Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 Feb 25 - ईश्वर भाग्य कैसे बनाता है? क्या है परमात्मा के तल तक पहुँचने का राज़? अनाहत तक कैसे पहुँचे?
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- 0:13बाबा जी प्रणाम पूछना चाहता हूँ बाबा कि मन में विचार आते ही गलत
- 0:26विचार आते ही पाप हो जाता है? या कर्म करने से पाप होता है,
- 0:35ईश्वर मन देखकर भाग्य बनाता है या कर्म देखकर भाग्य बनाता है।
- 0:46दीपक कुमार गुप्ता बड़ा सुन्दर प्रश्न है।
- 0:58ऐसे ही प्रश्न करना अध्यात्म में सार्थक है।
- 1:05जो तुम्हारे जीवन को जीने की घाठों को खोल सके अन्यथा सिर की
- 1:17खुजलाहट है। समुद्र में से कोई बूंद फिर संसार
- 1:26में आ गई फिर क्या होगा? ये सब खोपड़ी की खुजलाहट हैं इन
- 1:33प्रश्नों से तुम्हारी गांठे नहीं खुलती और गांठे नहीं खुलेंगी तो
- 1:38तुम आजाद नहीं हो पाओगे। तुम उन रूढियों में बंदे रहोगे।
- 1:46जो तुमने मान ली हैं सत्य को जानना ही मुक्ति है।
- 1:55आइए इस महत्त्व प्रश्न पर चलते हैं।
- 2:00सभी संतो का भगवान श्री कृष्ण का मुख्य मुद्दा रहा है।
- 2:13ध्यान से समझिएगा। एक मौन झील है, उसमें किसी ने
- 2:22कंकड़ मार दिया, तरंगें उठीं। उस वक्त झील दो काम कर सकती है,
- 2:40उन तरंगों के साथ बह सकती है या उन तरंगों को झील के गहरे तरों पर
- 2:47जा के निहार सकती है। थोड़ा गहरा हो गया।
- 2:52फिर समझाऊंगा मन में कोई पाप कर्म आया, किसी के बारे में कोई बुरा
- 2:59विचार आया? विचार आने से कुछ नहीं होता, यह
- 3:07आपको गलत समझाया गया है। मन सा यहाँ तक तो बिल्कुल भी गलत
- 3:19नहीं है। मन में तो आएँगे, चिंता के आएँगे,
- 3:24मुर्दा के नहीं आएँगे। जब मर जाओगे तो कोई प्रश्न नहीं
- 3:31आएगा। तो जिंदा व्यक्ति के मन में
- 3:38तिरंगे उठती हैं। उठेंगे विचारों की भी, विचारों की
- 3:45भी वो जब भी तरंगे उठे। अब दो रास्ते हैं तुम्हारे पास एक
- 3:59रास्ता है उन तरंगों के साथ बह जाना है एक आकार हो जाना है।
- 4:10उन तरंगों की बात को मूर्त रूप दे लेना उसे कहते हैं, कर्म दूसरा उन
- 4:19तरंगों को देखते रहना, देखते रहना तरंगें उठेंगी चले जाएंगे।
- 4:28तरंगें उठेंगी, चले जाएंगी और धीरे धीरे विदा हो जाएंगे।
- 4:36एक कंकड़ी मारी थी किसी ने उसकी तरंगे ज्यादा देर तक नहीं चलेंगी।
- 4:45थोड़ी देर चलेंगी, फिर तुम देखना लुप्त हो जाएंगे।
- 4:49ऐसे ही मन की व्यवस्था है। मन में कोई विचार आया?
- 4:54किसी के प्रति उस विचार को देखकर परमात्मा कभी फल नहीं देता।
- 5:05विचार तो उठेंगे। जीवित प्राणी में विचार और विकार
- 5:11आना स्वाभाविक है। यही गलती हो गई।
- 5:17तुम्हारे मार्गदर्शकों से वाचा कर्मणा मनसा।
- 5:27तो मनसा को तो छोड़ता हूँ, मनसा तो मन में आई हुई तरंगें हैं,
- 5:34वाचा कह देने से भी कर्म नहीं होता।
- 5:44कह देने से जिसके प्रति कहीं गए हैं, उसके मन में थोड़ा सा असंतोष
- 5:53होता है, लेकिन अभी कर्म हुआ नहीं कर्मना।
- 6:02फिर आपने वो कर्म कर दिया, पहले मन में आया फिर वचन में आया फिर
- 6:10कर्म में आया ये तीन स्टेजेस हैं कर्म के तो मन में तो आएगा, यह तो
- 6:20स्वभाविक है। बेकार भी आएगा, विचार भी आएगा,
- 6:28भावनाओं भी आएंगी, शांति भी आएगी। ये स्वाभाविक है, इट्स नेचुरल है।
- 6:40लेकिन मानव में कोई चीज़ आने से तुम्हारे पास दो ऑप्शन हैं वहाँ
- 6:50चाहे तो उस मन के साथ बह जाओ तो मैं क्रोध आया हूँ।
- 6:57मनस में क्रोध आया मनस के पर्दे पर बड़ी क्रोध की लहरें चलने
- 7:03लगीं। अगर तुम उन क्रोध की लहरों के साथ
- 7:09मिल गए, आइडेंटिफिकेशन कर लिया, तादाद में साँध लिया।
- 7:19तो वह कर्म बन जाएगा, फिर तुम रोक नहीं पाओगे विकार उठा और तुम
- 7:33देखते रहे विकार उठा। और थोड़ी देर ठहरेगा, ठहरने दे ना
- 7:44तुम्हारा कुछ नहीं लेता। फिर वो विदा हो जाएगा।
- 7:49तुम देखना जब विदा हो जाएगा। उसे ही मुक्ति कहते हैं।
- 7:56फिर तुम इन विचारों से मुक्त हो गए ऐसे कोई भी विकार या कोई भी
- 8:02विचार तुम्हारे मन के पर्दे पे आए उसे दो ही तरीकों से निपटाया जा
- 8:11सकता है। साक्षी और कर्म एक तो उसे साक्षी
- 8:25बनकर देखते रहो तुम अपने साक्षितों में।
- 8:32सिधर रहो इसे ही कृष्ण भगवान ने स्थिति प्रज्ञा कहा तुम प्रज्ञा
- 8:39में सिधर रहो, हैलो मत तुम उस विचार के साथ मत जाओ।
- 8:51उसके साथ यात्रा न करो। अगर तुमने उस विचार या विकार उसके
- 9:02साथ यात्रा की तो वह कर्म में तब्दील हो जाएगा।
- 9:10फिर मिलेगा तुम्हें फल यही कहते हैं कृष्ण जैसा कर्म करेगा वैसा
- 9:21फल देगा भगवान। अब दूसरी जो व्यवस्था है, वो
- 9:27साइकोलॉजी ने मनोवैज्ञानिक ने खोजी है।
- 9:36वो क्या है? वो भी ठीक है लेकिन वो तब तक ठीक
- 9:44है। मनोविज्ञान कहता है अगर एक दोहा
- 9:49सुनूंगा। तो मैं करत करत अभ्यास के जड़ मती
- 9:55होत सुजान रसरी आवत जातते सिर पर पड़ते निशान।
- 10:03पत्थर की शिला होती है। पहले जमाने में कुंए होते थे, वो
- 10:11रस्सी पत्थर की शैला के ऊपर से आती जाती थी।
- 10:17कुछ दिनों में उस पत्थर की शिला पर निशान पड़ जाता था।
- 10:27अगर ऐसे लगातार तुम्हारे मन में आते रहेंगे, आते ही रहेंगे तो फिर
- 10:36निशान पड़ जाएगा। यही व्यवस्था है मनोविज्ञान की।
- 10:44सोचती रहो सोचती रहो मनुष्य में आने दो, आने दो सुबह उठो तुम कहो
- 10:57मैं मिनिस्टर बनना चाहता हूँ, मैं मिनिस्टर बनना चाहता हूँ।
- 11:02धीरे धीरे धीरे धीरे रसरी आवत जात ते।
- 11:07सिर पर पड़ते निशान ऐसा सोचने से ऐसा कहने से कुछ नहीं होगा, लेकिन
- 11:17वह जो निशान पड़ गया। 1 दिन वह निशान वह सोच कर में
- 11:25तब्दील हो जाएगी। ध्यान से समझे ना बात को वह सोच
- 11:34कि मैंने मैजिस्टिक वर्ल्ड। सोचते रहो, सोचते रहो, रशड़ी आती
- 11:44रहे जाती रहे, निशान पड़ जाएगा फिर तुम क्या करोगे?
- 11:49फिर तुम रजिस्ट्रेट बनने के लिए प्रयास करोगे और वह प्रयास।
- 12:00तो मैं मैजिस्ट्रेट बना देता हूँ सिर्फ मात्र सोचने से कुछ नहीं
- 12:06होता बहुत से मूर्ख हैं और बहुत सी संस्थाएँ हैं जो समझा रही हैं
- 12:16के सोचते जब। सोचते रहो आगे की बात वो या तो
- 12:22जानते नहीं कि इसके भीतर की क्रोनोलॉजी क्या है या वो जानबूझ
- 12:29के नहीं बताते? भीतर की ये है रहस्य।
- 12:38सोचोगे मैं मिनिस्टर बन जाऊं, प्राइम मिनिस्टर बन जाऊं बनोगे
- 12:45नहीं, क्योंकि कतार में बड़े लोक्कड़ है।
- 12:51तुम्हारा नंबर बड़ी दूर होगा। अभी तो मौजूदा प्राइम मिनिस्टर की
- 12:58कुर्सी की तरफ टांग खींचने वालों की नहाए जमी हुई है।
- 13:04वो बहुत देर से प्रयासरत हैं कि कब इसके टांग खींचूं अभी तो उनका
- 13:13नंबर आएगा। तुम भी इस कतार में लग जाओ, तुम
- 13:19भी सोचते रहो, सोचते सोचते 1 दिन तुम मूर्त रूप दोगे, फिर राजनीति
- 13:27में आ जाओगे जिंदाबाद मुर्दाबाद, झंडे डंडे उठाओगे।
- 13:34लेक्चर्स करोगे? बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी उसके बाद
- 13:44फल आएगा। धीरे धीरे रेबना धीरे सब कुछ होए।
- 13:54माली सीचे सो घड़ा ऋतु आय फल होया जो धर्म जी कहते हैं कि सिर्फ
- 14:03सोचो, सुबह उठकर 10 मिनट, 15 मिनट, आधा घंटा सोचो।
- 14:14सोचने से कुछ नहीं होता और कुछ तो ऐसी बातें जो हो नहीं सकती, वो भी
- 14:24ये कहते हैं कि सोचो। ये बहुत से पागल वाराणसी की गंगा
- 14:33के किनारे हैं। हाथ में माला लिए जप रहे हैं।
- 14:37शिवो हम मैं शिव हूँ मैं शिव हूँ चिल्ला के रहो उमरे बीत जाएंगे
- 14:45तुम शिव नहीं बनोगे। शिव के जाप करने से शिव नहीं
- 14:50बनाया जाता। तुम शिव हो तुम सत्य हो तुम सनातन
- 14:56हो यह माला छोड़नी होगी शिव होने की उमंग।
- 15:06जम जाए गहरी फिर उस प्रयास पे चलो प्रयास पे चलो निरंतर, चलो चरई
- 15:19वैती चरई वैती। फिर 1 दिन।
- 15:26तुम्हें मार्ग मिलेगा, मार्ग बताने वाला भी मिल जाएगा, मार्ग
- 15:33पे चलोगे और 1 दिन तुम शुभ हो जाओगे, मैं जल पे पहुँच जाऊंगी
- 15:40अगर तुमने वो कायदा है। बनारस के घाट पे, गंगा के तीर पे
- 15:50शिव हम शिव हम का जाप करना एक कायदा है जिसे हम कहते हैं ए
- 15:58अनार। बी बॉल सी कैट वो एक कायदा है अगर
- 16:17कायदे को पकड़े रहे अगर माला को पकड़े रहे।
- 16:23शिबो हम शिबो हम जपते रहे तो कभी शिव नहीं हो पाओगे अगर तुम राधा
- 16:34राधा राधा जपते रहे तो कभी राधा उस राधा तक जो वास्तव में राधा
- 16:41है। नहीं पहुँच सकोगे क्योंकि राधा तो
- 16:46तुम्हारे अंतस का वो चैतन्य है वह चैतन्य स्वरूप वहाँ जाने के लिए
- 16:56किसी जाप की आवश्यकता नहीं पड़ती। लेकिन शुरुआत में अच्छा है अगर
- 17:08तुम छोड़ने की कला जानू, तो यह तुम्हें पहुंचा देंगे मुश्किल
- 17:15कहाँ पेश आती है। तुम पकड़ तो लेते हो, छोड़ने की
- 17:23कला तुम्हें आती है एक बार पकड़ लेती हो, फिर चिपक जाते हो ये
- 17:33चिपकाहट तुम्हें बांध लेती है ये बंधन बन जाते हैं।
- 17:42जैसे एक पूड़ी को हमने पकड़ लिया सीढ़ी को अगर तुम को छोड़ने की
- 17:48कला नहीं आती तो तुम पहले ही पूड़ी के ऊपर खड़े रहोगे।
- 17:56दूसरी सीढ़ी पे तुम्हारे पांव कभी नहीं आएँगे।
- 18:02अगर तुम चलना चाहते हो एक कदम चले, फिर तुम रोज़ चलते हो, तुम
- 18:13जानते हो? एक कदम चले फिर पीछे का पांव
- 18:17छोड़ना पड़ेगा। आगे वो आगे वाला पांव पीछे हो
- 18:23जाएगा, फिर आगे रखना पड़ेगा पीछे वाला।
- 18:31ऐसे तुम चल पाओगे और ऐसे मंजिल तक पहुँच पाओगे छोड़ने की कला आवश्यक
- 18:41है और यही तुम्हें आती नहीं, तुम चिपक जाते हो तुम कहते हो वह
- 18:49सीढ़ी आ गई। सीढ़ी चढ़ना तो चढ़ गए नहीं।
- 18:57सीढ़ी चढ़ना है, पायदान बदलना है फिर उस सीढ़ी को छोड़ना दूसरे
- 19:05पायदान पे फिर उसको छोड़ना तीसरे पे 1 दिन छत आ जाएंगे।
- 19:15तो शिवों हम का जॉब करो। यहाँ से शुरुआत अच्छी है, जरूरी
- 19:23भी है। मैं शिव शुरू हूँ, ये सत्य भी है।
- 19:29राधा का जाप करोगे। बिल्कुल उसी तरह जैसे तुम जज बनना
- 19:34चाहते हो, लेकिन इस सोच को छोड़कर क्रिया में आना होगा, पुस्तकें
- 19:43लानी होंगी, लाज की पुस्तकें पढ़नी होंगी।
- 19:48सभी विषय जो आते हैं मुकाबले में कॉम्पिटिशन में वो पढ़ने होंगे,
- 19:54कॉम्पिटिशन में बैठना होगा और फिर पास करना होगा।
- 20:01फिर तुम 1 दिन जाके जज बन पाओगे। मात्र जाप करने से या मात्र सुबह
- 20:09उठकर सोचने से 1520 मिनट जरूरी तो है, लेकिन पहला कदम है पहले कदम
- 20:20के आगे मनुष्य में तुमने जचा लिया।
- 20:28वह दृढ़ प्रतिज्ञ होना है। समझना भारत को ये जो हम संकल्प
- 20:33उठाते हैं बिषम ने संकल्प उठाया मैं संकल्प उठाता हूँ कि आजीवन
- 20:43शादी नहीं करूँगा। ब्रह्मचारी रहूंगा।
- 20:51यह संकल्प था। फिर उसने निभाया तुम संकल्प लेना
- 20:58तो जानते हो, निभाना नहीं जानते। निभाना भी पड़ता है।
- 21:07फिर ही संकल्प पूरा हुआ अन्यथा संकल्प संकल्प न रहा।
- 21:12टूट गया अधूरा रह क्या तो यह पहली पोड़ी है मनुष्य में आएगा।
- 21:23मनस में आने के बाद मनस में ही मत उलझे रहना ये चपकाहट तुम्हें कहीं
- 21:32का नहीं छोड़ेगी बस बहुत से बुद्धू आज राधे राधे कर रहे हैं
- 21:40बहुत से बुधू आज शिवो हम शिवो हम कर रहे हैं।
- 21:44माला ही पकड़े हैं। कबीर समझाते हैं कि माला पकड़ लो,
- 21:51राम राम तो कबीर ने भी किया। रामानंद के शिष्य थे, वो सबसे
- 21:57पहले थे गुरु शिष्य को। जाप ही देता है।
- 22:05इसका जाप करो, माला पकड़ाओ ठीक से इसे लिखना आ जाए।
- 22:12शुरू से बच्चे को हम पुरने डालते हैं कि इसके ऊपर ऊपर लिखे जाओ फिर
- 22:19वो खुद पहचानने लगता है। फिर 1 दिन खुद लिखने लगता है।
- 22:27तुम इस सारी चीज़ को समझ नहीं पाए या ऐसा समझो कि तुम्हें समझाने
- 22:34वाले मिले कहीं तो कुछ गर्व है। जब आज सारा संसार पीड़ा में, दुख
- 22:46के जरोखों में आँखों में अश्क दुखों के हैं कहीं शांति का कोई
- 22:55नामो निशा नहीं, ओम शांति का जाप करते रहो, शांति नहीं आएगी।
- 23:03ओम शांति का जाप करने से शांति नहीं आती, शांति आती है उस तट पे
- 23:10पहुंचने से जहाँ ओम का गुंजार हो रहा है अनाह अनाहतनाद का वो
- 23:19अंतरिम छोर। ये नाद जहाँ से उठता है उदगम स्थल
- 23:28वहाँ से ओंकार की ध्वनि आती है और भी बहुत सी ध्वनियां आती हैं।
- 23:34तो बताने वालों ने सिर्फ एक सिम्बोलिक रिप्रजेंटेशन की तरह
- 23:39आपको बताया। ओम शांत वहाँ बड़ी शांति है जहाँ
- 23:46ओम का गुंजार हो रहा है, बड़ी शांति है, जाके देखो बड़ा प्यार
- 23:53छलकता है, बड़ा अमृत बरसता है, लेकिन तुम अगर जुबान से।
- 24:00मन से उसका जाप करने लगोगे, यह सोने लगोगे, कुछ नहीं होगा, उस तल
- 24:11पर पहुंचना होगा। चंद्रमा चंद्रमा चंद्रमा कहने से
- 24:18चंद्रमा के ऊपर नहीं बैठ जाओगे। यात्रा करनी होगी।
- 24:25ओम शांति ओम शांति कहने से शांति नहीं होगी।
- 24:30ये मतलब था कि जहाँ ओंकार का नाद हो रहा है, वह वातावरण बड़ा शीघ्र
- 24:39है। बड़ा शांत है, पिन ड्रॉप साइलेंस
- 24:50ज़रा भी अशांति नहीं शोर नहीं। पूर्ण शांति है कहाँ जहाँ अहंकार
- 25:04का गुंजार हो रहा है बाजयनाथ अनेक अशंका केत वावनहारी।
- 25:18बुल्ले शाह ने कहा मस्जिद खोलो जोड़ा डरया इन मंदिर या मस्ज़िदों
- 25:26की चारदवारियों में तुम्हारा मन घबराता है मस्जिद खोलो जोड़ा डरया
- 25:35ये जीभ डर गया। मस्जिद की चारदुवारियों में यानी
- 25:40बंधनों से ये जीभ डर गया। मस्जिद कोलो जोड़ा डरया जा ठाकर
- 25:50दे डेरे वड़िया फिर मैंने क्या किया?
- 25:56उन चार दीवानियों के बंधन मैंने तोड़े और ठाकुर के ढेर में प्रवेश
- 26:04किया, मस्जिद गोलों जोड़ा डरया जा ठाकुर दे ढेर वडिया वहाँ पहचान
- 26:13बताते हैं। बोले शाह।
- 26:19जिथे बज दे नाद 1000 वहाँ पर हजारों नाद बज रहे हैं, बड़ी
- 26:32शांति है। मधुर संगीत की स्वर्धनिया तुम्हें
- 26:39मदमस्त कर देंगे यहाँ का संगीत ही तुम नहीं झेल पाते गर्दनें हिलने
- 26:48लग जाती हैं वहाँ का दिव्य संगीत। और तुम्हारे प्राणों को आलोकित
- 26:57करतेगा तुम झूम उठो गए ये उसकी निशानी बताते हैं।
- 27:04बोले शाह जिथे वैदेनाथ 1000 इश्क दी नमी ओह नमी बहार।
- 27:14प्रेम प्रेम वाहन तक पहुंचा देता है, प्रेम की नावों पे संवार होकर
- 27:27ओंकार की धुन तक निकल जाओ। वह शांति है, ओम शांति कहने से
- 27:35कुछ नहीं होगा। ओम शांति ओम शांति का जाप कितना
- 27:44ही करते रहो, सारी उम्र करते रहो, जन्मो जन्मो तक करते रहो, कुछ
- 27:49नहीं होने वाला, ना शांत हो पाओगे, ना ओम की ध्वनि तक पहुँच
- 27:54पाओगे। महके हुए गुरस्ता के भीतर जाना
- 28:02होता है। गोलों की सुगंधी को नासा पूठों के
- 28:09भीतर भरना होता है। फिर आता है मज़ा गुलस्ता में जाने
- 28:15का। सिर्फ गुर स्तान का नाम लेने से
- 28:25बस याद आती है। उसकी इतना सा प्रभाव तो होता है।
- 28:31शब्दों का प्रभाव इतना तो पड़ता है।
- 28:34तुम गंदगी का नाम लोगे तो थोड़ा सा प्रभाव मनुष्य में आएगा।
- 28:43तुम फूलों की सुगंधी का नाम लोगे, इत्र का तो थोड़ा सा प्रभाव उसका
- 28:49आएगा, गन्दी बातें करोगे, थोड़ा सा प्रभाव वो आएगा।
- 28:58इसे संकत का प्रभाव कहते हैं और सत्संग की बात करोगे तो मनुष्य
- 29:06में अच्छी लगी रें खींचा की बस इतना सा प्रभाव आता है इतना तो
- 29:11आता है तो पूछा है दीपक ने। क्या मन में या कर्म में किसका फल
- 29:30मिलता है? शुरू होता है मन से कोई भी कर्म
- 29:39ऑप्शन है तुम्हारे पास। अगर मन के साथ हो लिए बेकार के
- 29:47साथ हो लिए विचार के साथ हो लिए तो वह कर्म में तब्दील हो जाएगा
- 29:56फिर तुम्हारे हाथों से बाजी गई। अगर मन के साथ न हुए तो तुम शांति
- 30:08में अवस्थित रहे। तुम साक्षी में अवस्थित रहे।
- 30:13तुम दृष्टा में बैठे रहे, फिर तुम मौन रौ हो गए।
- 30:20झील का गहरा तल मौन रहता है। झील का गहरा तल ऊपर उठी हुई
- 30:28तरंगों के साथ कभी एक आकार नहीं होता।
- 30:35झील का गहरा तल? समुद्र का भी गहरा तल असपृश्य बना
- 30:42रहता है। माँ बना रहता है, शान उठती हुई
- 30:50लहरों को निहारता है, लहरें उठती हैं।
- 30:56वह ठहरा ही रहता है। झील का गहरा तल सदैव ठहराव में
- 31:05है। ऊपर की तरंगें तो आईं, थोड़ी देर
- 31:11तक टीकेंगी फिर चले जाएंगे। यही तुम्हारे मनस के साथ होता है।
- 31:20इसको गहरे से सुन लेना मनस में किसी के बारे में कोई विचार आया
- 31:28आएगा, कोई तुम्हारा शत्रु भी होगा।
- 31:34उसको दंड देने के विचार भी आ सकता है।
- 31:37कोई तुम्हारा प्रेमी भी होगा, उसको गले मिलने का विचार भी आ
- 31:42सकता है। विचार तुम्हें सिर्फ क्रोधित कर
- 31:47जाएगा या प्रेम से भर जाएगा। प्रेमिका का विचार आ गया।
- 31:51प्रेमी का विचार आ गया तो मन में शीतलता आ जाएगी, दुश्मन का विचार
- 31:58आ गया तो मन में उत्पाद खड़ा होगा, कोलाहल होगा लेकिन विचारों
- 32:06तक ही कीमत अगर रह जाए। और तुम्हारी भीतर का साक्षी है,
- 32:14उसके साथ यात्रा न करे, उसके साथ न निकल पड़े तो वह कर्म नहीं
- 32:22बनेगा और तुमने पूछा भी। कर्म का फल मिलता है या मनुष्य का
- 32:31मनुष्य का फल नहीं मिलता? मनुष्य तो अच्छा है, जब हम
- 32:36कैथप्रस करते हैं, मैं रोज़ कहता हूँ, घरों में पूजा और उन्नत
- 32:41मनाओ। घरों में एक कमरा बना दो जहाँ पर
- 32:55अगर कोई आदमी नाराज है वहाँ जाकर अपने विचारों को कैथल कर सके को प
- 33:03भवन कहते थे। दशरथ बड़े सयानी थे।
- 33:11उन्होंने गोप भवन का निर्माण किया।
- 33:16जाओ वहाँ जाकर मारपीट करो, चीखो चिल्लाओ।
- 33:24क्रोध को निकालो जो तुम्हारे मनस में आ गया ध्यान रखना वह निकलने
- 33:30के लिए आया है इच्छा तुम्हारी के तम उसको कैसा हर्षित करते हो या
- 33:37उसके साथ निकल कर यात्रा करते हो। यह ऑप्शन तुम्हारी है।
- 33:44तो कोप भवन बनाया। दशरथ ने अगर कोई व्यक्ति नाराज है
- 33:50कोई दुखी है, किसी बात से मन है जीते जी तो सब कुछ होगा, मरने के
- 33:56बाद कुछ नहीं होगा। मरने के बाद तो वह व्यक्ति।
- 34:02जो तुम्हारा दुश्मन है, तुम्हें ठुड्डे भी मारता रहे और तुम्हें
- 34:06आग में भी डाल देते हैं तो तुम कुछ भी नहीं करते कर नहीं सकते
- 34:12क्योंकि जीवन दायिनी प्राण शक्ति चेतना हो गई जो रिएक्शन कर सकते
- 34:18थे। जिसकी मौजूदगी में रिएक्शन होता
- 34:22है वह निकल गई। मनस में आएगा विचार वह विकार हो,
- 34:35वह विचार हो विकार। काम, क्रोध, लोभ, मोभ, अंकार मद,
- 34:42मत्सर और वह ये मैंने बेकार कहा है मन में आएँगे अगर इन्हें
- 34:53रोकोगे तो भी दबे। अगर इन्हें भोगोगे तो भी मुश्किल
- 34:59में पड़ी ना रोको ना भोगो, बरण देखो अपने जागने में स्थित रहो
- 35:13साक्षी की तरह इन्हें निहारो। आएँगे तुम्हारे सामने आएँगे तुम
- 35:20धृष्ट हो तुम्हारी आँखें हैं तुम खुद आँखें हो तुम्हारे सामने से
- 35:29आएँगे। विचार बड़ी ही चित्र है साफ साफ
- 35:32दिखेगा। लेकिन अगर तुमने इसको आने दिया,
- 35:44तुम ठहरे रहे अपने में तो यह चले जाएंगे चले कहाँ जाएंगे
- 35:53अट्मोसफियर में वातावरण में। और तुम हल्के हुए इससे निजात मिल
- 36:00गई। इसको कहते हैं निरजरा जो जैन धर्म
- 36:06में निरजरा होती है वो साक्षित में होने से होती है।
- 36:12आजकल पता नहीं क्या क्या रिवाज़ बन गए हैं।
- 36:19उपवास करो, पूजा करो, नवकार मंत्र करो नहीं कुछ नहीं करो, मन में जब
- 36:28विकार आए तो राधे राधे करने राम राम करने जाओ।
- 36:34नवकार मंत्र जपने मत लग जाना बस स्थित हो जाना अपनी प्रज्ञा में
- 36:43ठहर जाना अपने आप में तुम साक्षी हो तुम्हें दिखेंगे।
- 36:53और तुम ठहरे रहे तो तुम पाओगे जो भी विकार आया, जो भी विचार आया ये
- 37:03सब धीरे धीरे विदा हो जाएगा खो जाएगा वातावरण में और तुम
- 37:08वास्तविक मुक्त हुए। अब यहाँ समझ लो बात को तुम मुक्ति
- 37:16चाहते हो तुम्हें इन्हीं चीजों ने तंग कर रखा है रोज़ मेरे पास लोग
- 37:21आते हैं बाबा विचार बड़े तंग करते हैं, मन बड़ा तंग करता है, यह
- 37:26विकार बड़े तंग करता है तो इन दोनों का उपाय क्या है?
- 37:32इन दोनों का उपाय है साक्षित विकार आएं या विचार आएं तुम
- 37:40साक्षित्व में डटे रहना, साक्षित्व में ठहरे रहना झील के
- 37:46उस अंतस्तम तल की तरह। जो बाहर की तरंगों के साथ लिप्त
- 37:52नहीं होता ऐसा मत हो। घर से तो हम चले थे खुशी।
- 38:09की तलाश में खुशी की तलाश में घमराह में।
- 38:27खड़े थे, वो ही साथ हो लिए खो दिल से दिल की बात कही और।
- 38:46रोहलिए जूं हसरतों के दाहक मोहब्बत में धो लिए।
- 39:03खो दो, दिल से दिल की बात कही और रो लिए।
- 39:17घर से तो हम चले थे खुशी की तलाश में।
- 39:22गमराह में खड़े थे, वो ही साथ बोलिए मन में मन के पर्दे पर आए
- 39:32हुए इन विचारों या बेकारों को अगर तुम पकड़ने जाओगे।
- 39:43तो तुम इनके साथ चुप कर जाओ, कहीं फिर ये तुम्हारा पीछा नहीं
- 39:51छोड़ेगा, फिर तुम्हें भोगना ही पड़ेगा।
- 39:58और भोग कर तुम पछताओगे, मैंने क्या किया मुझे क्रोध नहीं करना
- 40:04चाहिए था। मुझे काम के अंतरंग क्षणों में
- 40:10जाना नहीं चाहिए था क्या मिला? दुश्मनी बढ़ी वह भी फिर तू देगा
- 40:29आपने एक मारा और दो मारेगा फिर आप चार मारोगे?
- 40:35यही 1 दिन कतरो गारक में तब्दील हो जाएगा।
- 40:42नहीं पहले मुकाम पर उसे रोक लो अंत में तुम रोक ना पाओगे अंत में
- 40:52पश्चात आपके सिवा और कुछ नहीं होता।
- 40:55हत्या का विचार आए। अगर जेल की कोठडियों में या फंसी
- 41:00के फन्धों से बचना चाहते हो तो उसी वक्त उन्हें देख लो रोको मत
- 41:07सुनो बात मैं क्या कहता हूँ यहाँ बड़ी मुश्किल खड़ी होती है
- 41:15तुम्हें विचार आया मनस में। आया जैसे झील के ऊपरी सतह है पर
- 41:23तरंगें ऐसे ही विचार आए या विकार आया लेकिन झील की अंतरंग तरंगें
- 41:33निर्दोष बनी रही, निर्लिप्त बनी रही।
- 41:38फिर तो कोई तुम्हारा कुछ नहीं बाँट सकता।
- 41:41वह विचार हो या बेकार हो, लोग रोज़ मुझे पूछते हैं, मैं रोज़
- 41:48लोगों को समझता हूँ, यही बात समझता हूँ और रोज़ वो कहते हैं,
- 41:54बाबा। फिर फंस गए।
- 41:58कोई बात नहीं धीरे धीरे रे मन्नू धीरे सब कुछ हो कोशिश करो करत
- 42:07करत। अभ्यास के आज हार गए, कोई बात
- 42:10नहीं, प्रत्याशित मत करो। आज काम जीत गया, आज क्रोध जीत
- 42:17गया, आज लोग मौ जीत गया, इरशादुइश जीत गई, कोई बात नहीं तुम जीरा मत
- 42:27छोड़ो, तो मन मत हारो, कोई बात नहीं।
- 42:37फिर देखेंगे, अगली बार देखेंगे बेकार फिर भी आएँगे विचार फिर भी
- 42:45आएँगे लेकिन तुम अपने आप में ठहरने का अभ्यास करो।
- 42:55और अभ्यास करते करते करते करते सिर पर भी निशान पड़ जाता है।
- 43:03ये अभ्यास 1 दिन फलीभूत होगा और तुम अपने भीतर ठहरने के अभ्यस्त
- 43:11हो जाओगे। जैसे तुम भोगने के अभ्यस्त हो गए,
- 43:16जिसे हम संस्कार कहते हैं, क्योंकि अभ्यास किया हमने हमारे
- 43:22मन में काम उठा क्रोध उठा हमने वो भोग लिया तो हम जन्मो जन्मो से
- 43:28अभ्यस्त हो गए। इस अभ्यस्त होने को ही संस्कारित
- 43:32कहते हैं। हम संस्कारों से ही जुप्त हो गए।
- 43:40ऐसे ही तुम साक्षी होने के अभ्यस्त हो जाओ हारोगे।
- 43:45मुझे पता है। गिरते ही शहसवार ही मैदानी जंग
- 43:50में नाबाल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले अभ्यास से तू कौन ते
- 44:02वराकिएन चेग्रह ते? छठे अध्याय का शायद पैंतीसवां
- 44:13श्लोक है जहाँ तक मेरी मेमोरी काम करती है।
- 44:21हाँ, छठे अध्याय का पैंतीसवां श्लोक।
- 44:25अभ्यासें तो कौनते व्याकेन चक्रिहते।
- 44:31इसका अर्थ है अभ्यास, अभ्यास से वैराग्य हो जायेगा अभ्यास और
- 44:38वैराग्य ये दोनों वश में करने का मूल मंत्र।
- 44:46करत करत अभ्यास की जड़ मती हो तो सजान तुम मन मत हार जाना गिरोगे
- 44:58लेकिन अफ़सोस मत बनाना प्रयास मत करना।
- 45:04गिरोगे गिरना स्वभाव गिरना जरूरी है गिर गिर के सीखोगे, उठना,
- 45:15संभलना और चलना फिर दौड़ोगे भी 1 दिन।
- 45:24मनुष्य के ऊपर विचार आएं, मनुष्य के पर्दे पर विचार आएं और सारी
- 45:33मानवता इससे तृषित है। जूझ रही है।
- 45:40बहुत से सकोलॉजिस्ट मेरे पास आए हैं।
- 45:42मनोवैज्ञानिक साइकोट्रिस्ट दूसरों के मन का इलाज करते हैं।
- 45:49खुद मन के शोर शराबे से त्रसित हैं बाबा क्या करें?
- 45:57हम तो ज्यादा से ज्यादा मन को सुला सकते हैं सैडिट्यूड देकर,
- 46:03ट्रेंकोलाइजर देकर लेकिन असली बात तो आप जानते हैं क्योंकि मन के
- 46:11पार जाकर ही मन का स्वभाव जाना जा सकता है।
- 46:15इस शब्द को फिर सुन लो। मन का स्वभाव मन के पार जाकर ही
- 46:22देखा जा सकता है और मन का स्वभाव है कि मन अगर एन्टेंगल होगे उसके
- 46:29साथी चिपकोगे तो मन भोग में ले जाएगा तुम्हें।
- 46:36और मन अगर उसके साक्षी बने रहे देखते रहे तो मन तिरोहित हो
- 46:43जायेगा। अब इसको फिर सुन लो, यह मोरू है,
- 46:48मन यानी विचार हूँ या विकार हूँ। यह जब भी तुम्हारे पर्दे पे आए
- 46:55मनुस के अगर तू इसके साथ ही चिपक गए तो ये तुम्हें भोग में ले
- 47:02जाएगा। फिर कोलाहल शांत नहीं होगा, फिर
- 47:07लड़ी चढ़ पड़ी है फिर पराशित करोगे।
- 47:13ये तो है दुखों का रास्ता और सारी मानवता इस बात से तृषित है
- 47:19मनोवैज्ञानिक भी मेरे पास आ जाते हैं बाबा ये तकलीफ है लोगों को हम
- 47:24समझाते हैं हमारे पास सिर्फ मन को सुलाने का मेथड है हू कैन
- 47:30प्रोवाइड त्रंकुलायजर एस् एडिटिव्ज़।
- 47:34हम सिर्फ त्रंकुलायजर दे सकते हैं या सेडिशन दे सकते हैं,
- 47:39एनेस्थीसिया दे सकते हैं, इससे ज्यादा हमारे पास कोई हल नहीं है
- 47:45लेकिन ये कोई हल थोड़ी है ये तो दमन है, ये तो सुपरसन है।
- 47:52डिप्रेशन का सुपरेशन तो बाबा सही हल बताओ, मन को वह जान सकता है जो
- 48:02मन को देखता है संत मन का साक्षी रहता है हर वक्त।
- 48:12मन को अच्छी तरह देखते हैं। संत मन की सब गतिविधियों को
- 48:16निहारता है बारीकी से क्यों निहारता है क्योंकि वह अपने आप
- 48:23में सिधर रहता है जैसे झील अपने अंतस के तल को कभी नहीं छोड़ती।
- 48:32अपनी सतर्कता को कभी नहीं छोड़ती यही भगवान कृष्ण बार बार कहते हैं
- 48:37अर्जुन को हे अर्जुन तू सती प्रज्ञ हो जा, तू सिद्ध हो जा तू
- 48:43ठहर जा निष्कंभ हो जा तू कांप मत तू ठहर जा अपनी प्रज्ञा में।
- 48:51इस झील के अंतस्तंभ के कोने में ठहर जा वहाँ तू है ठहरा हुआ और
- 49:02अगर तू वहीं ठहरा रहा तो ये बेकार आएँगे, आएँगे मनुस के परदे पे।
- 49:11तुम ठहरे रहना तुम कंपित मत होना तुम्हारे दिये के लोग कांपेना
- 49:18प्रभावित न हो तुम अपनी मौझ में रहना बेकार आएँगे, विचार आएँगे,
- 49:26चले जाएंगे। ये है मोरेल और अगर तुमने मनुस को
- 49:40कर्म में बदल दिया तो वो तुम्हें भुगतना पड़ेगा अगर तुमने मनुस को।
- 49:49सिर्फ देखा तो वह फट जाएगा खंड खंड हो जाएगा और विलय हो जाएगा
- 49:59वातावरण में अट्मोसफियर में फिर तुम्हें कोई दंड नहीं मिलेगा पूछा
- 50:07तो पुत्र। मानसिक विकार फल नहीं देते हैं,
- 50:15पर महात्मा मनुष्य में उठी हुई बातों को फल नहीं देती, वे तो
- 50:19आएंगी। जिंदा होने की यह लक्षण भी है।
- 50:25मुर्दा में विकार नहीं आते। मुर्दा में विचार भी नहीं आते तो
- 50:32स्वाभाविक है नेचुरल है। जीवंत व्यक्ति में विचार भी
- 50:39आएँगे, बेकार भी आएँगे लेकिन इनके गुलाम न हो जाना।
- 50:46इसलिए मैं सदा कहता हूँ कि सांसारिक कोण, जो विकारों और
- 50:55विचारों का गुलाम हो गया, वह संसार संत कोण जो विकारों और
- 51:03विचारों का मालिक हो गया। वह काम लेगा उनसे विकारों से भी
- 51:08विचारों से भी विकार और विचार उसके हुक्म से नाचते हैं।
- 51:19वो शांत और तुम जो गृहस्थ। भिखारू और विचारों के नचाये से
- 51:29नाचते हो उनके इशारों पे नाचते हो तो गृहस्थ हो संत और गृहस्थ में
- 51:36ये फर्क है भिखार और विचारों को जो नचाए वो संत।
- 51:42विकार और विचारों की हाथों की कठपुतली बन जाए।
- 51:46वहग्रस्त मांस में जो कुछ आया, वह तुम्हें फल नहीं देगा, वह तो
- 51:57आएगा। लेकिन तुम साक्षी तम में ठहरे
- 52:02रहना, तुम उसे क्रिया में तिब्बदली मत करना, तुम कर्म मत
- 52:08बनने देना, उसे तुम ठहरे रहना अपने में शांत स्थिर।
- 52:19तो कभी भी मनुष्य के विचार या विकार कर्म में तब्दील नहीं होंगे
- 52:29और कर्मों का ही फल मिलता है, विचारों का नहीं, विचारों का
- 52:35नहीं। अभ्यासीन।
- 52:39तू कौन ते वैरागेन चैग है ते अभ्यास और वैरागिसे यानी कि तू
- 52:48ठहर जा ठहरने का अभ्यास कर 1 दिन जीत तेरी होगी घबरा मत।
- 52:58मनुष में आई हुई बातें उनका कोई फल नहीं मिलता।
- 53:03तुम्हें घबराओ मत उन्हें आने दो, वो आई हैं निकलने के लिए,
- 53:09कैथोर्सेस के लिए उन्हें अपना काम करने दो कैथोर्सेस होने दो।
- 53:16और तुम देखोगे नीलजरा हो गई तुम मुक्त हो गए मुक्ति का सरल और
- 53:22सीधा साधन। श्री कृष्ण गोविंद हरे।
- 53:35मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण।
- 53:55हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव पितुमात।
- 54:11स्वामी। सखा हमारे पितुमात, स्वामी सखा
- 54:24हमारे हेनाथनारा। यन वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे
- 54:40मुरारी हे न हाथ नारायण। वासुदेव वा यारण दी सन सथर चांगी
- 55:03यारण दी। सन।
- 55:08सथर उ चंगी फट केले आ दे रैना, रैना।
- 55:29मित्र प्यार नु मित्र प्यार नु हाल।
- 55:46मुरीदांदे कणना मित्र प्यार नू श्री कृष्ण गोबिंद हरे।
- 56:06मोरारी हे नाथ नारायण वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद आरे, मोरारी हे
- 56:19नाथ नारायण वासुदेव। पितुमात स्वामी सखा हमार पितुमात
- 56:42स्वामी। सगा?
- 56:45हमारे हेनाथ नारायण वासुदेव, हेनाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण
- 57:01गोविंद। अरे मुरारी हे नाथू नारायण
- 57:10वासुदेव व। धन बता।