Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 Mar 26 - आनंद पाने की पहली शर्त और गोरख वाणी का रहस्य: परिधि से केंद्र तक की रूहानी यात्रा
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- 0:23गौरख वाणी के तेरवी श्लोक, कोई वादी, कोई वे वादी।
- 0:37जोगी को वाध न करना 68 तीरथ संबंध समन्वय यूं जोगी को गुरमुख जलन।
- 0:59गौरख के शब्द बड़े सारण हैं, लेकिन उनके अर्थ बड़े गहरे हैं।
- 1:20गौरख कहते हैं, तुम परिधि पर अर्थ मत जाना।
- 1:30परिधि पर कहीं भी बैठे हो तुम तुम्हारी नजर केंद्र पर रहने
- 1:39चाहिए। परिधि यानी सफर हम प्रकार से एक
- 1:52गोला खींच लेते हैं। तो जहाँ प्रकार की नोक होती है
- 1:58वहाँ केंद्र होता है और जो चारों तरफ पेंसिल गहरा भड़पती है सर्कल
- 2:05वह भरेती होती है। गौरव कहते हैं कि इस सर्कल के ऊपर
- 2:18तुम कहाँ बैठे हो, इसका हिसाब मत रखना जाने तुम हिंदू हो, तुम
- 2:29मुसलमान हो। तुम ईसाई हो, पादरी हो, सिख हो
- 2:35हो, कौन से धर्म से रिलेट करते हो?
- 2:46इसको ध्यान में मत लेके आना क्योंकि परमात्मा ने।
- 2:52जब कोई बच्चा पैदा होता है तो तुमने कभी ये कहा कि मुसलमान पैदा
- 2:59हुआ है तुमने? कहा कि हिंदू, सिख, ईसाई पैदा
- 3:08हुआ, पादरी पैदा हुआ? जभूत ही पैदा हुआ।
- 3:14तुमने कहा कभी नहीं, क्योंकि मुसलमान पैदा नहीं होते।
- 3:24हिंदू और सिख पैदा नहीं होते। यहूदी और ईसाई पैदा नहीं होता
- 3:35पैदा होता है। मनुष्य वह आदमी भी हो सकता है, वह
- 3:44स्त्री भी हो सकता है, दो ही जाती हैं।
- 3:52तो गौर कहते हैं कि इन पचड़ों में मत उलझ जानो।
- 4:00अगर तुम इन पचड़ों में उलझ गए, तो सर्कल पर ही तुम।
- 4:06एक जगह से दूसरी जगह पर जाते रहोगे।
- 4:15सर्कल पर एक जगह से दूसरी जगह पर जाना भी जाता है और सर्कल पर।
- 4:27सफीर से जाना केंद्र की तरफ जैबी एक यात्रा गौरव कहते हैं, सफीर के
- 4:38ऊपर यात्रा मत करते रहना, यह सफीर तो एक चक्र है, इसलिए हमने संसार
- 4:46को चक्र? यहाँ तुम चलोगे कोलू की बैल की
- 4:52तरह कितने जन्म तुम चल लिया, लेकिन पहुंचे कहीं भी ना।
- 5:06तुम शफीर पर ही बने रहे, तुम परिधि पर ही बने रहे, यही यात्रा
- 5:15अगर तुमने शफीर से नीचे उतर के केंद्र की तरफ की होती तो अब तक।
- 5:25कितनी बार पहुँच गए होते यात्रा संत भी करता है रोज़ करता है, संत
- 5:39भी यात्रा करता है से केंद्र तक की हजारों लाखों बार रोज़।
- 5:46कभी सफियर पे आता है, कभी केंद्र पे जाता है केंद्र से भरता है
- 5:53आनंद को सफियर पे आता है आपको बांटने के लिए जैसे कोई समुद्र से
- 6:02बाल्टी भरे। और आग के टैंकर में डाल देना गुरु
- 6:12भी बांटना चाहता है। संत भी बांटना चाहता है।
- 6:17उसने उस आनंद के सूत्र को जान लिया है।
- 6:24तुम्हें तो पता ही नहीं चलता कि यह इतना आनंद कहाँ से लेके आता है
- 6:35क्योंकि तुमने अभी वो क्वेश्चन ऑफ लक देखा है।
- 6:42जीस दिन तुमने ओशन ऑफ लव देख लिया, उस दिन तुम भी अपनी बाल्टी
- 6:47उठा के उस समुद्र में से प्यार भरना शुरू कर दोगे और लोगों में
- 6:53बांटना शुरू कर दोगे तो गोरख हमें सिखाते हैं भेद मत कर।
- 7:08सबसे पहली शर्त और देखो अगर तुम भेद नहीं छोड़ सकते तो इस यात्रा
- 7:21पर मत निकल जाना फिर। समय बर्बाद करोगे इसके अलावा कुछ
- 7:29नहीं करोगे क्योंकि भेद सिफीर में होते हैं।
- 7:37केंद्र पर तो कोई भेद नहीं होते हैं।
- 7:43गौरव की बातों को। सहेज लेना हृदय।
- 7:53गौर कहते हैं, भेद बुद्धि कभी परमात्मा का रास नहीं चख सकता।
- 8:10जैसे टूटी हुई बाल्टी में कितना ही पानी भर लो वह जिसका थल्ला
- 8:20जिसका बॉटम उसमें सराक हो गए हैं। कितने ही द्रव्य डालू, वह उसमें
- 8:30ठहरेगा, नहीं तो गौर कहते हैं, सबसे पहला भेद को समाप्त कर।
- 8:47तुम कौन हो ये अभी तुम्हें पता नहीं भेद करती है।
- 8:54तुम्हारी बुद्धि और बुद्धि जानती कुछ नहीं बुद्धि तो जन्म लिए है
- 9:05गर्भ में से बाहर आई। जो उसने सीखा वो समाज से सीखा
- 9:12माता पिता से सिख तथा कथित धर्मज्ञों से सिख गुरुओं से सिख
- 9:23पाठशाला से सिख। गुरुकुलों से सीखा है।
- 9:31स्कूल से या कॉलेज से सीखा, यूनिवर्सिटी से सीखा जो सीखा
- 9:41तुमने यही सीखा। इसलिए यहाँ का ज्ञान यहीं पर छोड़
- 9:52देना। पहला सूत्र गोरखा भेद अगर तुम
- 10:03भेद। बुद्धि रहना चाहते हो तो समय
- 10:06बर्बाद मत करना। फिर उस समय को तुम संसार के
- 10:13प्रयोजन हेतु लगा देना उसका भी फायदा है।
- 10:22गलत रहकर चलने का भी फायदा होता है।
- 10:27चौंकना मत क्योंकि अगर कोरलू का बैल सारे दिन चलता और सांझी जब
- 10:37पट्टी खोलता है तेली। उस बैल के तो वह पता कि मैं चला
- 10:45तो बहुत लेकिन पहुंचा कहीं भी नहीं।
- 10:48उसी गोल दायरे में घूमता रहा। यह संसार चक्र है और चक्र की एक
- 10:59जगह से दूसरी जगह पर। दिशाएं तो बदली जाती हैं।
- 11:04अवस्थाएं बदली नहीं जाती हैं। इसको अच्छी तरह समझो दीक्षा तो
- 11:11तुम उत्तर से दक्षिण भी आ जाओगे, सूफी के ऊपर चलते चलते दक्षिण से
- 11:18पूर्व और पश्चिम भी आओगे? हर पल चलोगे पल पल चलकर तुम उस
- 11:28सफर के चक्कर की यात्रा करोगे लेकिन पहुंचोगे कहीं नहीं केंद्र
- 11:34से सदा दूर रहोगे। और केंद्र है अमृत केंद्र है,
- 11:45आनंद केंद्र है, खुशी केंद्र है, सुगंध जिसने केंद्र को नहीं पाया।
- 11:59वह फले सफीर के ऊपर करोड़ों जन्मो तक चलता रहे, वह केंद्र तक नहीं
- 12:08पहुंचेगा, आनंद नहीं पाएगा वो इसलिए गौरव कहते हैं कि जाप पाठ,
- 12:17पूजा। यह तुम्हें कही नहीं लेके जाता यह
- 12:24एक गुमाव चक्कर का गुमाव माला देखो तुम फिरते हो उसी चक्कर में
- 12:32फिर आ जाते हो सुमेरु से शुरू करते हो?
- 12:37सारी माला पूरी करके सुमेरु में फिर आ जाते हैं।
- 12:41यह एक चक्कर किया पूरा तमश पहला पाठ पढ़ाते हैं गौरव कहते हैं।
- 12:58अगर तुम भेद को नहीं छोड़ सकते, तो फिर तुम आनंद को पीने की कामना
- 13:05भी मत करना भेद को नहीं छोड़ सकते, तो आनंद को पीने की तमन्ना
- 13:13छोड़ दो एक चीज़ छोड़ दो। या तो वेद को छोड़ दो तो फिर तुम
- 13:25आनंद को पा जाओगे अगर वेद को नहीं छोड़ सकते, भेद या नेपार शिल्ड
- 13:33के। मैं हिंदू हूँ, तू मुसलमान है,
- 13:38मैं सिख हूँ, तू ईसाई है, तू यहूदी है, मैं पारसी हूँ, इसे भेद
- 13:47कहते हैं, तू ब्राह्मण है, मैं शुद्र हूँ, तू वैश्य है, मैं
- 13:52क्षत्रिय हूँ। तू दुकानदार है, मैं कर्मचारी अगर
- 14:06तुम भेद नहीं छोड़ सकते इस बात को बड़े सहेजता से सुनो ठहर के सुनो।
- 14:20तो फिर गौरव कहते हैं कि यत्न करना छोड़ दो, फिर तुम्हें वह
- 14:30आनंद के रस के बोध का स्वाद में मिलेगा, इसलिए पृथ में।
- 14:39गौरव तुम्हें कहते हैं, छोड़ दो, इनको समय बर्बाद मत करो।
- 14:45अगर तुम भेद को नहीं छोड़ सकते तो समय बर्बाद मत करो, पार्टी बनाओ
- 14:56वो पार्टी राजनीति को। वह पार्टी धार्मिक हो, वह पार्टी
- 15:05सम्प्रदायिक हो, वह पार्टी किसी भी चीज़ की हो समूह बनाओ समूह
- 15:14बनाओ। लेकिन आनंद को चखने की इच्छा
- 15:19त्याग दो, मैं बहुत सहज मत से बोल रहा हूँ ताकि आपको समझने में
- 15:31कठिनाई न हो। प्रथम सूत्र हैं भेदरहित हो।
- 15:43अगर तुम समझती हो कि देखो ये मेरे बस की बात है, भेद तो मेरे को तो
- 15:53वो रखे थे, कोई बात नहीं जहाँ इतने जन्म भटक रही है।
- 16:01वह और 1020 50,000 सर जन्म तुम भटक रहे हो, लेकिन याद रखना
- 16:14मिलेगा वेद छोड़ के। बिना भेद छोड़े तो नींद भी नहीं
- 16:23आती, परम आनंद का स्वाद की कामना कैसे करोगे?
- 16:33भेद छोड़ना ही पड़ता है। रात को तुम सब छोड़ देते हो तो
- 16:38नींद आती है, अगर तुम चिंता को न छोड़ो तो नींद कहाँ आएगी?
- 16:45चिंता तो एक वेद है जब तुम छोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सकते।
- 17:02तो परमात्मा के रस को पाने की इच्छा भी मत करो।
- 17:12अब मैंने इतना बोला भेद क्यों? आपकी समझ में आज्ञा होगा सबसे
- 17:21पहला। स्टेप अनिवार्यता समझलो योग्यता
- 17:29समझलो अगर तुम भेद को छोड़ सकते हो तो इस मार्ग पे न करना अन्यथा
- 17:42संसार में बने रहना। संसार में खाना पीना, मौज करना,
- 17:52कॉम्पटीशन करना, आईएएस बनना, आईपीएस बनना, मैजिस्ट्रेट बनना,
- 18:01खेल खेलना। फिर तुम खेल खेलो और जब तुम थक
- 18:09जाओगे इस खेल के खेलने से तो जब तुम थक जाते हो जब बच्चा थक जाता
- 18:18है खेलने से, तो फिर उसे याद आती है घर जाने की।
- 18:27फिर वह कहता है घर छोड़ थक गए, आराम करेंगे, खाना खाएंगे,
- 18:35नहाएंगे धोएंगे। ऐसी बात शायद बहुत कम संतों ने
- 18:47कही, जो आपकी जड़ पर प्रहार करती गौरख कहते हैं, सबसे पहले
- 18:56अनिवार्यता है भेज हो। हिंदू मुसलमान होने का वेद
- 19:08ब्राह्मण शूद्र होने का वेद व्यापारी।
- 19:19और नौकरी पेशा होने का भेद और यहाँ तक कि स्त्री पुरुष होने का
- 19:25भेद भी क्या था? जो चीज़ तुम्हें भेद में ले के
- 19:34जाती है वो छोड़। फिर वो चाहे कोई भी क्यों न हो और
- 19:45अगर तुम भेद को नहीं छोड़ सकते तो बोर कहते हैं।
- 19:50फिर परमात्मा के रस को पीने की काम न छोड़ दो।
- 19:54दोनों में से एक चीज़ छोड़ दो, कोई बात नहीं।
- 20:00कोई विवाद योगी को वाद न करना योगी वाद विवाद नहीं करता क्योंकि
- 20:12जिसके बारे में जाना नहीं जिसे देखा नहीं, जिसे पहचाना नहीं।
- 20:22उसके बारे में वाद व वाद करोगे क्या?
- 20:28जिसका स्वाद नहीं चखा तो स्वाद के बारे में बहस क्या करोगे?
- 20:36जीस फूल की सुगंध नहीं तुमने नासिक का पुटों में मानी उसका
- 20:43व्याख्यान कैसे करूँगा जीस रस का आनंद तुमने जाना है।
- 20:55उसका वाद विवाद मत करना, लेकिन हम तो यही कर रहे हैं।
- 21:04आज गुरु डम्बो की भरमार जिसने रस नहीं भी पिया।
- 21:14बोगी कहता मैं गुरु और यह आज से नहीं बहुत पुराना धंधा है, माखन
- 21:26शरलवाना के भक्त भी ऐसा। उसने कहा मेरा जहाज बचा दो, हे
- 21:37नमन पाक्षण मैं सो अशरफी जहाज बच गया लेकिन जैसे ही वो जहाज के
- 21:49किनारे से उतरा। और बाजार की तरफ आए तो पांडाल लगे
- 21:55हुए थे। अज्ञानी श्रेय लेना चाहता है
- 22:07अज्ञानी मान सम्मान की कामना करता है।
- 22:16अज्ञानी चाहता है श्रेय लेने और अगर तुम श्रेय लेते हो या कामना
- 22:25है श्रेय लेने की तो यह एक परखने का डंग भी है।
- 22:34अगर श्रेय लेने की कामना भी बाकी है, हर चीज़ का श्रेय तुम लेते
- 22:38हो, कोई घटना घट जाए तुमने कहा हाँ, मैंने कहा तो तुम अपने ढंग
- 22:49से व्यवसाय करते हो, इसका मतलब तुम श्रेय लेना चाहते हो?
- 22:58और तुम्हें पता नहीं, यह श्रेय लेने वाला आज है कल शायद हो की ना
- 23:11जो श्रेय लेता है वह अज्ञानी। उसने उसका राशि भी दिया है।
- 23:32पहला कहा कि भेद भेद मत करना, भेद को छोड़ो हम हम आंधी आगे हैं
- 23:40दूसरे चैपटर पे श्रेय। यह क्यों कहते हैं गोरख इसकी
- 23:56बैकग्राउंड में क्या सत्य है? जो गोरख कहते हैं कि वेद।
- 24:03और श्रेय इन दोनों को प्यार था क्योंकि जिसका श्रेय तुम लेना
- 24:13चाहते हो, वह काम तुमने किया ही नहीं।
- 24:21गो रखिये, जानते हैं और तुम्हें समझाते हैं करता तो वही है और वह
- 24:33शरीर लेने के लिए नहीं। वह तो अपनी लीला से खेलता है।
- 24:41खेलने में काहे का श्रेय होता है खेलना तो उसका शौक है खेलना तो
- 24:49उसकी हॉबी है। मुझे बहुत से लोग कह देते हैं
- 24:54उसकी हॉबी हो गई, हमारा मरना हो गया।
- 25:01तो गौरव कहते हैं, जिसका मरना हो गया वह है भी कि सिर्फ तुम्हारा
- 25:10इल्ल्यूश़न है कि तुम हो, ज़रा सोचिएगा बुलबुले का फैलाव।
- 25:21तुम देखते तो हो क्या वह फैलाव होता है और तुम रोज़ देखते हो?
- 25:30बुलबुला पानी का ऊपर बुलबुला चलता है, ना उसका फैलाव होता है, ना?
- 25:40क्या वो सच में होता है? और अगर बुलबुला कहे कि तुम्हारा
- 25:49खेल हो गया और मेरा मरना हो गया, क्या बुलबुला सच में मरा नहीं?
- 26:00बुलबुले के भीतर हवा थी, हवा निकल गई और हवा बुलबुला नहीं थी हवा
- 26:12बुलबुला सा अलग थी, तो भेज दो क्या को।
- 26:19श्रे को त्याग किसी भी काम को श्रेय मित्र और क्योंकि तुम अभी
- 26:34वहाँ पहुंचे नहीं जीसको गंतव्य कहते हैं।
- 26:39गौरव इसलिए तुम्हें नीचे की पौड़ी से समझाते हैं।
- 26:45पहली पौड़ी, दूसरी पौड़ी छत्र से नहीं सीधा ले के जाते अष्टा वक्र
- 26:51की तरह अष्टा वक्र सीधी छत की बात कर।
- 27:00गौरख बिलकुल उलटे गौरख कहते हैं फ्रॉम दी फर्स्ट स्टेप तुम भेद मत
- 27:10करो, क्योंकि भेद यहाँ है सारा अस्तित्व।
- 27:16एक सूत्र में परोया हुआ है और एक है हमारे शरीर की तरह ये रोम
- 27:23तुम्हें अलग नजर आते होंगे, लेकिन है एक ही ढांचे का हिस्सा।
- 27:33लगता है ये हजारों है। ये करोड़ों है लेकिन है नहीं।
- 27:40ये है एक ही पाठ हिस्सा है, एक शरीर का हिस्सा है, उसमें नाखून
- 27:48भी है, उसमें चमड़ी भी है, उसमें मांस भी है, उसमें लघु भी है।
- 27:54उसमें हड्डी भी है, उसमें मज़ा भी है, चमड़ी भी है, सब है उसमें
- 28:03उसमें बाल भी है, उसमें ऊंट में है, उसमें सारा स्ट्रक्चर ढांचा
- 28:10है। बाहर का भीतर का यह सारा यूनिफाइ
- 28:15हो के बनता है एक डांच और फिर देखो तुम इसे अलग अलग कह सकते हो,
- 28:22लेकिन है तो एक तुम्हारे पीठ में दर्द होता है।
- 28:30अगर तुम एक न होते तो पेट ही दुखता रहता।
- 28:35तुम क्यों परेशान हो? तुम परेशान इसलिए होते हो कि पेट
- 28:46तुम्हारा अंग है। पांव के अंगूठे में चोट लग जाती।
- 28:57तुम्हें नींद नहीं आती अगर पांव का अंगूठा तुमसे संबंधित न होता
- 29:04तो तुम्हारी रातों की नींद खराब नहीं होती थी।
- 29:11गोरख कहते हैं, ये सारे यूनिवर्स सारे ब्राह्मण आपस में बूथे हुए
- 29:18हैं। जितना भी अस्तित्व है वॉटेवर
- 29:21एडजिस्ट। जो अस्तित्व है, जो है वह आपस में
- 29:31गुथरा हुआ है और एक है इसलिए बाबा नानक जब नदिया से बाहर।
- 29:44तो उन्होंने जो पहला शब्द बोला उठा एकों का सारे अस्तित्व मिलकर
- 30:00समा जाते हैं। एक।
- 30:04सब अस्तित्व से सब ब्रह्मण्डों से मिलकर बना है एक और वह एक ही है
- 30:13और वही सत्य है यहाँ आ गया कि क्यों कहा के भेद छोड़ दो।
- 30:24भेद छोड़ दो, क्योंकि भेद तुम्हें बाइफरकेट करता है ट्राईफरकेट करता
- 30:30है, भेद तुम्हें मल्टीडायमेंशनल बनाता है।
- 30:38और दूसरा क्यों? कहा कि श्रेय मत लो, क्योंकि
- 30:42श्रेय लेने में तुम अलग हो जाते हो, दूसरे अलग हो जाते हैं और जो
- 30:48चीज़ अलगाव पैदा करे उसको त्याग देना।
- 30:53तुम कहते हो मैं पुरुष, वह स्त्री?
- 30:58या मैं स्त्री वह पुरुष तो तुमने भेद खड़ा कर दिया लेकिन जो जान
- 31:07गया वह कहता है बस एक के सिवा यहाँ दुजा कोई हैं?
- 31:22एक का ही सारा पसारा आपस में गुंठा हुआ और उससे ही यह सारा
- 31:32अखंड है। एक है कोई वादी, कोई वादी।
- 31:43जोगी को वाधन करना इसलिए वाद विवाद मत करो।
- 31:50किसके बारे में वाद विवाद करोगे? एक के बारे में वाद विवाद होता ही
- 31:57नहीं। अब हम स्वाद चखते हैं, मीठा होता
- 32:01है। क्या वाद विवाद करेंगे?
- 32:04तुम्हें भी मीठा लगा मुझे भी मीठा लगेगा, उसको भी मीठा लगेगा।
- 32:10फिर वाद वाद क्या करना है? अब दूसरी बात समझे।
- 32:15वाद वाद वह करेगा जिसने चखा ही। इसलिए कबीर कहते हैं, सब्य सयाने
- 32:26एक मत जिसने चख लिया वह कहेगा मीठा है जो गूंगा गुड़ खाई के कह
- 32:36कौन मक स्वाद? चाहे गूंगा है, लेकिन गुड़ जिसने
- 32:44खा लिया उस उसको लगेगा तो मीठा ही है।
- 32:53अगर कोई कहता है कि नहीं, यह मीठा नहीं है।
- 32:58तो बस साफ है कि उसने जाना नहीं है, क्योंकि गुड़ स्वभाव का मीठा
- 33:02ही होता है। कोई वादी, कोई विवादी योगी को बाध
- 33:11न करना। जो योग होना चाहता है, जो उसके
- 33:16साथ मिलना चाहता है, वो योगी होता है, जो खंड खंड करता है, जो भेद
- 33:27करता है वह योगी नहीं होता। वह तो अयोग्य होता है, अयोग्य है,
- 33:34योग्य नहीं है, वो योग से योग्य बनना है, जो भेद करता है वह
- 33:42अयोग्य है और जो निरभेद है वो योग है।
- 33:50तो योगी कहता है कि वाद वाद नहीं करता।
- 33:5768 तीर्थ संबंध समन्वय यूं योगी को गोरमुख झरना।
- 34:11कोई वादी, कोई वादी योगी को वाद न करना 68 तीर्थ संबंध समावय यूं
- 34:19योगी को गुरमुख जड़ना जैसे सभी नदियां?
- 34:26कोई 68 तीर्थ कह देता है, कोई बहंतर तीर्थ कह देता है नदियां
- 34:34सभी नदियां आखिर में जाकर में मिल जाती हैं।
- 34:42सफीर से जो भी लाइन खींचोगे वह केंद्र पर पहुँच जाएगी।
- 34:51परिधि से जो रेखा खींचोगे वो केंद्र तक पहुँच जाएगी।
- 34:59तो योगी वादविवाद नहीं करता, योगी भेद नहीं करता, योगी श्रेय नहीं
- 35:04लेता, मान सम्मान नहीं लेता तो फिर योगी योग करने की चेष्टा करता
- 35:12है। किसके साथ आनंद के साथ?
- 35:18आनंद में युक्त होना चाहता है योगी जो मैं रोज़ कहता हूँ
- 35:26इन्सर्ट यूरसेल्फ़ कंप्लीट्ली अपने आप को परिपूर्णतया इन्सर्ट
- 35:34कर देना इसका मतलब योग होता है। अगर तुम परमात्मा का स्वादि चख हो
- 35:44तो योग तो नहीं होगा अभी तो चख तो शुरू शुरू में, तुम इतना भी काफी
- 35:51कि तुम्हें उसका स्वादि चखने को मिलेगा।
- 35:58और एक वक्त आएगा कि तुम्हारे में तनप इतनी आएगी कि तुम उस चखे हुए
- 36:07अमृत और आनंद के भीतर निरंतर अखंड धारा में एकाकार होने की चेष्टा
- 36:16करो। क्योंकि वह मीठा ही इतना है, वह
- 36:22स्वाद ही इतना है, उसकी सुगंध ही निराली है।
- 36:28उसकी मदहोशी का आरंभ क्या कहूं? मदभोशी में योगी बोल नहीं सकता,
- 36:46जो युक्त हो गया उसे जो योग कर गया उसमें।
- 36:53जो उसमें प्लस हो गया। जो जुड़ गया उससे वह वही हो गया
- 36:59जिसमें जुड़ा था। बूंद सामान्य समुद्र में जैसे
- 37:05बूंद समुद्र में समा जाए तो वह योग हो गया।
- 37:12बूंद का समुद्र से योग हो गया। गौरख कहते हैं कि जैसे 68 तीर्थ
- 37:32यानी सभी नदियां संसार की सभी नदियां हैं तो अलग अलग।
- 37:39कोई नील नदी है, कोई कावेरी है, कोई गंगा है, कोई ब्रह्मपुत्र है,
- 37:46कोई सरस्वती है, कोई नर्मदा है, कोई यमुना नदियां सभी अलग अलग
- 37:56हैं। लेकिन गौरव कहते हैं कि मिल जाती
- 37:59हैं एक सागर में और जब वो समुद्र में मिल जाती है तो पाती हैं कि
- 38:12मैं इतना विस्ता? अखंड विस्तार मेरा मैं इतनी तुच्छ
- 38:23और इतनी विस्तृत कैसे होगी। पहचाने गीत हैं पहचाने गीत हैं
- 38:59दित हैं हे चाने दित हैं, कल तक जो
- 39:43क्या होगा, कौन से पल में कोई जाने ना और ताल मिले।
- 39:53नदी के जल में नदी मिले, सागर में सागर मिले।
- 40:04कौन से जल में कोई जाने ना। ओहोरे ताल मिले नदी के जल में।
- 40:19ताल नदी के जल में मिल जाता, नदी सागर के जल में मिल जाता और सागर
- 40:26कौन से जल में मिलता पता नहीं। मुझे लोग पूछ लेते हैं आप कहते
- 40:34हैं बाबा इस संसार को परमात्मा ने बनाया तो परमात्मा को किसने
- 40:44बनाया? मैंने कहा पुत्र मैं समझ गया यह
- 40:50प्रश्न अनउत्रित ही रहने दो यही बुद्ध ने कहा इस प्रश्न को
- 41:00अनउत्रित ही रहने दो। आखिर में तुम कहोगे, वह तो स्वयं
- 41:06बन गया, सैपम सैपम खुद से प्रकट हुआ।
- 41:16आखिर में जो भी कुछ कहोगे, तुम बड़े परमात्मा ने पाया।
- 41:21उससे बड़े परमात्मा ने बनाया, उससे बड़े परमात्मा ने और फिर
- 41:25आखिर में कहोगे वह तो खुद से बन गया।
- 41:28आखिरी परमात्मा तो खुद से बन गया तो?
- 41:32बुध कहते हैं जब तुमने एक खुद से पैदा हुई चीज़ पर ही ठहर जाना है।
- 41:41तो फिर प्रकृति पर ही क्यों नहीं ठहर जाते?
- 41:45बात ठीक है बुद्धि को जचेंगे इसलिए बुध ने कहा यहीं रुक जाओ,
- 41:54लाज आर्सफिशिया। प्रकृति खुद से ही पैदा हो गई।
- 42:00बस यहीं रुक जाओ, अब दीपो भवा अपनी ज़िन्दगी को खुद ही खुशहाल
- 42:09बनाओ शेभम वह भी खुद से ही पैदा हुई प्रकृति।
- 42:16तुम भी खुद से ही पैदा हो अपना निर्णय खुद लो, अपने निर्णय खोज
- 42:23लो अप दीपो भवा। बुद्ध की बात बिल्कुल ठीक जचती है
- 42:29बुद्धि को जचती है लेकिन। सही नहीं सही इसलिए नहीं
- 42:42जिन्होंने प्रकृति से आगे देख लिया उनका क्या होगा, क्या होगा
- 42:49कबीर का, क्या होगा दादू का पलटों का?
- 42:58मेरी तो यही अर्जी कर वही जो तेरी मर्जी बिल्कुल उलट है।
- 43:04बुद्ध से बुद्ध कहते हैं अप दीपो भव अपने दीपक के स्वयं बनो अपने
- 43:13मार्ग। की रौशनी तुम खुद रोशन करो लेकिन
- 43:18बटु तो कहते नहीं मेरी तो यही अर्जी कर वही जो तेरी मर्ज़ी,
- 43:27मेरी ज़िन्दगी का फैसला तो ही कर मैं अपना दीपक जलाने में असमर्थ
- 43:33हूँ। और देखिए नास्तिक भी हुए और
- 43:44नियमों को नए मानने वाले भी हुए। बुद्ध कहते हैं, ला 1000
- 43:49सुफ्फिसिएंट। लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं
- 43:54लेने देने का कोई नियम नहीं। यहाँ देर इस नो एक्शन ऑफ़ नो
- 43:59रिएक्शन चार बात जदा जी वे सुखी जीवित।
- 44:10ऋण मुकृत व गर्तं पीवे बस में बहुत से अधेहस्य पुनर आगमन कुता
- 44:20कर्ज उठालो घी पीलो वापस मत करो क्योंकि किसको वापस?
- 44:30आज नहीं कल जिसे उधार लिया वो मर जाए जिसने उधार लिया वो भी मर जाए
- 44:40फिर कर्ज उठा लो और घिब पिलो। ये कौन है?
- 44:47ये बुद्ध की बात को काटते हैं ये कहते ना लार्ज ऑर नट सुफ्फिसिएंट
- 44:56लार्ज को भी छोड़ दो, नियमों को भी छोड़ दो कोई लेन देन नहीं
- 45:02होता। कोई भुगतना नहीं पड़ता।
- 45:06कर्मों का प्रतिक्रम आता ही नहीं। यानी ये कहते हैं कि बीज कभी
- 45:12प्रश्न होते तो होता ही है। ये ये कहते हैं कि बीज कभी वृक्ष
- 45:18बनता ही नहीं। बीज वृक्ष बन के उसको फूल नहीं
- 45:22लगते, उसको फल नहीं लगते। तो चार वह कहते बुद्ध बुद्ध कहते
- 45:33लार्ज अरे सुफ्फिसिएंट कबीर से क्या लेना है?
- 45:40कृष्ण से क्या लेना है? बुद्ध कहते हैं कृष्ण ठीक नहीं
- 45:45पड़ता बुध कहते हैं लव से ठीक नहीं पड़ता, चौंग से ठीक नहीं।
- 45:56यज्ञ बल के ठीक नहीं। और चार बाग कहते हैं कि वो तो ठीक
- 46:03है, चार बाग कहते हैं कौन वापस करेगा?
- 46:09कर्ज लेने वाला तो मर गया, कर्ज देने वाला भी मर गया बस में भूत
- 46:14से देह से पुनर आगमन कुत्ता। किसको वापस करोगे?
- 46:26मेरे दादाजी के पड़ दादाजी की कहानी मैं सुनाया करता हूँ कुछ
- 46:30पैसे लेके वो चले गए थे, अटके रह गए चार जन्मों तक अटके रहे।
- 46:43मैं संबोधि को प्राप्त हुआ तो मुझे कहने लगे मुझे पुत्र पहचाना।
- 46:54मैंने कहा मैंने तो आपको नहीं पहचाना।
- 47:00कि तुम्हें, आपके दादाजी का दादाजी, मैंने कहा मैंने कौन सा
- 47:11देखे यही कहता हूँ मैं जिन बच्चों के लिए तुम राते जागते हो, वो
- 47:20तुम्हें पहचानेंगे भी नहीं कल। तुमने रातें गंवाई काली की अपनी
- 47:29नींदें न्योछावर की तीन बच्चों का पालन पोषण कर रहे हो और बच्चे
- 47:38बड़े होते हैं तो कहते हैं हमने तो आपको नहीं पहचाना।
- 47:42और चौथी पीढ़ी कहती है पहली पीढ़ी से आला की 100 पीढ़ियां पहली पे
- 47:50के सड दादा जी मैंने तो तुम्हें नहीं पहचानी कहती मैं अटका हुआ।
- 48:00मेरी आत्मा, मेरी आत्मा, मेरी चेतना उलझ गई।
- 48:05थोड़े पैसे देने इस व्यक्ति को दे नहीं पाएगा।
- 48:12क्या तुम मेरा ऋण चुका दोगे? यही पितृ ऋण होता है।
- 48:18मैंने कहा मैं चुका दूंगा। तो फिर मैं उसके बाद ही मुक्त हो
- 48:23पाऊंगा। मैंने कहा कोई बात नहीं, आप चिंता
- 48:26मत कीजिए। मैंने ढूँढा पाया और उनको उनका
- 48:35कर्ज लौटा दिया। इसे पितृ ऋण से मुक्ति कहते हैं।
- 48:40इसीलिए एक शब्द कहा गया कि जीस पीढ़ी में कोई एनलाइटनमेंट को
- 48:52प्राप्त हो जाता है उसके साथ कुछ तर जाते हैं।
- 48:58बस कहने का अभिप्राय यही था, इट वास् ए सिम्बोलिक रिप्रेजेंटेशन
- 49:03अब्रिवरेशन। यह एक बताने का ढंकन था कि कोई
- 49:11आएगा अगर तुम्हारी आत्मा कहीं अड़ गई तो वह तुम्हें मुक्त कर देगा।
- 49:19बहुत से मेरे पूर्वज जो अटके हुए हैं, मुझे सुनते हैं।
- 49:26वो जानते हैं कि ये हमारी आठवीं, दसवीं, बीसवीं पीढ़ी हैं, लेकिन
- 49:32मैं नहीं जानता। हम इन्हीं के लिए राते बर्बाद
- 49:39करते हैं। हम इन्हीं के लिए चिंताग्रस्त
- 49:43करते हैं। हम इन्हीं के लिए फिकरमंद बच्चे
- 49:49की पढ़ाई कैसे हो गई? ये स्कूल तो जाता ना?
- 49:53ये पढ़ता तो है नहीं, अल्बर्ट आइंस्टीन को स्कूल से निकाल दिया
- 49:58था, क्लास से बाहर खड़े कर दिए जाते थे, ये समझता तो कुछ है
- 50:03नहीं। उसकी माता को बुलाया, क्या उसको
- 50:08स्कूल से बाहर निकाल दिया? और वही अल्बर्ट आइंस्टाइन 1 दिन
- 50:12फॉर्मूला देता है। संसार को ई इज़ इक्वल टू एमसीएच
- 50:18का और दुनिया निहाल हो जाती है। बोंद छिपे किस बादल में कोई जाने
- 50:43न ओह रे ताल मिले नदी के जल। में।
- 50:50नदी मिले। सागर में सागर मिले कौन से जल में
- 50:58कोई जाने ना और तार मिले नदी के जल में।
- 51:07बूंद छिपी किस बात में? कोई जाने नहीं कौन किस पीढ़ी में
- 51:13कौन मुक्त हो जाएगा और जो एक भी मुक्त हो गया बहन न जाने कितनों
- 51:22को मुक्त करा देगा। जिन नाम से आया गए मशककत का हाल
- 51:29नानकते मुखो जले किती छुट्टी नार जिन्होंने अपना आपा देखा
- 51:40जिन्होंने अपने आपको पहचाना। और अपना आपका विराट स्वरूप देखा
- 51:48उनके चेहरे उज्वल हो गए नानकते मुख उज्वल है कितनी छुट्टी नाल वह
- 51:55कितनी दुनिया को मुक्त करा देगा एक ही बंधन है।
- 52:01एक ही अलूशन तुम जानते नहीं अपने आप को कि तुम वास्तव में हो
- 52:09दुनिया ने बताया कि तुम विजय कुमार दुनिया ने बताया कि तुम
- 52:15प्रहलाद, तुम्हें पता नहीं। माँ बाप ने तुम्हारा नाम रख दिया,
- 52:23किसी ज्योतिषी ने तुम्हारा नाम रख दिया इस नक्षत्र में पैदा हुए इस
- 52:28दिन पैदा हुए ये तुम्हारे पिता, ये तुम्हारी माता, ये तुम्हारा
- 52:32दादा, लेकिन क्या तुम्हें पता है नहीं पता।
- 52:39नहीं पता तो तुम क्या बोलते हो, जो तुम नहीं जानते हो, जो तुम्हें
- 52:45सिखाया गया है वो तुम बोलते हो, मैं तुम्हें कहता हूँ इसीलिए इसे
- 52:51व्यर्थ कहता हूँ। सब शास्त्र किसी ने जाने होंगे और
- 52:57जान कर लिख दिए होंगे। तुमने जाना जिसने जाना उसने लिख
- 53:05दिया और उसी ने आनंद माना, जिसने भोजन खाया वह तो हो जिसने शीतल जल
- 53:14पिया, उसकी व्यास बुझा। तुम सिर्फ ग्रंथ पढ़ के शास्त्र
- 53:21पढ़ के कह देते हो कि मैं त्रप हो गया मेरा सूखा गला, शुष्क गला
- 53:31शीतल पेय पदार्थ से। मेरी प्यास मिट गयी, नहीं मिट गयी
- 53:41शस्त्र के अंदर पानी नहीं है, शब्द नाम के अंतर भी शब्द है,
- 53:47भोजन नहीं नाम के अंदर जल नहीं है।
- 53:55जो तुम्हारे प्यास को बजा दे, नाम के अंदर भोजन नहीं जो तुम्हारी
- 54:01भूख को मिटा दे और तुम्हारी भूख और प्यास बड़ी गहरी और तुम
- 54:08चिल्लाए जाते हो सारे दिन राधे राधे राधे पांच नाम?
- 54:13फिर अगर प्यास न बुझे तो कोई आश्चर्य चकित करने वाली बात थोड़ी
- 54:18है, ये सत्य है नामों से कभी प्यास थोड़ी बुझती है ब्लैकबोर्ड
- 54:25पे लिख दो पानी ब्लैकबोर्ड पे लिख दो, वाटर ब्लैकबोर्ड पे लिख दो
- 54:30जल। ब्लैकबोर्ड पे लिख दो, एच टू ओह
- 54:34क्या ये सब प्यास मिलकर बुझा देंगे?
- 54:36तुम्हारी नहीं बुझा पाएंगे कोई गॉड लिखे, कोई हल्ला लिखे, कोई
- 54:41बैगरू लिखे, कोई राम लिखे, कोई रहीम लिखे क्या ये सब मिलकर भी
- 54:47तुम्हारी प्यास बुझा सकते हैं? नहीं बजा सकते तो फिर तुम क्या
- 54:52पागल हुए हो? तुम इन मूर्खों के पीछे क्यों लगे
- 54:58हो? पूछो इनसे सवाल इनके पास कोई जवाब
- 55:03नहीं कारण इनकी खुद की प्रास नहीं पूछो।
- 55:10अगर प्यास बूझ गई होती तो डेरों का विस्तार रुक जाता।
- 55:17अगर प्यास बूझ गई होती तो ये संस्थान इतने मुल्कों में और चला
- 55:24बढ़ जाऊं और शाखाएं बना दूँ। ये दौड़ मिट जाती।
- 55:35ये दौड़ ही दुख का कारण जो खुद ही दौड़ रहे हैं वो तुम्हें दौड़ से
- 55:43कैसे रोकेंगे? और दौड़ने वाला सदा दुखी होता है।
- 55:49धातु, दूजा को नहीं, दूजे मन की दौड़ कहते दुख और कुछ नहीं है।
- 55:55दादू कहते दुख और कुछ नहीं है, दुख सिर्फ तुम्हारे मन का दौड़ना
- 56:00है, दौड़ मिट्टी सन सह गया। हमारा दुख मिट जाता है जब
- 56:10तुम्हारा संशय चला जाता है। संशय क्या है?
- 56:15तुम कौन हो, यही संशय है तुम्हारे पिता इस संशय को जीस तन मिटा दोगे
- 56:21वास्तव में तुम जान लोगे कि तुम हो कौन तो संशय मिट जाएगा।
- 56:28सन से मिट जाएगा तो वस्तु ठोर के ठोर उसे तुम वहीं पाओगे जहाँ छोड़
- 56:34के गए वस्तुएं वह मिला करती हैं जहाँ पर हुआ करते हैं।
- 56:40मैंने कल भी कहा। वस्तु ठोर की ठोर वस्तुएं वहाँ
- 56:47मिली करती हैं जहाँ हुआ करती हैं तुम किसी चाबी को रख के कहीं भूल
- 56:52गए किसी कानस में रख के किसी आला में रख गए, किसी लॉकर में रख
- 56:58दिया, किसी अल्मिर में रख दिया। कहीं रख के भूल गए।
- 57:05वह कहीं और नहीं मिलेंगे। जहाँ रखी वहीं मिलेंगे तो दादू
- 57:12कहते हैं, व्रत का दौड़ना तुम्हें दुख देता है और दौड़ ही व्यर्थ
- 57:22है। दौड़ना तुम्हें दुख देता है और
- 57:29तुम होना चाहते हो सुख प्रत्येक व्यक्ति संसार का प्रत्येक
- 57:35व्यक्ति प्रत्येक जीव जंतु सुखी होना चाहता है।
- 57:41वह आनंदित होना चाहता है, लेकिन दौड़ रहा है और दादू कहते हैं कि
- 57:50तुम सूखे नहीं होगे। बकायदा जब तक दौड़ जारी रहेंगी
- 57:57तुम सूखे नहीं होगे। क्योंकि जो दौड़ा उसने सुख को
- 58:03गंवाया, जो ठहरा उसने सुख को पाया ज़रा देखना ज़रा ठहर के देखना
- 58:17क्या तुम दौड़ तो नहीं रहे थे? मैं बोलता हूँ तुम ना जाने कहाँ
- 58:23कहाँ घूम आते हो, मैं बोलता हूँ मेरे प्रवचन में तुम वहाँ होते हो
- 58:30जहाँ मैं बोलता हूँ, क्या तुम मेरी आवाज को ठीक से सुन पाते हो?
- 58:37मैं बोलता हूँ तुम न जाने कहाँ कहाँ घूम आते हो संसार में इसीलिए
- 58:43तो कहा महावीर ने सच्चे श्रावक बन श्रवण की कला भी एक कला है, बस
- 58:51तुम्हारा मन कहीं और न भटके। जब गुरु बोले तो सुनता ही रहे,
- 58:58गुरु को ही सुनी संसार की सैर, ना करे संसार की सैर तो तुम प्रवचन
- 59:06के बाद भी करोगे प्रवचन से पहले भी कर रहे थे।
- 59:12फिर प्रवचन का क्या लाभ उठाया तुमने प्रवचन के दौरान तो ठहर
- 59:19जाओ। प्रवचन के दौरान तो ब्रेक लगा लो
- 59:23भागने पे तुम प्रवचन के दौरान भी रेस के ऊपर पांव रखे हो।
- 59:30फिर ठहराव आएगा कैसे और ठहराव नहीं आएगा तो वस्तु का पता लगेगा।
- 59:36कैसे वस्तु का पता नहीं लगेगा तो दुख की निवृत्ति होगी कैसे?
- 59:45तो फिर तुम दुखी ही रहोगे। कित्ते जन्म से तुमने प्रयास किए?
- 59:52लेकिन गुरुओं ने तुम्हें दौड़ नहीं सखाया ओह वी का कहते हैं, यह
- 1:00:01तो दौड़ है तू जी मन की तो। वे पांच नाम हो वह राधे राधे का
- 1:00:07नाम हो। ये सब दौड़ हैं और दौड़ों से कभी
- 1:00:11वो मिलता नहीं, बल्कि भागने से तो वह विलीन होता है, गुम होता है और
- 1:00:21तुम्हारे गुरु भी तुम्हें दौड़ नहीं सखा रहे हैं।
- 1:00:26तुम्हारी सेठ, अडानी, अंबानी भी तुम्हें दौड़ना सिखा रहे।
- 1:00:30देखो मैं एक नंबर का धनी हो गया भाई तुम सुखी भी हो गए क्या?
- 1:00:39आनंदित भी हो गए। एक नंबर का धन तो आ गया।
- 1:00:44मानो लेकिन क्या आनंद भी आ गया ईमानदारी से पूछना कभी तुम्हारे
- 1:00:54पड़ोसी को, जो सुखी जो अमीर, जिसके पास सभी सुख सुविधाओं के
- 1:01:03साधन हैं। उनसे पूछना सुविधाएं तो मिल गईं,
- 1:01:08धन भी मिल गया, सोना, चांदी भी मिल गया लेकिन क्या चैन मिला क्या
- 1:01:16और कमाने की तृष्णा मिटी क्या तृप्ति आई?
- 1:01:23वह मुँह लटका लेगा, वह कहेगा नहीं, तृप्ति तो नहीं, ईमानदारी
- 1:01:28से पूछो तो वह कहेगा नहीं, प्राइम मिनिस्टर भी कहेगा नहीं और प्राइम
- 1:01:35मिनिस्टर कहेगा तुम मूर्ख हुए हो का अगर तृप्ति हो गयी होती तो मैं
- 1:01:40दूसरी बार थोड़े ही वोट मांगता हूँ।
- 1:01:45मेरा दूसरी बार वोट मांगना यह सिद्ध करता है कि पहली बार तृप्ति
- 1:01:49हुई नहीं और जब पहली बार नहीं हुई तो दूसरी बार कैसे हो जाएगी और
- 1:01:56फिर तीसरी बार कैसे हो जाएगी जिंदगी?
- 1:01:59तुम सम्राट बने रहोगे। लेकिन सुकून नहीं आएगा।
- 1:02:11तुम सम्राट बने रह सकते हो चक्रव्रत लेकिन बात तो सुकून की
- 1:02:17है तो कहते हैं गोरख। कि ना तो विवाद करना, ना बहस
- 1:02:31करना, ना व्याख्या करना, ना भेद करना, ना ही किसी चीज़ का आश्रय
- 1:02:41लेने की चेष्टा करना, मान सम्मान प्राप्त करना, भूल जाना।
- 1:02:49क्योंकि वही मालिक है जिसने दुनिया को बनाया तुमने तो कजर्रा
- 1:02:56भी रेत का कभी नहीं बनाया, न वायु का एक इलेक्ट्रॉन।
- 1:03:05ना पानी की एक बूंद धरती का एक जर्रा तुमने कुछ बनाया तो है ना
- 1:03:14और जब तुमने बनाया नहीं तो फौका शरीर लेने का क्या अर्थ रह जाता
- 1:03:20है? और तुम तो 1 दिन विदा हो जाओगे
- 1:03:30कितने सिकंदर यहाँ से चढ़ गए कुछ ले के गए साथ श्रेय साथ ले गए।
- 1:03:41जो भेद फैलाया जो गर्दनें काटी जो लहूलुहान हुए जो सोना जो धन जो
- 1:03:52गद्दियाँ छीनीं लोगों की जमीनें हड़पीं साथ ली गई एक ज़रा फिर
- 1:04:00काहे दूर रहे हो? ठहरों ना ठहर जाओ अगर दौड़ से
- 1:04:09नहीं मिलता तो समझ लो कि रस्ता गलत है।
- 1:04:16थोड़ा ठहरों सोचो कहीं ऐसा तो नहीं?
- 1:04:20दौड़ तो रहा हूँ जन्मो जन्मो से, वह मिला नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं
- 1:04:27कि ठहर कर ही देख लूँ? दौड़ना तो बहुत ही जन्मो में कर
- 1:04:33लिया, अब थोड़ा ठहर के देखो और पाओगे के जैसे ही तुम ठहरे।
- 1:04:40दौड़ मिठी सन से गया तुम्हारे सन से मिट जाएंगे, दुविधा मिट जाएगी
- 1:04:47दौड़ दुविधा है वस्तु ठोर कि ठोर। दादू कहते हैं तुम्हें वो आनंद
- 1:04:54प्राप्त हो जाएगा जीसको बरसों पहले जन्मो पहले तुमने गंवा दिया
- 1:04:59था। गोरख कहते हैं जैसे 68 तीर्थ, 68
- 1:05:06नदियां जाके समुद्र में मिल जाती हैं, ऐसे ही तुम बूंद उस समुद्र
- 1:05:15में समा जाओ। और समुद्र ही हो जाओ और पीलो उस
- 1:05:22समुद्र के आनंद को जिसका रस कभी चुकता नहीं, जिसके रस में
- 1:05:31मधुमस्ती का वो आलम है जो कभी चुकता नहीं।
- 1:05:37खत्म नहीं होता, कम नहीं होता चाहे उसको सारे को ही निकाल ले
- 1:05:52पूर्णश्य पूर्ण माता है पूर्ण मेवा विशेष।
- 1:05:57पूर्णमदहा पूर्णमिदं पूर्णिमा पूर्णमदश्य दे पूर्णस्य पूर्ण
- 1:06:03महागाय पूर्णमय। वह पूर्ण है और पूर्ण में से
- 1:06:10पूर्ण को निकाल लिया जाए तो उपनिश्र के ऋषि कहते हैं।
- 1:06:15के पूर्ण ही शेष बचेगा। तुम बुद्धि से उसे नापना चाहते
- 1:06:20हो? उपनिषद तुम्हारी बुद्धि को तोड़ना
- 1:06:23चाहते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि तुम्हारे रस को अगर कोई चीज़
- 1:06:29गँवाती है तो वह तुम्हारी बुद्धि है।
- 1:06:33तो क्यों ना इस बुद्धि को ही काट दिया जाए?
- 1:06:37कोशिश तो बहुत करते हैं लेकिन छूटती नहीं है का?
- 1:06:42फिर मुँह को लगी हुई है यह बुद्धि तुमसे छोड़ी नहीं जाती, तुम तो
- 1:06:51जिद पर अटल रहते हो। कि मैं तो इस गागर में सागर को भर
- 1:06:55के ही रहूंगा, यद्यपि तुम लाखों जन्मों से यही कोशिश कर रहे हो।
- 1:07:03तुम्हें यही समझ नहीं आया कि इस गागर में सागर नहीं समाएगा लेकिन
- 1:07:10फिर भी तुम चेष्टा कर रहे हो? पांच नाम की चरखड़ी घूमा रहे हो?
- 1:07:15राधे राधे, राम राम अल्लाह अकबर कर रहे हो और जानते हो किस गागर
- 1:07:25में सागर समायेंगे कोई बाधी? कोई विवाद, जोगी को वाद न करना,
- 1:07:36विवाद मत करना, भेद मत करना, श्री मत लेना, 68 तीर्थ समन्द्र समन्वय
- 1:07:44जैसे सभी नदियां समत्र में समा जाती हैं।
- 1:07:49जो योगी को गुरमुख्य जर्ण ऐसे प्रत्येक योगी उस एक गुरु के भीतर
- 1:07:56सम जाता है जीसको गुर प्रसाद कहते हैं नानक और अगर वो न मिला।
- 1:08:08तो फिर बाकी सब मिल जाए बेकार सागर से लिपट के रोल।
- 1:08:22तुझ से लिपट के। तुझसे लिपटके जोरो लेते हम।
- 1:08:44आंसू फिर ये आंसू डले भी तो क्या है?
- 1:09:36एक तू ना मिला? तू ना मिला सारी दुनिया मिले भी
- 1:09:49तो क्या है? एक तू ना मिला सारी दुनिया।
- 1:10:00मिले भी तो क्या है मेरा दिल ना खिला दिल ना खिला सारी बागियाँ।
- 1:10:17खिले भी तो क्या? है।
- 1:10:29मिला। धन्यवाद।