Latest / Baba ji Vijay Vats / 16 Apr 26 - प्राण क्या है? प्राण, प्राण वायु और चेतना: परमात्मा होने की यात्रा!! Must Watch
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- 0:14प्राण क्या है? बाबा विट्ठल, भाई बेन और एमडी
- 0:26भास्कर प्राण जिनके निकलने के बाद।
- 0:39हम कहते हैं कि प्राण पखेरु हो गए, प्राण उड़ गए, वह प्राण हैं
- 0:49क्या? प्राण उपनिषद में प्राणों को सब
- 1:11का स्वामी कहा गया है। यानी मान और इंद्रियों से भी ऊपर।
- 1:29लेकिन आज तक प्राण की परिभाषा तुम्हें सीधी सीधी किसी ने बताई।
- 1:40कोई इसे वायु के रूप में रहता है। प्राण वायु उसके अंग बताता है।
- 1:50प्राण अपान समान उद्यान व्याण यह शरीर के अलग अलग हिस्सों में
- 2:00विद्यमान होती है। लेकिन देखिये मैं ना तो उपनिषद का
- 2:15ज्ञान बांटता हूँ, ना गीता का, ना ही किसी धर्म शास्त्र का।
- 2:26मैं अपना अनुभव बताता हूँ, जो मेरे अनुभव में आया है उसके सेवा
- 2:35में कुछ नहीं बताता आपको याद होगा।
- 2:50मैंने शुरुआत में कहा था कि आत्मा की यात्रा जड़ से परमात्मक होने
- 3:04की है। शून्य से 100 डिग्री तक का
- 3:14कैन्सेस्नेस। यह पत्थर से शुरू होता है और
- 3:25परमात्मा के सुपरकॉन्शसनेस में समाप्त होता है।
- 3:35साथ में ये भी कहा था कि जड़ से परम चेतन बनने तक की यात्रा में
- 3:53हमारे साथ दे ही बनता जाता है। जब पत्थर से शुरू हुई यात्रा तो
- 4:09धीरे धीरे देही का निर्माण होगा। देही का सूक्ष्म अर्थ अगर हम
- 4:17लेंगे तो वो ये है। कि पत्थर भी कहीं ना कहीं ये
- 4:24सोचता है कि मैं करता हूँ, वृक्ष भी सोचता है, पाँचों पदार्थ भी
- 4:34सोचते हैं और सारे। यूनीसेल्युलर मल्टीसेल्युलर पशु
- 4:53और सर मनुष्य। पत्थर से चलती है देह की यात्रा
- 5:07और उसके साथ मैंने आपसे कहा कि एक छोटा सा चेतन बिंदु चलता है चेतना
- 5:16का बिंदु। उसके साथ चलता है।
- 5:20असल में यात्रा देही की नहीं है, असल में यात्रा चेतना के उस छोटे
- 5:31से महीन अंश की है। जिसमें परिपूर्णता को प्राप्त
- 5:38करना होता है सारी यात्राएं शून्य से परिपूर्णता तक की यात्रा है,
- 5:48कान्शस्नस की जड़ पत्थर में। यह नेगलिजबल होता है और परमात्मा
- 6:02में यह 100% होता है। जो लगातार मुझे सुनते हैं, उन्हें
- 6:14यह बात समझ आ गई होगी। सारी 84,00,000 योनियों की
- 6:28परिक्रमा सच में प्राण की परिक्रमा है।
- 6:37उस चेतना का नाम जो पहले पहले पत्थर से चली, उसका नाम प्राण है
- 6:50बोही प्राण। जब देह में आता है, वहाँ से देही
- 7:00का निर्माण होना शुरू होता है। पत्थर में आया तो उसने समझा कि
- 7:10मैं पत्थर मिला, वृक्ष में आया तो उसने समझा कि मैं वृक्ष।
- 7:20पंच महाभूतों में आया तो उसने कहा कि मैं पंच महभूत हूँ, इसमें
- 7:27थोड़ीथोड़ी चेतना होती है, इसलिए तुम्हें अक्सर ये शब्द सुनने को
- 7:34मिलेगा। वे पानी में भी सवर्ण शक्ति होती
- 7:38हैं। चेतना के बिना सवर्ण शक्ति नहीं
- 7:41होती। मतलब पानी भी चेतन है चाहे नगली
- 7:50से भले ही क्यों न हो। शुरू शुरू से यात्रा मैंने
- 7:59प्रारंभ की पत्थर से आगे चला पेड़ बना फिर आगे की यात्रा।
- 8:14और जीस, जीस के साथ उसने आइडेंटिफिकेशन किया।
- 8:20उसने खुद को वही मान लिया। पत्थर था तो पत्थर मान लिया।
- 8:26पेड़ था तो पेड़ मान लिया। पानी था तो पानी हवा तो हवा।
- 8:34माटी तो माटी आकाश तो आकाश अग्नि तो अग्नि यह मैं भाव ही दे ही
- 8:44कहलाता है, बहुत सूक्ष्म बात है, आराम से सुनिएगा।
- 9:00समझ ना आए तो रिपीट रिवाइंड करके सुन 1 दिन शुरू हुई थी।
- 9:15यात्रा प्राणों के थोड़ा सा प्राण पत्थर में भी होता है।
- 9:32और वो यात्रा बढ़ती गई पंचमहाभूतों में से पेड़ो में फिर
- 9:42अमीबा यूनीसेल्युलर मल्टीसेल्युलर दो पाया, चार पाया।
- 9:49पशुओं के भीतर से गुजरते हुए मानव का श्रेय धारण किया।
- 10:01यह परमात्मा की एक लीला है क्योंकि अगर परमात्मा ये सब कुछ न
- 10:11बनाता। तो क्या यह प्रोसेसिंग हो पाती
- 10:18नहीं? इसलिए बाबा नानक ने कहा कर्मी आवय
- 10:24कपड़ा है, उसकी कृपा से ही तुम्हें शरीर मिलता है, वह पत्थर
- 10:31का? वो पेड़ का हो ओह पंच महाभूत का
- 10:39हो वो दो पाया चार पाया और मानस रे का हो उसकी कृपा से ही मिलता
- 10:46है क्योंकि उसने बनाया। तो प्राण की यात्रा शुरू हुई है।
- 10:56कर्मी आवै कपड़ा नदरी मोख दवार उसकी कृपा से ही तुम मुक्त हो
- 11:08जाओगे। यह मुक्ति का सफर अब्रीविएशन के
- 11:24रूप में कहा जाए। सिम्बोलिकली कहा जाए तो इसका सीधा
- 11:36सा मतलब यह है यहाँ बंधा कुछ भी नहीं।
- 11:45सिर्फ यात्रा है पत्थर से परमात्मा तक की और उस यात्रा में
- 11:55तुम जीस भी शरीर में गए उसके साथ। एकात्म साथ बस वहीं एकात्म को साध
- 12:09लेना बंधन का कारण है, अन्यथा बंधन नाम की चीज़ कहीं कुछ भी
- 12:19नहीं है। विशाल विराट अस्तित्व कही कोई
- 12:29बंधन नहीं बंधन तुम खुद बनाते हो, मैं शरीर हूँ।
- 12:46यह सभी तुम्हें शरीर मिला, उसके साथ तुमने एकात्म साध लिया, वही
- 12:54तुम्हारे बंधन का कारण बन लेकिन। डेवलपमेंट होंगे, कॉन्शसनेस का
- 13:09उत्थान होगा और तुम धीरे धीरे अगले शरीरों में प्रवेश करते
- 13:18जाओगे? अपने आप को शरीर मान लेना प्राणी
- 13:31के द्वारा ही बंधन है और जीतने भी बंधन बने आज तक उन सब का।
- 13:53समूहिक नाम देही है पत्थर से शुरू की मनुष्य तक पहुँच इतनी देर में
- 14:13लाखों वर्ष। और इतनी देर में तुम्हारा दे ही
- 14:20बड़ा ग्राहक हो गया दे ही का मतलब सर्वतम रूप में मैं भाव होता है
- 14:30तुम्हारा मैं भाव बहुत बढ़ गया। इस समय भाव से छुटकारा ही निर्वाण
- 14:43कहलाता है। असल में यात्रा देही की नहीं है,
- 14:55देही तो बनता चला जाता है। प्राण की यात्रा के कारण प्राणों
- 15:07ने यात्रा की। जड़ से पत्थर से।
- 15:16और मानता चला गया कि मैं पत्थर हूँ, मैं पेड़ हूँ, मैं पानी हूँ,
- 15:23मैं अग्नि हूँ, मैं जीव हूँ दो पाया हूँ चार पाया हूँ या मनुष्य
- 15:34हूँ। ऐसे ही करते करते देही का निर्माण
- 15:41बैराट हो जाता है। अब मूल चीज़ समझ लेना।
- 15:53यह दे ही है, बंधन है, इल्यूज़न है और इस देही से छुटकारा पाना है
- 16:11मुक्ति निर्वाण लिबरेशन। शायद यह सारी प्रोसेसर आपको समझ आ
- 16:24गई होगी ना तो मैं वेद उपनिषित। केता या किसी संत की सुनी कही बात
- 16:43आपको नहीं कहते? मैं सिर्फ बोलने निकला हूँ उस
- 16:55विराट के हुक्म के कारण जो सारी गाथा मैंने सुनाई।
- 17:04और अपने अनुभव को बोलने निकला। इसलिए मैं कोई ज़ोर नहीं देता कि
- 17:15तुम मुझे सुनो मुझे शिष्य बनाने की कोई।
- 17:22अंकाक्षण मेरा काम सिर्फ जो मैंने अनुभव किया वह रिकॉर्ड कर के यहाँ
- 17:38पर रख जाना है आने वाली नस्लों को।
- 17:44जीसको भी आवश्यकता होगी। वह यहाँ से खंगाल ले और अपना
- 17:52मार्ग तय कर ले। उपनिषद में जीस चीज़ का जिक्र हुआ
- 18:03है। वह प्राण वायु है।
- 18:08मैं उस प्राण की बात नहीं कर रहा हूँ।
- 18:13जो प्रश्न तुमने पूछा प्राण क्या है?
- 18:17जो निकल जाता है आदमी मर जाता है जो प्राण इस शरीर में आ जाता है।
- 18:30तो व्यक्ति जीवत हो जाता है वह प्राण क्या है?
- 18:36उसी प्राण की बात में कर रहा हूँ इस वायु की बात नहीं कर रहा हूँ
- 18:43जीसको उपनिषद में। व्याख्यायित किया गया।
- 18:51प्राण, अपान, समान उद्यान, व्यायाम इसके पोषण बताए गए है।
- 19:01व्यायाम सारे शरीर में रहता है। जीस प्राण की बात आपने पूछी वह
- 19:22प्राण वेशिक तत्व है, जिसकी यात्रा प्रत्येक देह ही कर रहा
- 19:33है। प्राण जब प्राण को चेतना भी कह
- 19:41लो, आप चेतना परी पूर्णता के पास पहुँच गए।
- 19:53इस काल खंड में जो देही का निर्माण हुआ वह देही, धीरे धीरे
- 20:00गलता गलता शून्य हो जाता है। और बचता है वह प्राण का 100% वह
- 20:13कॉन्शसनेस चेतना का 100% जो पाथर से चला था और मनुष्य के बीच में
- 20:24आके संपूर्ण। यह एक यात्रा है।
- 20:32मनुष्य के बिना किसी शरीर में यह यात्रा पूर्ण नहीं होती इसलिए
- 20:40बड़े भाग मानस तन पाभा। मनुष्य के शरीर के इतने महत्त्व
- 20:49है। देवता भी तरसते है क्योंकि किसी
- 21:05भी शरीर में इस देही से छुटकारा नहीं पाया जा सकता।
- 21:17कारण क्योंकि प्रत्येक शरीर की बनावट मनुष्य जैसी नहीं इसलिए
- 21:35रामायण में आता है कि हनुमान जी वंतर से लिबरेट हो गए गलत।
- 21:46मनुष्य के अलावा कोई शरीर लिबरेशन के योग्य एक छोटा सा प्रश्न बीच
- 21:59में से भी ले ले। बाबा जी प्रणव आपने इतने सारे
- 22:07वीडियो बोले और सभी के प्रश्नों के उत्तर दिए।
- 22:14आपने ऐसी कोई भी दिशा नहीं छोड़ी जहाँ से व्यक्ति का मन।
- 22:20प्रश्न उठा सकता है। आप उस प्रश्नों का भी जवाब देते
- 22:28हैं जिसका जवाब आपने पहले ही दे दिया है और वह भी।
- 22:40आप एक ही बात को यदि दो या तीन या 1000 बार्बी को न बोलें।
- 22:50सब में एक नयापन का अहसास होता है।
- 22:55एक ही बात। लेकिन हवा नहीं होती है हर बार
- 23:05लेकिन आज के सोकैल्ड गुरस के पास हर प्रश्नों का मुरझाया हुआ जवाब
- 23:12होता है। मैंने मुरझाया हुआ इसीलिए बोला,
- 23:24क्योंकि इनके पास आखिरी ताकत इनकी पढ़ी हुई पुस्तकें ही होती हैं,
- 23:32भले वो गीता हो या उपनिश्चित लेकिन वो इनके जीवन का अनुभव नहीं
- 23:38होता। और अपनी बात को सिद्ध करने के लिए
- 23:44ये लोग इन्हीं पुस्तकों का सहारा ले लें।
- 23:52जो लिखा गया है उन महापुरुषों के द्वारा।
- 23:57जिन्होंने कभी देखा होगा आधे से ज्यादा भारत राधे राधे कर रहा है।
- 24:12आचार्य पर शांत बचे हुए लोगों को भड़का रहा है।
- 24:22आचार्य प्रश्न उपनिषद और गीता का वेख्यान पढ़ रहे हैं, ऐसे में
- 24:29वैसे लोग क्या करें जो न राधा राधा करते हैं?
- 24:35और न ही ऐसे व्यक्ति को फॉलो करते हैं जो गीता, उपनिषद, अष्टावक्र
- 24:42गीता जैसी किताबों का शाब्दी का अर्थ करके व्याख्यान करके हमें
- 24:52बताते हैं। तो बताइए ऐसा व्यक्ति क्या करे?
- 25:06तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। बुत्रा श्रेयांज।
- 25:21प्रेवानंद के पास एक ही जवाब है कारण कारण वह बुद्धू है।
- 25:30अपने भीतर ज्ञान है, मन के वो महिम तल।
- 25:39जिनको पार करके पल पल पल पल हमने अनुभव एकत्र करना था वो इनके बस
- 25:52के बाहर की बात है। इनका कोई भी अनुभव भीतर जाकर उस
- 26:08तल से नहीं आता। जीस तल से बोले थे कृष्ण
- 26:14अष्टावक्र। या संत?
- 26:23यहाँ से कबीर बोले जहाँ से नानक बोले तो इनके पास दो अल्फाज़ हैं।
- 26:34टूटी फूटी कहानियों होंगी। ठाकुर जी ने नामदेव की माता को
- 26:41गर्भवती कर दिया, यह बात शर्मनाक नहीं है।
- 26:44क्या तुम्हारे भगवान ऐसे होते हैं क्या अगर तुम्हारे भगवान ऐसे होते
- 26:55हैं तो तुम कैसे हो क्या? ठाकुर जी ने नामदेव की माता को
- 27:06गर्भवती कर दिया जिससे कि नामदेव का जन्म हुआ।
- 27:16ये कहते हुए कोई लज्जा नहीं आते कि हम कितना बड़ा पाप कमा रहे
- 27:21हैं। क्योंकि उस तर्क पर जाने के लिए
- 27:31तो क्षमा के परवाने की तरह जलना होता है।
- 27:34भस्मी भूत होना होता है, राख और हाथ बुझाना होता है।
- 27:44इतनी जरूरत इनमें है अन्यथा इतनी जुर्रत ये भी कर लें तो ये भी
- 27:51पहुँच जाए तो फिर कहेंगे आंधी रात कर।
- 28:00तो फिर गधे गधे करने में क्या इतराज़ है?
- 28:05यही झगड़ा है। मुसलमान कहते हैं, अल्लाह हुआ कोई
- 28:13हर हर महादेव का। कोई राम राम, कोई राधे, राधे जो
- 28:22जिसके मन में आता है वह किए जाता है।
- 28:26मतलब साफ है अपने भीतर नहीं गाया। उस आनंद को पिया नहीं है, उस रस
- 28:38के प्यारे को पिया नहीं है। स्वयं का भी गंवा दिया।
- 28:43अब दूसरों को भी गलत मार्गदर्शन देकर इनके जीवनों को भी बिगाड़
- 28:48देंगे और ये आज की बोली हुई बातें।
- 28:53अनेक जन्मों में इनका पीछा नहीं छोड़ेंगे, ये संस्कार बन जाएंगे
- 29:01ये कहेंगे 5 मिनट के लिए राधे राधे कर मैं कहता हूँ 5 मिनट के
- 29:09लिए मौन हो जाओ। राधे राधे करके ताली बजाने में
- 29:16कोई फायदा नहीं एनर्जीलेसनेस होती है।
- 29:20पांच राम जपने में एनर्जीलेसनेस होते तुम थक जाते हो और 5 मिनट।
- 29:30अगर तुम्हारे पास हैं फुर्सत के लम्हे तो 5 मिनट के लिए मौन हो जा
- 29:43और इते मौन हो जा कि 1 दिन तुम पांच 5 मिनट करके।
- 29:52उस गहरे मौन के अंत स्थल में जब विराजमान हो जीसको कृष्ण कहते हैं
- 29:59स्तुति प्रज्ञा तुम वहाँ अचल होकर बैठ जाओ, आनंद के समुद्र में गोते
- 30:10लगाओ। नुकसान किसका हुआ?
- 30:17पहले खुद का गंवाया फिर जीसको प्रचारित किया उसको गंवाया।
- 30:28मुझे कल ही एक देवी का मैसेज आ गया।
- 30:33आपकी ही तरह एक बाबा जी बोलते हैं सेम क्या मैं उनको सुन लिया करूँ?
- 30:46मैंने कोई जवाब नहीं दिया। इसका मतलब सा है कि तुमने मेरी
- 31:00बताई हुई क्रियाएं को 100% निभाया है।
- 31:08अन्यथा तुम पहुँच गई होती आज ये शब्द तुम्हारे लगों पे ना अब तो
- 31:19घबरा के ये कहते हो कि मर जाएंगे अब तो घबरा के ये कहते हो कि मर
- 31:28जाएंगे घर मर के भी चैन न। तो किधर जाओगे अगर उस बाबा को भी
- 31:39सुन के तुमने नहीं पाया, जो कि नहीं पाओगे पाओगी?
- 31:46उसी दिन जीस दिन 100%। यू विल इन्सर्ट यू योरसेल्फ
- 31:55कंप्लीट्ली जब तुम 100% उस विधि में डूब जाओगे।
- 32:17कर्ता समाप्त हो जायेगा। दृष्टा समाप्त हो जायेगा, दर्शन
- 32:27समाप्त हो जायेगा। मात्र दृश्य ही बजेगा।
- 32:37कर्ता समाप्त हो जाएगा, दृष्टता समाप्त हो जाएगा, कर्म ही बचेगा
- 32:46तुम नाच रहे हो नाचते रह जाओगे के मैंने आपको अत्यंतिक प्रणम बताया
- 32:58है। करता खो जाए कर्म ही बचे न करने
- 33:07वाला बचे न देखने वाला बचे कर्म बच जाए।
- 33:17वहाँ से लगती है छलांग तो यह यात्रा पत्थर से चली,
- 33:38परमात्मा की परिपूर्णता तक 100%। चेतना का विस्तार हुआ और 100% की
- 33:51चेतना का विस्तार ही तुम्हारा लक्ष्य है।
- 34:00प्राण का लक्ष्य चेतना का लक्ष्य। 100% चेतन होना है तो मानव जाम
- 34:12में आकर यह सुविधा है और किसी जन्म में नहीं।
- 34:24तोता राम राम कर सकता है, तोता राधे, राधे भी कर सकता है।
- 34:30ऐसे ही तुम कर रहा हो कभी तोते में बदलाव होगा तुम्हें भी नहीं
- 34:37होगा। क्योंकि तोते की भाँति तुम रटे
- 34:45चले जाते हो, ताजियाँ मारे जाते हो, भीतर कोई रस नहीं है, भीतर
- 34:53कोई आनंद की महक नहीं है। बस किसी मूर्ख व्यक्ति ने कह दिया
- 35:01और तुमने राधे राधे करना, पांच ना करना, राम राम करना शुरू कर दिया,
- 35:08ना वो पहुंचे हैं ना तुम पहुँचो। लोभी गुरु लालची केला दोनों नरक
- 35:19में ठेलम ठेला गुरु के भीतर भी लोप है।
- 35:29डायलसिस करवाना है मरे मरे फिर रहित हरिद्वार के किनार।
- 35:39आस पास जो सेवक है उनका भी परिफोषण करना है क्योंकि
- 35:45बेरोजगारी घनी है तो इनको भी रोज़ी रोटी चाहिए।
- 35:55ध्यान रखना मेरे पास जितना भी स्टाफ है, सब अपना अपना काम करता
- 36:01है और मज़े की बात बताऊँ मेरा पुत्र भी स्वयं।
- 36:14गत्ते का भार ढोंके मिठाई के डिब्बे बेच के आता है।
- 36:23उस हलाल के पैसे से हम अपना गुजर बसर करते हैं जो आप दे देते हो।
- 36:32यह जो तुम खड़े हुए मंजिल देखते हो, इससे ये बन जाता है आपकी
- 36:38सुविधा के लिए आपके बैठने के लिए हमने कुछ साथ नहीं ले के जाना हम
- 36:49जो खाते हैं। जो भी कुछ खाते हैं कल ही फ़्रेंच
- 36:57से एक आदमी आता है उसको रोहित ने कहा बाबा 14 सालों से।
- 37:10कमरे से बाहर नहीं निकले और 14 वर्षों से तीन बार चाय पीते हैं
- 37:21सर वो कहता है भोजन नहीं खाते हैं, कोई पिज़्ज़ा बर्गर।
- 37:31कोई चाउमन चुग्गा, कोई गुलाब जामुन, रसगुल्ला, कोई आइसक्रीम
- 37:40नहीं, कोई रोटी वगैरह नहीं वो व्यक्ति करता इम्पोसिबल।
- 37:52हौ इट कैन बी पॉसिबल? मुझे भी डॉक्टर कहते थे कि आप 1
- 38:06साल 2 साल ज्यादा से ज्यादा 3 साल से ज्यादा नहीं कटोगे और इस 24।
- 38:1725 मई को 2026 को पूरे 14 वर्ष हो जाएंगे।
- 38:32मेरे पारिवारिक सदस्य भी परेशान है, लेकिन अब परेशानी छोड़ दी है।
- 38:41क्योंकि मैं मानता नहीं और जिंदा भी उनको फिकर थी मेरे जिंदा रहने
- 38:49देंगे, वो मैं हूँ तब उन्होंने कहना छोड़ दिया, फिकर करना भी
- 38:56छोड़ दिया। उनके बात समझ में आ गई कि जो सारी
- 39:05सृष्टि को चला रहा है इतने भारी भारी सूर्य चाँद तारेग्रह नक्षत्र
- 39:14ब्रम्हंड आकाश गंगाएं। उल्का पिंडा सबको चला रहा है, वो
- 39:25भी मुझको भी चला रहा है और तुम्हें यही भर्ती है।
- 39:33इस सार की सृष्टि को चलाने वाला हमें नहीं चलाता।
- 39:39यही तुम्हारा मोड़ता है राधे राधे कहने से तुम्हें नहीं चलाएगा वो
- 39:49तुम उसको रिश्वत देना चाहते हो? उसको रिश्वत की कोई जरूरत नहीं।
- 39:58उसने इतना बना दिया है यू कैनट काउंट दैट?
- 40:05हम उसका मेजरमेंट भी नहीं कर सकते।
- 40:11वह कितना है? वह जब तक चलाता है और जीस दिन,
- 40:24तुम इस सत्य को परिपूर्ण है जैसे स्वीकार कर लोगे, उस दिन तुम अपने
- 40:38उस भीतरी तल पे पहुँच जाओगे। जहाँ तुम्हारी चेतना 100% है तो
- 40:53बात क्या है? विधि क्या है?
- 40:58ढांग क्या है? टु इन्सर्ट योरसेल्फ कंप्लीट।
- 41:09अपने आप को परिपूर्ण रूप से समर्पित करते स्थान चाहे कोई भी
- 41:18हो, हिमालय हो, वृक्ष हों, जंगल हों।
- 41:26घर हो, महल हो, कोई बात नहीं प्राण की यात्रा पहले दिन से शुरू
- 41:39होती है, पत्थर में थोड़ा सा प्राण होता है और वहाँ से
- 41:54एवोल्यूशन बढ़ती है। एवोल्यूशन होती है कॉन्शसनेस की
- 42:02चेतना की और जैसे जैसे चेतना बढ़ती है वैसे वैसे उसको चेतना के
- 42:12हिसाब से ही शरीर मिलता रहता है। पत्थर से पेड़ हुआ पंचभौतिक तत्व
- 42:21हुए अमीपा हुआ। मल्टी सेल्यूलर दो पाया, चार
- 42:34पाया। नभ चार जल, चार थल चार ये सब जीव
- 42:41जंतु हो, ऐसे ऐसे चेतना बढ़ती चली गई।
- 42:53आखिरी कुछ योनियम है। किनकी चेतना आदमी से पहले की
- 43:03चेतना है जैसे हाथ थी, घोड़ा गधा? ये जीव जंतु 100% कॉन्शसनेस पर
- 43:22पहुंचने के योग्य हो गए। ये कूद सकते हैं मानस चोले में?
- 43:37और परमात्मा का विधान लॉ ऑफ नेचर यह उन प्राणों को, उन चेतना, ये
- 43:51दोनों एक ही बातें सम्मिलनी मैं प्राण को हूँ।
- 43:55या मैं चेतना कहूं, एक ही बात है, प्राणों का बड़ी पूर्ण हो जाना या
- 44:05चेतना का बड़ी पूर्ण हो जाना एक ही बात है और जब चेतना 100%
- 44:16ऊंचाइयों को छूती है। तो प्राण भी 100% ऊँचाइयों को
- 44:21छूता है और फिर जब तलत तुम अपने आपको रिकॉग्नाइज़ नहीं करते, टू
- 44:39नो दाय सेल्फ हू एमआइ। तब तक राधे राधे कहो गधे गधे कहो
- 44:47तुम गालियां निकालो, तुम राम कम करो, तुम पांच नम करो, अगर
- 44:54तुम्हारे परी प्राण परिपूर्ण नहीं हुए।
- 45:00चेतना 100% विकसित नहीं हुई। तो कुछ भी कहे जाओ मात्र अल्फाज़
- 45:08हैं कुछ भी कहना तुम्हें कहीं नहीं हो जाता धरती की सब किताबें
- 45:22पढ़। ये बड़े बड़े शस्त्र पर ये तुममें
- 45:32रत्तीभर भी चेतना का विकास नहीं कर सकता, रत्तीभर भी, रत्तीभर भी।
- 45:46पर पर गड्ढे लगती है। ते पड़ पड़ हुए ख्वाब नानक लिखे
- 45:52एक गल ते, बाकी चकनाचार बस काम आएगा।
- 46:06तो चेतना का सुपरकॉन्सीस नस होना काम आएगा।
- 46:11रात रात कहने से चेतना पड़ती है, कोई भी अलफाज़ दोहराने से चेतना
- 46:21पड़ती नहीं तो उसमें थकावट आती है।
- 46:27एनर्जी लेस निस आती है। तुम्हें यह भ्रांतियां तुम्हारे
- 46:34इन मूर्ख गुरुओं ने डाली हैं जो भीतर जा न सके, क्योंकि भीतर जाने
- 46:41के लिए बहुत। वृहद कीमत चुकानी होती है।
- 46:46वो वृहद कीमत है स्वयं को जो अब तक माने हुआ था कि मैं शरीर हूँ
- 46:57उसको मिटा देना होती। है।
- 47:03नकल को मिटाओगे तो असल प्रकट हो जाएगा मिटाते अपनी हस्ती को तुम
- 47:11जो समझते हो अपने आपको तुम क्या समझते हो अपने आपको शरीर मन?
- 47:18विचार भावनाएँ यही तो समझते हो मिटा दे अपनी हस्ती को अगर कुछ
- 47:26मृद वाचा है कि दाना खाक में मिलकर गुले गुलजार होता है।
- 47:39इस ऐडेंटिफिकेशन को मिटा दी यह नकली है इट्स एन इल्ल्यूसन यह एक
- 47:48भ्रम है और सत्य में जान ले के तू है कौन?
- 48:00हू आर यू नो द सच? रमन के पास लोग पहुँच जाते।
- 48:14महाराज बताओ हम क्या करें? रमण कहते कुछ न करो, स्वयं को
- 48:23जानो और स्वयं को जानने से बंधन मुक्त हो जाओगे, क्योंकि कॉन्शस
- 48:30ने मनुष्य के जामि में आकर। 100% हो जाती है।
- 48:35प्राण 100% हो जाती है। यह है प्राणों की व्याख्या जो
- 48:50प्राणों की पांच व्याख्याएं की गईं, वो वायु है।
- 48:58उपनिषदों में वायु की व्याख्या है, प्राण की व्याख्या नहीं है
- 49:04प्राण ये सब वायु हैं अपान समान उद्यान व्यान।
- 49:16पांच प्रकार की वायु हमारे शरीर को और मन को और इंद्रियों को
- 49:22संचालित करती है। यह उपनिषद का कथन है, लेकिन शरीर
- 49:32के लिए सही है। चेतना के लिए और अध्यात्म चेतना
- 49:43का विषय है शरीर का। तुम अध्यात्म की व्याख्या करते
- 49:59करते शरीर को बीच में से घसीट लेते हो और पता भी नहीं चलता।
- 50:04शरीर का बीच में आ गया। मेरे पास सोच नए नए फॉलोवर आ जाता
- 50:20है। अभी अभी आये थे मेरा कोई प्रवचन
- 50:25सुन के उससे कोई प्रश्न उठा। और प्रश्न व्हाट्सएप पे सीधे ही
- 50:37मेरे पेज पे आ जाते हैं और कहते हैं बाबा जल्दी से जवाब दो मैं
- 50:45उनको ब्लॉक कर देती हूँ उसी प्रश्न का जवाब।
- 50:51मैंने सैकड़ों बार बोला है और इनकी इतनी जुर्रत नहीं हुई कि
- 51:02मेरी पिछली सारी वीडियो उसको सुन लें, फिर कोई प्रश्न बाकी नहीं
- 51:07रहेगा। मैं तो प्रश्न खुद ढूंढता हूँ
- 51:11रोज़ लाओ प्रश्न लेकिन अब कोई प्रश्न है ही नहीं, यही मुश्कलात
- 51:24है जीस व्यक्ति ने कोई प्रश्न पूछना है।
- 51:34वह अपनी जिंदगी की उलझनों से प्रश्न जो निकला है वह पूछे जो
- 51:44खोपड़ी की खुजलाहट से प्रश्न आया उसको पूछने का कोई फायदा नहीं?
- 51:54अब अंतिम बात वह प्राण चेतना का छोटा सा अंश।
- 52:06जो पाथर की चेतना के साथ साथ चला था और यह सारा सफर उस चेतना का
- 52:15परिपूर्ण होने का था और इस परिपूर्ण होने के रास्ते में देही
- 52:22का निर्माण होता चला गया। मनुष्य जीवन में आके दे ही इतना
- 52:31व्रत हो जाता है कि यह एक मुसीबत हो जाता है।
- 52:39इसलिए मैं तुम्हें कहता हूँ मान्यताओं को तोड़ता हूँ।
- 52:46मान्यताओं को मिटा दो गिरा दो मान्यताएँ झूठी हैं और जब ये घर
- 52:57जाएंगे। तो बिल्कुल ऐसा है कि तुमने हीरे
- 53:05के ऊपर गोबर का पहाड़ खड़ा कर दिया है, मैं तुम्हें कहता हूँ कि
- 53:16इस गोबर के पहाड़ को घन मार मार के घर।
- 53:24और पाओगे के उस गोबर के पहाड़ के नीचे चमचमाता हुआ हीरा पड़ा है।
- 53:45उसी हीरे की तलाश थी, लेकिन यह गोबर का आवरण उस हीरे की चमक को
- 53:55बाहर नहीं आने देता, यही मुसीबत है।
- 54:05गर्भ में जब स्पर्म और अंडाणु मिलते हैं माता के गर्भ में तो यह
- 54:14चेतना या प्राण उसमें प्रतिष्ठित होता है।
- 54:22प्रतिष्ठित होते ही प्रथम क्षण में जीवन शुरू हो जाता है और दे
- 54:37ही अपनी देख रेख में अपने किए गए कर्मों के मुताबिक।
- 54:44उस शरीर का निर्माण अगरब के भीतर करवाता है।
- 54:47यह बड़ी सूक्ष्म प्रक्रिया है इसलिये तो बहुत से लोग सवस्थ
- 54:54मिलेंगे। तुम्हें जन्मजात अगर पिछले जन्मों
- 55:01का कोई कर्मभोग वाकी नहीं है। तो इस जनम में बच्चे पोलियोग्रस्त
- 55:07अपंग क्यों होते हैं, मंदबुद्धि क्यों होते हैं?
- 55:14बेकार को लेकर क्यों पैदा होते हैं?
- 55:19तो वह देही गर्भ में आकर? क्योंकि देही के साथ प्राण भी आते
- 55:27हैं समझ लेना। प्राण की यात्रा जब पत्थर से शुरू
- 55:33हुई तो देही का निर्माण होता चला गया।
- 55:37देही विराट हो गया और मानव जनम में आकर।
- 55:43प्राण अभी व्रत हो गए हैं, ये बिलकुल ऐसे हैं जैसे हीरे के ऊपर
- 55:55गोबर का पहाड़ पड़ा। एक तरफ देही अपने डेवलप्ड स्टेज
- 56:06में और एक तरफ वह प्राण का वो हिस्सा, वह भी करीब करीब 6070%।
- 56:20दो काम करने हैं इस गोबर के ढेर को गिरा देना है इसके नीचे
- 56:36तुम्हें छुपा हुआ हीरा मिलेगा। जीस हीरे के ऊपर तहे जमनी शुरू हो
- 56:44गई थी। गोबर की और इस हीरे को शुद्ध गंगा
- 56:55जल से धोकर पवित्र करके। रखना होगा।
- 57:03बीज़ी 100% कान्शस्नस बड़ी आनंददायक ग्लोरियस आनंद की बरसात
- 57:21करती हुई रोशनाई से युक्त लावण्य से युक्त जब प्राण परिपूर्ण हो
- 57:37जाते हैं तो फिर जीस शरीर के भीतर।
- 57:45यह प्राण अवस्थित है जब वह छोड़ना चाहे या जब यह शरीर टूट जाए तो वह
- 58:01प्राण रूपी हीरा 1000 से निकल जाता है।
- 58:12वह चाहे तो किसी और द्वार से भी निकल सकता है।
- 58:16नाक, आँख, कान, मुँह इन द्वारों से भी निकल सकता है।
- 58:28उसकी सभी बंदिशें टूट गई। मुझे लोग पूछ लेते हैं कि परम
- 58:37तत्व तक पहुंचा व्यक्ति जब मरता है तो कबाल से निकलता है नहीं।
- 58:45जरूरी नहीं है। फिर तो ये भी एक बंधन हो गया।
- 58:52वह बंधन मुक्त हुआ एक घर के किसी भी दरवाजे से निकल सकता है, वो
- 58:58बाहर ही तो जाना है उसे। और वह चेतना का 100% हिस्सा जो हो
- 59:09गया है विकसित जो हो गया है वह चेतना के समुद्र में एकाकार हो
- 59:18जाता है बूंद सामान्य। यह प्राण की परिपूर्णता हुई है।
- 59:33अक्सर लोग उपनिषद के इसी भ्रम में रहते हैं कि यह पांच वायु।
- 59:41ही प्राण है नहीं, प्राण तो आधार है।
- 59:48जब यह प्राण बाहर निकल गया तो तुम्हारी वायु तो फिर भी रहेंगी।
- 59:55यह पांच वायु फिर भी रहेंगे। लेकिन मुख्य जीवन का आधार प्राण
- 1:00:05चेतना बाहर चली गई। हम अक्सर ये अल्फाज़ प्रयोग करते
- 1:00:11हैं लेकिन इसके अर्थ नहीं जानते कि उसके प्राण पखेरु उड़ गए।
- 1:00:26उसके प्राण निकल गए। ये कौन से प्राण निकल गए?
- 1:00:33प्राण वायु निकल गई। उद्यान व्यान अपान समान कौन सी
- 1:00:38वायु निकल गई नहीं समझना। एक प्राण वायु भी है, वह प्राण
- 1:00:51वायु हम नाक से लेते हैं, वह फेफड़ों में जाती है के बीच में
- 1:00:57सोक और वह हीमोग्लोबिन से। रक्त को शुद्ध करके सारे शरीर में
- 1:01:08संचारित होती है। वह प्राण वायु अलग है, वह प्राण
- 1:01:13वायु ऑक्सीजन होती है। प्रश्न पूछा है।
- 1:01:23विट्ठल भाई वेन ने और एमडी भास्कर ने कि प्राण क्या है तो प्राण और
- 1:01:36प्राण वायु यकसानी। बहुत विशाल अंतर है प्राण वायु
- 1:01:49वायु है, जो हम नाच से लेते हैं, फेफड़ों में खून को शुद्ध करती
- 1:01:55है। कार्बन डाइऑक्साइड को एडजिल करते
- 1:01:59हैं, ऑक्सीजन को इन्हेल करते हैं लेकिन अगर वह प्राण ना हो जो जीवन
- 1:02:13के शुरुआत में। माता के घर में प्रविष्ट हुआ था।
- 1:02:17दे ही को साथ लेकर शब्द बड़े बारीक हैं।
- 1:02:21आराम से सुन वह प्राण अलग है जो जीवन के प्रारंभ में माता के घर
- 1:02:33में। दे ही को साथ लेकर उस छोटे से
- 1:02:44शरीर में उतर गया था। वह प्राण अलग है।
- 1:02:50उसी को परिपूर्ण होना है, याने मुक्त होना है।
- 1:02:57उस प्राण के ऊपर दे ही रूपी गोबर की बर्तें हैं जो तुमने इतने
- 1:03:04जन्मों से अपने ऊपर चढ़ा ली। इन गोबर की बर्तों को गिराना होगा
- 1:03:11राज्य राज्य कहने से ये गिरती नहीं, पांच नाम जपने से ये गिरती
- 1:03:16नहीं किसी भी नाम का जप करने से ये गिरती नहीं नाम जप इन्हें
- 1:03:25कराता नहीं। ये भ्रांति है।
- 1:03:31यह तो तोड़ना होता है, इसलिए मैंने तुम्हें कहा पहले मैं थोड़ी
- 1:03:37मरूंगा, फिर मैं सुनार का हथौड़ी को छोड़कर लोहार का हथौड़ा
- 1:03:44मारूंगा। और फिर मैं गाणा मारूंगा लोहा
- 1:03:51जिससे लोहा तोड़ा जाता है, गाडर तोड़ा जाता है।
- 1:03:59तुम्हारी इन नकली नकली धारणाओं को, मान्यताओं को, विश्वासों को
- 1:04:06मैंने तोड़ना है। और जैसे ही मैं तुम्हारी
- 1:04:16मान्यताओं को विश्वास को तोड़ दूंगा और सारा गोबर का बाहर गिर
- 1:04:25जाएगा तो तुम स्वयं ही देख लोगे। उसके नीचे चम चमकता हुआ।
- 1:04:32ग्लोरिया से हीरा डायमंड छिपा हुआ है, यह सारी प्राण की यात्रा
- 1:04:42चेतना की कहलों प्राण की कहलों होता सब उसकी कृपा से।
- 1:04:56द्वार दया का जब तू खोल द्वार दया का जब तू खोल पंचमसुर में गूंगा
- 1:05:15बोल। अंधा देखे लंगड़ा चल कर अंधा देखे
- 1:05:29लंगड़ा चल कर। सिरे दर्शन दो घन शामनाथ मौरी
- 1:05:47अँखियाँ प्यार सीरे। मन मंदिर में ज्योत जला दे, घट घट
- 1:06:01व सिर दर्शन दो कनशाम ना?