Latest / Baba ji Vijay Vats / 3 Feb 26 - मनुष्य का भ्रम vs ईश्वर का सत्य | तुम मालिक नहीं: तुमने कुछ क्रिएट नहीं किया, सिर्फ कमाया |
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- 0:08जो करता है, ईश्वर करता है मनुष्य कुछ करता नहीं बाबा इसको
- 0:19साइंटिफिक अवे से समझाने का कष्ट कीजियेगा।
- 0:31बिल्कुल सरल जो नहीं जानते उनके लिए बड़ा मुश्किल है।
- 0:41जो जानते हैं उनके लिए बड़ा सहज है इस संसार में तुमने।
- 0:51कुछ नहीं बनाया यू डिड नॉट कैरिएट एनीथिंग अगर किया तो मुझे बता दो
- 1:06कभी किसी ने कुछ बनाया धरती के ऊपर क्या कुछ नहीं है।
- 1:14मिट्टी है, हवा है, जल है, पेड़ पौधे हैं, पत्ती है, तनी है, शाल
- 1:20है तुमने, इनमें से कुछ बनाया है, कुछ भी बनाया।
- 1:33कुछ भी बनाया हो तुमने कभी भी बनाया हो, मुझे बता दो ये बाल
- 1:41तुमने बनाए। यह रेत का कण तुमने बनाया यह
- 1:54आंखें तुमने बनाई यह कक्ष तुमने बनाई यह कक्ष तुमने बनाई यह दांत।
- 2:03तुमने बनाई? ये वस्त्र तुमने अपने पहली बात तो
- 2:16ये समझने जैसी है कि तुमने यहाँ कुछ नहीं बनाया, दूसरी बात ये
- 2:23समझने जैसी है कि तुम यहाँ कुछ बना सकते हो।
- 2:31अगर बना सकते तो बना लेते हैं ना तुमने यहाँ कुछ बनाया क्रियेट
- 2:41किया, तुमने जो कुछ भी किया। वह कमाया और कमाने का मतलब एक जगह
- 2:51से उठा के दूसरी जगह पे रख लिया अगर मैं इस बोझ में से जेब में से
- 2:55पैसे निकाल के खीसे में डालू, बस ऐसा ही कुछ तुम करते हो।
- 3:07ये सेठ लोग गरीबों का छीन लेते हैं, अपनी तिजोरियो में करा देते
- 3:12हैं, लेकिन कमाया है बनाया तो कुछ ने बनाया उस एक ने।
- 3:24और उस एक को जो जान लेता है वह एक हो जाता है।
- 3:35इसको फिर समझ लो जो उस एक को जान लेता है।
- 3:40जानते ही वह एक हो जाता है वन डाइमेंशनल मल्टीडाइमेंशनल वो रहता
- 3:50नहीं, वो तो हिजा में नहीं रहता, वो शहंशा में नहीं रहता, वह जान
- 3:59लेता है। कि एक ही है यही बाबा ने कहा एक
- 4:03कोंकार यह समाधि के बाद की घटना होती है।
- 4:08समाधि यानी जिसने सत्य जान लिया समाधि के बाद प्रथम बाप के जो
- 4:17बाबा ने बोला वो कहते एक कोंकार है।
- 4:20एक ही है, उसने ही बनाया है ही इज़ ओनली ही इज़ दी ओनली करियरर
- 4:35तुमने करियर तो कुछ किया नहीं? मैंने पिछले प्रवचन में कहा था कि
- 4:41एक इल्यूजन है तुम्हें इल्यूजन यही है तुम्हें कि हमने सब कुछ
- 4:49बनाया है, वरना सत्य यह है कि तुमने सब कुछ कमाया है।
- 4:59एंड यू कैनट कैरिएट तुमने कुछ क्रियेशन किया नहीं और तुम
- 5:08क्रियेशन कर भी नहीं सकते, ये दो बातों को याद रखा।
- 5:14कोई और है जिसने क्रिएट किया है, जिसने क्रिएट किया माल वही मालिक
- 5:26कहलाता है जिसने माल को क्रिएट किया वो है मालिक।
- 5:34तुमने नहीं करियर किया तुमने उसकी जेब में से निकाल लिया, उसकी जेब
- 5:38में से निकाल लिया, उसकी जेब में से निकाल लिया, अपनी तिजोरियां भर
- 5:43ली और मज़े की बात है तिजोरियां भर जाती हैं तुम्हारी नीयत नहीं
- 5:48भरती तुम जोड़तें ही चले जाते हो। और दूसरे मज़े की बात ये है कि
- 5:55संघ तुम्हारे कुछ भी नहीं रहता, कभी किसी के संग गया तो मुझे बता
- 6:05दो। क्रिएटर ने क्रिएट किया माल गुड्स
- 6:27गुड्स सिस्टम पूरा कर रहा है माल से मालक बनो, माल से मालक बनो।
- 6:38गुट से गौड़ बना। जी ओह डी गोट यह शब्द कहीं नकल
- 6:45किया। जिसने माल बनाया वह मालिक हो गया,
- 6:54जिसने गुट से बनाया वह गौड़ हो गया।
- 7:02लेकिन तुमने कुछ नहीं बनाया तुमने सिर्फ कमाया कमाने का मतलब एक जगह
- 7:13से उठा के दूसरी जगह रख लिया ट्रांसफर ट्रांसफर किया।
- 7:18आज जमीन किसी की है कागजों में कल जमीन किसी और की हो जाएगी कागजों
- 7:29में। लेकिन क्या तुम सच्चे मालिक बने?
- 7:36क्या जमीन ज़रा भी हिले क्या जमीन टस से मस हुई।
- 7:42क्या जमीन ने अपना डाइमेंशन बदला? क्या जमीन पूर्व से पश्चिम हुई?
- 7:48उत्तर से दक्षिण हुई नहीं जमीन वहीं रही मालिक बदलते चलेगा।
- 7:58फिर ये मालिक क्या सत्यमे मालिक है?
- 8:02सत्यमे मालिक नहीं, झूठे मालिक है और मौज तुम्हें बदला देती है कि
- 8:08तुम सच्चे मालिक नहीं थे। धर्म से घर पड़ते हो।
- 8:14और ऐसे लाचार हो जाते हो के चार भाई तुम्हें उठा के ले के जाते
- 8:19हैं श्मशान तक कब्रिस्तान तक तुम इतने लाचार हो जाते हो और बिल्कुल
- 8:27तुम वहीं थे जो कल तक गहरे थे। मैं हूँ तो मुमकिन है।
- 8:33इम्पॉसिबल वर्ड इस नॉट फाउंड इन माय डिक्शनरी असंभव शब्द सिर्फ
- 8:43मूर्खों के शब्दकोश में मिला करता है नैपोलियन बोना पार्ट।
- 8:57आखिरी वक्त में आकर जंग हार गया और देश निकाला दे दिया गया उसे
- 9:05जाओ, तुझे मारेंगे तो नहीं? जीवन को भिक्षा में दान देते हैं
- 9:12तुम्हें, लेकिन निष्कासित कर दिया।
- 9:15देश से निकाल दिया उसे वही नेपोलियन बोना गड जो कहता था
- 9:23असंभव शब्द मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है सिर्फ इम्पॉसिबल
- 9:29वर्ड इस नॉट फाउंड इन माइडिक्शनरी।
- 9:34वाटर लू का जंग हार गया, सभी जंग जीते, वाटर लू का जंग हार गया और
- 9:42समझदार थे राजा राजा कहते तुम्हे मारी नहीं क्योंकि मार देना तो
- 9:52सदा के लिए। उसको समस्याओं से निजात दे देना
- 9:56होता है। वो कहते हैं, तुम्हें जिंदा भी
- 10:01रखेंगे क्योंकि मार देना कोई दंड नहीं है।
- 10:09दंड है जिंदा रखना। तुम इस बात को समथिंग नहीं सकोगे
- 10:15ज़िन्दगी एक बहुत बड़ा दंड है। अगर वह भटक जाए तो ज़िन्दगी बहुत
- 10:25बड़ा पुरस्कार है। अगर वह सुधर जाए तो?
- 10:31इन शब्दों को ध्यान में रख अभी शाब है जिंदगी अगर भटक जाए तो ये
- 10:43राम राम राधे राधे करने वाले कभी आनंद का रास न पी पाएंगे।
- 10:52इनके लिए ज़िन्दगी अभी साफ है। किनको मार्ग से ही मिल गया?
- 11:04जो अपने ही अंत में उतरे? जहाँ उनका स्वयं का होना मौजूद
- 11:10है। वो स्थितीप्रग हो गए जो उनको सही
- 11:16मार्गदर्शन मिला और वो सुधर गए, उनकी जिंदगानी सुधर गयी और वो
- 11:23सुखी हो गए। वो मंगलमय हो गए।
- 11:27वह आनंद कारस पीने लगे। फिर जिंदगी उनके लिए वरदान है
- 11:33अन्यथा जिंदगी तुम्हारे लिए अभिशाप है।
- 11:37सुबह बैठो, शाम बैठो मुझे उस बाबा ने बचाया मुझे उस देवी ने बचाया।
- 11:48मुझे उस देवता ने बचाया सब भ्रम है, तुम्हारी कोरी कल्पनाएं हैं,
- 11:52तुम्हारी इतनी बड़ी सृष्टि इतनी बरात सृजना में तुम और तुम्हारे
- 12:02देवी देवताओं की औकात क्या है? एक्का सुमरिया नान का जो जालो थल
- 12:10रे आसम आए ध्वजा काहे समरिये जो जमे ते मर जाए तुम्हारे देव देवता
- 12:21आज है कल किसी और की पूजा हो रही थी।
- 12:27और कल किसी और की पूजा होगी तो वेबिलॉन की जंग हार गए तुमने यहा
- 12:39बनाया कुछ नहीं क्रिएशन कुछ नहीं की।
- 12:48इधर का माल उठा के उधर रखा है और इसी से तुम्हारी भीतर भ्रम आ गया
- 12:53है कि मैं मालिक हूँ, सच में मालिक वो होता है जो माल बनाता
- 13:00है, जो माल को इधर से उधर रखता है, वह टोपल्लेदार होता है।
- 13:09तुम पले तो या तुम्हारे बड़े बड़े सेट या तुम्हारे बिल गेट्स, ये
- 13:23अदानी, अंबानी पलेदार है। चौकीदार उनके सिवा और कुछ भी
- 13:28नहीं। वे सिर्फ इधर का माल उधर और
- 13:31निगरानी रखते हैं। रात रात जागते हैं भला ऐसा क्या
- 13:36कमा लिया उन्होंने? जिसकी रक्षा करने की जरूरत पड़े,
- 13:44वह सत्य में माल नहीं है, वह तो अभिशाप है।
- 13:48जिसकी चौकीदारी करनी पड़े। वह स्वर्ग का साधन नहीं है, वह
- 13:58नर्क का साधन है। जो रात रात भर जिसकी रक्षा के लिए
- 14:02जागना पड़े वह तो नर्क है। जो स्वयं से अपनी रक्षा करे वह
- 14:13स्वर्ग है और तुम तो कहते हो धर्मो रक्षती रक्षा है, जो धर्म
- 14:20की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
- 14:23तुम पगला गए हो? यू शुड बी मेंटली ट्रीटेड तुम्हें
- 14:33मानसिक उपचार की आवश्यकता है तुमने यहाँ बनाया कुछ और नहीं तुम
- 14:45कुछ बना सकते हो मेरी यह बात पहले भी शक्ति थी।
- 14:52आज भी सत्य है, आगे भी सत्य रहेंगी और अगर कभी भी असत्य हो
- 14:58जाए तो मेरी खबर के ऊपर जूते हार ना हो, ये सदा सत्य है और सदा
- 15:10सत्य रहेंगी तो मात्र नाम के मालिक हो।
- 15:16तुमने कैरिएट कुछ नहीं किया, तुमने इधर की चीजें उधर रखी है,
- 15:23इसको ही तुम बल्कि कहते हो। कागजों में नाम बदल जाते हैं।
- 15:29तुम कहते हो हम बालिक हो गए यही इल्यूज़न है।
- 15:35मालिक तुम होगे नहीं, क्योंकि अगर सच्चे मालिक होते तो सच्चा मालिक
- 15:40तो कभी मरता नहीं। सच्चा मालिक तो सदा ही रहता है आज
- 15:48सच जोगा आध सच है भी सच नानक होश ही सच।
- 15:55वह कभी नहीं मरता मोहे मिला जिला बन हारा मुझे वह मिल गया जो कभी
- 16:02मरता नहीं, मैं ना मरूँ, मरे संसार, यह तुम्हारी कागज़ पर
- 16:13खींची हुई लकीरें मट जाएँगी। यह है संसार लेकिन मैं ना मरूँ,
- 16:21मालिक नहीं मरेगा, मरे संसार तुम्हारी कागज़ की लाइने हो
- 16:26जाएँगी। आज किसी के नाम कल किसी के नाम
- 16:29होंगे सिकंदर ने। आज कोई बता सकता है उसकी कबर कहाँ
- 16:42है? आज कोई बता सकता है सिकंदर की कबर
- 16:49कहाँ है? सिकंदर की कबर कब की खत्म कर दी
- 17:04गई? सिकंदर नाम का व्यक्ति कबर से
- 17:13निकालकर? फूंक दिया गया और उसकी राख समुद्र
- 17:18में करा दी गई। और यह तथ्य किसी को पता नहीं।
- 17:25तुम कहते हो बेबीलॉन में है उसकी कब्र दिखाओ कहाँ है?
- 17:46पूछती है माटी सिकंदर कहाँ है? पूछता है भारत नरेंद्र कहाँ है?
- 17:58आज सिकंदर नहीं बचा, कल नरेंद्र नहीं बचेगा।
- 18:08यह भ्रांत है, यह इलूशन है, तुम कहते हो हम श्रद्धा के लिए रहेंगे
- 18:15और श्रद्धा के लिए रहने के जुगाड़ भी बनाते हो।
- 18:18पापुड़ बेलते हो, कितने लोगों का कतल करवातें हो और कितने लोगों के
- 18:24कतल की जानकारी जिसे उनको दफन कर देते हो, क्या तुम शक्ति को दफन
- 18:34कर सकते हो? जो घटनाओं को जानता है उनको तो
- 18:41दफन कर दिया तुमने, लेकिन क्या तुम शक्ति को दफन कर सकते हो?
- 18:46नहीं? शक्ति को किसी वक्त में जाकर
- 18:51भ्रमण के भीतर उसके लॉकर को खोलकर शुभचनाओं को देखा जा सकता है और
- 19:01अगर कोई सही से शांत है तो वह अपने भीतर जाकर।
- 19:06देख सकेगा। यह क्यों होगा या किसने किया या
- 19:10किसने करवाया? एक शब्द आता है ऑल दी इवेंट्स आर
- 19:17प्रीडिटरमाइन्ड डेस्टाइन्ड प्रीडेस्टाइन्ड।
- 19:25अब हम थोड़ा आगे चले और थोड़ा सा ज्यादा बारीक हो जाओ।
- 19:32समझ के मसले में जब तुमने यहाँ कुछ बनाया ही नहीं, क्रिएट ही
- 19:39नहीं किया का काम किया है या चुगली का काम किया है?
- 19:46फिर तुम्हारा यहाँ है क्या? इसे ही संत इल्यूसन कहते हैं, ये
- 19:54तुम्हारा भ्रम है कि मेरा यहाँ कुछ है, अगर तुम्हारा यहाँ कुछ
- 19:58होता तो तुम्हारे संग। अगर तुम्हारा यहाँ कुछ होता तो जब
- 20:11तुम्हारा जनाजा उठ रहा था तो वह पीछे पीछे न चलता, ये मेरा मालिक
- 20:17ही जा रहा है। वह तो अपनी जगह खामोश बता या महल
- 20:24अटारी। पहल उदासुल गलियां सुन।
- 20:39चुप चुप हैं दीवारें दिल क्या उजड़ा दुनिया उजड़ी।
- 20:56रूठ गई हैं बह और हम जी बन के से गुजार।
- 21:16हो मंदिर गिरता फिर बन जाता दिल को कौन संभाले?
- 21:34वो दुनिया आके रखे बा। महल उदास और कर गया सोनी चुप चुप
- 21:45रहे सब उजड़ गया आज। तथाकथित मालिक चला है, लेकिन अगर
- 21:57सच में मालिक होता तो ये दीवारें, ये महल, ये अडारियां ये महंगी
- 22:04महंगी कारें यह गद्दी जीस पर आसीन हो तुम ये तुम्हारे पीछे पीछे
- 22:10चलती। क्योंकि तुम्हारी कुछ भी तो संग
- 22:16नहीं जाता, कुछ भी तो तुम्हारे पीछे नहीं जाते।
- 22:19कुछ लोग हैं जो राम राम सत्य है सत्य बोले महल अपनी जगह है,
- 22:30अटारिया अपनी जगह है। महंगी, महंगी कार्य अपनी जगह
- 22:35गद्दियाँ वहीं हैं जहाँ थी और कोई और मालिक बन जाएगा उस गद्दी का कल
- 22:46तुम किसे मालिकाना हक कहते हो तुम्हारा है क्या?
- 22:54सोच लेना जब तक जियो तब तक सोच लेना और अगर कभी भी तुम्हें उत्तर
- 23:01मिल जाए तो मुझे या मेरी खबर को जरूर बताना, लेकिन एक बात तुम्हें
- 23:11बता दूँ। तुम्हें उत्तर कभी मिलेगा आई ऐम
- 23:17शुर क्यों? क्योंकि तुम ने कुछ बनाया तुम कुछ
- 23:28बना सकते। तो फिर मालिक कौन?
- 23:34जिसने माल बनाया फिर गोड्स का मालिक कौन?
- 23:39गॉड तुम मालिक ने जिसका माल वह मालिक।
- 23:57अब यहाँ से तो बड़ा सा हल्के से चले हम खिसकेंगे नीचे जब तुम
- 24:03मालगी ही नहीं हो तो शिकायत का ही करते।
- 24:07हो? हे प्रभु तुने ऐसा नहीं किया,
- 24:14तुने वैसा नहीं किया तुम परमात्मा से ऐसे बातें करते हो जैसे वह
- 24:18तुम्हारा गुलाम अरे भाई, उसने माल बनाया अपनी लीला के लिए, अपने खेल
- 24:28के लिए। और अपने खेल से खेल रहा है वो
- 24:34तुम्हे क्या दिक्कत है? लेकिन तुम्हारी खोपड़ी कहती है
- 24:42फिर ये बलात्कार, फिर एक कतल, ये हत्या, ये फरेब, ये बेईमानी?
- 24:53यह क्यों होती है, क्यों? क्यों?
- 24:57तो मालिक पूछा करता है मूर्खो तुम मालिक तो हो ही नहीं, तुम मालिक
- 25:04हो क्या? क्यों मालिक को पूछा करता है
- 25:09मालिक तो तुम हो ही नहीं। क्यों पूछने का अधिकार तुम्हें है
- 25:14ही नहीं, क्योंकि तुम मालकिन ही हो क्यों?
- 25:17कौन पूछ सकता है, जिसने क्रिएशन की क्रिएशन तुमने की नहीं?
- 25:23क्रिएशन किसने की? तुम्हारी भी क्रिएशन किसी और ने
- 25:27की? कौन है वह?
- 25:32जिसने तुम्हारी क्रियेशन की कौन है वह जहर तुम्हारी क्रियेशन को
- 25:37बचाने के लिए दान दान सांस लेने के लिए हवा खाने के लिए मीठे
- 25:44पकवान पीने के लिए शीतल जल। तुम्हारी मनपसंद चीज़ उपजाने के
- 25:57लिए ये धरती इतना कुछ बनाने के बाद भी तुम शिकायत करते हो।
- 26:13क्या शिकायत करना तुम्हारा जायज अधिकार है?
- 26:20तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में आता है, मैं थोड़ा सा चुप हो जाता
- 26:27हूँ, तुम सोच लो। जब असल मालिक तुम ही नहीं हो, तुम
- 26:34तो मात्र पर ले जा रहे हो, इधर की चीज़ उधर रख उधर की चीज़ उधर रखती
- 26:41छीना छपती लगी है तुम असल मालिक न तो थे न हो।
- 26:52ये गद्दी कल किसी और के पास थे। भूल गया आज तुम्हारे पास है, मैं
- 27:05छाती ठोक के कहता हूँ कल किसी और के पास हो के तो मैं छाती ठोक के
- 27:12कहता हूँ तुम कल नहीं बचोगे। फिर मालिकाना हक काहे का?
- 27:25यही इल्ल्यूज़न है? मैंने कल भी बोला इल्ल्यूज़न मैं
- 27:32आज भी बोलता हूँ इल्ल्यूज़न। यह तुम्हारा धोखा है, यह तुम्हारा
- 27:37भ्रम है, यह तुम्हारा धोखा है और इसी धोखे के कारण तुम दुखी हो।
- 27:48तुम इसे अपनी संपत्ति मानते हो। जबकि यह तुम्हारी संपत्ति है
- 27:53नहीं, जब यह छिन जाती है तो यही तुम्हारी संपत्ति का मानना
- 27:59तुम्हारी भी पत्नी का कारण बन जाती है।
- 28:05क्या तुमने बनाया था, जिसके लिए छाती टूटते हो?
- 28:15सोच लिया तुम मालिक हो नहीं कुछ देर के लिए, लेकिन जो श्रद्धा के
- 28:24लिए मालिक है आज सच जुगाद सच है भी सच नानक हुसी भी सच वह कोई और
- 28:29है? फिर वह अपनी सृजना से जैसे खेले
- 28:37तो मैं क्या इतरजा भाई, वह अपनी सृजना से जिसने बनाया।
- 28:53वह अपनी सर्जना से जैसा चाहे खेले, तुम्हें क्या ऐतराज है?
- 28:59तुम्हें शिकायत क्यों होती? तुम ऐतराज करने का अधिकार रखते हो
- 29:08नहीं? फिर एतराज करते क्यों हो?
- 29:13यहीं आकर कहा संत ने वह जो करता है ठीक करता है, क्यों?
- 29:24क्योंकि अपने साथ ही करता है। यह मटेरियल भी उसका है।
- 29:34सर्जना भी उसकी है, सर्जन हारा भी वह स्वयं है तुम्हारा क्या है
- 29:40यहाँ? जो हमने दास्तां अपनी सुनाई, आप
- 29:57क्यों रोए? जो हमने दास्तां अपनी सुनाई, आप
- 30:14क्यों रोए? अगर उसने अपनी सृजना से अपनी
- 30:21इच्छा के मुताबिक कोई खेल खेल दिया उसे अच्छा लगा।
- 30:26नानक भिक्षा कर विचार उसे अच्छा लगता है।
- 30:32फिर वो तुम्हारी इच्छा को देखे के अपनी इच्छा को देखे।
- 30:39यहीं दो इच्छाओं का बैठ जाना तुम्हें दुख देता है।
- 30:43वह तो दुखी कभी हो नहीं सकता क्योंकि वह सच्चा मालिका है।
- 30:49तुम झूठे मालिका हो। यू अरे इन इल्ल्यूश़न तुम में
- 30:53भ्रम है, तुम धोखा खा गए हो। वह अगर चीजों को उलट पुलट करता
- 30:58है। आप क्यों रोए?
- 31:04अगर उसने गड़बड़ी कर दी अपनी ही सरजना में तो क्या गलत किया अब पे
- 31:12खेले खेल खिलाड़ी अब पे खेलना हारा हूँ।
- 31:21अप पे रोए अप पे हँसे अप पे सर्जन आ रहा हूँ तुम्हारा क्या है अप पे
- 31:32खेल खेल खिलाड़ी खुद ही खेलने वाला?
- 31:38खुद से ही बनाई हुई चीजों से खेलता है अब पे खिल नहारा हूँ अब
- 31:45पे रोवे अब पे हँसे, अब पे सर्जन हारा हूँ, सर्जना भी उसने की, खुद
- 31:53ही रोता है, खुद ही हँसता है, आप क्यों रोते हो?
- 32:07दिल्लगी में दिल लगाया दिल गया दिल्लगी में दिल लगाया दिल गया
- 32:13दिल लगाने का नतीजा मिल गया आगे आगे थी सवारी मेरे यार की पीछे
- 32:18पीछे में और मेरा दिल गया तुम कह रोते हो तुम कहाँ से हो तुम्हे
- 32:23क्या मिल गया? मैं तो रोता हूँ कि मेरा दिल गया
- 32:37तुम क्यों हँसते हो तुम्हें क्या मिल गया गद्दी मिल गई मैं तो रोता
- 32:45हूँ कि मेरा दिल क्या? जब तुम माल की नहीं हो, चीजों की
- 33:00उलट उलट होती है तो तुम शिकायत काहे की करते हो?
- 33:15असेक बात आके ठहर जाती है, तुम इन बातों को बर्दाश्त नहीं कर पाता
- 33:23है, फिर आचार्यों की खोपड़ी नीचे से की खोपड़ी चारबाग की खोपड़ी।
- 33:34और मार्कस की खोपड़ी कहती की वो है स्वयं से ही उत्पन्न हो गया
- 33:40सहभम है मान्यताएँ तो बहुत हैं। बुद्ध कहते हैं वह सहभम प्रकृति
- 33:50सहभम है लार्ज अरे सुफ्फिसिएंट लाज अपने आप बन गए लेकिन बाबा ना
- 33:59ना कहते हैं वह अपने आप बन गया सजन हरा सहभम तो कौन बना अपने आप
- 34:09कोई तो बना होगा। आपको सृष्टि दिखती है तो आप कहते
- 34:17हो कि सृष्टि दिखती है, इसलिए सृष्टि अपने आप ही पैदा हो गई,
- 34:24लेकिन मैं तुमसे पूछुंगा जिनको परमात्मा दिखता है।
- 34:32उनका क्या होगा? तुम तो कहते हो कि सृष्टि दिखती
- 34:43है, परमात्मा दिखता नहीं। लाज आर सफीशियंट देर इस नो नीड ऑफ
- 34:50गॉड, लेकिन मैं तुम्हें कहता हूँ, जिनको परमात्मा दिखता है, वह क्या
- 35:05करें? तबाही तो हमारे दिल पे आई तबाही
- 35:25तो हमारे दिल पे। आई।
- 35:33आप क्यों रोए? तबाही तो हमारे दिल में आई।
- 35:48आप क्यों रो जो हमने दास्तां अपनी सुनाई, आप क्यों रोए?
- 36:07हम खेल रहे हैं अपनी ही बनाई हुई चीजों से तुम क्या हँसते हो
- 36:16तुम्हें क्या मिल गया मैं तो रोता हूँ कि मेरा दिल क्या दिल लगाया
- 36:24दिल की मैं दिल गया। दिल लगाने का नतीजा मिल गया आगे
- 36:30आगे थी सवारी मेरे यार की पीछे पीछे मैं और मेरा दिल गया तुम
- 36:37क्यों हँसते हो तुम्हें क्या मिल गया मैं तो रोता हूँ कि मेरा दिल
- 36:42क्या तुम्हारा क्या गुम हो गया तुम क्यों शिकायत करते हो?
- 36:50तुम क्यूँ फरियाद करते हो? हे भगवान ऐसा कर दे क्यूँ कर दे
- 36:58तुम क्यूँ कहते हो कि मेरा ये गम हो गया मेरा ये ऐसे हो गया मेरा
- 37:02ये ऐसे हो गया तो हमारा गुस्ता। बस संत यहीं आकर कहता है कि
- 37:09तुम्हारे यहाँ कुछ और संत कहता है, मोहर लगा के कहता है।
- 37:24लिखा लिखी कह नहीं देखा देखी बात और देखा क्या?
- 37:28मैंने तुम कहते कगद की लिखी और मैं कहता तो जिनको परमात्मा दिख
- 37:40गया उनका क्या होगा? मैं बुद्ध से यही सवाल पूछता हूँ,
- 37:48मार्कर्स को छोड़ो, उसने तो कभी खोजा ही नहीं, नीचे को छोड़ो, चार
- 37:55वक्त को छोड़ो छोड़ो, लेकिन मैं बुद्ध से पूछता हूँ उनका क्या
- 38:01होगा? जिनको वह सहभम जिसे परमात्मा कहते
- 38:08हैं वह देखा गया। फिर वह क्या करें?
- 38:22यह झूठों का संसार है, लेकिन मार्क्सस तो झूठे ऐसे ही हैं कि
- 38:34उन्होंने खोजा ही नहीं। बुद्ध झूठ है ना बुद्ध सच्चे?
- 38:44खुद ने जहाँ तक खोजा वहाँ तक मिल गया जिन खोजा तिन पानी हाँ गहरे
- 38:50पानी में बैठ लेकिन थोड़ा गहरे कम उतरे मैं अब पूरा बूढ़ा डरा गया
- 38:58किनारे बैठ कच्चे कच्चे उठ के आ गए।
- 39:04जितना जाना था उतना बता दिया और यह सुफ्फिसिएंट नहीं था।
- 39:12काम चलाऊ तो था पर्याप्त, नहीं था पर्याप्त, क्या है पर्याप्त कृष्ण
- 39:23बताते। बस कृष्ण में सब समाहित हो जाते
- 39:28हैं और कृष्ण ही सनाथ। इसलिए हमने बुद्ध को कभी भगवान
- 39:36नहीं कहा। महात्मा कृष्ण को कभी महात्मा
- 39:41नहीं कहा भगवान। वहाँ जाकर सब रास्ता खत्म हो जाता
- 39:54है। क्यों मंजल आ जाती है?
- 39:57बुध के आगे और भी रस्ते हैं राहतें और भी हैं फसल की राहत के
- 40:03सिवा। और भी दुख है जमाने में मोहब्बत
- 40:08के सिवा बुद्ध ने देखा ईमानदार इस दृष्टि
- 40:33से मार्क्स भी ईमानदार है। चरवाक भी ईमानदार है, बेईमान कोई
- 40:39भी नहीं है। लेकिन फिर क्या है?
- 40:42अट्टियानी बुद्ध को मैं ज्ञानी नहीं कहता जो चरम को न देख ले, जो
- 40:52चरम तक पहुँच न जाए। वह अज्ञानी ही रहता है, खुशनसीब
- 41:00है जहाँ तक खुशी मिलती है वहाँ तक पहुँच गए इसीलिए खुशनसीब है लेकिन
- 41:08रस से भरे नहीं हैं क्योंकि अरे हस तक नहीं पहुंचे।
- 41:17और जब कोई रस को पा लेता है फिर वह दौड़ता नहीं।
- 41:27कहाँ दौड़े कृष्ण, कहाँ दौड़े कृष्ण?
- 41:39बुद्ध गली गली दौड़े बताने के लिए के बिना दौड़ा भी तो नहीं जाता,
- 41:52लेकिन कृष्ण जानते हैं। कि जो आज दुखी है, वह वास्तव में
- 42:00दुखी नहीं है। उसका अंतस घोर शांति से भरा पड़ा
- 42:05है। उसका अंतस घोर आनंद के समुद्र से
- 42:09भरा पड़ा है। वह राष्ट्र से भरपूर है।
- 42:18इसलिए उपनिश्चित में कहा गया, रसोवैसा वह रस से भरा हुआ है और
- 42:28कण कण रसीला ईशा वास, मेंदम सर्वम यत किंची जगत एवं जगत।
- 42:36वह जगत का कण कण राष्ट्र से भरा हुआ है।
- 42:39तुमने इसे कहा नहीं, इसलिए तुम झूठे नहीं, तुम अज्ञानी झूठा वह
- 42:50होता है। जो जानकर भी गलत बोले और जानकर
- 42:57कभी कोई गलत बोले हैं। जिसने आनंद को भी लिया उसकी भटकन
- 43:03समाप्त हो जाती है, वह बांटना भी तो नहीं चाहता, उससे बट जाता है
- 43:11बादल। कृष्ण से बढ़ जाता है, बांटते
- 43:23हैं। जो भी व्यक्ति इस स्थल पर पहुंचा
- 43:29उससे बांट गया। उन्होंने बांटा और यह दो चीजों
- 43:34में बड़ा गैप है, दूरी है। बांटने वाले को कभी अहंकार हो
- 43:44सकता है कि मैंने बांटा? दानी को कभी अहंकार हो सकता है कि
- 43:48मैंने दान किया, लेकिन जब खुद से बांट जाए उसके भीतर तो अहंकार ही
- 43:55आएगा। हमारे शास्त्रों में लिखा।
- 43:59एक हाथ दान करें। दूसरे हाथ को पता न चले क्यों
- 44:04क्योंकि तुम्हारा कुछ यहाँ है ही नहीं, कौन दान करेगा, किसको दान
- 44:09करेगा? एक ही तो है दान करने वाला भी और
- 44:14दान लेने वाला भी वही तो है। मुझे एनलाइटनमेंट हुआ उसके बाद तब
- 44:27से जरे जरे में जधर देखता हूँ, उधर तो ही तो है।
- 44:36हर झरे में तू ही तो रूबरू है, तो मैं सुअर से गले मिल लिया।
- 44:42सुअर जो गंदगी के नाले में से उठ के अभी अभी आया था हमारे घर के
- 44:48बैकसाइड के ऊपर बहुत बड़े बड़े नाले हुआ करते थे।
- 44:54उसमें से उठ के आया था सूअर, इसलिए हमने तो सनातन ने तो सूअर
- 45:02को वरहा अवतार कहा, अवतारों में से एक है सूअर और मैं सूअर को गले
- 45:08मिल लिया क्या मैं सूअर को गले मिला?
- 45:11नहीं, मैं परमात्मा से गले मिला। ईशा वासिमिदम सर्बम जगत याम जगत
- 45:19वह सुवर में भी था नजर आया मुझे और अच्छा लगा मैंने सुवर को गले
- 45:24से लगा लिया। लोग कहते है रे आपके कपड़े, श्वेत
- 45:31वस्त्र सारे गंदे हो गए। मैंने कहा यह यह गंदगी भी तो
- 45:37परमात्मा है। 3 दिन तक 72 घंटे में होशो हवास
- 45:48में खो बैठा। जैसे कोई शराब का नया नया प्रकट
- 45:53हो, उसको एकदम से ढेर सारी बोतलें, पूरा मैखाना पीला दिया
- 46:00जाए तो क्या होगा? बस ऐसा ही होता है।
- 46:07एनलाइटनमेंट के वक़्त पूरा मैखाना पी लेता है व्यक्ति पहली बार।
- 46:12और वह एडिक्टेड नहीं होता धीरे धीरे तो आप अपनी कैपेसिटी बढ़ा
- 46:16सकते हो और तीसों वर्ष लग गई। यह कैपेसिटी लाने में धीरे धीरे
- 46:26पीता गया पीता गया इम्युनिटी बढ़ती गई।
- 46:33और थोड़ा थोड़ा होश भी आता गया। यद्यपि खुमारी बड़ी गहरी थी,
- 46:39यद्यपि मद होशी बड़ी गहरी थी, लेकिन धीरे धीरे एडिक्टेड हो गया
- 46:47और आज मैं पूरा मैं खाना पी के मैं खाने को छोड़ा।
- 46:53मैं आज समुद्र का वह रस भी गया, सारा समुद्र भी गया।
- 46:58अगस्त की तरह ये सब सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स थे जो तुम्हारे
- 47:05लिए संभाल के रखे हुए थे। कोई आएगा और इसको?
- 47:10विश्लेषित करेगा अगस्त समुद्र को भी जाते हैं और तुम इनको बुद्धि
- 47:17से व्याख्यात करते रहते हो। जब से ये बुद्धि से व्याख्यात
- 47:23करने वाली चीज़ ही नहीं है, यह तो रस है समुद्र तो यह तो पीने योग्य
- 47:28है और एक व्यक्ति। कभी न कभी इस स्थल पर आएगा जो इस
- 47:34सारे समुद्र के रस को पी जायेगा यक्लक्ष्य भी जायेगा।
- 47:40यह एक सिंबल था तुम्हें समझाने के लिए कि प्रत्येक व्यक्ति 1 दिन
- 47:44ऋषि हो जाता है। और फिर वह मौन हो जाता है, फिर
- 47:53उसके मुख से कुछ नहीं निकलता। फिरो, पायो गांठ गठियायो।
- 48:14हीरोपयो गांठ गठियायो बार बार बाको क्यों खोले?
- 48:33मन मस्त। हुआ मन मस्त हुआ हाँ फिर क्यों
- 48:41बोल मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल? उसकी भटकन समाप्त हो जाती है,
- 48:53उसकी दौड़ समाप्त हो जाती है, वो ठहर जाता है, वह परम ठहराव में आ
- 48:58जाता है, क्योंकि हमारा भीतर का अंतः परम मौन है।
- 49:07थोड़ी सी कंकड़ फेंकोगी तो लहरें उठेंगी।
- 49:15हमारा भीतर का अस्तित्व इतना परममुन है कि ज़रा सी भी लहर नहीं
- 49:21उठती। उसमें तुम्हारा नाम जब भी उसमें
- 49:26उथल पुथल मचा देता है वो आ रहे हैं सांसों ज़रा आहिस्ता चलो।
- 49:35वो आ रहे हैं सांसो ज़रा आज हिस्सा चलो दिल के धड़कने से भी
- 49:42इबादत में खलल पड़ती है, यह जो दिल धड़कता है यह तुम्हारे लिए
- 49:50जीवनदायी होगा। लेकिन संत कहता कि इसके धड़कने से
- 49:56इसकी आवाज से इबादत में खरल पड़ती है।
- 50:08हिंसा पायो। मानसरोवर हमसफयो, मानसरोवर।
- 50:32ताल तलेया क्यों डोले ताल? तलेया क्यों?
- 50:43डोले मन मस्त हुआ। फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ आह
- 50:55फिर क्या बोल? हंसपयो मानसरोवर।
- 51:15जहाँ जाकर ऐसा सम्मान मिलता है। पंचे पांवि दरगाह मान पंचा का
- 51:24गुरु एकतेहान। ध्यान से मिलता है हम।
- 51:31सब बायो। जाप से नहीं मिलता।
- 51:34ध्यान से मिलता है मानसरोवर? सापयो मानसरोवर ताल तलैया क्यों
- 51:55ढोल? फिर वो तालाबों के अंदर क्यों
- 51:58छोड़ेगा जिसने मानसरोवर पा लिया? मैं कीचड़ भरे तालाबों के अंदर
- 52:05ताल तलइयों में क्यों तोड़ेगा? ताल तलैया क्यों डोल, मन मस्त हुआ
- 52:17फिर क्यों बोल? मन मस्त हुआ।
- 52:22हाँ फिर क्यों बोल यहीं? आकर कहा जो करता है वह ठीक करता
- 52:32है, क्यों सब कुछ उसका है मालिक को तुम रोक कैसे सकते हो?
- 52:39आप पे खेले खेल खिलाड़ी आप पे खेलना आ रहा हूँ आप पे रोवे आप पे
- 52:45हँसे, आप पे सर्जन आ रहा हूँ उसने खुद नहीं सर्जना की अब बात यहाँ
- 52:54हटके की। सृजन हार देखा किसने?
- 53:04बुध ने तो नहीं देखा, चारबाक ने कोशिश नहीं की?
- 53:12मार्क्स और निक से ने कोशिश नहीं की?
- 53:16लेकिन जिसने देख लिया फिर वह क्या करे?
- 53:25दिल क्या करे जब किसी को किसी से प्यार हो जा?
- 53:36वह क्या करे? कबीर को दिख गया।
- 53:40वह अज्ञात हाथ दिख गए जो नचाते हैं सारे संसार को, फिर कबीर क्या
- 53:48करेगा और ध्यान रखो मैंने पिछले प्रवचन में तुम्हें बताया था संत
- 53:55झूठ नहीं बोलते। उस तल पर गया हुआ व्यक्ति जो तल
- 54:02सत्य है, वह सत्य बोलेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे, यह उसका लक्षण है।
- 54:11झूठ बोलेंगे ही नहीं, वो झूठ बोल सकेगा इन्हें वो।
- 54:15जो बोलेंगे सच बोलेंगे तो कबीर झूठ तो बोल नहीं सकता, फिर कबीर
- 54:27का क्या होगा? कबीर ने अपनी आँखों से देखा, मैं
- 54:33कहता आँखों देखी। तुम्हारी बात कबीर कैसे मान लें?
- 54:41कबीर कहते है तुम तो लिखी लिखी पड़ा बड़ी लिखा लिखी की है, नहीं
- 54:46देखा लिखी वह और देखा मैंने मेरी आँखों से देखा।
- 55:00तो कबीर का क्या होगा? तुम तो कहते हो लार्ज अरे
- 55:05सुफ्फिसिएंट लेकिन जिसने सर्जन हरे को देख लिया।
- 55:09जिसने लॉज भी बनाई उसका क्या होगा?
- 55:18और कबीर झूठ नहीं बोलते और आज आज मैं कबीर के शब्दों पे मोहर लगाता
- 55:29हूँ, कबीर के वर्ड्स पे मैं स्टेम्प लगाता हूँ, क्यों?
- 55:38क्योंकि मैंने भी देखा। जंगल में मोर नचा।
- 55:46किसने देखा? मैंने देखा, मैंने देखा, मैंने
- 55:55देखा। जंगल में मोर नाचा?
- 56:00किसने देखा? कबीर ने देखा?
- 56:06कृष्ण ने देखा, गोरख ने देखा, नानक ने देखा, मीरा ने देखा।
- 56:16मैंने भी सीखा कबीर की बात के ऊपर मैं मुहर लगाएं कल को कोई मेरी
- 56:30बात के ऊपर भी मुहर लगाएगा, आ जाएगा कोई?
- 56:34ये खंड हर तो 1 दिन स्कैटर हो जाएगा बिखर जाएगा फिर कोई और आएगा
- 56:44यदा यदा ही धर्म से गला निर्भक्ति भारत जब तुम मान्यताओं को बिना
- 56:51देखे मानना शुरू कर दोगे? अद्वथानम अधर्मस्य तथा आत्मानम
- 56:58सरजा में हम पृथ्रानाय साधुना सत्य को बताने के लिए विनाशाय के
- 57:09दुष्क्रितम् असत्य को परिभाषित करने के लिए।
- 57:13असत्य को बांटने के लिए फैलाव करने वालों के लिए पित्रा नाय
- 57:22साधु नाम बिना शायद दुष्क्रिदान इन झूठ बोलने वालों का विनाश करने
- 57:28के लिए। झूठ बोलने वालों का विनाश करने के
- 57:34लिए, झूठ बोलने वालों को, गंदगी फैलाने वालों का विनाश करने के
- 57:43लिए? धर्म संस्थापना अर्था व्हाटस दी
- 57:52ट्रुथ यह बताने के लिए संभव नहीं युग युग में मैं प्रकट होता हूँ।
- 58:08कल की आगे फिकर मत करो। पिछले वर्ष अक्तूबर के महीने में
- 58:21मैंने यह घोषणा किया। पता मुझे पहले भी था।
- 58:31और तुम मेरी बातों के तीखेपन को सह न सके, क्योंकि तुम्हारी
- 58:35मान्यताएँ तोड़ दी मैंने मैंने गाणें चला दिया।
- 58:41मैंने सुनार का हथौड़ी नहीं चलाया।
- 58:48मैंने लोहार का घण चला दिया और तुम कफे तुम थर्राये तुम टूटे,
- 58:56तुम विखंडित हुए, तुम स्केटर हुए तुम्हारी मान्यताएँ टूट गयी, तुम
- 59:05बुरी तरह से फज़ल हो गए, ये क्या? जो माना वह 1 दिन टूट जाएगा।
- 59:13शीशा हो या दिल हो आखिर। टूट जाता है।
- 59:24टूट जाता है। टूट जाता है टूट जाता।
- 59:34मान्यता 1 दिन टूट ही जाती है। मैं ना तोडूंगा कोई और तोड़ दे
- 59:40कबीर ने तोड़ी इससे पहले मान्यता, यहाँ पे पाथर पूजा हर मिले तो मैं
- 59:45पूजू पहाड़। तुम मूर्तियों को पूजते हो
- 59:49पत्थरों को और अगर इससे हरी मिल जाए तो मैं पहाड़ को गुज लूँ।
- 59:57लेकिन काश पत्थरों को पूछने से कभी कोई हरी मिल जाता वह जो
- 1:00:04तुम्हें चुरा लेता है। पत्थर को पूजने से नहीं तुम चुराए
- 1:00:09जाते पत्थर को पूजने से तुम और ज्यादा मजबूत हो जाते हो,
- 1:00:13तुम्हारा अहंकार और ज्यादा मजबूत हो जाता है।
- 1:00:16तुम कहते हो हमने तो एक अरब जाप कर लिया बाबा जी को जैसे
- 1:00:22मान्यताओं को तोड़ने के लिए। विनाशा के दुष्क्रिदान
- 1:00:28दुष्क्रिदान कौन जिन्होंने झूठ फैलाया, जिन्होंने गलत मान्यताएँ
- 1:00:33फैलाई वो दुष्ट प्रित्रण साथ जो बिचारे जानते तो हैं।
- 1:00:47कि ये झूठ बोल रहे हैं लेकिन कहने की हिम्मत नहीं है उनको बचाने के
- 1:00:55लिए परित रहना एक साधू ने बिना शायद के दुष्कृत।
- 1:01:03धर्म संस्थापना अर्थात संभवन सुख सुख।
- 1:01:09जब भी ऐसा काल खंड आएगा, तब तब मैं आऊंगा क्यों?
- 1:01:17क्योंकि मेरी सृष्टि को। मैं ही तो बचा पाऊंगा, मैंने ही
- 1:01:24बनाई, मैं ही खेल रहा हूँ अपनी ही सृष्टि से और अगर हम अपनी दास्तां
- 1:01:37सुनाते हैं। ख्यामत तो।
- 1:01:45कयामत तो हमारे दिल पे आई, आप क्यों रोए?
- 1:02:01जो हमने दास अगर हम। अपने ही मटेरियल से खेले तो आप
- 1:02:08क्यों रोये? के हम तो हमने।
- 1:02:18ही बिगाड़ा स्वयं की बनाई हुई सृष्टि को।
- 1:02:25कयामत तो हमारे दिल पे आए आप क्यों हम?
- 1:02:37रोए आपने शिकायत क्यों की? आपका क्या गया?
- 1:02:47संत यह जानने के बाद घोषणा करता है क्योंकि दूसरा यहाँ कोई है?
- 1:02:54ही नहीं। वह ही है एकों का।
- 1:03:00और वह अपने ही मटेरियल से माल से खेल रहा है, जो उसने खुद ही पैदा
- 1:03:05किया। तुम्हारा क्या चाहता है तुम क्यों
- 1:03:12फरियाद करते हो? मैं तुम्हें रोज़ कहता हूँ,
- 1:03:16तुम्हारी फरियादें बेकार है। तुम्हारा यहाँ है क्या तुम अपने
- 1:03:27मुँह को बचाना चाहते हो? बस इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।
- 1:03:38लेकिन कौन देखता है तुम्हारे मुँह को?
- 1:03:47मैंने यह सृजना अपने खेल खेलने के लिए बनाई, तुम क्यों बीच में अड़े
- 1:03:56तुमको किसने कहा तुम नहत ही बीच में परेशान हो?
- 1:04:05और अंत में मृत्यु तुम्हें बता देती है तुम्हारा सब खेला खेला था
- 1:04:16बेकार था, अंत में सब विदा हो जाते हो।
- 1:04:22लेकिन मेरी सर्जना में से एक अंश भी नहीं गड़ता मेरी सर्जना में से
- 1:04:29एक अंश भी नहीं गड़ता ना चोरी होता है, ना तुम कहीं ले के जा
- 1:04:35सकते हो ना तुम्हारा कुछ है यहाँ। फिर मैं जो करता हूँ वह ठीक करता
- 1:04:45हूँ, क्योंकि अपने लिए करता हूँ तुम्हारे लिए नहीं करता, तुम
- 1:04:54स्टाम्प क्यों लगाते हो कि यह मेरा है?
- 1:04:58अगर स्टाम्प लगाओगे तो मार खाओगे। क्यों, क्योंकि यह झूठ है,
- 1:05:09तुम्हारा स्टेम्प लगाना गलत है। यही जानने के बाद मैंने कहा संत
- 1:05:18आखिर में जा के। यही देखता है कि मैं नहीं आया कब
- 1:05:24से बोल रहा हूँ मैं आज आखिरी अध्याय है, मैं नहीं हूँ तो मेरा
- 1:05:34भी कुछ नहीं है और क्षण रह पाता है।
- 1:05:41मैं ही हूँ और सब कुछ मेरा ही है, बड़े मज़े की बात है।
- 1:05:46ये दोनों बातें उलट है, लेकिन यक्सांग घटती है।
- 1:05:51जैसे ही तुम देख लेते हो कि मैं नहीं हूँ और मेरा यहाँ कुछ भी
- 1:05:56नहीं है। जैसे ही तुम देखते हो, दूसरे पहलू
- 1:06:00की तरफ मैं ही हूँ और सब मेरा ही है, वहीं जाकर तुम बोलते हो अनल
- 1:06:08हक अहम् ब्रह्मस्त्र मैं खुद खुदा हूँ।
- 1:06:16खालक खलक खलक मैं खालक इस सृष्टि के प्रत्येक दर्रे में मैं खालक
- 1:06:25बनके समाया हुआ हूँ मैं श्रेष्ठ बनके समाया हुआ हूँ खालक खलक खलक
- 1:06:32मैं खालक, लेकिन तुम्हारे मान्यताओं को यह मंजूर नहीं।
- 1:06:36मंसूर कहता है अनल हक तुम कहते हो नहीं यह हमारी किताबों में दिखा
- 1:06:42नहीं, तुम किताबों को चाटते रहो, संत अपने अनुभव से बोलेंगे, संत
- 1:06:53तुम्हारी परवाह नहीं करता। ध्यान रखना, संत तुम्हारी परवाह।
- 1:07:01नहीं करता। मन्नू रे तू कह ना धीर ज र।
- 1:07:17निर्मोही मोह न जाने जिनका अमोह करे।
- 1:07:35मन रे तू का ही न धीर घरे ये निरमोही?
- 1:07:49मोह न जाने जिनका मोह कर रे। मन रे जिनका तू मोह करता है वो
- 1:08:06तेरे है ना? बस लाबादा उड़ा हो सकता है पिछले
- 1:08:13जन्म के तुम्हारे दुश्मन। ये निरमोह मोह न जानें।
- 1:08:27जिनका मोह करे मन रे तू काहे न धीर धरे।
- 1:08:43मैं खुद खेलता हूँ, अपने ही द्वारा बनाई गई सृजना से खेलता
- 1:08:49हूँ तो हमारा क्या लेता हूँ? तुम क्यों प्रयास करते हो कि
- 1:08:56प्रभु ऐसा करते हो? तुम मेरी इच्छा से उर्दू हो जाते
- 1:09:03हो? मैं जैसे ही खेलना चाहता हूँ,
- 1:09:09वैसे ही खेलूँगा तुम्हारी फरियादें सब बेकार क्यों अगर
- 1:09:18तुम्हारी बातों को मैं मान भी लूँ चलो बच्चो।
- 1:09:22तुम जैसा कहते हो मैं कर देता हूँ, लेकिन फिर भी तुम्हारा कुछ
- 1:09:27बनता है क्या तुम मालिक हो पाते हो एक दम से तो गिर पड़ते हो नीचे
- 1:09:35फिर तुम्हारा यहाँ क्या है? तुम घटनाओं को बदलना चाहते हो?
- 1:09:42इसलिए तो तुम्हारी फरियादें तुम्हारी मन्नत आई सब बेकार अगर
- 1:09:49मैं मान भी लूँ तो भी तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और मेरी सरजना
- 1:09:56में भी फर्क नहीं पड़ता, ना ही मेरे पदार्थ को फर्क पड़ता।
- 1:10:01ना ही मेरी कान्शस्नस को फर्क पड़ता मैटर कैन नीदर बी क्रिएटेड
- 1:10:05नॉर कैन बी डिस्ट्रॉइड ऑर कान्शस्नस नैनाम सिदंती शस्त्राणी
- 1:10:13नैनाम पावका नैनाम के लिए जनजापियों ने शोषित इमारूता।
- 1:10:22यहीं आकर संत कहता है वह जो करता है ठीक करता है, क्यों खुद के खेल
- 1:10:30के लिए खेलता है? किसी को ही सन्तों ने लीला कहा।
- 1:10:40आखिर शब्दा क्या है? मैं खुद अपनी इच्छा से अपनी ही
- 1:10:46बनाई हुई सृष्टि से खेलता हूँ। जैसा मन चाहा खेलता हूँ, फिर आप
- 1:10:54क्यों रोते हैं? तुम्हारा है क्या यहाँ तुम फरियाद
- 1:11:08काहे करते हो? घटनाओं को बदल देता हूँ, कोई बात
- 1:11:14नहीं, लेकिन फिर भी कुछ बदलता है नहीं अंतिम सत्य तो वही रहता है।
- 1:11:22राम राम सत्य राधे राधे सत्य सत्य बोले गत बदलता है कुछ घटनाओं को
- 1:11:37बदलने की चिष्टा न करो, इसे तुम प्रयाग कहते?
- 1:11:43हो ना ही? उपकार समझ को जितना संघ निभाते
- 1:12:00उतना ही उपकार समझ को। जितना साथ निभा दे जनममरण का मेल
- 1:12:20है सपना ये सपना। बिसरागे जनममरण का मेल है सपना ये
- 1:12:38सपना बिसरागे। कोई न संग मर कोई न संग मर मनरे।
- 1:13:03तू का है ना धीर धरे ये निरमो ही मोह न जाने।
- 1:13:21जिनका मोह कर जिनका मोह कर मनरे तो का ये नज़ीर।
- 1:13:40घर उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ में वाद।
- 1:13:46जनम मरण का मेल। है सपना ये सपना विसराद कोई न
- 1:13:52संगम रे मन रे तू काहे न जीर। ये निर्मो ही मोह न जाऊं, जिनका
- 1:14:04मोह कर के व्रत के पचड़े में पड़ता है तेरा यहाँ कुछ है ही
- 1:14:11नहीं यही आकर तुम्हारी सभी। छीथड़े उठ जाते हैं छिपका कर्रिंग
- 1:14:23नेसेस के छीथड़े उड़ जाते हैं, बम ब्लास्ट हो जाता है इसलिए मैंने
- 1:14:34बिल्कुल आखिर के प्रवचन में बोला। यह सब लीला है, कर्मों का भोग तुम
- 1:14:46हिसाब करते रह जाओगे और मैं संकल्प कर लूँगा बहुतों अहम।
- 1:15:00एको श्याम मैं बहुत हूँ एको हो दम और मैंने संकल्प किया एको अहम बहु
- 1:15:14शम। मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊं हो गया
- 1:15:20और अब तुम्हारे कर्म धरे के धरे रह जाएंगे, तुम्हारे हिसाब धरे के
- 1:15:24धरे रह जाएंगे मैं संकल्प करूँगा यहाँ बराबर कुछ नहीं होता भाई तुम
- 1:15:32गलती मत खा जा यह सब लीला। जब चाहूँगा लपेटरों का बहुतों अहम
- 1:15:39मैं बहुत हूँ एक और शाम एक हो जाऊं फिर क्या करोगे?
- 1:15:48जन्म मरण का मेल है सपनों। ये सपना, बिसरा ये सपना है।
- 1:16:06लीला है, यह मैं खेल रहा हूँ मेरे लिए खेल रहा हूँ।
- 1:16:15तबाही तो हमारे दिल पे आए आप क्यों?
- 1:16:33रोए जो हमने दासता अपनी सुनाई। हम आज अपनी दास्तां पे नहीं चल
- 1:16:50पड़े आपके रोटी लगे तुम्हारा जहाँ कुछ नहीं है और देखो आँख खोल के
- 1:17:07देखो। क्या वास्तव में अंतिम घड़ी में
- 1:17:13तुमने जो ज़िन्दगी में कमाया है, उसका ज़रा भी तुम्हारे संग संग
- 1:17:18जाएगा? नहीं तो जाएगा, तुम दफन हो जाओगे
- 1:17:24या दहन हो जाओगे? लेकिन तुम्हारे संग क्या?
- 1:17:38जाएगा। न् कमा कर।
- 1:17:49है तो जिनका मुँह करता है ये संघ नहीं जानते क्यों?
- 1:18:01क्योंकि सब मेरा है तुम्हारा क्वेश्चन तुम बीच में क्यों फंसते
- 1:18:13हो? मेरी इच्छा विराट की इच्छा, वृहद
- 1:18:18इच्छा, वृहद की इच्छा से अगर तुम्हारी?
- 1:18:24इच्छा टकराएगी, तो परिणाम तुम जानते हो क्या होगा?
- 1:18:31तुम खंड खंड हो जाओगे, वृहद की इच्छा से टकराने का कभी सोचना भी
- 1:18:41मत। मैं जो करता हूँ ठीक करता हूँ और
- 1:18:48जो करता हूँ भले के लिए करता हूँ तुम उस पर कभी आपत्ति मत करना
- 1:18:55क्योंकि तुम्हारा अधिकार है अधिकार सिर्फ मेरा।
- 1:19:05तुम तो सिर्फ एक काम कर दो, सर्वधर्म पर तो जमाने कम तुम छोड़
- 1:19:16दो सब कुछ क्योंकि तुम्हारा है ही नहीं।
- 1:19:20मेरी शरण में आ जाओ और हम तम सर्व पापे पे मोक्ष मैं तुम्हारे सभी
- 1:19:28पापों को हरण करके अपने में ही मिला लूँगा, तुम बोध से समुद्र हो
- 1:19:36जाओगे। फिर तुम्हारा कोई और छोर न होगा,
- 1:19:42फिर तुम सीमाओं को लांग कर असीम हो जाओगे, फिर तुम अंतो से लाभ
- 1:19:49उलट कर अनंत हो जाओगे, फिर तुम शूद्र से विरात हो जाओगे तुम्हारा
- 1:19:55कोई और छोर तुम्हारा कोई पैमाना मेज़रमेंट न रहेगा।
- 1:20:00फिर मैं ही रहूँगा आज में भी मैं था मध्य में भी मैं हूँ और अंत
- 1:20:08में भी मैं रहूँगा, मैं जब चाहूँ अपनी लीला को समझ लूँगा, तुम इतना
- 1:20:17सा कर दो। अगर कर सको तो सभी इन धर्मों को
- 1:20:24छोड़ दो ये तुम्हारी मान्यता है माँ एकं शरणं वृक्ष मेरी शरण में
- 1:20:32आ जाओ सर्वधर्माण पर तजमा में कम शरण वृक्ष।
- 1:20:37अह, हम तो अनुसार पापे भव मोक्ष स्वामी माँ सोच
- 1:20:51धन्यवाद।