो भी इन गलियों की धूलों में बहुत राख छाने इन्हीं गलियों से
- 1:07:11गुजर के गया हुआ खिलाड़ी है। वो उसको धोखा न दे पाओगे।
- 1:07:20गुरु इन्हीं गलियों में खेला है। गुरु भी कभी अलग था।
- 1:07:26दुखित और जैसे ही ट्रांसफार्मर हुआ नमक से पानी में झट से मिल
- 1:07:37गया, घुला था पहले। ट्रांसफार्म हुआ, पानी में झट से
- 1:07:48मिल गया। बस इतनी ही बात है, यही तो बुल्ले
- 1:07:52शाह कहते हैं रब दा कीपणा उदनों पुटना, एनएसीएल से पुट लो ते अंदर
- 1:07:59लाना और एचटू वो हो जाओ। नमक अहो नमक से पानी बन जाओ, इतना
- 1:08:13सा ट्रांसफॉर्म तो करना पड़ेगा और तुम तुम्हें इतने से तकलीफ होती
- 1:08:17है। तुम कहते हो ये तो न हो सकेगा
- 1:08:19बाबा। फिर अगर ये ना हो सकेगा तो वो भी
- 1:08:23ना हो सकेगा। यही तो शर्त पूरी करनी होती है।
- 1:08:29हर चीज़ का विधान है। विधान को पूरे किए बिना वो
- 1:08:33प्रोसेसर कंप्लीट नहीं होती। तुम्हें पानी भरना होगा, पानी के
- 1:08:42बूंद ही मिल सकती है। समुद्र में समुद्र होना चाहते हो,
- 1:08:49महा आनंद होना चाहते हो तो अपना शेरू भी चेंज करो।
- 1:08:59इस अंह का रूपी नमक को गला दो और पानी रूपी बूंद हो जाओ।
- 1:09:08मिल जाओ, समुद्र में मिल जाओगे, पानी हो के मिल जाओगे, नमक हो के
- 1:09:16नहीं मिल सकोगे नमक हो के तो गुले रहोगे।
- 1:09:27तो विशिष्ट कहते हैं, भगवान राम को नर्वशा हो जाओ, सब्जेक्ट्स को
- 1:09:36कोलेक्ट करना बंद करो। सूचनाओं को संग्रहित करना बंद
- 1:09:40करो। ये तुमसे वो न सकेगा क्यों?
- 1:09:44क्योंकि यु पीएससी करना है, आई ए एस बनना है पीसी एस बनना है,
- 1:09:48डॉक्टर बनना है, इंजीनियर बनना है, ये तुम्हारी मजबूरी है।
- 1:09:59फिर वशिष्ठ कहते हैं कि अगर तुमने कुछ बनना है तो फिर होने की फिक्र
- 1:10:04ना करो। बनना है तो बन का ही स्वाद देख
- 1:10:09लो, पहले चख लो, आई ए एस बन जाओ। पीसी एस बन जाओ कोलेक्ट बन के देख
- 1:10:18लो भाई कौन कहता है तो राम से कहते हैं गुरु विशिष्ट के विषयों
- 1:10:26का क्या करो? विषय सब्जेक्ट्स और विषय बेकार और
- 1:10:33बोलझो मत। सूचनाओं यह विषयों की सूचनाएं
- 1:10:38होती है। सूचनाओं को इकट्ठा करनी बंद कर दो
- 1:10:48और क्या बताते हैं तुम्हारे सद्गुरु देखिए अध्यात्मिक हैं
- 1:10:54क्या खा कर अध्यात्मिक हैं? जो तुम्हें रोज़ कॉन्स्टिट्यूशन
- 1:10:59से मुक्त कराने के लिए दवाब बताते हैं, वो वैद्य हैं या अध्यात्मिक
- 1:11:08हकीम है या अध्यात्मिक? सारे दिन यही काम?
- 1:11:17क्या कहें इनसे और कर को देख लेना कोई व्यापार शुरू कर दें कर ही
- 1:11:23दिया है मैंने सुना मन लोभी मन लालची मन चल मन चोप।
- 1:11:36और तुम इनके पीछे लग जाते हो, ये व्यापार करते हैं, तुम्हें ऑफलाइन
- 1:11:41से खाएंगे ऑनलाइन से खाएंगे यहाँ आ जाओ, शर्म लगा लो हमारे कोर्स
- 1:11:49को ले लो। हमारे से संपर्क में आ जाओ, सीख
- 1:11:52लो गीता ऐसे बड़े खिलाड़ी तुम्हें मिल जाएंगे, लेकिन धोखा है बड़े
- 1:12:02धोखे हैं बड़े धोखे हैं इस राह में।
- 1:12:08बाबू जी धीरे। चलना प्यार में ज़रा मैं।
- 1:12:15चलना संभलना बड़े धोखे हैं बड़े धोखे हैं इसरारों में।
- 1:12:25बाबू जी धीरे चलना। प्यार।
- 1:12:29में ज़रा संभलना तुम कहाँ जा रहे हो जनाब, इधर से सूचना इकट्ठी कर
- 1:12:43ली, उधर से सूचना इकट्ठी कर ली कर लो।
- 1:12:47अगर तुमने लेक्चरर बनना है तो सूचना इकट्ठी कर लो, इंजीनियर
- 1:12:52बनना है, डॉक्टर बनना है, आईएएस करना है, आईपीएस करना है, पीसीएस
- 1:12:58करना है, सूचना इकट्ठी करो करनी पड़ेगी, लेकिन वो ख्वाहिश है।
- 1:13:06और ये सारे लोग आपकी ख्वाहिशों को पूर्ण कर रहे हैं।
- 1:13:09अच्छा कर रहे हैं, कुछ तो कर गुज़रो किसी का स्वाद तो चखो बैठे
- 1:13:17न रहो कहीं तो पता लगे कुछ भोगोगे तो वैराग्य होगा।
- 1:13:25या तो भोग लो या ठहर जाओ, कोई मार्ग तो चुनो ना भाई लेडी ने तो
- 1:13:34अच्छे नहीं होते या तो भोग लो भोग से दुख मिलेगा, ये पक्का है दुख
- 1:13:41मिलेगा। क्योंकि संत जो देख लेता है वो
- 1:13:46बड़ी खुली आँखों से देखता है और बैठ जाता है, देख लेता है भोग में
- 1:13:52दुख है दुख से वैराग्य और वैराग्य से मुँह मूक्षा और मुँह मूक्षा से
- 1:13:57मुक्ति हो जाती है। ऐसी देसी सीली है जो अष्टावक्र ने
- 1:14:03बताई। तुम न तो भोगते हो, न तुम्हें
- 1:14:08भोगने देते हैं। ये राजनीति के खुद ही भोग लेते
- 1:14:11हैं या तुम भोग लो और भोग के इन भोगों से मुक्त हो जाओगे।
- 1:14:22क्यों? क्योंकि भोगों में दुख मिलेगा या
- 1:14:26ठहर जाओ। ठहरने से क्या होगा ठहरने से तुम
- 1:14:30अपने भीतर उतरोगे और अंततः वो पालोगे किथे वायदे न ध 1000 इश्क
- 1:14:41दी नमियो नमिं बाशा एक अंकार जहाँ अहंकार की ध्वनि का गुंजार होता
- 1:14:50है, ये जो दूर तनक में सुनाई पड़ती है, अनदरुब यह अनादनाथ।
- 1:14:59जो वहाँ से उदगम होता है जहाँ हुंकार का नाद है, वहाँ से आती
- 1:15:05आती आवाज़ तुम्हें सुनाई पड़ती है।
- 1:15:08ये कोई कपोल कल्पनाएं नहीं हैं ये सत्य का दर्शन है लेकिन तुम?
- 1:15:19कुछ तो चुनो, भोंख से वैराग्य हो, के उस तरफ जाओ या सीधे सीधे अपने
- 1:15:26भीतर उतर जाओ। तुम्हारी इच्छा है मर्ज़ी
- 1:15:31तुम्हारी क्योंकि तुम स्वतंत्र हो।
- 1:15:37तुम चाहो तो भोगनी की तरफ चलोगे। तुम चाहो तो अपने भीतर उतरने की
- 1:15:42तरफ चलो, तो वशिष्ट कहते हैं न रमेश हो जाओ कैसे कहते हैं?
- 1:15:49राम से कहते हैं और राम पक्के खिलाड़ी हैं।
- 1:15:56राम ने सब देख लिया, राजघराने में जन्मे, इतनी कान्शस्नस की ऊँचाई
- 1:16:07के अवतार की श्रेणी तक का है, कुछ वो न बाकी न बचा है।
- 1:16:16सब हैं उनके पास और जैसे ही उन्हें राजतिलक का इंकार हो के
- 1:16:25वनवास की घोषणा होती है। बड़े प्रसन्न होते हो क्योंकि
- 1:16:31राज़ तीरक तो फिर वो ही भोग हो गया।
- 1:16:34मैं तो संतो के दर्शन करना चाहता हूँ, उनके दर्शन करना चाहता हूँ
- 1:16:40जो आनंद में मग्न आसानी रंगों से भरे हुए हैं अपनी मस्ती में झूमे,
- 1:16:47झूमे बैठे हैं उनकी करीबी उनके सांनिध्य में।
- 1:16:53मैं भी बैठना चाहता हूँ दो घड़ी तो बड़े खुश होते हैं वो निरवशा
- 1:17:03हो जाओ, अच्छी तरह से समझ लिया होगा अगर तो कुछ बनना चाहते हो।
- 1:17:12दो हर की बात बताता हूँ, कुछ भी बनना चाहते हो।
- 1:17:17डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर पीएमसी एम तो फिर कुछ करो फिर विषयों को
- 1:17:28पकड़ो, सब्जेक्ट्स को पढ़ो। राजनीति को पढ़ो इंजीनियर, डॉक्टर
- 1:17:40इलेक्शन लड़ो या कॉम्पिटिशन लड़ो लेकिन लड़ो लड़ना पड़ेगा।
- 1:17:48ये तो एक लड़ाई का। पाशा है।
- 1:17:53यहाँ लड़के जीतना होता है या हारना भी होता है तो कहते हैं
- 1:18:00वशिष्ठ निर्विषय हो जाओ, क्योंकि वशिष्ठ जानते हैं कि भोग हमें कुछ
- 1:18:06नहीं मिलेगा। तुम कुछ भी बन गए, कुछ भी बन गए,
- 1:18:11चपरासी बन गए कि पीएम बन गए। जो भी तुम्हें मिलेगा वो
- 1:18:17तृप्तिदायक नहीं होगा, यह विशिष्ट जानते हैं।
- 1:18:22यह राम भी जानते हैं और वो सम्मुख हैं राम के।
- 1:18:28वह कहते हैं, विषयों से दूर हो जाओ, कुछ याद मत करो, इन न्यूरॉन
- 1:18:33को खाली करो। ये खाली हैं और राम का न्यूरॉन
- 1:18:38अगर खाली नहीं होगा तो फिर किसका होगा?
- 1:18:41राम के न्यूरॉन कोरे कागज हैं बस ऐसा ही व्यक्ति।
- 1:18:47उसकी इबारत को लिखवा सकता है जेब फरमाए, तेबते बप्पा बाबा ना लिखने
- 1:18:58का है जैसे ये लिखया ते से सर ना मैंने कुछ नहीं लिखा, इसके ऊपर
- 1:19:05जेब फरमाए तेबते बप्पा जैसे ही उसने लिखना था लिख दिया।
- 1:19:11यह कोरा कागज़ ही कह सकता है और भगवान राम कोरे कागज़ है।
- 1:19:18वशिष्ठ समझाते हैं कि विषयों में इन न्यूरोन्स को खपाओ मत कोरा
- 1:19:26कागज़ है, कोरा कागज़ ही रहने दो। विषयों को चिपकाओ मत इन नेरोन्स
- 1:19:33में इनको खाली रहने दो, लेट दैट बी एम्प्टी निर विषय हो जाओ, कुछ
- 1:19:40न इसमें जमा करो और आखिर में विशिष्ट कहते हैं कि मेरी बातों
- 1:19:46को भी जमा न कर दो, इन्हें फेंक दो।
- 1:19:48ये कूड़ा है क्योंकि जब पोडियों पे चढ़ दिया जाता है ना तो जब छत
- 1:19:55पे चला जाता है आदमी तो सभी पोडियों का त्याग कर दिया जाता
- 1:19:59है। इसलिए सभी वस्त्रों को त्यागना।
- 1:20:05और जीस गुरु के वचन से तुम सीढ़ियों चढ़े हो और छत पे
- 1:20:10पहुंचते ही उन सीढ़ियों को भी त्याग देना गुरु के वचनों को भी
- 1:20:16त्याग देना अन्यथा ये भी कांटों की तरह चुभेंगे श्री कृष्ण गोविंद
- 1:20:25हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद।
- 1:20:41हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण हो हरे मुरारी।
- 1:21:00हे। नाथ नारायण वसुदेव पितुमात स्वामी
- 1:21:14सखा हमारे। हेतुमात स्वामी सखा हमार हे हेनाथ
- 1:21:28नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:21:46नाथ नारायण वासुदेव। हे नाथ नारायण वासुदेव धन्यवाद।