Latest / Baba ji Vijay Vats / 29 Aug 25 - धर्म vs विज्ञान | क्या दीक्षा वापिस ली जा सकती है? | मेरा एकांत में बैठने का कारण?
Transcript
- 0:01बाबा जी प्रणम शालू अग्निहोत्री धर्म बड़ा अमीर था, विज्ञान बड़ा
- 0:18गरीब था। विज्ञान के पास कुछ भी न था धर्म
- 0:29के पास शास्त्र भरे पड़े थे। धर्म से कहाँ छू हुई बाबा?
- 0:43क्या चूक हुई जो धर्म आज दृद्र हो गया?
- 0:50कल का अमीर धर्म आज कंगाल हो गया और कल का गरीब विज्ञान आज सहिंसा
- 1:01हो गया। पहला प्रश्न दूसरा प्रश्न भी हो
- 1:08सके तो साथ ले लेना दुनिया से बहुत दूर बहुत वर्षों से।
- 1:22आप एकांत में, अपनी कुटिया में, बिना किसी वासना के, दौड़ के भाग
- 1:35के आपधापी के शांत भाव से क्यों बैठे?
- 1:42शालू अग्निहोत्री, जोधपुर प्रश्न बड़ा गंभीर है विद्या, लेकिन ऐसे
- 2:02प्रश्न सोजते उसी हैं। जिसका मन निष्पक्ष हो जाता है, न
- 2:15तो धार्मिक रहता है, न वैज्ञानिक रहता है, निष्पक्ष हो जाता है।
- 2:24धर्म बड़ा अमीर था। विज्ञान बड़ा गरीब था, धर्म के
- 2:29पास सम्पदा के नाम पर शास्त्र भरे पड़े थे और विज्ञान के पास कोई एक
- 2:36आध किताब था, आज उल्टा है विज्ञान सहिंसा हो गया।
- 2:49धर्म दरिद्रों के कारण का बहुत प्यारा सवाल है आइए इसे सुनने गए
- 3:05शांत। धर्म के भीतर शिष्य और गुरु की
- 3:18परंपरात चौंकने मत विज्ञान के भीतर शिष्य और गुरु की परंपरा,
- 3:27नृत्य। इस शिष्य और गुर की परंपरा ने
- 3:39धर्म को मार दिया और विज्ञान को बुलंदियों छूती आसमान को पार कर
- 3:53गया। विज्ञान।
- 3:56दूसरे ग्रहों पे पहुँच गया विज्ञान धर्म आज धरती की खाक छान
- 4:04रहा है, विज्ञान एक खोज कर लेता है आज जरदर फोग।
- 4:22दूसरा अन्वेषक साइंटिस्ट रिसर्चर उसका अनुकरण नहीं करता, उसको एक
- 4:34सीढ़ी की तरह लेकर आगे बढ़ने की चेष्टा करता है।
- 4:43यह सर्जना बड़ी विराट है, इतना खोज लिया, मापदंड पे परख लिया ठीक
- 4:52है, आइंस्टीन ने खोज लिया ई इजोक्रिटोयमसिस का।
- 4:59तो ठीक है, अब इसको सीढ़ी बना के आगे चलें।
- 5:06विज्ञान की यही परंपरा विज्ञान को बुलंदियों को छू गई और धर्म की
- 5:15यही परंपरा। गुरु ने जो कहा बस वो ही अंत है
- 5:30गुरु ने कहा बस वो ही संपूर्ण है। हे धर्म को उदैधरता में धकेल गया।
- 5:45मैं जो बोलता हूँ मैंने बहुत कुछ बोला, अपने जीवन का अनुभव बोला
- 5:55हर्जा क्या है? वैज्ञानिक भी तो ऐसा करते हैं जो
- 6:02खोज लिया वो बोल दिया, मैंने भी जो खोजा बोल दिया, कृष्ण ने जो
- 6:18खोजा बोल दिया, कबीर ने जो खोजा बोल दिया।
- 6:22नानक ने ओशो ने कृष्णमूर्ति ने जो खोजा, बोल दिया, लेकिन हम उनके
- 6:29अनुयायी बन गए हैं। अब यहाँ से आपके प्रश्न का जवाब
- 6:38शुरू होता है, धर्म का अंतर्मुखी है।
- 6:46विज्ञान था बहर्मुख रास्ता उतना ही बाहर है, रास्ता उतना ही भीतर
- 6:53है। धार्मिक व्यक्ति को अपने भीतर का
- 6:58रास्ता तय करना होता है। वैज्ञानिक को अपने बाहर का रास्ता
- 7:04तय करना होता है। बाहर का रास्ता कभी पूर्णतया
- 7:15सुलझेगा न क्योंकि विराट प्रबंधन कितना ही खोजे चले जाओ।
- 7:24नई नई गुंडियां नई नई अड़चने निकलती आएंगी।
- 7:33पहले कहते थे फ़ोटन जस्ट पार्टी करना अब कहते नो इट इस ऑल्सो ए
- 7:50वेव लहर भी है ये कण भी अभी ठहर। अभी बहुत कुछ होना बाकी है, धर्म
- 8:04नहीं ऐसा नहीं किया इसलिए धर्म पिछड़ गया।
- 8:14धर्म अनुकरणीय की जमात्मता विज्ञान ने सबक सीखा धर्म ने सबक
- 8:26नहीं सीखा धर्म चिपट गया विज्ञान चिपटा नहीं उस पौड़ी को सीढ़ी को।
- 8:34लांघ गया अब यहाँ समझ लेना धर्म जो खोजे हुए उससे चिपट गया।
- 8:48विज्ञान ने उसे सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया।
- 8:52चिपटा नहीं, उसके लांग गया विज्ञान विज्ञान कभी त्रप्त नहीं
- 9:06हुआ। विज्ञान कहता इतना खोज लिया।
- 9:10इसको सीढ़ी बना लो, इससे आगे चलो इसलिए विज्ञान धीरे धीरे से आज
- 9:17सम्राट हो गया, धर्म चिपक हो गया हमारे गुरु नहीं ये कहा हमारे
- 9:28गुरु नहीं ये कहा। तो लड़ाइयां होने लगीं।
- 9:38अहंकार लड़ने लगे हैं। मैंने पहले भी कहा था जब दो
- 9:44व्यक्ति धर्म के लिए लड़ते हैं, वह कहता है मेरा गुरु बड़ा।
- 9:50दूसरा कहता है मेरा गुरु बड़ा तो दोनों के गुरु बड़े नहीं होते
- 9:56हैं। वो ये दिखाना चाहती हैं कि मैं
- 9:59बड़ा क्योंकि मेरा गुरु बड़ा अप्रत्यक्ष रूप से।
- 10:07वो ये कहना चाहते हैं कि मैं बड़ा और प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको
- 10:16बड़ा दिखाना चाहता हूँ, विज्ञान में ऐसा नहीं।
- 10:26विज्ञान कहता है ऐसा ऐसा खोजा जाँचों परखो देखो कसो सत्य की
- 10:38कसौटी पर कसो मैंने ठीक खोजा या गलत खोजा?
- 10:46ठीक खोजा तो इससे सीढ़ी बना गलत खोजा तो मुझे बता दो।
- 10:56मैं भी इसमें सुधार का उपाय करूँगा।
- 11:00विज्ञानी के चिपके नहीं, धार्मिक चिपके।
- 11:06धर्म ने शंकराचार्य खड़े कर दिए हैं।
- 11:08बस और जहाँ व्यक्ति चिपक जाता है वहाँ इतिश्रय द एंड हो जाता है तो
- 11:21धर्म ठहर गया। सच पूछो तो धर्म ठहर नहीं गया,
- 11:30धर्म बेक घर लगा गया, विज्ञान ठहरा नहीं, विज्ञान आगे ही निकल
- 11:39गया विज्ञान ने। वैज्ञानिक की खोजों को सीढ़ी की
- 11:46तरह इस्तेमाल करके आगे बढ़ गए और नई खोजेंगे जो कल धिर ध्र था आज
- 11:54सहिंसा हो गया और जो कल सहिंसा था।
- 12:02इतने शास्त्र थे, धर्म के पास पुराण थे कितने पर, 18 पर उपनिषद
- 12:10थे, वेद थे, धर्म के पास प्रचुरोतम मात्रा में द्रव्य था।
- 12:23धर्म बड़ा वीर था और विज्ञान के पास कुछ भी नहीं था।
- 12:30विज्ञान के पास अगर कुछ था भी तो भी वो धार्मिक ग्रंथों से इकठ्ठा
- 12:34करते थे। बहुत सी खोजें हमने वेदों से
- 12:39लिया। लेकिन धर्म वेदों पे ठहर गया, अंत
- 12:50मान लिया, चरम मान लिया, पीक मान लिया इससे आगे कुछ।
- 12:59इसलिए पिछड़ गया धर्म, आगे बढ़ गया विज्ञान विज्ञान आज अंतरिक्ष
- 13:10ग्रह नक्षत्रों की ऊंचाइयों को छू रहा है विज्ञान आज सूरज में
- 13:16प्रवेश करने की। जोधना बना रहा है और धर्म इस बात
- 13:26के ऊपर है कि सूरज को कैसे हनुमान ने निकल लिया था।
- 13:35हम बहस करते हैं। जो हमारे पूर्वजों ने खोज लिया,
- 13:43हम उसके साथ झपट गए। आज आप विशेष हो किसी के उसके जो
- 13:515000 साल पहले हुआ था कृष्ण कर। तुम्हें कृष्ण का कोई आता पता
- 13:57नहीं। हम शिष्य हैं उसके जो 5000 साल
- 14:03पहले राधा हुई थी, हमें राधा को कोई पता नहीं हुई, हुई भी थी या
- 14:09नहीं हुई थी और इसी बात के ऊपर। झगड़े हो जाते हैं, एक दूसरे को
- 14:18दुग्धकार पड़ती है, फटकार पड़ती है, अंधे आपस में लड़ते हैं और
- 14:27अंधे ही फैसला करवातें हैं। सूरज को धरती तरसे धरती को
- 14:43चन्द्रमा, धरती को चन्द्रमा। सूरज को धरती तरसे, धरती को
- 14:58चंद्रमा, धरती को चंद्रमा, पानी में शिप जैसे।
- 15:12प्यासी हरात्मा प्यासी हर आत्मा अमितवार बूंद छुपी।
- 15:30किस बादल में बूंद छुपी, किस बादल में कोई जाने ना और तालमेल नदी के
- 15:48जल में? नदी मिले, सागर में सागर मिले कौन
- 15:59से जल में कोई जाने ना। तालमेल नदी के जल में पानी में
- 16:15बूंद जैसे प्यासी हर आत्मा बूंद छिपी के सो बादल कोई जाने न।
- 16:33बड़ी कमाल की बात है। सीप पानी के भीतर है और प्यासी है
- 16:45मीन पानी में है और प्यासी है। एक अजूबा हमने देखा जल में रहकर
- 16:57मीन है प्यासी कबीर कहते ये अजूबा है, खोजें दोनों ही अज्ञात कि।
- 17:15धर्म की खोज भीतर की अज्ञात की खोज और विज्ञान की खोज बाहर के
- 17:23अज्ञात की खोज दोनों खोजें अज्ञात की।
- 17:33लेकिन धर्म ने जो खोजा उसके साथ ये चिपक गया।
- 17:40विज्ञान ने जो खोजा चिपका नहीं उसको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया।
- 17:48यही कारण है बेटे। धर्म बिछड़ गया, विज्ञान भ्रमण की
- 18:01ऊचाइयों को लांघ गया, तुम्हारा चिपकना तुम्हें ठहरा देता है
- 18:10तुमने देखा जो चीज़ हम दीवाल से चिपका देते हैं।
- 18:17कोई फोटो लगा देते हैं, चिपका देते हैं।
- 18:19देवाल से वह सिथर जाती है, वह ठहर जाती है।
- 18:27तुम धर्म से चिपक गए इसलिए हमारा विकास होता है।
- 18:36और अब ध्यान रखना जो भी सभ्यता धर्म से चिपकेगी वह बिछड़ जाएगी
- 18:46और घर खुल जाएगी इसलिए आज। हिंदुस्तान घर का गया है तो कोई
- 18:56अति शोक भी नहीं है, क्योंकि हम धार्मिक हैं इसलिए आज बाहर के
- 19:06मुल्क हमारे पड़ोसी मुल्क को चाइना।
- 19:12अर्थव्यवस्था है 18 और हमारी चार टीले आजाद हम पहले हुए चाइनाबाद
- 19:26में हुआ थोड़ा सा ऐसा क्या हुआ? वो यहाँ होना चाहिए था।
- 19:36हमारे ऋषियों ने भीतर का आनंद बहुत भी लिया था।
- 19:41अब जरूरत थी बाहर के विज्ञान के तो मौत से तुम।
- 19:49यह समझ लिया था कि धर्म धर्म चिपकाहट है और पाप है धर्म
- 20:00व्यक्ति को ठहरा देता है विज्ञान व्यक्ति को आगे ले जाता है
- 20:08विज्ञान। खोजों को सीढ़ियों की तरह
- 20:11इस्तेमाल करता है और धर्म खोजों को दीवाल की तरह इस्तेमाल करता
- 20:17है, छिप के जाता है इसलिए बेटी हम चिपक गए और ठहर गए, ठहर गए और
- 20:25गर्क गए दुनिया कहाँ निकल गई? आबादी बराबर है और शायद आज तो
- 20:35हिंदुस्तान की आबादी ज्यादा है, चाइना की थोड़ी सी कम है।
- 20:46लेकिन चार टिलियन डॉलर 18 टिलियन डॉलर जो अमेरिका को चैलेंज कर
- 20:52सकता है और हम दब्बू बने बैठे हैं।
- 21:00ये शक्ति है। कोई इसको आत्म प्रतिष्ठा, आत्म
- 21:05सम्मान का विषय न बनाएं। सत्य विचारणीय होता है, आत्म
- 21:11सम्मान का विषय नहीं होता, सत्य को खोजो, देखो, विचारो हम पीछे
- 21:19क्यों रह गए? अगर आघात करोगे तो पिछड़े तो हम
- 21:25पहले ही हुए हैं और पिछड़ जाएंगे। अब समझना बात को तुम्हारा दूसरा
- 21:38क्वेश्चन बचे आप एक काम तुम्हें इतने वर्षों से।
- 21:45नरमोही होके निर्वासना होके अकेले बैठे हो ऐसा क्या मिल गया हाँ जो
- 22:00धर्म की राह पे चला। उसे अंत तो गतवा वो ही मिल जाता
- 22:07है। जब मुझे मिल गया, जो कबीर को मिल
- 22:11गया, जो नानक को मिल गया, जो भूत को मिल गया, कृष्ण को मिल गया,
- 22:20बाहर से ही कोई ठहर जाता है। कोई उदासीयां करता है, कोई
- 22:28यात्राएं करता है, ये आचरण की बात है, लेकिन भीतर से हीरा पायो गांठ
- 22:36कचरा बार बार बाकू क्यों खोल लिया?
- 22:42मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल रहा है जिससे आँखें मिल जाती हैं।
- 22:53मुझे आँखें मिल गई। बच्चे बाहर की आँखें तो सभी के
- 23:00पास होती हैं। भीतर की आँख किसी वरले को कभी कभी
- 23:05मिल जाती है और जब वो भीतर की आँख मिल जाती है तो व्यक्ति तुम्हें
- 23:16विलक्षण दिखाई पड़ता है। ना तो उसकी कोई कामना रहती है ना
- 23:22उसकी कोई चिपकाट रहती है। ना उसकी कोई वासना रहती है ना
- 23:27उसकी कोई दौड़ रहती है। फिर तुम उसे देख के कहोगे इसका
- 23:32जीना भी क्या जीना है, ये भी कोई जीना है?
- 23:39कहीं कुल्लू मनाली नहीं गए, कोई स्विस वगैरह की यात्रा नहीं की।
- 23:45कहीं संसार घूमा नहीं, जहाज में कुछ बढ़िया सा खाया नहीं।
- 23:53इडली, डोसा, चाव मंचोंगा। कोई स्वाद नहीं लेता, ये कोई
- 24:02दौड़ता नहीं, कोई काम नहीं करता, कुछ कमाता नहीं, कहीं जाता नहीं,
- 24:10कहीं आता नहीं है, जिंदा खेलता है, बोलता है।
- 24:20खाता कुछ नहीं इसे क्या मिल गया पागल भी नहीं है अगर पागल होता तो
- 24:37इलाज करवाता। पागल खाने जाता, घर वाले ही पागल
- 24:42खाने के लिए जाता कौन बर्दाश्त करता है?
- 24:47बाबलों को घर वाले ही बेड़िया डाल देते हैं, जिनजीरें डाल देते हैं,
- 24:53लेकिन बातें तो समझदारी भी करता है।
- 25:03मुझे आँखें मिल गई बैठें, तुमने ठीक प्रश्न किया, ऐसे तल्ख प्रश्न
- 25:15मुझे चाहिए, वैसे तल्ख नहीं चाहिए कि अंगूठा लगाने के भीतर कैसे चले
- 25:19जाओगे? ये तल्ख प्रश्न है।
- 25:24नहीं तो दीक्षा लेने वाले को सोचना चाहिए।
- 25:27पहले बात मैंने मैंने बाबा से पूछा बाबा ये जो अंगूठा लगा दिया
- 25:34आपने मेरे से। उसकी दीक्षा वापस होगी।
- 25:40क्या कहते हैं ये आपकी और उसकी बात है गुरु शिष्य की, आपके जरिए
- 25:50से मैं मिला। बलिहारी गुरु आपने जिनको पद्धति
- 26:00और मिला है तुम्हारे मध्यम से मैंने घूठा लगाया, तुम्हारे
- 26:07माध्यम से उसने गुंठा लगवाया तो दीक्षा तो कैंसिल नहीं हुई,
- 26:13दीक्षित तो वह रहेगा और उसकी। लिवरेट करने की जिम्मेदारी मेरी
- 26:19रहती है। मैं रेंज फेंकूंगा मैं उसको सुधार
- 26:23करूँगा ये काम मेरा वो काम तुम्हारा फिर बाबा इसने खोया क्या
- 26:32खोया क्योंकि? जहाँ इसको रास्ते की जरूरत थी।
- 26:40अब ये प्रश्न नहीं कर पाएगा। तुमसे थोड़ी देर हो जाएगी और इस
- 26:48रास्ते पे थोड़ी देर भी बहुत ज्यादा देर हो जाती है।
- 26:55कहीं देर न हो जाए, कहीं देर न हो जाए यह देर कई बार।
- 27:11बडका भी देती है। यह देर होना ही कई बार सबेर कर
- 27:19देता है अंधेर कर देता है। देरी मत होने देना यथा संभव।
- 27:36और गुरु से मजाक अच्छा भी नहीं होता।
- 27:40गुरु मजाक का पात्र नहीं है। मजाक करने और बहुत है।
- 27:47गुरु सीखने की चीज़ है। इस शास्त्रों से तुम मजाक करोगे
- 27:56शास्त्रों को खंगालो उनमें से सत्य निकालो, सत्य के शब्द निकालो
- 28:05और फिर उनसे राह लो उस राह पे चलो।
- 28:09गुरु इसी काम का होता है, जीवत शास्त्र होता है, गुरु और जीवत
- 28:15शास्त्र कभी कभी मिलते हैं। मैंने बहुतों को दीक्षा दी,
- 28:28बहुतों को ब्लॉक भी गिरा। लेकिन बाबा ने दीक्षा बाप से नहीं
- 28:34ली। बाबा अपना काम करते रहेंगे।
- 28:38यू विल गेट एनलाइटनमेंट वन डे 1 दिन तुम एनलाइटन हो जाओगे, फर्क
- 28:45क्या पड़ेगा? तुम मुझसे प्रश्न नहीं पूछ सकोगे।
- 28:49ये रास्ता ऐसा कि पल पल में गुरु की आवश्यकता पड़ती है।
- 28:57उस परम उस विराट का तो तुम्हें कोई पता नहीं है तो काम कौन आएगा?
- 29:05शास्त्र भी काम नहीं आएगा। परमात्मा से तुम पूछ नहीं सकोगे
- 29:11विराट से तुम पूछ नहीं सकोगे शस्त्र बोलता नहीं तो कौन कमाएगा?
- 29:17जो बोलता है गुरु जी वत गुरु कमाएगा तो यहाँ देर हो जाएगी,
- 29:22तुम्हें यही गलती होती है तुमसे। जीसको एक बार दीक्षित मैंने कर
- 29:34दिया, वो मैंने नहीं किया। दीक्षित बाबा ने किया इस यंत्र का
- 29:40उपयोग करके मैं बहुत बार बोल चुका हूँ, लेकिन तुम्हें समझो क्यों
- 29:44नहीं आता? लेकिन चुक हो गए, सुख है, दुख है,
- 29:56शरीर कांपा। 1000 तरह की बातें पूछनी पड़ सकती
- 30:01है? किसके पास?
- 30:07शोक है? मुर्दा शास्त्र बोल नहीं सकता और
- 30:13विराट के साथ संबंध जुड़ने का तुम्हारे पास तरीका नहीं है तो एक
- 30:20ही माध्यम था वो तुमने खो दिया जो तुम्हारे।
- 30:27और परमात्मा के बीच में सेतु बन गया था।
- 30:32एक पुल का काम किया था। दो किनारों को जोड़ने के लिए वो
- 30:39तल्ख प्रश्न पूछने की कवायद में ये प्रश्न तल्ख है, अभी ये क्या?
- 30:45प्रश्न तल्ख है? अगर अंगूठा लगाने से कोई लिबरेट
- 30:50नहीं हो सकता तो ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं लिबरेशन ही नहीं
- 30:54होती, हम कभी मुक्त होंगे ही नहीं।
- 30:59आचारों सेस तो फिर अंगूठा लगवाया ही क्यूँ भाई?
- 31:06किसी विश्वविद्यालय के अंदर दाखला लेके ये कह देना कि विश्वविद्यालय
- 31:13में दाखिला लेने का अर्थ ही क्या है तो दाखिला मत लेते भाई और अभी
- 31:21क्या है? अगर दाखिला ले लिया तो पढ़ो मत।
- 31:25घर भर जाओ, आराम से तो मैं क्या करता हूँ बेटी मुझे वो हीरा मिल
- 31:36गया है और हीरे के रस का पान करता करता मैं।
- 31:51वे शुद्ध हो गया, खुमार में डूब गया हूँ, आनंद से ओतप्रोत हो गया
- 32:00हूँ, रस से वर्गा हूँ जीस रस की तुम्हें इंतजार है।
- 32:09तुम जन्मो जन्मो से, जिसकी खोज में हद कर रहे हो, यह वो ही रस
- 32:16है, जो मुझे मिल गया हो और उसके लक्षण आते हैं, बेटे।
- 32:26बस यही लक्षण है जो तुम देख रहे हो ठहराव ठहराव धर्म का परम आगाज़
- 32:42कहीं से भी हो, लेकिन परम। अंत परम ठहराव में उतर तुम्हें
- 32:54मेरी आवाज में उस रस की सुगंध दिखायी नहीं।
- 33:05तुम्हें मेरी आवाज में उस रस का गीत उसकी झंकार सुनाई नहीं पड़ती
- 33:14और बजती हुई पायलिया तुमसे अनछुई रह जाती है।
- 33:20क्या नहीं तुम सुनते हो? मैं क्या करता हूँ?
- 33:28वो ही जीसको आंख मिल जाती है, वह क्या करता है?
- 33:35मैं इन अंधों के कामों को देखता हूँ, एक अंधा दूसरे अंधे को समझा
- 33:44रहा है। वह शंकराचार्य है।
- 33:48बड़ा शंकराचार्य जन्मो जन्मो से अंधे होते हैं, फिर उसे हम
- 34:01शंकराचार्य बना देते हैं। वह शंकराचार्य दूसरे अंधों से
- 34:07बोलता है। दोस्त के शिष्य क्या बोलता है?
- 34:14वह अंधा दूसरे अंधों से बोलता है, ना दिखायी सुनने वालों को?
- 34:20न दिखाई बोलने वाले को, क्योंकि दोनों अंते अब बड़ा अंधा छोटे
- 34:27अंतो को समझता है कि हरे रंग में और गेरुए रंग में फर्क है।
- 34:42कहते हरे रंग की श्यार टंगें होती है, हरे रंग और गैरवे रंग की छः
- 34:53टंगें होती है अंधा अंधे को समझा रहा है।
- 34:57शंकराचार्य बड़ा अंधा है। छोटे अंधों को समझा रहा है कि हरे
- 35:03रंग की चार टांगें होती हैं और गैरवे रंग की छः टांगें होती हैं
- 35:19तो मैं हसता हूँ, खिलखिला के हसता हूँ।
- 35:27हरा रंग आम खाता है चीर के और गेरुआ रंग खाता है आम खाता है चूस
- 35:46के। हर रंगा आसमान को छूता है चाँद
- 35:58तारों में जाता है, कुछ देर वा रंग ब्राह्मण की शहार करता है।
- 36:10अंधे अंधों को समझा रहे हैं, बस मैं ऐसी ही बातों का लुत्फ लिया
- 36:18करता हूँ न उसको ये पता है टाँगें कैसे होती हैं?
- 36:27चार टाँगें कैसी? और छे टाँगें कैसी?
- 36:31और रंगों की टांगें होती हैं और रंग आम चूसता है।
- 36:42एक आम खाता है, ना इसको चूसने का पता ना इसको खाने का पता।
- 36:52और हरा रंग चाँद तारों में जाता है और गैरवा रंग ब्राह्मण की सैर
- 37:00करता है। न इसको चाँद तारों का बताओ न इसको
- 37:05ब्राह्मण का बताओ, ऐसी ही तुम्हारी धार में कमाने का है।
- 37:11समझने वाले समझ जाएंगे। तुम जो भी सुन रहे हो, मैं क्यों
- 37:18कहता हूँ मत सुना करो और कोई कारण नहीं है।
- 37:25मेरा कोई नहीं है इनसे। मैंने कोई जमीन जायदाद नहीं
- 37:30बांटनी है। इसे बस मैं तो इनकी बातों को
- 37:35सुनकर मंद मंद मुस्कुराया करता हूँ मेरी हीमोग्लोब में जरूर बढ़ा
- 37:43देते हैं ये रोग। चार थी चार से 12 ऐसी हँसी आती है
- 37:56कभी कभी तो उस हँसी की ऐसी कड़क आती है कि आपको भी सुनाई पड़ती है
- 38:04ये कौन हँसा? इतने ऊंचे से हँसा लेकिन अंधों को
- 38:13दिखाई नहीं पड़ता क्षमा करना और अंधे ऐसी ही बातें किया करते हैं।
- 38:26मैं क्यों कहता हूँ शस्त्रों को भुंकता हूँ?
- 38:31जिन्होंने शास्त्र लिखे उन्हें आँखें मिल गईं थीं।
- 38:37आँखों के बिना शास्त्र लिखे नहीं जाते लेकिन जो बाचेंगे वो बाचेंगे
- 38:45कैसे आँखें नहीं। आँखें ही तो देखेंगी कि बांचा
- 38:54क्या लिखा किसे बांचे दिखाई ही नहीं पड़ता।
- 39:03अनधे शास्त्रों को बांच रहे। ना अंधे शस्त्र लिख सकते हैं, ना
- 39:16बाँच सकते हैं। पर आज ये आचार्य अंधे शास्त्रों
- 39:29का रस बता रहे हैं आपको। शास्त्रों का रस निकाल के बता रहे
- 39:39अष्टावकर गीता की एक एक शब्द का अर्थ बता रहे गीता के रंग
- 39:52आचार्यों के संग आ जाओ। 50,000 तो हो गए अंधे कितने ही
- 39:59इकट्ठे कर कोई फर्क पड़ता है? अंधों को दिखाई नहीं पड़ता तुम
- 40:0750,000 कह दो, तुम 50,00,000 कह दो, तुम 50,00,00,000 कह दो।
- 40:13मेरे पास एक व्यक्ति है कि आपके इस चैनल को इसके व्यूस जो बढ़ा
- 40:19दूँ, सब्सक्राइबर बढ़ा दूँ। मैंने कहा काहे को बाबा, आपको पता
- 40:26नहीं लोग जब सुनते हैं ना और देखते हैं किसके सब्सक्राइबर
- 40:30कितने हैं। इसके व्यूस कितने?
- 40:36मैंने कहा लोगों की मैं फिक्र नहीं करता।
- 40:42जो ग्राहक देखे भी ग्राहक दुकान पर ज्यादा खड़े हैं वहाँ से सामान
- 40:48सस्ता मिलता है जरूरी नहीं। वह गलती भी कर सकता है।
- 40:57कोई नया आया होगा या जो पहले खड़े हैं वो मूर्ख होंगे।
- 41:04मैं एक दुकान पे जाया करता था सामान लेने के लिए यहाँ की ऊपर से
- 41:09दुकान थी। बड़ी रौनक सी बड़ी एकठ था नहीं
- 41:16भाग्या मुझे कोई कहने लगा देखो शाम तक आपकी बारी नहीं आएगी घर
- 41:24चले जाओ खाना दाना खाओ फिर शायद शाम को।
- 41:29कुछ फुर्सत मेरे देखो कितने कट मैंने कहा चलो ऐसा तो बता दो कि
- 41:39फलां चीज़ कितने की आएगी। कहते हैं ये तो ₹100 की आये चलो
- 41:45आगे से ले लेते हैं दो दुकान आगे। एक विचार मक्खी मार रहा था, हवा
- 41:54कर रहा था, अपने इधर का भट्टा उधर रख रहा था और क्या करें?
- 42:01हमारे पंजाबी में कहावत है बेला बाणियां की करे हैदर दे बट्टे उधर
- 42:06करे। क्या करे बेचारा गा के नहीं आता
- 42:11मैं चला गया उसके पास उसने धरती क्यों मैं कोई ग्राहक आया, मैंने
- 42:19कहा भाई ऐसे करियो, थोड़ी सी ये चीज़ लेने आया है दे दो।
- 42:26झट से उठा जल्दी से पकड़ा दी पैक के मैंने कहा कितने पैसे दो, कहता
- 42:31है ₹80 दे दो और भीड़ वाला ठीक था के ये ठीक है, तुम्हारे अंधा से
- 42:43कई बार गलत लग सकता है, अक्सर गलत हो जाता है।
- 42:49ज्यादा भीड़ को देखकर हम भी चले जाते हैं।
- 42:52ज्यादा लोगों ने देखा अवश्य ही कोई अच्छी बात होगी, सयानी बात
- 42:58होगी, समझदार होगा लेकिन अंधे अन्धों को सीखा रहे हैं।
- 43:05के हरे रंग की टांगे चार होती है। हँसा मत करो गैरवे रंग की टांगे
- 43:13छः होती है हरे रंग जाता है चाँदता रंग गेरवा रंग जाता है
- 43:24ब्राह्मण की तरफ। हरा रंग आम को काट के खाता है।
- 43:37गेरुवा रंग आम को चुस्त है। ये पहचान होती है हरे रंग की।
- 43:46आपको समझाये कुछ। ठीक अगर समझाई तो मैं कृदार्थ हुआ
- 43:56धन्यबागी हूँ मैं अगर आपको समझाई हरा रंग चार टंगों वाला होता है
- 44:05और गिरवा छे टंगों वाला होता है। ये पर भाषाएं आपकी परमात्मा की
- 44:10हैं, जिसका कोई पता नहीं, कोई पता नहीं जीसको किसी ने देखा नहीं,
- 44:22कोई देख सकता नहीं। यह तो नास्तिक भी कह देते हैं।
- 44:28इस नॉट ओनली अननोन बट ऑल्सो अननोनबल पर नास्तिकों को छोड़ो,
- 44:37वैज्ञानिक को छोड़ो हमारे धार्मिक शास्त्र, वेद भी कह देते हैं आखिर
- 44:43में। नीती, नीती न नीती, न नीती इतना
- 44:48नहीं है इतना नहीं हमारी आँखें फिर भी नहीं खुलतीं वेद आँखों
- 44:57वालो ने लिखे लेकिन वांछित। बांचेंगे अंधे तो मैं परिभाषा
- 45:09क्या करता हूँ अंधों की और सुझाकों की अंधा वह देखा देखी,
- 45:18सोना सुनाई कहा कहई गुरु से शब्द सीख लिए।
- 45:23सुन लिए और दिमाग में बढ़ लिए वह अंधा उसके पास कान है समृद्धि है,
- 45:36इसलिए हम कुछ चीजों को सुना श्रवण किया श्रुतियां।
- 45:42और स्मृतियों में भर लिया, लेकिन इससे कुछ नहीं होगा।
- 45:55बक्के गया गलमुकदि न ही तीर्थ गया गलमुकदि न ही।
- 46:04ये सुना सुनाई और स्मृति में फीड कर लेनी सूचनाएं इससे कुछ नहीं
- 46:10होगा होगा किस्से देखा देख लिखा लिखी की है नहीं देखा देखी बात।
- 46:24दूल्हा दुल्हन मिल गए। फीके पड़ी बारात ना लिखी जाती है
- 46:32ना पड़ी जाती है ये तो माट गए थे आँखों वाली।
- 46:41जिन्होंने भीतर जाके देखा, खोजा पाया परमात्मा के बारे में लिख
- 46:46के, लेकिन लिखने की बात ही है, बोलने की बात भी यह नहीं है।
- 46:56सुनने की बात भी ये नहीं है ना ये स्त्रुतियों में आती ना ये
- 47:00समृतियों में आती इसलिए तुम्हारी सारी सूचनाएं बेकार है।
- 47:06तुम्हारा सुना सुनाया सब बेकार है इसलिए मैं कहता हूँ ये कचड़ा है,
- 47:13जो तुमने दिमागों में भर लिया। और कचरा क्या करता है?
- 47:21विजातीय द्रव्य क्या किया करता है?
- 47:23इन्फेक्शन फैलाया करता है। तुम इन्फेक्टेड हो और इन्फेक्टेड
- 47:30व्यक्ति अंधविश्वास फैलाता है। अंधविश्वास फैलाता है, इन्फेक्ट
- 47:42व्यक्ति जहर फैलाता है, इन्फेक्ट व्यक्ति बह फैलाता है, द्वेष
- 47:50फैलाता है। घृणा फैलाता है, आगजनी फैलाता है।
- 47:57इनफेक्टेड व्यक्तियों के ये लक्षण जो रोग ग्रस्त हो गया, जो सवस्थ
- 48:04हो गया वह प्रेम फैलाएगा, सिर्फ प्रेम अद्वैत फैलाएगा अभेद
- 48:12फैलाएगा अभेत होने के डंग बताएगा इन्फेक्शन को काटने के डंग बताएगा
- 48:24यह इनफेक्टेड है इसको हटा दो इसको खुर्च दो तुम हीरे हो।
- 48:30तुम वो सी हो जो पानी के भीतर हो और प्यासे हो।
- 48:50सूरज को धरती ढूंढे धरती को चंद्रमा।
- 49:03धरती को चन्द्रमा पानी में शीप जैसे सुनी इस बात को तुम जीस
- 49:16परमात्मा को ढूंढ़ते हो। उसी में ही हर वक्त हो, सिर्फ
- 49:25समुद्र में ही रहती। हर वक्त मछली समुद्र में ही पानी
- 49:32में ही रहती। हर वक्त हो क्या कहोगे?
- 49:38अगर मीन पानी को ढूंढने लग जाए क्या कहोगे अगर सिप समुद्र के
- 49:47भीतर प्यासी रह जाए। सूरज को धरती ढूंढे धरती को
- 50:01चन्द्रमा धरती को चन्द्रमा। पानी में सी जैसे प्यासी हर
- 50:18आत्मा, प्यासी हर आत्मा। उम्मीदवार बोध छिपी किस बादल में
- 50:40बोध छिपी किस बादल में? कोई जाने ना ताल मिले नदी के जल
- 50:57जो कहानियों सुनाते हो अंधे की। हरे रंग की चार टाँगें होती
- 51:07गेरुवे रंग के छः टाँगें होती हैं।
- 51:11बस ऐसी ही तुम्हारी धर्म की व्याख्याएं धर्म गर्ग का गया है।
- 51:17आज क्योंकि धर्म नहीं है। जैसे खोजा जाना चाहिए।
- 51:25धर्म बुद्धि का विषय है विज्ञान अगर विज्ञान को खोजना तो परमात्मा
- 51:34ने तुम्हें बुद्धि दिया। मुझे लोग कह देते हैं।
- 51:44संसार को किसने बनाया ये शास्त्र कहते हैं ब्रह्मात्मा ने बनाया
- 51:49परमात्मा को किसने बनाया? ये शास्त्र शुभ हो जाते हैं।
- 51:58परमात्मा खुद ही बन गया। तो मुझे तर्क देते हैं, अगर
- 52:06परमात्मा खुद बन गया तो क्या प्रकृति खुद नहीं बन सकती?
- 52:13मैंने कहा तुम्हारा तर्क ठीक है, लेकिन मैं तुमसे पूछता हूँ
- 52:17तुम्हारा ही तर्क? क्या प्रकृति खुद बन सकती है तो
- 52:21परमात्मा खुद नहीं बन सकता? तुम्हारा ही तर्क तुम्हारे पर
- 52:28इस्तेमाल करता हूँ, तुम कहते हो अगर परमात्मा खुद बन सकता है सेब
- 52:33हम है तो क्या प्रकृति सेब हम नहीं हो सकती?
- 52:38क्या प्रकृति स्वयं निर्माण नहीं कर सकती, स्वयं निर्मित नहीं हो
- 52:42सकती? इसलिए हम तो प्रकृति को मानेंगे?
- 52:46सहभम मानते रहो भाई मैं तुमसे पूछता हूँ, अगर प्रकृति सहभम हो
- 52:54सकती है तो क्या परमात्मा सहभम नहीं?
- 52:59देना, जो अब इसका पूछना आचार्यों से पूछना, आचार्यों से पूछना, शंक
- 53:07आचार्यों से अगर प्रकृति सहम हो सकती है तो परमात्मा सहम नहीं हो
- 53:18सकता। बिलकुल हो सकता है।
- 53:25मेरे पास एक डॉक्टर है, बहुत बड़े बहुत बड़े डॉक्टर था, नाम ही गर्म
- 53:28है, कोई समस्या आ गई थी। किसने सुझाव दे दिया था बाबा के
- 53:33पास से? एक वही व्यक्ति है जो आपको सही
- 53:42राय दे देगा। अंडरग्राउंड है बाहर नहीं आता ऐसा
- 53:48ऐसा जैसे भगत लोग अपने गुरु की प्रशंसा करते हैं, ऐसे ही उसने
- 53:55थोड़ी सी ज्यादा ही कर दी हो। फिर जब ओशो का जन्म होता है तो
- 54:05कृष्ण के जन्म की तरह यमुना उसके पांव छूने को राजी हो जाती है,
- 54:10तरसती है, तड़पती है और कहानियों बनती हैं, कभी शांता बना लेते
- 54:16हैं। कवि दाएं हट लेती हैं।
- 54:20महंगे कवि ओशो का जन्म होता है तो कोई नदिया आकर उनके घर के भीतर
- 54:32घुस जाती है। भक्तों की मजबूरी है क्या करें?
- 54:40भक्त कल्पना, शील और कल्पना शील जो होता है वह यथार्थ को नहीं
- 54:47देखे होता। मेरे पिता कृपा करना मेरे आस पास
- 54:54कोई नदी नहीं है। मैं तो गीदड़ बहा मंडी में जन्मा
- 54:59यहाँ कोई नदियाँ नहीं है, कोई नदियाँ थी ही नहीं और मुझे किसी
- 55:05के डर से बाहर भी नहीं ले जाना पड़ा।
- 55:08यो नन्द वंश मेरा कोई दुश्म भी नहीं था।
- 55:12तो मेरी बायोग्राफी लिखने लगो तो ऐसी कृपा जरूर कर देना किसी नदिया
- 55:17ने न नहीं विजय वत्स के पांव छूने नहीं चाहे थे और नदियाँ चाहे की
- 55:24बिको पागल हुए हो तुम नदियाँ में इतनी चेतनता होती है क्या?
- 55:32पानी पदार्थ है और पदार्थ चेतन नहीं होता।
- 55:38थोड़ी सी नाम मात्र नेग्लिजिबल चेतना होती है, लेकिन इतनी चेतना
- 55:43नहीं होती कि यह परमात्मा है, इसके पांव छू लूँ।
- 55:49ये कहानियों हैं तुम्हारी सब घड़ी घड़।
- 55:52न कृष्ण के पांव छुए किसी ने जब न उफ़ान पे थी ये बात ठीक है न उसको
- 55:59जब जन्मे तो किसी नदिया न उनके घर में नहीं गुस्सा हो गई अन्यथा
- 56:09उनको भागना पड़ता। तो ऐसी कृपा करना मेरे पर तो कृपा
- 56:14करना ऐसा कुछ नहीं हुआ भाई मैं खुद ही बोल जाता हूँ जन्मा सहज
- 56:22सहज ही जन्मा जैसे जन्म होता है जी सब प्रोसेसर से होता है।
- 56:29क्रिसमस के दिन मैंने कर प्रवेश किया क्रिसमस 51 की क्रिसमस जी
- 56:46याद है थोड़ी थोड़ी चेतना थी। क्रिसमस का दिन था, 51 का साहस था
- 56:561951 कोई नदियां नहीं थीं, कोई कुछ नहीं था और एक बात और समझा
- 57:05दूँ, मैं सिर्फ बातें कहा करता हूँ तुम्हें मानने के लिए।
- 57:13ज़ोर नहीं डाला करता तानाशाही बात जिद नहीं हूँ कि मेरी बात मानो
- 57:21मैंने बहुत कुछ किया है। एस्टल ट्रैवलिंग किया है, लेकिन
- 57:25तुम मत मानो। तुम खुद एस्टल ट्रैवलिंग पे जाना,
- 57:30उस जंक्चर पॉइंट पर जाकर फिर तुम एस्टल ट्रैवलिंग करना, फिर तुम
- 57:37बताना मैं रहूँ तो मुझे बताना न रहूँ, तो शिष्यों को बताना दुनिया
- 57:44को बताना कि बाबा ठीक है। तुम्हारे साथ वो घटना घट जाए जो
- 57:52करीब 5 घंटे में भूत की तरह खड़ा रहा।
- 57:55शरद पूर्णिमा की रात तो लोगों को बताना हाँ, मेरे साथ भी कटा दट।
- 58:01वास् नॉट एन इल्लुसिनेशन। एक्सटसी परमात्मा की शर्म आनंद की
- 58:11रस की धार मेरे ऊपर गिर श्वेत कणों से तो तुम बताना अगर
- 58:18तुम्हारे से गटे न गटे तो कृपया करके कटाक्ष मत करना।
- 58:25क्योंकि तो मैं अभी देखा ही नहीं तो मैं मार्कस को आचार्यों को
- 58:31चारवाक को बड़े ईमानदार भेजता हूँ।
- 58:36कम से कम स्वच्छ तो बोले हैं एक नहीं, ये समझा कि लेने देने का
- 58:44कोई संबंध नहीं होता यहाँ। कौन सी प्रकृति हिसाब रखती?
- 58:48परमात्मा तो है ही कोई क्षेत्र को तो थोड़ी बैठे हैं बाएं बाएं गंधे
- 58:54पर तो उसने लिख दिया कि लेने देने का ये तुम्हारा जो चक्र बनाया
- 58:59ब्राह्मण ने गलत है यदा जी वेद सुखी जी वेद।
- 59:05कहाँ सुखी रह पाते हो? तुम चाहकर भी लोगों का धन चुरा
- 59:09लेते हो, सुखी रह पाते हो धन से कभी सुख मिलता है धन से सुविधाएं
- 59:15मिलती है सुख नहीं मिलता, सुख मिलता है किसी और स्थल पे जाके धन
- 59:23से सुविधाओं। पदार्थ खरीद सकते हो।
- 59:26तुम बढ़िया बैट ला सकते हो, डेवलप के पिल्लो ला सकते हो, लेकिन नींद
- 59:32गन देगा नींद उस पर्म की दांत है, नींद वह देगा भोजन तुम खरीद सकते
- 59:43हो 3600 प्रकार। धन से लेकिन भूख कौन देगा?
- 59:50भूख ना होगी तो तुम सब कुछ भरा पड़ा होगा तुम्हारे आस पास, तुम
- 59:55कहोगे नहीं, मन नहीं है खाने का। अगर परमात्मा हूँ, तुम्हें भूख न
- 1:00:01दे तुम्हें नींद न दे तुम्हें प्यार सुना दे तो जल तुम्हारे लिए
- 1:00:05बेकार हो जाता है, बहुत जन तुम्हारे लिए बेकार हो जाता है,
- 1:00:10बिछुने तुम्हारे लिए बेकार हो जाते हैं और अगर नींद दे दे भगवान
- 1:00:17तो तुम। सड़क किनारे पड़े हुए रोड़ों के
- 1:00:23ऊपर भी कूटे हुए रोड़ों के ऊपर भी नींद आ जाती है, नींद है ना विखे,
- 1:00:28बिसरा ऊखना विखे पात मौत न विखे उम्र नु तेश का न विखे जात।
- 1:00:41जाते तो तुमने अपने भगवान ने कहाँ बनाई?
- 1:00:45भगवान ने इंसान पैदा किया, ये तुम्हारी चालबाजियों ने राजनीतिक
- 1:00:52लोगों ने, पाखंडियों ने, ब्राह्मणों ने, लुटेरों ने।
- 1:01:01उनका बनाया हुआ है। सब शैतानी काम है, ये इंसानों की
- 1:01:08इजाज नहीं है। ये शैतानो की इजाज़त है।
- 1:01:12इंसानों की इजाज़त तो यही है। ना हिंदू बनेगा, ना मुसलमान
- 1:01:20बनेगा। इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
- 1:01:31इंसान की दुनिया। है।
- 1:01:33इंसान हिंदू नहीं बनाता, मुसलमान नहीं बनाता, शुद्र नहीं बनाता,
- 1:01:37ब्राह्मण नहीं बनाता, भेद नहीं करता।
- 1:01:41वो अभेद है, सारा यूनिवर्स गुथा हुआ है आपस में और वह गुथ ही रहना
- 1:01:47देखता है और गुथा ही रहना बताता है तुम्हें?
- 1:01:52कैसे उलझा हुआ है, कैसे गुथा हुआ है सारा संसार जब तुम अपनी नंगी
- 1:02:00आँखों से इसे देख लोगे तो उसकी महिमा मंडन तब शुरू होता है, उसकी
- 1:02:09महिमा तब शुरू होती है देखने के बाद।
- 1:02:15उससे पहले मेहमानी शुरुआत। प्रभुजी ने ऐसी कायनात बाधी
- 1:02:29प्रभुजी ने ऐसी। काय नात बांधी 1 दिन के पीछे एक
- 1:02:40रात बांधी साथ साथ बांधी प्रभु जी प्रभु जी।
- 1:02:51प्रभुजी ने ऐसी काय हाथ बंधी? 1 दिन के पीछे 177 बंधी उसकी
- 1:03:10कायने। गुत्थी हुई है आपस में जैसे
- 1:03:14तुम्हारे शरीर का तंतु तंतु गुत्था हुआ है इंटरमींगल्ड है ये
- 1:03:21पांव को चोट लगती है तुम्हारे दिमाग को खबर होती है, एक वायरिंग
- 1:03:27है भीतर जाल भीषण हुआ है तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता।
- 1:03:32बड़ा सूक्षम व्यवस्था है तो मेरे पास है बहुत बड़े साइंटिस्ट आ गए
- 1:03:37डॉक्टर विजय हम परमात्मा को सिर्फ उसके असधारण।
- 1:03:52गुथे हुए इस सारी संरचना को देखकर व्यवस्था को देखकर इतनी शानदार
- 1:04:02व्यवस्था घड़ी है, वहाँ शिक्षक बढ़ता है।
- 1:04:08कि इतनी शानदार व्यवस्था को करने वाला कोई है अन्यथा उपड़ खबड़
- 1:04:16पड़ा होता ऊबड़ खबड़ जमीन है। ऊबड़ खबड़ पहाड़ पर्वत है।
- 1:04:28पत्थर है लेकिन ऊपर खापड़ मनुष्य की संरचना नहीं जीवों की संरचना
- 1:04:35इतनी शानदार गुथी हुई है ये और तारामंडल को देखो कितना शानदार
- 1:04:42गढ़ा हुआ है कैसे आग का गोला? इसके करीब जाते ही तुम बसु में
- 1:04:51जाओगे, दूर तक ही बसु में जाओगे, कैसे?
- 1:04:55उसमें आसमान में उसने सित्र कर दिया।
- 1:04:59बस इसे देखकर हमें सिर्फ उसका आभास होता है कि कोई?
- 1:05:06देर इस सम एक्स्ट्रा आर्डिनरी पावर बिहाइंड इट इसकी बेक में
- 1:05:14इसके पीछे कोई अपराध शक्ति है। तुम समझ सकते हो ये खुद में बन
- 1:05:25कर। ठीक लेकिन बड़े बड़े वैज्ञानिक
- 1:05:29कहते हैं खुद से नहीं बनी दिखाई पड़ती।
- 1:05:33कुछ है जो हमें बहुत मौकों के ऊपर हतप्रभ कर जाता है।
- 1:05:39हैरान कर जाता है हमें बहुत मौकों के ऊपर।
- 1:05:44तो लगता है प्रकृति से पार कुछ है तो मैंने उससे कहा प्रकृति से पार
- 1:05:56कुछ है, पर वो कुछ उसी को हम विराट कहते हैं।
- 1:06:02उसी को हम परमात्मा कहते हैं। उसी को हम कहते हैं बुद्ध से
- 1:06:09कृष्ण की यात्रा वह विराट बुद्ध को भी दिखाई पड़ता है, लेकिन किसी
- 1:06:16कारणवश जानते हैं यह तो। यात्रा परमात्मा की है, खुद ही कर
- 1:06:23लेगा हमने जान लिया, बंधन टूट गए, रोग, शोक सब नष्ट है, व्याधियां,
- 1:06:37चिंताएं सब खत्म हुई। हम वहाँ पहुँच गए।
- 1:06:45जीवन दुख है, जीवन दर्द है, क्यों नहीं इसको बांटा जाए?
- 1:06:53और करुणा घनी है, त्याग घना है अन्यथा।
- 1:06:59कौन लात मारता है भरी पूरी थाली भरी पूरी थाली को लात मार के आगे
- 1:07:05वहीं से इनका साहस प्रकट हो गया तो करना बस छूट देते हैं इतना
- 1:07:14बड़ा स्वाद जो कृष्ण पीते हैं हर। और होंठों पर मुरलियां साध लेती
- 1:07:22हैं। मंजूर शीला वत बैठे रहेंगे हम
- 1:07:31लेकिन दुनिया को बांटेंगे, वो तत्व की बात बताएंगे।
- 1:07:35मैंने देखा। और मैंने देखा ये कहने के लिए कोई
- 1:07:44जिम्मेदार व्यक्ति होना चाहिए। प्रबुद्ध जानते हैं मेरे से
- 1:07:48ज्यादा जिम्मेदार और कोई हो भी नहीं सकता क्योंकि मेरे पास बताने
- 1:07:52को कुछ है मेरे पास बताने को लोगों के पास तर्क है देने को।
- 1:07:59कुछ है जिसकी खोज में गया और वो मुझे मिल गया और मैं इतने बड़े
- 1:08:04संकासन को लात मार दी और आज भी है।
- 1:08:07मैं चाहूं तो उस संकासन पे बैठ सकता हूँ लेकिन नहीं बैठता बुद्ध
- 1:08:12इसलिए उठ गए बुद्ध के पास तर्क है बड़ा जबरदस्त और बुद्ध ने।
- 1:08:19इस तर्क का इस्तेमाल करना बेहतर समझा।
- 1:08:22मानवता के हितार्थ था ये बातें अज्ञात हैं।
- 1:08:28बुद्ध बोलते नहीं लेकिन समित हैं। बुद्ध के लोग समझ जाएंगे।
- 1:08:33कुछ पाने के लिए निकला था भरा पूरा।
- 1:08:39साम्राज्य लात मार के चला गया और आज कुछ मिल गया।
- 1:08:42इसीलिए भरा पूरा साम्राज्य तो आज भी है चाहे तो बैठ जाए और कहा भी
- 1:08:49उसके पिता ने जब धारण ठिकाने आ गई करी मुझे पता था।
- 1:08:57जिसकी एक आवाज पे 3600 प्रकार की थालियां सज के आ जाती हैं।
- 1:09:02वो भिक्षा पत्र उठा के कैसे मांगेगा?
- 1:09:05घर कर मुझे पता तेरी धरन ठकानी आ जाएगी आज तेरी धरन ठकानी आ गई तो
- 1:09:11बैठ जा अपनी गद्दी को संभाल ले। तो बुद्ध के अच्छे नहीं पूछा जे
- 1:09:21राजजी छोटा है मैं जीस साम्राज्य को पा दिए हूँ।
- 1:09:30बड़ा विराट बड़ा विराट साम्राज्य मैंने पा लिया।
- 1:09:36और अब मैंने यहाँ बैठना नहीं है। अब मैंने जो पा लिया उसको बांटना
- 1:09:40है। सूत बिसरा गए हो मोरी रे?
- 1:09:58सूद विसरा गयो मोरे ओह कला कला। काला इक बां सूरी वाला ओह काला इक
- 1:10:26बां सूरी वाला शुध मिश्रा गयो। मोरी रे सुध विसरा गयो मोरी की
- 1:10:49माखन चोर वो। माखन चोर वो नन्द की शोर जो माखन
- 1:11:01चोर वो नन्द की शोर जो कर गयो मन की।
- 1:11:11चोरी रे अब तक तो माखन चुराता था, मेरा मन ही चुरा के ले गया।
- 1:11:22सो देवी से रहगयो मोरी। वो करा करा इकवा सूरी वाला
- 1:11:46धन्यवाद।