Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Sep 25 - प्रकृति vs विजातीय द्रव्य! मन क्यों बोलता है? नींद में ऐसा क्या होता है? Must Watch
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- 0:02सतीश पाण्डेय एक कहानी है। बाबा जी महाराज जनक नरक में गए,
- 0:20नरक की फेरी लगाई। और सारा नरक खाली हो गया।
- 0:33कृपया इस कहानी को रहस्यत्मक ढंग से वर्णित करने की कष्ट करें।
- 0:52आइए इस कहानी को हम बुनियाद से उठे।
- 1:00महाराजा जनक नरक में गए और सारा नरक खाली हो गया।
- 1:14इस नर्म में खुश बातें समझने वाली नरक हो या स्वर्ग हो, सतलोक हो या
- 1:27सत्यकांड हो, ये कोई भौगोलिक स्थान नहीं है।
- 1:37नर्क और स्वर्क मेंटल स्टेट हैं। मानसिक दर्शन सचखंड और सक्त लोक
- 1:54आध्यात्मिक स्थित है। जब तुम मनुष्य में दुखी होते हो,
- 2:02वह नरक ही तो होता है और जब तुम्हारा मन खुशी से लहलहा उठता
- 2:12है, वह स्वर्ग ही तो होता है। और जब ना सुख होता है ना दुख होता
- 2:26है तुम दोनों के पार होते हो, अच्छाई से भी परे होते हो, बड़ाई
- 2:39से भी परे हो। दोनों से पार तो सतलोक होता है,
- 2:50सत्यखंड होता है जैसे ब्राह्मणों ने नरक और स्वर्ग का निर्माण
- 3:00किया। वैसे ही तुम्हारे पाखंडी गुरुओं
- 3:05ने सतलोक और सच खंड का निर्माण किया।
- 3:11कल के प्रवचन में मैंने सच खंड के बारे में बोला था।
- 3:17सच खंड तक की यात्रा। तुम्हें करनी होती है जीते जी
- 3:26करनी होती है। मरकर नहीं करनी होती सच खंड कोई
- 3:36भौगोलिक स्थान नहीं। सच खंड इस ए स्टेट ऑफ युअर
- 3:45कान्शस्नस तुम्हारी चेतना की एक अवस्था है और सतलोक हो या सच खंड।
- 3:59वहाँ तुम सुख और दुख दोनों से पार होते हो स्वर्ग में तुम सुखी होते
- 4:06हो नरक में तुम दुखी होते हो समझाने के लिए दीज़ आर
- 4:13सिम्बोलिकरी प्रेजेंटेशन। दे अरे कॉल्ड अब्रीविएशन सिंबल्स
- 4:19हैं ये प्रतीक जन जैसे हमने मूर्तियां बना दी ध्यान रखना
- 4:32शब्दों से ज्यादा प्रतीक चिरस्थाई होते हैं।
- 4:39शब्द मिट जाते हैं। प्रतीक बहुत देर में मिटते हैं।
- 4:49इसलिए सनातन ने प्रतीकों का निर्माण किया, मूर्तियों का
- 4:56निर्माण किया। वैसे तो भाषा भी एक प्रतीत है।
- 5:10विश्वाभर में करीब 7000 भाषाएं, 7000 भाषाएं सबसे ज्यादा बोलने
- 5:20वाली भाषा है अंग्रेजी, जिसे। 1.4 अरब लोग बोलते हैं कुल आबादी
- 5:28आठ अरब की है। 1.4 लोग अंग्रेजी बोलते हैं,
- 5:41दूसरी भाषा है चीन। तीसरी भाषा है अंग्रेजी शमाकरण
- 5:47हिंदी। ये भाषाएं हैं पर इसमें कोई
- 5:54आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आपको किसी एक भाषा में वह
- 6:01परमात्मा का नाम भी हो सकता है और दूसरी भाषा में वो गाली भी हो
- 6:05सकती है। भाषाएं अपने ढंग से गढ़ी गईं।
- 6:16मैंने कल भी बताया था भाषाओं का प्रयोजन है अपने मन की बात कह
- 6:23देना। अपने विचार, अपनी भावना, अपनी
- 6:28जरूरत, अपने दुख, तकलीफ और भाषा बड़ी बोझिल है।
- 6:35हमारे दिमाग ये भाषा ही तो है जो तुम कहते हो बाबा हमारा मन बोलता
- 6:43है। क्योंकि भाषा वीजा भी अद्रव्य है।
- 6:47अब इसको ठीक से समझ लो आप रात को सो जाते हो, रात को हमारा तंत्र
- 6:59शरीर का। विजय की यह द्रव्य जो फॉरेन
- 7:04मैटेरियल्स होते हैं, उनको साफ सफाई करके मूत्र के जरिए बाहर
- 7:11फेंक देता है। सारी रात सफाई होती है आपका शरीर
- 7:18सारी रात भीतर के ऑर्गन। साफ सफाई में जुटे रहते हैं।
- 7:24आप सो जाते हो और वह सुबह मूत्र मार्ग से निकल जाती है।
- 7:39इसलिए आपने देखा होगा ये प्रयोगशाला के लोग जब मुत्र को।
- 7:44चेक करते हो। कहते हो सुबह सुबह का पहला पेशाब
- 7:47लेके आना मतलब उसमें सारा दंड, अंड, वंड सब उसमें होगा रो ही आप
- 8:00पी जाते हो सुबह मराज जी देसाई का।
- 8:03सुबह सुबह का ये बे पदार्थ और फिर मुझे लोग कहते थे मराड जी था ये
- 8:14मूत्र पीते थे 100 साल जिए यही तो तकलीफ है तुम्हें अगर मूत्र न
- 8:21पीते। तो सबासु सर, एक भाषा में जो
- 8:35अच्छे के लिए नाम होता है वो दूसरी भाषा में बुरे के लिए भी हो
- 8:39सकता है। भाषा विजातीय द्रव्य के कारण है
- 8:46जो बाहर निकलना चाहती है। इसलिए आपका मन बोलता है क्योंकि
- 8:55शरीर उसको बाहर फेंकना चाहता है। वांट टू इवैपरेट वांट टू कथोरसेज़
- 9:12बाहर निकालना चाहता है, रीज़न करना चाहता है, फेंक देना चाहता
- 9:16है, शरीर की स्वभाव का क्रिया है। जो शरीर को नहीं चाहिए, जो मन को
- 9:22नहीं चाहिए, बाहर फेंक देता हूँ इसलिए आपका मन बोलता है तुम्हारे
- 9:33शरीर के नेचुरल तंत्र में। और तुम्हारे मन में यही तो झगड़ा
- 9:40है। तंत्र कहता है मैं इस विजातीय
- 9:45द्रव्य को रहने नहीं दूंगा, इट्स ऑफ हर इन मटेरियल मैं इसको केसर
- 9:53से कर दूंगा, बाहर निकाल दूंगा। लेकिन तुम्हारा मनुष को पकड़े
- 9:59रहता है। अरे नहीं ये तो भगवान का नाम है
- 10:06लेकिन तंत्र सही होता है। नेचर इस राइट प्रकृति बिलकुल ठीक।
- 10:17और प्रकृति को अपना काम करते रहना चाहिए, करते देते रहना चाहिए।
- 10:25ये झगड़ा है प्रकृति में और तुम्हारे मन में तुम्हारी भाषा
- 10:33बाहर से आई थोपी गई। न तो हमारे शरीर ने बनाई, न हमारी
- 10:40मन ने बनाई और तुम्हारी प्रकृति हर पल हर घड़ी इस भाषा को
- 10:46कैथोरसिस करना चाहती है, बाहर एवपोरेट करना चाहती है।
- 10:50वातावरण में यही झगड़ा होता है। इसे ही तुम कहते हो बाबा मन
- 10:53बोलता। फिर आप पूछते हो पापा इंतजाम क्या
- 11:03है? हर वक्त बोलता रहता है।
- 11:09बेतर की प्रकृति फॉरेन मैटेरियल्स को भिजाती है, अद्रव्यों को हर
- 11:16वक्त बाहर धकेलने में लगी रहती है।
- 11:21और शब्द तुम झकड़ लेते हो, पकड़ लेते हो के भूल जाएंगे, फिर क्या
- 11:26लिखेंगे? एग्ज़ैमनेशन में यही दुविधा है।
- 11:33ये झगड़ा होता ही रहता है और तुम इसी से त्रस्त हो।
- 11:40मन से त्रस्त हुए हुए लोग एक जितनी आत्महत्या करते हैं, इसी
- 11:47झगड़े के कारण करते हैं। आज आत्महत्या का तुम्हें मैंने
- 11:52आंतरिक कारण बता। प्रकृति चाहती है बाहर से थूकी
- 11:58हुई प्रत्येक चीज़ को बाहर फेंक देना कोई काम नहीं है।
- 12:02भाई तुम्हारा यहाँ नो नीड जाइए बाहर।
- 12:18और तुम मन को पकड़े रहते हो, तुम कहते नहीं हो भाई, तुम्हें पता भी
- 12:26नहीं होता कि प्रकृति इसको बाहर फेंक रही है।
- 12:29फेंकना चाहती है। तुम्हारे मन को जबरदस्ती ज़ोर से
- 12:35पकड़ लेना और प्रकृति का पूरे ज़ोर से उसे बाहर निकाल देना।
- 12:38तो कौन हारेगा तुम्हारे? इसलिए मैं कहता हूँ नींद बड़ी
- 12:47जरूरी है। अब समझिए।
- 12:53इस साइंस को नींद में प्रत्येक विजाती है।
- 12:58द्रव्य प्रकृति बाहर एक्सक्रीट करती है तो शरीर के भी विजाती है।
- 13:06द्रव्य फौरन मटेरियल्स और मन के और मन में शब्द पड़े।
- 13:15प्रकृति शब्दों को भी बाहर फेंक देती है।
- 13:20तुम्हें पता भी नहीं चलता सारी रात तुम्हारे इकट्ठे किए गए फालतू
- 13:30आलतू के झगड़े। इकट्ठे किए गए शब्द सब बाहर फेंक
- 13:38देती है। प्रकृति इससे भी है तो तुम सुबह
- 13:43तरो ताजा महसूस करते हो। दिन में तुम बेड़ियों से जकड़े
- 13:51जकड़े से? मरे मरे से किसी भार के तले,
- 14:02इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ इन संत महापुरुषों के दर्शनों में मत उलझ
- 14:09जाना, दर्शन करने को एक स्थान है। बस उस स्थान पर चले जाना ही
- 14:18तुम्हारा टारगेट है। हेम है, लक्ष्य है, और वहाँ जाकर
- 14:29तुम पाओगे, संसार में सब कुछ देखा।
- 14:34संसार में सब भोगा सब चखा, लेकिन कुछ नहीं मिला।
- 14:46अगर वह नहीं मिला तो फिर कुछ भी नहीं मिला।
- 14:58इन मूर्तियों के इन तीर्थों के बहता पानी है मूर्तियां कभी किसी
- 15:12पर्वत पर थीं उखाड़ी गईं। तराशी गईं और तुमने तो देखी नहीं,
- 15:21मैंने देखी, मूर्तियाँ बनती हैं, मूर्तियाँ बनाने वाले कारीगर के
- 15:26मुँह में भान होता है। मूर्ति को छैनी हथौड़ी से वो
- 15:33काटता पीटता है। नय नय नक्ष बनाता है।
- 15:37और जब मुँह भर जाता है पीख से तो वहीं पर उसके ऊपर ही थूक देता है,
- 15:42जैसे आप कल को पूजोगे और मन में यह भ्रम उत्पन्न करोगे कि इसमें
- 15:51पंडित जी ने प्राण प्रतिष्ठा होती प्राण प्रतिष्ठा।
- 15:56पत्थर में कभी नहीं प्राण प्रतिष्ठा चीत न का प्रवेश करा
- 16:10देना मामूली बात में कुछ गिनती चिंती का योगी जड़ में।
- 16:20प्राण प्रतिष्ठित चेतना को डाल सकते हैं।
- 16:24उनमें एक शिव हैं, जिसे हम भगवान शंकर के नाम से भी जानते हैं।
- 16:32शिव खुद अपने आप में ही चेतना है। वह पत्थर में चला जाए, वह माटी
- 16:45में चला जाए, वह धातु में चला जाए, सचेतन हो जाती है, लेकिन
- 16:53हमने आज सब नकली बना दिया है। आज सब नकली है।
- 16:59वेदवत्ता नकली है, ज्ञान नकली है तुम्हारी भगवान नकली तुम्हारी
- 17:09तीर्थ नकली हैं, भगवान तो भीतर है, तीर्थ भी तुम्हारे भीतर हैं।
- 17:18तीर्थ नावण जयते स्वभाव है उसकी इच्छा हो तो मैं अपने भीतर जाके
- 17:26उस तीर्थ में स्नान करूँगा, लेकिन तुम तो बाहर जाके हाज्य कराते हो,
- 17:33तुम तो बाहर जाके गंगासागर पर आते हो, उसे तीर्थ कहते हो?
- 17:41ये सब तुमने बनाई? भाषा तुमने बनाई तीर्थ तुमने बनाई
- 17:48मूर्तियां तुमने बनाई और मैंने कहा पी कगरा देते हैं मुख।
- 17:55फिर दो स्वर की अच्छी तरह। फिर वह तुम्हारे मंत्रों में सजा
- 18:01देते हैं और पंडित की झूठी मूठी प्राण प्रतिष्ठा करते हैं।
- 18:07मैंने कहा प्राण प्रतिष्ठा करने वाले कुछ गणित में रोग हैं संसार।
- 18:15उनमें से एक शिव है जिसने पार्वती को विज्ञान भैरव तंत्र के 112
- 18:22सूत्र दिए। शिव खुद ही जीते शुरू।
- 18:38गुरवाणी में एक शब्द आता है ढिठ सभ्यता सभी स्थान देखे।
- 18:44मैंने तीर्थ देखा सागर। देखें हज देखें पर्वत देखें
- 18:55नदियां देखी। बर्फीली पहाड़ियाँ देखीं गुफाएं,
- 18:59कंदराएं देखीं, वृक्ष पेठ देखें डिट्ठे सभ्यता हूँ नहीं तो तुझे
- 19:09है, कहीं आनंद नहीं आया सभी जगह में गया।
- 19:16नहीं तू तो जे है आ तेरे जैसा कोई नहीं बस वो ठीक है दूसरी जगहों पे
- 19:27आपको खुशी तो मिल सकती है वणों में जाओगे शुद्ध ऑक्सीजन तो मिल
- 19:31सकती है, पर्वतों में जाओगे ठंडक तो मिल सकती है।
- 19:41लेकिन गढ़वाणी कहती है कि आनंद नहीं तू ध जे है आप आनंद तो अपने
- 19:49भितर जा के मिलेगा एक ही स्थान है आनंद को पानी।
- 20:03और वह है तुम्हारी बेचारा तुम बेणता बन जाओ, तुम हरिद्वार जाओ
- 20:10ऋषिकेश जाओ, तुम कालीमठ जाओ, तुम हज जाओ।
- 20:22तुम मक्का जाओ, मदीना जाओ, कहीं जाओ एक बात को ध्यान में रख लेना,
- 20:29जैसे गए थे वैसे ही वापस आ जाओगे थके मादे शरीर थक जाएगा, लेकिन
- 20:39आनंद को साथ नहीं लेकर आओगे। वहाँ जाकर जहाँ दुख न सें सुख कर
- 20:56ले जाए एक स्थान ऐसा है तुम्हारे भीतर जहाँ जाकर तुम्हारे सारे
- 21:02दुखड़े नष्ट हो जाते हैं, सुख कार्यालय जाओ और सुख तुम्हारे पास
- 21:11आ जाता है। उस स्थान कहाँ है?
- 21:15बार कहें, उस स्थान तुम्हारी दूसरा है और मैं बहुत बार बोलता
- 21:26हूँ, रोज़ बोलता हूँ ये गुरु जन छर्क से आपके पास से निकल जाते
- 21:32हैं। लोग जी दर्शन हो गए।
- 21:35सब नकली नकली फूल हैं कोई दर्शन वर्शन नहीं, न तो इन्होंने कुछ
- 21:41पाया एक राधास्वामी व्यक्ति मेरे पास आ गया, अपनी समस्या बदल गया।
- 21:56मैंने कहा दीक्षित हो नहीं बाबा मैंने तो नाम दान लिया है।
- 22:14तो फिर ये समस्या क्या तुम्हारे गुरु सॉल्व नहीं कर सकता?
- 22:20कहता है की सॉल्व तो कर सकता है वो तो जल थल कर दे मैं कहा वो तो
- 22:25कर देगा जल थल तो बाट भी कर देगी। वो तो परे ले आ गई।
- 22:34मैं कहा वो तो आइटम बम पी ले आया। नई बात क्या है?
- 22:39वो तो हाइड्रोजन बम पी ले आया जल थल कर दे परे ले ले आए ये सब तो
- 22:46नेचर कर देगी, लेकिन तुम्हारे गुरु क्या कर सकते हैं?
- 22:52अपने गुरु से तकलीफ कहते कि नहीं गुरु बनाया क्या है?
- 22:57गुरु ने तुम्हें अपनाया क्या है? अच्छा बाबा वो तो बात ही नहीं
- 23:06करते, मिलते नहीं। मैंने कहा, फिर अगर डॉक्टर रात को
- 23:14पेट में दर्द हो रहा है और तुमने कोई फैम्ली डॉक्टर कर लिया तो
- 23:24कैसे पुकारोगे? अपनी फैम्ली डॉक्टर को ही फ़ोन
- 23:31करोगे तो तुम कहती हो वो तो मिलते नहीं तो फिर क्या करना पड़ता है
- 23:38बाबा चिठ्ठी रखनी पड़ती है? अच्छा फिर चिठ्ठी आज कल व्हाट्सएप
- 23:46का ज़माना है, फ़ोन का ज़माना है। यार डायल का ना और सीधा लग जाता
- 23:52है पर अपनी तकलीफ बता दो नहीं कहता हूँ इस बक बक में पड़ते ही
- 23:57नहीं तो मैंने कहा बक बक करने के लिए मैं ही रखा हूँ क्या?
- 24:07अरे हरामखोर। गुरु का काम ही करना है बक बक
- 24:14करे, कुछ करे तुम्हें समझाए, तुम्हारा दुख सुनें तो दूर कर
- 24:21सकता है। हर उपाय करे जैसे आपका फैम्ली
- 24:23डॉक्टर। नहीं कर सकता तो प्रेम से कह दे
- 24:30देखिए ऐसा तेरे हो गया नहीं ठीक होगा भाई फैम्ली डॉक्टर आपने
- 24:40बनाया आंधी रात को आवाज दो और आंधी रात को आवाज आप तभी दोगे।
- 24:47जब सीरियस मैटर होगा, ऐसे नहीं हुआ।
- 24:54मैंने कहा यही मुश्किल है, तुम कहते हो दीक्षा दो बाबा अभी आज
- 25:08एक। पुत्री का मैसेज आया शिवानी हम
- 25:14लोगों को चाहते हैं वो आपके पीछे लगू हो जाएं तो हम समझाने की
- 25:23चेष्टा करते हैं लेकिन वो मानते ही नहीं।
- 25:30हम उनका भला करना चाहते हैं कि किस हिसाब से ये तर जाएं।
- 25:34हमें पता है आपके साथ आपकी बातें सुनकर ये तर जाएंगे, लेकिन ये लोग
- 25:46आपके बारे में भला बुरा बोलते हैं।
- 25:54हम तो उनका भला चाहते हैं लेकिन वो लोग आपके बारे में भला बुरा
- 26:00बोलते हैं। मैंने कहा बेटी ये बताओ पहले मेरे
- 26:08से दीक्षा लेके तुम सुखी होगी। ईमानदारी से जवाब दे न कहती पूरी
- 26:19सुखी नहीं हो। मैंने कहा फिर जब तुम पूरी सुखी
- 26:26हो जाओ न तब बात करना उससे। अभी अधूरे अधूरे कोई पता नहीं अभी
- 26:35तुम खुद तो बदल लो यह मन की चाल बाजी है उसका भला कर दें उसका भला
- 26:45कर दें और मैंने सख्त पाबंदी लगा रखी है जीवन में हजारों वीडियो
- 26:51बोली कभी मैंने कहा मुझको फॉलो करो।
- 26:57बल्कि ये कहा मुझको फॉलो मत करना अंधे होकर फॉलो मत करना सुन
- 27:06सुनिए, सिर्फ सुनिए सुनिए दुख पाप का नाश अगर सुनने से तुम्हारे दुख
- 27:11दूर होते हैं। भ्रांतियां दूर होती हैं तुम्हारे
- 27:15कष्ट, क्लेश कट जाते हैं तो फिर आगे कदम दूसरा फिर करिये क्रिया
- 27:25योग करिये, ध्यान करिये फिर परवचन सुनिए।
- 27:33उस परमात्मा की वाणी को श्रवण कीजिये।
- 27:38अगर अभी तुम्हारा ही कल्याण नहीं हुआ, क्यों दूसरों को घसीट रही हो
- 27:44और फिर अगर ले भी आओगे तो अगला रजामंद हो गया ठीक है चलो बाबा के
- 27:51पास। यहाँ स्वीकृत हो जाएगा।
- 27:56बा मुश्किल तुम कितनी देर में स्वीकृत हो?
- 28:02पांच 5 साल से लोगों ने रजिस्ट्रेशन करवा रखा है।
- 28:05आज मैं निरीक्षण, तुम आगे तो देखो।
- 28:13ना खुदा ही मिला ना वसाली सनम इसको जीस राह पे चलता है चलने दो।
- 28:22ये भी एक तरीका है पहुंचने का इसलिए मैं ज़्यादा मशक्कत नहीं
- 28:26करता। तुम्हारे भ्रम तोड़ने की भी बस
- 28:29बात कह देता हूँ, टूट जाए तो टूट जाए।
- 28:33भटकना भी एक रहा है। एक अनुभव तो ले लो के मूर्ति पूजा
- 28:45की थी। नहीं कुछ मिला भटके नाम जब किया
- 28:50था नहीं, कुछ मिला भटके एनर्जीलेसनेस हुए तुम्हें पता है
- 28:57मैंने राम राम का कितना नाम दिया है?
- 29:02मैं भी ऐसे ही गुरु की गृहस्थी में आ गया था।
- 29:09और वह अज्ञानी निकला राम रामू करते रहो चलते फिरते, बैठते उठते,
- 29:19सफर करते राम रामू करते रहो मैं राम रामू करता रहा।
- 29:26राम राम हो गए, 1 दिन कह दिया राम राम गुरू जी चल क्योंकि कुछ मिला
- 29:39नहीं, यह भी एक रास्ता है भटको। भटकोगे तो तुम ध्यान से सुनो मेरी
- 29:48बात फिर तुम्हारा मंत्र में भटकाएगा नहीं कि देखो वो पड़ाव तो
- 29:54तुमने अन खोजा छोड़ दिया। सारी दुनिया जो नाम स्मरण कर रही
- 30:01है, तुम क्यों नहीं करते? मन तुम्हारा बार बार उतर जाएगा और
- 30:10ये मन ही तो तुम्हारा रोग है, इसको पूरा ही कर दो।
- 30:17ये भी एक रास्ता है। भटकना भी तो एक रास्ता है सही
- 30:22रास्ते पे जाने के लिए फिर भटकोगे नहीं मिलेगा फिर तुम किसी से
- 30:29पूछोगे और कभी न कभी ईश्वर मेहरबान होगा।
- 30:37कर्मी आवे कपड़ा नजर अमौख द्वार कभी कभी उसकी नजर भौंके फिर वो
- 30:45तुम्हें सही रास्ता डाल देगा। तुम्हें गुरु को तलाशने की
- 30:49आवश्यकता नहीं है। गुरू हित में तलाश लेगा।
- 30:57तुम किसी को मूर्ख बनाने की चेष्टा न करो, तुम किसी को मेरी
- 31:01बात को मानें, मैं खुद ही नहीं कहता तुम कब है चलो।
- 31:10किसी को सब्सक्राइब करने के लिए ना कहो ये गायत्री वगैरह मंत्र
- 31:19देखिये मंत्रा इनकी बात अलग है लेकिन जो ईश्वर का रास्ता है वो
- 31:25इससे बिलकुल विपरीत है। ना सब्सक्राइब करने के लिए कहो ना
- 31:33मुझे सुनने के लिए, कहो ना मेरी बातों पर तवज्जो देने के लिए कहो
- 31:41ना अनुकरण करने के लिए कहो बस तुम अपना ही सुधार लो काफी।
- 31:48यह काफी नहीं है क्या और ध्यान रखना जैसे तुम सुधर गए उस इशारा
- 31:56मेरी तरफ करना बंद कर दोगे यही मैं चाहता हूँ तुम्हारा खुद का
- 32:02दिया का विचार। ये मेरा ऋण है, तुम्हारे ऊपर उस
- 32:10तरह उतर जाएगा जीस दिन तुम मेरी तरफ इशारा न करके खुद ही बताना
- 32:17शुरू कर दो और अनुभव से बताना शुरू कर दो।
- 32:21गबोड़ शंखों से बताना शुरू मत कर उस ठंडी छॉव में जब बैठ के शीतल
- 32:29जल तुमने पे लिया तुम्हारा शुष्क गला तर हो गया उस कड़ी बोलना
- 32:39दूसरे को बदला। उससे पहले मेरे पास भीड़ मत करना,
- 32:47मैं भीड़ का आदि नहीं। मैं कोई राजनीतिक पार्टी थोड़ी
- 32:54बनायीं। मुझे मुंहमुख शू चाहिए, व्यासियों
- 32:58की भीड़ चाहिए। तुम जबरदस्ती किसी में प्यास पैदा
- 33:04नहीं कर सकते और करना भी मत, ये एक पाप होगा किसी को मत कहना ये
- 33:13मन की तरकीबें हैं अपने आप को ना बदलने की पर मैं कहता हूँ किसी को
- 33:20मत बदलो, खोज बदलो। अभी आज पांच चार और सवार हैं।
- 33:26बाबा घर में बड़ा क्लेश शायद आपकी वीडियो दो 4 दिन ना सुन सको क्षमा
- 33:34करना आप घर के माहौल को ठीक कर दो, घर का माहौल दो तो हमें ठीक
- 33:40कर लो। फार्मूला तुम्हें बता दिया गया
- 33:45है। टकराव होता है दो चीजों के खटकनिस
- 33:52अगर वो अभी मूर्ख हैं तो तुम सयाने हो जाओ, वो किसी बात पर
- 33:59अड़ा है। अवश्य ही यह जो क्लेश हुआ ना घर
- 34:07में सभी सुन लें इस बात को तुम भी अपनी जगह पर अड़े हुए हो।
- 34:16तुमने भी अपनी धौन में किल्ला फंसा लिया है।
- 34:22स्टेनलेस स्टील का इस किले को निकाल के फेंक दो गर्दन झुक जाए
- 34:28जब ज़रा गर्दन झुकाई देख लें सब क्लेश खत्म हो जाए।
- 34:35मेरे पास लोग आ जाते हैं पौथी डाल के।
- 34:40आओ बाबा शास्त्रार्थ करें, मैं समझ जाता हूँ भगत है भक्तों से
- 34:48क्या शास्त्र शंकराचार्यों से कभी शास्त्रार्थ करना होता है,
- 34:55शंकराचार्य तो हरे ही हरे हैं। क्योंकि शब्दों से शस्त्र करेंगे
- 34:59देखा इन्होंने कुछ तो इनका उपाय है उपाय क्या है?
- 35:05दूर से नमन कर लूँ श्रद्धापूर्वक भाव के हाथ लगा लूँ मैं बड़ी
- 35:11श्रद्धा से आँखें बंद करके। दोनों पांवों को छूता था और उसका
- 35:16अहंकार तृप्त हो जाता था और उसको आशीर्वाद देने पर विवश होना पड़ता
- 35:24तो वो कहता कल्याण मस्तू बाबा, मैंने कहा प्रभु जलपान करो।
- 35:33भोजन बन रहा है, तृप्त हो के जाना, शास्त्रार्थ करना आया था,
- 35:42भोजन करके जाता है। शास्त्रार्थ एक आड़ थी,
- 35:51शास्त्रार्थ झगड़ा था। हम दोनों झगड़ा करते हैं।
- 35:56तुम्हें पता नहीं चलता। शास्त्र रथ का मतलब है झगड़ा
- 35:59करना। वो कहेगा मैं ठीक वो कहेगा मैं
- 36:03ठीक वो अपना शास्त्र निकालेगा, वो अपना शास्त्र निकालेगा, ये झगड़ा
- 36:07ही तो है बस विनम्र लोगों का झगड़ा है।
- 36:15जो शालीनता से बात करते हैं। ज्ञानी से ज्ञानी मेले करें।
- 36:20ज्ञान की बात ये शस्त्र अर्थ मूर्ख से मूर्ख मिले दे घूंसा दे
- 36:28लात। फिर वहाँ पर घूंसे लाते जलते हैं।
- 36:33तुम्हें पता नहीं है सात रात तो मैंने भी किया, उसके पांव छुए,
- 36:41प्रणाम किया, उसने मुझे आशीर्वाद दिया, मैंने जलपान खाना खा के
- 36:50जाना। तृप्त हो के गया।
- 36:54प्रश्न हो के गया क्योंकि पेट भी भर गया, अहंकार भी भर गया।
- 37:02दोनों को तृप्त करके भेजा गया ढंक होता है।
- 37:08अगर घर में क्लेश है। तो भगवान तक ईश्वर तक पहुँचने की
- 37:17बातों में अड़चन क्या है? सुनने में तुम्हारे ही हाथ में है
- 37:22सब कुछ उसके हाथ की कठपुतली बन जाओ शरैंटर जैसा वो कहता है वैसा
- 37:33कुछ। रो जाते हैं।
- 37:37ऐसे मैसेज आज आया कि मेरे पिता के साथ मेरे ज़रा भी नहीं।
- 37:42मैंने कहा फिर तुम बना लो ना, जो समझदार होता है वो बनाता है जो
- 37:47मूर्ख होता है वो बिगाड़ता है। अब देखो समझदार तुम हो, वो चाहे
- 37:51उम्र में बड़ा है। लेकिन मूर्खों के साथ समझदार
- 37:57समझौता कर लेते हैं, ये जानते हुए भी के ये मुर्ख हैं, लड़ाई नहीं
- 38:02करते। मूर्खों से कभी झगड़ा करना होता
- 38:04है अंदर भक्तों से, मूर्खों से पागलों से हाँ झगड़ा करोगे ईंट
- 38:10हमारे को उठा के। बोबरा फोड़ देगा तो आज के प्रवचन
- 38:16में अब तक का मोरू प्रकृति सभी विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालते
- 38:22हैं। तुम्हारा मन बोलता है, इसका मतलब
- 38:26मन विजातीय द्रव्य है। शब्द विजातीय द्रव्य है, फौरन
- 38:30मटेरियल्स है। भीतर समा नहीं सकते।
- 38:32प्रकृति इनको बाहर धकेलने की चेष्टा करती है।
- 38:35तुम सहजे सहजे इनको छोड़ दो अन्यथा फिर दुख झेलने की दोनों
- 38:49में से एक तो चिन्ह ही होंगे ना? या तो दुख झेलने की तैयारी करो,
- 38:59प्रकृति लड़ती है जैसे तुम्हें पता नहीं हमारी टर्न सेल्स है,
- 39:05तुम्हें तो पता भी नहीं चलता। ये लड़ाई झगड़ा करते हैं।
- 39:09बाहर से आए हुए कीटाणुओं से ये हमारे सुरक्षा गार्ड हैं।
- 39:14सिक्योरिटी गार्ड बाहर से आए हुए विजातीय कीटाणुओं से लड़ते हैं या
- 39:22खुद मर जाते हैं, उनको मार देते हैं।
- 39:26करो या मरो की राजनीति होती है। यहाँ गाँधीवाडी कितना ही अहिंसक
- 39:36व्यक्ति हो लेकिन एक बात समझ लेना अहिंसा ही सब कुछ नहीं होती।
- 39:43एक वक्त ऐसा आता है जब गाँधी जी ने भी कह दिया था।
- 39:488 अगस्त 9 अगस्त को गिरफ्तार हुए 1942 को क्विट इंडिया मूवमेंट में
- 39:56करो या मरो दो और ये क्या है, करो या मरो।
- 40:11ये वाक्य अहिंसक लगेगा, लेकिन बहुत अहिंसक वाक्य है इसके ऊपर
- 40:23बाद में कभी विस्तार से बताऊँगा। हम बहक जाएंगे अपने रास्ते से अगर
- 40:35घरों में झगड़े हैं तो स्वाभाविक हैं, प्रत्येक घर में झगड़ा होना
- 40:42चाहिए, अवश्य आंधी तूफान चलते हैं तो।
- 40:50पत्तों पर जमी हुई डोल छंट जाती है।
- 40:53ऊपर से बारिश तरो ताजा हो जाते हैं।
- 40:58नहा लेते हैं पत्ते लेकिन अगर घरों में झगड़े हैं तो मैंने
- 41:06तुम्हे बड़ा सरल रास्ता बताया है। ये बात बहुत आगे भी बढ़ जाती है
- 41:19और फिर भी तो होश में आते हो जब कोई ज्यादा नुकसान हो जाता है।
- 41:29लोग गुस्से में आके मोबाइल मेरे शिष्य थे।
- 41:34गुस्से में आके मोबाइल फोड़ दिया। घर वाले से कैसे बात हो गई, बात
- 41:41हो गई। मोबाइल के ऊपर क्यों झगड़ा करती
- 41:43हो गई ₹1,50,000 का मोबाइल तोड़ते?
- 41:51सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या हुआ सब कुछ लुटा के होश में?
- 42:10आए तो क्या हुआ? दिन में अगर चिराग जलाये तो।
- 42:28क्या हुआ? सब कुछ लुटा के होश में आये तो
- 42:42क्या हुआ लौटे पड़ जाते हो सब कुछ?
- 42:47भारी नुकसान हो जाता है फिर होश में आते है रंग लाती है यहाँ
- 42:55पत्थर पर घिस जाने के बाद होश में आता है बंदा ठोकरे खाने के बाद
- 43:02फिर भी तो रास्तों पर आओगे अभी आजा।
- 43:08शांति शांति से आ जाओ, एक कचरा बाहर ऊपर छत पर जाओ निकाल दो बड़ा
- 43:14आसान रास्ता है कैथोर्सेस कर दो ये क्रोध तुम्हारे भीतर है, ये
- 43:20कैंसराइटिस का मबाद है। ये फोड़ा चस चस करता है जो क्रोध
- 43:25जिसे तुम कहते हो, थोड़ा क्रिया जो करो पांच 4 मिनट इस कचरे को
- 43:32बाहर निकाल दो और फिर देखना जाकर तुम्हारा फैसला बदल जाएगा,
- 43:40तुम्हारा व्यवहार बदल जाएगा। तुम झोंको और ऐसा नहीं छोड़ता,
- 43:50इधर तुम भी खींचे हो इधर वह भी खींचे हैं पूरे ज़ोर से तुम खींचे
- 43:56हो यही तनाव होता है और तुम क्या करो अपनी ओर कैसा +2।
- 44:08अपनी ओर का रस्सा छोड़ दो और दम से बढ़ेगा।
- 44:13दूसरा अकल ठिकाने आ जाएगी। कुछ और भी रस्ते होते हैं।
- 44:31सिर्फ एक झगड़ा ही रास्ता नहीं होता, राहतें और भी हैं बसल की
- 44:36राहत के सिवा और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा और भी तो काम
- 44:42करना है भाई झगड़ों में कब तक उलझी रहोगे?
- 44:54देखो, अगर दूसरा ज्ञानी है दूसरा भगत है तो तुम नहीं करपाकर तुम
- 45:08अपनी ओर कर ऐसा छोड़ फेंचो मत यही तनाव पैदा करता है।
- 45:18तुम्हें आसान सा रिश्ता बता दे जितना तुम खींचोगे उतना ही वो
- 45:26ज़ोर से खिचेगा ना तुम झुकोगे ना वो झुकोगे इसलिए तुम झुको मत, तुम
- 45:32रस्सा ही छोड़ो। अल्लाह भाई साहब को जियाँ तिहा कर
- 45:38चलीं। सरदारी
- 45:51अक्षरों के खेद असल में भीतर क्रोध है, सुबह रोज़ उठकर ज्यादा
- 46:00नहीं। 5 मिनट कैसर।
- 46:06क्रिया जो करो कैसे सर्च करो बड़ा हल्का हो जाएगा।
- 46:09दिन में ग्राहकों के गल नहीं पड़ोगे ऑफिस में जो ग्राहक आते
- 46:15हैं, उनसे दूर से व्यवहार नहीं करोगे।
- 46:23प्रेम से बोलेंगे। और सभी तुम्हारी प्रशंसा करेंगे।
- 46:29झगड़े से बचने का उपाय वह नरम नहीं होता।
- 46:34तुम हो जाओ ये तो तुम्हारे हाथ में है ना?
- 46:41अब ये मत कहना कि ये हमारे हाथ में नहीं है।
- 46:45फिर तुम अहम्कारी फिर तुम परमात्मा के रास्ते पे नहीं चलना
- 46:49चाहते, परमात्मा का रास्ता यही सखाता है, दूसरा तो नहीं झुकेगा,
- 46:53वह तो अंधा भाग्य तह है और भाग्य कभी झुकते हैं भाग्य नहीं, कभी
- 46:58झुकते भाग्य झुकाते हैं, तुम झुक जाओ।