Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 Jul 25 - आत्मबोध से परमात्मबोध की यात्रा! रस को भीतर कैसे इकट्ठा करें? सुनने की कला सीखें!
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- 0:00बाबाजी प्रणब प्रश्न गहरा है, आपको बेवकूफ़ी से भरा हुआ भी
- 0:13लगेगा, लेकिन मैं? पूछ लेना चाहती हूँ जो कुछ पूछा
- 0:23जा सकता है, आत्मबोध और परमात्माबोध को प्राप्त दोनों
- 0:34व्यक्तियों के लक्षण क्या है? जीसको हम सरलता से।
- 0:39पहचान सके। दोनों में आनंद होगा, आनंद भी
- 0:53पूर्ण होगा, लेकिन आत्मभूत से युक्त व्यक्ति।
- 1:04के अल्फाज बता देंगे। परमात्मभोध से युक्त व्यक्ति के
- 1:12अल्फास्त में बता चूके दोनों व्यक्तियों के अल्फाजों से पता
- 1:17किया जा सकता है उनकी परिस्थितियों का।
- 1:21उनके अनुपमुख निश्चित ही दो अवस्थाएं पहला पड़ाव है स्वयं को
- 1:29जान लेना और दूसरा पड़ाव है परमात्मा को जान लेना।
- 1:39परमात्मा को जानना नहीं होता, परमात्मा में तो विलीन होना होता
- 1:44है, स्वयं को जानना होता है, परमात्मा में दुबना होता है।
- 1:52कैसे पहचाना? बिलकुल शरद है।
- 2:01उनके शब्दों से पहचान आत्मबोध से युक्त व्यक्ति की भाषा आचार्यों
- 2:13से व्यक्ति। सर लोगों से मिलती जुगती होगी,
- 2:23उनके काम करने का जंग भी समान होगा जैसे ये प्रयास करवातें हैं।
- 2:35सर लोग भी प्रयास करते हैं और आचार्य लोग भी प्रयास करते हैं।
- 2:50आत्मा बहुत तक पहुंचा हुआ व्यक्ति इससे बुद्ध बुद्ध कहेगा।
- 2:58अप दीपो बाबा यू विल हैव टू डू समथिंग तो अटैन दैट गोल।
- 3:13तुम्हें कुछ करना होगा और परमात्मा बोध तक पहुंचा हुआ
- 3:24व्यक्ति। दो भाषाओं में बोले क्योंकि वह
- 3:27परिपूर्ण हो जाएगा। वह ऐसा कहे कि मैं हूँ नहीं या वह
- 3:37ऐसा कहे कि मैं ही हूँ, दोनों बातों का अर्थ ही एक ही ही है।
- 3:44तुम्हारे भाषा कोश में नहीं आता तुम्हारे शब्द कोश में दोनों शब्द
- 3:50यकसा नहीं होते, लेकिन परमात्मा बहुत से युक्त व्यक्ति थे।
- 3:57दोनों शब्द यकसा होते। हैं नानक।
- 4:03परमात्मा बहुत से युक्त हैं। नानक कहते हैं जो तुध पाव हैं,
- 4:15सैपली का तू सता सलामत नरंकार ये शून्य से बोल रहे हैं।
- 4:25विराट शून्य से भी बोलता है। दो तलों से बोलेंगे, विराट या
- 4:32शून्य से बोलेंगे या पूर्ण से बोलेंगे, पूर्ण से बोलेंगे तो
- 4:36कृष्ण कहेंगे सर्वधर्माण पर तिज्य मामले का शर्म प्रच।
- 4:43सभी को छोड़कर मेरी शरण में नाच परिपूर्ण व्यक्ति दो तरह से
- 4:48बोलेंगे और अपूर्ण व्यक्ति एक तरह से बोलेंगे।
- 4:54उसकी भाषा बड़ी सरल और सीधी होगी, खुद कभी नहीं देंगे, खुद ही हो
- 5:01जाएगा। बुध कहें कि नहीं यू विल हैव टु
- 5:05डू समथिंग आप दीपो भवः और अपना मार्ग खुद ही तलाशो अपने दीपक
- 5:17मार्गप्रदर्शक खुद ही बनो। आत्मबोध से युक्त व्यक्ति ऐसा
- 5:26पहचाना जाएगा। अपने शब्दों से जो कहेगा तुम कर
- 5:30सकते हो, तुम ही कर सकते हो। ये आत्मबोधस्थ व्यक्ति की निशानी
- 5:38है, लक्षण हैं। उनके शब्द बता देंगे लव जे कहकर
- 5:46तुम कुछ नहीं कर सकते, तुम्हारी औकात ही क्या है?
- 5:56इतने विराट प्रमंड के आगे तुम्हारी हैसियत भी क्या है?
- 6:01तुम ज़रा भी तो नहीं हो लव जे को ये बात ठीक लगती है ऐसा नहीं लव
- 6:13जे ने इस चीज़ का अनुभव किया है। संपूर्णता को पहुंचा हुआ व्यक्ति
- 6:20दो भाषाओं में बोल सकता है। शून्य से भी बोल सकता है
- 6:25सम्पूर्णता से भी बोल। सकता है।
- 6:28शून्य से बोलेंगे तो कहेगा मैं कुछ नहीं कर सकता, जो करता है
- 6:33परमात्मा करता है और सम्पूर्णता से बोलेंगे तो मैं कहेगा मैं ही
- 6:40करता हूँ। अन्न न्यास चिन्ह चिन्ह तो माँ ये
- 6:44जनहा परिभास्य अनन्य भाव से तू मेरा स्मरण कर मैं तेरी सभी
- 6:54प्रकार से सहायता करूँगा तुम्हारे दुख में हर लूँगा तुम्हारे पाप
- 7:00में हर लूँगा। तो मेरी शरण आज एक ही वो प्रकृति
- 7:10करने के दो ढांग शून्य से शुरू करें या सम्पूर्णता से शून्य शुरू
- 7:17करें, कोई फर्क नहीं पड़ता। तो संपूर्णता तक पहुंचा हुआ
- 7:25व्यक्ति दो भाषाओं में पार कर सकता है।
- 7:31और नानक? हो या कृष्ण हो।
- 7:38या लव से हो। अपूर्णता तक पहुंचा हुआ व्यक्ति
- 7:46ध्यान रखना अपूर्णता बुद्ध के तल को मैं अपूर्ण कहता हूँ उस बात
- 7:54करेंगे वो एक तरफ़ा बात करेंगे। दो तरफा पास नहीं वो कहे कि कोई
- 8:04नहीं कुछ कर सकता, तुम्हें ही करना होगा, तुम ही बनोगे अपने
- 8:12मार्ग के दीपक कोई दूसरे से रौशनी मांगने की।
- 8:19कोशिश ही मत कर चिष्ठा व्यर्थ हो जाएगी।
- 8:24खुद ही अपना मार्ग प्रज्वलित करना और खुद ही अपना मार्ग तलाशना
- 8:34बुद्ध स्वयं को जानते हैं। उस आगे के।
- 8:41कृष्ण पीक पॉइंट पे पहुंचे बुद्ध अतमस्त कृष्ण परमात्मस्त।
- 8:57बुद्ध ने स्वय को पा लिया। कृष्ण परिपूर्णों को पा लिया।
- 9:05उनकी भाषा ही वैसी होगी। ईमानदार हैं दोनों ईमानदारी तो
- 9:13हाँ। नास्तिकों के भीतर भी होती है
- 9:20प्रकृति के नियमों को जो नहीं जानता वो चारवाँ भी कहता है यदा
- 9:29जीवित सुखी जीवित भस्मभूतस देहस्य पुनर आगमनम।
- 9:40रिन उठा लो घी पी लो। आखिर में दोनों बसें भूत हो जाते
- 9:47हैं। न रिन लेने वाला, न रिन देने वाला
- 9:52दोनों ही तो नहीं बचते। फिर क्यों ना खाया खेला जाए, मौज
- 9:59उड़ाई जाए इसे तुम ऐश के कोई नियम को नहीं मानता वो नियम आप बताइए,
- 10:11ऐसी भाषा का प्रयोग करेगा। इमानदार रोग है।
- 10:16माँ किस कहेगा परमात्मा नहीं धर्म अफीम का नशा है ठीक कहते हैं कम
- 10:30से कम जोत तो नहीं बोलते हैं बस इन व्यक्तियों में एक प्रकार की।
- 10:40काबिलियत होती है और क्या ईमानदारी?
- 10:44ये ईमानदार लोग हैं सब चारवा हो, मारकस हो नीचे हो इमानदार है अचार
- 10:55चार लोग। ये दोगलापन नहीं करते, जीस चीज़
- 11:02को नहीं जानते, कहीं तो नहीं जानते एनलाइटनमेंट नहीं होती।
- 11:07बड़ी ईमानदारी की बात है और ईमानदारी से बोलने के लिए कलेजा
- 11:11भी चल रहा है। साहस तो बड़ा होना चाहिए।
- 11:17साहसी भी है लेकिन साहसी होने का मतलब शक्ति होना नहीं होता।
- 11:25सत्य जो है वह तो है साहसी तो शेर भी पड़ा होता है।
- 11:35लेकिन शेर क्या करता है? वध करके खाता है, हिंसा करके खाता
- 11:40है, एक प्रकार का अपराध करता है। ध्यान रखें, मैंने शब्द प्रयोग
- 11:50किया, एक प्रकार का अपराध करता कैसे फर्क करें?
- 11:59दो व्यक्तियों का एक ने खुद के तल को छू लिया।
- 12:05जान दिया हो एमआइ इससे रमन कहते हैं, जानो अपने आप को।
- 12:15अपने आप को जानना एक पड़ाव है और यहाँ तक पहुंचना अनिवार्य है।
- 12:24आगे की मंजिलें तय करने की थी, लेकिन मंजिलें आगे भी हैं।
- 12:35राहतें और भी हैं। फसल की राहत के सिवा राहतें और भी
- 12:46हैं फसल की राहत के साथ। और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत
- 12:56के सिलवा गम और भी बहुत हैं और राहतें भी और बहुत हैं यहाँ आकर।
- 13:07पड़ाव है। लक्ष्मण लक्ष्य पूरा करते हैं
- 13:13कृष्ण अल्लाह से नानक ये फिर कभी लौट के नहीं आते हैं।
- 13:26बस इन्हें तुम पुकारना ही रह जाते हो और जो लौट के कभी नहीं आता
- 13:31उसकी तुम पूजा करना शुरू कर देते हो ये लौट के कभी।
- 13:36नहीं आए लेकिन बुध। लौट के आए हैं।
- 13:46बुध के लौटने का आज भी इंतजार है। मैत्री के रूप में किसी नित्यानंद
- 13:57में प्रवेश करने की कोशिश होती। किसी जिद्दू कृष्ण मूर्ति में
- 14:04प्रवेश कराने की कोशिश होती, नाकाम हो जाती।
- 14:09गर्भ कोई उपलब्ध नहीं होता, कुछ रह के ना बाकी है रह क्या क्या
- 14:21कृष्ण होना बाकी है? बुध से कृष्ण तक की यात्रा अभी
- 14:26बाकी है। सब है यहाँ की तृप्ति भी है,
- 14:39बुद्ध अतिरिक्त नहीं है, स्वयं के पास पहुँच के व्यक्ति अतिरिक्त
- 14:46नहीं रहता। एक बात को ध्यान में रख लेना
- 14:53आचार्य और बुद्ध में भी आचार्य तुम्हें संतुष्ट करना चाहता है
- 15:01यहाँ की वस्तुओं को तुम्हें सीखाता है डिग्री देता है।
- 15:12तुम्हें कुछ सूचनाएं उपलब्ध करवाता है उससे तुम कुछ हासिल
- 15:18करते हो लेकिन वो हासल आनंद नहीं है।
- 15:24इसलिए बुद्ध के तल पे आचारण को मत।
- 15:29ये बिल्कुल निम्न स्तर है। यहाँ सुख तो है, सुविधा तो है,
- 15:37राजगदियाँ भी हैं लेकिन बुध के पास कुछ अलग है।
- 15:45वो तो पहले भी था। बुध के पास जीसको छोड़ के चले गए।
- 15:53जो आज आचार्य इस मुकाम पे तुम्हें पहचानी चली है उसे बुद्ध कब के
- 16:00लात मार? चूके हैं तो फिर।
- 16:03बुद्ध ने और क्या पाया? बुद्ध ने अपना होना पाया।
- 16:12जब घर से निकले तब वासनाओं से भरे थे, अभी कुछ चाहिए था, सुख है,
- 16:23सुविधाएं हैं, लेकिन तृप्ति में संसार का सब कुछ।
- 16:31सोकर सुविधा देता है, तृप्ति नहीं देता, अतिरिक्त मन से निकलते हैं
- 16:44और 1 दिन तृप्त हो जाता। है।
- 16:50फिर अब तृप्ति से परम तृप्ति होती यात्रा यह बुद्ध से कृष्ण तक की
- 16:58यात्रा है। बुद्ध इतने मधुर ना हो पाएगा?
- 17:07बुद्ध बंसुरी नहीं बजा सकता है। ध्यान रखना बुद्ध निधि वन में
- 17:14राधा के साथ डांस नहीं कर सकते, नाच नहीं नहीं जा सकते।
- 17:22बुध बैठ सकते हैं, अपने भीतर के रास का पालन कर सकते हैं।
- 17:27तृपते हैं। उनके चेहरे से उनकी शांति और
- 17:32तृप्ति की लावण्या झलकेगी। ज़रा भी तो कमी नहीं लगेंगी बाहर
- 17:40से, लेकिन भीतर अभी थोड़ी सी कमी है कुछ भी कह दो।
- 17:50शायद तुम अभी ये फर्क न कर सको, लेकिन मीरा बिरहा की अगली में जल
- 17:58रही थी। बिरहा भी तो एक प्रकार की दूरी
- 18:05है। अभी वो बंसरी वाला गिरधर पापा,
- 18:13आयन तो मीरा नहीं जीतने, गीत लिखे जीतने गीत गाए गाये तू गिरधर करी।
- 18:27लेकिन तब तक अतिरिक्त रही कहानी कहती है के आखिर में मीरा जाते
- 18:36हैं, कृष्ण की मूर्ति में समाहित हो गई बस यहाँ वह पूर्ण हो गए।
- 18:47कृष्ण में समाहित होने का मतलब पूर्ण पूजा परमात्मा मैं अपने
- 18:54आपको बिलीव करता हूँ। उससे पहले वे हाथ की अग्नि में जल
- 19:02रही है और रो रही है। छटपटा रही है बिरहा के गीत बड़े
- 19:10दुखदायीं हैं, उसके हृदय की भीतरी पुकार को सुनकर बड़ा रोदन होता है
- 19:20लगता है कि दुखयारी है? थोड़ा सा तो दुख है बिरहा का दुख
- 19:28थोड़ा सा दुख तो होता है क्या ही पता ना लगे लेकिन बिरहा भी आवश्यक
- 19:38है। इन गलियारों से भी तो निकलना होता
- 19:42है। तो मीरा बिरहा की मारी है गली गली
- 19:49कूंचे कूंचे द्वार द्वार दौड़ती है कोई सुध बुध नहीं उसे अपने।
- 20:03और ऐसी दीवानी हो जाती है वो कैसी है?
- 20:09मेरा दुख कोई जानता नहीं है। काश मेरा दुख कोई जान बिरहा का भी
- 20:19थोड़ा दुख है। वे राह भी पीड़ा देती है।
- 20:23बुद्ध कितने भी बुद्ध हो जाएं, कितने भी तृप्त हो जाएं, लेकिन एक
- 20:28कहीं ना कहीं माँ मूली माँ मूली दुई बनी ही रहती है।
- 20:37दरार है। ये दरार थोड़ा सा दुख देती है,
- 20:46तृप्त पूरे हैं बुद्ध, लेकिन ये दरार दुखदाई है।
- 20:58मैं पिछले दिनों गिर गया था। सुकना टूट गया था तो डॉक्टर कहते
- 21:03हैं बस बाल के समान तरह और बाल के समान जो दरार थी वो इतना दुख काही
- 21:09थी। कष्टकारी थी स्ट्रांग एनल जैसिक
- 21:14इन्जेक्शन लेने पड़ते थे। चाहे बाल के समान ही दूरी दरार
- 21:22कितनी भी छोटी हो न हो। दुखदायी तो होती है तो बिरहा की
- 21:27गीत ऐसे ही क्यों नहीं निकलते बिरहा के गीत।
- 21:36दरार है अभी थोड़ी सी अभी दरार है, इसलिए निर्माण और
- 21:46महापरिनिर्वाण। समाधि और संबोधि में संतजनों ने
- 21:55फर्क किया। समाधि और महासमाधि में आपको लगेगा
- 22:04कि शायद शब्दों की हेरा फेरी है नहीं स्थितियों की।
- 22:12परिस्थितियों का फर्क है। दरार चाहे बिल्कुल बारीक हो, बाल
- 22:19जितनी सूक्ष्म हो, लेकिन दुख तो देती है।
- 22:27पूछा तुमने पुत्र अर्थ मस्त? और परमात्मा आत्मबोध और
- 22:37परमात्मबोध दोनों व्यक्तियों की पहचान कैसे की जाए?
- 22:42पहली बात तो ये समझ लेना कि सिर्फ शब्दों की बातों को सुन के।
- 22:51अपने न्यूरोस को सूचनाओं से भर मत लेना, फिर मेरे बोलने का कोई
- 23:00फायदा न हुआ। फिर मेरे बोलने का वो फायदा
- 23:04उठाएगा जो न जाने कब किसी एकांत स्थान में बैठ के।
- 23:10मेरे शब्दों का रश पीएगा और अपने गहन अंत स्थल में उतर जाएगा और जो
- 23:17मैं समझाना चाहता हूँ वो बताना चाहता हूँ, जहाँ से ये आवाज़ आ
- 23:22रही है वहाँ तक पहुँच ही जाएगा वो व्यक्ति अत मस्त।
- 23:30और परमात्मस व्यक्ति में फर्क तो है, मामूली दरार ही क्यों ना हो
- 23:39लेकिन थोड़ा सा दुःख तो बना रहता है, वो तो क्यों जन्म लेंगे?
- 23:45क्यों नहीं कृष्ण जन्म लेंगे? तू नहीं नानक जन्म लेंगे तू नहीं,
- 23:53कबीर जन्म लेंगे, महावीर जन्म नहीं लेंगे।
- 24:03वह पूर्ण हो गए के वले में पहुँच गए।
- 24:11महा समाधि में पहुँच गए। उन्हें और जन्म लेने की आवश्यकता
- 24:15नहीं। जन्म उन्हें लेना होगा जो अभी
- 24:18थोड़े से अधूरे। हैं और।
- 24:24ये थोड़ा सा दूरी बहुत बड़ा दुख भी पैदा कर सकती है।
- 24:322500 साल से ज्यादा हो गए। माना कि यहाँ के वक्त की और वहाँ
- 24:40के वक्त की जहाबुध हैं। बहुत फर्क है वहाँ 2500 साल ऐसे
- 24:48ही बीत गए। जैसे ढ़ाई पर बीते और यहाँ 2500
- 24:58साल बीत जाते है लेकिन बात तो चीन की है।
- 25:09बिना उसके संपूर्ण तल को छुए कहीं ना कहीं चस चस चस होती ही रहेंगी।
- 25:25हल्का हल्का दुख दर्द तुम्हें पता भी न चले।
- 25:30तुम अभी पूर्ण स्वस्थ्य न हुए, स्वस्थित हो गए, स्वस्थ्य हो गए,
- 25:37परमात्मस्त नहीं होया परमात्मस्त नहीं हुए यही फर्क यही दरार
- 25:45तुम्हें दुख देखी बड़ी बात है। सरल ढंग से कह रहा हूँ तुम भी
- 25:51सरलता से सुनने का आयोजन करना है। अभी कुछ मुझे एक प्रश्न बीच में
- 26:00लेता चलूं। संगम प्रवाह के साथ यह भी बह
- 26:04जाएगा। बाबा वो जापानी व्यक्ति पहुंचा
- 26:14अर्थ नहीं जानता, शब्दों का सिर्फ सुनकर पहुंचा और बाबा नानक भी
- 26:20कहते हैं। सुनिए दुख बाप का नष्ट महावीर भी
- 26:24कहते हैं कि सच्ची श्रावक बनो सबमें के श्रवण करो।
- 26:28ये बातें मिलती जुलती हैं। इनका थोड़ा सा तात्पर्य सुझाओगी
- 26:36और सुनने की कला बताने का कष्ट करो।
- 26:39बिल्कुल सुनने की कला है कि तुम शब्दों की काँट छाड़।
- 26:47जैसा बोला जाए शुद्ध रूप में तुम्हारे अंतःस्थ में उतर जाए
- 26:52अन्यथा सुनो ही मत तुमने स्वेच्छा से गुरु धारण किया कहीं की कहीं
- 27:03करोड़ा बानुमति ने कुनबा जोड़ा। कुछ उस चैनल से उठाया कुछ उस चैनल
- 27:09से उठाया कुछ उस संत से सीखा कुछ उस संत से सीखा तुम कहीं नहीं
- 27:15पहुंचोगे ब्ले शाह कहते हैं, पहुंचे एक कसमड़े वाली जिसका एक
- 27:23कसम होता है वो पहुँच जाती है। बड़ा प्यारा शब्द है।
- 27:28इसका अर्थ भी उतना गहरा है। तुम एक को ही सुन समर्पण सदा एक
- 27:35के प्रति ही होता है, सबके प्रति नहीं होता, समर्पण एक की प्रति ही
- 27:43होता है। पहुंचे एक समडे वाली अष्टमस्त
- 27:57व्यक्ति और परमात्मा व्यक्ति दोनों आनंदित होंगे।
- 28:05दोनों तृप्त होंगे, लेकिन ध्यान रखना यह अनुभव की बात।
- 28:12ये दरार? तो मैं छूती ही रहती हूँ।
- 28:15अन्यथा बुद्ध क्यों? जन्म लेते।
- 28:18क्या पड़ी थी? आवश्यकता क्या थी?
- 28:24कृष्ण क्यों नहीं जन्म? लेते।
- 28:30शून्य का तरीका। क्या है?
- 28:32सम्यक श्रवण का तरीका क्या है? तुम जागते जागते सुनोगे तो
- 28:38तुम्हारी बुद्धि लुत्फ उठायेगी। अगर तुम समर्पित हो तो?
- 28:44ध्यान से सुन लेना। इस बात को।
- 28:48जागते। जागते अगर किसी का प्रवचन सुनोगे।
- 28:53तुम्हारी बुद्धि। अगर उसके प्रतिपूर्ण समरपस्थ है।
- 28:58तो वह कोई बाधा। नहीं बनाएगी उन शब्दों को यथावत।
- 29:05प्रवेश करने देगी अपने अंत स्थल तक।
- 29:10और वो शब्द? भीतर जा के रस को स्टोर कर देगा।
- 29:17तुम्हारी बुद्धि ने। रोक टोक नहीं की किसी को रोका
- 29:20नहीं। किसी शब्द को रोका तो याद रखना
- 29:23शब्दों के साथ। अगर तुम किसी शब्द को तुम्हारी
- 29:31बूटी काटती है, तो भूल जाती है उसे पता है के इन शब्दों के साथ
- 29:35कुछ रस भी लबड़ के आया लिपट के आया।
- 29:40कुछ शब्दों को काट। शाट किया तो उस रस की भी कट होती
- 29:44है। ये है सम्यक।
- 29:48श्रावण महावीर कहती हैं सम्यक श्रावण।
- 29:54जाने तुम्हारी बुद्धि कोई। काँट शर्ट ना करें?
- 29:59बुद्धि को अलग से। नहीं रख सकते तुम?
- 30:03लेकिन बुद्धि को अलग रख सकते हो, अलग से नहीं रख सकते अलग रख सकते
- 30:08हो। बुद्धि को बीच में।
- 30:11मत आने दो। तुम सुनो।
- 30:14बुद्धि भी सुनेगी, कोई कांच हंट न करे, कोई सेंसरशिप न करे जैसे
- 30:21शब्द आए। जैसे आये।
- 30:25जीस प्रकार आये। जीस ढंग से आये उसी तरह से उनको
- 30:29अपने अंत स्थल में उतरने दे मार्ग बना दे।
- 30:35दिन में तो कभी। कभी तुम्हारी बुद्धि अड़ेगी।
- 30:39बड़े से बड़ा। समर्पण करता।
- 30:43कहीं ना कहीं। पढ़ सकता है।
- 30:49तो फिर क्या करें? फिर एक काम करो।
- 30:53रात को सोते हुए आज तो ये इन्स्ट्रुमेंट्स उपलब्ध है बैठे
- 30:58जमाने में नहीं थे। आज वीडियो पर।
- 31:05लगा लो। कान में ईयरफोन।
- 31:11को लगा लो चलती वीडियो को सुनो। आपको नींद आ जाती।
- 31:20है। वैसे भी नींद आ जाती है तो।
- 31:24लेकिन उस नींद को रात की नींद को रोको मत, दिन की नींद को भी मत
- 31:28रोको। ये बड़ा कीमती?
- 31:32सूत्र है। दिन में भी अगर।
- 31:36तुम मुझे सुन। नींद आ जाए।
- 31:41जगाओ मत अपने आप। उसे आनंद है, वह लोरी की।
- 31:48सौगंध है और रस की तृप्ति का आनंद है।
- 31:55वो तुम्हें सुला। रहा है हिलोरे दे रहा है।
- 32:01और तुम ज़रा भी जागने की कोशिश मत करो।
- 32:04नहीं। गायक अन किसी योग निद्रा।
- 32:09को पाने के लिए। बड़े बड़े योगी कंदराव में कितना
- 32:13अभ्यास करते हैं? लेकिन ये योग निद्रा आती है।
- 32:18आती नहीं। तुम्हें सहज लग।
- 32:21जाती है। सिर्फ सुनिए दुःख पाप का नाश।
- 32:25सिर्फ सुनने से। सिर्फ श्रावक सबमे का श्रवण बनने
- 32:29से। कान में लगा के।
- 32:34सो जाओ। वीडियो को चलने।
- 32:40जितनी देर। चली चली रुकी रुकी तुमको पर फिक्र
- 32:44ना करो। बस रात।
- 32:49को जब बुद्धि भी सो जाती है तुम्हारी।
- 32:53वो शब्द। तुम्हारे अंत।
- 32:57में चले जाते हैं। बिना किसी रोक टोके।
- 33:01उन्हें सेंसर करने वाला सो गया है।
- 33:05उन्हें कोई पहरेदार रोकता नहीं। कोई जवाब बदल भी नहीं होती।
- 33:11कोई पूछ्ताछ। नहीं होती, कोई इन्क्वायरी नहीं
- 33:14होती। बड़ा विश्वास का।
- 33:21काम है। इसे ही कहते हैं।
- 33:25तो उसकी श्रद्धा विश्वास। और इसके बिना कहते।
- 33:30मिलता नहीं या व्यायाम बिना ना पुश।
- 33:39तो तुम वीडियो को। ऑन करो अभी लोग बहुत से लोग कर
- 33:42रहे हैं। रात को सोते।
- 33:45वक्त कान से निकाल लेते हैं, नींद वैसे ही आएगी, उसको आने, जागने की
- 33:51कोशिश करो, उनके अलफज़ो का अर्थ जानने की कोशिश मत करो।
- 34:01चल ले तो यथा यथा व्रत सारी की सारी निकल जाओगे।
- 34:11और शब्द भी। निकलोगे और रस भी निकलोगे संग
- 34:16संग। रोज़ बूंद बूंद करके घड़ा भर
- 34:21जाएगा। ये है प्रोसिस जो जापानी के साथ
- 34:29उसने शब्द नहीं पिए। तुम कब के शब्द?
- 34:32पी रहे हो? पांच 5 साल हो गए तुम्हें शब्द पी
- 34:35के। काठ शाट करते।
- 34:38हो अर्थ देखते हो? फिर सवाल जवाब करते हो, हालांकि
- 34:42किसी सवाल जवाब का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
- 34:45कोई मतलब नहीं रह जाता। अंत में तुम पाओगे शब्द बेकार
- 34:50हुए। शहद ही।
- 34:55काम आया। जो शब्दों से।
- 34:59लिपटकर संग आया था शब्दों के। रूपांतरण।
- 35:03उसी ने किया आनंद, उसी से मिला घड़ा उसी से भरा शब्द तो बाहर फिर
- 35:10जाएंगे बाहर फेंक दिए जाएंगे प्राकृतिक।
- 35:14व्यवस्था के कारण। लेकिन वो आनंद बाहर नहीं फेंकेगा।
- 35:23उससे घड़ा बढ़ता रहेगा। बूंद बूंद बूंद इकट्ठा होता
- 35:27रहेगा। प्रोसेसर।
- 35:30लंबी हो सकती है। लेकिन दो फायदे।
- 35:35हैं। एक फायदा तुम्हें नींद बड़ी
- 35:37सुन्दर आएगा। इन सुम्मनिया।
- 35:41के प्रेषण से आजमा सकते हैं, लोरी की तरह काम करेगा और नींद बड़ी
- 35:47गहरी आएगी। और क्वालिटी।
- 35:50नींद की बड़ी क्षमता। जिसे योगी।
- 35:56तरसते हैं, इसे योग निद्रा कहते हैं।
- 36:04योग निद्रा का अर्थ। तुम एकाकार हुए परमात्मा।
- 36:09और एकाकार। होकर जो नींद आई उसे योग निद्रा
- 36:12कहते हैं। उस सम्मिलन के कारण जो नींद आई।
- 36:18अद्भुत नाम। था।
- 36:21हालांकि योग। होने के बाद जागृति होती है,
- 36:25निद्रा नहीं होती। लेकिन ये अद्भुत शब्द दिया जैसे
- 36:30मैंने कहा मदहोशी मदहोशी का तुम सीधा सा शब्दी का अर्ज निकालोगे
- 36:37तो पज़ल हो जाओ मद तो शराब के नशे को कहते हैं और होश होती है,
- 36:42जागृति अवेयरनेस दोनों को मिलाओगे कैसे?
- 36:46लेकिन वह ताल ही ऐसा है। वह होष परिपूर्ण।
- 36:50है। और अमृत का?
- 36:53स्वाद भी परिपूर्ण है। दोनों है भरपूर।
- 36:57मात्रा में है और परिपूर्ण मात्रा में है, तो दोनों का संगम है।
- 37:03शुद्ध भी शराब। व्यवस्था हो रही है।
- 37:08वो काला इकबंसेल वाला। माखन।
- 37:14चोर व नंदकिशोर चोर। करबयो मन।
- 37:18की चोरी रे? शुद्ध भी सराह के।
- 37:23मोरी रे। मदहोशी बिल्कुल उलट शब्द हैं।
- 37:29दोनों मद है बेहोशी का नाम शराफ। तुम डूबे उस आनंद की।
- 37:39लहरों में तुम खोए। और जब खो गए।
- 37:45तो फिर होश मदहोश। जब स्थिति ऐसी होती है की स्थिति
- 37:56दोनों तरफ इशारे करते हैं। तो ऐसे ही।
- 38:00विपरीत शब्द खोजे जाते हैं। तो उस भीतर।
- 38:04के रस को व्याख्यान करने के लिए ये शब्द गड़ा गया।
- 38:09मद कोसी खुमारी। बुद्ध के तल पे।
- 38:19आनंद पूरा है, लेकिन पूरा होने के बाद तो बड़ी सी कमी।
- 38:29वो थोड़ी। सी कमी।
- 38:31मैंने कहा हड्डी घिसक गई थी, बाल समान हड्डी घिसक गई थी।
- 38:37किसी को पता न चलता था, लेकिन मुझे पता चलता था।
- 38:41बेहद दर्द हो। रहा है।
- 38:48और इन्जेक्शन से। निपट रही हैं।
- 38:50ट्रिम मतलब? में तो दीवाने।
- 39:55री में तो प्रेम दीवानी घायल की गति घायल जा।
- 40:19जो घायल हुआ है। वो भी घायल की गति जानता।
- 40:25है घायल। की गति खा ल जानें।
- 40:34घायल की गति घायल। तो प्रेम।
- 40:57दीवाने में रो दर्द न जाने को। ऐसा दर्द होता।
- 41:10है, कोई नहीं जान सकता। बुद्ध में थोड़ा।
- 41:14सा दर्द होता है। एक धरा।
- 41:18बाकी है आत्मस व्यक्ति में। तृप्त होता।
- 41:24है। कोई वासना शेष नहीं होती, कोई
- 41:29कल्पना शेष नहीं होती, कोई सोपन नहीं देता वो।
- 41:33कोई भविष्य के। सपने संजोता नहीं कोई, अतीत की
- 41:36स्मृतियां, कंगालता नहीं। कुछ भी तो नहीं।
- 41:40करता ठहर किया है, परम ठहराव ने जीता है, परम शांत है, ज़रा भी
- 41:45तूफान का वेग नहीं, कोई हिलोरा नहीं उसके भीतर।
- 41:50कोई यादों के। झरोखे से।
- 41:54ओके समृति को। उगाड़ के राता ने जरूरत भी नहीं
- 41:58रह गई अब लेकिन फिर भी थोड़ा सा। इसे ही बिरहा।
- 42:06कहते हैं बिरहा और वि योग ये शब्द दो हैं।
- 42:11लेकिन बियोग खुशहोर है बिरहा खुशहोर है।
- 42:17बिरहा में। थोड़ी सी हल्की सी तरह और वियोग
- 42:21में तो बिल्कुल अलग हो जाना होता है।
- 42:25जिसका अभी योग? नहीं होता है।
- 42:30बिरहा में। थोड़ी दूरी बनी।
- 42:33हुई है। थोड़ा उसको गले से लगा लेना चाहती
- 42:40हूँ और वह वियोग अगर गौर से देखा जाए तो जान निकलती है।
- 42:49उसी। वह योग?
- 42:53लेकर आदम जीवंत नहीं रह सकता, जैसे जैसे बारिश होती है, हवाएं
- 43:04ठंडी होती हैं। उसके वजन से।
- 43:07टकराती हैं। वो दर्द गाना।
- 43:11होता है तुमने देखा कभी तुम्हे कोई चोट लगी हो?
- 43:15ज़िन्दगी में हड्डी पर सर्दी का मौसम जब लहरें चलती है सर्द।
- 43:25वह हड्डी दुखने लग जाती है। कितनी भी जुड़ गई सर्द जोकों से,
- 43:38धधकते बदन में। सर के जोखों।
- 43:52से धधकते हैं बदन में शोले? जान ले लेगी ये बरसाती करी
- 44:18बाज़ार। आनंद पूरा।
- 44:42होगा। स्थायित्व पूरा।
- 44:47होगा। अडोर होगा हकम्प होगा, कोई वासना
- 44:54उसके भीतर नहीं रहेगा। परम धैर्यवान।
- 44:58होगा निर्वासना होगा। लेकिन फिर भी मीरा?
- 45:03कहती है कि तुम नहीं जान सकोगे। घायल की गति।
- 45:08घायल मीरा जानती है के गर्त को। तुम नहीं जानोगे।
- 45:17क्योंकि घायल हुई है। घायल ही।
- 45:20मेरा सेम 70 की बात कर रही है मेरा।
- 45:27वो कहती तुम्हारे बस की बात क्योंकि तुम कभी घायल हुए।
- 45:33कैसे जान पाओगे? उस स्तर पे।
- 45:36पहुँच कर भी व्यक्ति कभी कभी घायल होता है।
- 45:41जो आगे नहीं। जाता वो घायल रह जाता है।
- 45:48बुद्ध वो घायल है। जो उससे आगे नहीं।
- 45:52जाते लेकिन पूर्ण है। आनंद घना।
- 45:57है, तृप्ति पूरी है, मन वटिकता नहीं, परम विश्राम में है कोई
- 46:03वासना में मुक्ति, कोई अपूरक लक्ष्य नहीं बाकी।
- 46:08कोई जंजा बात? नहीं आती, लेकिन कुछ तो है।
- 46:14जो अभी फिर से। जन्म लेना पड़ेगा।
- 46:18तुम कहते हो अपने कुछ कर्म भोग भोगने के लिए नहीं।
- 46:23यह कोई कारण न। हुआ।
- 46:27अभी मिलान। थोड़ा सा कम हुआ है।
- 46:33अभी। आत्मस्त से परमात्मस्त होना।
- 46:37यह काम बाकी। है।
- 46:39यह दरार बाकी है इस तरह को वरना। इताशाही।
- 46:46दरार बड़ा दुख करता है। बुद्ध कर्म भोगने।
- 46:51के लिए तो आएँगे ही आना ही पड़ेगा।
- 46:55लेकिन बात है उस। दरार की जो दुख देती है।
- 47:01और इसको व्याख्याय। करती है, मीरा ही कर सकती है।
- 47:05और मीरा का दर्द। उस दिन बढ़ता है जीस तन को।
- 47:09विलीन हो जाती। है भगवान कृष्ण की मूर्ति क्या?
- 47:14ऐसा ही बुद्ध को। भी 1 दिन विलीन होना पड़ेगा।
- 47:17जैसे कृष्ण विलीन हो गए जैसे नानक विलीन हो गए, कबीर विलीन हो गए,
- 47:23वीरा विलीन हो गई। ऐसे ही बुद्ध को भी विलीन होना
- 47:26पड़ेगा। ये अंतिम स्थिति।
- 47:32बड़ी बड़ी। बात है और अनुभव की बात है।
- 47:37मैं कह रहा था। सारी रात सुनते रहना और फिक्र मत
- 47:42करना। कितनी चली?
- 47:45कब तक चली, कब बंद हुई तुम्हें पता नहीं चलेगा।
- 47:50आंख जो बंद हुई तुम अपने भीतर उतरे।
- 47:54तुम उस स्तर पर। चले जाओगे।
- 47:57जहाँ पर रोज़। जाते हो जहाँ पर तुम खुद बैठे हो,
- 48:02तुम्हारा खुद का होना वहाँ है, और बड़े आनंद स्वर हो तुम।
- 48:08उस आनंद के पास यानी अपने ही पास पहुँच जाओ।
- 48:15कोई कमी तो नहीं? होती वहाँ वहाँ सारी रात पियोगे
- 48:22उसको? वो तो पियोगे?
- 48:24ही पियोगे? लेकिन यह जो वाणी का आनंद
- 48:28तुम्हारे भीतर घड़ा बूंद बूंद करके रस से भरेगा, यह एक्स्ट्रा
- 48:35बेनिफिट है। पर यही भर।
- 48:39जाए। यही है लक्ष्य तुम्हारा।
- 48:45यही संत? का लक्ष्य है, यही भक्त का लक्ष्य
- 48:49है। संत और।
- 48:53भक्त दोनों जबरदस्त से परिपूर्ण हो जाते हैं तो उनकी यात्रा।
- 49:01परम विश्राम। की गति को उपलब्ध हो।
- 49:05यह स्थिति। ऐसी है और आएगी कैसे इसको रात भर
- 49:10पीना? यद्यपि तुम्हें पता नहीं चलेगा।
- 49:15दिन में भी सुनोगे लेकिन बुद्धि? गाहि बगाही पड़ जाएगी?
- 49:22काटेगी। ये कैसे बहुत ऊपर के तल पे हो गए
- 49:28तो सुनना ही मत अगर ऐसा तर्क करना व्याकनाचार्य वरना बाबा आगास आगास
- 49:36नहीं आकास आकास होता है तो तुम व्याकनाचार्य हुए।
- 49:41तुमने शब्दों को पकड़ लिया, शब्दों के भीतर शब्द तो सिर्फ
- 49:45तुम्हें समझाने के लिए थे। इशारे तो मात्र राह दिखाने के लिए
- 49:50होते हैं। शब्द तो एक इशारा।
- 49:53है शब्द तुम्हें समझाने के लिए नहीं होते।
- 49:59और वह समझाता। भी नहीं।
- 50:01शब्द इशारे के लिए होता है और यद्यपि इशारा भी परिपूर्ण नहीं
- 50:06होता, इशारा भी कहीं जाकर समाप्त हो जाता है।
- 50:09मैं कहूंगा रहा है चंद्रमा, लेकिन यहाँ तो खत्म हो ही जाएगा।
- 50:14इशारा कहीं तो। खत्म होगा।
- 50:19लेकिन तुम उसी को अगर चिपट के बैठ जाओगे, हाँ, मैं मैं समझ गया।
- 50:26कुछ नहीं समझे तुम तुमने गलत को पकड़।
- 50:30लिया। इसलिए जागते।
- 50:33जागते अगर ना पहुँच सको। तो यह तरीका भी।
- 50:39अपना लेना। वो भी अपना लेना।
- 50:43ये भी अपना लेना जीस दिन, दिन में तुम ना सुन पाओ उस दिन रात को
- 50:48सोये सोये रात को सोते तो हो। ये रोज़ ही तरीका।
- 50:54आजमाना बहुत से दो इस क्रिया को अपना।
- 51:00और वो मुझे। कमेंट आते ही बाबा धन्यवाद जीने
- 51:04का रास्ता मिल गया। जीने का ढंग आ गया।
- 51:07हमें तो पता ही नहीं था जीना किसे कहते हैं कुछ क्रिया योग और कुछ
- 51:14आपकी यह देन? दोनों मिलाजुला।
- 51:18के हमें विश्वास हो चला है कि 1 दिन हम उस मुकाम पर पहुँच जाएंगे
- 51:25और ये विश्वास भी तुम्हें सहायता करेगा वहाँ पहुंचने के लिए।
- 51:31गहन विश्वास। भी मददगार होता है।
- 51:41आशा है कि दोनों। में आत्मस्त और परमात्मस्त
- 51:44व्यक्ति का फर्क बाहर से कैसे करें?
- 51:47करना थोड़ा सा मुश्किल। है।
- 51:50बुद्ध बिल्कुल वैसे ही लगेंगे, लेकिन बुद्ध नाचेंगे।
- 51:58ठहराव पूरा होगा। आनंद पूरा होगा, शांति पूरी होगी।
- 52:02भेद बुद्धि बिल्कुल नहीं रहेंगी और यही तो परमात्मस्त व्यक्ति का
- 52:07भी यही रक्षण है। लेकिन आत्मस्त।
- 52:11व्यक्ति में एक चीज़ नहीं होगी जो परमात्मस्त व्यक्ति में है क्या?
- 52:17जो नानक में है। गाते हैं, मस्ती से गाते हैं।
- 52:23मीरा नक्षती। है।
- 52:27होंठों पे। वंशरे लिए मुरली बजाते हैं कृष्ण
- 52:33चैतन्य महाप्रभु? नृत्य करते हैं।
- 52:41शंकर जब अपने। अद्वितीय रंग में होते हैं, तो
- 52:44तांडव करते हैं। यह जो कृष्ण में।
- 52:50है, जो शंकर में है, जो मीरा में है जो नानक में है।
- 52:54सुरती में गुम हो जाएंगे कभी? और भी सभी।
- 53:01में। लव से चुप हो।
- 53:04जाए जैसे जीव तालुए से लग गई हो। क्या कहें किस्से?
- 53:10कहें क्या बोलें? कुछ बोलने को बचा।
- 53:22क्या? बुध नहीं कर पाएंगे बस बोलेंगे
- 53:24भी। बुध निक्शल भाव।
- 53:29से मूर्तिवत बैठे भी नजर आएँगे परम शांत।
- 53:35लेकिन कोई गीत? ना बजेगा, कोई संगीत ना उठेगा।
- 53:42हृदय गायेगा नहीं ये गायन ना होगा।
- 53:52और वह रस। फूटता है जब भीतर का परमात्मस
- 53:57व्यक्ति के भीतर ही फूटता है ध्यान रखना।
- 54:02आत्मस्त व्यक्ति। के भीतर।
- 54:06तो इतना सा। होता है आनंद कि वह खुद को
- 54:10स्थायित्व प्रदान कर दे, खुद का रोम रोम मग्न हो जाए और वह अविचल
- 54:17भाव से बैठ जाए। शांत।
- 54:19मूर्तिवत बिलकुल पाशान जैसा लगेगा, आनंद गहरा होगा।
- 54:29चेहरे पे नूर। छलकेगा।
- 54:31लेकिन बाहर से तुम पहचान ना पाओगे।
- 54:34तो फिर मीरा। बताती हैं इस बात का कि घायल की
- 54:37गति खाये जा। या चिन्ह।
- 54:42घायल होए बस जो घायल हो गया उसे पता है कि कमी क्या है, लगती तो
- 54:47है नहीं। लेकिन मेरा बता।
- 54:52सके कि इस विराह की अग्नि को विराह भी तो दुख है एक प्रकार का।
- 54:59जहाँ जलन भी नहीं। कृष्ण?
- 55:03जलते नहीं, नानक जलते हैं जब तक पहुंचते नहीं और तृप्ति में गीत
- 55:12गाते हैं पपीहे से और लगी। सारी रात गाते हैं।
- 55:18और ये गाना भी उनके बेरहा से आता है।
- 55:23कबीर भी गाते हैं। बिरहा के।
- 55:29गीत लेकिन मिलन के बाद जो गीत निकलता है भीतर से।
- 55:36उसकी गुणवत्ता। थोड़ी बदल जाती है।
- 55:41तो बुद्ध कभी। बाँसरी ऑटो पे नहीं लगा सकेंगे।
- 55:47ज़रा सोचो बुद्ध। नाचने लगे।
- 55:49कैसा दृश्य होगा? सोचो।
- 55:54बुद्ध नाचने लग। जाएं।
- 55:55चैतन्य महाप्रभु की तरह है बुद्ध नाचने लग जाएं, शिव की तरह बुद्ध
- 56:00नाचने लग जाएं। मीरा की तरह पद को गुरु बांध के
- 56:03तो कैसे लगेंगे? बड़े आदम से।
- 56:07मालूम पड़ेगा। क्योंकि नाचेंगे।
- 56:10तो लेकिन नाचने का भाव नहीं होगा। बस ये नाचने का भाव एक्स्ट्रा।
- 56:18ये एक्स्ट्रा? है जो शेष रह गया है यात्रा में।
- 56:24वह अभी बुद्ध को। पाना है।
- 56:29तो बुद्ध के शब्द। बताएंगे।
- 56:32अपने दीपक स्वयं बनो। तुम ही कर सकते।
- 56:36हो उसपे मत छोड़ दो। इसलिए जो यज्ञ।
- 56:43वल्क कहते हैं। और वो दिन।
- 56:46कह पाए जो कृष्ण कहते हैं। और बुध ना कह पाएंगे।
- 56:55तुम्हें जानकर हैरानी होगी संकल्प का मार्ग लिए महावीर तुम कहते हो,
- 57:04संकल्प का मार्ग है, लेकिन तुम्हें पता नहीं तुम आय तक पहचान
- 57:08गए। बुद्ध फिर भी मांगने।
- 57:11चली जाती है। लेकिन महावीर तो।
- 57:18सिथानिक के अंदर जो खाना लेके आते हैं उसे ही वापस कर देते हैं कि
- 57:22नहीं तुम जाओ, वो चाहेगा मुझे जलाना।
- 57:33तो वो मेरे हिसाब। से व्यवस्था कर देगा।
- 57:37मैं जो लगाऊंगा। शर्त।
- 57:40वो शर्त पूरी। कर देगा तो मैं समझूंगा, वो जीना
- 57:44मुझे जीना चाहता है मैं जाऊं अभी। मेरी जरूरत है, अभी।
- 57:53और अगर उसने। मुझे खाना न दिया मेरी शर्तों पे
- 57:57तो मैं समझूंगा, वो मुझे जलाना नहीं चाहता इसलिए महीना महीना भर।
- 58:06जैन धर्म के लोग। कहते हैं कि।
- 58:09महावीर? साल में 12 बार खाते थे।
- 58:14क्योंकि उन्हें बारम बार। मिलता था।
- 58:16शर्ते ही इतनी गहन थी, इतनी मुश्किल थी क्योंकि लेकिन
- 58:24परमात्मा चाहता था। केजी।
- 58:28फिर ये संकल्प? हुआ या परम समर्पण हुआ ध्यान से
- 58:31सोच के वतन यह परम समर्पण हुआ। जिसने जीने की।
- 58:37इच्छा ही छोड़ दी उसके ऊपर। वह किसी परम।
- 58:42शक्ति के ऊपर ही छोड़ा होगा। उसने वो विराट हाँ तो देख लिए जो
- 58:48नचा रही हैं सारी सृजना। फिर यह संकल्प।
- 58:52है या समर्पण है? मेरी दृष्टि में।
- 58:57महावीर से बड़ा भक्त नहीं हो सकता।
- 59:02यद्यपि। तुम महावीर को पहचान न पाओगे,
- 59:06भक्त के रूप में। तुम्हें तो बड़ा अजूबा।
- 59:11से रहकेगा महावीर और भक्त हाँ महावीर से बड़ा समर्पण हो नहीं
- 59:16सकता किसी का। महावीर बड़े।
- 59:20से बड़ा समर्पण करते हैं। वो कहते हैं, नहीं।
- 59:25जीने की इतना? ही मैं जियूँगा ही जब तक वो मुझे
- 59:31खुद ना खिला देगा। ऐसा भी मुकाम।
- 59:37आता है। और उस।
- 59:43परम तत्व को। इसकी इच्छा पूरी करनी होती है
- 59:47जैसे महावीर की इच्छा पूरी। धन्ना भगत की इच्छा?
- 59:51पूरी होती है। ऊंट पटांग शर्त लगा देते हैं, खाओ
- 59:56खाओगे तो मैं खाऊंगा। नहीं खाओगे तो?
- 1:00:00मैं। अब यहाँ जाकर बुद्धि हार जाती है
- 1:00:04यहाँ जाकर तुम तर्क करोगे, इसी तर्क को मैं तोड़ता हूँ।
- 1:00:09मैं कहता हूँ कि। तुम सच्चे श्रावक नहीं तुम
- 1:00:14पहुंचोगे जरूर लेकिन असमर्थ होकर वापस आ जाओगे।
- 1:00:20पर मैं चाहता हूँ। कि तुम परमात्मस्त होके वापस आ
- 1:00:24जाओ। तुम आत्मस्त।
- 1:00:27होके भी वापस आ सकते हो फर्क कोई ज्यादा नहीं है।
- 1:00:31बस एक मामूली। सी तरीड है वक्त रह के वो भी भर
- 1:00:34जाएगी लेकिन ये फर्क भी बहुत है। कृष्ण परमात्मस्त हुए 5000 साल
- 1:00:48पहले उस लोटप को पीने लगे। उस सागर में।
- 1:00:54समाहित हो गए, विलीन हो गए। मुरल पे आ।
- 1:01:01जाए कृष्ण तक जाने का मार्ग। बुद्ध से।
- 1:01:12होकर गुजरता है। लेकिन बुद्ध पे?
- 1:01:17ठहर जाओगे। तो मुसीबत कुछ।
- 1:01:21नहीं ये हल्का सा बाल सामान का जो फासला होगा दरार होगी।
- 1:01:31यह हल्का सा दर्द। देके।
- 1:01:34मिरा की तरह। तड़पन बाकी रह जाएगी।
- 1:01:38और आखिर में। मीरा की तरह भगवान कृष्ण की
- 1:01:41मूर्ति में समाहित होना पड़ेगा। फिर खत्म होगा ये बिरहा का आलम
- 1:01:46बिरहा की अग्नि फिर कैसे पहुंचाने जो आत्मस्त व्यक्ति है वह कहेगा
- 1:01:55तुम ही कर सकते हो, कोई दूसरा नहीं कहेगा।
- 1:02:00अप दीपो भव। अपने दीपक के स्वयं बनो, अपना
- 1:02:04मार्ग खुद प्रकाशित करो। और परमात्मा से व्यक्ति।
- 1:02:09कहकर नहीं, तुम्हे कोई आवश्यकता नहीं, संसार को चलाने वाली एक
- 1:02:14संरचना है, बस उसके समर्पित हो जाओ।
- 1:02:17और तुम्हें खुद ही सलाह लेगा सारी सृष्टि को चला रहा हूँ, तुम्हें
- 1:02:23नहीं चला पायेगा तुम तो एक ज़रा भी नहीं हो।
- 1:02:28और वो भी नहीं। देखा जाये तो सत्य है, लाउसे
- 1:02:34बिल्कुल सत्य है। नानक, बिल्कुल।
- 1:02:37सत्य है कृष्ण बिल्कुल सत्य है, यहाँ आकर थोड़ी सी जूठ रखती है।
- 1:02:45बुद्ध के। अंदर थोड़ा सा फासला रखता है कि
- 1:02:50कुछ कमी रह गई। बुद्ध अभी थोड़े से कमजोर दिखाई
- 1:02:54पड़ते हैं। लेकिन बुद्ध से?
- 1:02:58आगे का पूर्ण होने का युगान। विलीन हो।
- 1:03:03जाना अमीरा कर लेती है, नानक कर लेते हैं, कबीर कर लेते हैं,
- 1:03:11कृष्ण कर लेते हैं, चैतन्य कर लेती, शंकर कर लेती।
- 1:03:24बिरहा की। अगन्या भी चढ़ पाती है।
- 1:03:28और उसके भीतर। भी उस दरार का होना प्रकृत करता
- 1:03:35है। उसके बिरहा के गीतों में ये दरार
- 1:03:42की। स्पष्ट जलक मचती है जो में सजा।
- 1:04:17इतना। गर्मियों को।
- 1:04:26जो? मैं ऐसा जानती।
- 1:04:34पृथकः दुख हो। नगर।
- 1:04:42डंडोरा की। प्रीत नकरियों को।
- 1:05:05धन्यवाद।