Latest / Baba ji Vijay Vats / 15 May 25 - तुम्हारे न पहुंचने का कारण कहीं आलस्य तो नहीं? आलस्य और असहाय में फर्क? Japji Sahib paudi 17.
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- 0:01बाबा जी पुनः खट दर्शनों में कौन सा दर्शन बेहतर है?
- 0:17और सबसे शीघ्र पहुंचा देता है। आइए हम जपजी साहब के शब्द पर चलते
- 0:30हैं। असंख जप असंख, तपता असंख जप।
- 0:44असंखपाव असंख पूजा असंख तपता असंख ग्रंथ मुखवेद पाठ असंख जोग मन रही
- 1:00उदास। असंखपगत गुण ज्ञान विचार असंख सती
- 1:09असंख दातार असंख सूर्य महपखसार असंख मौन।
- 1:20ले बलाए तार कुदरत कवन कहा विचार वारा न जामा एक बार जो तू द पा वे
- 1:31सैपलिका तू सदा सलामत नृंकार की सत्र में पड़ी है जब से।
- 1:50पूछा कौन सा विधान, कौन सा नियम, कौन सी धारणा या तप पर ठीक रहेगा?
- 2:02हमें जाने के लिए कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है?
- 2:09अब देखिए बाबा क्या कहते हैं बाबा कहते हैं कोई व्यक्ति जाप कर रहे
- 2:16हैं। असंक जाप बहुत से व्यक्ति जब्त कर
- 2:21रहे हैं। असंकोपा।
- 2:25बहुत से लोग भाव से प्रेम से श्रद्धा से नमन कर रहे हैं।
- 2:33प्रसंग पूजा कुछ लोग पूजा करते हैं।
- 2:39प्रसंग का तपता। बहुत से लोग तप करते हैं, एक पांव
- 2:44पे खड़े हो जाते हैं, सिर के बल खड़े हो जाते हैं, पानी के ऊपर
- 2:50बिछ जाते हैं असंख ग्रंथ मुख वेद पाठ बहुत से लोग वेद।
- 3:03पुराण, कुरान, बाइबल, ग्रंथ गीता इनका वाट करते हैं।
- 3:10प्रसंक जोग मन रही उदास बहुत से लोग योग करते हैं और बहुत से लोग
- 3:18उदासीन रहते हैं, वैराग्य में रहते हैं।
- 3:24उदासी, पंथ ये एक अशंक, प्रगत। गुण ज्ञान विचार बहुत से लोग
- 3:35भक्ति में डूब जाते हैं, प्रेम से और बहुत से लोग तर्क शास्त्र में
- 3:40चले जाते हैं। असंक प्रगति, गुण, ज्ञान, विचार
- 3:48कुछ लोग ज्ञान से विचार से उसका विचार करते हैं।
- 3:55असंकशती असंक दा तार बहुत से लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं,
- 4:06बहुत से लोग दान दानी। असंख सुर बहुत से व्यक्ति
- 4:15शूरवीरता का प्रदर्शन करते हैं। मो।
- 4:21पख सार असंख मौन लिवलाएदार बहुत से लोग मौन हो जाते हैं, चुप हो
- 4:29जाते हैं। और उसके साथ तार लगाने में व्यस्त
- 4:34हो जाते हैं। कनेक्शन जोड़ने में व्यस्त हो
- 4:38जाते हैं योगी हठ योग राज़ योग ये भी एक प्रश्न है बीच में कौन सा
- 4:47योग सिर्फ श्रेष्ठ है? कुदरत कवन कहाँ विचार इस कुदरत का
- 4:55कैसे विचार करूँ? वारया न जावां एक बार मेरी समस्या
- 5:02तो इतनी भी नहीं कि मैं इसके ऊपर एक बार भी बलिहार हो जाऊं।
- 5:11जो तू तू पा वह सैंपलिकार तू सदा सलामत निरंकार, कोई जप करे, कोई
- 5:27तप करे, पाठ करे, पूजा करे, अध्ययन करे, कोई मौन हो जाए।
- 5:42कोई वेद का पुराण का पुराण बाबिल ग्रंथ गीता का सुबह उठकर पाठ करें
- 5:50टल खड़काएं पूजा करें, कुछ वस्तु अर्पण करें।
- 6:00दान करें। ये बहुत से ढंग करते हैं लोग बाबा
- 6:07कहते हैं काहे के लिए करते हैं? बाबा कहते हैं उस परमात्मा तक
- 6:15पहुंचने के लिए यत्न करते हैं। अब सुनिए बाबा के खुद के विचार
- 6:25क्या हैं? खुद के अनुभव क्या हैं?
- 6:33बाबा कहते हैं ये सब तुम्हारा करना, धरना बेकार है।
- 6:40ये सब तुम्हारे इस करने धरने से तुम नहीं पहुंचोगे उस पर्म खुशी
- 6:48में, उस आनंद के समग्र में उस अमृत में तुम नहीं पहुँच पाओगे।
- 7:01ज़ोर न शूरती ज्ञान, विचार ज़ोर न जोगती छोटे संसार किसी भी युक्ति
- 7:09में कोई ज़ोर नहीं जो तुम्हें मुक्त करा दे।
- 7:17कोई भी रास्ता अपना लो। यही कहा कृष्णमूर्ति ने पात लेस
- 7:23पात, वह मंजिल जिसका कोई रास्ता नहीं है।
- 7:39कौन सा रास्ता श्रेष्ठ है? तो बाबा तुम्हें कहते हैं रास्ता
- 7:45ही गलत है, सभी रिश्ते गलत इसी रास्ते पर चले जाओ।
- 7:53तुम पाठ करो, पूजा करो। जप करो, तप करो, स्वाध्याय करो,
- 8:01पुण्य करो, दान करो, कुछ भी करो, लेकिन तुम्हारा करना व्यर्थ है तो
- 8:09सार्थक क्या है? किस्से मिलेंगे वो अनंत खुशी किस
- 8:20कारण से किस कारण ढंग से तुम उस अमृत के सरोवर में छलांग ले
- 8:26पाओगे? बाबा कहते हैं, अप्रया से प्रयास।
- 8:35ए प्रयास प्रयास छोड़ दो ए प्रयास कार्थ का जो तो धब्बा वे सैप अली
- 8:44का ए प्रयास कार्थ ये नहीं है लेजिनेस नहीं है आलसी बन।
- 8:52न तुम पढ़ाई करो, न तुम कॉम्पिटिशन लड़ो, न तुम कोई संसार
- 8:58का काम धम करो, न तुम अपनी डोटी में जाओ, कुछ भी न करो ये आलसपन
- 9:06नहीं कहते हैं बाबा बाबा कहते हैं तुम असहाय हो जाओ।
- 9:13द्रौपदी की तरह जैसे द्रौपदी ने सब बल आजमा लिए और कोई भी बल उसके
- 9:23काम नहीं आया। बल आजमा के पता चला कि मेरे सभी
- 9:30बल। सभी बल काल्पनिक थे, बनाए हुए थे,
- 9:39कोई बल काम न आया। मेरी ही कल्पना के ये पैदाइश थे।
- 9:47न भीष्म काम आए, न दरूण काम आए। ना तातिश्री काम आए, ना विद्रु
- 9:54काम आए ना उसके पति काम आए। कोई भी तो काम नहीं है।
- 10:03फिर किसने शुद्ध बुद्ध में से निकाला तो?
- 10:11जो तू तो पा गए सैंपल कार तुम असहाय हो जाओ।
- 10:21आई कैन डू नथिंग मतलब? ये आलस के ढंग से मत समझ लेना।
- 10:30बहुत से व्यक्ति आलस के ढंग से समझ लेते हैं, आलसी और असहाय में
- 10:35बड़ा फर्क है। आलस होता है कर्म करने से गुरेज
- 10:43करना। समझना बात ठीक से आलस होता है,
- 10:51काम करने से गुरेज करो। बहुत से लोग कहते हैं बाबा आपने
- 10:57तो मौज बना दी, कुछ न करो तो मौज से पड़े रहते हैं भैस के तरह।
- 11:05खाते हैं, पीते हैं, मज़े उड़ाते हैं जीने का सिलिका क्या?
- 11:10मैंने कहा ये क्या खाक चीन का सिलिका है?
- 11:19ऐसे तो पशु में पड़े रहते हैं। तुम खाये पिए सो गए तुम आलसी आलस
- 11:32और असहाय आलस है शक्ति होते हुए शक्ति होते हुए कुछ ना करना।
- 11:47अकरम में आ जाना बस कुछ नहीं करना है और असहाय क्या है असहाय है जब
- 12:00तुम सब कर्म करके सूख जाते हो। अब समझना बात को जब तुम सब कर्म
- 12:10करके सारी शक्ति तुम्हारी चूक जाती है और तुम शक्ति विहीन हो
- 12:16जाते हो, द्रौपदी की तरह तो फिर पुकार उठती है वेदृश्य व्यवस्था
- 12:23होती है असहाय। वह आलूस नहीं होता, द्रौपदी ने
- 12:28आलूस नहीं किया, उसने सभी पतियों की तरफ देखा पांचों की तरफ ललचाई
- 12:35आँखों से कि मुझे बचा लेंगे और जिसकी तरफ देखती वही सर झुका
- 12:42लेता। क्या करें?
- 12:44हम तो खुद ही बंधी हैं, हम तो खुद को हार गए तुमको भी हार गए फिर वो
- 12:51देखती, विषम की तरफ सबसे वृद्ध दादा पिता मैं वो भी सर झुका
- 12:58लेता, फिर गुरु की तरफ देखती त्रौण।
- 13:03वो भी सर झुका रहे और तातश्री को तो दिखता ही नहीं।
- 13:08धृतराष्ट्र को वह तो बनता है लेकिन उसके देखने की महक उसे छूती
- 13:20है। वह तरंगों से प्रभावित होता है
- 13:26लेकिन भीतर ही भीतर वो भी लाचार है भी कुछ नहीं कर सकता।
- 13:33हुक्म दे सकता था, चिल्लाते हुई द्रोपदी को दिखता नहीं था संतत्व
- 13:38था धृतराष्ट्र। लेकिन वह भी कुछ नहीं कर सकता।
- 13:48सभी असहाय इस अवस्था में धर्म के विरुद्ध जा नहीं सकते और धर्म की
- 13:56परिभाषा इन्होंने गलत कर ली। अब इस शब्द को ठीक से मैंने कहा
- 14:04धर्म के विरुद्ध ये जा नहीं सकते और धर्म की परिभाषा इन्होंने गलत
- 14:08कर दी। तुम हार गए बिल्कुल ठीक, लेकिन
- 14:13जुए में हार गए, ये तो ठीक है। और विदरुत तो जानते हैं और विषम
- 14:20भी जानते हैं कि सक्नों ने पासा गलत फेंका बेमानी करते हैं, जब
- 14:31बेमानी करके और पासा गलत फेंका गया।
- 14:35तो भीष्मिता में फौरन उठते और देवव्रत बन जाते हैं, पहले के
- 14:40भीष्म पर अपना धनुष उठा लेते तो सब कांपते भाग जाते हैं।
- 14:50भीष्म का कर्तव्य था। इसलिए जब कृष्ण से पूछा गया कि
- 14:57तुमने सबसे ज्यादा दंड भीष्म को क्यों दिया, तो कृष्ण ने यही कहा
- 15:04भीष्म सबसे ज्यादा गुण हुआ है। वह चाहता तो उस क्षण में जब
- 15:11द्रौपदी लाचार थी, असहाय थी। सभी की तरफ लालची दृष्टि से निहार
- 15:18रही थी कि मेरी कोई लाज बचाएगा। सभी धर्म की अपनी अपनी व्याख्याएं
- 15:26करके इन शब्दों को आप गहरे मिले लेना मैं बार बार बोलता हूँ सभी
- 15:31धर्म की अपनी अपनी व्याख्याएं करके।
- 15:36अपने आपको असहाय बताते रहे। ऋषियों ने सिर झुका लिया, द्रोण
- 15:42ने सिर झुका लिया और मुख्य तो दो ही थे धृतराष्ट्र को दिखता है
- 15:46कृष्ण विद्रवचारे दासी पुत्र थे। बिद्रु का बराबर का रुतबा नहीं था
- 15:56बिद्रु जानते थे सारी चीज़ उन्होंने भीष्म को समझा भी दी थी,
- 16:00लेकिन भीष्म को यह बात समझ आई नहीं थी कि झूठ और कपट से जीता
- 16:08हुआ युद्ध। सच्चा कब्जा नहीं होता, झूठा होता
- 16:18जैसे कोई सरकार बन जाए, सभी सूत्रों को खरीद ले और सभी सूत्र
- 16:31बेईमानी करके उसको तख्त तो निश्चित।
- 16:36तख्त पर बैठा दी तो क्या वो सच में राजा बना नहीं बना?
- 16:42बस ऐसा ही था वो जुए का पासा खेला गया और पासा दुर्व्यधन्य खुद नहीं
- 16:51खेला मज़े की बात? एक तरफ से दुर्योधन और एक तरफ से
- 16:57दावा तो दोनों का था। दूसरी तरफ से युधिष्ठिर युधिष्ठिर
- 17:03तो खुद ही पाशा फेंक रहे थे लेकिन इधर से दुर्योधन बड़ा शरारती वह
- 17:10बेईमान था, वह पाशा बिकवा रहा था। अपने मामा शीर्षक में से और वह
- 17:17फांसी का महारथ ही था। वह बेईमानी करने में माहिर था।
- 17:22कहीं से निकल जाए इधर से निकल जाए, उधर से निकल जाए।
- 17:25उसने सब दांव पे चाहते थे राजनीति के मोहरों के।
- 17:32वही मनी से वो जीत गया, जीत गया तो जानते हुए भी उन्होंने ये शब्द
- 17:40फिर सुनिए। मेरे जानते हुए भी भीष्म ने वह
- 17:45देवव्रत नहीं बना। जो देवव्रत जा के काशी पुत्रियां
- 17:53को अपने बल पर सब राजाओं को हराकर उसकी तीन पुत्रों को अगवा कर सकता
- 18:03है। इतने राजाओं के होते हुए भी
- 18:07अम्बा, अम्बिका, अम्बारिका। किसी राजा की कोई भी ना ही राजा
- 18:14की, ना ही किसी अन्य की, ना ही काशी नरेश की जरूरत पड़ी के अपनी
- 18:22बेटियों को बचा ले। देव व्रत के आगे सब आत्मसमर्पित
- 18:26हो गए। कृष्ण कहते हैं, मैंने सबसे
- 18:32ज्यादा दंड विषम को इसलिए दिया, वह जानता है बेईमानी हुई और वह
- 18:38समर्थ था ही। कोल्ड डू एवरीथिंग बट डीड नॉट।
- 18:47सब कुछ कर सकता है लेकिन नहीं किया।
- 18:51इसलिए सबसे ज्यादा दंडी से मिला इसका रोम रोम छेद दिया गया।
- 19:01यह चाहता। यह भीष्म प्रतिज्ञा को छोड़कर
- 19:04देवव्रत बन जाता और वह तो प्रतिज्ञा टूटती भी तो नहीं थी,
- 19:11वह तो एक न्याय के विरुद्ध खड़ा होना था।
- 19:14अब ये न्याय के विरुद्ध खड़ा हो गया।
- 19:17यही गलती हो गई। देवव्रत बना होता इसने अपना धनुष
- 19:23उठाया होता तो सभी भाग जाते हैं और द्रोपदी कोई जरूरत नहीं थी।
- 19:30कृष्ण की जरूरत नहीं थी द्रोपदी की, लेकिन उसने पुकारा असहाय
- 19:40अवस्था से पुकारा हालत से नहीं पुकारा ये समझो आप।
- 19:44आप पुकारते हो आलस से, क्योंकि आप अहंकार की आहुति दे नहीं सकते
- 19:50इतना साहस ने हमारे में और तुम इन शब्दों को थोप लेते हो जो तुद
- 19:58पावह साईं पालिका ये आलस है। अब मैं एक ही शब्द को दो तरफ से
- 20:05व्याख्या कर रहा हूँ। तुम आदत से भी कह सकते हो वो जो
- 20:10करेगा ठीक कर पड़े हैं। मलोकदास के इस शब्द को दोनों तरफ
- 20:20से देखा जा सकता है। अजगर करे न चाह करी पंछी कर न काम
- 20:28कह तमलोका दासी सब के दाता रहा ये बात तो सत्य है लेकिन पंछी काम
- 20:37करना छोड़ दे काम तो करते है। चोगा चुगने के लिए उड़ते हैं जाते
- 20:43हैं और अजगर भी बिल्कुल पराहि तो नहीं रहती।
- 20:48वह भी शिकार के आते हुए झपटता है उसे और कहा जाता है ओके शब्दों को
- 20:55ध्यान से सुन लिया करो ताकि आपके अंतश में उतार।
- 21:00अजगर करे ना चाकरी अपने हिसाब से मलूक ठीक कहते हैं, लेकिन चाकरी
- 21:08तो करनी पड़ती है। तुम कहोगे नहीं करता वो चाकरी
- 21:11बिलकुल करता है अपने पेट की चाकरी तो करता है ना अपनी भूख की चाकरी
- 21:17तो करता है ना? जब पेट भूखा होता है, आग लगती है,
- 21:27भीतर तेजाब उत्पन्न होता है तो उसे आग लगती कहते हैं चूहे कूत
- 21:32रहे हैं, वेसल में तेजाब बनता होता है।
- 21:36वह तेजाब खाता है। भीतर के मांस को तो तुम्हें लगता
- 21:40है चूहे कूद रहे हैं तो पेट की चाकरी तो अजगर भी करता है।
- 21:49लोग मुझसे पूछ लेते हैं बाबा आज कृष्ण और महावीर को एक वरडे में
- 21:55रख दो। मैंने कहा विरोधी दोनों पल्टों को
- 21:59बराबर करता हूँ, एक मैं कृष्ण दूसरे में महंगी जी क्यों?
- 22:05क्योंकि उसने पेट की भी चाकरी नहीं की।
- 22:10महावीर पेट की भी चाकरी नहीं करते, भोग की चाकरी नहीं करते।
- 22:15वरना उनकी तो बात बिल्कुल उलटी वो तो कहते हैं मैं खाऊंगा, अगर तू
- 22:26मुझे खाने को स्थानक के ऊपर भी देगा तो भी नहीं खाऊंगा मैं
- 22:31खाऊंगा, मेरी शर्तों पे खाऊंगा। ऐसा ऐसा दृश्य होगा तो उस घर से
- 22:38मैं भिक्षा मांगूंगा, एक घर से भिक्षा मांगूंगा, नहीं मिलेंगे,
- 22:42चला जाऊंगा, भूखा रह जाऊंगा। यानी पेट की चाकरी भी महावीर नहीं
- 22:49करते वर्तमान महावीर इसीलिए एक ही व्यक्ति इतिहास में हुआ जीसको
- 22:56महावीर के खिताब से नवाजा गया। वो थे महावीर वर्धमान वर्धमान
- 23:04महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थों पर।
- 23:10मैं इनको इसीलिए कृष्ण के बराबर दूसरी पंडित में रखता हूँ कि
- 23:15कृष्ण सब भोगों को भोगते हुए एक पंडित हैं, लेकिन खुद को जानते
- 23:20हैं और खुद का विस्तार और कम महावीर भी नहीं है।
- 23:25खुद को जानते हैं और केबल में पहुँच के खुद का विस्तार भी जानते
- 23:30हैं। मैं एक सिर्फ मैं ही हूँ कवल्य
- 23:33हूँ बस एक अहम् ब्रह्मस्म यह संतो का वचन दोहराते हुए से शब्द हैं।
- 23:50अगर तुम मुझे चिंता रखना चाहता है तो ऐसा ऐसा दृश्य पेश करते हैं।
- 23:58राजकुमारी हो पांव मैं बेड़ियां हूँ हाथ मैं बेड़ियां हूँ, आँखों
- 24:04में आंसू हूँ और मुझे भिक्षा दें। ऐसी गड़बड़ बातें अगर ऐसा दृश्य
- 24:15देखने को मिलेगा तो मैं वहाँ से शिक्षा ले लूँगा।
- 24:23क्या हुआ? पेट की चाकरी भी नहीं थी।
- 24:26भूक की चाकरी भी नहीं थी। मृत्यु के गुलाम भी न हुए तुम तो
- 24:32मृत्यु सटृत्य हो मेरे पास रोज़ मिन्नतें आती हैं, अरदासी आती हैं
- 24:43और मैं लाख समझाता हूँ और रोज़ समझाता हूँ।
- 24:47हरदासों से कुछ नहीं होगा भाई तो मेरे आगे फरियाद न करो, इसलिए मैं
- 24:54तो फरियादों के बिलकुल वर्थ हूँ, मैं तो योग्यता के हक में हूँ,
- 25:00फरियादों के हक में नहीं, मुझे रोज़ कॉमेंट्स आती है बाबा आप
- 25:06मेरे लिए फरियाद करो। आपने उसके लिए प्रयास कर दी, उसके
- 25:11लिए कर दी मेरे लिए तो मैं कहता हूँ मैं योग्यता के हक में हूँ।
- 25:24जैसे पहाड़ों की भरी हुई पथरीरी जमीन कहे कि हमें उपजाऊ बना दो,
- 25:37क्या कहेगा परमात्मा बीज क्या कहेगा?
- 25:42तुम पहले योग्यता पैदा करो, बीज तो है हाजिर है, बीज घरा दूंगा,
- 25:51लेकिन अंकुरित करने की क्षमता तो में है।
- 25:56अगर बीजों को अंकुरित करने की क्षमता तुम में नहीं है तो अरदासो
- 26:01से क्या होने वाला है? अरदास तो तुम्हारे लोगों का
- 26:05विस्तार है तुम ₹1 की अरदास करके परमात्मा से क्या कुछ मांग लेते
- 26:14हो? मैं रोज़ देखता हूँ भक्तों के
- 26:17कमेंट। और मैं देखता हूँ कि कैसे वो मुझे
- 26:23मूड बनाने की चेष्टा करते हैं। बात अलग है कि मैं मूड बंधन हूँ।
- 26:26ये जागरण वाले कहते हैं ₹1 की और दास माँ तेरे चरणों के पास वह देख
- 26:40कर विच फेरा पावें ऐसे एक तो लख बनाएं।
- 26:46हे दे पुत्र ते पुत्र पोगांवी के सब कुछ मापड़ि है देख करवुछ फेरा
- 26:58पानी हे देख करते फेररला सुन्त परमात्मा को बेहरेगर बना देते हो
- 27:04चौकीदार बनाते हो शर्म नहीं आती। अरे चौकीदारी तो वो सदर से कर रहा
- 27:11है, वह साक्षी है, चौकीदार ही तो है।
- 27:16वह सृष्टि के कण कण का साक्षी है। यानी चौकीदार बिलकुल बराबर पह रहा
- 27:22है उसका। लेकिन तुम्हारा अरदास करने का डंग
- 27:26क्या है? तुम्हारा अरदास करने का डंग
- 27:31बिल्कुल यही है कि पथरीली जमीनों में इस बीज को उगा दे ना प्रम और
- 27:39न जाने कहाँ से ये विचार आया। तुम भी मैं तो जानता हूँ कहाँ से
- 27:45आया तुमने बात सुन ली और तुमने बात सुन के उसके गड़बड़ को टाल
- 27:53दिया। बीज बोदो पथरीली जमीन में।
- 28:01और पथरीली जमीन यह अरदास करें कि हे प्रभु इसमें फसलों का तो इससे
- 28:09भूख मिट जाए। क्या उगेगी फसल उर्वरक, जमीन नहीं
- 28:15होगी? फर्टाइल जमीन नहीं होगी तो क्या
- 28:18फसल उड़ जाएगी? नहीं उगेगी।
- 28:22ना गेहूं होगा, ना धान होगा, ना कोई फल होगा।
- 28:29मज़े की बात इसे आलस्य कहते हैं। ये देखो बात आलस का और असहाय का
- 28:36फर्क क्या होता है? असहाय है।
- 28:40तुम सब करके हार गए, सब करके हार गए और उसके बाद जो स्थिति आती है
- 28:48तुम पैदा नहीं करते, वो स्थिति आती है, वो होती है असमर्थता की
- 28:54हेल्पलेसनेस। तुम लेजीनस को हेल्पनेस समझना
- 29:00शुरू कर दिया, यही से गड़बड़ हो, यद् भी शब्द बड़े बारी लेकिन समझ
- 29:07आ जाएगी ऐसे मुझे आशा है लेजीनस इज़ नॉट हेल्पनेस।
- 29:16नेस तुम हेल्पलेसनेस को लेजनेस कह देते?
- 29:27द्रोपदी लेजिनेस में नहीं थी, द्रोपदी थी हेल्पलेसनेस में उसने
- 29:35सभी हेल्प्स को देख लिया। पतियों को देखा, विष्णु को देखा,
- 29:39तरण को देखा, तातिश्री को देखा, विद्र को देखा सबको देखा क्या हुआ
- 29:47उसकी मोह रंगमा नष्ट हुई, उसका मुँह टूटा, उसने प्रयास किया।
- 29:56ऐसी ही परमात्मा सेवाएं नहीं दी। उसने।
- 30:01अब तुम मेरी बात कर निष्कर्ष में चले जाना, फिर सोचना कि मैंने कहा
- 30:08क्या संत जो हुए उन्होंने प्रयास पहले किया कोई भी हुआ।
- 30:18ये हो सकता है कि प्रयास उन्होंने थोड़ी देर पहले किया हो या पिछले
- 30:24जन्म में किया हो और पिछले जन्म का वो चक्कर चलता चलता, घर बदलते
- 30:32गए, बदलते गए, बदलते गए और एक घर में।
- 30:35पलीभूत हो गए तो द्रोपदी आलस की स्थिति में नहीं थी।
- 30:42द्रौपदी असहाय की स्थिति में थी। असहाय की स्थिति में जब आता है
- 30:52व्यक्ति। निर्बल हो जाता है, निर्बल हो
- 31:03जाता है, सब बल आजमाता है और पता है दांव चलेन हार जाता है वो होती
- 31:12है अवस्था असहाय। और तुम वैसे ही हार जाओ बिना कर्म
- 31:16किये ये होती है अवस्था लेजिनेस की इन दोनों में फर्क समझेंगे
- 31:24लेजिनेस से तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा।
- 31:28मलूकदास इस बात को समझाते हैं, लेकिन भक्त लोग समझेंगे।
- 31:38अजगर करे न चाकरी, लेकिन पेट की चाकरी वो करता है देखिए उदाहरणों
- 31:46में तो ऐसा ही होता है। उदाहरण सटीक प्रमाण नहीं होती।
- 31:51जबकि तुम उदाहरणों से सटीक प्रमाण की आकक्षा करते हो, उदाहरण के
- 31:58सटीक प्रमाण नहीं होती। मैं परमात्मा की लाख उदाहरण दे
- 32:01दूंगा आपको, लेकिन मैं जानता हूँ कि कितने ही उदाहरण देने के बाद
- 32:07ही परमात्मा की उदाहरण नहीं दिए जा सकते।
- 32:12मैं कह दूंगा बहुत आनंद है, परमा आनंद है, समुद्र है, सागर है सब
- 32:18है, लेकिन फिर भी मैं जानता हूँ नहीं कहा गया जितना वो है नहीं
- 32:25कहा गया ये जीव असमर्थ है। गूंगे निपुण तो खा लिया भाषा में
- 32:34नहीं व्याखयित हो सकता कहे कौन हो मुख्य स्वास्थ्य स्वाद भी चख लिया
- 32:44व्याख्यान नहीं हो सकता और तुम इस जिद के ऊपर बाधित हो के व्याख्यान
- 32:49पर। बस ये जिद तुम्हें ले डूबे की और
- 32:55यही जिद तुम्हें ले डूबती है। तुम इस बात पर अड़े रहोगे, हमें
- 33:02नहीं पता हमें तो पथरीली जमीन में।
- 33:08अन्य चाहिए उपज चाहिए जबकि उसके विधान से बाहर की बात है।
- 33:18अब समझो थोड़ी बात। अब हम इससे थोड़ा आगे चले बात दूर
- 33:24की हो जाएगी, लेकिन हम आगे चल ही रहे हैं आज।
- 33:32विधान के अंदर यह बात नहीं आती कि पथरीली जमीन में लहलहाती फसल हो
- 33:38जाए क्योंकि पथरीली जमीन जब्त को उपजाऊ न बनेगी।
- 33:44वो बीच बीच में अंकुरित नहीं होगा।
- 33:47ये नियम है लेकिन एक सत्ता नियमों से बाहर है।
- 33:54अब इस बात को आप गौर से सजनो फिर रोक कर देते हैं।
- 33:59बाबा आपके प्रवचन सर से पार हो जाते हैं, मैंने कहा नहीं।
- 34:07सिर से पार नहीं होते। तुम सिर से समझने की चिष्टा करते
- 34:11हो बस ये फर्क है सिर से पार तो ये कब के ही हैं जो मैंने देखा,
- 34:20अनुभव किया वो सिर से पार हो के को किया।
- 34:25सिर से पार हुआ भावनाओं से पार हुआ जहाँ जहाँ तक अर्चन थी सबको
- 34:30क्रॉस किया और फिर अपने आप में एस्टब्लिश हुआ तो मेरी बातें सिर
- 34:37से पार नहीं होती। मेरी बातें आप सिर से समझने की
- 34:41चेष्टा करते हो इसलिए समझ नहीं आती।
- 34:46अब इन दोनों में फर्क आप करते रहना ये शब्द मैंने बोल दिया बार
- 34:50बार रिवाइंड कर लेना, सुन लेना आप सिर से समझने की चेष्टा करते हो
- 34:57जो सिर से समझा जा नहीं सकता, जो सिर से जिसका अनुभव नहीं होता।
- 35:07और आप इस जद पे पकड़े रहते हो नहीं हम जो देखा नहीं बहुत था ना
- 35:16और मैंने बहुत बार बैठा कर तो किसी का क्या रोक?
- 35:23वक्त खराब होगा सर लोगों का वक्त खराब होगा, आइचार्यों का वक्त
- 35:28खराब होगा नास्तिकों का, चारबाग का जो नियमों के सिद्धांतों को भी
- 35:33नहीं मानते रिएक्शन एक्शन को भी नहीं मानते।
- 35:36मार्क्स का वक्त खराब होगा, नीचे का वक्त खराब होगा।
- 35:40संतों को क्या फर्क पड़ेगा या परमात्मा को क्या फर्क पड़ेगा?
- 35:47क्या मार्क्स के न मानने से परमात्मा के आनंद में ज़रा भी कमी
- 35:51आ जाती है? सारी दुनिया नास्तिक हो जाए।
- 35:55आज परमात्मा का आनंद कम हो जाएगा। गुम हो जाएगा, खत्म हो जाएगा नहीं
- 36:01उसपे ज़रा भी फर्क नहीं पड़ेगा वह तो अपनी मस्ती से मस्त रहेगा कोई
- 36:08उसमें डूबेगा उस मस्ती को पीलेगा जो नहीं डूबेगा वह दुखी होते
- 36:14रहेगा यह फल भी तो कौन पायेगा? जो इन मान्यताओं को स्वीकार करेगा
- 36:24के परमात्मा नहीं होता, नियम नहीं होता, लेना देना नहीं होता।
- 36:29ऋणं कृतवा कर्तं पीवेत् जदा जीवेत् सुखी जीवेत् बस मैं बहुत
- 36:35से देह से पुनः आगमनम कुत्ता। तो मानते रहो भाई हम तो नहीं कहते
- 36:41हैं न मानो फिर दुख भी तो तुम ही भोगोगे बात तो ये है कि तब
- 36:48चिल्लाते हुए तुम संत की शरण में आते हो तो संत को बोलना पड़ता है।
- 36:56कि तुमने भाई बोया भाई तुम काट 2,00,000 कहने के बावजूद कितने
- 37:02संतए सब ने एक ही बात बोली, लेकिन तुम समझी नहीं नहीं समझे सब दुख
- 37:10को भाई जो किया है पर दुख को तुम सहन करो स्वीकार करो इसे।
- 37:15तो बाबा कहते हैं बहुत से मार्ग हैं, जप है, तप है, पूजा है, पाठ
- 37:20है, दान है, पुण्य है, सब है सब करते हैं लोग, लेकिन परमात्मा तक
- 37:29पहुंचने का ये सभी मार्ग नहीं। परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग
- 37:41क्या है? जो तुद पांव है शई पलिक सारे
- 37:53प्रयास करके देख लो। तुम अपनी सहायता करके देख लो।
- 38:03एक शब्दाता अंग्रेजी में गॉड हेल्प डोस हू हेल्प देमसेल्व्स
- 38:11उसकी सहायता करता है परमात्मा जो अपनी सहायता आप करते है।
- 38:16मुझसे पूछ लेते हैं कितना ठीक है बाबा?
- 38:20मैंने कहा देखो खुद की सहायता करना अच्छा होता है लेकिन खुद की
- 38:27सहायता करके तुम संबोधि को प्राप्त हो गए, ये झूठ है।
- 38:34खुद की सहायता करो, मुसीबत में फंस जाओ तो मुसीबत से निकलने का
- 38:39प्रयास करो, खुद नहीं निकल सकते। किसी टीचर के पास मास्टर के पास
- 38:43जाके राय ले, खुद को सहायता करना, खुद की सहायता करना तुम्हारा
- 38:50दायित्व है। लेकिन खुद की सहायता करके तुम
- 38:56मुक्त हो गए। यह भ्रम पालन यह पाप है अरदास
- 39:06करने वालों से मैं सदा ही कहता हूँ अरदास मत करो, योग्यता वेदा
- 39:10करो? फर्टिलिटी पैदा करो पथरीली जमीन
- 39:15को फर्टिलिटी पैदा करो, नियमों से बाहर की बात मत करो नियमों से
- 39:20बाहर की बात भी होती है, कह दूंगा साफ हश्र में पूछेगा बर्फ़।
- 39:28लाखों गुणा किए तेरी रहमत के ज़ोर पे अब ये शब्दों को बिना हारे,
- 39:36बिना प्रयास करके हारी इन शब्दों को दोहराने में लेजी नसीहत।
- 39:45तुम पहले प्रयास करो, प्रयास करके हारो और उसको समर्पित हो जाओ, फिर
- 39:51तुम जो मांगोगे तुम्हें नीचे बड़ा अजीब सिद्धांत है और निराला
- 39:56सिद्धांत है तुम भली होते होते अगर कहोगे मुझे।
- 40:05जो मैं चाहता हूँ वो मिल जाए तो तुम गलत हो, तुम प्रयास करो,
- 40:11पूर्ण प्रयास करो, पूरे उड़ल जाओ, टोटली इन्सर्ट हो जाओ और उसके बाद
- 40:18तुम्हें कुछ ना मिले फिर क्या होगा?
- 40:23जब सब झोंक कर भी तुम्हें कुछ न मिले, तुम शून्य हो जाओ, फिर क्या
- 40:30होगा? फिर उससे आगे परमात्मा का क्षेत्र
- 40:35शुरू होता है। जब तुमने खुदी को मिटा दिया, उससे
- 40:40आगे संभालना है परमात्मा। क्योंकि तुम तो शून्य हो गए, यही
- 40:45तो नागरिक का शून्य हुआ था। तुमने सारा प्रयास करके अपनी सारी
- 40:51शक्ति को झोंक दिया। तुम शून्य हो गए।
- 40:55जब तुम शून्य हो जाते हो तो तुमने देखा जहाँ शून्य का होती है।
- 41:01चारों तरफ से हवाएं दौड़ती है वो सुनेता को भर देती है।
- 41:06तुमने देखा कोई गड्ढा खोद लो। नहर के बीच में जो पानी पीछे से
- 41:11आएगा पहले गड्ढे को भरेगा। पहले लल करेगा बड़ा कम्युनिज्म
- 41:18पानी के पीछे? पानी से बड़ा कम्युनिस्ट कोई है
- 41:23ही नहीं। हवा से बड़ी कम्युनिस्ट कोई है ही
- 41:26नहीं। परमात्मा ने सारे पदार्थों को
- 41:29कम्युनिज्म दिया, लेकिन गड्ढा खुदा होना चाहिए।
- 41:34पहले गड्ढे को खरीदे तुम ट्रंको को पहले भर लेते हो।
- 41:39तुम्हारी बस्ती में कोई दम तोड़ देता है, भूखा कोई दम तोड़ देता
- 41:44है, नंगा कोई दम तोड़ देता है, सर्दी और गर्मी की लू और ठंडी में
- 41:51और तुम्हारे ट्रंक भरे रहते हैं कंबरों से गर्मी सर्दी इनके।
- 41:59इंस्ट्रूमेंट्स से तभी ये शब्द आता है जहाँ भी जीस भी बस्ती में
- 42:08कोई भी भूखा सोता है वहाँ बस्ती ही बस्ती से खुदा नाराज होता है।
- 42:16अब तुम भरे बैठो, लेकिन दुखी हो दुख क्यों मिला क्योंकि तुमने
- 42:22किसी का छीन लिया, छीन लिया तो तुम्हें दुख वो दुख किस तरफ से
- 42:30तुम्हें देखा, यह तुम्हें नहीं मालूम, उसे मालूम है।
- 42:36तुमने किसी का छीनना फिर छीनकर तुमने सोने की होशके पहन सोने के
- 42:49मुकुट लगा लिए सोने का सब पहन लिया लोगों को दिखाते हम।
- 42:56लोगों को क्या दिखाना भाई जब तुमने हीरा पाया तो गांठ में
- 43:01क्यों नहीं गठिया रही दिखाती क्यों हो?
- 43:05ये दिखाने का मतलब साफ़ है कि तुम्हें वो नहीं मिला जिससे
- 43:10तृप्ति होती है। इसलिए तुम बिना तृप्त हुए दिखाने
- 43:15से तृप्त होने की चेष्टा करते हो। सोने की पुशाके डाल के कभी कोई
- 43:21प्रबुद्ध हुआ है। अगर सोने की पुशाके डाल के कोई
- 43:26प्रबुद्ध हो पाता तो बुध के पास सोने की पुशाकों की कमी थी।
- 43:31फिर घर छोड़ने की आवश्यकता थी, महावीर भी राजा थे।
- 43:35महावीर के पास कोई सोने की पोशाकों की कमी थी।
- 43:39वे सोने की पोशाकें बेल लेते प्रबुद्ध हो जाते थे।
- 43:45क्यों सोने की पोशाक को छोड़ कर भाग गए?
- 43:49क्योंकि जानते हैं। सोने की पोशाकें भी पहनी हूँ तो
- 43:55मृत्यु मेरा पीछे न छोड़ेगी। मृत्यु तो मार देते, वो ये थोड़ी
- 44:01देखती है तुम्हें आज सूट छह बदले के आज तुमने छह महीने से सूट नहीं
- 44:07बदला, मृत्यु नहीं देखती। मृत्यु नहीं देखती, आज तुम्हें 10
- 44:14सडियाँ बदलीं या के 10 दिनों से तुमने सड़ी ही नहीं बदली।
- 44:21मृत्यु कहाँ देखती है? इसलिए मैं कहता हूँ ये चीजें जो
- 44:26परमात्मा ने बनाई सभी कम्युनिज्म की बनाई।
- 44:29तुम कम्युनुजम को लाने की चेष्टा करते हो, मैं कहता हूँ परमात्मा
- 44:35की व्यवस्था ही कम्युनुजम है, जो शरीर को सुखद पक्षों के ऊपर डलप
- 44:46के पिल्लों के ऊपर सुलाते हैं। उनको नींद नहीं आती हूँ, फिर
- 44:56उन्हें गोलियां करनी पड़ती है। इन सोमनिया की बीमारियां हो जाती
- 45:03है, बिल्लो है, बड़े बड़े तख्त है।
- 45:09लेकिन नींद नहीं है, नींद तो उसकी नब्बत है, उसके हाथों में रग है
- 45:14तुम्हारी तुम सोने को बना लेती हो तख्त तो ताज तो वह छीन लेता है
- 45:23तुमसे भीतर का चेन। तुम दूसरों का लूट के अपने ट्रक
- 45:32और बैंक भर लेते हो, दूसरों का लूट के तुम जमीनों की अपनी
- 45:37बाउंडरीज बढ़ा लेते हो हम्म। सारे पदार्थों को लूट लेते हो।
- 45:49संसार के 3600 प्रकार के तुम्हारे पास भोजन होते हैं तो वह भूख छीन
- 45:56लेता है। क्या करोगे?
- 46:01मेरे पास एक सेट आया करते थे, पहले गरीब थे।
- 46:07पहले उनकी यही पुकार रहती थी बाबा अमीर कैसे हो जाऊं?
- 46:14मैंने कहा हो जाओगे तुमने कह दिया हो जाऊंगा, मैंने कहा फिर मत आना,
- 46:20अमीर होने के बाद कहता नहीं आऊंगा।
- 46:24बस मैं अमीर हो जाऊं हो जाएगा पुत्र जाओ, अमीर हो गया, अमीर हो
- 46:31गया तो अमीरी से तृप्ति नहीं होती, यह बात समझना अब तृप्ति
- 46:36नहीं हुई तो और और और ये मन मांगे मोर।
- 46:43तो तुम ही मोर बन जाते हो अति समझ ये मन मांगे मोर उस मोर में तुम
- 46:57हो ले जाते हैं, उलझा ही चले जाते हैं।
- 47:05अबे उससे तो मोरनी अच्छी जीसको पंखों का बोझा तो नहीं उठाना
- 47:10पड़ता, मोर को तो पंखों को इतना भार उठाना पड़ता है, इतना बोझल हो
- 47:16जाता है सिर्फ सुंदरता के लिए मोर से पूछो ना किसी ने पूछा मोर से?
- 47:23कि भाई तुम्हारी क्या गति है, वो कहेगा इन पंखों को हटाओ, ये मेरा
- 47:28लहू भी है, ये मुझे रोज़ उठाने पड़ते हैं, ये मुझे उठने नहीं
- 47:34देते। ठीक से इनका भार मैं क्यों उठूं?
- 47:42तुमने मोर्चे कभी पूछा और उसे सब मिल गया।
- 47:46धन मिल गया लेकिन फिर वो 10 वर्ष के बाद फिर आया कहते बाबा पहले तो
- 47:55एक समस्या थी गरीब था। अब समस्याएं बहुत हो गई, समस्याएं
- 48:00ही समस्याएं हो गई। मैंने क्या कहते?
- 48:04सोने के लिए साधन सब हैं लेकिन नींद नहीं आती।
- 48:09खाने के लिए सभी पदार्थ हैं लेकिन भूख नहीं।
- 48:17सभी चीजें मन को सुख देती हैं। लेकिन चैन नहीं चैन छिन गया, नींद
- 48:26छिन गई, भूख छिन गई, यह तो मैंने सब कुछ लुटा दिया।
- 48:33बड़े अच्छे से भूख लगती थी। पहले एक विपत्ति थी, गरीबी पदार्थ
- 48:40नहीं थे, खाने को सोने के लिए चारपाई नहीं थी, भागदौड़ बहुत थी,
- 48:53लेकिन चैन था। अब चैन छीन गया।
- 48:59भागदौड़ बिल्कुल नहीं, चैन छीन गया।
- 49:03पहले भागदौड़ बहुत थी, चैन था अब भागदौड़ बिल्कुल नहीं लेकिन चैन।
- 49:16पदार्थ हैं होक हैं गद्दे हैं, बैठे हैं, सोने के बैठे हैं,
- 49:28लेकिन सोने की नींद नहीं है। अब क्या करूँ?
- 49:32मैंने कहा मैंने तो मैं कहा था फिर मत आना ये जो मैं कभी कभी
- 49:37बोलता हूँ की तुम भूखे मारते हो, ये एक भूखे के लिए बोलता सुनो बात
- 49:42को ये दोनों के लिए बोलता हूँ, क्योंकि परमात्मक कम्युनिज्म में
- 49:49विश्वास रखता है। और तुम जब उसके सिद्धांतों को
- 49:54नहीं मानते तो परमात्मा तो कम्युनिस्ट ही रहेगा तो परमात्मा
- 50:04जीसको तुम भूख से मार देते हो सुनो।
- 50:09जीसको तुम भूख से मार देते हो, परमात्मा तुम्हारी भूख छीन लेता
- 50:14है। मैंने यही कहा था तुम आँखों का
- 50:18दुरुपयोग करते हो। परमात्मा तुम्हारी आँखें छीन लेता
- 50:21है, उसकी विधान में सीधी सी दंड प्रणली तुमने जुबान का दुरूपयोग
- 50:29किया, मैं तुम्हें गूंगा बनाते थे, तुमने जीस चीज़ का दुरुपयोग
- 50:38किया परमात्मा तुमसे वो हथियार छीन लेगा तुमने यौन यंत्रों से
- 50:44दुरुपयोग किया, किसी से बलात्कार किया वो तुम्हें?
- 50:48मेरी जान चाह रही हूँ जो के मेरी जान जिला जल नगर हाँ हंसो की बात
- 50:58मैं एक सती की बात करता हूँ क्यों करते हो ऐसा काम?
- 51:11जीस चीज़ से तुम पाप करते हो दुष्कर्म करते हो परमात्मा वो
- 51:19साधन तुम्हारा छीन लेता है तुमने व्रतकार किया परमात्मा ने
- 51:24तुम्हारी गुप्तेन्द्र छीनी। तुम्हारे यो न अंग छींडी तुमने
- 51:30किसी को भूखा मारा, परमात्मा ने तुम्हारी भूख छीनी, तुमने किसी को
- 51:36ठंड से मारा, परमात्मा ने तुम्हारी कपड़ी छीनी।
- 51:44संत इसलिए कहते हैं कि अगर कोई भूखा मर्द तुम देखो बाबा नानक ने
- 51:49व्यापार करना छोड़ दिया और उनको पहले पेट भराया, उनका पहले खाना
- 51:55खा लो भाई, मेरे लिए व्यापार करना जरूरी नहीं है।
- 52:00तुम्हारे लिए भोजन खाना जरूरी है। वहीं से लंगर व्यवस्था चली जो
- 52:04साढ़े 1500 सालों के बाद आज भी मेरे लिए प्रिय सिक्ख आज भी उन
- 52:12लंगरों को तरती से जलाये जाते हैं।
- 52:18अटूट लंगर। ये होती है परंपरा बहुत से लोग
- 52:25इनसे टूट गए, कुछ कारणों से टूट गए तो भूखों का पेट नहीं भरते और
- 52:34ढेरों में दान कर देते हैं। अब डेरे क्या करते हैं?
- 52:39डेरे अपना फैलाव में पैसे कहाँ, भूखों का पेट भरा तुमने सिर्फ एक
- 52:51बात के लिए? धर्म में ही बदल लिया।
- 52:54सिख धर्म से तुम किसी और में चले गए, अब मैं नाम नाम क्या दूँ?
- 52:58वह मूर्ख व्यक्ति थे जिन्होंने इस पहुंचो हुए व्यक्ति का अनादर
- 53:06किया। 10 के 10 गुरु पहुंचो एक ऐसी लंबी
- 53:11परंपरा। वह मुश्किल जन्म होती, वह मुश्किल
- 53:16सिर्फ साढ़े 500 साल में 10 के 10 गुरु इकट्ठे गठे आए।
- 53:21ऐसा कभी नहीं हुआ। इतिहास में पूरी प्रणाली पांच,
- 53:29600 वर्षों में पूरी हो जाए। सिख धर्म के अलावा किसी धर्म में
- 53:33असम में बुद्ध अकेले निपट गए। महावीर 24 में तीर्थंकर थे लेकिन
- 53:44हजारों सालों में निपटे कहाँ? पहला मन्नू।
- 53:51और कहा पांच माह वृषभदेव और कहा चौबीसवें वर्धमान कितने वर्ष लगु
- 54:02इस्लामियत को देख लीजिए 1400 के करीब तो।
- 54:11पैगंबर मोहम्मद को खैर सर, अल्लाह को पहले ही वस्सल्लाह, उससे पहले
- 54:28उसके बाद कोई नहीं। और ठीक है, लेकिन आज आज एक शाम के
- 54:35दो टुकड़े हो गए। दो के फिर चार हो जाएंगे, चार के
- 54:38फिर आठ हो जाएंगे क्योंकि बेसिक समझ नहीं है किसी और जब बेसिक समझ
- 54:48ना हो। तो व्यक्ति दो फाड़ होता जाता है।
- 54:52बिना किसी कारण से छोटी छोटी बात अब देखिए ये समझ नहीं थी तो
- 54:57इस्लाम के दो हो गए सियासन समझ नहीं थी तो जैनियों में दो हो गए,
- 55:04अब इससे क्या फर्क पड़ता है? महावीर ने शादी की के नहीं की,
- 55:09महावीर नग्न हुए के नहीं हुए, सिर्फ इसी बात पर तुमने दिगंबर और
- 55:14स्वेतंबर पैदा कर दिया, बस यहाँ समझ गई ही तो कमी सनातन को तुम
- 55:23सनातन कहते हो। वहाँ भी तो हो गए, वैष्णव हो गए
- 55:26और शिव हो गए। ये टूटते हैं, लेकिन गुरु नहीं
- 55:32तोड़ते इनको शिष्य तोड़ते हैं इनको क्योंकि शिष्य होता है
- 55:37अज्ञान, गुरु होते हैं ज्ञानी। तब तक ये परंपरा नहीं टूटी जब तक
- 55:44के 24 के 24 तीर्थंकर निपट नहीं गए जब तक के 10 के 10 गुरु सिखों
- 55:52के फर्स्ट लास्ट गुरु गोविंद सिंह ने कह दिया और गुरु?
- 56:00सब सिखन को भूकंप है। गुरु मान्यता पर सब ग्रंथ ही
- 56:05तुम्हारे गुरु विराम जानते थे। अगर इसको गुरु नहीं माना तो तुम
- 56:15भटक जाओगे। देखो भटक गए।
- 56:18ये डेरे ये क्या है? भड़के हुए स्वरूप हैं निकाल लूँ?
- 56:24इनमें से चार नाम पांच नाम तुम्हें कौन कहता है?
- 56:26तुम परमात्मा तक पहुंचो तो सही तुम जश्न परमात्मा तक पहुंचोगे।
- 56:35संत तो जश्न मनाएगा? क्योंकि ये सारी सृज नाचेगी तो
- 56:43संत तो नाचेगा, जब किसी भी धर्म में कोई भी उस अपनी मंजिल तक
- 56:56पहुंचता है, सारा अस्तित्व नाचता है, झूमता है।
- 57:02खुशी मनाता है, जश्न मनाता है, रोवा रोवा हरकली फूल बन जाती है,
- 57:08मुखड़ा खोल लेती है, वो प्यार का मौसम आ जाता है।
- 57:15कलियों ने। कॉल कलियों होंगत कॉल हर फूल पे
- 57:34भंवरा डोल। प्यार का मौसम गुलजार का मौसम
- 57:55गलियों ने। घोंघट खोबो हर फूल पे भंवराटो।
- 58:07करो भाई, पहुंचो तो सही, तुम पांच नाम जब कर पहुंचो, तुम 1000 नाम
- 58:14जब कर पहुंचो। तुम ढेरों में पहुंचो, तुम
- 58:17तीर्थों में पहुंचो, तुम मक्का मदीना में पहुंचो हज घर में
- 58:22पहुंचो पहुंचो पहुंचो तो सही, जश्न मनाएगा सारा अस्तित्व, लेकिन
- 58:29काश के तुम पहुँच जाती कोई पहुंचता।
- 58:35कोई पहुंचा कि सिर्फ गद्दियाँ बदली गईं गद्दियाँ ही बदल गईं और
- 58:42कुछ नहीं हुआ। मूर्ख लोग गद्दी पर बैठा दिया
- 58:47गया। यह कोई परंपरा है?
- 58:50नानक जाते तो श्रीचंद। दोनों में से किसी को गलती देते
- 58:55लेकिन ये बहुत उन्होंने देखी नहीं नहीं दोनों योग्य नहीं उन्होंने
- 59:05गलती थी। अपने पुत्रों को अगर गद्दी देते
- 59:12थे, अपने पुत्र को तो सब भी देते हैं और नाम नहीं लूँगा।
- 59:17एक धार्मिक सम्प्रदाय चलाने वाले को गोली लगी तो उसका मन तो अटका
- 59:23था काका में और गोली जब लगी। तो उसने कहा अब तो गए वसीयत तो
- 59:32लिखी नहीं तो वो कहते हैं गद्दी का का नाम नहीं बोलेंगे।
- 59:41अंत मति सोगति अंत में निकल जाता है जो सत्य लेता है।
- 59:46जो भीतर तुम्हारे प्राणों में छिपा होता है, अंत में बाहर प्रकट
- 59:49हो जाता है, इसलिए मैं कहता हूँ गाँधी जब मरे अल्लाह कहाँ आया
- 59:53भाई, तीनों बार राम आया भीतर जो था अंत प्रकट कर देता है उसको।
- 1:00:04तुम लाख से लाए जाओ, तुम्हारी तरह काम न पड़ेंगे, अंत वेला सब बता
- 1:00:09देगा। तुमने जीवन में क्या किया?
- 1:00:15अंत वेला निर्णायक होता है और तुम्हारी सारी ज़िन्दगी की कहानी
- 1:00:20एक पल में सुना जाता है। तो गद्दी काका अब दे दो का फेंको
- 1:00:26गति और काकी को दे दी गई बस आगे फिर गुरु माता, गुरु पिता जी धर्म
- 1:00:32है या राजाओं की राजगद्दियों का प्रवेश है?
- 1:00:39के बाबर से हमयूँ आ गए हमयूँ से अकबर आ गए आर्कबर से ऐसे ही चलते
- 1:00:43कि संतानी ये राजगदियाँ हैं या धर्म गद्दियाँ हैं धर्म गद्दियों
- 1:00:47को तुम राजगद्दी की तरह से लाओगे ऐसे नहीं चला करते।
- 1:00:58धर्म नहीं चला सकते। तुम धर्म को पार्टियों की तरह
- 1:01:02राजनीतिक पार्टियों की तरह चलाना चाहते हो, लेकिन नहीं चलेंगे ऐसे
- 1:01:08और तुम्हें इन लोगों को फॉलो करने वाले लोग भी धार्मिक नहीं है।
- 1:01:14उनके मन में ज़रा भी जड़ फनी है। मैंने पूछा एक व्यक्ति को?
- 1:01:18तो तुम डेयरी क्यों चाहती हो? कहते कि मैं तो वहाँ बल्ले बहुत
- 1:01:22बढ़िया, मुझसे कहाँ बल्ले कहाँ बल्ले कहाँ स्वार्थ से मुक्ति।
- 1:01:32अब ये दो बातें हैं बिलकुल उलट। मैं तो वर्ले खाने जाता हूँ, मैं
- 1:01:41तो वहाँ आनंद से पांच 7 दिन रहता हूँ लंगर मिल जाता है अपने मन
- 1:01:47पसंद का लेते हैं, लंगर तो नहीं हम तो मन पसंद की सब्जियां वहाँ
- 1:01:52मिल जाती हैं, मैं वहाँ जाके खाता हूँ।
- 1:01:58जैसा कहते हैं, हम गुरु की गोलक में डाल देते हैं और यहाँ रोज़ आ
- 1:02:05जाते हैं। जब गोलक खोली तो पर्ची में ये
- 1:02:08निकला देख के तुम हैरान हो जाओगे क्या क्या निकला भाई ऐसा क्या
- 1:02:11हैरान हो जाओगे जो गुरु को भी हैरान कर दो?
- 1:02:15वो तो फिर गुरु न हुआ गुरु तो हैरानी के सब पड़ाव पे था करके
- 1:02:21गुरु का तो पहला कदम हैरानी था वंडर 20 समय यहीं से शुरू हुआ,
- 1:02:26फिर आखिरी सीढ़ी पे पहुंचा छत पे पहुंचा।
- 1:02:33ये वंडर तो गुरु में बहले आता है और ये कहते हैं पर्ची निकली और
- 1:02:40सारा गुरु भी वंडर में आ गया। कमाल है भाई, कुछ लोग कहते थे आप
- 1:02:51सुन तो कैसी बातें क्यों करते हो? मैंने कहा संत हो के झूठ को
- 1:02:57स्वीकार कर लो, संत हो के झूठ को स्वीकार कर लो, मोहर लगा दूँ कि
- 1:03:05जो है ये ठीक है, ऐसे ही करते जाओ नहीं।
- 1:03:11जहाँ तक मैं बोल सकता हूँ, तुम क्या सोचते हो, मुझे ज़रा फिकर है
- 1:03:17सत्य क्या है? मुझे पूरी फिकर है तुम क्या
- 1:03:21सोचोगे मुझे कोई फिकर नहीं सत्य क्या है?
- 1:03:25मुझे इसकी पूरी फिकर है आध सच जुगाद सच।
- 1:03:30है भी, सच ना नको सिंह भी सच तुमने आज कितने शानदार कड़ी को
- 1:03:38तोड़ दिया। कितने धर्मों के इसमें और ये धर्म
- 1:03:41है? इनमें से कोई व्यक्ति पहुंचा हुआ
- 1:03:44था। चमत्कारों को गिनाने से तो कोई
- 1:03:50पहुँच नहीं जाता। ऐसे तो बाबा बाकी सूर्य दिखाते
- 1:03:55हैं तो फिर वो पहुँच गए और नारे तो लगाते हैं, राष्ट्र हित के
- 1:04:01लगाते हैं, राष्ट्र बनाने के लगाते हैं।
- 1:04:08नहीं इनकी पसंद पहुंचने की जो लक्षण है वो लक्षण है सहजता,
- 1:04:14ठहराव, आनंद, मस्ती, जुमना, गुणगान करना।
- 1:04:22उसकी बराटता का गुण गान। सुद भी सिरा गयो मोरी रे।
- 1:05:00श्रेष्ठ मार्ग कौन सा जो वहाँ तक पहुंचा दे?
- 1:05:07उसके चरणों में पूर्णतः समर्पित हो जाओ और उसके किए हुए को
- 1:05:12पूर्णतः स्वीकार करता हूँ? प्रदेश से बस यही सूत्र है।
- 1:05:20कोई जप, तप, पूजा पाठ, कोई योग, किसी प्रकार का शास्त्र, पठन पाठन
- 1:05:29नहीं काम करेगा। यही तुमसे मैं कहना चाहता हूँ
- 1:05:36योग्यता लेके आओ। पथरेली जमीनों पर लहलहाती फसलें
- 1:05:41हुआ नहीं, बीज की सिकर मत करो, तुम पानी की फिक्र न करो, फिक्र
- 1:05:53करो, प्यास की पानी बजाने वाला है।
- 1:05:57प्यास बजाने वाला है पानी की फिक्र ना करो पानी कहाँ से आएगा
- 1:06:04तुम प्यास से तो हो जाओ तुम भूख तो पैदा करो, भोजन मच जायेगा, तुम
- 1:06:14फिक्र करते हो। जीस बात की फिक्र नहीं करनी चाहिए
- 1:06:20वो ही कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन तुम उनके लिए शोकाकुल हो रहे हो
- 1:06:26जिनके लिए शोक किया नहीं जाना चाहिए।
- 1:06:34तुम इस तरह कुछ कहते हो कहते हो बाबा।
- 1:06:38मस्ती तो आती है, मैंने कहा वो एनर्जी से लबा जब होती है नहीं वो
- 1:06:43होती तो मूर्छित है, हम गिर जाते हैं बस तो गिर तो कोई भी जाएगा
- 1:06:48सांझ आप बिस्तर पर गिर जाते हो, दिन के थके मारते हो?
- 1:06:52भाई कोई मस्ती थोड़ी होती है, वह तो मस्ती लेने का एक प्रयास होता
- 1:06:56है सारी रात तुम मस्ती में पड़े रहते हो धीरे धीरे तुम जुटाते हो
- 1:07:01मस्ती को और सुबह तुम फ्रेश छूटते हो तो तुम किसी भी नाम का स्मरण
- 1:07:06करोगे यू विल लूज़ युअर एनर्जी। और एनर्जी को लूज़ करते करते तुम
- 1:07:12मदहोश नहीं होगे, बेहोश होगे, मूर्छित हो जाओगे और यहाँ बात
- 1:07:19करती है राधा मदहोश ही तुम या तो जाफे तोहते हो या बेहोश होते हो।
- 1:07:30तुमने बीच की अवस्था कभी जानी नहीं, होश भी हो परिपूर्ण और
- 1:07:36मस्ती भी हो परिपूर्ण इसे कहते हैं मत वोशी लेकिन ये शब्द तुमने
- 1:07:41सुना है? इस अनुभव में से तुम गुजरे नहीं।
- 1:07:48पनघट पे मोरी भैया मरोरी मैं बोली तो मेरे मटकी।
- 1:08:08अरे मैं बोली तो मेरी मटकी फॉर पनघट पे मरोरी।
- 1:08:29मैं बोली तो मेरी मद की बोरी, मैं बोली तो मेरी मद।
- 1:08:42की। बोरी।
- 1:08:46पैया परूँ करो पैया पैया परूँ करो में विनती पर। ैयां
- 1:09:07परुं करो मैं दिन की परूँ एक एक नमानी।
- 1:09:25वो मोरी रे एक नम ने वो मोरी रे। सुध बिसरा, मौ ऋ वो काला वोकारा।
- 1:10:00वो काला इकवां सूरी वाला कर गयो मन की चोरी रे।
- 1:10:19सुध विसरा गयो मौरी ओह काला इक बांसुरी वाला छुप गयो फिर।
- 1:10:42चला के कहाँ गयो इकतान सुना के। कहाँ गए हो छुप गए हो फिर ठीक बाण
- 1:11:05चला के कहाँ गए हो? तान सुना के काम गयो, तान सुना के
- 1:11:26गोकुल ठंडा मैंने। मथुरा ढोंढी गोकुल ढूँढा मैंने
- 1:11:44मथुरा ढोंढी। कोई नगरिया न छोड़ी रे कोई नगरिया
- 1:12:07न छोड़ी रे। सुध भी सिरा गयो मोरी वो काला एक
- 1:12:26भांसरी वाला। ओखला आइक बांसुरी वाला बोखला टिक
- 1:12:45बांसुरी वाला।