Latest / Baba ji Vijay Vats / 1 Mar 25 - New Philosophy ना हुकम मानो, ना हुकम करो - बस ठहर जाओ! जटाजूट रखने के आध्यात्मिक रहस्य! गंगा के पानी की विशेषता क्या है?
Transcript
- 0:24तीन रास्ते हैं हुक्म मानना, हुक्म करना।
- 0:39और तीसरा ठहर जाना, न हुकुम करना, न हुकुम मानना, ध्यान से सुनियेगा
- 0:57हुकुम करना सब चाहते हैं। हुक्म मानना कोई नहीं चाहता, जबकि
- 1:12इन दोनों का अपने आप में कोई अर्थ नहीं है बड़ी गहरी बातें हैं।
- 1:19लेकिन क्योंकि गहरे प्रवचन चल रहे।
- 1:21हैं और मैं ऐसा समझो कि गीता के अठार में धय की आखिरी कड़ी प्रेम।
- 1:37जहाँ वो कहते हैं सर्वधर्माण प्रतिजमा में एक।
- 1:51तीन रास्ते हैं भूकंप करना, भूकंप मानना और ठहर जाना।
- 2:02हुक्म करने में भी तुम नहीं ठहरते कुछ करते हो, समर्पण करने में भी
- 2:13तुम नहीं ठहरते, कुछ करते हो? तीसरा है ठहर जाना, वास्तव में
- 2:26देखा जाए तो उन दोनों का संकल्प और समर्पण हुकुम करना संकल्प
- 2:39हुकुम मानना। समर्पण इन दोनों का तत्व रस है
- 2:48ठहरना क्योंकि हुक्म करना भी झूल है पानी में हिलाना है पानी को।
- 3:04हुक्म मानना भी झोल है। पानी में कुछ करना है, मानना है
- 3:13और तीसरा ठहर जाना यह ठहर जाना तुम्हें प्रकृति रोध से करती है।
- 3:22नींद की अवस्था में और तुम सुध खो देते हो, तुम्हें ज़रा भी पता
- 3:30नहीं चलता कितना वक्त बीत गया कितनी देर से तुम सोए पड़े हो?
- 3:42और उसका रिसाल्ट क्या होता है? फ्रेशनेस हुकुम मानना सभी चाहते
- 3:55हैं कि मैं हुकुम ना मानु हुकुम करना।
- 4:04सभी चाहते हैं कि मैं हुक्म करूँ, हाकम बनु, दास न बनु राजा बनु
- 4:15कठपुतली न बनु, कठपुतलियों को नचाने वाला बनु।
- 4:24अब ये तीसरा जो मैंने कहा मेरे दर्शन का वो दर्शन नहीं आपका मगज
- 4:33खपाई का आखिरी अध्याय चल रहा है। ठहर जाना नय हुकुम करना संकल्प नय
- 4:52हुकुम मानना समर्पण बल्कि दोनों से पार।
- 5:00ठहर जाना हुकुम करने से भी तुम नहीं पहुंचते।
- 5:12हुकुम मानने से भी तुम नहीं पहुंचते, अब तुम चकित मत होना।
- 5:23यह आखिरी कणक है तुम्हारी आँखों का जोड़ निकाल दूँ।
- 5:32इन दोनों में उथलपुथल है, उन दोनों में तुम हिलते हो।
- 5:47हुकुम करते हो तो भी हिलते हो, तानाशाह बन जाते हो, हुकुम मानते
- 5:53हो तो भी हिलते हो भक्त बन जाते हो।
- 6:03मैंने आपको एक अन्य की फिलॉसफी दी है।
- 6:05दोनों में से कोई नहीं ठहर जाना। ये कैसे होगा?
- 6:24न हुकुम करना, न हुकुम मारना, ठहर जाना, ये कैसे होगा?
- 6:33जैसे बुद्ध ने एक मार्ग दिया है, मध्यम मार्ग आपने पेंडुलम देखा।
- 6:41होगा। एक छोर पे जाता है, फिर बीच में
- 6:50ठहरता नहीं, आगे चला जाता है, दूसरे छोर से पलट के आता है उसकी
- 6:57यात्रा में शुरू रहती है। इस छोर से उस छोर तक इस अति से उस
- 7:09अति तक और इन दोनों ही अतियों में वह गुजरता है उस बिंदु से जहाँ
- 7:20ठहरा जा सकता है। जिसे बुद्ध कहते हैं।
- 7:25मध्य मार्ग मध्य मार्ग क्या है? न संकल्प करो, न समर्पण करो, कुछ
- 7:38न करो, स्वीकार करो। ठहर जाओ जो होता है व्हाटएवर इस
- 7:49हैपनिंग लेट दट, बी हैपन उसे होने दो तुम बाधा ना बनो।
- 8:00जाने तुम न रहो मुझे लोग कह देते हैं बाबा अगर हम ही न रहे तो
- 8:17मुक्ति का आनंद चखेगा कौन? मैं उनसे कहता हूँ कि अभी तक तुम
- 8:28थे तो तुमने पाया क्या? महज उत्तेजनों का फल पाया सुख भी
- 8:43एक उतेजना। जिसमें तुम हँसते हो नाचते हो,
- 8:49दुख भी एक को तेजन जिसमें तुम दुखी होते हो, शोक में आते हो,
- 8:57संतप्त होता है तुम्हारा हृदय कलेजा बिंद जाता है।
- 9:07जब तुम हो अब अब क्या पा रहे हो? ये संतों के पास या तथा कथित
- 9:22संतों के पास इतनी लंबी कतारें क्यों हैं?
- 9:31इतनी लम्बी कतारें क्यों हैं ये? क्या चाहते हैं लोग?
- 9:45क्यों ये सत्य को पाखंड में डाल दिया गया है?
- 9:52ये मान्यताएँ पनपी क्यों? ये भ्रम अपनाने क्यों पड़े?
- 9:58मानवता को क्यों जय अंधविश्वास थोपने पड़े आदमी को?
- 10:15ज़रा गहरे से सोचना अगर मानव सुखी हो गया होता।
- 10:23क्यों जाता कंभासनन को जब तुम सवस्थ होते हो तो दवा लेते हो जब
- 10:36तुम पूर्ण सवस्थ हो तो दवा तुम तभी लेते हो जब तुम बीमार होते
- 10:45हो। वो बीमार चाहे कोई रोग हो, चाहे
- 10:53कोई कमी हो, कोई विटामिन की कमी, कैल्शियम की कमी, किसी मिनरल की
- 11:02कमी। जब तो कोई कमी है, डेफिशियेंसी
- 11:07है, जब कोई बिमारी है, कुछ दुख बच रहा है।
- 11:15दो ही कारणों से तो मैं डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती है और गुरु डॉक्टर
- 11:22होते हैं। यह बात छोड़िये, नीम हकीम खतराए
- 11:28जान भी होते हैं और सही जीवन को बचाने वाले भी होते हैं।
- 11:40यह लम्बी कतारें कौन हैं? मेरा प्रश्न यह है जो थोड़ा सा
- 11:46ढोंग रच लेता है। आड़े तिरछे कपड़े पहन लेता है
- 11:56आड़े तिरछी वेस्ट मोसा बना लेता है।
- 12:02आदमी होकर आदमी का हुलिया बिगाड़ लेता है ये काला पुला मुँह करना
- 12:10हम रामलीला में क्या करते थे ये मेकअप करना ये क्यों करता है
- 12:18आदमी? आखिर चाहता क्या है तुम्हें पता
- 12:27ही नहीं तुम इनके पास जाते कम हो तुम्हें परख ही नहीं।
- 12:41अगर फर्क होती तो इन मेकअप मैन्स के पास जाते कोई दाढ़ी को पीले
- 12:48किये बैठा है, क्या फायदा? उससे उम्र ढलते ढलते ये स्वतः हो
- 12:56जाएगी। पहले काली थी, फिर सफेद होगी,
- 13:03उम्र के पड़ाव हैं, प्रकृति का खेल है खुद से क्यों पीली की खुद
- 13:21से क्यों एक नाग नमा टोपी पहन? ये छोटी छोटी।
- 13:29उम्र के बच्चे आज क्या कर रहे? हैं।
- 13:34ये आपको गुमराह करने में लगे। हैं कोई सपना दिखा के?
- 13:47राजनीतिज्ञों को मैं बहुत समझदार व्यक्ति नहीं मानता।
- 13:56समझदार हैं कृष्ण जो आपको सपना भी दिखाते हैं तो सत्य का दिखाते
- 14:08हैं। समझदार अष्टावक्र हैं शरीर टेढ़ा
- 14:15मिटा है, कोई बात नहीं। लेकिन तुम्हें कल्पना करवातें हैं
- 14:23शक्ति। की।
- 14:25ये कल्पनाएँ दो प्रकार की हैं। एक सत्य की कल्पना एक असत्य की
- 14:32कल्पना राजनीतिज्ञ आपको असत्य की कल्पना देते हैं।
- 14:38हवाई महल इन महलों में ना तुम रह सकोगे ना कमरे हैं।
- 14:47ना स्नागिरी हैं, ना इन कमरों में बैठ डल सकेगा, ना सूझ सको के आराम
- 14:56कर सको के कुछ नहीं कर सकते। कागज के महलों में कभी कोई ठहरा
- 15:01है। कबीर भी तुम्हें सपना दिखाते हैं,
- 15:13नानक भी, मीरा भी, चैतन्य भी, शंकर भी, कृष्ण भी, महावीर भी,
- 15:21बुद्ध भी ये भी सपना दिखाते हैं। सपना कौन?
- 15:28सपना वो जो तुम्हे आज तक पता न हो वो तुम्हारे लिए सपना।
- 15:33है तो सपना ये है कि तुम अमीर नहीं हो।
- 15:43राजनीतिज्ञ कहता है मैं तुम्हें अमीर बना दूंगा और ये सपना झूठा
- 15:49है। क्योंकि वो अमीर बना नहीं सकता।
- 15:53उसका प्रयोजन दूसरा है। तुम्हें लूटपाट करके खुद अमीर हो
- 15:59जाना है उसका सपना ये है तुम्हें भ्रमित सपनों के जाल में उलझा
- 16:07लेता है एक सपना तुम्हें। संत भीत कहता है और तुम किस सपने
- 16:20पर विश्वास करते हो? यह तुम्हारी स्वतंत्र चेतना पर
- 16:26निर्भर करता है। आवश्यकता क्या है तुम्हे?
- 16:35अगर तुम्हें प्यास लगी। है।
- 16:40और तुम्हें भोजन की थाली परोसती जाए तो तुम कहोगे नहीं पहले पानी
- 16:44में गला सूखा जा रहा रोम रोम। पानी मांग रहे हैं खाना नहीं खाना
- 16:58बाद में पहले पानी दो और अगर तुम्हें भूख लगी है पेट भूखा है।
- 17:15तो तुम्हें पानी दे दिया जाए। तुम कहोगे नहीं पानी तो बहुत पिया
- 17:19है, लगी तो है भूख राजनीतिज्ञ यही काम करते हैं।
- 17:32तुम्हें जीस चीज़ की जरूरत है वो नहीं देते।
- 17:37उसके अलावे कुछ देते हैं क्योंकि सपना है एक राजनीतिक सपना है, एक
- 17:48आध्यात्मिक सपना है, दोनों सपने। इनमें से एक सत्य सपना है, एक
- 17:58असत्य सपना है, कबीर तुम्हें सत्य सपना दिखाते हैं।
- 18:07राजनीतिज्ञ कोई भी हो, किसी एक राजनीतिज्ञ की बात नहीं कर रहा
- 18:13हूँ। वह गरीब से गरीब मुल्क का हो या
- 18:20अमीर से अमीर मुल्क का हो दिखाते सपने ही और सपने कागजी दिखाते
- 18:26हैं। झूठ एक बात त है।
- 18:33कि राजनीतिज्ञ संतुष्ट नहीं होता। अब इसको कागज़ पर लिख ले और एक
- 18:41बात तय है कि आध्यात्मिक संतुष्ट होता है।
- 18:49हिटलर संतुष्ट नहीं होता। कृष्ण संतुष्ट होते हैं, सपने
- 18:56एड्रेस भी दिखाएगा और कृष्ण जो बोलेंगे लगेगा वो भी आपको सपना
- 19:04भला ईमानदारी से सोच के बताइए क्या जो कृष्ण कहते हैं वो आपको
- 19:09सपना नहीं लगता? जब कृष्ण कहते हैं वह तत्व ऐसा
- 19:17जीसको कोई शस्त्र नहीं काट सकता। आग नहीं जला सकती, पानी नहीं गला
- 19:24सकता, वायु नहीं सुखा सकती। सच में बताना भीतर से सोच के क्या
- 19:30तुम्हें ये सपना नहीं लगता लगता है तो इसे मैं अध्यात्मिक सपना
- 19:39कहता हूँ और एक सपना दिखाने वाले राजनीतिक होता है।
- 19:53वो कैसी हैं? मैं सोनी के महल बना दूंगा,
- 19:56तुम्हारे तुम्हें अमीर बना दूंगा, तुम्हें काम धाम दूंगा, आराम
- 20:08दूंगा। दोनों ही सपने हैं।
- 20:17बातों को बड़े आनंद से सुनते रहिए और इसका स्वाद चखिए कृष्ण भी
- 20:27सपने। दिखाते।
- 20:28हैं। कबीर भी सपना तो करते है, वो
- 20:33आध्यात्मिक सपना है, वो राजनीति के सपना है।
- 20:42सपने का अर्थ क्या है? सपने का अर्थ जो तुम अब नहीं हो।
- 20:49वो होने का नाम सपना है राजनीतिज्ञ जो आपको सपना दिखाते
- 20:59हैं, वो राजनीतिज्ञ खुद तृप्त नहीं होते।
- 21:03खुद तलाश। में होते हैं।
- 21:07वो खुद उस राह पे हैं के हम कैसे तृप्त हो जाए?
- 21:12अभी तक तृप्त हुए नहीं हैं वो खुद प्रैक्टिकल कर रहे हैं।
- 21:21सुखी नहीं हैं राजनैतिक। खुद सुखी नहीं है तो वो अच्छी तरह
- 21:30से समते हैं कि तुम भी सुखी। नहीं हो तो फिर वो एक सपना दिखाते
- 21:38हैं कि मैं तुम्हें सुखी बना लूँगा।
- 21:47मुझे इस राजगद्दी पर बिठा दो, मुझे हकम बना दो, तुम बिठा देते
- 21:53हो और कुछ वर्षों में परिणाम तुम्हारे सामने आ जाता है।
- 22:01वो ठीक हो या गलत है। परिणाम आ ही जाता है और ये सपना
- 22:10है आध्यात्मिक सपना सदा झूठा होता है।
- 22:23मैं सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ रहा हूँ और आप सीढ़ी दर सीढ़ी समझने का
- 22:28प्रयास करो। आध्यात्मिक सपना सपना नहीं होता
- 22:37है। आध्यात्मिक सपना मार्ग है वो
- 22:44सपना। जो दिखा रहे हैं कृष्ण वो भी अभी
- 22:48सपना लगेगा तुम्हें वहाँ बड़ा आनंद है, क्या ये सपना है?
- 23:00वहाँ शीतल हवाएं बहती हैं। वहाँ सुरों का संगम है चर हंसाः
- 23:10उस देश समुद्र जहाँ मूर्ति ये क्या तुम्हें सपना नहीं लगता?
- 23:21बिल्कुल लगता है। लेकिन तुम बोल नहीं सकते दोनों
- 23:30सपने हैं अभी तो। सपने।
- 23:34हैं। न राजनीतिज्ञ तुम्हें खुशहाल कर
- 23:40पाता है। ना आध्यात्मिक व्यक्ति तुम्हें
- 23:46आनंद दे पाता है अभी लेकिन आध्यात्मिक सपना जो दिखाते हैं।
- 23:56लोक वो सपना सत्य हो जाता है 1 दिन।
- 24:08राजनीतिक सपना जो दिखाते हैं लोग वो शक्ति कभी नहीं होता तुम कभी
- 24:16अमीर नहीं हो पाओगे, चौंक मत जाना, तुम धनाढ्य हो सकते हो।
- 24:27धनपति हो सकते हो, अमीर होना और धनपति होना बिल्कुल अलग बात है।
- 24:37खुशहाल होना और खुश होना यह बिल्कुल अलग बात।
- 24:42है। सुनने में तुम्हें यक् लगेंगे।
- 24:46एक ही बात। है राजनीतिक जो सपने दिखाएगा अंत
- 24:59तह उसे तुम पाओगे, झूठे निकले इसलिए राजनीतिक के सपने सदा ही
- 25:04झूठे होते हैं और कुछ भी दिखाएं आपको।
- 25:15वह राजनीतिज्ञ गरीब से गरीब मुल्क का हो, अमीर से अमीर मुल्क का हो।
- 25:22किसी वक्त अमीर मुल्क ब्रिटेन था, जॉर्ज पंच मुझपे राज़ करता था।
- 25:30दो तिहाई ऑफ द वायर्ड उसकी हुकूमत में आते थे किसी वक्त।
- 25:41आज ब्रिटेन पिछड़ गया। धूप छाम का खेल है।
- 25:48कोई वक्त था जब हिंदुस्तान सोने की चिड़िया थे।
- 25:56आज वक्त है आज सोने की चिड़िया अमेरिका है, दो पछाओं का खेल है,
- 26:041 दिन आएगा, अमेरिका नंग हो जाएगा।
- 26:11कोई और सम्पन्न हो जाएगा क्योंकि सभी दौड़ रहे हैं और इस मैराथन की
- 26:22दौड़ बन। कभी कोई आगे निकल जाता है, कभी
- 26:26कोई आगे निकल जाता है लेकिन ये आगे निकलना दौड़ में आगे निकलना
- 26:39महज सपना है। दौड़ में ना कोई आगे होता है ना
- 26:46कोई पीछे होता है तीन रास्ते मैंने बताए हुकुम करना, हुकुम
- 27:03मारना। और ठहर जाना रास्तों की परिभाषाओं
- 27:17से देखो तो संतों के भीतर ये तत्व मिलेगा के ठहर जाओ।
- 27:27कैसे तैसे वो आपको ठहरना चाहते हैं और राजनीतिज्ञ के सपनों में
- 27:36आपसे मिलेंगे। के दो।
- 27:42वो राजनीतिज्ञ चाहे सर के रूप में हो, वो भी दौड़ेंगे ये सब दौड़ है
- 27:53गद्दी नसीन हो जाओ तुम सीएम पीएम बन जाओ।
- 28:00तो मिनिस्टर वगैरह बन जाओ, धनपति हो जाओ, मान सम्मान दुनिया करेगी,
- 28:07जो सोचोगे वही मिल जाएगा और दुनिया उसके पीछे हो लेती।
- 28:11है। जो सपना है आध्यात्मिक, वह भी
- 28:30सपना है। माला फेरो, पूजा करो, नारियल
- 28:37फोड़ो। अब ये साबना आया तो पत्थर के ऊपर
- 28:44दूध चढ़ा, अब हम सार की बात। करें राजनीति के सपना वो सपना?
- 29:02तुम गद्दी नसीन हो जाओ, हुक्म करने वाले बन जाओ, बड़े से ऑफिसर
- 29:10बन जाओ, कलेक्टर बन जाओ, अध्यक्ष बन जाओ।
- 29:20मुख्यमंत्री बन जाओ। यह जो दौड़ को सखाने वाले लोग
- 29:30हैं, वह चाहे सार हैं, चाहे राजनीतिज्ञ हैं, चाहे किसी पार्टी
- 29:36के नेता हैं। वह पार्टी कोई?
- 29:39भी है। आज कोई राज़ करता है।
- 29:42कल बदल जाता है क्योंकि मनुष्य का मन बदलता रहता है।
- 29:49और बदलने की इस प्रक्रिया में बाहर की सीनरीज को भी बदलता रहता
- 29:56है थक जाता है ऊब जाता। है।
- 30:08तुम थक जाते हो एक ही पत्नी से तुम थक जाते हो एक ही पति से ये
- 30:16तो तुम्हें ठीक लगेगा क्योंकि तुम्हारा अनुभव है।
- 30:25तुम एक ही गद्दी से भी थक जाते हो, ये तुम्हें अटपटा लगेगा।
- 30:32ये वही व्यक्ति बोलेंगे जिसने गलियों को भोंका भोग से दुख मिलता
- 30:39है। यह वह व्यक्ति बोलेंगे जिसने
- 30:43बहुत। भोंका है।
- 30:46अष्टावक्र ही बोल। पायेगा?
- 30:53जनक को कहते हैं और भोग ले जनक कहते हैं महाराज भोगलिया भोगों से
- 30:58कुछ नहीं पाया। दुख पाया और जनक से बोलते।
- 31:04हैं अष्टवक्कर के हे राजन। भोग से दुख मिलता है और जनक सिर
- 31:15हिला लेते हैं। क्यों?
- 31:17क्योंकि उसने भोका है, प्रचुर मात्रा में भोग है, जनक सिर हिला
- 31:27लेते हैं तो मत सिर हिला लेना क्योंकि तुमने अभी भोका नहीं।
- 31:33तुम्हें तो अभी खाने को पांच किलो आटा मिलता है, तुम कैसे तड़पता हो
- 31:41पाओगे? जनक ने भोंक लिया है।
- 31:49साम्राज्य भोंक लिया है। सभी प्रकार के व्यंजन चख लिए हैं
- 31:55जो मन में आया। अष्टा वक्र की बात वही व्यक्ति
- 32:04जान पाएगा और हाँ करेगा जिसने उसे ही भोंक दिया तुम तो अगर गर्दन
- 32:12हिलाओगे भी। तो वह सिर्फ एक अखंड मात्र होगा,
- 32:22तुम्हारा कन्क्लूजन क्षण के भी हो।
- 32:26सकता है। फॉर दी टाइम किसी ने आपको धोखा दे
- 32:30दिया तो आप कहोगे? सभी धोखेबाज होते हैं, पुरुष
- 32:34धोखेबाज होते हैं, स्त्रियाँ बेवफा होती हैं।
- 32:40यह क्षणिक कन्क्लूजन है और आप क्षणिक कन्क्लूजन देते हैं
- 32:54क्योंकि एक बार अंतरण कक्षणों में।
- 32:58तुम्हे सुख तो मिलता है लेकिन फिर तुम दूसरी तरफ दूसरे दिन फिर
- 33:03भागते हो पा। नहीं सकते तो तुम कहते हो नहीं
- 33:10मिलता सुख, लेकिन तुमने पर्याप्त अभी भोका।
- 33:18एक बार की तुमने भोगा, लेकिन परिपूर्ण रस नहीं निकला, परिपूर्ण
- 33:29रस निकलेगा। जनक जो पूरा भोग लेते हैं।
- 33:41जन का दरबार सका था। किसी भिक्षुक को उस गुरु ने
- 33:48पहुंचा दिया था कि बस ईमानदार गुरु होते थे, उस क्षण की बात है
- 33:54जन कोई आदमी हो गया। अगर कम से कम आखिरी जन को देख
- 34:01लिया जाए तो वे 8000 साल प्रणा था।
- 34:06भगवान राम का क्षेत्र वक्त 8000 साल के करीब बैठता है।
- 34:14तब जनक उसके ससुर थे। और यह 19 जनकों की परंपरा थी जैसे
- 34:21तीर्थंकरों की परंपरा है। जैनियों में 24 तीर्थंकर हुए।
- 34:28ऐसे ही जनकों की परंपरा में 19 जनक हुए और आखिरी जनक देखे गए।
- 34:37भगवान राम के ससुर की तरह गुरु कहने लगे, मेरे पास जो था मैंने
- 34:48तुम्हें बता। दिया।
- 34:50ठीक भी है प्राइमरी तक जानने वाला टीचर अगर कहे के बस भाई अब
- 34:58पांचवीं तक पढ़ा दिया। अब तुम हाई स्कूल जाओ और हाई
- 35:06स्कूल के बाद टीचर अगर ईमानदार हो, वे कहे कि अब विश्वविद्यालय।
- 35:13छोड़ और विश्वविद्यालय के बाद अगर कोई ईमानदार।
- 35:18है वो कहे। अब रिसर्च करो।
- 35:22इतना तो खोज लिया गया अब तुम खोजो क्योंकि खोजने को बहुत है इस
- 35:32संसार की खोजें न पूरी हुई, न पूरी हुई कोई भी का लग गया हो।
- 35:42कितना ही समृद्ध काल अगया हो खोज कभी पूरी नहीं हुई और खोज पूरी
- 35:49कभी नहीं हुई। साइंस अधूरा ही रहेगा।
- 35:53हमेशा और परमात्मा। पूर्ण है और पूरा ही रहेगा हमेशा
- 36:04लेकिन तुम्हारा मन नहीं मानता। तुम्हारा मन कहता हम खोज लेंगे,
- 36:08सब खोज लेंगे और तुम्हारा मन यह भी नहीं मानता कि परमात्मा पूर्ण
- 36:15रहेगा सदा तुम कहोगे नहीं। हम परमात्मा को भी जीत लेंगे।
- 36:20कैसे देना तुम्हारी मत ही उल्टी है?
- 36:33तो उस गुरु ने कहा कि मेरे पास जो था तुम्हें बता दिया, इससे आगे
- 36:39तुम जनक के पास जाओ, अच्छा गुरु था।
- 36:43उस जमाने का बड़ा विख्यात गुरु था।
- 36:48ऐसा लगता था कि उसके जाने के बाद किसी और के पास जाने की कोई जरूरत
- 36:54नहीं है, लेकिन उस गुरु ने सब कुछ बता दिया और कहता बस शिष्य के आगे
- 37:01हाथ जोड़ के खड़ा हो गया। यहाँ तक मुझे पता है आज का गुरु
- 37:08नहीं होगा आज का गुरु कहता है मैं सब जानूं मेरे पास है, बैठ जाओ
- 37:16डेरे में बैठे रहो मैं ही पूछा दूंगा।
- 37:22ऐसे कुछ तब नहीं होता था ईमानदार लोग थे, ईमानदार गुरु होते थे।
- 37:40ज्ञात जनक के पास सांझ हो गई देखा दरबार लगा शराब ढन रही है, महफिल
- 37:49सजी। जाम खटक रहे हैं।
- 37:55नृत्यंगणा ही नाच रहे हैं। ऐसा वातावरण तो उसने आँखें मूँद
- 38:00लीं अरे राम राम राम राम ये कहाँ बेच दिया गुरूजी ने कहाँ बेच
- 38:09दिया? ये गुरूजी क्या ये गुरूजी हैं?
- 38:12ये तो गधे हैं ये तो मेरे साथ मजाक कर दिया भागा वहाँ से लेकिन
- 38:23जनक की दृष्टि से कोई पद? सका है।
- 38:27जनक ने पीछे हाथ में लगा दिया, पकड़ो उसको थोड़ी देर में आया।
- 38:33मैं निपटा के महफिल को जनक गए। उस भिक्षु के पास कैसे आए थे?
- 38:47और आए तो फिर भाग्य क्यों? और इतनी रात गए कहाँ जाओगे?
- 38:56वो कहता जी क्या बताऊँ? मेरे गुरु ने मेरे से मजाक कर
- 39:02दिया, कहते बस मुझे जितना आता था। उतना बता दिया।
- 39:10अब जनक के बाद शो फिर फिर मैंने जो हाल देखा आपको पता ही है राम
- 39:20राम, राधे राधे, राधे भाग। गया।
- 39:23कहता कोई बात नहीं। भाग नहीं है सुबह भाग जाना।
- 39:31लेकिन मैं भाग्य क्यों ये पता देख ही लेते हैं।
- 39:35हम क्या कर रहे हैं अच्छी तरह से मैं इसलिए भागा कि आपसे तो मैं
- 39:48अच्छा हूँ मेरे पास मात्र दो लंगो।
- 39:57और दो लंगोटी में मैं संतुष्ट हूँ, बस गुजर बसर बढ़िया हो जाता
- 40:03है, मांग के खा लेता हूँ और तुम्हारे पास सब है लेकिन तुम तरफ
- 40:09से नहीं हो इसलिए भागा इससे क्या उम्मीद रखु मैं?
- 40:18अब कृष्णा की हालत देख कर कोई क्या उम्मीद रख सकता है?
- 40:24हाँ बताइए 16,118 में लाखों पुत्र पुत्रियां।
- 40:37ऐसा श्रृंगार मोरू मुकुट, टेढ़ी टाँग की ये खड़ा है मुरली बजा रहा
- 40:44है। अब इससे उसका हुलिया देखकर कोई
- 40:52क्या उम्मीद करेगा ये लंगोट धारी खास तौर से चड्डी धारी।
- 41:02क्या कल्पना करेंगे कृष्ण की कृष्ण जो करते हैं सरे आम करते
- 41:11हैं। उनका कोई पहलू तुमसे छिपाने।
- 41:19सरे आम शिशु पालिका वध करते हैं। सरे आम राणियों के साथ रहते हैं।
- 41:24सरे आम बच्चे पैदा करते हैं। तुम्हारे में और उसमें क्या फर्क
- 41:32है? मुझसे लोग पूछ लेते हैं हम में और
- 41:33गाँधी जी में क्या फर्क है? गाँधी जी अपने दुष्कर्मों को लिख
- 41:42देते हैं, बता जाते हैं तुम अपने दुष्कर्मों को छिपा लेते हो, यही
- 41:50फर्क है और इससे बड़ा फर्क हो भी नहीं सकता।
- 41:58तुम सारा मीडिया झोक देते हो? कोई हम नहीं है वो पर वो सहज बता
- 42:03देते हैं, लिख के चले जाते हैं सत्य के ब्रोक में मैंने ऐसा कुछ
- 42:07किया भाई व्हेन माय फादर वास् ऑन दी।
- 42:13डेथ दी बेड आई, वास् ऑन दी कस्तूरबा बेड बस यही फर्क है इससे
- 42:22तुम फर्क समझो तो तुम्हारे में और कृष्ण में बस यही फर्क है।
- 42:35यही कहने लगा वो बिछु तुम्हारे अपने और मेरे में क्या फर्क है?
- 42:40मैं दो लंगोटी में संतुष्ट हूँ और तुम महलों के राजकाज।
- 42:48में हो नौलखा हार पहन रखे हैं। भरे पड़े हैं तुम्हारे लोका सेवक
- 43:00सेवक काय मंत्री परिषद नृत्यंगनाएँ हैं एक से एक सुन्दर
- 43:08बलि, एक से एक बलि फौज है तुम्हारे।
- 43:10पास। आती हैं।
- 43:12घोड़ी सब है, तुम उससे भी संतुष्ट नहीं हो फिर भी शाम को ये
- 43:19कंजरखाना करते हो क्या? जरूरत पड़ी।
- 43:35जनक ने कहा ठीक। कोई बात नहीं।
- 43:38तुम आ गए हो रात कहाँ जाओगे? अमावस्या की रात है, घोर अंधकार
- 43:48है, कहीं कोई रोशनाई की किरण दिखाई नहीं पड़ती।
- 43:54मौसम भी कुछ भीगा है, तूफान चल रहा है, ऐसे में कहाँ जाओगे?
- 44:03मेरे एक दरवाजे को खुलवा देता हूँ मैं कमरे में आराम कर लो सुबह
- 44:09होते। चले जाना जाना ही है।
- 44:13तो सुबह होते चले जाना। मैं भी भ्रम मुहूर्त में उठ जाता
- 44:18हूँ मैं जगा दूंगा तुम्हें रात भर कहाँ भटकोगे अँधेरा है जंगली
- 44:29क्षेत्र है। सांप बिच्छू हैं, डाकू हैं।
- 44:39वैसे तो तुम्हारे से कोई छीन भी काले का दो लंगोट हैं लेकिन फिर
- 44:46भी जान तो है, यह तो बड़ी कीमती है।
- 44:50हाँ ये तो है। तो कोई मार ही दे ये जैसी बात
- 44:55उसकी है, बात तो ठीक है, चाहे दो लोग उठ है लेकिन ज़िन्दगी तो
- 45:00बढ़िया मूल है ना? इसका तो हीरे जोरा से मूल्य तोला
- 45:03नहीं ना जाता। ये बात जच गई और जनक ने पकड़
- 45:09लिया। कृष्ण होते तो वो कहते न ये जान
- 45:17भी क्या है, रहदास होते तो कहते न माटी का पुत्र कैसा नचत?
- 45:23है कैसा जान? कृष्ण कहते हैं, नहीं वो नहीं
- 45:29मरता जीसको ये डाकू मार देंगे, जीसको साँप काट लेगा वह मैं नहीं
- 45:40हूँ जीसको शस्त्र काट लेगा वो मैं नहीं।
- 45:47मैं कहाँ लुटा जाता हूँ? मुझे कोई नहीं लूट सकता लेकिन
- 45:54अज्ञानी था भिक्षुक इस बात को दहे के साथ मुँह था।
- 45:59कहता ये तो बात ठीक गजब की की आपने एक चीज़ तो बड़ी अमूल्य।
- 46:04है मेरे पास। बात ठीक।
- 46:07मैं रात भर ठहरूंगा सुबह जाऊंगा। क्यों जान को जोखिम में डालना और
- 46:18रुक क्या तुम्हारे में और मेरे में फर्क क्या है यह पूछा था।
- 46:28सुबह उठे जनक ने जगा लिया बड़े मज़े से सोया हूँ पिल्लू थे बड़े
- 46:36गदम गदम बड़ी नींद आई कठोर धरती पर सोया था, आज अब प्रथम बार सोने
- 46:43को मिला। और नींद खूब गहरी आई और उठा शुभ
- 46:49है। दरवाज़ा खोला, जनक ने प्रणाम
- 46:56किया। और भिक्षुक चुप खड़ा रहा।
- 47:08जनक ने दोनों हाथों से प्रणाम किया।
- 47:16हे प्रभु। नमस्कार जनक आपको प्रणाम करता है।
- 47:28और भिक्षुक ने स्वीकार किया, वाकई जरूरत मैं योग्य हूँ।
- 47:33इसके दो वात्र लंगोटी है मेरे पास प्रणाम करने तो योग्य हूँ ही
- 47:45त्यागी लोग इसी वेश के ऊपर अपने आप।
- 47:48को। माननीय।
- 47:51मान लेते हैं कि मैं पूजा करने की जो कि इतना त्याग का अभी पीछे खबर
- 48:00आई 4000 करोड़ का मार्ग लात मार के मुंड मुंडा लिए जैन मुन्नी हो
- 48:08गया। मैंने कहा बड़ी हिम्मत खाई।
- 48:15कहाँ परखी जाती है हिम्मत? वस्तुओं को छोड़ने से हिम्मत तो
- 48:22कुछ और। है।
- 48:25वो तो जब हिम्मत की परीक्षा होगी तब पता चलेगा तुम्हें।
- 48:32कहने को तो बहुत बुद्धिमान होते हैं।
- 48:35नरेंद्र दत्त जैसे विवेकानंद जैसे बड़े धड़ल्ले से पूजते है, ईश्वर
- 48:43है, सभी से पूछा। और रामकृष्णा के आड़े आ गए ईश्वर
- 48:53है रामकृष्णा कहते हैं, हाँ है देखना है।
- 49:00अब पहली बार थर्राए है इस व्यक्ति की आँखों में कुछ चमक थी, वाणी
- 49:06में कुछ दमक। थी।
- 49:09बिजली सी कौन कहे अनमनी से बाप से बोले हाँ देखना किस तरह साहस
- 49:15जुटाए होगा बेचारे ने? अब ऐसी तो उम्मीद ही नहीं।
- 49:22थी। चला था हैरानी?
- 49:26नप मस्तक हो गया ऐसा जो भाग मिलेगा वो उम्मीद ही नहीं थी।
- 49:33मुझसे लोग पूछ लेते हैं भगवान हैं, तुम हाँ हैं प्रमाण प्रमाण
- 49:42मैंने देखा है। अगर मैंने न देखा हो तो कोई
- 49:47प्रमाण काम नहीं करेगा जैसे तुम तुम्हें कोई प्रमाण काम नहीं करता
- 49:57क्योंकि तुमने देखा था इसलिए तुम प्रमाण मांगते हो।
- 50:04मैंने देखा है कि बस इतना प्रमाण काफी नहीं है।
- 50:10इट इज़ दी ऑथेंटिक प्रूफ जीवन का प्रमाण होना चाहिए, चमत्कारों का
- 50:18नहीं। चमत्कार तो तुम जिधर दिखोगे, उधर
- 50:23ईश्वर ईश्वर ईशा वाश्य में दम सर्वमम यत्केन्द्र जगत याम जगत
- 50:30लेकिन वो आँखें कहाँ हैं? हैं तो जन्मचक्षु उस आँख से दिखता
- 50:38है परमात्मा। चमड़े की आँख से नहीं देखता और
- 50:43कृष्ण यही सही प्रमाण को दिखाने के लिए अर्जुन को, वो चरम चक्षु
- 50:53के अलावा। ज्ञान चक्षु प्रदान करते हैं।
- 50:58दीप वे चक्षु जी ने कहते हैं। अब तू देख इन आँखों से दिखेगा
- 51:04जैसे दूर कहीं नकल आँखों से नहीं देखा जा सकता ब्रह्मांड के पार,
- 51:12लेकिन हर्बल नहीं तो जेम्स वेब देख लेता।
- 51:16है। उन चीजों को जनक एंड आँखों से
- 51:19दिखाई नहीं पड़ती। आँखों की अपनी एक सामर्थ्य है।
- 51:27दूरबीन की अपनी एक सामर्थ्य है टेलीस्कोप देख लेगा आँखें नहीं
- 51:32देख सकेंगे रामकृष्णा का। है।
- 51:41तुमने देखा? हाँ देखा तुमने देखना है, बस इस
- 51:47इसकी उम्मीद नहीं थी विवेकानंद को अनमने स्वभाव से सर हिला दिया,
- 51:55हाँ देखना। है।
- 51:57किसी तरह दृढ़ किया होगा। संकल्प को एक दम से सारे प्रश्न
- 52:04भीतर से उठाये मरना पड़ता है। सुना है सुना है हिल जाओगे,
- 52:12तूफानों की तरह उड़ जाएगा तो हमारा अहंकार?
- 52:17सारे अचेतन में घुसे हुए वो शब्द बाहर निकल आए और घबरा तो गया
- 52:25लेकिन किसी तरह कह दिया के हाँ हिम्मत जुटा के देखना चाहता।
- 52:29हूँ। नकली, नकली जिज्ञासु का यही असर
- 52:37हुआ करता। है।
- 52:41इसलिए मैंने तुम्हें बहुत बार कहा ईश्वर की खोज से पहले ईश्वर की
- 52:48खोज की महमुक्षा पैदा कर लेना, तंग आ जाना इस संसार से।
- 52:54बाज आए इस महब से उठा लो। पान दान अपना।
- 52:59भोगों से तंग आ जाना फिर उठेगी। मो।
- 53:05मुक्षा जिसे अष्टावकर कहते हैं भोग से दुख होगा और दुख से व्यार
- 53:11आ गया नहीं है। कुछ।
- 53:14यह थीम आ गया एक्सट्रैक्ट आ गया। संसार का भोग से दुख मिलता है यह
- 53:20जानोगे और दुख से वैराग्य आएगा नहीं है कुछ छोड़ के चले जाते
- 53:27हैं। बुद्ध।
- 53:32सर पे हाथ रख दिया लोग देख भीतर ही भीतर जाते गए।
- 53:39जब भी मिलेगा भीतर से मिलेगा याद रखना।
- 53:44तेरा सा हे तुझ? माहिम तेरा साहब है तुझे माहिम
- 54:02बाहर नैना क्यों खोल? मन मस्त हुआ फिर क्यों बोला मन
- 54:17मस्त हुआ फिर क्या बोला? उस मकान पे पहुँच गए जहाँ मैं
- 54:28कहता हूँ साहस की जरूरत पड़ती है ये मुनी लोग कह देते है इतना तो
- 54:34छोड़ दिया। है।
- 54:39वह तो छोड़ा भाई तुम नहीं छोड़ोगे तो मोज़ छुड़वा लोगे तुमसे?
- 54:48इसकी फिक्र मत करो, जो तुम आज छोड़ आया वह तो तुम नहीं छोड़ोगे
- 54:54और बढ़ा लोगे या बढ़ाते ही जाते हैं जो एक नंबर के अमीर हो जाते
- 55:00हैं। पहले हिंदुस्तान के फिर वर्ल्ड के
- 55:02हो जाते हैं। बढ़ाते जाते हैं उनको 1 दिन
- 55:07मृत्यु उनसे छुड़ा लेगी क्योंकि झूठा सपना है ये सर लोगों ने
- 55:13दिखाया आई ए एस बना देंगे बड़े सूखी हो जाओ।
- 55:20लेकिन सुख इतनी हल्की बात हो रही है।
- 55:25सुख बड़ी गहरी बात। है।
- 55:33सुख न संकल्प में है, न समर्पण में है सुख कहाँ है हम आगे चलें,
- 55:40पता लगेगा तुम्हें। वहाँ जाकर कंप है मृत्यु देखी
- 55:46सामने तांडव नृत्य करती वहीं शंकर जिसकी पूजा करते।
- 55:54थे। ये कंप का है मृत्यु के रूप में
- 56:02उसे देख न सके। चिल्लाए चीख नकली स्वामी जी मेरे
- 56:12माँ बाप भी हैं भाई। बहन भी हैं अच्छा तो उससे हाथ उठा
- 56:20लिया। फिर तू बाहर आजा?
- 56:24फिर पुत्र काहे काहे रहता के हाँ, देखना है, इसलिए मैं कहता हूँ
- 56:32पहले हिम्मत। जुटा के आओ।
- 56:35ऐसे ही फिर कच्चे कच्चे आओगे तो कच्चे कच्चे चले जाओ, अब कहाँ
- 56:40पहुंचे विवेकानंद? जख्म?
- 56:46मारते फिर रहे हैं आज भी। आखिरी हिम्मत हो मिट जाने की,
- 57:00क्षमा के भीतर राख होने की। ये शंकर प्रतीक हैं जो अंग के
- 57:10ऊपर, बसु में लगाते। हैं।
- 57:12ये तुम्हें बताते हैं सबसे पहले कि ये तुम्हारा वास्तविक का
- 57:16स्वरूप है यह देह इस बसुम में तब्बूत हो जायेगा ये बसुम जो
- 57:23मैंने लेपन कर रखा था। यह सिर पर रखे हुए केस यह प्रतीक
- 57:35बाहर की ऊर्जा भीतर प्रवेश नहीं कर सकेंगे, क्योंकि आम तौर पर
- 57:41वातावरण में नेगेटिविटी बहुत ज़्यादा भरी पड़ी, जिन्हें हम
- 57:47लासानी तरंगें कहते हैं। प्रकृति बड़ी समझदार है, जिसका
- 57:59शरीर ज्यादा सेंसिटिव होता है, उससे ज्यादा बाल घनिभूत करके दे
- 58:03देता है। इस स्त्री का शरीर ज्यादा नेटिव
- 58:12से बढ़ जाता है जल्दी इसलिए स्त्री को।
- 58:16घनी तुम जुल्फें कह देते हो, थोड़ा सा शेयर अर्ज कर दूँ, याद
- 58:27आ। गया।
- 58:29तेरी जुल्फों के साईं के तले आराम कर लूँ तेरी जुल्फों के साईं के
- 58:37तले आराम कर लूँ। मगर डर लगता है कि कहीं इसमें
- 58:44जुमे ना हो। ये जो जटा जूठ जो बुद्ध रहते हैं,
- 58:59ये जो जटा जूठ शंकर रखते हैं। वे बाहर की लासानी तरंगों को भीतर
- 59:07जाने से रोकते हैं और भीतर की आसानी तरंगों को बाहर जाने से
- 59:14रोकते हैं। स्त्रियाँ बहुत ही जल्दी
- 59:19इनैक्टिविटी को खेंच लेती हैं, बड़ी भावक होती हैं।
- 59:22आंसू तो उनके यहाँ रखे होते हैं तुम देख लेना थोड़ी सी बात करोगे
- 59:29ढलक ढलक आंसू पड़ेंगे। बाबू कहें।
- 59:41इसलिए स्त्रियों को सिर पर गाने बान देती है।
- 59:44सिर ही है महत्वपूर्ण सिर ही मांगते हैं परमात्मा कल मैंने कहा
- 59:51ना श्याम बाबा तुम श्याम भाबे के कटे हुए सिर की पूजा करते हो, ये
- 59:57मतलब तो नहीं था। तुम कहते हो शंकर ने अपने ही
- 1:00:03पुत्र का सिर काट दिया। ये मतलब तो नहीं था ऐसा किया कि
- 1:00:10उसका अहम। टूट गया तुम शरीर नहीं हो, ये टूट
- 1:00:16गया, भ्रम टूट गया। ऐसा किया भगवान कृष्ण और भगवान
- 1:00:21कृष्ण न कर पाएंगे तो और कौन कर पाएगा?
- 1:00:25भगवान कृष्ण के सांनिध्य में ही अहंकार टूटता है, बहुत जल्दी
- 1:00:30टूटता है, बहुत जल्दी पिघलता है, इसलिए मैं तुम्हें कहता।
- 1:00:34हूँ। सच्चे संत की शरण में बैठ जाना।
- 1:00:38बस सिर्फ बैठ जाना जरूरी नहीं कि उसके पांव के तले चिप के बैठ जाना
- 1:00:46नहीं, उसके प्रभाव क्षेत्र में बैठ जाना शब्द का प्रभाव क्षेत्र
- 1:00:53बहुत गहरा होता है। 500 500 मीटर तक काम करता है उसके
- 1:01:04प्रभाव के क्षेत्र में बैठ जाना है, और बरबरी कृष्ण के प्रभाव के
- 1:01:10क्षेत्र में आके। बरबरी कहने लगे, मैं देखना चाहता
- 1:01:17हूँ जो सच में होगा, बड़ी जिज्ञासा है कौन जीतेगा, कौन
- 1:01:22हारेगा? कृष्ण?
- 1:01:25कहने लगे देख लो लेकिन इन चरम चक्षुओं से नहीं, वही बात जो
- 1:01:30अर्जुन ने कही। सच्चाई दिख जाएगी, लेकिन चरम
- 1:01:34जक्षू से नहीं। मैं तुम्हें दिव्य जक्षू प्रदान
- 1:01:37कर दूंगा। वही भर ब्रिक से कहे, सर देना
- 1:01:42पड़ेगा दिव्य जक्षू लेने के लिए अर्जुन को भी यही।
- 1:01:47कहा। अर्जुन तो कब रहा था, मरे का
- 1:01:50पड़े? तुम ना मारोगे भगवान तो ये बेशम
- 1:01:59पिता माँ गुरु द्रौ ये मार देंगे तुम्हारे हाथों में मर जाऊं अच्छा
- 1:02:06ठीक समर्पित हो गया सर्वधर्म पर तजमाम एकम शरण पर।
- 1:02:15हो गए। श्रम और दिव्य चक्षु मिल गया।
- 1:02:19ऐसे दिव्य चक्षु नहीं मिला करते तो बारिश मन की बटकन है।
- 1:02:28जो कहती प्रभु मुझे भी दिव्य चक्षु दे दो, योग्य हो जाओ भाई।
- 1:02:34गंदा नाला कहे कि मेरे में घी डाल दो, बताओ ज़रा कोई फायदा है?
- 1:02:41घी भी विकृत हो जाएगा हो जाएगा। तो सिर दे दिया।
- 1:02:55हंकार दे दिया तुमने सचमुच में सिर काट के वो कटा हुआ सिर की
- 1:03:01पूजा हो रही है इन मूर्खों का पता नहीं लम्बी लम्बी कतारें दर्शन
- 1:03:09करने काहे दर्शन करने दर्शन तुम्हारे भीतर होंगे भाई।
- 1:03:15इससे कुछ सबक ले लो। इस कटे सिर से कोई सबक ले लो।
- 1:03:20अगर ले सकते हो पूजा मत करो तुम पूजा में लग जाते हो।
- 1:03:27क्या सबक लेना है ये तुम? प्रेम मिलनो की चाह अगर तुझे उस
- 1:03:45प्रेम से मिलने की चाह। है।
- 1:03:49शीश तलीधरु। शिशतलीधर शिशतलीधर जितम फेम मिलन
- 1:04:09की चा। सिसतलीधर घर मेरे आ घर मेरे आ।
- 1:04:28घर मेरे ये तो प्रेम मिलानो की चा उस प्रेम के राजा की भाषा ना
- 1:04:45चाहती। हूँ।
- 1:04:48पोषण ऑफ़ लव प्रेम का समुद्र तो सबसे पहले।
- 1:04:58शीश को तली पे रख लो, काट के यह एक सिम्बल था अब्रीविएशन।
- 1:05:07सिम्बोलिक रिप्रजेंटेशन जिन्हें तुम प्रतीक कहते हो जैसे एच टू वो
- 1:05:14प्रतीक है पानी का एनएसीएल प्रतीक है नमक का, लेकिन एनएसीएल को
- 1:05:22ब्लैकबोर्ड पे चाटोगे तो नमकीन नहीं होगा।
- 1:05:28एच टू ओह को ब्लैकबोर्ड पर चाटोगे प्यास नहीं बुझेगी, वो प्रतीक है
- 1:05:36तुम ऐसा ही कर रहे हो। कटे हुए सिर की पूजा कर रहे हो।
- 1:05:44फिर तुम कहते हो तुम समझदार हो, तुम अंधे हो, तुम महामूर्ख हो, ये
- 1:05:52पुजारी पंडे या मोटे पेटों वाले तुम में ठग रहे असली मतलब ये है
- 1:06:01अहंकार की बलि दे दो। ओह चाहे हवन था, यज्ञ था, हमने
- 1:06:06कुछ भी किया, लेकिन उसके मूल में क्या था?
- 1:06:10अहंकार को मार दो, अहंकार की बलि दे दो।
- 1:06:14प्रत्येक धर्मों में ये चीज़ बनाई इस्लाम में बनाई बकरीद।
- 1:06:25अल्लाह को प्यारी है कुर्बानी, जिसकी कुर्बानी देनी चाहिए, वह
- 1:06:31बरबरी के ने दे दिया तुम बकरे की मेमने के प्यारे प्यारे बच्चे की
- 1:06:39बलि दे देते हो। और कामना करते हो कि अल्लाह जब
- 1:06:46होगी कयामत तो हमें ले जाएगा, जन्नत में नहीं ले के जाएगा तुम
- 1:06:52ऐसे ही सड़ोगे इस हैयत ने कहा कन्फेशन?
- 1:07:01है हिम्मत कन्फेशन करने की जिन्होंने कन्फेशन किया उनको तुम
- 1:07:06गाली निकालते हो अजूबा है ना गाँधी कहते हैं आई वॉज़ ऑन दी बेड
- 1:07:16ऑफ कस्तूरबा। व्हेन मैं फादर वास् ऑन दी डेथ
- 1:07:21बेक मेरे पिता मृत्युशैया पे थे और मैं कस्तूरबा के शिया पे था
- 1:07:31तुम्हारा अंकाट टूटेगा। तुम कहोगे नहीं।
- 1:07:34तुम तो आज तक नहीं बताते कि तुम चरण चुम्बक बने रहे काहे चले गए
- 1:07:40भाई आजादी का बेला था 1000 साल से गुलाम थे, बेला था वह मुश्किल
- 1:07:48माहौल बना था, साथ रल लेते छोटा भाई छोटा भाई होता है।
- 1:07:55सावरकर 14 साल छोटे थे। 69 का उनका जन्म 83 का, उनका जन्म
- 1:08:0514 साल छोटे थे। छोटे भाई की तरह थे, छोटे भाई की
- 1:08:09तरह काम आते थे। लेकिन चरण चुम्बक बनता है मैं
- 1:08:19आजादी नहीं होने दूंगा हिन्दुओं के और आज तुम कहते हो हिंदू
- 1:08:23राष्ट्र बनाएंगे तो मैं शर्म नहीं आती।
- 1:08:30अरे हिंदू राष्ट्र बनाओगे तब तुम? क्यों तुम चरन चुम्बक बने रहे जो
- 1:08:39अपने गुनाह से लिखा गया ईसाईयत कहती।
- 1:08:42है। कन्फेशन ऑफ़ एरर्स ह्यूमनिस्ट टु
- 1:08:45एरर्स आदमी गलती का पुतला है, लेकिन उन गलतियों को स्वीकार कर
- 1:08:51लो। महत आत्मा होती है वो जो अपने
- 1:08:55गुनाहों को स्वीकार कर लेती है और तुम कहते हो।
- 1:09:01राष्ट्रपिता गाँधी ने कहा, मुझे राष्ट्रपिता राष्ट्रपिता बनवो
- 1:09:07महात्मा किसने उपाधि दी महात्मा की?
- 1:09:12बताओ अगर कोई दूसरा उपाधि दे दे तो तुम क्या करोगे?
- 1:09:21मुझे लोग कुछ संत कह दे तो इसमें मैं क्या करूँ?
- 1:09:25मेरा कोई दोष है क्या? भाई, उससे पूछो ये कैसे शांत है।
- 1:09:34बहुत से लोग हैं जो मुझे लफंगा लुच्चा कहते हैं हैं ऐसे पूछो
- 1:09:39उनसे जा के वो बड़ी बड़ी कहानियों बताएंगे।
- 1:09:42आप। उनसे पूछो ना।
- 1:09:48तो उनसे को पूछते हो जो मुझे संत कहते हैं तो मेरा कोई कसूर कहने
- 1:09:55वाले को कहने दो जिनकी रही भावना जैसी।
- 1:10:04प्रभु मुहूर्त जन देखी। मैं वो विश्वरूप हूँ जो कभी नहीं
- 1:10:11मरता। जो कटता नहीं जो सूखता नहीं, जो
- 1:10:16गलता नहीं, तुम जो चाहे कहते रहो, तुम जिसकी बात करते हो वह मैं हूँ
- 1:10:21नहीं। यह मैंने भी जाना देरी से जाना
- 1:10:31बहुत देर कर दी, मेहरबान आते आते वक्त लग गया उससे पहले बड़े कोतक
- 1:10:39किया सबने किया, मैंने भी किया, किसने नहीं किया फिर कन्फेशन करने
- 1:10:46में अर्ज किया। कन्फेशन करने में तुम हल्के होते
- 1:10:51हो। मैंने पिछले प्रवचन में कहा कि
- 1:10:55तुम्हारा कोई परम मित्र होना चाहिए जिससे तुम हृदय की बात कह
- 1:11:01सको और वो तुम्हें ब्रैक मेल लांग है।
- 1:11:05मेरे पास तो रोज़ से कहती आती है। ये पास्ट लाइफ रिग्रेशन वाले, हम
- 1:11:09कुछ कह देते हैं, हमें ब्लैकमेल करते।
- 1:11:11हैं। क्या कोई कन्फेशन करेगा इनके
- 1:11:16सामने? कन्फेशन करो संत के सामने जो
- 1:11:24स्वीकार करे। के होम एंड टू एरर्स सभी करते
- 1:11:28हैं। गलती मैंने भी की तुमने भी की कोई
- 1:11:32बात नहीं चोर चोर मुसेरे भाई खुश नहीं होते तुम देख कर मुझे मैं
- 1:11:42तुम्हारे जैसा। हूँ।
- 1:11:45क्या हो गया थोड़ा सा आज बदल लिया तो हूँ मैं तुम्हारी जैसा एक तल
- 1:11:53पर एक तल पर बदला हूँ उस तल पर तुम भी बदल जाओ यही कहता हूँ।
- 1:12:05विवेकानंद चीख मरते हैं, चिल्ला पड़ते हैं जनक कहने लगे चलो घूम
- 1:12:12आये थोड़ा थोड़ा घूम आये मिथिलापुरी में आओ तो मैं दर्शन
- 1:12:20करा दूंगा बाग बाटिकाओं के। चलो क्या राजा था डरता भी था ये
- 1:12:28मसलमैन खड़े थे सामने वाले लिए तलवारें, नंगी कटवाते का करना
- 1:12:35माना जबरदस्ती शहर को भी जाना पड़ा निकल गए बड़ी दूर निकल गए
- 1:12:41बड़ी दूर। और भिक्षु कहने लगा, अरे कहाँ तक
- 1:12:48जाओगे राजा जी, मैं तो थक गया हूँ चलो वापस चलें अरे क्या जल्दी
- 1:12:55पड़ी है, जाना कहाँ है? पीछे मुड़कर देखा देखो महलों को
- 1:13:00आग लगी। लगी होगी भाई क्या लेना है
- 1:13:07तुम्हें चले जाओ कहाँ जाओगे तुम याने की चलते ही जाते हैं भिक्षुक
- 1:13:18के चलते नहीं जाते रुक जाते हैं भिक्षुक तो भाग पड़ा खुशी।
- 1:13:24का? ये जलते हुए महल कहता है ये मेरे
- 1:13:34हैं, जलेंगे तो जलने दो तुम्हारा क्या है?
- 1:13:38भिक्षु कहता है, मेरी एक लंगोटी पड़ी है, एक लंगोटी वहाँ पड़ी है
- 1:13:45एक मैंने। तो जनक ने भाग्य पकड़ लिया उसे
- 1:13:55तुम कहते थे कि तुम में और मेरे में क्या फर्क है?
- 1:13:58यही फर्क है मेरा सब जल गया। और मैं अगर वापस भी ना जाऊंगा तो
- 1:14:08मुझे कोई फरक नहीं पड़ेगा, तुम्हे वापस जाना ही पड़ेगा, वो लंगोटी
- 1:14:12बुला रही है तुम्हे मुझे महल भी वापस न बुला पाएंगे वो हीरे जो
- 1:14:18आरात जो तुम कहते हो तो तुम्हारे पास ही हैं, मुझे वो भी न खेंच
- 1:14:22पाएंगे। मुझे वो नृत्य गणई और मेरा राज़
- 1:14:28काज और मेरे महल, दरबार, मेरी रानियों, मेरे घोड़े, मेरे हाथी
- 1:14:35मेरी सम्पदा मुझे वापस न ले जा पाए और तुम लंगोटी लंगोटी ने खींच
- 1:14:42लिया। बात खीचने की है बात द्रव्यों की
- 1:14:48नहीं है, मौत खीच लेती है, आखिर में तुम कितने खीचते हो, जीते जी
- 1:14:56इसे ही कहते हैं। मर जीवड़ा।
- 1:15:01जीते जी मरे जैसे हो जाओ मरा कभी खिसता है मरे को गाली निकाल दो या
- 1:15:09ठुड्डा मार दो कभी गुस्सा करेगा मृता व्रत हो जाओ मैं सदा।
- 1:15:14कहता हूँ तुम्हें। जीत जी मर जाओ और भुत ने यह कर के
- 1:15:27दिखाया। है।
- 1:15:30तुम भी कहते हो कर के दिखाएंगे लेकिन वो बात कुछ और है।
- 1:15:34तुम तो आई ए एस बन के दिखाओगे तुम तो?
- 1:15:38लोगों को बताओगे कि मैं बलशाली हूँ फिर क्या हो जाएगा किसको
- 1:15:42बताओगे जो आज हैं, कल नहीं रहेंगे नाम किसके आगे कमाओगे मैं हूँ तो
- 1:15:49मुमकिन है जो आज हैं और कल नहीं रहेंगे, तुम कहते हो नाम रहेगा
- 1:15:55कितने कितने नाम खाक में मिल गए। जो आए धुरंधर थे खाक में मिल गया
- 1:16:08आज जिनका नामो निशान नाम लेवा पानी देवा कोई नहीं बचा उनका।
- 1:16:18नाम किसका बचा है और नाम बच भी जाए तो फर्क क्या पड़ता है?
- 1:16:24यहाँ लोग बुत्तों को तोड़ देते हैं, क्या फर्क पड़ता है?
- 1:16:28ये मानसिक विकसित के लक्षण हैं इनका मानसिक उपचार होना।
- 1:16:34चाहिए। इनको डॉक्टर के पास कंसल्ट करना
- 1:16:40चाहिए, दवा लेनी चाहिए। एंटी डिप्रेसेंट ये पागल तरह के
- 1:16:45लोग हैं। अरे मर गया ये तो पत्थर क्यों
- 1:16:47छोड़ रहे हो तुम? मैं रोज़ देखता हूँ कभी अम्बेद
- 1:16:53करता हूँ। वो तो तोड़ देते हैं कभी गाँधी को
- 1:16:57गोली मार देते हैं अरे भाई मार तो दी गोली और क्या करोगे वो मर गया,
- 1:17:02फूंक दिया अब और गोली मारोगे उसको ये तुम्हारे दिमाग की सड़ाम थी।
- 1:17:14मिटनी चाहिए? यही कहता है ये सूत्र और भिक्षुक
- 1:17:22को समझाइए, मुझे एक नगोंटी खींच के लेके जा रही है और जनक को
- 1:17:27राजमहल रानियों मुकट जिन्हें मैं सम्पदा कहता था।
- 1:17:32इन्हें संपदा जैसी नहीं लगती। यही भगवान शंकर कहते हैं, यह शरीर
- 1:17:38यह जो मैंने लेपन किया है इसमें बदल जाएगा।
- 1:17:42यह जो त्रिशूल है त्रिगुणम। इस माया के भीतर रजो गुण सत्व गुण
- 1:17:57तम्म गुण में कैसे अपने वश में रखना है हाथ में है उनके।
- 1:18:06यह तीनों गुण तुम्हारे हाथ में होने चाहिए।
- 1:18:11यह तुम्हारे मालिक न बन जाएं। तुम इनके माल को हो।
- 1:18:18सिर के यह जटा जूट और सिर से निकलती हुई गंगा की धारा यह बड़ी
- 1:18:25कमाल की बात है। ये तुमसे स्वर्ग न हो पाया तुम
- 1:18:30त्रिगुणा तीत हो जाओ, ये तीन गुणों से संपन्न प्रकृति तुम्हारे
- 1:18:36हाथों में खेले तुम इंद्रियों के गुलाम न रहो, इन्द्र बन जाओ, राजा
- 1:18:44हो जाओ। इन्द्रियों पर तुम्हारा आदिपत्र
- 1:18:47हो, तुम्हारे हुक्म से इन्द्रियां काम करें, इन्द्रियों के हुक्म से
- 1:18:52तुम काम ना करो, तुम तो इन्द्रियों के गुलम हो इन्द्रियां
- 1:18:56तुम्हें कहती हैं इन्द्रियां उत्तेजित हो जाती हैं जी, वह
- 1:19:00स्वाद मांगती है। और बाकी इंद्रियां अपना अपना काम
- 1:19:06मांगती हैं। बस इतना ही समझ लेना काफी है।
- 1:19:10बाकी बदलाव हो जाता है। तुम इंद्रियों के करो।
- 1:19:18और। संत कहते हैं तुम इंद्रियों के
- 1:19:20गुलाम तुम इंद्रों बन जाओ, इन्द्रियों पे राज़ करो।
- 1:19:25तुम्हारे चने से हो, रात तुम्हारे चने से हो, तुम चाहो तो इंद्रियाँ
- 1:19:32काम करें, तुम चाहो तो इंद्रियाँ काम न करें, क्योंकि तुम मरको जब
- 1:19:36तुम निकल जाते हो तो इन इंद्रियों का क्या होता है?
- 1:19:39वहीं पड़ी रह जाती हूँ। समझ तुम्हें फिर भी नहीं आती,
- 1:19:46मालिक तुम थे, तुम गए तो इंद्रियाँ शांत हो गई।
- 1:19:52मृत्यु के वेला में भी तुम्हें समझ नहीं आती के मालिक तुम थे,
- 1:19:56तुम निकले केन्द्रियाँ ठहर गई तो जीते जी।
- 1:20:01तुम इंद्रियों पर राज़ करने लगो, तुम्हारे कहने से दिन निकले,
- 1:20:07तुम्हारे कहने से रात हो, तुम इंद्रियों के गुलाम मत बनाओ, तुम
- 1:20:14इंद्रियों के माल हो जाओ। जटा जूट में से निकलती हुई गंगा।
- 1:20:22जटाट वी गल चिल प्रवाह पावित स्थली गलैवलम, विलंबी तांग
- 1:20:27भुजंगतोंग मालिकां, डमट डमट, डबन निनाद व डमर व्ययम चकारचंड तांडवम
- 1:20:35तनौ तू न? शिवै शिवम।
- 1:20:40इसका क्या रहस्य है? आइए तो मैं कुंभ के रहस्य को बता
- 1:20:47दूँ। आज अच्छी तरह से बता दूँ सभी
- 1:20:54ग्रहों का। पानी पर गहरा प्रभाव पड़ता है
- 1:21:02किसी विशेष स्थितियों में चंद्रमा, सूर्य और बृहस्पति की
- 1:21:09विशेष स्थितियों में। प्रभाव किसी विशेष स्थान पर
- 1:21:15ज्यादा पड़ता है। ऐसा कह लो कि ये तीन ग्रह ग्रह तो
- 1:21:23सभी डालते हैं अपना अपना असर लेकिन मुख्य ये तीन ग्रह है ये
- 1:21:29किसी विशेष इस जगह पर। कन्डेन्सेशन प्रवाह डालते हैं
- 1:21:34इफेक्ट जैसे समुद्र के पानी में ज्वार आता है।
- 1:21:49आम दिनों में क्यों नहीं रहता इतना ज्यादा?
- 1:21:54क्यों किसी विशेष तिथि को आता है पूर्णमासी को?
- 1:21:57क्यों आता है? और जल के भीतर क्यों आता?
- 1:22:03है। जल बड़ा रिसेक्टिव है।
- 1:22:15जैसे मैंने तुम्हें कहा स्त्री का मन रिसेप्टिव।
- 1:22:20है। ऐसी ही जल बड़ा रिसेप्टिव है खेच
- 1:22:26लेता है, इसलिए जल के अंदर प्रभाव पड़ता है।
- 1:22:32किसी विशेष धन पूर्णमासी के धन ज्वार।
- 1:22:36बाटा आता है। और दिन क्यों नहीं आ जाता है?
- 1:22:40इतने ज़्यादा हर चीज़ का साइंटिफिक प्रभाव है।
- 1:22:45तुमने नहीं खोजा बात अलग कभी किसी वक्त खोज लिया गया था बाद में
- 1:22:51लुप्त हो गया। और पुस्तकें जला दी गई नालंदा
- 1:22:56में। लेकिन अब तुम ये सवाल मत करना कि
- 1:23:03बचाया क्यों नहीं? क्योंकि तुम भी थे उस वक्त तुम ये
- 1:23:09कह के बच नहीं सकते। ऊंट पटांग सवाल मत किया करो हम तो
- 1:23:17उसकी कब्र उधेड़ेंगे क्यूँ छेड़ोगे भाई वो ही वक्त तुम कोई
- 1:23:23नई इन्वेंशन करने से क्यूँ नहीं गुजारते थे कब्र उधाड़ के क्या
- 1:23:29मिलेगा? कुछ नहीं मिलेगा।
- 1:23:31स्वाय राजनीति के उच्च पदों के यह भी पता नहीं कि मेले का ना मिलेगा
- 1:23:39तो किसी विशेष ग्रह स्थिति में ग्रह कोण से चंद्रमा के विशेष
- 1:23:45कलाओं से समुद्र का पानी आंदोलित हो जाता है और तुम्हें पता नहीं
- 1:23:49चलता। तुम्हारे भीतर भी बिल्कुल समुद्र
- 1:23:52का पानी है। 70% खारा पानी बिल्कुल तुम चखना
- 1:23:56कभी अगर खून कहीं से निकल आई चखना बिल्कुल खारा और फिर समुद्र के
- 1:24:02पानी को चखना बिल्कुल वैसा ही मिलेगा पूर्णमासी के दिन।
- 1:24:12जितनी घटनाएं और दुर्घटनाएं और अच्छी घटनाएं होती हैं, पूर्णमासी
- 1:24:17के दिन ज्यादा होती हैं। पूर्णमासी के दिन प्रेमी और
- 1:24:24प्रेमिका की याद बड़ी आती। है।
- 1:24:29रात काटे नहीं करते। अब ये खुश और है।
- 1:24:37याद मैं तेरी जाग जाग के हाँ। रात भर कर बसें बदलते हैं हर घड़ी
- 1:24:58दिल में तेरी फट के। धीमे धीमे चिराग जलते हैं ये
- 1:25:15पूर्णमासी की रात को ज्यादा दिखाओगे तुम प्रेम भी प्रेम काहे?
- 1:25:20पूर्णमासी की रात को सो नहीं पाती।
- 1:25:24हंस रहे हैं, बड़ा हंस रहे हैं, खूब खुश है के इनके काम की बात हो
- 1:25:29गई, मज़ा आ गया अरे भाई गंगा जो निकलती है, शंकर के चटाओं में से
- 1:25:42उसकी बात कर रहा। हूँ।
- 1:25:49तुम्हें इस बहाने भी प्रेमिका और प्रेम में याद।
- 1:25:51आ जाती है पानी सबसे ज्यादा। ग्रहणशील है रिसेप्टिव बड़ा
- 1:26:06शानदार यंत्र बनाया परमात्मा ने पांचों तत्वों में से सबसे
- 1:26:10ज्यादा। रिसेप्टिव पानी और गंगा के पानी
- 1:26:16में कुछ खासियत है। इसलिए चार सालों पे जहाँ जहाँ भी
- 1:26:26कहानी है जी तो के जयंत इंद्र का पुत्र।
- 1:26:30अमृत का घड़ा लेके निकला राक्षस पीछे पड़ गए राक्षस तो पीछे पड़े
- 1:26:35रहते हैं अमर होने के लिए अमर होने का मतलब हमारा नाम रह जाए
- 1:26:42खोदेंगे कैप्सूल दबाएंगे यह राक्षस ही तो है और क्या?
- 1:26:48और बीच में अपना नाम लिखेगा। इस तरह का एक राजा हुआ करता था,
- 1:26:52बड़ा बलशाली था और डरते फिरते हैं।
- 1:26:58माटी का पुत्र कैसा नचत हैं? कैसा नचत है?
- 1:27:10डरियो फिरत है माटी का। पुतला कैसा नचत डरियो फिरत है तभी
- 1:27:23तो साथ साथ। राउंड्स होती हैं सेफ्टी की मर न
- 1:27:29जाऊं, क्योंकि यह भ्रम टूटा नहीं कि मैं शरीर गंगा के पानी में एक
- 1:27:38विशेषता। है।
- 1:27:43और ये गंगा का पानी निकलना। भगवान शंकर के जटों से यह गंगा के
- 1:27:52पानी की विशेषता को बताता है। ये गंगा का पानी है।
- 1:28:04विशेषता है। उसमें कुछ ऐसा मिश्रित होता है
- 1:28:09जिन्हें तुम खंगाल नहीं सकते, जैसे तुम शरीर के भीतर आय तक
- 1:28:14चक्कर नहीं खंगाल पाए। कुंडलिनी नहीं खंगाल पाए सहसरार
- 1:28:21भ्रम भद्र तुम नहीं खंगाल पाए, अभी तक तुम नहीं खंगाल पाए कभी
- 1:28:29शायद योग्य हो जाओ तुम अभी तक खुशी गमी दर्द इन लम्हों को पहचान
- 1:28:39नहीं पाए तुम्हारी मशीनें नहीं पकड़?
- 1:28:43कभी वक्त आ जाएगा जब तुम खंगाल लोगे।
- 1:28:46इसको खोज हो जाएगा और किसी दिन ये कुंभ साइंटिफिक हो जाएगा।
- 1:28:54और किसी दिन ये कुंभ साइंटिफिक था।
- 1:29:00मूर्खों ने आकर इस साइंटिफिक व्यवस्था को नाश कर दिया, करी
- 1:29:07करायी। संतों की मेहनत बेकार कर दी
- 1:29:14तेरहवीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने।
- 1:29:18नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया, आग लगा दिया।
- 1:29:24खैर, उनके कुछ नियत स्वास्थ्य वीडियो पहले बहुत लंबी हो गई।
- 1:29:28आप देख नहीं पाते थे आपकी एवरेज क्यूँ?
- 1:29:32ड्यूरेशन कम आ गई, बहुत कम आ गई। क्योंकि 30 मिनट 3540 मिनट ये कोई
- 1:29:41एवरेज भी ड्यूरेशन नहीं है। बहुत से लोग तो चार चार बार सुन
- 1:29:47लेते। हैं।
- 1:29:49लेकिन बहुत से लोग कुछ मिनट सुनते।
- 1:29:51हैं। मैं मानता हूँ, गहन विषय हैं, सिर
- 1:29:56के ऊपर से निकल जाते हैं, लेकिन सुना तो करो रसरी आवत जातते सिर
- 1:30:03पर पड़ते निशान धीरे धीरे समझ भी आना शुरू हो जाएगा तो बख्तियार
- 1:30:10खिलजी ने इसको जला डाला। अब तुम क्या करोगे?
- 1:30:14राज़ करने के बहाने के कारण तुम मुसलमानों को काटोगे, मजाक
- 1:30:22कराओगे? कहोगे, इनको निकालो यह कोई कारण
- 1:30:27न। हुआ।
- 1:30:31मेरे बाप दादा कोई गुनाह किये उससे मैं गुनाहकार कैसे हो क्या?
- 1:30:38कोई तर्क बनता है महत ऋषि प्लस्त के बेटे बिशर भाग।
- 1:30:50ये दोनों ऋषि थे। और विसर्भा के कुल में दुष्ट रावण
- 1:30:55पैदा हो गया तो तुम रावण के कारण विसर्भा और उपलस्य को गाली
- 1:31:03निकालना शुरू कर दो, ये ठीक है, उचित है?
- 1:31:08नहीं बिलकुल करते है। क्योंकि अगर रावण हुआ तो भाई
- 1:31:15बिसर्भा भी तो हुआ, प्लस ऋषि भी तो हुआ, हम उनकी पूजा करते हैं और
- 1:31:24रावण भी किस तरीके से गलत था? खैर बड़ा लम्बा प्रसंग हो जाएगा,
- 1:31:29रावण गलत नहीं। था।
- 1:31:32रावण ठीक था। इसके बाद किस दिन बाद रावण पूजनीय
- 1:31:40है? आज भी पूजनीय है।
- 1:31:42तुम जलाते हो और मुझे तो शिकवा इस वासी है दोष लोग ब्राह्मण रावण को
- 1:31:50जलाते हैं। खैर, ये लंबी बात हो जाएगी।
- 1:31:56गंगा के पानी में कुछ ऐसा है लहर के रूप में, जैसे मैं कहता हूँ
- 1:32:03आसानी तिरंगे लासानी तरंगे तुमने खोज पाओगे।
- 1:32:08तुम अपने ही तरीके की अल्फा बीटा थमा गमा ये खोज लोगे, लेकिन
- 1:32:13लासानी और आसानी तरंगे तुम्हारे पकड़ में नहीं आएंगी तो बहुत
- 1:32:17सूक्ष्म है, आत्मा की तरह परमात्मा की तरह अति सूक्ष्म है,
- 1:32:25उनपे यंत्र काम नहीं करेगा। वो तो अनुभव में आएँगे तो किसी
- 1:32:33विशेष गृहही स्थिति में आकाश मंडलीय ग्रह स्थिति में किसी जगह
- 1:32:39पर इन तीनों की व्यवस्था का समूह। कहीं केंद्र तो होता है कहीं
- 1:32:46नासिक में, कभी पुष्कर, कभी हरिद्वार में कि चार स्थानों पर
- 1:32:57इनका पुंज चौथा उज्जैन, उज्जैन, नासिक, हरिद्वार, प्रयावराज।
- 1:33:04ये चार स्थान है। इन चारों स्थानों पर किसी विशेष
- 1:33:09आकाशीय गृह स्थिति में कुछ सूक्ष्म किरणें धरती के इन चार
- 1:33:16स्थानों में पड़ती हैं। यह एक सेठ विक विधि है, आज नहीं
- 1:33:20कल खोज ली जाएगी। ये था कारण लेकिन आज ये मात्र एक
- 1:33:31रसम बन के रह गया। जब हवन को कर्मकांड बना दिया जाए
- 1:33:38उसको अर्थ कुछ और ले लिया जाए। हवन था स्वयं को आहूत करना तुमने
- 1:33:44हवन सामग्री को आहूत करना शुरू कर दिया।
- 1:33:47कोई क्या करे? ऐसे ही कुंभ की प्रथा तुमने
- 1:33:51बिगाड़ ली। बड़ा सुंदर मौका था तुमने उन
- 1:33:55ऋषियों को भी जाने से मना कर दिया जो जाकर वहाँ बदल सकते थे।
- 1:34:04कोई क्या कर सकता है? बिगाड़े तुमने गलत प्रचार करने
- 1:34:11वाले गलत लोगों को इकट्ठा कर लेते हैं।
- 1:34:15बना पाप तो तुम करो गंगा क्यों धोएगी भाई?
- 1:34:20गंगा ने ठेका ले रखा है तुम्हारे पाप करने को, दोनों का क्यों
- 1:34:25धोएगी कोई तर्क बनता है गंगा बेचारी ने क्या बिगाड़ा है
- 1:34:30तुम्हारा? तुम गंगा को दूषित कर देते हो।
- 1:34:35गंगा महादुषित हो जाती है। तुम्हारे जाने से करोड़ों आदमी जब
- 1:34:38चनान करेंगे, तुम्हारे वर्ल्ड रिकॉर्ड बन सकते हैं, लेकिन गंगा
- 1:34:44ने ठेका नहीं दिया तुम्हारे पाप करने को धोय पाप तुम करो धोये
- 1:34:48गंगा ये कहाँ की न्याय प्रणाली आ गई ये तो परमात्मा फिर अनाचार
- 1:34:53करने लगा। परमात्मा अन्यायी हो गया कि तुम
- 1:35:00पाप करके आ जाओ। जीतने ज्यादा लोग स्नान किए, बस
- 1:35:05पाप ज्यादा बढ़ गए। इसका मतलब है और कुछ नहीं।
- 1:35:10पाप की भावना भीतर उठेगी। तो बड़ा सरल तरीका, दुष्ट व्यक्ति
- 1:35:16सरल तरीका खोजते हैं पाप को धोने का, नरझरा का सरल तरीका क्योंकि
- 1:35:24पाप तो कर दिया अब जल्दी से धुल जाए, कोई आकर धो दे।
- 1:35:30तो कोई आके धो दे तो गंगा बन जाती है माध्यम और तुम्हें अच्छा भी
- 1:35:37लगता है लेकिन इस गलती में मत रहना।
- 1:35:43कुंभ में जाने वालों मेरी बात को ध्यान से समझ लेना दर्द भी होगा।
- 1:35:49बिमारी भी होगी कैंसर आइटिस भी। होगा।
- 1:35:52टांग भाभी टूटेगी, दुर्घटनाएं भी होंगी, सब कुछ होगा और गंगा स्नान
- 1:35:57तुम कराएं कुम्भ में तुम जाए तुम देखना तुम्हारे जीवन में क्या कुछ
- 1:36:01होता है और नहीं जाते तो भी होता क्योंकि परमात्मा का अपना एक
- 1:36:07विधान है। वह अपने विधान से काम करता है।
- 1:36:14तुम्हारे विधान से काम नहीं करता, वह तुम देख लेना जिन्होंने बुलाया
- 1:36:20उनके ऊपर भी ऐसा कुछ होगा और जो जा के आए ज्यादा डुबकियां लगाईं,
- 1:36:24उससे कोई फर्क नहीं। पड़ता।
- 1:36:28ज्यादा गंदा कराये गंगा ये इनको मैं मान्यताएँ कहता हूँ, जो
- 1:36:35भ्रमित हो गई। एक सत्य को तुमने कर्म में बदल
- 1:36:41दिया, ऐसा सत्य तुमने कर्म कंड में बदल दिया।
- 1:36:50समर्पण संकल्प यह दोनों करने पड़ते हैं।
- 1:36:55मेरे पास यहाँ लोग आ जाते हैं, कोई सिर्फ प्रणाम करता है, कोई
- 1:37:02पांव के हाथ लगा देता है, रजाई कोई हाथ लगा देता है।
- 1:37:09और कोई दंडवत करता है। अच्छी तरह से पूरा शरीर झुक जाता
- 1:37:12है। जब उठते हैं मैं चेहरे मोरे देख
- 1:37:16लेता हूँ, मैं नहीं बताता नहीं बोलता, लेकिन मुझे पता है ये
- 1:37:23सिर्फ सर्कस की है। इसने सर्कस करके दिखाई मुझे।
- 1:37:30वो दंड, आसन, दंडवता आसन, बस दंडवता आसन और कुछ रोग ऐसे आते
- 1:37:36हैं जो परिपूर्ण श्रद्धा से भरे होते हैं।
- 1:37:42वो मुख्य क्षत्रों से भरे होते हैं।
- 1:37:45उनके भीतर से ऐसा होता है। के आह, मुझे तीर्थ मिल।
- 1:37:49गया। और कुछ लोग सिर्फ परंपरा निभाने
- 1:37:53के लिए आते हैं कि बाबा गुट्ठा लगा दे, मेरे बाप धो दे।
- 1:37:56ऐसे ही तुम गंगा के पास जाती हो। यू विल हॅव टु डू समथिंग?
- 1:38:08मैं आने वालों के लिए भी कहता हूँ कि देखो जाकर आराम से बैठना, एक
- 1:38:14हफ्ता का अवकाश लेके आना, एकांत में बैठ जाना, कुछ ना करना जो आज
- 1:38:21मैं कह रहा। हूँ।
- 1:38:23न संकल्प न समर्पण तो क्या करना स्वीकार करना ये तीसरी पद्धति ठहर
- 1:38:31जाना जो जब तुम स्वीकार करते हो तब तुम ठहर जाते हो न संकल्प में
- 1:38:38तुम ठहरते हो, वह भी कुछ करते हो गड़बड़झोल करते हो?
- 1:38:42ना समर्पण में तुम कुछ करते हो यह देखो आप सफेद वस्त्र वाली समर्पण
- 1:38:47करने वाली इनका दिल कैसे डम डम होते हैं मेरे पास रोज़ आते हैं
- 1:38:55मैसेज अब मैं क्या कहूँ? बढ़िया तुम फंस गई मैं क्या करूँ?
- 1:39:04ये धर्मों के चक्र में तो वे उलझा देते हैं लोग बस सिर्फ एक अहंकार
- 1:39:10पैदा हो जाता है हमारा समूह, हमारा कमून बहुत बड़ा है, फिर
- 1:39:15इससे क्या होता है? दुनिया बहुत बड़ी है।
- 1:39:18आठ अरब की दुनिया है। ये कम्युन नहीं है।
- 1:39:22अगर समझो तो वसुधैव कुटुम्बकम नहीं समझो तो ठीक तुम्हारे अपने
- 1:39:28घरवाले भी तुम्हारे नहीं हैं। घर में रोज़ झगड़ा होता है।
- 1:39:37न संकल्प करना है न समर्पण करना है।
- 1:39:41अब तीसरी चीज़ मैं तुम्हें दे रहा हूँ क्या ठहर जाना है सिर्फ ठहर
- 1:39:48जाना है तुम्हारे सब करने और मंत्र हो अनुष्ठान हो।
- 1:39:54हवन हो, यज्ञ हो, जप हो, तप हो, पूजा हो, प्रतिष्ठा हो खुशबू।
- 1:40:00हो? सब भागने के उपाय है।
- 1:40:04दौड़ने के उपाय है ठहरने का कोई उपाय सब कर्मकांड रहे और मैंने
- 1:40:10तुम्हें तीसरा रास्ता दे दिया। इसको बुद्ध ने भी कहा मध्य मार्ग
- 1:40:19ठहरों ठहरों पेंडुलम की तरह दो एक्स्ट्रीम पर मत जाओ अति सर्वत्र
- 1:40:29वर्जित एक्सेस ऑफ़ एवरीथिंग इस ए बैड।
- 1:40:32इधर जाओ तो भी एक्सेस उधर जाओगे तो भी एक्सेस बीच में ठहर जाओ मत
- 1:40:38सिर्फ वो ठहर जाओ नथ्थिंग टु डू ये करके देखो तो मैं कहता हूँ
- 1:40:46क्रिया योग करो तो ये नहीं कि करो उसके लिए तुम्हारा शरीर भी तो
- 1:40:50चाहिए। निरोग हो जाएगा क्रियोग करने से
- 1:40:54ऑक्सीजनेटेड हो जाएगा भीतर का माहौल जैसे तुम खाना खाते हो,
- 1:41:00खाना नहीं खाते तो वैसे ही तुम क्रिया जो कर लो और भी तो शारीरिक
- 1:41:06क्रियाएं तुम निभाते हो, स्नान, ध्यान वगैरह नहीं करते हो।
- 1:41:10फिर। क्रिया को भी कर लोगे तो भीतर का
- 1:41:13मल साफ हो जाएगा। वायु के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड
- 1:41:16निकल जाएगी। ऑक्सीजनेटेड हो जाएगा सर तो नहीं
- 1:41:21होता तो भाई मत करो। यह तुम्हें अपने भीतर ले जाने का
- 1:41:27एक सुगमता प्रदान करेगा। आसान कर देगा।
- 1:41:32तुम्हारी राह नहीं करना है, मत करो, ज्यादा करोगे, जल्दी आसान हो
- 1:41:36जाओगे, सहजता से चले जाओगे और ध्यान ध्यान का तो मतलब ही है हो
- 1:41:46जाओ ठहर जाओ, ध्यान में जाओ। कुछ न करो नथ्थिंग टु डू वे रोज़
- 1:41:54मेरे पास आ जाते हैं। मैं कृष्ण के पास फरियाद करके रो
- 1:41:57लेती थी। अब बाबा क्या करूँ?
- 1:42:00मैंने कहा अब तुम सिर्फ रो लिया करो।
- 1:42:04क्या फर्क पड़ता है किसी के सामने रोने से?
- 1:42:09यह सिर्फ रोने से क्या फर्क पड़ता है?
- 1:42:13कृष्ण तो गए बिचारे पहले तो झूठ तुमने कल्पना में बना लिया था अब
- 1:42:20सिर्फ रोलिया करो क्योंकि हल्के तो तुम रोने से हो गए कृष्ण के
- 1:42:26सामने रोते हो या मेरे सामने रोते हो?
- 1:42:30या अपने किसी भगवान के सामने रोते हों, बात काम करेगा रोना वह कथक
- 1:42:38से करेगा तुम्हारे भीतर के भावों को और तुम्हारे भीतर के भाव ही
- 1:42:42तुम्हारे ऊपर भाव है तुम्हारे ऊपर भार।
- 1:42:45है। तुम्हारी छाती के ऊपर बार बनकर
- 1:42:48बैठे हैं ये भाव, ये विचार तीसरा रास्ता ठहर जाओ न संकल्प न।
- 1:43:02समरबा कुछ नहीं। मंत्र ठहरों आज का मोरल आज का सब
- 1:43:17एक्सट्रैक्ट थीम रस ठहर जाओ। कुछ न करो, न भक्ति, न पूजा न
- 1:43:29तपस्या न संकल्प न समर्पण मात्र ठहरों नथ्थिंग टु डू ठहरने से मिल
- 1:43:40जायेगा वो जन्मो जन्मो से नहीं मिला, जो।
- 1:43:45आज वक्त कम है। बहुत ज़्यादा हो गई डेढ़ घंटे की
- 1:43:48पुणे 2 घंटे की वीडियो हो गई। कैसे सुनोगे तुम दो पार्ट करके
- 1:43:53सुन लिया करो, तीन करके सुन लिया करो, सुन लिया करो।
- 1:44:00आज रामायण को थोड़े से शब्दों में कह दूँ आदो राम तपो बना दी घमनम
- 1:44:17हतवा मृगा। कांचनम वैदेही हरणम जटाजु मरणम
- 1:44:31सुक्रवसम भाषणम। अम्बाली, नृग्रहणम समुद्र, तरुणम
- 1:44:43लंकापुरी हनम तत्पश्चात रावण, कुंभकरण, आदिहणम।
- 1:45:01ए त धीराम माई एणम बस इतनी सी रामायण ये सारी रामायण आ गई आदो
- 1:45:12राम तपो बना दी घमनम अथवा मृगा कांचनम।
- 1:45:17वैदेही हरणम जटा युमरणम सुग्रीव बसम्भाषणम, समभाषणम हुआ, सुग्रीव
- 1:45:24के साथ बादी, नेग्रहणम समुद्र, तरणम लंका पुरीदाहनम तत्पश्चात
- 1:45:35रावण कुंभ करना आदि घनम। ऐसा दी रामायण बस यही रामायण
- 1:45:43धन्यवाद।