Latest / Baba ji Vijay Vats / 27 May 25 - अष्टावक्र गीता - विषयों को विष के समान छोड़ दे! The only discourse you Need to Understand.
Transcript
- 0:00अष्टवक्र गीता का एक शब्द हे प्रिया यदि तू मुझे चाहता है तो
- 0:13विषयों को विश्व के सामान छोड़ दे।
- 0:21हे प्रिय, यदि तू मुझे चाहता है तो विषयों को विश के समान छोड़
- 0:29दे। इसका अर्थ क्या है बाबा भारतवंशी?
- 0:39आइए इन शब्दों की गहराई में चल हे प्रिय, यदि तू मुझे चाहता है मैं
- 0:52कौन हूँ? यदि तुम मुझे चाहता है मैं कौन
- 0:59हूँ बिन पग चले सुने बिन काना कर बिन कर्म कर विधि नाना मैं कौन
- 1:23हूँ? जिसे शब्दों में समझाया नहीं जा
- 1:28सकता और जिसे समझा नहीं जा सकता वो मैं हूँ, हे प्रिय, यदि तू
- 1:39मुझे प्राप्त करना चाहता है। गहरे से गहरे शब्द है।
- 1:48अगर आप इस एक श्लोक को भी समझ लोगे तो बाकी सारे शास्त्रों को
- 1:55गंगा में बाहर कोई आवश्यकता नहीं है।
- 2:03इन शब्दों की इतनी गहराई में उतर जाओ के रसातल तक पहुँच जाओ, तो
- 2:15तुम्हें समझा जाएगा कि मैं कौन। ऐसा क्यों बोलते हैं संत?
- 2:25क्योंकि वह सीधे सीधे समझाया नहीं जा सकता कानों के बिना सुनता है,
- 2:38आँखों के बिना देखता है। हाथों के बिना काम करता है, पांव
- 2:45के बिना चलता है, ऐसा ही समझाया जा सकता है।
- 2:58नेगेटिविटी के हिसाब से पाजिटिविटी के हिसाब से वो समझाया
- 3:01नहीं जा सकता। वह आनंद है, वह सुरूर है, वह
- 3:09प्रेम है, वह खुमारी है समझाए तो ऐसे भी जा सकता है दो ढंग है
- 3:20समझने की, लेकिन तुम वैसे समझते नहीं।
- 3:26वैसे तो तुम लोग बखा जाओगे, समझाने की ये व्यवस्था ज्यादा
- 3:34बढ़िया है, कानों के बिना सुनता। पांव के बिना चलता हाथों के बिना
- 3:44काम करता हूँ मैं वो हूँ ध्यान से समझना एक एक बात को तो तुम्हें
- 4:02दूसरा प्रवचन सुनने की आवश्यकता नहीं है।
- 4:07काश तुमने मुझे एक बार की सुन लिया होता तो तुम किसी को भी
- 4:16सुनना बंद कर देते, सुनने की जरूरत नहीं रह जाती, तुम आज भी
- 4:21सुने जा रहे हो। इसका अर्थ साफ सुथरा है।
- 4:28कि तुम उस स्तर पर गए नहीं जो बिना आँखों के देखता बिना कान्हों
- 4:37की क्षमता बिना जीवा के बोलता हूँ रसास्वादन करता हूँ।
- 4:46बिना हाथों के कर्म करते हैं, जो अकारण सुखी है, जो किसी कारण से
- 4:57सुखी नहीं धनपति सुखी है। धन के कारण।
- 5:06प्राइम मिनिस्टर सुखी है। गद्दी के कारण मान सम्मान को
- 5:11चाहने वाला सुखी है। मान सम्मान के कारण वह उसे प्यारा
- 5:22लगता है। तुलसीदास ने शब्द कहा है कामि नार
- 5:35प्यार जिम जैसे कामि को स्त्री या पुरुष प्यारा लगता है कामि नार
- 5:43प्यार जिम लोभियाँ प्रिय जिम दाम। लोभी व्यक्ति को जैसे पैसा अच्छा
- 5:51लगता है। धन, दौलत, सोना, चांदी ही रचवारा
- 5:56तेही रघुनाथ निरंतर प्रिय लागू मधेराम ये प्रभु बिल्कुल इसी तरह
- 6:03है, तुम मुझे अकारण ही प्रिय लगो। जैसे कामी को स्त्री या पुरुष
- 6:11प्यारा होता है, लोभी को धन, हीरे, जौहरा, सोना, चांदी प्यारा
- 6:18होता है। हे प्रभु राम तुम मुझे ऐसे ही
- 6:22अकारण अच्छे लो। बड़ा प्यारा शब्द है।
- 6:28अगर गहराई में जाया जाए, वह कौन है वह जो अकारण सुखी वह कौन है,
- 6:41जो किसी कारण से सुखी नहीं है? क्योंकि जो कारण से सुखी होगा, वह
- 6:47तो कारण के छिन जाने से दुखी हो जाएगा।
- 6:52प्राइम मिनिस्टर की गद्दी चली जाए, दुखी हो जाएगा क्योंकि गद्दी
- 6:55के कारण वो सुखी था और गद्दी के कारण सुखी है तो गद्दी को बचाने
- 7:00की चेष्टा करेगा। मर बैठेगा, गलती को नहीं जाने
- 7:06देगा, ऐसे ही धनपति है दंड के कारण सुखी है, धन को कमाएगा।
- 7:18जैसे तैसे कमाएगा पापा वाज न होवे कट्ठी मोया असंग न जावे, इकट्ठी
- 7:28करेगा और फिर चौकीदारी करेगा संभालेगा उसको, क्योंकि उसमें
- 7:37उसकी जान। अकारण सुखी नहीं है वो, वह किसी
- 7:44कारण से सुखी है। धनपति धन के कारण सुखी गद्दी नशीं
- 7:50गद्दी के कारण सुखी। काम ही भोग के कारण सुखी जीसको रस
- 8:08से प्यारा फिर ऐसा आस्वाद से सुखी लेकिन तुम किसी कारण से सुखी हो
- 8:16तो मैं कौन हूँ? हे प्रिय यदि तुम मुझे पाना चाहता
- 8:21है। तो मैं कौन जो किसी कारण से सुखी
- 8:28हूँ, जो अकारण सुखी हूँ, वो मैं हूँ, कोई कारण नहीं है मेरे सुखी
- 8:38होने का, लेकिन मैं सुखी हूँ। और तुम 1000 तरह के कारण पैदा कर
- 8:44लेते हो, लेकिन तुम सुखी नहीं होती।
- 8:48देखिए आईएस की यूपीएससी की आईपीएस की कितने बच्चे तैयारी कर रहे है?
- 8:55भीतर क्या है? अचेतन में कल को सुखी हो जाएंगे।
- 9:05कोई चाहत है मैं सेवा करूँगा देश की कोई चाहत है मैं लूटूंगा देश
- 9:09को, लेकिन किसी कारण से सुखी होना चाहती हूँ।
- 9:17किसी भावना के वश में ओतप्रोत हो के वह सुखी होना चाहती हूँ।
- 9:22लेकिन अष्टावक्र की बात नहीं कहते अष्टावक्र कहते मैं अकारण सुखी
- 9:27हूँ। हे प्रिय यदि तुम मुझे खाना चाहते
- 9:33हो, मैं कौन हूँ जो अकारण सुखी हूँ?
- 9:41मैं किसी कारण से सुखी नहीं, क्योंकि अगर जीस कारण से मैं सुखी
- 9:46हूँ वह कारण के खत्म होने पे मेरा सुख भी समाप्त हो जाएगा इसलिए
- 9:51मेरा सुख कभी समाप्त नहीं होता। मेरी अखंड धारा आनंद की कभी कम
- 9:57नहीं होती। कभी समाप्त नहीं होती।
- 10:00मैं सदा सुखी हूँ और बिना कारण के सुखी हूँ तो विषयों को विष के
- 10:08समान छोड़ दो। अगर तुम ये शब्द समझ गए ना।
- 10:18और कहा, तुम ये समझ जाओ तो तुम मुझे भी सुनना मत कर, तुम किसी को
- 10:30भी न सुनोगे। अगर तुम्हे ये बात समझा गई।
- 10:40यूं तो अष्टवक्र गीता पे बहुत बोले, लेकिन वो मूड अज्ञानी और
- 10:54विश्व को अगर खतरा है तो इन लोगों से खतरा है।
- 10:58आचार्य प्रशांत जैसे रोगोज जिनके पास विकल ब्रिक है, अनुभव शून्य
- 11:12सद्गुरु जैसे रुखोस जिनके पास अनुभव है ही नहीं।
- 11:19कुछ भी कह देते हैं आदि। योगी बकरा अनुभव के नाम पे कुछ भी
- 11:28एक स्टील की मूर्ति है कितने टन की है?
- 11:36ये सभी गड़बड़ घटाले चलते रहेंगे जब तक तुम ना समझोगे, छः प्रिय
- 11:45यदि तुम मुझे पाना चाहता है मैं कौन?
- 11:53इस एक श्लोक में? सारे आनंद के समुद्र समा जाते सभी
- 12:06वृक्षों को लेखनी बना लिया जाए सारे सुन्दरों को।
- 12:15शाही बना लिया जाए। असत गिरिशमं स्यात के जलम
- 12:19सिंधुपात्र सुरतर्वर शाखा लेखनी पत्रमर्भय लिख्ति अधिग्रहीत
- 12:25वाषार्थ सर्वोकालम तदपीतब गुणानम इसपारव ने धरती को का कुछ बना
- 12:33दिया जाए। और तेरी महिमा लिखनी शुरू हो जाये
- 12:37तदपी तब गुणाना में शुभारंभ न याद थी, फिर भी तुम्हारे गुणों की
- 12:42व्याख्या नहीं हो सकती। प्रभु तुम अव्यख्य है और है।
- 12:54जो लोग कहते हैं वह व्याखयित हो सकता है, उनके दिमाग का इलाज होना
- 12:59चाहिए। दे शुड बी ट्रीटेड मेंटली या तो
- 13:06अहंकारिय हैं या उनका मस्तिष्क गड़बड़ा गया है, दोनों में कोई
- 13:12बात है। उनके भीतर से कोई रसधार बहती और
- 13:20मानवता को सबसे बड़ा खतरा जिन्हें तुम अपना हितैषी समेत हो।
- 13:29जिन्हें तुम पर बुद्धिमान समते हो, सबसे बड़ा खतरा वही जो जानते
- 13:38कुछ नहीं शब्दों की व्याख्या की अतिरिक्तता और ध्यान रखना।
- 13:47रोटी रोटी कहने से भूख तो मिटत नहीं पानी पानी कहने से प्यास तो
- 13:55बुझत नहीं, रोटी रोटी कहते रहो किसी की भूख मिट्टी आज तक।
- 14:11रेगिस्तान में तुम पसीना, खुसी दोपहर का वक्त, सूर्य प्रकाश ठप
- 14:16है, आग बिखेर रहा है तुम चले जा रहे हो प्यास लगी उस पानी की कीमत
- 14:26क्या है? पानी की कीमत का पता तुम तब चलता
- 14:31है जब तुम रेगिस्तान की भरी गर्मी के अंदर हो दोपहरी के वक्त तब तुम
- 14:36सूरज के तले चलते हो और तुम्हे प्यास लगती है तुम्हारा रोया रोया
- 14:42कहता है पानी वहाँ एच टू वो काम नहीं करेगा।
- 14:47वहाँ पानी पानी का जाप नहीं काम करेगा।
- 14:50कितनी ही मालचपलों राधे राधे बिल्कुल नहीं चलेगा।
- 14:57इन मूर्खों को जेल में डाल देना चाहिए।
- 15:06इनको रेगिस्तान में छोड़ देना चाहिए।
- 15:11तप तो जमीन के ऊपर छोड़ देना चाहिए।
- 15:13भरी तो पहरी के अंदर बिना जूतों के फिर ये पांच।
- 15:26ये कहेंगे पानी तुमको बिल्कुल मिल जाएगा, यह रमाला कहो पानी पानी
- 15:34पानी मिल जाएगा, प्यास बूझ जाएगी फिर भी इनमें सुधार नहीं होगा, मर
- 15:43जाएंगे। क्योंकि ये मूढ़ता इतनी गहराई तक
- 15:49उतर गई है, यह हटाई से हटती नहीं। अगर समाज को सभ्य समाज को।
- 16:12कोई विकृत कर रहा है या कोई मार रहा है।
- 16:15वो ऐसे ही लोग हैं जो गीता की अष्टावकर गीता की उपनिश्चितों की
- 16:21व्याख्या करें। एक बूंद पानी के स्वाद का इन्हें
- 16:27पता नहीं और चले हैं। समुद्र की व्याख्या करें।
- 16:35यही हमारा दुर्भाग्य ऐसे रोग पैदा होते हैं यहाँ संत कबीर तो कभी
- 16:48कभी होते हैं यहाँ रैदास। तो कभी कभी होते हैं यहाँ नानक के
- 16:59गले से संगीत तो कभी कभी बरसता है यहाँ मीरा के झांजर से गोंगुरू
- 17:07कभी कभी छनकते हैं। यहाँ कभी कभी कृष्ण के श्लोकों का
- 17:14उबास होता है, अन्यथा ये बुद्धों ने ही डेरा जला रखा है।
- 17:25इन्होंने परेशान कर दिया तुम्हें जीना हरम कर दिया तुम्हें आज तुम
- 17:30शब्दों में उलझ के रह गए काश। इतना आसान होता पानी पानी कहने से
- 17:40प्यास रोटी रोटी कहने से बोख मिट जाती फिर कौन काम करता मूर्खों।
- 17:52कोई सुबह से शाम तक पल्ले गाड़ी करता।
- 17:55क्या अगर शब्दों को दोहराने से भूख मिट जाती है तो फिर तुम काम
- 18:05क्यों करते हो? क्यों दुकान खोलते हो?
- 18:09जो चाहिए उसका गुणगान करना शुरू कर दो।
- 18:12वस्त्र चाहिए हो, कपड़ा, कपड़ा, कपड़ा।
- 18:24भूख लगी है रोटी रोटी प्यास लगी है पानी पानी कब टूटेगी तुम्हारी
- 18:31ये मूड मानसिकता और तुम हो तुम इन लोगों को हृदय में भीतर तक उतारे।
- 18:43कोई करे भी तो क्या करे तुम्हारी मूडताओं की आगे संत निर्भर हो
- 18:53जाता है जी प्रज्ञा यदि तू मुझे चाहता है।
- 19:05में कौन हो जो बिना किसी कारण के प्रश्न हो तो विषयों को विश के
- 19:17समान त्यागते हैं। बचपन की बात है।
- 19:26मेरे पिताजी मुझे कहानी सुना रहे थे अपने ही शहर की कहते यहाँ एक
- 19:32सेठ था घमंडी लाल उसके चार पुत्र थे मेरे जाम से पहले की बात होगी।
- 19:46पिताजी के काल की बात होगी, मैं बड़े प्रेम से सुन रहा था, पिताजी
- 19:55कभी कभी बोलते थे, लेकिन पूरा तोर कहते है।
- 20:05वह गबंडी लाल, इतना शानदार मनेजमेंट था उसका जब वह बच्चों को
- 20:16पुकारता चारों में से किसी एक का नाम लिखता है।
- 20:23सत्यनारायण तो बस इतना ही नाम सुनते चारों खड़े हो जाते थे।
- 20:30हाँ पिताजी पिताजी मुझे कहने लगे आप कुछ समझे इस बात से पुत्र
- 20:45मैंने कहा। क्या समझे बेटा?
- 20:56पिता जी आपने कहा और बड़ी आज्ञाकारी से इसका मतलब यही बनेगा
- 21:05हाँ और बड़े डरते थे उससे। घमंडी लाल एक बार कहते ये हमारे
- 21:15हमारे शहर की कहानी और सच्ची कहानी और सच्ची कहानी है।
- 21:20पिताजी मुझे सुना रहे थे ये सच्ची बात है।
- 21:28एक बार आके कहलता सत्यनारायण तो चारों उठते हाँ बेटा तुमने क्या
- 21:39सबक सीखा है सर? मैंने कहा पिताजी अगर मेरे पास से
- 21:44रिवॉल्वर होता तो मैं उसको गोली मार देता।
- 21:51हाँ, ऐसे उल्लू के पुट्ठों का लेना क्या ऐसे लोगों को बाप बनने
- 22:00की कब लेती है? अरे भैंसे कभी पिता हुआ जा सकता
- 22:08है, प्रेम, प्रेम परम पिता परमात्मा को हम इसलिए पूजते हैं,
- 22:19सब उसके बच्चे हैं क्यों? क्योंकि वो सब से प्रेम करता है,
- 22:23किसी से दुश्मनी नहीं करता। एक को बुलाई तो एक को उठना चाहिए।
- 22:30सत्यनारायण को बुलाए तो सत्यनारायण को उठना चाहिए।
- 22:34ये चारों क्यों उठे? ये बड़ा डरते हैं।
- 22:36सपने में भी अपने बाप की छाया से डरते हैं तो पिताजी कहने लगे कि
- 22:41तुमने क्या शिक्षा ली बेटा? मैंने करने की शिक्षा ली।
- 22:45अगर मेरे पास सिर्फ वाल्वर होता ना पिताजी तो मैं उसको गोली मार
- 22:50देता हूँ। पिताजी एकदम से खेले हैं अरे
- 22:57पुत्र तू तो क्रांतिकारी बनेगा। मैंने कहा पिताजी मुझे तो नहीं
- 23:02पता मैं क्या? लेकिन मुझे ये जरूर पता है कि अगर
- 23:08घमंडी लाल सत्यनारायण को बुलाए तो सत्यनारायण ही उठे।
- 23:13इतना खौफ नहीं होना चाहिए पिता का, बच्चों के मन में।
- 23:23यह है खौफ फिर जनम क्यों दिया बच्चों को, तुम बच्चों के हाथों
- 23:29में तो है नहीं जनम लेना सारी प्रोसेसर तो मैंने की बच्चों की
- 23:36कोई आजादी नहीं जनम लेने के लिए सारा काम तो मरा।
- 23:44वो तो बस तुम्हारी उत्पत्ति है उन विचारों के तो गले में ढोलक डाल
- 23:50दिया, अब वो ढोलक डाल दिया तो बजाना पड़ेगा किसी तरह धो लेते
- 23:56हैं ज़िन्दगी को आशा के सहारे। लेकिन ये कोई ज़िन्दगी है, किसी
- 24:05के पास रोटी नहीं है, किसी के पास मकान नहीं है, किसी के पास वस्त्र
- 24:11नहीं है, किसी के पास पीने को पानी नहीं है, ये तुमने इस सृष्टि
- 24:23का हाल क्या कर रखा है? और ऊपर से ऐसे तानाशाही पता
- 24:38पिताजी थोड़ा घबराए, पिताजी कहते तू बेटा क्रांतिकारी बनेगा।
- 24:43मैंने कहा पिताजी मैं जो भी बनूँगा वो तो वक्त बताएगा।
- 24:48लेकिन एक बात साफ है। लेकिन अगर मैं घमंडी लाल का बेटा
- 24:53होता, मैं हूँ कन्हैया लाल का घमंडी लाल का बेटा मैं होता तो
- 24:58मैं उसको उड़ा देता। बड़ी शीतल स्वभाव कहते पिताजी
- 25:07कहते नहीं इतनी गर्मी नहीं खानी चाहिए पुत्र मैं समझ गया
- 25:13तुम्हारा। इरादाक रहे, तुम स्वतंत्र रहना
- 25:19चाहते हो। मैंने कहा स्वतंत्र ही तो पैदा
- 25:21किया। परमात्मा में कोई किसी के अधीन
- 25:25रहे, यह तो शास्त्र नहीं हो कहता, यह परमात्मा का शास्त्र नहीं
- 25:32होता। परमात्मा ने हर चीज़ को आज़ाद
- 25:35बनाया और घमंडी लाल अपने बच्चों का मालिक कैसे हो गया?
- 25:42घमंडी लाल के द्वारा ये बच्चे तो आए, लेकिन वह तो अपना शोक बरमा
- 25:48रहा था, पिताजी? पहली दफ़े पिताजी को मेरे सामने
- 25:55गर्द नीचे करना पड़ेगा। पिता कहते तुम सत्य बोल रहे हो
- 26:02बेटा मेरे भी पांच पुत्र हैं। एक पुत्र मेरा स्वर्गवास हो गया।
- 26:12छः भाई से 14 महीने का था वो सर्वासो राम नारायण उसका नाम सबसे
- 26:21बड़ा सॉन्ग पिता है क्या जिसकी परछाई को देख कर तुम डर जाओ?
- 26:34पिता तो वो होता है अगर सपने में भी आ जाए तो तुम्हारा अंत का रोम
- 26:40रोम खिल जाए प्रेम से तुम उसको आगोश में ले के छिप के जाओ और
- 26:48रोने लग जाओ अपनी व्यथा को उसे बताओ उससे व्यथित होने।
- 26:56और उसको देखकर व्यथा के मिट जाने में तो जमीन आसमान का वर्क है, ये
- 27:02तो घमंडीलाल अपने बच्चों को ही दुखी कर रहा है बहुत से माता पिता
- 27:14ने। बच्चों को मेरी वीडियो देखने से
- 27:16मना कर रखा है, लेकिन बच्चे कहते हैं हम कहाँ रुकने वाले हैं, जो
- 27:27हमारे हृदय को चीर कर हमारे अंतश में उतर जाती है।
- 27:32हम चोरी सवेरे सुन लेते हैं। कब तक रोकेंगे?
- 27:39मैंने कहा मैं दुश्मन नहीं बनाना चाहता पिता का मैं पिता के भीतर
- 27:47से ये गंदगी निकलना चाहता कि बच्चा तुम्हारी मलकियत है।
- 27:54हम तो आज सब कुछ चीजों को समझ लेते हैं जीसको हम गद्दी पर बिठा
- 27:57देते हैं। वह होता तो मनेजमेंट के लिए
- 28:00बैठाया और बन जाता है। मालिक चीजों को बेचना शुरू कर
- 28:03देता है, देश को बेचना शुरू कर देता है।
- 28:06किसने कहा था भाई, संविधान के किस?
- 28:13आईपीएस की धारा के कौन सी खंड में लिखा है?
- 28:15कौन सी क्लास में लिखा है ये बताओ, एक जगह भी नहीं बेच सकता
- 28:22मैनेजर पर यहाँ तो सब कुछ जड़ा जड़ बिक रहा है।
- 28:30वैसे तो मूड भी हैं ये लोग। तानाशाह होने के साथ साथ ये लोग
- 28:38मूड भी हैं। मूड क्यों?
- 28:40क्योंकि इन्हें पता ही नहीं असली सुख कहाँ असली स्वाद कहाँ
- 28:45पष्टावक्रक बताते हैं असली स्वाद कहाँ छः प्रिय यदि तो मुझे पाना
- 28:51चाहता है। अगर तो तू भ्रम में है सोना,
- 28:58हीरे, चौरात, मोती माणी कवणियां तू पालेगा और तू सुखी हो जाएगा तो
- 29:03फिर तू आजमाले यह भी मेरा ही बनाया हुआ है।
- 29:10लेकिन फिर आखिर में जब तुम्हें मुझे कहानी तो तू भोंक भोंक के
- 29:14मेरे ही द्वार पर आ जा रहा है तो ये आखिरी शब्द हैं जनक को बोले
- 29:19हुए जनक बड़े तृप्त व्यक्ति हैं संसार की तरफ से।
- 29:28जनकष्टा वक्र के पांव पकड़ लिया अष्टा वक्र कहते हैं राजन तो और
- 29:35भाव थोड़ा सा और भोगलिया और वह कंपता है, थर थरता है नहीं, प्रभु
- 29:42नहीं बहुगलिया इनमें नहीं है कुछ तू देख ले।
- 29:49देख लिया प्रभु मुझे तो तुम जीस आनंद में खोए हो जीस, खुमारी में
- 30:00तुम चहक रहे हो मुझे वो आनंद चाहिए।
- 30:07वह बोलते हैं, अष्टावकरी शब्द हे प्रिया यदि तो मुझे चाहता है
- 30:15अष्टावकरी तो खुद को जानते हैं वो कौन अष्टावकरी ये भी जानते हैं कि
- 30:25मैं कौन हूँ और अष्टावकरी ये भी जानते हैं कि जनक भी वही है जो
- 30:29मैं हूँ। तब तो और मास की फिर क्लिक दो तुम
- 30:36भी वो ही मैं भी वो ही। तो विषयों को विश के समान त्याग
- 30:54दे। इसका अर्थ अगर तुम सच से गहरे में
- 30:59ले गए, तो तुम्हें कोई और शास्त्र पठन की आवश्यकता नहीं।
- 31:05तुम्हें किसी और संत को सुनने की जरूरत नहीं।
- 31:09तुम मुझे भी सुनना बंद कर देना फिर क्या आवश्यकता है अगर तुम सही
- 31:16से समझ गए इस कार से एक शरूप इसलिए कृष्ण की गीता को कहा गया
- 31:25किता। पृष्ठवक्र की गीता को कहा गया
- 31:29महागीर कृष्ण की गीता तुम्हें पहुंचा देंगी उसी तल पर, लेकिन
- 31:43थोड़ा सा घूम घाम के आएगी पृष्ठवक्र की गीता घूम घाम के
- 31:50नहीं आएगी शॉर्टकट जम्प। एंड फाइन कुदोह और परम हे प्रिया
- 32:06यदि तू मुझे पाना चाहता है, मैं कौन हूँ जो बिना किसी कारण के
- 32:11सुखी? बार बार समझा रहा हूँ ताकि तुम
- 32:15समझ जाओ जो बिना किसी कारण के सुखी हूँ, वह मैं हूँ, कोई कारण
- 32:21नहीं हूँ, अन्यथा उस कारण को खींच के लाया जाए तो मैं दुखी हो
- 32:25जाऊंगा। लोग मुझे कह देते हैं बाबा आज
- 32:38तुम्हारी असलियत सामने आएगी। आपने दूसरा चैनल और राजनीति का
- 32:45शुरू कर दिया, फिर फिर तुम पदवी पाना चाहते हो और सुखी होना चाहते
- 32:51हो? मैंने कहा नहीं।
- 32:55जीस पदवी के कारण आप सुखी होना चाहते हो या जीस पदवी के ऊपर बैठे
- 33:01हुए व्यक्तियों को तुम सुखी समते हो वह वास्तव में सुखी का है तुम
- 33:07ज़रा पूछो तो ईमानदारी से बोल रहे हो तुम सुखी हो वो कहेंगे।
- 33:13अभी मिला नहीं सुख इसीलिए तो ठूठा उठा के तुमसे वोट मांग रही हैं
- 33:18सुख मिल क्या होता? कोई कोने में आराम से पड़े होते
- 33:24हैं। जद पाले अपेद?
- 33:34कलंदर दा बुआ खुल गया अपने अंदर दा सुखवासी हाँ।
- 33:49उस मंदर दा। जितनी चढ़ दी है, है ना लें दी है
- 34:03जद पाल्या पीद कलंक। वो हाँ खुल गया अपने अंदर दा सुख
- 34:08वा सिंह उस मंद्रदा जिथे जड़ दी है ना लेंगी फिर जरूरत क्या है इन
- 34:16गद्दियो की मान संवादनों की इन छठ प्रकार के अस्वादनों की स्वादों
- 34:23की क्या जान? जब स्वादों का परम रस रसों का परम
- 34:30रस मिल गया, तुम्हें उसके बाद किसी और रस को पाने की जरूरत नहीं
- 34:41रह जाती। छठ के छठ रस छी की छी रस इसमें आ
- 34:47जाते हैं। इसलिए उपनिषद में कहा गया रसों
- 34:51वैश्य मैं रस आइए इस शब्द के अगले।
- 35:03पहरे का मतलब है ये प्रिय युधि तो मुझे पाना चाहता है तो विषयों को
- 35:11विश के समान त्याग दे यहूदियों की प्राणी ओल्ड टेस्टमेंट में लिखा
- 35:18है, मैं परमात्मा हूँ। मैं बड़ा खूंखार मैं जारिया हूँ
- 35:27मैं तुम्हारी रगों को खींच लूँगा, तुम्हारी बौटियों को न छू लूँगा,
- 35:34मैं तुम्हें ऐसा दंडित करूँगा कि तुम कहीं के भी न रहोगे, तुम मरने
- 35:41की भीख मांगोगे। मैं तुम्हारे रोम रोम को थर्रा
- 35:45दूंगा, मैं परमात्मा हूँ ओल्ड टेस्टमेंट तो एक हिसाब से हीटर ने
- 35:53अच्छा ही किया, क्योंकि ऐसे परमात्मा को मानने वाले उसके
- 36:00बच्चे कैसे क्रूर होंगे? और इजराइल वो देश है।
- 36:11हम सभी रिटर्नर को गलत कहते हैं लेकिन एक पक्ष में आके वो गलत
- 36:18नहीं है, वो बिल्कुल ठीक है। वो कहती हैं इनका नामो निशान मिटा
- 36:22दो। उनकी प्राणी बाइबल नहीं वाइबिल तो
- 36:28बड़ा प्रेम का वाद सखाती है। ईसा तो प्यार के प्रेम के पैगंबर
- 36:33है, बिलकुल ओलट लेकिन यहूतियों के ओल्ड टेस्ट हमें कहती हैं।
- 36:43मैं मैडम जलीम हूँ बड़ा क्रोर निर्दयी तुम्हें नोच लूँगा,
- 36:49तुम्हें भक्ष लूँगा, मुझसे डरो, यह परमात्मा नहीं हो सकता तो
- 36:56हिटलर ने ठीक ही किया। इसके अंशों को ही उजाडो।
- 37:03ये बात सोचने और कहने वाला कोई बचे ही ना एक हिसाब से बड़े
- 37:09उत्साह का काम किया। उन्होंने बड़ा हौसले का काम किया।
- 37:13उन्होंने ऐसी बनारी को ही ध्वस्त करता हूँ, जिसका परमात्मा डर
- 37:22दिखाता है। लेकिन उसी की आगे की पीढ़ी लव इस
- 37:37गॉड हिस्सा कहते हैं। लव इस गॉड मैं प्रेम का सागर हूँ।
- 37:50तुम प्यार का सागर है, तुम प्यार का सागर है।
- 38:05तेरे पिक बूंद के प्यार से हम तू प्यार का सागर है।
- 38:21होटा जो दिया तुने लौटा जो दिया तुने चले जा लेंगे जहाँ से हम।
- 38:41लौटा जो दिया तुमने चले जाएंगे जहाँ से हम तो प्यार का सागर।
- 39:02वह प्रेम का समुद्र है, यहूदियों का परमात्मा बड़ा खूंखार, इसलिए
- 39:11यहूदी बड़े, खूंखार जैसा तुम्हारा परमात्मा होगा, वैसे ही तुम होगे।
- 39:21इसे एक रेडिटरी कैरेक्टर ही समझलो हे प्रिय, यदि तू मुझे पाना चाहता
- 39:35है तो सभी विषयों को विश के समान त्याग दे आइए वक्त बहुत ज्यादा
- 39:43हुआ जाता है। और आज मैंने वीडियो वैसे भी छोटी
- 39:48बिना नहीं दी, लेकिन लगता नहीं है क्योंकि आज मुझे एक कक्ष में बैठे
- 39:58हुए है। एक स्थान पर बैठे हुए है।
- 40:0113 वर्ष पूरे हो जाएंगे 24 मई। जो भी समय का बहुत दिन जब मैंने
- 40:10आश्रम ग्रहण किया था और जब मैंने भोजन करना छोड़ा था आज 13 वर्ष
- 40:18पूरे वर्ष। ये सूक्ष्म वाले कहते हैं बाबा 14
- 40:28वर्ष पूरे कर दो वनवास के ये कोई वनवास नहीं है।
- 40:31मेरे लिए बड़ा आनंद में हूँ, बड़ा आनंद में हूँ और ये चाहता हूँ कि
- 40:40तुम भी इसी आनंद में कड़मस्तियां करो।
- 40:46मैं कोई दुख नहीं झेल रहा हूँ। ये सब कुछ करके तुम्हें पता ही
- 40:52नहीं है। जो रस्सास्वादन करके तुम तीर्थता
- 40:58के अतिरिक्त कुछ दे नहीं पाते वो मैं इन रसों को छोड़कर।
- 41:09बड़े शानदार स्वादों में, रसों में सदा से ही मस्त रहता है।
- 41:22तुम ये मत समझना कि मैं बड़ा त्यागी हूँ नहीं मुझसे बड़ा भोगी
- 41:28कोई नहीं। क्योंकि जिसे मैंने त्याग वह
- 41:33शुद्र मैंने चीजों को त्याग दिया, यह शुद्र मैंने रस्सों को त्याग
- 41:39दिया, यह शुद्र और मैंने जीसको भोंगा, वह विराट, वह अखंड, वह
- 41:44असीम उसका कोई और छोर नहीं। तो भोगी मैं ज्यादा बड़ा हुआ या
- 41:51तुम तुम तो शूद्रो को भोग के राजी हो जाती, लेकिन मैं असीम को
- 41:58भौंकता हूँ। मैं अखंड को भौंकता हूँ जिसका ओर
- 42:01छोर नहीं मैं उसको सदैव हर पल भौंकता हूँ।
- 42:06इसलिए तुम मुझे त्यागी मत कहना मुझसे बड़ा भोगी।
- 42:09कुछ विराट को भोगने वाला विराट ही भोगी होता है।
- 42:17तो आइए दूसरे शब्दों पे चले हे प्रिया यदि तू मुझे ये चाहता है
- 42:22तो विषयों को विश के समान छोड़ दे।
- 42:26त्याग करते हैं। ये शब्द बड़ा गंभीर है।
- 42:32इसके मायने अगर तुमने ठीक से अपने अर्धय में बसा लिए तो तुम अभी से
- 42:41संतों को सुनना छोड़ दोगे। अभी से जीस घड़ी से तुमने ये शब्द
- 42:50तुम्हारे अपने अंत में उतारे खाली मन से तुमने अगर मुझे सुन लिया
- 42:56जिसे महावीर कहते हैं श्रावक बन गए सब में के श्रवण तुमने कर
- 43:00लिया। तो तुम अभी से सुनना बंद कर दो
- 43:05करो, सच अपकर तुम गए उस स्थान पर जिसकी तुम डिमॅंड कर रहे हो अलग
- 43:13अलग चीजों से तुम पदार्थों से उपाधियों से गद्दियों से।
- 43:24सभी विषयों को विष की तरह छोड़ दे।
- 43:29दूसरे अध्याय का अष्टवक्र गीता का दूसरे अध्याय का दूसरा श्लोक है।
- 43:40विषय क्या है? तुम विषय को समझते हो?
- 43:44काम क्रोध लोम अहंकार मदमद्सर तुम्हारी शिक्षा प्रणाली में यही
- 43:54विषय आती है और तुम कहते हो कि इन विषयों को विकारों को वीज के समान
- 44:03छोड़ दो, लेकिन असली तुम चूक गए। अष्टा वक्र कुछ और कहना चाहते है
- 44:13अष्टा वक्र जहाँ तीर लगाते हैं, वह निशाने पर तुम्हारे बैठता नहीं
- 44:17और जिसके निशान पर बैठ गया वह फिर जो मैंने कहा।
- 44:27पल भर में छोड़ देता है सब कुछ क्योंकि तुम्हारे लिए और भी बड़ी
- 44:37चीजें हैं जो वैल्युएबल हैं मेरे लिए।
- 44:43वो चीजें वैल्यूएबल रही, अष्टावक्र के लिए वो चीजें
- 44:46वैल्यूएबल रही और जनक को यही सीखा रहे हैं।
- 44:49वो सभी विषयों को विष के समान छोड़ दें।
- 44:57अब ध्यान से समझेगा विषय तुम जिन्हें विषय कहते हो।
- 45:03वो विचारों को विषय कहते हो, लेकिन ये दो नाम है विषय विकार
- 45:10तुम विषय तो भूल गए बेकारों को छोड़ने की जल्दी होने लगी और तुम
- 45:16रोज़ बोलते हो विषय बेकारों से दूर हट जाओ।
- 45:20विकार विषय दो शब्द हैं तुम विचारों को छोड़ने में तलीन हो
- 45:26जाते हो विषय को छोड़ने में तुम्हारा पता ही नहीं है विषय है
- 45:31क्या अब समझो चीजों को। ये जो तुम विषय पढ़ते हो
- 45:39सब्जेक्ट्स ये साइंस है, फिजियोलॉजी है, शिविक है,
- 45:49पॉलिटिकल साइंस है, ये जो आईएसआईपीएस के लोग।
- 45:55बनना चाहते हैं और सर लोग समझा रहे हैं ये यह विषय विषय तुम कहते
- 46:02हो कौन सा सब्जेक्ट्स लेने हैं तुम्हें और सब्जेक्ट्स को?
- 46:06हिंदी में कहते हैं विषय और विषय को अंग्रेजी में कहते हैं
- 46:10सब्जेक्ट्स। इसकी तरफ हमारा कभी ख्याल नहीं
- 46:16था, लेकिन इसकी तरफ अष्टावक्र का ख्याल चला गया।
- 46:23अष्टावक्र गीता के दूसरे अध्याय के दूसरे।
- 46:35सभी सूचनाओं को इकट्ठा करना बंद करो, सभी सब्जेक्ट्स को इकट्ठा
- 46:45करना बंद करो, सूचनाओं को इकट्ठा करना बंद करो।
- 46:56हे प्रिय, अगर तुम मुझे चाहता है तो कोई किंतु परंतु नहीं करेगा
- 47:07क्योंकि तुम्हारी सवाल अगर हल हो गए होते।
- 47:10तो तुम पहुँच ही न जाते ना फिर मेरी जगह तुम बोलते फिर बाबा को
- 47:16मुझे कहने की क्या आवश्यकता थी नहीं है कोई बोलो किंतु उनसे ना
- 47:22करो सभी ऐसे हो नहीं सकते, मैं जानता हूँ।
- 47:31कब का बोला हुआ स्टॉक कितने हो गए?
- 47:36तुम चीजों को तोड़ मरोड़ लेते हो और तुम नहीं तोड़ते, तुम्हारे
- 47:40आचार्य तोड़ देते हैं, आचार्य भटकाने पर लगे हुए हैं तो किस की
- 47:46हिम्मत है जो इस भटकाव को रोके? क्योंकि तुम्हें समझ पड़ता है
- 47:52तुम्हारी काम की बात तुम किसी कारण से सुख पाने की मार्ग पर चल
- 48:00पड़े हो और यह किसी कारण से सुख पाने का मार्ग तुम्हें दिखा देते
- 48:06हैं। येलो मार्ग।
- 48:08इस कारण से मिलेगा सुख यहीं गड़बड़ हो जाता है ऐसे फिर समझ लो
- 48:16तुम भी किसी कारण से सुख पाने की फिराक में हो और ये है आचार्य और
- 48:24सद्गुरु जैसे लोग। परमानंद जैसे लोग प्रेमानंद जैसे
- 48:28लोग यह किसी कारण से सुख पाने की तुम्हें मार्ग बता देती हूँ।
- 48:37राधे राधे, छपते रहो या ऐसा कर लो या वैसा कर लो।
- 48:45ये कारण से सुख पाने का ढंग है। मार्ग है और अष्टावक्र कहते हैं
- 48:51कि बेकार है। अष्टावक्र कहते हैं ना ये पहुंचे
- 48:56हैं, ना इनके शीशे पहुँचेंगे जितना चाहे ज़ोर लगा लो और कितना
- 49:01पहुंचे हैं जो पहुंचा हो वो आ जाए मेरे पास।
- 49:06मुझे थोड़ी सी सूचना तो दे दे ये जिन्हों को भूतों प्रेतों को
- 49:14निकालने वाले लोग सिर मारते हैं बेचारी स्त्रियां सिर घुमाती हैं,
- 49:19पागल जैसी लगती हैं। वह ऑर्डर करता है।
- 49:23जिनको निकल जाओ निकल जाता। मैंने कहा थोड़ा सा एक ही जिन
- 49:29मेरे पास ही रहेगा हराम करो इनको मैं सोच लूँ, थोड़ा सा कोई नहीं
- 49:37भाई, कोई होगा तो भाई। कोई पितरों के नाम पे डरा रहा है
- 49:44तुम्हें भयभीत कर रहा है कोई तानाशाह बन के डरा रहा है कोई
- 49:51कहता है श्राद्ध करो कितने प्रखंड हैं तुम्हारे सिर के ऊपर और तुम
- 49:57कितना बोझ ढोए चले जा रहे हो तुम्हें पता ही नहीं।
- 50:00बहुत से लोग मुझे कहते हैं बाबा बचा दिया मैंने कभी कहा बचाओ अभी
- 50:05तो तुम्हारे सर के ऊपर बहुत सा बोझा पड़ा है।
- 50:12ये पूरी तरह से हटा दो। कचरा साफ कर दो, व्हाइट वास्कर दो
- 50:17पोछा लगा दो अच्छी तरह से। शीशे की तरह तुम्हारे ऊपर चमक
- 50:23जाए, विषय कोई भी विषय हिंदी हो, पंजाबी हो, अंग्रेजी हो, संस्कृत
- 50:35हो, बायोलोजी हो, जूलोजी हो, बाटनी हो, फिर जैलोजी हो।
- 50:42यह कितने तुमने जी बना रखे हैं? हाँ बायोलोजी, जलोजी, एस्ट्रोलॉजी
- 50:53ये कितने जी बना रखे है अभी तो फ़ोर जी 5जी सेवेन जी ये बाकी रह
- 51:00गया। और चैट जी सब कूड़ा भरा पड़ा है
- 51:16तो मैं तुमसे बहुत बार रहा। इन आचार्यों से पूछने के बजाय चैट
- 51:21जी से पूछ रही आप? बेचारा बिल्कुल निर्लेप हो के
- 51:28बोलता है। संतों की तरह ज़रा पूछो तो विषयों
- 51:35को छोड़ दो। सब्जेक्ट्स को छोड़ दो।
- 51:41किसी मार्ग के द्वारा मिलेगा। इस बात को तो छोड़ दो ही ना तुम
- 51:53किसी कारण से मिलेगा इस धारणा को ही छोड़ दो तुम अकारण सुखी कैसे
- 52:02हो जाओ? कुछ भी ना हो तुम्हारे पास मलंग
- 52:07हो, तुम फकीर हो जाओ। सच्ची आशिकी दा मज़ा हो चखे।
- 52:22जो बे कर्ज होवे बे फर्ज होवे बे वर्ज होवे।
- 52:30बे मर जो होवे अब तुम्हे बेगर्ज़ कोई न कोई रोग घरे रहता है।
- 52:40ताई जीके पांव के हाथर फन मेरे पिता के समान लगाओ, पांव के हाथ
- 52:49तुम इतने गर्जमंद हो कि छोटी छोटी चीजों के लिए अपनी गर्ज को पूरा
- 52:55करने के लिए। तुम तलवे चाटना शुरू कर दे देखो
- 53:02आज का मीडिया गरजमंद है, जो चाहे बुलवा लो, उनसे बस पीसा टेको
- 53:12तमाशा देखो। सब्जेक्ट लेसनेस विषय ही न हो जाओ
- 53:22किसी भी विषय को इकट्ठा करने की चेष्टा न करो और तुम तो सारा दिन
- 53:26तुम्हारी सोसाइटी ने सिखाया है। कहाँ गए?
- 53:49जाने कहाँ गए वो दिन खत तेरी याद में।
- 54:06पलकों को हम झुकाएंगे जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी।
- 54:24छ में। पूरा बोल दूंगा।
- 54:33मुझे थोड़ा स्मृतियों में ले आने दो शब्दों को फिर सब सब्जेक्ट्स
- 54:39को छोड़ दो। हे प्रिय।
- 54:42अगर तू मुझे पाना चाहता है मैं कौन हूँ बिना किसी कारण के जो
- 54:48सुखी है वह मैं हूँ बे न पग चले सुने बे न कान, और मैं हूँ बिना
- 54:59किसी कारण के सुखी। बार बार समझा रहा हो ताकि एक ही
- 55:05प्रवचन पुथल पुथल मचा दे। प्रलय ले जाए हमारे दुखों को न्यत
- 55:15ना बुत करते विषय। विकार विकार काम, क्रोध लोग
- 55:25मोहनकर लेकिन विषय तुमने कहाँ छोड़े विषयों को तो गिट्ठा करता
- 55:29है काम, क्रोध अहंकार के अंदर फिर डूबे हुए हो और विषय अलग से है के
- 55:36ज्यादा खराब करता है क्योंकि ये विषय उन्नतुरल है ये तुमने बनाए।
- 55:44काम क्रोध लो मो। अहंकार ये अननेचुरल नहीं है दीज़
- 55:48अरे नेचुरल भीतर से आता है काम एक क्रोध इनके ऊपर विजय प्राप्ति का
- 55:58तो एक कला है ढंग गया है फॉर्मूला।
- 56:02वो तो मैंने तुम्हें बता दिया साक्षी रह जाओ मन भटकता है भटकने
- 56:06दो उसके साथ मत चलो, उससे लड़ो भी मत, उसके संग भी मत चलो।
- 56:12यह तो विषयों से पिशा छुड़ाने का एक ढंग था विकारों से और विषयों
- 56:19से। विषय इनको तो तुम अपनाना चाहती
- 56:25हो, जो ज्यादा विषयों में दक्ष है।
- 56:28तुम तो उसकी स्तुति गान करते हो, यह तो 25 भाषाओं का गाता है तो यह
- 56:34तो फिर ज्यादा पागल है। जो सारे संसार की भाषाओं को जानता
- 56:41है, उससे बड़ा पागल और कौन हो सकता है?
- 56:43सारी उम्र खपा दी इसने भाषाओं के ज्ञान में जिससे आनंद नहीं
- 56:49मिलेगा, जिससे सुख नहीं मिलेगा। इसका सारा वीजा भर गया है।
- 56:54सारे न्यूरॉन भर गए हैं। इसके उसका भार इतना ज्यादा है।
- 56:59वह जियेगा कैसे कब जियेगा पहले इकट्ठा करने में मशरूफ रहा।
- 57:05अब वो इसका बोझा ढोएगा और तुम कहते हो यह तो बड़ा ज्ञाता है।
- 57:10ज्ञाता खा के सिर्फ गंदगी की टोकरी इसके सिर के ऊपर रखी है
- 57:17बोझा ढो रहा है। तुम्हारी दृष्टि में ऐसे ही लोग
- 57:20विद्वान होते हैं। आचार्य देश सब जानता है ना गीता
- 57:28आती है, ना अपने शिरदाता है, ना महा गीता आती है ना इन्हें कुछ
- 57:35नहीं आता सिर्फ शब्दों के खिलाड़ी।
- 57:38बस इधर थोड़ा सा ज्यादा ऑप्शन था, इधर लोग वहाँ भी पहुंचते और हुकम
- 57:44भी मानते। श्रोतागण ज्यादा है, बल्ले बल्ले
- 57:48ज्यादा होगी, इन्हें पता नहीं इतने मूर्ख हैं।
- 57:51इन्हें पता नहीं कि 1 दिन धाम से आज नहीं 1 दिन धाम से इस माटी में
- 57:57मिल जाओ। और तुम्हारी संस्था माटी में मिल
- 58:00जाएगी, खंडहर हो जाएगी नालंदा यूनिवर्सिटी की तरफ जी उन्हें
- 58:05नहीं पता अगर पता होता तो क्यों तांडव करते हैं?
- 58:11इतना करने की आवश्यकता है घर में बैठ जाओ, आराम से।
- 58:18लव से कहता है जिसने पा लिया वो जो हो गया हम अगर बोलते हैं
- 58:26तुम्हें चुप कराने के लिए। काश बिना बोले को समय जाते तो हम
- 58:34चुप ही रहते हैं लेकिन इनके बोलने का कारण कुछ और है।
- 58:41ये कहते हैं सस्ता का हाथ मजबूत करो और ये हो गया है सुस्त।
- 58:50आज अपन को हो गए हैं अपने झूठे ज्ञान के बुनियाद पर तुम्हें पागल
- 58:59बना देते हैं विषय ये सब्जेक्ट्स बाहरी तुम कितनी नॉलेज रखते हो?
- 59:09सबसे खतरनाक चीज़ है, यह है नॉरिस, यह डेफिनिशन्स यह सूचनाएँ
- 59:21तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन हैं। अष्टावकर कहते हैं इन्हें छोड़
- 59:25दे। तुमने विचारों को तो छोड़ने की
- 59:30बड़ी कोशिश की? ये जैन मणि सुबह से शाम तक
- 59:33विचारों को छोड़ते रहते हैं लेकिन ग्रंथ बढ़ते रहते हैं, भेजा भर
- 59:40लेते हैं नमोवरि अंतना नमो सिद्धाना नमो आर्यन बस इससे भेजा
- 59:47भर लेते हैं। नमन करना और बात है जो की जाना और
- 59:51बात है नमाज़ करना और बात है, नमाज़ के शब्दों को भेजेगा।
- 59:57एक अंग बना लेना, ये अलग बात है। तुम शब्दों से भरे भरे फिर तुम
- 1:00:04कहते हो, हम दुखी हो। शब्दों का भार ही इतना दुखी कर
- 1:00:09देगा। तुम्हें अब देखिए, मेरे बोलने से
- 1:00:13पहले ही कॉमेंट्स आ जाते हैं। ये क्या है?
- 1:00:15भरी खोपड़ी की निचनी सूचना इतनी ज्यादा इकट्ठी कर ली है, इन्हें
- 1:00:21सुख कैसे मिलेगा? इधर भटक रहे हैं, उधर भटक रहे
- 1:00:25हैं, उधर भटक। मेरे बोलने से पहले ही शुरू हो
- 1:00:28जाती है करोड़ों की किताब। इन्हें मुक्ति मिलेंगे कैसे?
- 1:00:35इन्हीं से तो मुक्ति चाहिए समझी है।
- 1:00:40बात को जीस चीजों से मुक्ति चाहिए।
- 1:00:46वो इन्होंने खुद जोड़ी हैं। ये वासनाओं से भी ज्यादा गंभीर
- 1:00:53वासना वासनाएं तो कभी कभी उठती हैं, कभी नहीं भी उठती, लेकिन ये
- 1:00:59सूचनाएं तो सदा ही तुम्हारे दिमाग में छाई रहती है।
- 1:01:03ये सूचनाएं। ये नॉलेज यह ज्ञान गीता में क्या
- 1:01:10लिखा? उसमें क्या लिखा उसमें क्या लिखा?
- 1:01:13यह तो तुम्हारा लहू चूस लेती है, तुम्हें सुखी होने ही नहीं देती।
- 1:01:17बड़ा अजीब बात कहते हैं और सत्य कहते हैं इसलिए तुमने पुत्र पूछा।
- 1:01:26बड़ा गहरा प्रश्न है। हालांकि आखिरी मुकाम भी चल रहा
- 1:01:30है। सब कंप्लीट कर दिया कोर्स मैंने
- 1:01:33सिलेबस टोटली कंप्लीट है, लेकिन फिर भी तुम्हारा प्रश्न बड़ा
- 1:01:38प्रासंगिक है और नए प्रश्नों को मैं बड़ा अधीमान देता हूँ क्योंकि
- 1:01:42वह रह गए। तो इनको भी बोलता चलो सब विषयों
- 1:01:53को विष के समान छोड़ दो। तुमने विचारों को तो छोड़ने की
- 1:01:57कोशिश की विषयों को तुमने ज्यादा अपनाने की कोशिश की।
- 1:02:03इसका भी मास्टर हो जाऊं एक व्यक्ति के अंदर का मैं छींक,
- 1:02:07छींक सब्जेक्ट्स में मास्टर हूँ। मैंने कहा, फिर तुम तो कैंसर
- 1:02:12एपिसोड कैंसर के रोकी या फोड़ा पार लिया कैंसर का अब कैसे
- 1:02:18छुटकारा करू? अरे इतना रोग बाला करते हैं और
- 1:02:27कोई कहता राधे राधे कोई कहता रामता कोई कहता ओम शांति अरे यार
- 1:02:36सुनो। ये सब सूचनाओं के भंडार हैं और
- 1:02:40देखिए इनकी जमातों के अंदर सूचनाओं के आधार पर पीएचडी की
- 1:02:45डिग्री दी जाती हैं और ये अपने आपको बड़ा गौरान भी तो महसूस करते
- 1:02:51हैं। पीएचडी की डिग्री पाने के बाद
- 1:02:55नहीं, ये नहीं पता कि हम ज्यादा पागल हो गए।
- 1:02:59जो बड़ा वागल होता है ना मूर्ख वे पीएचडी और डबल पीएचडी कोई तो
- 1:03:04ट्रिपल पीएचडी है। मेरे पास आये थे एक मैं कही इसके
- 1:03:09बाद मत आ जाना। अरे मूर्ख तुम तो मुर्ख ही नहीं।
- 1:03:15तू तो तीरे मुर्खों? तुम्हारी मूर्खताओं को मैं कैसे
- 1:03:19दूर करूँगा और मेरे पास लोग आ जाते हैं बाबा 10 गुरु बदलिए
- 1:03:23मैंने कहा फिर तुम मेरे पास तो मत आ 10 गुरुओं की तरह मैं भी थोथ ही
- 1:03:28सा बताऊँगा तुम दूर ही रहो भाई तुम तो मत आ जइयो।
- 1:03:35विषय वासनाओं से दूर हो जाओ। अगर तुम मुझे प्राप्त करना चाहता
- 1:03:41है तो सुंदर और सिंपल शब्द विषयों से दूर हो जाओ, कुछ इकट्ठा करना
- 1:03:48धन को इकट्ठा करो या शब्दों को इकट्ठा करो।
- 1:03:55वो शब्द फिर जाप हो परमात्मा का राम राम करो, रात ही रात ही करो
- 1:04:01फिर सूचना हो कि कौनसा तारा कितनी दूर द्रव कितनी दूर सप्तर्षि
- 1:04:06कितनी दूर यहाँ से किस गति से चलेंगे चंद्रमा, कितनी दूर ये सब
- 1:04:11सूचना? इन सूचनाओं को लिप्त हो जाना इनके
- 1:04:20साथ अब इनको मैं सही आपको ढंग से समझा दूँ।
- 1:04:27वीडियो तो बहुत लंबी हो गई काश। बुद्ध को रहस्य में उतरने की
- 1:04:38थोड़ी सी और छूट मिल जाती। उनका मन उन्हें और बैठने को कह
- 1:04:47देता कि तुम खुद को तो जान लिया हो।
- 1:04:51अब रहस्य में उतर जाओ अगर बुद्ध रहस्य में उतर जाते तो बड़ा
- 1:04:56शानदार दुनिया को तोहफा देके जाते चूक है।
- 1:05:00उन्हें जल्दबाजी की कि बुद्ध हो गए, खुद को जान दिया, बस खत्म हुआ
- 1:05:05काम अब बांटो। ये बांटना भी काफी ठीक है।
- 1:05:10बहुत से लोगों के दर्द दुख मिटेंगे, कारण मिटेगा, लेकिन अगर
- 1:05:15कहीं रहस्यमय उतर जाते बुद्ध जैसे व्यक्ति तो वह कमाल था तो फिर घर
- 1:05:24छोड़ना नहीं पड़ता और अगर छोड़ भी दिया था।
- 1:05:29तो फिर वापस आके गद्दी को संभाल लेते कृष्ण की तरह बुद्ध को फर्क
- 1:05:35पड़ता है। अगर आसपास सोने की मटकियां रखी
- 1:05:39लेकिन कृष्ण को फर्क नहीं पड़ता। अगर आसपास कितने भी राज्य
- 1:05:43साम्राज्य कितने भी जनता। कितनी रानियों, कितने पुत्र,
- 1:05:48कितना साम्राज्य, कितना सोना, कितनी अशर्फिया, कितने हीरे
- 1:05:55जवाहरातों के भंडार। कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 1:05:58वो जानता है ये मार्टिन जानते हैं।
- 1:06:04माटी का पुतराव कैसे नचत है कैसे नचत है, डरो फिरत है।
- 1:06:22माँ टीका उतरा कैसे नचित है? कृष्ण जानते हैं और काश बुद्ध
- 1:06:30कृष्ण कैसे हो जाते हैं इसलिए बुध घबराते हैं, फिर लौटते हैं कपल
- 1:06:38वस्तु। लेकिन राज्य नहीं संभाले।
- 1:06:43कृष्ण अगर ऐसे ही गए होते तो कृष्ण वापस आके संभाल लेते और
- 1:06:49कृष्ण से बढ़िया राजा और कौन हो सकता है बाटनी कितनी जुलती है अभी
- 1:06:58रहस्य का पता नहीं। और जब तक व्यक्ति खुद ही तक पहुँच
- 1:07:04गया और रहस्य तक नहीं पहुंचा, खुद ही तक पहुँच गया, खुदा तक नहीं
- 1:07:10पहुँच गया, वह अधूरा है, वो चाहे कोई भी।
- 1:07:15इसलिए मैं बुद्ध के ऊपर कृष्ण को सदा ही बहुत ज्यादा आधिमान देता
- 1:07:19हूँ। क्यों?
- 1:07:20वो कि बुद्ध कभी नहीं कहेंगे कि मेरे समर्पण हो जाओ वो कहेंगे
- 1:07:27अपपद्वीपों भवर खुद का प्रकाश खुद उत्पन्न कर।
- 1:07:34लेकिन कृष्ण कहेंगे तुम मेरे अर्पित हो जा अनन्या, चिंतित तो
- 1:07:40माम ये जन परियोपास्थ ते श्याम नित्याभूक्ता नाम योग शमं वाहमं
- 1:07:46सर्व द्रवानम् प्रतिज्ञमामी का मिश्रणं ब्रज अहम तम सर्प
- 1:07:50पापयभ्रमम। सूचनाओं को इकट्ठा अगर कर ही लिया
- 1:08:01है तो एक रास्ता बचता है जितना हो सके और सूचना इकट्ठी करने से बचो।
- 1:08:10जो हो गया वो हो गया। अब स्टॉप हो जाओ, रुक जाओ और
- 1:08:16सूचनाएँ कठिना करो अब एकत्रिका तो मैं बता देता हूँ सूचनाओं के साथ
- 1:08:23वही व्यवहार करो जो आप वासनाओं के साथ करते हो।
- 1:08:28सूचनाएँ आएंगी। आएंगी, ठहरेंगी लेकिन तुम निर्ले
- 1:08:35बने रहो, तुम अपने होने में बने रहो, तुम स्थिति भृग बने रहो,
- 1:08:42जानते तो कृष्ण भी सभी कुछ है। 64 कलाओं से सुन लेकिन वो कलाएं
- 1:08:49दूर पड़ी हैं। उनकी खोपड़ी में प्रेम दूर पड़ा
- 1:08:54है उनके हृदय में और वे स्वयं बहुत दूर बैठे हैं सबसे निर्लिप्त
- 1:09:01प्रेम से भी सूचनाओं से भी इन दोनों चीजों से निर्लिप्त बैठे
- 1:09:06हैं। ना सूचनाओं के क्रीब जब जरूरत
- 1:09:09पड़ती है, सूचनाओं के क्रीब हो जाते हैं, जब रास जाते हैं तो
- 1:09:14हृदय के क्रीब हो जाते हैं, प्रेम बरस आते हैं और जब किसी चीज़ की
- 1:09:20जरूरत होती है ज्ञान अर्जुन को देना तो बुद्धि के क्रीब हो जाते
- 1:09:26हैं। लेकिन खुद उनका काम कहाँ?
- 1:09:30खुद उनका काम उस जगह पर जो अकारण सुखी है, तुमने अकारण सुखी होना
- 1:09:36है और तुम अकारण ही सुखी हो सकते हो।
- 1:09:39सह कारण तो कभी कोई सुखी हो ही नहीं सकता।
- 1:09:43एक ही ढंग है एक ही मार्ग है। तुम सुखी हो सकते हो अकारण अगर
- 1:09:50सहकारण सुखी होगे तो वो करण के खो जाने पर तुम्हारा सुख भी हो
- 1:09:54जाएगा। इस बात को आप अच्छी तरह से सब।
- 1:10:07जैसे विचारों के लिए तुम निर्ले बने रहे, विकार आए, विचार आए तुम
- 1:10:14छिपटो मत, तुम उनसे झगड़ा मत करो, लड़ाई मत करो, वो आए हैं, आने दो,
- 1:10:21चले जाएंगे, जाने दो ऐसी ही सूचनाएं आएंगी।
- 1:10:26आने दो ठहरेंगी ठहरने दो जाएँगी, जाने दो बिलकुल उनसे भी यही
- 1:10:33व्यवहार करो। जो आपने विचारों के साथ किया वो
- 1:10:37ही विचारों के साथ तो यही कृष्ण करते है।
- 1:10:43कृष्ण परम प्रज्ञावान। लेकिन यह तकनीक आ गई है जीसको यह
- 1:10:49तकनीक आ गई। वह अष्टावक्र हो गया।
- 1:10:54वह फिर जनकों को बढ़ा सकता है। वह कृष्ण हो गया।
- 1:10:58वह अर्जुन को राह दिखा सकता है। समझा दे तुम हे प्रिये अगर तुम
- 1:11:08मुझे पाना चाहता है अगर संसार की चीज़ पाना चाहता है तो मेहनत कर
- 1:11:12ले कमा ले छीना छपटी कर ले पापा भज न होवे, इकट्ठी हो या संग न
- 1:11:17जावे अगर तुम मुझे पाना चाहता है यानी विश्राम, आनंद, प्रेम।
- 1:11:24खुमारी आनंद का उल्लास और प्रेम का रस्ता हुआ झरना और अमृत की
- 1:11:34बोनें व आनंद का चहुं तरफ से घर जाना वो सागर में।
- 1:11:42अठकेड़ियां खाना अगर तू ये चाहता है मेरे पास आना चाहता है तो सभी
- 1:11:49विषयों को विष के समान छोड़ दे जैसे जहर को हम छोड़ देते हैं
- 1:11:54अमृत को हम पी लेते हैं ऐसे ही जहर को तुम विषयों को और
- 1:12:00वेहिकारों को। विषय बराबर रखो।
- 1:12:04तुम विषयों को भूल गए और ये लोग तुम विकारों को तो जैन मुनि हटाने
- 1:12:11के लिए बैठ गए और विषयों को बढ़ाने में लग गए ये अचार्य जैसे
- 1:12:16लोग और तुम तो मारे गए, बिलकुल मारे गए।
- 1:12:20दौड़ इतनी भयंकर हो गई। मैं जिधर देखता हूँ सब दौड़ रहे
- 1:12:23है। एक ग्रामीण दिल्ली चला गया तो
- 1:12:28जल्दी वापस आ गया तो ग्राउंड वाले पूछने लगे भाई तू गया तो सर दो
- 1:12:34हफ्ते के लिए तू आ गया, तीसरे दिन कहता वो भी बस आने जाने में वक्त
- 1:12:39लगा है। क्या बात तो रुका नहीं?
- 1:12:41दिल्ली गया था। दिल्ली तो देखने वाली है दिलवालों
- 1:12:45की है, अरे कहता है भाई क्या बताऊँ?
- 1:12:47जब मैं दिल्ली में गया तो सब भागे जा रहे थे।
- 1:12:53सब जिसके पास जो मिला जिसे स्कूटर मिला स्कूटर, कार मिला कार, बस
- 1:12:59मिला बस पे। रेलगाड़ी मिली, रेलगाड़ी पे जीसको
- 1:13:03जो मिला उसके ऊपर बैठ के भाग रहा है।
- 1:13:06मैंने कहा पता नहीं कौन सी भगदड़ मच गई, ये तो कहीं कोई ना कोई
- 1:13:12युद्ध चल पड़ा। ये कहीं कोई कांड हुआ है ये सभी
- 1:13:18जो भाग रहे हैं। तो तू भी भाग भाग मिल्खा भाग तो
- 1:13:25मैं तो यूं चला वहाँ से मैं तो भागा और जल्दी से ट्रेन पकड़ ली,
- 1:13:30जान बुझा के किसी तरह आया हूँ बस ऐसे ही सारी दुनिया भाग रही है
- 1:13:36कहाँ जा रही थी? तुम्हें पता नहीं तुमने जाना कहाँ
- 1:13:41है तुम्हारा मन तुम्हें कहाँ ले के जाता है।
- 1:13:45साथी ना कोई मन दिया है ना कोई। महफिल चला मुझे ले के है दिल
- 1:14:05अकेले कहा साथी ना कोई मैं। अष्टावकर का ये श्लोक पूरा हुआ हे
- 1:14:19प्रिय, अगर तुम मुझे प्राप्त करना चाहता है तो विषयों को विश्व के
- 1:14:26समान सौंप दे। त्याग दे ये कदम।
- 1:14:34जहाँ पड़े सजदे किए थे यार ने, मुझको रुला रुला दिया जाती हुई
- 1:14:51बाहर ने। जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी
- 1:15:05याद में नजरों को हम। बिछाएंगे।
- 1:15:15जाने कहीं भी तुम रहो चाहेंगे तुमको उम्रभर तुमको न भूल।
- 1:15:31आएँगे। जाने कहाँ गए वो दिन?
- 1:15:40अपनी नजर में, आजकर दिन? भी?
- 1:15:48अंधेरी। रात है अपनी नजर में आजकल दिन भी
- 1:16:01अंधेरी रात है, साया ही अपने। साथ था साया ही अपने साथ है।
- 1:16:17जाने कहाँ गए वो दिन कहते थे तेरी।
- 1:16:27याद में नजरों को हम भिछाएंगे राधे राधे शाम मिला दे।
- 1:16:46राधे राधे श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हरे राधे राधे श्याम मिला
- 1:17:03दे गोविंदा। गोपाल हरे मेरी नैया पार लगा दे
- 1:17:14गोबिंद गोपाल हरे राधे राधे श्याम मिला दे गोबिंद गोपाल हरे।
- 1:17:26राधे राधे श्याम मिला दे गोविंदा गोपाल हरे मेरी नैया पार लगा दे
- 1:17:39गोविंदा गोपाल हरे। राधे राधे जाम मिला दे गोबिंदा
- 1:17:50गोपाल हरे। धन्यवाद।