Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Mar 26 - लीनता बनाम एकाग्रता: परमात्मा के मार्ग पर 'मिट' जाने का गुप्त रहस्य
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- 0:14कालिदास बाबा जी लीनता में और एकाग्रता में क्या फर्क है?
- 0:42लीनता में और एकाग्रता में क्या फर्क है एकाग्रता में तुम बचे
- 0:57रहते हो लीनता में तुम खो जाते हो।
- 1:11तुम बिज़नेस करते हो, व्यापार करते हो, लेकिन जूं ही व्यापार
- 1:18खत्म होता है, तो तुम दुकान बंद करके घर लौट जाते हो।
- 1:26व्यापार के क्षण के दौरान। तुम बीज़ी हो गए थे, व्यस्त हो गए
- 1:36थे और जैसी ही व्यस्तता हटी, तुम फिर अपने आप में आ गए।
- 1:50यानी व्यस्तता के बाद। कॉन्सेंट्रेशन के बाद एकाग्रता के
- 1:56बाद भी तुम बचे रहते हो जब तुम उस एकाग्रता से बाहर आते हो, लेकिन
- 2:08लिंगता लिंगता के बाद तुम बचते नहीं।
- 2:16जैसे पानी की बूँद समुद्र में लीन हो गयी उसके बाद वो तुम्हें मिले
- 2:24नहीं, वो लीन हो गयी। जैसे कहा जाता है कि मीरा भगवान
- 2:35कृष्ण की मूर्ति में वृंदावन में लीन हो गए फिर वो मिल गए जो लीन
- 2:44हो जाता है, वह नहीं मिलता। तुमने लीनता का अर्थ गलत ले लिया
- 2:51है, तुम लीनता को कॉन्सेंट्रेशन समझने लग गए हो, यही तुमसे गलती
- 2:59हो जाती है कॉन्सेंट्रेशन में तुम सिर्फ व्यस्त होते हो एक बिंदु
- 3:07पर। एक जगह एक व्यापार में किसी
- 3:11कारोबार में किसी झगड़े झूठे में किसी विषय में किसी आकार में,
- 3:20लेकिन व्यस्तता के बाद जब तुम उस व्यस्तता से बाहर आते हो।
- 3:27तो तुम बचे रह जाते हो तुम्हारी पूजा पाठ, सवर्ण जप, तप, अध्ययन,
- 3:39विषय, वस्तुएं सब व्यस्तताएं। तुम स्वर से प्यार पूजन करो या का
- 3:56मंत्र करो या कोई गायत्री अनुष्ठान करो।
- 4:04जब तक तुम वो करोगे तो व्यस्त रहोगे और जब वो समापन हो जाएगा तो
- 4:13तुम फिर वैसे ही रह गए, इसलिए मैं कहता हूँ तुम्हारी सारी पूजाएं।
- 4:24तुम्हारी सब प्रार्थनाएँ तुम्हारे सब अर्धा से तुम्हारे सब तीर्थ
- 4:33व्यर्थ हैं तीर्थ तो वह होता है जहाँ पर एक बार जाने के बाद।
- 4:46फिर से वापस नहीं आता। तीरथ एक बार जाया जाता है और वही
- 4:55बाबा कहते हैं तीरथ नाम जयते। सब आ गए।
- 5:01तुम क्या समझते हो? तीरथ जाने के बाद तुम नहार्द हो
- 5:08के साफ सुथरे हो के निर्मल हो के बाहर आ जाओगे नहीं तीरथ जाने के
- 5:17बाद तुम वापस नहीं भरतोगे। तुम गए फिर जो आया वह वो नहीं था
- 5:29जो गया था, लेकिन व्यस्तता के बाद लीनता के बाद।
- 5:39पूजा के बाद प्रार्थना के बाद अरदास के बाद तुम जैसे ही खाली
- 5:48होते हो तो तुम बिल्कुल वैसे ही बाहर आते हो जैसे गाय।
- 5:53थोड़ा फर्क गहरा है। समझना लीनता में तुम वापस नहीं
- 6:10आता, जैसे बूंद समुद्र में लीन हो जाते है।
- 6:19कहाँ बजती है? फिर तुम उस बूंद को किसी और बूंद
- 6:29से रेप्लस तो कर सकते हो की देखो ये बूंद मैंने ढूंढ ली लेकिन गलती
- 6:35मत खा जाना। यह वो बूंद नहीं होगी जो समुद्र
- 6:40में समाई हो गया। तुम भ्रम में डाल सकते हो लोगों
- 6:46को तुम नकली नकली समर्पण इसी तरह तो तुम करते हो भला समर्पण करने
- 6:55के बाद? कभी व्यक्ति वापस आया तुम्हारे
- 7:01समर्पण नकली हैं, असली नहीं हैं जैसे तुम्हारे पूजा के फूल नकली
- 7:09हैं प्लास्टिक की फैक्टरी में बनाए गए हैं।
- 7:16उनमें सुगंध नहीं आती, सुगंध भी तुम ऊपर से इतर छिड़कते हो, लेकिन
- 7:23वस्तुतः उनके भीतर से सुगंध नहीं आता।
- 7:29ऐसे ही तुम्हारी मैन मेड पूजाएं। भला ये पूजा करने का ढंग तुमने
- 7:36कहाँ से सीखा? किसी शास्त्र से किसी गुरु से,
- 7:48किसी महात्मा से किसी तथाकथित मार्गदर्शक, पाखंडी।
- 7:58हमारी सभी पूजाएं तुम्हारी सभी प्रार्थनाएँ व्रत क्योंकि पूजा
- 8:08प्रार्थना के बाद। तुम फिर फिर से वापस आ जाते हो।
- 8:16उसी तरह जैसे गए थे थोड़ा बारीक, थोड़ा महीन शांति से समझोगे तो
- 8:31समझाया जायेगा। तीरथ पर तुम एक बार चले गए, फिर
- 8:41तुम वापस नहीं लौटते, प्वाइंट ऑफ नो रिटर्न वापसी का कोई रास्ता
- 8:48नहीं जैसे तुमने इस समुद्र में चला।
- 8:53समुद्र की दलहटी के भीतर तुम चले गए फिर वहाँ से आना नहीं होता, बस
- 9:01तुम गए और गए के तुम वापस नहीं आते।
- 9:15लेकिन पूजा में प्रार्थना में, तुम वैसे के वैसे बाहर आ जाते हो
- 9:21जैसे इस स्नान में तुम वैसे के वैसे बाहर आ जाते हो जो धुल धवन
- 9:33से लगी थी। वह तुम नहीं थे, वह बाहर से ही आई
- 9:38थी ओह नहाने धोने में पानी के साथ बह गई, लेकिन तुम कहाँ गए?
- 9:47तुम तो वैसे के वैसे ही बाहर आ गए, तुम में तो कोई बर्बर्तन न
- 9:52हो। यही फर्क है कॉन्सन्ट्रेशन में और
- 10:02अलीनफा में क्लीन हो के व्यक्ति कभी वापस नहीं उठता है एकाग्र हो
- 10:10के व्यक्ति। वापस मुड़ता है और सदा फिर फिर से
- 10:14ही एकाग्र होता है। मैं तुम्हें यही समझाता हूँ कि
- 10:25तुम पूजाएं फरियादें। प्रार्थनाएँ छोड़ दो क्योंकि
- 10:37परमात्मा चापुलुसी का इच्छुक नहीं है, परमात्मा रिश्वतखोर भी नहीं,
- 10:47परमात्मा तुम्हारे भोगों का इच्छुक भी नहीं।
- 10:53वह तो इतना तृप्त है, जैसे भोग की इच्छा होगी, वह तृप्त कैसे हो
- 11:01सकता है? जिसकी भोगने की कोई इच्छा बाकी न
- 11:05रहे, वही तृप्त है। तुम लंगर में बैठे हो, तुम एक
- 11:17ग्रास और नहीं खा सकते और फिर तुम उठ जाते हो।
- 11:30फिर तुम क्यों कहे कि ग्रास और खा तुम कौन है?
- 11:35अब मैं और नहीं खा सकती। मैं तृप्त हुआ परमात्मा अगर
- 11:44तुम्हारी बहुत से पुजारी मुझे कह देते हैं कि वह तुम्हारी प्रसाद
- 11:52को सूँघता है सुगंध पृष्ठवर्धनम। तुमने तरीके बनाए हैं लोगों को
- 12:00ठगने के ठगे चले जाओ, लोगों का धन मार्ग लूट लोगे कल किसी और का था।
- 12:16आज उसका हो गया, अब तुमने लूट लिया फिर कोई तुमसे लूट लेगा यह
- 12:25सब डाकू है तुम्हारी तरह लुटेरे। सिर्फ एक ही व्यक्ति है जिसकी कोई
- 12:37चाहत न बची, जिसकी कोई वासना न बची भोगने, जिसकी कोई चाहत न बची
- 12:46और यहाँ तक की जीने की भी चाहत न बची, वो हुआ की नहीं हुआ बराबर।
- 12:54इसलिए हमने बुध को तथगथ कहा तथ आ गथ जैसे आया वैसे चला गया जैसे
- 13:06हवा का झोंका होता है। दिन में तुम्हारे पास से कितने
- 13:11हवा के झोंके गुजरे और चले गए? क्या तुम उनकी गढ़ती कर पाओगे?
- 13:20नहीं, उनका पता ही नहीं चलता कब वो आता है और कब चला जाता है
- 13:27तुम्हारे बदन से छूके। लीनता उस स्थिति का नाम है जब तुम
- 13:43प्रज्ञा में लीन हो जाते हो। उसे भगवान कृष्ण कहते है तो
- 13:47स्तिथि प्रज्ञा हो जा अपनी प्रज्ञा में लीन हो जाना और वह।
- 13:55सही प्रज्ञा वहाँ है, तुम खोपड़ी में प्रज्ञा को ढूंढ़ते हो।
- 14:02प्रज्ञा खोपड़ी में प्रज्ञावान व्यक्ति वह है जो अपने स्वयं में
- 14:11उतर जाता है। वही कृष्ण कहते हैं, तू स्थिति
- 14:16प्रज्ञा हो, वास्तविक प्रज्ञा में स्थित हो जा तुम्हारी खोपड़ी में
- 14:24जो प्रज्ञा तुम समझे बैठे हो, वह तो मात्र सूचनाएं जानकारियां हैं।
- 14:33इधर उधर से इकट्ठी की गई सचमुच में प्रज्ञा नहीं है वो सही
- 14:44प्रज्ञा वह जिसमें उत्तर के तुम सदा के लिए खोजा।
- 14:56उस प्रज्ञा में जाके तुम फिर लौटते तो हो लेकिन आमूल चूल पर
- 15:07वर्तित हो के लौटते हो, वैसे नहीं रहते।
- 15:11अगर डाकू गए थे तो लौटते हो दानी बनकर अगर काम ही गए थे तो लौटते
- 15:25हो ब्रह्म ब्रह्मचर्य होकर अगर लोभी गए थे।
- 15:33तो तुम लौटते हो परम वीर दानी बनकर अगर कायर कायर गए थे तो तुम
- 15:41लौटते हो साहसी बनकर वो ही नहीं लौटते जो गए थे।
- 15:47हाँ, मूलचूर परिवर्तन टोटल ट्रांसफॉर्मेशन तुमने पूछा पुत्र
- 16:00बिज़नेस कॉन्सेंट्रेशन। और लीन तन भेद क्या है?
- 16:15जब तुम जैसे गए थे वैसे बाहर न आप तो समझो तुम लीन हो।
- 16:25जब तुम जैसे ही गए थे वैसे ही वापस लौट आओ, तो समझो कि सिर्फ
- 16:33तुम कॉन्सेंट्रेट हुए सिर्फ तुम व्यस्त हुए कुछ देर के लिए और कोई
- 16:43रूपांतरण न हुआ है। व्यस्त होने में कोई रूपांतरण
- 16:47नहीं होता, लेकिन लीन होने में जब तुम अपने अंतरस में जाते हो, अपनी
- 16:56प्रज्ञा को छू लेते हो तो आमूल चूर परिवर्तन हो जाता है।
- 17:04फिर तुम वैसे नहीं रहते जैसे गए थे।
- 17:10बिल्कुल बदल जाते हैं। बाबा नानक केली नदी के किनारे
- 17:21बैठे हैं अपने शिष्य के साथ समझ। 3 दिन तक उस नदी में से बाहर नहीं
- 17:39निकला। लोगों ने बहुत खोजा, कहीं नहीं
- 17:44मिले। लेकिन 3 दिन के बाद अचानक नानक
- 17:52प्रकट हो गए और उनकी जुबान से पहला शब्द निकला एकोंका।
- 18:07और हम आज तक नहीं समझ पाए कि वह जो पहला पहला शब्द निकला था एक
- 18:17ओंकार है, उसका अभिप्राय क्या है? उसका मतलब कुछ नहीं है।
- 18:26उसका अभिप्राय क्या है? बाबा नानक ने कहा, मैंने जो देखा
- 18:38तो यह देखा कि वह सब जगह एक ही है।
- 18:45दूसरा पुल क्या तुमने उनकी बातों की कदर की?
- 18:59वह जीस, गहरे समुद्र के आनंद का रश्मि के चले आ रहे थे क्या
- 19:07तुमने? उनकी अमृत वाणी को अपने बेहतर
- 19:15समाने दिया। उन्हें बाबा कहते हैं एक।
- 19:30इसके कई अर्थ हैं अगर तुम कई डाइमेंशन से देखो यानी एक जहाँ
- 19:39कोई शत्रु नहीं है और बात भी ठीक है, जहाँ एक होता है वहाँ कोई
- 19:47शत्रु नहीं होता। तो उन्होंने कहा, निर्भय जहाँ एक
- 19:55होता है वहाँ कोई डर नहीं होता क्योंकि डर किस से करोगे।
- 20:07उन्होंने कहा, निरहपूर्ण। जहाँ एक होता है तो वह एक किस से
- 20:17जन्म लेता है। वह तो दूसरा हो गया जिससे जन्म
- 20:22लेगा तो उन्होंने कहा, सैथम खुद ही से प्रकट हो।
- 20:36जो सब में ही दिखाई पड़ेगा। सब योनियों में दिखाई पड़ेगा।
- 20:43ऐसी वस्ता मेरे पर 3 दिन आई थी जब मैंने सूअर को गले लगा लिया था।
- 20:57मुझे हर तरफ वो ही वो नजर आता था लेकिन जिनको सूअर नजर आता था और
- 21:10मैं भी नजर आता था, उन्होंने मुझे हटा लिया।
- 21:14जा के नहलाया धुलाया नए वस्त्र डलवाए, डेटोल की साबुन से नहाया,
- 21:21फिर महारानी संदल से नहलाया लेकिन उन तीन दिनों की स्मृतियां मुझे
- 21:31नहीं पता इसलिए बाबा। तो मैं उन तीन दिनों की स्मृति
- 21:41नहीं बता पाएंगी। उन तीन दिनों में क्या हुआ?
- 21:49हाँ, उन तीन दिनों के बाद जो देखा उसकी हल्की हल्की खुशबू आदमी साथ
- 21:57लिखे आता है। तो बा बा कहते हैं एक कोणकार सत्य
- 22:01नाम करता पुरुक वो ही करता है विज्ञान का जन्म यहाँ से होता है
- 22:14जब व्यक्ति कहता नहीं मैं करता हूँ।
- 22:20बिना अपनी औकात जान जब व्यक्ति कहता है नहीं मैं करता हूँ ये
- 22:29देखो मैं हाथ हिला रहा हूँ मैंने ये तो किया देखो मैं बोल रहा हूँ।
- 22:40मैं ही तो बोल रहा हूँ यहाँ से विज्ञान की शुरुआत होती है, यहाँ
- 22:50से द्वैत उत्पन्न होता है, तुम गलती खा गए हो।
- 23:00तुम कहते हो हमने अस्वीकार किया बाहर गर्मी है भीतर हम
- 23:06एयरकंडीशन्ड रूम में हैं, तुम गलती में हो तुमने अपनी इमेनिटी
- 23:12खोदी। पशुओं के भीतर इतने मैनिटी है कि
- 23:23उसे गर्मी भी नहीं लगती, उसे सर्दी भी नहीं लगती, उसे भूख
- 23:29प्यासी लगती है तो तुम कहते हो कि साइंस ने बड़ी तरक्की की, ज़रा
- 23:39बताओ क्या तरक्की? मैं पूछ लेता हूँ बड़े बड़े
- 23:43वैज्ञानिक भी आते हैं मेरे पास, क्योंकि अपने भीतर कौन नहीं जाना
- 23:48चाहेगा बाहर सब मिल जाएगा, सुख मिल जाएगा।
- 23:56सर्दी है तो रूम हीटर मिल जाएगा। गर्मी है तो एयर कंडीशन मिल
- 24:01जाएगा, अच्छे पिल्लो मिल जाएंगे, अच्छे बेड मिल जाएंगे, डिस्टिल्ड
- 24:09वाटर मिल जाएगा, सब मिल जाएगा, लेकिन उसका क्या होगा जो सब पाने
- 24:17के बाद भी तुम्हारे भीतर? एक चीज़ रखती रहेंगी अभी से तुम
- 24:26जान न पाओगे यह तुम जानोगे तब जब तुम सब कुछ भोग लोगे, जो तुम्हारे
- 24:36पास है। और पाओगे की प्यास तो वही की वही
- 24:45रही जो भोगने से पहले जितनी थी, उतनी ही रही।
- 24:50ये बड़े मज़े की बात है, तुम समझते हो शायद?
- 24:56परमात्मा की याद संसार को भोगने के बाद कुछ कम आएगी नहीं तो गलती
- 25:11में बात तो बिल्कुल उलटी है संसार को भोगने के बाद।
- 25:20परमात्मा की ज्यादा आया करते हैं। बिरहा मीरा के भीतर ज्यादा जन्म
- 25:31लेता है बिरहा बुद्ध के भीतर ज्यादा जन्म लेता है।
- 25:36महावीर के भीतर 24 तीर्थ अंकों के भीतर सभी राजा हैं।
- 25:42जनक के भीतर 19 के 19 जनकों के भीतर क्या हुआ वेक जीना सा आशा का
- 25:52पर्दा? के पदार्थों में सुख है।
- 26:00ये बड़ी सी कार बैठने को मिल जाए तो सुख सुख मिल जाएगा, लेकिन तुम
- 26:10बड़ी कार में भी बैठ लेते हो। ये हेलिकॉप्टर में उड़ जाऊं?
- 26:16ये जहाज पर उड़कर विदेश चला जाऊं वहाँ की, पर नाली बहुत अच्छी है
- 26:28मनेजमेंट तो फिर सुखी हो जाउंगी नहीं तुम गलती में।
- 26:39बड़ी कार में बैठने से हेलिकॉप्टर में उड़ने से, हेल जहाज में उड़ने
- 26:45से विदेश में जाने से बाहर की प्रनालियाँ बदलने से।
- 26:53तुम उस सुख को ग्रहण नहीं कर पाओगे।
- 26:59तुम्हे एक बात बताऊँ, जीस व्यक्ति को सरकार सजा दे देती है, उम्र
- 27:10कैद कर देती है, वह है धन्यवादी। बशर्ते के उसको सही गुरु में जाए।
- 27:21इन पाखंडियों को कथा कहने के लिए मत भेजा करो।
- 27:27ये अनरुद्ध आचार्य वगैरह ये तुम भेज देते हो कहानियों कहने के
- 27:32लिए। वो बेचारे दुखी हैं।
- 27:36यह एक अपूर्व मौका दिया है पर मत मने अगर तुम नाजायज फंसे हो तो
- 27:47अगर जायेंगे फंसे हो तो फिर तो तुम दुखी रहो।
- 27:52क्योंकि कर्म पूरे हैं। कर्मों का एक्शन का रिएक्शन आए,
- 27:58लेकिन अगर तुम पे नाजायज़ जैसे ईसा मसीह पे नाजायज़ मुकदमा चलाया
- 28:07क्या? क्रुसिफाइ किया गया, सलीम दे दी
- 28:16गई। अगर किसी व्यक्ति को नाजायज जेल
- 28:23हो जाती तो ध्यान रखना उसके अच्छे दिन उदय हो गए।
- 28:29नहीं नहीं, मेरा दिमाग बिल्कुल ठीक है।
- 28:35क्यों? क्योंकि अब तुमने कुछ नहीं करना
- 28:39है और यही मैं चाहता हूँ कि एक बार भी अगर तुम कुछ न करने में आ
- 28:49जाओ। तो तुम अपने भीतर उतरना शुरू हो
- 28:53जाते हो, तो तुम संसार में तो अपने आगे से तो अपनी इच्छा से तो
- 28:59अपने भीतर नहीं उतरोगे क्योंकि मन है मन कहेगा चलो और नहीं तो
- 29:08ताजमहल ढूंढ अब। सातवाँ अजूबा है।
- 29:1320। ऊपर मन कहीं ना कहीं भटकता रहेगा,
- 29:21लेकिन अगर सरकार ही तुम्हें दंडित करके कह दे कि तुम उम्र कैद हो और
- 29:27तुमने कोई गुनाह न किया। तो उससे बढ़िया मौका तुम्हारे पास
- 29:36नहीं है किसी प्रबुद्ध व्यक्ति को भेजना, वह उन्हें 1 दिन में बता
- 29:48देगा सारा फार्मूलेशन। कि तुम अपना पूरा वक्त कैसे इस
- 29:57मानव के जामे का लाभ उठा सकते हो बड़ा उलट सा बात है, तुम जीसको
- 30:04दंड समझते हो। वह उसके लिए उपहार बन के आएगा।
- 30:12बाहर तुम घर में बैठे हो कैद तो मैं यहाँ भी हूँ, लेकिन अपनी
- 30:17मर्जी से कैद मैं चाहूं तो बाहर जा सकता हूँ।
- 30:26लेकिन जेल की कोठरी में बंद अगर तुम चाहो कि मैं थोड़ा बाहर घूमा,
- 30:34तो तुम चाहते हुए भी जाना सकोगे। यू अरे बैड वहाँ मजबूरी है।
- 30:46और अगर तुम गलत फंसा लिए गए हो, तुम्हारा कोई कसूर नहीं, अब देखो
- 30:54बोलने की आज़ादी है हमें हम बोलते हैं।
- 31:02बोलना कोई गुणा तो है, किसी का चैनल बंद कर दिया जाए, किसी का
- 31:08फेसबुक बंद कर दिया जाए, हम बोल सकते है गलत मनेजमेंट के विरुद्ध
- 31:20हम बोल सकते। हमने ही तो वोट दिया है और वोट
- 31:30दिया है कि हम आजाद रहे हैं, वोट का मतलब समझो।
- 31:38वोट का मतलब है कि हमने जिसे वोट दिया है वह हमारी आज़ादी पर आंच
- 31:45नहीं आने देगा इसलिए वोट दिया और अगर सरकार जीसको हमने वोट दिया वो
- 31:54हमारी आज़ादी को प्रताड़ित करने लगे।
- 31:57फिर क्या होगा? और नाजायज प्रताड़ित करने लगे।
- 32:02फिर क्या होगा? तुम कानून बनाते हो, इसका मतलब
- 32:10तुम कोई भी तो कानून बना दो, ये ठीक नहीं है, तुम कल को कानून बना
- 32:17सकते हो। कि जो स्वास्थ्य लेगा वह दंडित
- 32:24किया जाएगा। बना सकते हो कोई पागलों के सींग
- 32:29थोड़े ही होते हैं, पागलों के भी वैसे ही होता है सर सींग नहीं लगे
- 32:34होते। और ऐसे बहुत से नियम बनाए जा चूके
- 32:38हैं जो कि हमारे ही द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों ने बनाये थे।
- 32:50मैं सदा ही बोलता हूँ, पक्ष के हूँ, विपक्ष के हूँ।
- 32:57जीतने, लोकसभा और राज्यसभा में लोग बैठे हैं।
- 33:04मूर्ख महामूर्ख सब गधे क्यों? क्योंकि भगवान कृष्ण के शब्द कहते
- 33:18हैं, तुम किसी की जुबान को मत देखना कि वह क्या बोल रहा है और
- 33:24बड़ा शानदार सवाल है और मैं बार बार बोलता हूँ तुम लक्षणों को
- 33:30देखना। तुम ये मत दो देखना कि कोई लीडर
- 33:40तुम्हें आके ये कहता है कि मैं ये कर दूंगा, मैं वो कर दूंगा, मैं
- 33:45वो कर दूंगा जैसा हमर प्रधान सेवक महो देने का।
- 33:56अब ऐसे तो कोई भी वैसा अपने कोठे को तीर्थ का नाम दे सकती है।
- 34:03उसके लिए तो वो तीर्थ ही है। अरे वह तो तुम्हारी मर्जी है
- 34:14क्या? नाम बदलने के लिए जिनका देश है,
- 34:19उनसे आज्ञा लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए?
- 34:24अगर यह तीर्थ है तो फिर गंगोत्री जाकर हमने करना क्या है?
- 34:31फिर तो हम यहीं जाने का कोई जुगाड़ उठाएं।
- 34:37इसलिए मैं इन लोगों को मोर खराता हूँ तो फिर अगर सारी जनता ने यहीं
- 34:43जाने का जुगाड़ बना लिया हो फिर तुम बुद्धू नहीं हो तो और कौन?
- 34:51तुम्हें जनता कॉलरों से पकड़कर बाहर निकाल देगी तीर्थ पे तुम्हें
- 34:55अकेले बैठने का अधिकार थोड़ी हम भी तो तीर्थ का मज़ा लेना चाहते
- 35:00हैं हम तो हम भी तो तीर्थ में अपने पापों का गुनाह मैल धोना
- 35:08चाहते हैं। तुमने बहुत धो लिए जाओ बाहर अब
- 35:12हमे धो लेने दो गुनाहगार तो हम भी है।
- 35:33अहले वफा कण हम भी खड़े हुए गुनाहगार।
- 35:52की तरह मैं जरूर लिख रहे हैं अहले वफा का नाम, हम भी खड़े हुए हैं
- 36:05गुनहगार की तरह। लेकिन जेल की कोठरी में तुम चाहो
- 36:21तो बाहर नहीं जा सकते, वहाँ तुम्हारा मन ठहर जाएगा और ये बहुत
- 36:31बड़ी उपलब्धि है। मन का ठहर जाना।
- 36:37तुम अगर किसी की किताब पढ़नी हो जीसको जेल होगी और वह अपराधी हो
- 36:49तो उसकी जेल में लिखी हुई किताब को पढ़ना, ये तुम्हें एक अमूल्य
- 36:54सूत्र नहीं चला। अगर किसी ऑथर की किताब पढ़नी है
- 37:03तो अगर वह किताब उसने जेल के अंदर लिखी है तो वह पढ़नी है क्यों?
- 37:09क्योंकि वह ज्यादा ऑथेंटिक होंगे। जेल में व्यक्ति का मन ठहर जाता
- 37:16है क्योंकि बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं रहता।
- 37:23बाहर से कोई रास्ता करने का मतलब नहीं रहता तो उसका मन।
- 37:31ठहर जाता है और कोई उपाय बचता भी नहीं।
- 37:36उस कंडीशन में उस मनोदशा में वह जो दिखेगा वो ठहराव के पलों में
- 37:42लिखेगा और ठहराव के पलों में हमेशा सत्य लिखा जाता है।
- 37:51ठहराव के पलों में असत्य लिखा ही नहीं जाता तो मैं तुमसे एक सूत्र
- 38:00देकर चला अगर तुमने किसी ऑथर की किताब पढ़नी।
- 38:07तुम किसी विशेष औथर से प्रेम करते हो और अगर उसे ऐसे पल बिताने का
- 38:14मौका मिला कि उसे जेल हो गई और जेल में उसने किताब लिखी तो वह
- 38:19किताब अवश्य पढ़ें। क्यों उसमें ठहरने के मुकाम आएँगे
- 38:25बार बार? और ठहरने के मुकाम आते आते तुम
- 38:34ठहरना सीख जाओगे, यह उस परमात्मा की कृपा से आया हुआ मुकाम है।
- 39:00जब कहीं और जाने का मन तुम करना भी चाहोगे तो बंदिश हो गया बड़ा
- 39:08शानदार मुकाम आ गया साधना के लिए। तुम चाहोगी तो बाहर तुम्हारा मन
- 39:21करे भी तो तुम जा नहीं सकते एक मजबूरी आगे आज बिलकुल नया पाठ।
- 39:35और व्यक्ति का मन ऐसा है कि मजबूरी के बिना वो भीतर नहीं
- 39:42उतरता इसलिए जीतने भी संत हुए वो किसी ना किसी रूप में।
- 39:53एक प्रकार से बंदीगृह से आए हुए थे अनीता बुद्ध को आंधी रात में
- 40:04घर से भागने की जरूरत नहीं थी। बुद्ध ने अपना घर अपना महल।
- 40:16अपनी जमीन जायदाद अपना पुत्र, अपनी पत्नी, अपना पिता, अपने धन
- 40:27दान न हीरे जवाहरात मोती मुनिया उनकी कीमत चाहे कुछ भी रखे।
- 40:36लेकिन बुध का भीतर अपने आपको कारागृह में सम रहा था, तुम्हें
- 40:45पता नहीं। बुध के पिता ने बुध को बिलकुल
- 40:52वैसे ही रखा जैसे सरकार। कैदियों को कैद में रखती है तुमने
- 41:02बुद्ध की जीवन गाथा गौर से नहीं पढ़ी होगी।
- 41:06ऊपर ऊपर से पढ़ रही होगी लेकिन जो उस स्तर पर पहुँच जाता है।
- 41:17उसका पढ़ना सुनना किसी और तल से होता है।
- 41:22तुम्हारे इस तल से नहीं होता। बहुत ने पाया कि मैं तो कारागृह
- 41:32में आज प्रथम बार पता चला कि मौत भी होती है।
- 41:42और हैरानी की बात के 29 वर्ष की उम्र तक मुझे ये भी नहीं पता चला
- 41:50कि आदमी मरता भी है, बीमार भी होता है।
- 41:56आदमी के रीढ़ की हड्डी झोंक भी जाती है, कमजोर भी होता है।
- 42:02नहीं पता था धरती का सबसे बड़ा अजूबा अगर कहीं देखना हो तो वह
- 42:10बुद्ध का जीवन देख लें। सूरज निकलने से पहले मुरझाए हुए
- 42:17फूल और पत्ते चुग लिए जाते थे, क्योंकि आदेश था राजा का,
- 42:35शुद्धोधन का हुक्म था। के राजकुमार को मृत्यु का आभास
- 42:46होना नहीं चाहिए क्योंकि जब जन्म हुआ बुध का तो हिमालय से ऊपर से
- 42:56उतर के। प्रबुद्ध पुरुष आए।
- 43:02उन्होंने कहा, यह या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा, यह फिर चक्रवर्ती
- 43:10संत बनेगा। तो शुद्ध दो धन का अंतर कांप गया।
- 43:20उसने कहा साधु मेरा अकेला बेटा है, राज़ काज कौन संभालेगा?
- 43:32तो उसने आदेश जारी किया अभी बच्चा नहीं था।
- 43:43के इसके जगने से पहले कोई फूल मुरझाया हुआ ना दिखा।
- 43:50पतझड़ के मौसम में कोई पत्ता झरा हुआ नीचे घरा ना मेरा।
- 44:02कोई पीला पत्ता ना मिले, बाहर ही बाहर हरियाली ही हरियाली नजर आई।
- 44:09कोई मृत्यु का साया भी ना पड़े क्योंकि उसे समझाए गए थे सब।
- 44:17कि इसे मृत्यु का एहसास न होने देना।
- 44:21अगर मृत्यु का एहसास तुमने होने दे दिया, फिर यह विरक्त हो जाएगा।
- 44:32लेकिन उसे यह नहीं पता था। की अगर ज्यादा भोग लिया जाए और
- 44:40अच्छा ही अच्छा भोग लिया जाए तो भी व्यक्ति भक्त हो जाया करता है।
- 44:46यह अष्टावक्र का सूत्र है, ये जनक का भी सूत्र है।
- 44:55अगर इतना भोग लिया जाए के भोगने से मन उगता जाए तो तुम बहुत जल्दी
- 45:04वक्त हो जाओगे। यही कहते हैं, स्टवक्र।
- 45:12भोगने से दुख मिलता है। भोगने से कभी सुख नहीं मिला।
- 45:17तुम्हें लगता है सुख जैसा ऐसे तो तुम्हें खारिश हो जाए, तो तुम
- 45:27खारिश कर के देखना। तुम्हारी चमड़ी उजड़ जाएगी, खून
- 45:32निकलने लगेगा तो तुम्हे मज़ा आएगा।
- 45:35मेरा एक मित्र कहा करता था, उसने शादी नहीं कराई, मैंने कहा तुमने
- 45:42शादी नहीं कराई, मैं तो किसी कारण से शादी नहीं कराई।
- 45:48मैं तो जीवन का सत्य देखूंगा, अगर दिख गया फिर करूँगा नहीं तो नहीं
- 45:53करवाऊंगा तो कहता कि मेरा फॉर्मूला दूसरा है।
- 45:59कहता क्या? वो बोला कि मेरा फॉर्मूला ये कि
- 46:05जब मुझे शादी कराने की इच्छा होती।
- 46:08तो मैं अपने आपको खारिज कर लेता हूँ, खारिज का रोग लगा लेता हूँ,
- 46:13फिर मैं ज़ोर ज़ोर से उसको खारिज करता हूँ।
- 46:16लहू निकल आता है तुम्हारा मज़ा वहाँ क्या करेगा तो खारिज हो जाये
- 46:25शादी हो जाये। खारिक से में मज़ा ज्यादा आता है
- 46:31ऐसा मत करो। ये बातें सत्य की कसूटी पर खरे
- 46:37उतरती हैं। इसलिए तो तुम इतनी खारिज करना
- 46:40चाहते हो बड़ा मज़ा आता है खरज किए जाओ, खरिज किए जाओ और ये जो
- 46:46तुम करते हो। ये तुम्हें पता नहीं है, ये खारिश
- 46:50ही है, ये खारिश ही बुझाते हो, तुम खारिश, वो हज से करो या गुप्त
- 47:03अंगों से करो होती खारिश ही है। ज्यादा भोग लिया जाए तो बैराग
- 47:14किया जाता है। भोग से दुख मिलता है, दुख से
- 47:18वैराग्य होता है, बैराग्य से मुँह मुखसा जन्मती है कि है तो कुछ है
- 47:24नहीं। बंधन नजर आने लगे तो इन बंधनों को
- 47:30कैसे तोडूं तो अष्टाबकर कहते हैं कि जब मुँह बख्शा ने जन्म लिया तो
- 47:39फिर तुम मुक्त होने के साधन खोजने लगोगे।
- 47:44अभी तो लोग नाम दाम ले आते हैं। मुक्त होने की इच्छा भी उठी नहीं,
- 47:51प्यास से जगी ना हो और पानी का ग्लास पीने का फायदा क्या है?
- 48:00बस ऐसा ही है मेरा नाम। मेरे पास लोग आ जाते हैं।
- 48:05प्रश्न पूछे लगते हैं, अंट शंट प्रश्न पूछे जाते हैं और मैं तो
- 48:12इंतजार ही करता हूँ क्योंकि मैं संख्या घटाने के मूड में रहता
- 48:16हूँ। गाहे बगाहे संख्या ज्यादा हो जाती
- 48:22है और मुझे एक सबक बाबा ने दिया कि गुरु को उतने ही विद्यार्थी
- 48:30रखने चाहिए जितनों को वो पहुंचा सकते हो, जितनों को वो।
- 48:38ज्ञानत्व तक ले जा सकता हूँ, ज़्यादा भीड़ भाड़ इकट्ठी मत
- 48:44करना, फिर तो तुम राजनीतिक हो जाओ, फिर तो तुम डेरे वाले बन
- 48:52जाओगे, मैं समझ गया बाबू ने कहा। तुम कम्यून मत बनाना, लेकिन ऐसा
- 49:05भी ना कोई प्यासा वापस चला जाए। आज बहुत से लोग जिनको मैं आहत
- 49:13करना चाहता हूँ और जीसको आहत करना चाहता हूँ।
- 49:17उसको वह बचाना चाहते हैं, यही तो रोग है इसी रोग से मैं तुम्हें
- 49:26मुक्त करना चाहता हूँ, तुम अपने अहंकार को बचाना चाहते हो, मैं उस
- 49:33तुम्हारे अहंकार के ऊपर घाने चलाना चाहता हूँ।
- 49:39फिर जब मैं घण मारता हूँ तो तुम पूछते हो के बाबा मैं तुमसे
- 49:46पूछुंगा कि तुमने मुझे क्यों कहा कि तुम तो गए?
- 49:55जब तुम अपने आप को बचाने में कोई कोर कसर बाकी न छोड़ोगे तो फिर
- 50:01मुझे गाने ही तो फेंकना पड़ेगा। मेरा परिश्रम व्यर्थ गया।
- 50:13अगर तुमने ये सवाल कर लिया जिसमें ये बू नज़र आई कि तुम अपने अहंकार
- 50:22को बजाना चाहता हूँ, बस मुझे थोड़ी सी बू आनी चाहिए, फिर मैं
- 50:29माथा कपाई क्यों करूँगा? फिर माथा कपाई करूँगा, राहतें और
- 50:37भी हैं बसल की राहत के सिवा और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के
- 50:45सिवा बहुत से प्यासे कतार बांधे बाहर खड़े।
- 50:52और मैं जानता हूँ और मैं एक भी मौका चूकना नहीं चाहता।
- 50:58ऐसा व्यक्ति मिल जाए जीसको प्यास जगी ना हो और मुझे समझ आ जाए
- 51:05वाक्य ही इसको प्यास नहीं जगी। तो मैं तुरंत ही अपना गढ़ फेंक
- 51:10देता हूँ एक तरफ कि भाई तू तो जा मैं व्यापारी थोड़े व्यापारी
- 51:19ग्राहक को दूर से बुलाएगा, आजा आजा इधर ही है आश्रम इधर ही है।
- 51:31लेकिन मेरा मसला थोड़ा उल्टा है। मैं प्यासों को तो गले से लगा
- 51:41लूँगा? मैं प्यासों की तो प्यास बजा
- 51:47दूंगा, क्योंकि वह प्यासा है और प्यासा जब तृप्त हो जाएगा उसकी
- 51:54आत्मा से शांत आनंद की धारा बहेगी।
- 52:05तो मुझे भी आनंद मिलेगा क्या? आज एक व्यक्ति मेरा प्रयास सफल कर
- 52:16गया और अगर मुझे पता चले मुझे भू आ जाए कि मेरा प्रयास कितना भी
- 52:24मैं कर लूँ। घण उठा उठा के घण बहुत भारी होता
- 52:28है अपने हाथों को थकाना व्यर्थ है इनके लिए तो फिर मैं कहूंगा अभी
- 52:38तू तो क्या जा तू कल मैं ब्लॉक मार दूंगा।
- 52:45बहुत से लोग आजकल बच्चों को चैट करने की आदत बहुत है, पर मुझसे भी
- 52:54वही फॉर्मूला आजमा लेते हैं। चैट करते करते।
- 53:02एक लड़की मुझे कहने लगी, अच्छा मुझे ये बताओ कि मैं कहाँ बैठी
- 53:06हूँ, मैंने अंगूठा लगा दिया। अब साल बीत गया कि दो बीत गए कि
- 53:14तीन बीत गए, अब वो रोज़ पीटती है कि बाबा गलती हो गई, मैंने कहा
- 53:20मैं तो समझ गया। अब तो गलती हो गई तो हो गई, अब
- 53:26मेरे से सही हो गया, तुमने गलती कर दी, अब मैं गूढ़ा बाबू से नहीं
- 53:34हटा, मुझे पता चल गया जीसको व्यास नहीं है।
- 53:46जो शीश तली पे धर न सके वो प्रेम गली में आयक जो शीश तली पे धर न
- 53:58सके वह प्रेम गली में आयक। फिर तुम मुझसे प्रश्न पूछते हो तो
- 54:09सन्तो तुम्हारे प्रश्न का जवाब दे सन्तो कर मने की गति ना।
- 54:25संतो कर्मणे की गति ना पू जल पंख। दिए।
- 54:44हसन को उज्ज्वल पंख दिए। हसन को कोयल?
- 54:59कहिविधिका संतो कर मन की गति ना पू जल।
- 55:16पंख दिए हसन को कोयल की गति। कोयल की गतिकारी संतो संतो, कोयल
- 55:46के विधिका संतो। कर मन की है घती ना तुम पुष्ट हो
- 56:01से कभी अपने भीतर भी झांक के देख लिया करो।
- 56:10कृष्ण ने कहा आखिर में आतंक बनी गवाह।
- 56:15अपने भीतर झांक के देखो मुझसे पूछने वालों के तुम तो गए, प्यास
- 56:23उठी थी या वैसे ही चले आए थे, कहे सुने से किसी ने कह दिया होगा?
- 56:34तुमने सुन लिया होगा और तुम चले आये होगे नहीं, पहले प्यास जगाओ,
- 56:44प्यास को जगने दो, प्यास को जगाने वाली चीज़ नहीं है, प्यास जगा
- 56:51करती है सौते। तुम्हारे जगाने से कभी प्यास नहीं
- 56:55जगती प्यास को जगने दो मेरे पास पानी है शीतल फिर आ जाना फिर मैं
- 57:08स्वतः ही बना लूँगा। ऐसे लोगों को मैं इंतजार करता ही
- 57:13रहता हूँ। मैं मैं प्रतीक्षा रत हूँ पहले
- 57:21तुम प्यास पैदा करो, इंतजार करो, मेरी पुकार ततक्षण चली जाएगी।
- 57:33ज़रा भी देरी नहीं करूँगा। बुद्ध को जेल की तरह रखा गया तो
- 57:51वैराग्य पैदा हो गया। बुध भाग गए वहाँ से।
- 58:03तुमने जेल से भाग कर लोग तो देखे होंगे, भागते लेकिन तुमने महलों
- 58:11से भागते हुए लोग शायद धरती पे बहुत कम हुए हुए तो हैं।
- 58:21भर्तृहरि हुए बुद्ध हुए महावीर हुए सभी 24 के 24 तीर्थंकर हुए।
- 58:32भरे पूरे राजघरानों में थे और घर से भाग गए।
- 58:38ये सिलसिला शुरू हुआ ऋषभदेव से मन्नू की पांचवीं पीढ़ी और
- 58:47सिलसिला चलता ही गया। जनक भी भागते हैं।
- 58:55अष्टावक्र के पास वो ये नहीं देखते कि इसका शरीर आठ जगह से
- 59:00टेढ़ा मिला है। यह चलता है सर्कस करता है लेकिन
- 59:06उसके पांव पकड़ लेता है, मैं उसकी चाल ढाल नहीं देखता।
- 59:17और प्यासी हैं और प्यासा व्यक्ति गुरु की चाक थोड़ी दिखा करती है।
- 59:26प्यासा व्यक्ति तो गुरु के चरण पकड़ता है तो कृष्ण ने कहा आत्मा
- 59:37बने ग्रह। अपने भीतर झांक के देखना क्या
- 59:42झांक के देखना ये तुमको कभी किसी गुरु ने बताएं?
- 59:48प्यास जगी है कि नहीं जगी है। कहीं ऐसे ही तो नहीं चले गए?
- 59:55फिर इससे अच्छा तो घर में ही बैठे रहते हैं।
- 59:59चार पीसे ज्यादा कमा लेते वैसे भी तो डेरों में बैठे बैठे।
- 1:00:04तुम्हारा मन दुकान में अटका रहता है, चार गज कपड़ा ही बेच लेते।
- 1:00:17कोई पापुलीन का ग्राहक न मुड़ गया हो, कोई चुन्नी दुपट्टा लेने न आ
- 1:00:26गया हो, कोई ग्राहक मुड़ न गया हो, डेरो में भी तुम क्या करते
- 1:00:32हो? मन तो चला यमान रहता है।
- 1:00:39माला तो कर मैं फिरै जीभ फिरै मुखमा मनीराम चहुति सू फिरै यह तो
- 1:00:49सुमरण। मैं तुमसे कहता हूँ मैं व्यापारी
- 1:01:02में हूँ और ना ही मुझे तुमसे कोई लोभ है।
- 1:01:14ना ही मुझे की कोई वासना की तृप्ति करनी है मैं तो वो गगरिया
- 1:01:26हूँ जो इतनी भर गई है के गगन मंडल से आता हुआ अमृत का यह टूटा हुआ
- 1:01:36बांध। इस गग्घरिया को छंद कहा जाता है
- 1:01:43पर वह अमृत होता है जो इसकी इज़्ज़त में आ गया हो।
- 1:01:53उसकी प्यास बज जाएगी। यह है फार्म और जिस्म गगरिया के
- 1:02:05भीतर यह समुद्र उतरा वह जिसे छू देगा निश्चित रूप से।
- 1:02:16वह सब जंजीरों को तोड़ देगा, लेकिन बस एक गुजारिश जब मैं घणु
- 1:02:22उठा लूँ, तो तुम इन जंजीरों को टूटने देना, तुम हाय दोगा मत करना
- 1:02:32क्योंकि मैं तुम्हारी जंजीरों को दौड़ रहा हूँ।
- 1:02:36मेरी जंजरे तो बहुत बैले टूट गई, मैंने आजादी का स्वाद चख लिया और
- 1:02:46मैं चाहता हूँ कि तुम भी आजादी का स्वाद चखो।
- 1:02:51और अगर तुम अभी खोपड़िया बाकी है तो फिर तुम अभी झुंझुरू में रहना
- 1:02:59चाहते हो फिर तुम्हे प्यास से लगे फिर तुम बंधे रहना चाहते हो बात
- 1:03:06तुम मुक्ति की करते होगे। बिलाशक।
- 1:03:10लेकिन ध्यान रखना शब्दों से भावना ही ज्यादा गहरी होती हैं।
- 1:03:16भावना यही होगी कि हमने भोगना है मुक्त नहीं होना है, तो मैं
- 1:03:22भावनाओं की कदर करता हूँ, मैं तुम्हें भोगने के लिए छोड़ देता
- 1:03:28हूँ संसार में जाओ। जब भोगने से मन व्रत हो जाये कोई
- 1:03:39जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे तड़पता हुआ जब।
- 1:03:51कोई छोड़ दे तब तुम मेरे पास आना प्रिये, मेरा दर खुला है, खुला ही
- 1:04:08रहेगा। तुम्हारे लिए तुम्हारे लिए कोई जब
- 1:04:19तुम्हारा हृदय तड़पता हुआ। जब कोई छोड़ अभी तो तुम्हें सपने
- 1:04:32भी नहीं पता कि तुम बंधन में हो और फिर मुझे पता है पक्का तुम
- 1:04:39कलोल करोगे? बताओ मैं कहाँ बैठी हूँ तो
- 1:04:44तुम्हें तुम्हारी जंजीरें पुत्री नजर नहीं आई?
- 1:04:49फिर मैं अगर घन उठाऊंगा और छैनी उठाऊंगा तो तुम कहाँ तोड़ने दोगी?
- 1:04:56बेटे, इसलिए अभी तुम संसार में मौज करो, अभी तुम्हें संसार में
- 1:05:04सुख लगता है। तो देख लो, अच्छे तरह से हर कूचा
- 1:05:10फ्लोर लो, हर आला फ्लोर लो, हर कोना फ्लोर लो खंगालो क्या कहीं
- 1:05:24किसी कोने में आनंद छुपा तो नहीं पड़ा?
- 1:05:29और फिर जब तुम्हें कोई ना मिले सब तुम्हें तड़पता हुआ छोड़ दी तब तो
- 1:05:36मेरे पास आना फ्री है मेरा डर खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे
- 1:05:43लिए बंधन। उसके टूटा करते हैं जो उन बंधरों
- 1:05:52से दुखी हो जाया करता है। अगर किसी को बंधरों में बंधने में
- 1:06:01भी स्वाद आता है जैसे खारिज का रोग हो जाए।
- 1:06:07तो खारिज ही करने में स्वाद आता है तो फिर उसे खारिज करते ही रहने
- 1:06:14देना। मैंने उससे कहा कल्याण मस्तु बाबा
- 1:06:19एव मस्तु बाबा। और वो आई तक खारीशी पैदा कर रहा
- 1:06:28है वैसे भी तुम वह करके भी खारीशी ही शांत करते हो हँसा मत करो ये
- 1:06:38कोई हँसने की बात थोड़ी। तुम खारिश ही ठंडी करते हो, अपनी
- 1:06:47और कुछ नहीं है और देखे हो, मैं अनुभव से बोला करता हूँ, मैं सुनी
- 1:06:58सुनाई देखा दिखाई बात नहीं कहा करता।
- 1:07:04लिखा लिखी की है नहीं देखा देखी बात मैंने जो देखा जो जाना वो ही
- 1:07:13बोला अन्यथा उसके सिवा एक शब्द भी कभी नहीं बोला।
- 1:07:24तो अगर तुम प्यासे हो, ध्यान रखना सच में प्यासे हो, तुम्हारी प्यास
- 1:07:35सच्ची है, नकली नकली प्यास भी तुम लिए लिए आ सकते हो कि चलो देख लें
- 1:07:42ऐसे। मुक्ति या प्यास बुझाने में अर्जा
- 1:07:46क्या है? थोड़ा सा पी के देख लेते हैं,
- 1:07:50लेकिन नहीं मेरे पास पानी कहाँ है?
- 1:07:57मेरे पास तो शराब है। फिर शराब तुम कहोगे कि हमारी तो
- 1:08:06गुरु ने मना किया, शराब नहीं चले। मैंने कहा यही तो पीने जैसी चीज़
- 1:08:12थी। अरे मूर्खों यही तुमने पाबंदी लगा
- 1:08:19दी यही तो पीने जैसी चीज़ पता है तुमको राज़ कहाँ है?
- 1:08:36मेरे इस सरूर का पता है तुमको राज़।
- 1:08:43क्या है मेरे इस सुरूर का के इस सुरूर में ज़रा सा रंग है गुरूर
- 1:08:53का जो मैंने पी तो क्यों न शा? जो मैंने पी तो क्यों नशा उतर गया
- 1:09:06हज़ूर का ये हज़ूर का नशा क्यों उतर गया?
- 1:09:14ये बाबा का नशा क्यों उतर गया, जो मैंने पी तो क्यों नशा उतर गया?
- 1:09:18हज़ूर का? और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी
- 1:09:29कैसे रहूं चुप के मैंने बहुत से लोग आ जाते हैं चुप कर जा पापा
- 1:09:35नहीं मार देंगे। कैसे रहूं चुप के मैंने पी ही
- 1:09:41क्या है होश भी तक है बाकी और ज़रा सी दे दे सा के और ज़रा सी
- 1:09:53और। कैसे रहूं के मैंने पी ही क्या
- 1:09:59है, होश भी तक है बाकी और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी अरे उल्लू
- 1:10:10के पठो जो चीज़ पीने वाली थी वो ही तुमने बंद कर दी।
- 1:10:19ऐसे ऐसे धर्म हैं दुनिया में कल को तुम पानी बंद रहोगे, पानी जो
- 1:10:26पिएगा उसको हम नामदान नहीं देंगे। लगता है हम उजड़ जाएंगे, अगर इसने
- 1:10:46शराब पी ली तो सच्चा सुरूर पा जाएगा, ये फिर हमारे राम राम को
- 1:10:53चला के मारेगा ये फिर तो ये और मांगेगा कि थोड़ी सी और।
- 1:11:02हम भटके हुए थे, अब तक बहुत से लोगों ने मुझे कहा है बाबा बच गए
- 1:11:11यह जान क्या पिया, ज़िन्दगी खुशहाल हो गई।
- 1:11:18अब तक पता नहीं था। हम जीते हैं तो जीते हैं क्यों?
- 1:11:24लेकिन अब तो ज़िन्दगी जीने का मज़ा आया।
- 1:11:29अब ये प्रश्न समाप्त हुआ कि जीते हैं क्यों?
- 1:11:34बल्कि ज़िन्दगी जीने का मज़ा आया। अब तो थोड़ी सी और ज़रा सी दे दे
- 1:11:40साखी और ज़रा सी कैसे रहूं चुप के मैंने पी ही क्या यह ऐसी शराब है
- 1:11:50जीसको जीतने पीते हो? उतना होश बढ़ता जाता है।
- 1:11:56अवेयरनेस इंक्रीज़ेस तुम्हारी ठेकी की शराब पीने से तो अवेयरनेस
- 1:12:03घटती है, लेकिन वह आनंद का सुरूर मदहोसी ऐसी।
- 1:12:14के जितनी भी होंगे उतनी अवेयरनेस बढ़ेगी और फिर नाम दान देने वालों
- 1:12:24पर सुरूर उतर जाएगा। नशा उतर जाता है इनका।
- 1:12:31जो मैंने पी तो क्यों नशा उतर गया हुजूर का अरे तुम फिर हस्ते हो और
- 1:12:43ज़रा सी दे दशा की और ज़रा सी। असल में अगर तुमने पी ली ये रोकते
- 1:12:58ही इसलिए ये रोकते ही इसलिए हैं कि अगर तुमने इस शराब को पी लिया
- 1:13:09तो ये नामदान की शराब कौन मूर्ख पिएगा?
- 1:13:15फिर हम तो व्यापार से गए, हमारे सिंधु तो खाली निकलेंगे, हमारे
- 1:13:22भल्ले तो नहीं बिकेंगे, हमारे रेस्टोरेंट, दुकान कैसे चलेगी?
- 1:13:34यही है इसके पीछे का राज़ और कोई राज़ नहीं है तो तुमने पूछा पुत्र
- 1:13:44के कॉन्सेंट्रेशन और लीनता में क्या फर्क है?
- 1:13:50पूजा तुम्हारी कॉन्सेंट्रेशन। और ध्यान तुम्हारा लीनता है पूजा
- 1:14:00में तुम पूजा करने के बाद छूट शुभ प्रचार पूजन करो, तुम बचे रह
- 1:14:06जाओगे वैसे ही बाहर निकलोगे, सब काम धाम करोगे।
- 1:14:12लेकिन जब तुम ध्यान के उस तलीनता में चले जाओगे, लीनता में चले
- 1:14:17जाओगे तो बाहर तो कोई बदलाव ना आया था क्योंकि बाहर कोई शराब
- 1:14:23नहीं थी। पीने के लिए भीतर जब तुम उतर गए
- 1:14:27लीन हो गए। तो वहाँ तो बड़ी बदहोसी की शराब
- 1:14:30मिलेंगे, वो शराब तुमको बाहर नहीं आने देगी, फिर तुम्हें पता ही
- 1:14:37नहीं चलेगा कि कुछ खाना भी था या प्याज नहीं, खाना था या लहसुन
- 1:14:47नहीं खाना था। फिर बड़े बड़े वित्त मंत्री तुम
- 1:14:50बन सकते हो, लेकिन उसमें कोई आनंद नहीं होगा।
- 1:14:56और बात तो सारी आनंद है। जिसके लिए बुध तख्त उतास
- 1:15:01मोतेमणियों को ठुकरा के चल देते हैं।
- 1:15:06पुत्र को और पत्नी को। जनता को सबको ठुकरा के चल देते
- 1:15:13हैं। मांग के खाना मंजूर, लेकिन उसकी
- 1:15:20एक बूंद पीऊंगा। जोश जब तनक तुम्हें इतनी प्यास न
- 1:15:26लगे। कि उसकी एक बूंद पियूंगा जरूर
- 1:15:35तुम्हारे सब तथा कथित संपत्तियाँ मैं ठुक रहता हूँ, सिर्फ उस रस की
- 1:15:45एक बूंद पीने के लिए। और जब तलक मुझे उस रस की एक बूँद
- 1:15:51न मिलेंगे तब तल्क मैं यहाँ नहीं आऊंगा, सोचा तो था उतने यही लेकिन
- 1:15:59हुआ बुद्ध के भी उलट क्योंकि उसे पता नहीं था।
- 1:16:05उससे पहले उसने पिया नहीं था। जब कोई व्यक्ति कॉन्सेंट्रेट होता
- 1:16:12है तो वह वैसा का वैसा विदाउट एनी ट्रांसफर्मेशन बना रहता है।
- 1:16:19आज उसने पूजा की कल फिर वह यही पूजा करेगा।
- 1:16:23यही सामग्री होगी। उसकी तालमेल पत्रम पुष्पम फ़िल्म
- 1:16:30दे। यह सब कुछ होगा उसके सामग्री में
- 1:16:38लेकिन रूपांतरण नहीं होगा। पूजा के बाद तुम यथावत बने रहोगे।
- 1:16:46जाने वही उदास चेहरे, वही लटके हुए मुँह, वही तीन बजकर 3.75
- 1:16:57मिनट। लेकिन जब तुम लीन हो गई तो फिर
- 1:17:06वही नहीं रोक गए। बुद्ध को कहाँ पता था?
- 1:17:11बुद्ध ने सोचा था घर छोड़ते वक्त कि जैसे ही मैं पा गया।
- 1:17:18घर वापस लौट जाऊंगा, फिर राजगज से मार लूँगा, लेकिन बात उलटी हुई
- 1:17:27झूं झूं दवा की मर्ज बढ़ता ही गया।
- 1:17:33जैसे जैसे तुम पीते हो। तुम्हारी मदहोसी का आलम बढ़ता है
- 1:17:43और मज़े की बात है। तुम मूर्छित नहीं होते तुम ज्यादा
- 1:17:48जागृत हो जाते हो, अवेयरनेस इन्क्रीज़ेस।
- 1:17:54या शराब कुछ गुणवत्ता में अलग है तुम्हारी बाहर के ठेकों की शराबों
- 1:18:00से अलग है बाहर की शराब तुम्हें मुर्शीत कर दो लेकिन वो भीतर के
- 1:18:07उस तल की जिसकी लीनता की बात की है मैंने वहाँ जाकर जब तुमने पी
- 1:18:13लिया एक बार। तो प्यास और जगेगी फिर तुम साखी
- 1:18:18से कहोगे साखी और ज़रा सी दे दे साखी और ज़रा सी और कैसे रहूं
- 1:18:29चुपके, मैंने पी ही क्या है? होश भी तक है।
- 1:18:35बाकी यह होश भी बाकी है और पीने की तमन्ना भी बढ़ गई।
- 1:18:43यह कैसी शराब पी, यह तो अंधकार मिट गया।
- 1:18:51जो ऋषि कहता था तमसो माँ ज्योतिर्गामे यह तो तमे समिट गया,
- 1:18:59यह तो ज्योति ही ज्योति नजर आई और फिर जब तुम इतनी पी लेते हो के
- 1:19:04लीन हो जाते हो, फिर कहते हो जिधर देखता हूँ।
- 1:19:10उधर तू ही तू है हर झरने में, तू ही तू रूबरू इतनी पियो, इतनी पियो
- 1:19:22के तुम्हें हर झरने में वो मालिक बैठा हुआ नजर आए।
- 1:19:33धन्यवाद।