Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 Mar 26 - कर्मों का सूक्ष्म विज्ञान!! पतंजलि के योग सूत्र "चित्त वृत्ति निरोध" की व्याख्या
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- 0:22बाबा जी पढ़ो कुलदीप सिंह, पटियाला शास्त्र का एक वचन है।
- 0:46चार वेग छः शास्त्र में बात मिलत है, दो है दुख दीन दुख होत है सुख
- 0:58दीन सुख। बाबा जी, मेरी बात को अन्यथा मत
- 1:12लेना आप सुबह से शाम तक। कितना लोगों के मन को दुखाते हो?
- 1:28कोई धर्म तुम्हें स्वीकृत नहीं है, कोई राजनीति तुम्हें स्वीकृत
- 1:35नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति का उपहार उड़ाते
- 1:42हो, अपने आचरण से इन शब्दों को सरलीकृत करके व्याख्यात करने का
- 1:56कष्ट करें कुलदीप। लाजवाब प्रश्न है, कर्मों की
- 2:15श्रृंखला के मूल से उत्पन्न हुआ प्रश्न है और कर्मों का मूल यही
- 2:24है। दुख देने दुख होते सुख देने सुख
- 2:34आय पुत्र तुमने कहा बड़े, सरलीकृत ढंग से कर्मों का ये आंत्रिक
- 2:46जंजाल। इसकी गुत्थियों को खोलने की कृपा
- 2:56करो लो किसी व्यक्ति को कैंसराइटिस हो जाता है।
- 3:10दर्द से चीखता है, चिल्लाता है, रोता है, इतनी विस्फोटक तरह से
- 3:23रोता है कि देखने वालों से देखा नहीं जाता, इस तरह से तड़पता है।
- 3:35कि देखने वाले आँखें बंद कर लेते हैं, उसकी चित्रकारों को सुनना
- 3:45नहीं चाहते, कान बंद कर लेते हैं, दूर चले जाते हैं
- 3:59तो किसी हॉस्पिटल का डॉक्टर, सर्जन।
- 4:05जीस भाग में कैंसर है उसको अगर काटेगा और उस कैंसर हुए।
- 4:22क्षेत्र को बाहर निकाल देगा, उस रोग के बुनियादी तत्वों को बाहर
- 4:32निकाल देगा। उसने सारे औजार चुराए।
- 4:41दर्द दिया, तकलीफ हुई लेकिन एनेस्थीसिया दे दिया पुत्र ज़रा
- 4:54सोच के बताना डॉक्टर मरीज को काटता है, पीटता है।
- 5:03कितना दर्द होता है? घाव भरते भरते महीनों लग जाते
- 5:08हैं, लेकिन वह व्यक्ति अपने दर्द से छुटकारा पा लेता है।
- 5:25ज़रा सोच ले और बताइए आपुत्र? डॉक्टर ने दिया तो दुख, लेकिन
- 5:38मरीज का भला हुआ कि बुरा हुआ। मरीज का भला उसका रोग बाहर निकाल
- 5:56के फेंक दिया। डॉक्टर ने कैंसर का वो तत्व बाहर
- 6:01निकाल दिया। वह जितना जिएगा, दर्द विहीन
- 6:08जिंदगी जिएगा। लेकिन डॉक्टर ने तो छोरी मारी थी
- 6:16सीजर चलाई थी, सारे हथियार प्रयोग कर रहे थे, डॉक्टर ने कर दिया था
- 6:27परिणाम क्या आया? अब इसको आप अंडरलाइन कर दो।
- 6:34परिणाम क्या आया इस बात पर निर्भर करता है कि डॉक्टर ने पूर्ण किया
- 6:46या। परिणाम आया कि तुम तुम्हारे रोग
- 6:52से भक्त हो गए। वह रोग जुमे पल पल चढ़ पाता था,
- 6:58तो सर्जरी के बाद वह रोग का। सब आया होगा, अंत होगा चार वेद
- 7:11शेष शास्त्र में बात मिलतः है दो, यह कर्मों की बेसिक का फिलसफी है।
- 7:23दुख दोगे, दुख होगा, सुख दोगे, सुख होगा लेकिन परिणाम डॉक्टर ने
- 7:37किस मंथो से उसका ऑपरेट किया? बस यही कर्म है।
- 7:48कर्म क्या हुआ यह नहीं कर्म का परिणाम क्या हुआ यह मायने रखता
- 7:59है। इसलिए कृष्ण ने कहा
- 8:03कर्मण्येवाधिकार हस्ते महफलेश्वर का?
- 8:10हे पार्थ तू सिर्फ कर्म कर ये मत देख कि मेरे गुरु की छाती भीध
- 8:16जाएगी, उन्हीं तीरों को चलाने का ढंग बसाया गुरु ने?
- 8:28उस नन्हे से पोते को गोदी में बैठा के खिलाया बुर्की बुर्की
- 8:32टुकड़े टुकड़े और उसी की छाती बिंदो कृष्ण कहते हैं माँ फले सू
- 8:42कदाच तू इस बात की फिक्र मत कर। हे पार्थ तू सिर्फ मान चला?
- 8:55निश्चित ही यह पहला प्रश्न भी है परमात्मा की सब विशाल विराट
- 9:02सृष्टी में यह पहला प्रश्न भी है और आखिरी प्रश्न।
- 9:16कर्म कैसे नियत से हो इसका फल मिलेगा।
- 9:29मैं बोलता हूँ मैं चुप भी रह सकता था।
- 9:35मेरे पास है, मुझे बोलने की बिमारी भी है और अगर बिमारी भी हो
- 9:42तो चारों तरफ दीवारें हैं, मैं इनसे बतिया लूँगा।
- 9:50दरवाजा सीधा बंद रहता है। मैं जो बकवास करनी है इनके सामने
- 9:58कर लूँगा। तुम तो गाली भी निकालते हो तो
- 10:03व्यक्ति के मौके के ऊपर निकालते हो।
- 10:11मैंने अगर गाली भी निकालना हूँ। तो मैं वातावरण में छोड़ दूंगा,
- 10:17उसको मेरा डंगा अनूठा है, क्योंकि तुम्हारे सामने गाली देने का कोई
- 10:26अर्थ नहीं रह जाता। क्रोध मेरे भीतर है, भीतर मेरा
- 10:32धधक रहा है। परेशान मैं तुमको करूँ और सत्य भी
- 10:39है। जब भी तुमने क्राइम किया, तुम्हें
- 10:45नहीं पता होता तुम्हारे अचेतन में तीव्र ज्वाला जल रही थी।
- 10:54इसलिए ये अध्यापक लोग घर से अपनी घरवाली से लड़ के आ जाते हैं।
- 11:02बच्चों को पेट देते हैं बच्चों को विचारों मासूमों को पता भी नहीं
- 11:06होता कि हमें मार क्यों पड़े? उनको क्या पता घरवाली से लड़कियां
- 11:13हैं। मेरा शिष्य एक बात बताया करता था।
- 11:22हरियाणा डप वाली में एक टीचर हुआ करता था, नाम भूल गया ओह कभी कभी
- 11:32तो ठीक रहता, कभी कभी उसे पागलपन का दौरा पड़ता।
- 11:40ऐसे व्यक्तियों को टीचर नहीं बनाना चाहिए जिन्हें कथोरसिस का
- 11:45ही पता नहीं तुम्हें क्रोध आता है।
- 11:57और तुम्हें इतना सा भी पता नहीं कि ये क्रोध तुम्हारे भीतर अचेतन
- 12:01से आया है। अगर भीतर था तो आया अगर क्रोध ना
- 12:08होता तो बुद्ध के ऊपर तो लोग थूक के भी चले जाते हैं।
- 12:13लेकिन वो अपने रूमाल से थूक को पोछ के पूछते हैं, बनते ये तो मैं
- 12:18समझ गया कुछ और भी कहना है क्योंकि क्रोध बुद्ध के भीतर।
- 12:41और जो भित्र होगा वो ही आएगा। बाहर अगर कैंसराइटिस का फोड़ा है
- 12:54उसके ऊपर तुम कैंची फेर दोगे या कोई?
- 13:04तीखी चीज़ फेंक दोगे क्या निकलेगा?
- 13:10मवाद क्यों? क्योंकि फोड़े के अंदर मवाद होते
- 13:16हैं जो चेस चेस करती है। सारी बात और अगर।
- 13:26फौड़ा न हो सवस्थ हाथ के ऊपर हम चाकू फिरते, ब्लेड चलाते क्या
- 13:36निकलेगा शुद्ध खून? दोनों में ही ब्रेड चला।
- 13:42एक डॉक्टर नहीं चलाया, एक तुम नहीं चलाया, कर्म दोनों बराबर।
- 13:52दोनों में ब्रेड चला, एक में मवाद निकला और तुम हल्के हो गए।
- 13:59वो दुर्गंध युक्त मवाद निकला, वो बैक्टीरिया से युक्त मवाद निकला
- 14:07जो फैल जाता तो शायद तुम्हारी शरीर को क्षति भी हो सकती थी।
- 14:19एक व्यक्ति ने तुम्हें चाकू मार दिया, खून निकला ब्रेड यहाँ भी
- 14:28चला कर्म दोनों देखने में बराबर लगेंगे।
- 14:39लेकिन मनशा अलग लगती है। किस मनशा से काम किया क्या है?
- 14:48बस कृष्ण यही कहते हैं, तुम्हें समझ नहीं आया?
- 14:54वो कहते कर्मण्य वाधिका रस्ते ही अर्जुन तू कर्म तो वैसा ही करेगा
- 15:00जैसा तुम्हारे अचेतन के भीतर भरा पड़ा है।
- 15:03क्रोध है तो क्रोध से करेगा, शांत है, तू शांति से करेगा।
- 15:15क्योंकि भीतर की भावना ऊर्जा का रूप, वह ऊर्जा दूषित भी हो सकती
- 15:23है, वह ऊर्जा स्पष्ट और सवस्थ भी हो सकती है।
- 15:31भावना क्या है? किस भावना से तुमने ये किया?
- 15:39डॉक्टर तुम्हारा भला चाहता है, फिर अगर वह बड़ा समिता है, वह
- 15:52पहले एनेस्थीसिया देता है तुम्हें।
- 15:55लेकिन दर्द तो फिर भी होता है। दांतों का डॉक्टर तुम्हें
- 16:01ऐनेस्थीसिया देके दांत निकाल देता है तो तुम्हें इतना दर्द नहीं
- 16:08होता बल्कि कभी कभी तो बिल्कुल भी दर्द नहीं होता।
- 16:11दांत निकल जाता है तो तुम्हारी पीड़ा का हर नो।
- 16:19तुमने जो कहा पुत्र, मैं सभी धर्मों को तुम्हारी भाषा में।
- 16:33अभद्र शब्द प्रयोग करता हूँ गाली निकलता हूँ, लेकिन मैं
- 16:43एनेस्थीसिया पे देता हूँ यही तो तुम्हें पता है तुम मेरे प्रवचन
- 16:50को सुन मैं तुम्हारे कैंस्राइटिस पर चीरा दे के।
- 16:58फिर गीत गाने लगता हूँ, यह ऐनेस्थीसिया है मेरी आवाज के भीतर
- 17:07से आते हुए प्रेरणात्मक तिरंगे, सुंदर प्रेम युक्त तरंगें।
- 17:16तुम्हारे लिए एनेस्थीसिया का काम करती है जैसे की छोटा बच्चा गाली
- 17:23निकालता हो बस मैं वैसा ही लिखूंगा तुम्हें तुम गौर से देखो,
- 17:32मैं कभी तुम्हें गाली भी निकालूँगा तुम्हें क्रोध नहीं
- 17:34आएगा। बिल्कुल वैसा होगा जैसे छोटा
- 17:39बच्चा गाली निकाल रहा हो। आप देखना छोटे बच्चे गाली निकालते
- 17:45हैं, उसको उनका मतलब ही नहीं पता होता, लेकिन गाली निकालते हैं बस
- 17:55मेरी गाली। इस छोटे बच्चे के समान है हवा में
- 18:03मारी गई तलवार है जिसका निशान भी नहीं पड़ता, लेकिन मेरी भावना सुध
- 18:10है। मनुष्य शुभ है।
- 18:16मैं जानता हूँ अगर मैं जानता ना होता तो मैं बोलता भी नहीं और
- 18:25दूसरी बात मैं नहीं बोलता, आज तलक एक शब्द भी।
- 18:35मैंने नहीं बोला तुम्हें जाकर आश्चर्य भी होगा, लेकिन यह एक
- 18:42सुखद आश्चर्य है कि क्यों बोला वह वही बोला।
- 18:51जिसने इस संसार की संरचना की, मैं कभी बोला नहीं, क्योंकि मैं तो
- 18:57हूँ ही जब से जाना है कि मैं नहीं हूँ।
- 19:0628 अक्टूबर 1985 के बाद। तब से हर चीज़ का मायना बदल गया।
- 19:21बुद्ध जैसे बुद्ध के ऊपर मुझे लोग कह देते हैं बाबा तुम्हें मार
- 19:26देंगे, मायना बदल गया। पहली बुद्ध अपने आपको शरीर समेटता
- 19:34है, फिर मायना बदल जाता है, पता चल जाता है, दृष्टि बदल जाती है
- 19:44और यथा दृष्टि तथा सृष्टि। बुध जान गए इसी को ज्ञान कहते हैं
- 20:03कि जीस ढांचे को इसने गाली निकाली।
- 20:06जीस ढांचे को पर इन्होंने थूका। वह ढांचा मिट्टी का है।
- 20:16माटी का उथरा कैसो नचत। कैसा?
- 20:40तू है। माटी का को तू रहा कैसो नचतू कैसो
- 20:55नचतू है डरियो फिर तू? वह जानता है या माटी का पुतला है,
- 21:08जिसने थूका और जिसके ऊपर थूका, वह भी माटी का पुतला है।
- 21:17बस उस थूकने वाले में और जिसके ऊपर थूका।
- 21:22उनमें गुणवत्ता का फर्क है तो ज्ञान और अज्ञान का फर्क है।
- 21:27बुद्ध जानते हैं कि मैं अछूता रह गया।
- 21:32इसके थूकने के बाद थूकने वाला यह समयता है।
- 21:39उसका गुबार निकल जाता है। वह समझता है कि मैंने बुद्ध के
- 21:45ऊपर थूक दिया, इसलिए अगर तुम इस भावना से काम करोगे कि यह मैंने
- 21:53किया तो उसका परिणाम तुम्हे भुगतना पड़ेगा।
- 21:59वह व्यक्ति चला जाता है। और सारी रात सो नहीं पाता।
- 22:09करवटें बदलते बदलते रात गुजर जाती है।
- 22:18सुबह भोर से पहले उठ जाता है। वह बात उसके अचेतन में गूंजती
- 22:29रहती के बुध ने तुम्हें तो कुछ नहीं कहा कि उसकी आत्मा उसे
- 22:36बिकारती है। तुम्हारे अंदर दो मन है।
- 22:45एक चेतन, एक अचेतन और अचेतन के भीतर सामूहिक अचेतन कलेक्टिव
- 22:55अनकॉन्शियस उसके नीचे कलेक्टिव कन्सेशन्स उसकी आवाज़ परमात्मा की
- 23:03आवाज़ कहलाती। मैं तुम्हें धिक्कारिका और उसकी
- 23:10आवाज कोलेक्टिव अनकॉन्शियस सबकॉन्शस को चीरती हुई तो हमारी
- 23:18कॉन्शस में आ जाएगी। थोड़ा सा आराम से सुन लें इस बात
- 23:22को। रिवाइंड करके, सुन लेना, वह
- 23:29कोलेक्टिव कैन्सेस्नस की धिक्कार कोलेक्टिव कॉन्सेस शुद्ध चेतन है,
- 23:42यह वो तत्व है। जो कभी बेहोश नहीं होता।
- 23:46जो कभी सोता नहीं वह तुम्हें धिक्कारेगा कि तुमने ये क्या किया
- 23:55और वह सबके भीतर है और उसकी आवाज इतनी तेज।
- 24:07इतनी तेज होगी कि वह तुम्हारे कोलेटिव अनकॉन्शियस सबकॉन्शियस को
- 24:15तोड़ती हुई तुम्हारे क्षेत्र में आ जाएगी।
- 24:22उसे ही तुम प्रायश्चित कहते हो, साँप निकल गया तुम लकीरों पर
- 24:32बैठते हो कर्म तो हो क्या अब किया हुआ कर्म।
- 24:42वापस नहीं होता और तुम्हारी आत्मा धिक्कारती है तुम्हें कि बुध का
- 24:49दोष बताओ क्या बुध तो बोलते हैं बिलकुल ठीक तो बोलने का अधिकार
- 24:58सभी को है। और बुध बोलते कहाँ हैं?
- 25:02बुध का अनुभव बोलता है बुध बोलते तो मानो गलत हो सकता था लेकिन बुध
- 25:11नहीं बोलते। बुध का अनुभव होता है और यह अनुभव
- 25:17इतना आनंद से ओतप्रोत है। के बुध को बोलना ही पड़ता है जो
- 25:24गगड़िया रस से भर जाती छलकने लगती वह क्रीड़ा ही करती।
- 25:35इसमें बुध का कोई कसोग नहीं, वह बोलेंगे।
- 25:46वह बोलेंगे नहीं वह झरेगा वह झरेगा और तुम उसका गुस्सा मान
- 25:54जाओगे, तुम थूक के चले जाओगे। और तुम्हारी अन्तश की आवाज़
- 26:06तुम्हें रात भर सोनी न थी और सुबह उठ के वही व्यक्ति बुद्ध के चरणों
- 26:15में से रख देता है प्रभु गलती होय मैं पापी।
- 26:22मैं दोषी मैंने कुकृत्य किया, मैंने आप जैसे संत व्यक्ति को
- 26:30गाली निकाली, मुझे एक समय कब बुध कहते मैंने?
- 26:42तुमसे बदला कब लिया जो तुम क्षमा मांगते हो?
- 26:49मैंने प्रतिक्रिया कहा की, लेकिन उस व्यक्ति के पास कोई जवाब नहीं
- 26:56होता इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ। अगर तुम्हें कोई गाली निकाले तो
- 27:05वह उसकी मनुष्य की प्रवृत्ति है। वह आकाश में आया हुआ बादल का एक
- 27:13टुकड़ा है अभी आया थोड़ी देर बाद चला जायेगा जब चला जायेगा तो उसी।
- 27:20प्रयासित होगा मैंने ऐसा क्यों किया तुम्हारे मन का?
- 27:29पेंडुलम बाएं से दायें दायें से बाएं घूमता ही रहता है।
- 27:33तुम सित्र कभी रहते नहीं। इसलिए बुध निकाह मध्य मार्ग ना
- 27:42इधर जाओ ना उधर जाओ बीच में ठहरों आती जाती, साहस को देखो, देखते
- 27:51देखते तुम ठहर जाओगे, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।
- 27:58जैसे जागते जागते तुम अचानक निद्रा में चले जाते हैं।
- 28:04ऐसे ही तुम अपने अंत में चले जाओगे।
- 28:10आकाश में पल भर के लिए कोई बादल आए थे।
- 28:17हवा का झोंक आया उन बादलों को उड़ा के लेके आए फिर वह व्यक्ति
- 28:23पश्चात और ये मैंने क्या किया ऐसा ही तुम करते हो?
- 28:34काम आता है उसके आवेग में बह जाते हो।
- 28:37क्रोध आता लोभ आता मोह, अहंकार, मध, मत्सर आता भय आता।
- 28:44तुम उसकी भावना में बह जाते हो, तुम उसके साथ एकाकार हो जाते हो।
- 28:56एक छोटा सा प्रश्न यहाँ और ले लें ये प्रश्न शायद बहुत सी बच्चियों
- 29:05का हुक्म बहुत दिनों से यह बच्ची मुझे परेशान करती है।
- 29:13इस मामले में। कहानी कहती है अपनी कि मैं 1514
- 29:29वर्ष की थी, मेरे मामा के बेटे ने मेरे साथ बलात्कार किया।
- 29:41इसमें मेरी ज़रा भी सहमति नहीं थी।
- 29:49उसके बाद मैं बड़ी हुई। बहुत बार उसने बलात्कार किया बड़े
- 30:01होकर मेरे माँ बाप ने। शादी कर दे।
- 30:08अब मैं कुंठा के मारे मरी जा रही हूँ।
- 30:16मेरा मन कहीं देखता नहीं है कि मुझे क्या करना चाहिए?
- 30:22अब दिशा दें बाबा जी। पुत्री, यह सिर्फ तुम्हारी दुविधा
- 30:31ने यह दुविधा बहु सी बच्चियों की है।
- 30:43बहुत सी स्त्रियों की है, बहुत सी लड़कियों की है, बहुत से
- 30:52प्राणियों की यह दुविधा है तुम्हारे एक मन कहता है कि पति को
- 30:59बता दो। तुम्हारा दूसरा मन रोक लेता है।
- 31:05नहीं पता ना क्योंकि उसकी नजरों में गिर जाओगे।
- 31:11उसकी नजरों में तुम पति भरताओ तुम सती सावित्री हो?
- 31:19मैं अंतर्दुंद में जल रही हूँ, मुझे रास्ता दिखाइए, तुम्हारा
- 31:33समाज। विकृत मानसिकताओं से घरा हुआ है
- 31:44जो कि साइंटिफिकली असंभव है। इसलिए तुम्हारा समाज चोर है।
- 31:59झूठा है मक्का तुम्हारा समाज कहता है कि स्त्री सती होनी चाहिए और
- 32:16नैतिकता के नाम पर उसने न जाने कितनी जंजीरें बना रखें।
- 32:24फिर ज़रा बताओ बेटी अब तक तुम तुम कहती हो मैं 28 साल 28 साल तक
- 32:37तुमने जीवन कहाँ जीया? तुमने हर पल मौत है और गबराहट में
- 32:47गुज़ारा, ये भी कोई जीवन है तुम जीसको जीना कहते हो, वह दिनों को
- 32:57धक्के देना है। जीवन होता है संत और मैं रोज़
- 33:06बोले जाता हूँ, इन आवरणों को उखाड़ दे साइंटिफिकली यह संभव ही
- 33:16नहीं है। साइंटिफिकली सतित्व नाम की कोई
- 33:26चीज़ नहीं होती, तुम गलती हो, आध्यात्मिकता में सतित्व होता है,
- 33:39वैज्ञानिकता में ना सतित्व होता है, ना ब्रह्मचर्य होता है।
- 33:43इस बात को ध्यान से समझ लेना बहुत सी बेड़िया टूटेंगी तुम्हारे जब
- 33:50तुम इतने परिपक्व हो जाते हो और परिपक्व कब होते हो?
- 34:05तुमने कभी देखा कोई बड़ा बूढ़ा मरता है जब कोई बारात निकल रही
- 34:10है, डोली उसके पीछे से पैसे लुटाने वाले उसके मामा, उसके बड़े
- 34:18भाई या कोई रिश्तेदार पैसे फेंकते हैं।
- 34:26ज़रा सोच के बताना क्या वो फेंके हुए पैसों को तुमने कभी उठाया और
- 34:38क्या कभी ऐसा वक्त आया कि फेंके हुए पैसों को?
- 34:45तुमने कभी गौर ही नहीं किया, तुम बिल्कुल मुर्दे जैसे हो गए।
- 34:54सिकंदर ने कहा कि मैंने जो धन, सोना, दौलत, हीरे, चौहरात।
- 35:01जो भी इकट्ठा किया मेरी अर्थी के ऊपर से जनाजे के ऊपर से गुजार
- 35:05देना फेंक देना यह व्यर्थ है और है भी व्यर्थ सिकंदर जब मरा वह
- 35:23एनलाइटन हो के मरा। यह बात तुम्हें किसी शास्त्र में
- 35:27मिलेंगे ना उसके अंतिम प्रवचन बताते हैं, अंत मति सो गति वही
- 35:38गति हुई है उसकी जो उसने बोला। वह एनलाइटन हो गया था।
- 35:45यह व्यर्थ और मुझे कंधा बोही दें। जिन्होंने मेरे ही शरीर को बचाने
- 35:55की सौगंध खाई थी, वह असफल हो गए। शरीर का भी बचता नहीं तुम्हारा
- 36:06कमाया धन तुम्हारे साथ जाता नहीं पुत्री तुमने कहा मेरी रजा नहीं
- 36:16होती, मेरे मामा के बेटे ने उसे बलात्कार किया ठीक?
- 36:24लेकिन उसके कसूर का दंड तुम क्यों भौंकते रहे शेक्सपियर ने एक बात
- 36:33कही थी जो व्यक्ति तुम पर क्रोध करता है।
- 36:41तुम उस पर करुणा बरसाना कि देखो बेचारा जल रहा है और जलते हुए
- 36:50व्यक्ति से हमें करुणा होनी चाहिए।
- 36:54सहानुभूति होनी चाहिए ना कि ग्रोथ।
- 36:58उसने खुद को आग लगा ली है। उसके भीतर आग लगाने वाले हार्मोन
- 37:04पैदा हो गए। कार्टिसोल एड्रेनेलिंग वह जलने लग
- 37:08गया। आगे से तुम भी जलने लग जाओ यही
- 37:15तुम्हारी मूर्खता है। अगर तुम आगे से सदस्य बने रहे
- 37:23न्यूट्रल रहे तो वह व्यक्ति और गालियाँ निकाल लेगा, चला जाएगा,
- 37:29लेकिन वापस फिर आएगा अगर तुमने उसे गाली निकाल दी फिर वो नहीं
- 37:35आएगा। क्योंकि तुमने लेखा जोखा बराबर कर
- 37:40दिया तो शेक्सपियर ने कहा अगर कोई जल रहा है क्रोध में और तुम्हें
- 37:47गालियाँ बोल रहा है, तुम्हें अनट्रिशन तो बोल रहा है तो तुम उस
- 37:57पर करुणा करना। तुम सहानुभूति करना, उसको देखकर
- 38:07के बेचा रहा, कैसे जल रहा है क्रोध की आग में क्रोध एक आग है,
- 38:14घृणा भी एक आध है। और जो लोग जो संस्थाएँ आरएसएस आज
- 38:24क्रोधित सिखाते हैं, घृणा सिखाती हैं, तुम्हें बांट के तुम हिंदू
- 38:31हो, मुसलमानों से घृणा करो। लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि वो
- 38:40कितना पाप को मारेगा। किसने सिखाया कि तुम भेद करो,
- 38:50घृणा करो, नफरत करो, आग फैलाओ। तो जब तुम्हारे भीतर आग लगेंगी तो
- 39:00तुम स्वयं को दंडित करोगे, जीसको दंडित करना चाहोगे?
- 39:05जीसको गाली निकालोगे उसके ऊपर तो शायद बुद्ध जैसा व्यक्ति हो, कोई
- 39:11फैक्ट न हो। फिर तुम क्या करोगे?
- 39:18लेकिन एक बात पक्की है कि तुम तो जलोगे जो क्रोध में होता है,
- 39:24शेक्सपियर कहता है कि तुम उसके ऊपर दया दिखाना, करुणा दिखाना के
- 39:31बेचारा। कैसे खुद को नाह के जला रखा है उस
- 39:38पर तरस खाना उसके हालात पर तरस खाना, लेकिन तुम उसके हालात पर
- 39:51तरस खाने के बजाय तुम अपने हालात वैसे ही।
- 39:58कर लेते हो जैसे सामने वाले के होते हैं, बस यही तुम्हारी मौड़ता
- 40:03है। अगर दूसरा तुम्हें गाली दे तो
- 40:09थोड़ा सा जागृत हो जाना, कटू से कटू शब्द बोलें तो ठहर जाना।
- 40:17और उस ठहराव में तुम पाओगे बड़ा आनंद है ठहराव सदा ही तुम्हें
- 40:26आनंद की झलक दिखाता है। अगर तुम क्रोध के क्षणों में ठहर
- 40:33गए तो बड़ा आनंद आएगा। लोभ के क्षणों में ठहर गए तो बड़ा
- 40:40आनंद आएगा। नानक लोभ के क्षणों में ठहर गए
- 40:44थे, व्यापार करते करते 131313 ठहर गए, ठहर गए और सब कुछ तेरा ही हो
- 40:53गया। ठहराव में मिलती है सटोरी की झलक
- 41:07जिसने तुम्हारे साथ तुम कहती हो दुराचार तो समाज के हिसाब से पाप
- 41:18किसने किया? फिर पाप का खनाजा तुम क्यों
- 41:25भुगतती हो? बेटे बताने में कोई हर्ज नहीं
- 41:32तुम्हें और अगर तुम्हारा पति मूढ़ नहीं होगा।
- 41:41तो वह तुम्हें सहानुभूति देगा और तुम्हारे प्रति उसकी विश्वसनीयता
- 41:48बढ़ जाएगी। के और तो और तुम सत्यवादी भी हो।
- 41:58तुमने सतित्व नहीं खोया और सतित्व कोई पैदा होने वाली चीज़ नहीं
- 42:09होती जो तुम साध लो ना ब्रह्मचर्य तुम साध सकते हो।
- 42:14ब्रह्मचर्य तो वो फूल है जो वक्त पाकर खिल जाता है।
- 42:22मैंने तुम्हें कहा, अर्थी के ऊपर से पैसे बिखेरे जाते, डोली के ऊपर
- 42:28से पैसे बिखेरे जाते, अगर तुम पास से गुजर जाते हो, रुपयों को
- 42:34रौंदकर तो तुम मेच्युर हो गए। अगर तुम उन पैसों को उठा के चुपके
- 42:41से आस पास देख के जेब में डाल लेते हो, तो तुम मैच्युर नहीं
- 42:44हुए, तुमने अभी धन की कीमत जानी है, तुमने यह नहीं देखा कि मैं
- 42:53जिसके पास से गुजर रहा हूँ। वह अर्थी यह कुछ साथ ले के नहीं
- 43:00गया तुम्हारी समाज की मान्यताएँ एक व्यक्ति के मरने पर खुशी मनाई
- 43:06जाती है और एक व्यक्ति के मरने पर दुख मनाया जाता है।
- 43:15हमारी यहाँ मेरी चाची 9095 साल की होकर मर गई थी तो उसके बेटों ने
- 43:26बड़ी खुशी मनाई, भोज दिया। देसी घी का प्रसाद बनो।
- 43:33मैंने कहा भाई खुशी किस बात की? कहता खुशी इस बात की कि उसके बेटे
- 43:40थे उसके पोते थे पड़ोते थे सड़ोते थे अच्छा यह भी कोई खुशी की बात
- 43:46होती है तुमने अपने मापदंड बना ली।
- 43:55और तुम्हारे सारे मापदंड मूर्खता से भरे पड़े, ये तुम्हारी समाज के
- 44:05मापदंड एक वक्त होता है। तुम बच्चों के लिए लालायी तमढ़ी
- 44:13मशानों पर माथा टेकते हो के परमात्मा?
- 44:17हे पीर फकीर मुझे और लाद दे दे फरियादें कराते अर्दासी कराते जब
- 44:25वो बेटे बड़े हो जाते तो तुम मुझसे भेदभाव करते हो।
- 44:34तुम ये कहते हो कि हमारी हुक्म सी चली फिर तुमने बच्चे मांगे थे।
- 44:44जा तुमने गुलाम मांगे थे, तुमने गुलाम मांगे थे, मैं जैसा कहूं
- 44:51बच्चे वैसा ही करें। बच्चे एक और स्वतंत्र इकाई बच्चे
- 44:58को समझाना चाहिए। अगर वो बच्चा मेच्युर हो गया उसको
- 45:07सिर्फ अपना अनुभव बताना चाहिए, समझाना भी नहीं चाहिए।
- 45:14बच्चा अगर बड़ा हो गया है उसे अपना अनुभव बताना चाहिए।
- 45:20के पुत्र पुत्री मैंने ये देखा अपने जमाने में बाकी तुम मेरे पे
- 45:27यकीन मत करना, तुम आजमाना तुम देखना क्या वास्तव में ऐसा है।
- 45:36बिल्कुल वैज्ञानिक की तरह वैज्ञानिक कहते हैं कि मैं नहीं
- 45:39जेपाई इ इस इक्वल टु एम सी स्क्वायर तुम देखो क्या ये ठीक है
- 45:48और सारी दुनिया ने कहा हाँ ये ठीक है।
- 45:54ये होता है वैज्ञानिक नजरिया। साइंटिफिक मापदंड तुम आज तक इस
- 46:09बात की आग में जल रही हो, तो ज़िन्दगी जी कहाँ तुम?
- 46:16तुमने ज़िन्दगी नहीं दी तुम्हारी ज़िन्दगी डर से गुजरे बह से गुजरे
- 46:24ध्वस्त होकर, लाचार रातों की नींदों की कीमतें चुकाकर।
- 46:33ये हमारे समाज ने एक बहुत बड़ा अपराध किया है।
- 46:39सती सावित्री की मांग करना राम जैसे लोग कर सकते हैं क्योंकि राम
- 46:48जैसे लोग। का ब्रह्मचर्य फलित हो गया है और
- 46:57ब्रह्मचर्य और सतित्व साधने जैसी चीज़ नहीं है।
- 47:00इस बात को फिर से सुन ब्रह्मचर्य और सतित्व साधने जैसी चीज़ नहीं
- 47:08है। कि तुम पराई पुरुष की तरफ मत
- 47:11देखो, तुम पराई स्त्री की तरफ मत देखो, यह कोई साधने वाली चीज़
- 47:15नहीं है। फिर तो तुम ने दमन कारी हो गए,
- 47:19तुम तुमने प्रवृत्तियाँ का दमन करना शुरू कर दिया पातंजली ने एक
- 47:28शप लिखा है। और मैं उससे सहमत नहीं।
- 47:35पतंजलि की जब मैं किताब पढ़ रहा था उसमें योग का मतलब आता है
- 47:43योगाश्चितवृत्ति नरोदा चित की वृत्तियों का निरोध।
- 47:52रोक ले। मैंने कहा पतंजलि तू आज है नहीं,
- 47:59मैं किस्से कहूँ कि तुने झूठ बोला।
- 48:10अगर एक शब्द थोड़ा सा बदल देते तो परिभाषा बदल जाती।
- 48:19योगा चित्तवृत्ति नरोदाह चित्त की वृत्तियाँ तो आएंगी और जाएंगे,
- 48:28कभी काम आएगा। कभी क्रोध आएगा, लोभ आएगा, कभी
- 48:31मोह आएगा, कभी बदले लेने की भावना आएगी, कभी क्षमा करने की भावना
- 48:36आएगी। यह है उन बादलों की तरह आकाश के
- 48:43चित्त के ऊपर आती जाती रहने वाली घटनाएं।
- 48:51लेकिन तुमने ये जो शब्द कहा चित्तवृत्ति नरोदा ये शब्द नरोदा
- 48:56गलत कहा, उसको दमन करो नहीं निरोधा का मतलब अगर तुमने उपेक्षा
- 49:04से लिया है तो ठीक। और मैं समझा दूँ जो पतंजलि को
- 49:11पढ़ने वाले लोग हैं। अगर योगाचित वृत्ति निरोधा
- 49:16निरोधकी शब्द को उसने दमनकारी रूप में लिया तो गलत।
- 49:22अगर उसने उपेक्षित ढंग से लिया तो ठीक।
- 49:29चित के वृत्तियां आएं आएं, ठहरे ठहरे चले जाएं और तुम उपेक्षित
- 49:38बने रहो, यह है इसका सही मतलब अब तुम देखो पतंजलि तुम नहीं हो।
- 49:48लेकिन पतंजलि के व्याख्यान करने वाले लोग हैं।
- 49:54वो इस चीज़ का कैसे अर्थ करते हैं?
- 49:57योगाश्चित वृत्ति नरोद्हार। चित्त की व्रतियों को निरोध करो।
- 50:07दबाओ सुप्रिश करो, दमन करो यह मतलब निकालते हैं तो गलत है।
- 50:16सही मतलब मेरे देखे चित्तवृत्ति झरोदाह उनकी उपेक्षा करो वो
- 50:23आएँगे। हो जाए वो ठहरेंगे आने दो ठहरने
- 50:31दो जाने दो लेकिन तुम उपेक्षित बने रहो न्यूट्रल बने रहो।
- 50:43अगर तुम ये करने में कामयाब हो गए तो ब्रह्मचर्य फलित हो गया, सतीत
- 50:48व फलित हो गया, बस ये मापदंड दूसरों को नहीं परखना है, ये
- 50:55तुमने स्वयं को परखना है। आज तुम विनी ग्रह यही शब्द कहा
- 51:01कृष्ण ने। खुद के भीतर जाके देखना है कि
- 51:07क्या ब्रह्मचर्य फलित हुआ सतित्व फलित हुआ अमानित्वं दंभित्वं
- 51:14हिंसा शांतिराज जवं आचार्य उपासं सक्षम।
- 51:20थैर्यम आत्मबिनग्रह आत्मबिनग्रह अगर तुमने इस हिसाब से उसका अर्थ
- 51:32लिया तो ठीक है, अगर तुमने दमनकारी हिसाब से मतलब लिया तो
- 51:38गलत। तो तुम पुत्री ऐसे करो, तुम ध्यान
- 51:48में बैठा करो, जाप मत किया करो। जाप, पाठ, पूजा, शोट्सुप, प्रचार,
- 51:53पूजन किसी प्रकार का अनुष्ठान जागरण कहीं मत जाओ, कोई आरती न
- 52:02करो कोई संध्या। कोई संध्या वेला मत करो, कोई दीपक
- 52:06मत जलाओ कोई धूप मत चलाओ, सिर्फ तुम बैठो, आरामदायक माहौल में
- 52:15बैठो जो तुम्हें सुखद व्यवस्था में बैठने की।
- 52:22प्रोत्साहित करें। एकांत शांत स्थान पर बैठ जाओ,
- 52:32वहाँ कुछ न सोचो, कुछ न करने में आ जाओ मन चलेगा।
- 52:42बाद सुनाई आएंगी। ठहरेंगी चली जाएंगी तुम आने देना,
- 52:48ठहरने देना, चली जाने देना, झगड़ा मत करना।
- 52:56इस अभ्यास को गहरा गहरा करते रहना वक्त कितना ही लग जाए और ध्यान
- 53:02रखना जो ऊँचाई तुमने इसी जन्म में पाली, वह अगले जन्म में तुम्हारी
- 53:11शुरुआत होगी। इसलिए अंत मति सोगति जो तुमने अंत
- 53:26में छोड़ा है, वह अगले जन्म की शुरुआत बनकर आएगा।
- 53:33तुम अपने भीतर हो। जब तुम ठहर जाओगे, चित्त की
- 53:42वृत्तियों को उपेक्षित करके आएंगी जाएंगी, ठहरेंगी तुम लिप्त न हो,
- 53:49न बस ये है सूत्र में। चित्त की व्रतियों से न झगड़ा
- 54:00करना, न खुश हूँ उन्हें आने देना। हवाओं की तरह तुमने कभी हवाओं को
- 54:12रोका है? रोक सकते हो, ठहरा सकते हो, हवाएं
- 54:20आएंगी, ठहरेंगी चले जाएंगे। यह हवाएं।
- 54:33कभी चुपचाप। गिरफ्तार न कर।
- 55:31ये सोचा। अपने हाथों से हवाओं को गिरफ्तार
- 55:41न कर। छपट मत जाना इनसे इनसे छपट मत
- 55:48जाना क्लिंगक नस मत कर लेना। कोई विचार तुम्हें अनुकूल बैठता
- 55:54है, कोई प्रतिकूल बैठता है आने, देना, ठहरने, देना और जाने।
- 56:03देना मैं तो इक ख्वाब। से।
- 56:08तू प्यार न कर प्यार हो जाए तो इस प्यार का इजहार न कर।
- 56:25मैं तो इक खाऊं चलते। रहना चलते रहना, चलते रहना चरबती
- 56:34चरबती 1 दिन ऐसा आएगा, तुम्हें पता चलेगा, मैं शरीर नहीं हूँ, बस
- 56:43तुम्हारा ब्रह्मचर्य सध गया। तुम्हारा सतित्व सध गया।
- 56:51सतित्व और ब्रह्मचर्य शारीरिक नहीं होता है, मानसिक भी नहीं
- 56:56होते, यह आध्यात्मिक होते है। तुम्हें तुम्हारे कल का पता चल
- 57:04जाए। तो सतित्व यानी सत्य का अस्तित्व
- 57:10सतित्व का मतलब सत्य का अस्तित्व लख तुमसे छेड़छाड़ कर ली तुम्हारे
- 57:18मामा के पुत्र ने। लेकिन तुम्हारा सत्य का अस्तित्व
- 57:23जो तुम हो अपने भीतर वह कंठित नहीं हो, तुम पाओ किसको प्रयोग
- 57:33करके देखो, ये एक अध्यात्मिक कथन है जो मैं रोज़ कहता हूँ।
- 57:41ऐसे ही ब्रह्मचर्य फलित होता है। जब तुम उस चर्या में चले गए जहाँ
- 57:50ब्रह्म विद्यमान हो तो तुम ब्रह्मचारी हो।
- 57:58उससे पहले तो शरीर का एक यंत्र है, लेकिन शरीर का ये यंत्र सध
- 58:05जाता है। कब?
- 58:07जब तुम्हें अपने आत्मज्ञान का पता चलता है, फिर तुम इंद्रियों से
- 58:13काम लेते हो? इंद्रियों के इशारे पे तुम नहीं
- 58:19नाचते वरन इंद्रियों को अपने इशारों पर नचाते हो।
- 58:25इंद्रियों से तुम काम लेते हो। ये दोर भाग्य है हमारा इस
- 58:33इंद्रिया से बच्चे पैदा करने चाहिए।
- 58:37उससे तुम स्वाद ले रहे हो सिर्फ जबकि वह स्वाद लेने का यंत्र नहीं
- 58:43है स्वाद लेने की तल है, यंत्र कोई नहीं होता।
- 58:51किसी यंत्र से वह चरम आनंद नहीं मिला।
- 58:59अस्तित्व पर जाकर अखंड चरम आनंद मिला करता है।
- 59:03जो कभी धारा टूटती नहीं उसकी और तुम्हारी कामभासना के भीतर आए हुए
- 59:10क्षण का आनंद तो आज नहीं कल टूट जाएगा।
- 59:15लेकिन अगर ब्रह्मचर्य स्वतः से ही खंडित हो जाए तो प्रयाशित भी मत
- 59:19करना। इट्स ए नेचुरल प्रोसेसर जैसे
- 59:23तुम्हें पेशाब, लघु शंका, दीर्घ शंका होती पसीना आता है, वैसे ही
- 59:31ब्रह्मचर्य खंडित हो जाए तो अफसोस मत करना।
- 59:35कोई बात नहीं, तुम उपेक्षित भाव को दृढ़ करते रहना, योगा
- 59:45चित्तवृत्ति नरोदा व्रतियों को अपेक्षा करना।
- 59:53क्रोध आए, अपेक्षा करो, घृणा आए, अपेक्षा करो, उनके साथ चिपट मत
- 59:58जाओ। अपने हाथों से करें।
- 1:00:19अगर तुम चिपक गई कलिंगनेस हो गई, तो फिर तुम दूषित हो गए और जब तुम
- 1:00:28पाओगी पुत्री। कि मैं शरीर नहीं हूँ, उस दिन
- 1:00:32सारा तुम्हारा अस्तित्व बेड़ियों से रहित हो जाएगा।
- 1:00:44बंधन छूट जाएंगे, कह नानक गुरु बंधन काट।
- 1:00:54और जीसको तुमने कभी भूल गए थे वह तुम्हें मिल जाता है।
- 1:01:32बंधन काटे। सिर्फ गुरु धारण कर लेने से बंधन
- 1:01:39नहीं कटते। तुम्हें अपने भीतर जाकर मौन होना
- 1:01:45होगा। तुम्हें अपने भीतर जाकर मन की
- 1:01:49चित्त की व्रतियों को आने, देना, ठहरने, देना और जाने देना होगा और
- 1:01:56तुमने उपेक्षित भाव में बैठना होगा।
- 1:02:03छेड़छाड़ नहीं करनी होगी उन व्रतियों के साथ।
- 1:02:06क्लिंगनेस नहीं करनी होगी तुम अछूते बने रहो, हवाएं आएं, गुलशन
- 1:02:17को छुएं, ठहरें और चली जाएं। तुम इनको गिरफ्तार करने की चेष्टा
- 1:02:25मत करो। इसलिए मन से सभी बोझों को उतारती
- 1:02:32हूँ। ये तुम्हारी समाज की व्यवस्थाएँ
- 1:02:35हैं। मैं जानता हूँ और समाज की
- 1:02:38व्यवस्था ने बहुत से लोग पागल कर दिए।
- 1:02:42ये आज जो बाबा बागेश्वर धाम में शर मार रही हैं।
- 1:02:46जो मेहंदीपुर के अंदर सिर मार रहे हैं, लोग जो न जाने किस किस स्थान
- 1:02:51पर लोग सिर मार रहे हैं, ऊंट पटांग हरकतें कर रहे हैं, इनका
- 1:02:57मानसिक उपचार होना चाहिए। ये पागल है।
- 1:03:04और पागल किसने किया? तुम्हारी समाज की अवैज्ञानिक
- 1:03:08मान्यता हूँ? नॉन सेंटिफिक कंसिडेरेशन्स अव
- 1:03:18वैज्ञानिक मान्यता हूँ। मैंने पागल कर दी।
- 1:03:22फिर ये ऊंट पटांग हरकतें करेंगे ये कहेंगे दे भी आ गई ये कहेंगे
- 1:03:28शेर बारी आ गई जी बाहर निकालेंगे काली आ गई मैंने ऐसी कालियां बहुत
- 1:03:36निकाली। तो तुम उपेक्षित बने रहना, मन में
- 1:03:49भाव आएगा, आने देना ठहरेगा, ठहरने देना चला जायेगा, चले जाने देना,
- 1:03:57उसे चपट लाने और तुम देखोगे। धीरे धीरे तुम बिल्कुल हल्के हो
- 1:04:02गए आज और कल और जैसे सिर के ऊपर रखा हुआ भट्ठल एक ईंट उठाई और
- 1:04:11गिरा दी बाहर हल्का हो गया, एक ईंट का दूसरी ईंट उठाई बाहर फेंक
- 1:04:17दी। दो ईंटों का बाहर हल्का हो गया।
- 1:04:20ऐसे ही 1 दिन तुम खाली बठल को भी करा दोगे अब तेरा क्या करना है?
- 1:04:26ईंटें तो इसमें है ही नहीं, तुम चित को भी करा दोगे।
- 1:04:33योगा चितवृत्ति नरोधा चित्त की वृत्तियों से उदासीन हो जा,
- 1:04:44उपेक्षित हो जा, उदासीन हो जा छिपकना नहीं, इसे ही शाक्षित भी
- 1:04:52कहते हैं। नाम बदल जाते हैं जो जैसे समझे,
- 1:04:56समझे। बुद्ध कहते हैं साक्षी बने रहना
- 1:04:59एक ही बात है और तुम पाओगे, तुम शरीर नहीं हो, फिर बलात्कार
- 1:05:08किस्से हुआ इस पंचभौतिक महाभूत से बने हुए शरीर के साथ।
- 1:05:16जो मैंने कहा था माटी का पुत्र कैसे नचत है?
- 1:05:22माटी का पुत्र कैसे नचत है तुम? भी डरी फिरती हो।
- 1:05:32डरो फिरत है, डरो फिरत है यह। तुम्हारा पुतला है जो डरा है, तुम
- 1:05:44नहीं तुम्हारा असली तत्व जो शक्तित्व में है।
- 1:05:51वह ना जलता है, ना कटता है, ना गलता है, ना सूखता है, ना ही उसके
- 1:05:59ऊपर किसी चीज़ का प्रभाव होता है, ना चिंता करता है।
- 1:06:06तुम्हारा अस्तित्व निर्दोष है। तुम उसके पास जा पहुँच जाओ तो
- 1:06:14तुम्हारे बंधन टूट जाएंगे और गुरू ही बंधन को काटता है सिर्फ गुरू
- 1:06:20बना के निश्चिंत मत हो जाना, गुरू ने जो कहा वो करना।
- 1:06:28तुम्हारा गुरु कहता है जाप करो, जाप करके देखो और मुझे पता है
- 1:06:36नहीं मिलेगा एक जाप करो और राधे करो और राम करो पांच करो 1000 करो
- 1:06:42करो और जब तुम थक जाओ। तुम्हें ना मिले मुझे पता है नहीं
- 1:06:49मिलेगा आई नो इट वेरी वेल क्योंकि मैंने किया है, मैंने भी गुरु
- 1:06:58दीक्षा ली थी मेरे गुरु ने कहा था राम राम करते हो।
- 1:07:05मैंने बहुत राम नाम किया, कुछ नहीं मिला और 1 दिन माला को बिगड़
- 1:07:11गई। ये वो ही क्षण था जो मैंने अपनी
- 1:07:14फोटो भेजी तुम्हें तुम देखोगे एक फोटो मेरे हाथ में माला है, मैं
- 1:07:21फिरकी बना देता हूँ। और 1 दिन वो गिर जाता है और जीस
- 1:07:26दिन सुबह को वो गिरती है सांझ को मुझे मेरा अस्तित्व पता चल जाता
- 1:07:31है। इसी क्षण में आके कबीर ने कहा भलो
- 1:07:36भयो, हरी भी सरो सर से टली बला बहुत अच्छा हुआ।
- 1:07:42जो सुबह मेरे हाथ से माला गिर गई, एक बला थी, सर के ऊपर वो टल गई
- 1:07:49जैसे थे तैसे भाई अब कछु कहा न जा मैं जैसा था वैसा प्रकट हो गया।
- 1:07:58पहले तो जो थोप नहीं थी अब वो सारी।
- 1:08:02धुल गई, उतर गई, कीचड़ थी, माटी थी, सब बह गई, जंजीरों उतर गई, सब
- 1:08:09बंधन टूट गए, गुरू ने मुझे मिला दिया उस बिछड़े हुए थे इसलिए गुरु
- 1:08:19की महिमा अपार है। गुरू से अगर तुम्हें नाम दाम लेने
- 1:08:26में आनंद आता है तो नाम दान लो। मैं इंकार नहीं करता।
- 1:08:32अगर तुम भटकना चाहते हो वो भी मुझे स्वीकृत है।
- 1:08:39लोग मुझे कह देते हैं, अगर तुम भगवान हो होते हुए बलात्कारों को
- 1:08:43रोकते क्यों नहीं? मैंने कहा इसलिए कि मैं भगवान
- 1:08:47हूँ, भगवान रोकते नहीं कभी न्यायालय में बैठे हुए?
- 1:08:55सुप्रीम कोर्ट के जज ने तुम्हें गुनाह करने से रोका है।
- 1:09:01बस ऐसा ही हाल अपूर्ण है। अपूर्ण रोकता ना अपूर्ण कहता है
- 1:09:07को तुम स्वतंत्र हो, तुम्हारी स्वतंत्रता भी बची रहनी चाहिए।
- 1:09:16लेकिन बेटा चंग यईयां बुरियाईयां वाच्चे तरम हदुर आखिर तो मेरी
- 1:09:21दरगाह में ही आओगे कर मैं आपको अपनी के निर्णय कर?
- 1:09:28दूँ? आज आओगे 50 साल बाद आओगे 100 साल
- 1:09:33बाद आओगे, कोई बात नहीं आओगे मेरे पास धर्मराज की कचहरी में तुम्हें
- 1:09:38हाजरी देनी ही होगी तो तुम मुझसे पूछते हो कि बाबा तुम रोकते क्यों
- 1:09:46नहीं? नहीं मैं रोकूंगा भी।
- 1:09:52कर मने वात के रास्ते, बस यहाँ तक रुक जाओ, मैं रोकूंगा नहीं, तुम
- 1:09:57कर्म करो लेकिन आगे का काम मैं करूँगा माँ फलेशु का राज़ हो आओगे
- 1:10:06तो बेटा मेरे पास। इसलिए रोकता है यही तो लीला है
- 1:10:15नानक विक सह कर विचार इस लीला को देख देख कर मैं हस्तम बड़ा
- 1:10:20प्रसन्न हो कैसे लड़ रहे हो, झगड़ रहे हो?
- 1:10:27हम बार लगा देते हो हिमालय जैसा समीर पर्वती जितना जाता तो एक
- 1:10:32तनखा भी नहीं तो मैं हसू न तो और क्या करूँ?
- 1:10:38मुझे हँसी आती है तुम कहते हो परमात्मा ने रोका क्यों नहीं?
- 1:10:46फिर तुम्हारी स्वतंत्रता भंग होती है पुत्र, लेकिन चंगेयाइयां
- 1:10:57पुरियाईयां वाछे तरमह दूर कर में अपो अपनी कीर निर्णय के दूर कर
- 1:11:03लूँ, जो करना है स्वतंत्र है। लेकिन न्यायालय को पता है आएगा तो
- 1:11:10मेरे पास इसके यहाँ के न्यायालय से तुम भाग सकते हो, लेकिन मेरा
- 1:11:18न्यायालय तो सभी भ्रमणों में बिखरा पड़ा है।
- 1:11:23एक एक क्षेत्र भी ऐसा नहीं जहाँ मैं नहीं हूँ ईशा वास में दम सरवम
- 1:11:31यत्केन से जगत या जगत जगत के कण कण में विद्यमान मैं तो मैं रोकूँ
- 1:11:37का नहीं, तुम्हारी स्वतंत्रता भी क्षीण नहीं होने दूंगा।
- 1:11:44और पुत्र तुम्हें परिणाम से भी बचने नहीं दूंगा।
- 1:11:50मा फलीछु कदाचन तुम पाओगी पुत्री आखिर में जाके कि जिससे बलात्कार
- 1:11:58हुआ मैंने। जिसकी हत्या हुई।
- 1:12:02मैं नहीं जो गुनाह हुए मैंने नहीं किया और प्रायश्चित भी तुमने नहीं
- 1:12:13किया, तुम पाओगी गुनाह करते हुए भी तुमने देखा तुम्हारे उस तत्व
- 1:12:19ने? जीस जीसको मैं सतित्व कहता हूँ
- 1:12:25गुनाह करते हुए भी तुम्हारे ब्रह्मचर्य ने भीतर बैठे हुए
- 1:12:30तुम्हारे स्वभाव ने देखा और फल भुगते हुए भी तुम्हारे स्वभाव ने
- 1:12:37देखा क्योंकि तुम केंद्र में हो। और कर्म से फिर हो रहे हैं परिजीत
- 1:12:46और तुम केंद्र में बैठे बैठे सब कुछ निहार रहे हो बिकॉज़ यू आर
- 1:12:50ओमनी प्रेसेंट सर्व व्यापक हो तुम कहाँ क्या हो रहा है?
- 1:12:58तुम्हें सब मालूम है अब पुत्र तुम्हारे पहले प्रश्न पे आ जाऊं
- 1:13:12तुम इतना कुछ कहते हो? चार वेद छः शास्त्र में बात मिलत
- 1:13:18है तो। दुख दी ने दुख होता है सुख दी ने
- 1:13:27लेकिन मैंने तो किसी को दुख नहीं दिया।
- 1:13:30क्या सर्जन किसी को दुख देता है? हालांकि काटता है, पीटता है।
- 1:13:36मेरा बोलने का मतलब सिर्फ तुम्हें सुख ही करना है।
- 1:13:41अगर मैं तुम्हारी जंजीरों को काटूं और तुम्हें दर्द हो, तो फिर
- 1:13:48मैं क्या करूँ? क्योंकि जंजीरें लोहे की हैं तुम
- 1:13:53नहीं हो जंजीरें जंजीरें तुम्हारे अस्तित्व पर जकड़ हैं, पकड़ हैं
- 1:13:59और मैं उनको दौड़ना चाहता हूँ। तुम उनको मैं माने बैठे हो?
- 1:14:05यहीं से दुविधा क्रियेट होती, तुमने जंजीरों के साथ तादाद में
- 1:14:12बना दिया, इसलिए गुरु बंधन काटेगा।
- 1:14:18गुरु जंजीरों को काटता है। और तुम हाथ का करोगे तो फिर तुम
- 1:14:23शिष्य नहीं हुए इसने नानक ने कहा शिष्य बनो।
- 1:14:33महावीर ने कहा, श्राव का बनो, सुनो, मैं बोलता हूँ यहाँ लोग
- 1:14:38सुनते कहाँ हो? झट से कमेंट ठह जाती है, मैं कहता
- 1:14:43हूँ अहो भाव प्रभु आपको प्रणाम आपने क्यों दर्शन दिए?
- 1:14:50चैनल आप तो महागुण संपन्न हो तत्व वेत हो आप घर बैठो, आराम से।
- 1:14:59क्योंकि आराम उसका लक्षण है, वह आराम से ही तो बैठा हुआ है, वह
- 1:15:05कोई उपद्रव करता है, कभी उसका स्वभाव है, आराम से बैठे तुम राम
- 1:15:15राम जगते रहो। तुम पांच इनाम जबते रहो, मुझे कोई
- 1:15:18आपत्ति नहीं कोई पगार लिए बिना एक पीरियड भी 30 मिनट का नहीं लगाता।
- 1:15:29मैं छह वर्ष से तुम्हारे साथ बोल रहा हूँ कारण क्या है?
- 1:15:36पगार तो मैं भी लेती हूँ, पगार लेता हूँ आनंद सारी रात सारे दिन
- 1:15:47आनंद की उस पगार को चुस्कियां भर भर के पीता हूँ जो परमात्मा ने
- 1:15:53मुझे ना जाने कैसे जन्म के। पुण्य कर्मों से दिया वह मेहरबान
- 1:16:00हुआ। सच्चा साहेब ये नजर करें टिकागो
- 1:16:05हंस कर उसने मुझे सत्य से परिचित कराया।
- 1:16:14उसने मुझे सत्य में आविषित किया, मैं बड़ी लुत्फ में आ गया।
- 1:16:20यह उसकी पगार थी, उसने ऑलरेडी मुझे पगार दे दी, इतनी पगार दे दी
- 1:16:27कि तुम कभी जिंदगी में कमा भी नहीं सकते और तुम्हारी पगार तो
- 1:16:30यहीं छूट जाए। मेरी पगार मेरे संग्रह की सदा।
- 1:16:42पाइएगा, अजी रूठ कर अब। जपो जपो नाम जपो पांच नाम जपो कौन
- 1:16:54कहता न जपो लेकिन ध्यान रखना जब तुम थक जाओगे शक्ति विहीन हो के
- 1:17:00एनर्जी लिस्ट में सो के तो मेरे ही पास आओगे मैं जानता हूँ।
- 1:17:10तुम्हारे नामों का हश्र क्या होगा?
- 1:17:12तुम्हारे नाम लेने में मेरे बोलने में भी शक्ति व्यय होती है।
- 1:17:19तुम जैसे सुख कहते हो, दट। इस एनर्जिलस्नेस हो चाहे
- 1:17:26ब्रह्मचर्य के खंडन होने से हो। चाहे नाम जप करने से आती हो, चाहे
- 1:17:33किसी भी चीज़ में तुम्हें सुख मिलता हो।
- 1:17:35दट इस एनर्जिलसनेस मैं सुख की बात ही नहीं करता।
- 1:17:41मैं बात करता हूँ आनंद की जो एनर्जिलसनेस से नहीं आता।
- 1:17:47जो अपने स्वभाव में प्रविष्ट होने से आती है जो आकाश के इन बादलों
- 1:17:54को उपेक्षित करने से आती है और तुम धीरे धीरे धीरे धीरे उस तत्व
- 1:18:01में पहुँच जाते हो। तो जो चाहो करो, इसलिए मैं हजारों
- 1:18:08मार्ग हजारों गुरु हैं और मैं खुद तो बोलता नहीं, मुझे आदेश है।
- 1:18:17सुई बालक। मेरा नाम जब्त है।
- 1:18:54जब तू है। ना में जब तू है।
- 1:19:03जा को। आप जब आयो हो ठाकुर, तुम शरिनाई।
- 1:19:17जब वह जपवाने लगे तुम में जपो वह कब होता है जब तुम्हें अपना
- 1:19:28अस्तित्व का तत्व वतल दिख जाता है, फिर याद आती है उसकी।
- 1:19:35जैसे तुम्हें तुम्हारी माशूका की या आशिक की याद आती है, वैसे ही
- 1:19:43फिर उस अवस्था में उसकी याद आती है।
- 1:19:46तुम याद नहीं करते और इसे ही बाबा कहते हैं।
- 1:19:53हे सच्चे पर्शा। हे शब्द पर दया करने वाली हे
- 1:19:59दिनों के नाथ मुझे भूल मत जाना इस आखिरी शब्द को ध्यान से सुन लेना
- 1:20:10सबना जिया का एक दाता है। सबना जिया का एक दाता शो में
- 1:20:18विसरण न जाए वह मुझे बोलना चाहिए। जब उसकी याद आने लगती है वो होता
- 1:20:31है। अजब बजाओ तुम नहीं जागते जैसे
- 1:20:36तुम्हें तुम्हारी मासूका की याद आती है आशिक की याद आती है और तुम
- 1:20:45कुछ नहीं कर सकते तुम बहुत धकेलने की कोशिश करते हो कि।
- 1:20:52किसी तरह भूल जाए, लेकिन नहीं भूलते ये को तुम बंद कर सकते हो।
- 1:20:59जिनके भी शुरू हुआ है, ज़रा बताओ मुझे क्या तुम इसे बंद कर सकते हो
- 1:21:05नहीं कर सकते यह बंद होता ही है। सब न जियाँ का एकता ता सो मैं भी
- 1:21:15शरण न जाए, वह मुझे न भूल जाए, मैं तो भूल भूल जाऊंगा।
- 1:21:19मैंने तो संसार के 1000 काम भी करना है, लेकिन वह मालिक तो सदा
- 1:21:27ही अपने में विद्यमान स्टेबल है। वह तो सदा से दृष्टता है, वह
- 1:21:35तुम्हारे किसी कर्म में इंटरफेरेन्स करता ही नहीं है
- 1:21:39क्योंकि अगर वो इंटरफेरेन्स से करेगा तो तुम्हारी स्वतंत्रता
- 1:21:43खत्म हो गई। वह तुम्हें स्वतंत्र रहने देगा।
- 1:21:49दो व्हाटएवर यू लाइक, लेकिन कर मन नेवाती का रस्ते यहाँ तक ही करने
- 1:21:59देगा तुम्हें मैं फली सू कदाचूँ आओगे तुम, मेरे पास ही पुत्र।
- 1:22:11चंगियाँ, वरियाईयाँ, वाच्य करमहतुर कर्मी।
- 1:22:17आपको अपनी के निर्णय कर तू जिन नाम से आया गए मशककत काल।
- 1:22:26जो विराट हो गया जिसने उस अनंत जिसका कोई परा वार नहीं है, उसको
- 1:22:35छू लिया उसमें समा गया जिन नाम से आया गए मशकतकाल सब बीड़ियों को
- 1:22:42तोड़ दिया उसने। सब मैल को उतार दिया उसने नानकते
- 1:22:50मुख उज्वल है उनका मुख उज्वल हो केटी छुट्टी नल और वो अकेले ही
- 1:23:06उज्वल नहीं होते बहुत सी जनता को। अपने जैसा ही बना देते हैं।
- 1:23:16आखिरी शब्द पारस और गुरुदेव में एक अंतरो जान पारस।
- 1:23:26और गुरुदेव में एक अंतरोजान वह लोहा कंचन करे पारस तो लोहे को
- 1:23:34सोना बना देता है, ये अंतर है पारस और गुरुदेव में एक अंतरोजान
- 1:23:42वह लोहा कंचन करे। गुरु कर ले आपसमान पार्स लोहे को
- 1:23:52पार्स नहीं बनाता, पार्स लोहे को सोना बना देता है, लेकिन गुरु
- 1:23:58गुरु की महिमा कथी ना जाए ताकि ये गल्ला कथिया ना जाए।
- 1:24:09गुरु तुम्हें पाराशर बना लेगा बस यही अंतर है।
- 1:24:20ठाकुर तुम सरना, ये यार। ठाकुर तुम सरनाई यार उतर गयो मेरे
- 1:24:43मन का आसन। मन का सं।
- 1:25:27जब ते दर्शन का जब ते दर्शन पा। जब तैं दर्शन प ठाकुर तुम सर आ आ
- 1:25:49आए हो? धन्यवाद।