Latest / Baba ji Vijay Vats / 13 Jun 25 - पूर्णिमा की रात होश पूर्वक कर्म करना! पूर्णिमा की रात कैसे बदल देती है जीवन? बाबा नानक।
Transcript
- 0:05रामेश्वर दयाल बाबाजी प्रणव गुरु नानक देव जी को।
- 0:20संबोधि कहाँ पर मिली, क्या था महीना, क्या थी तिथि, कौन सी थी
- 0:33जगह? वो अमूल्य नम है कहाँ गुजरे जहाँ
- 0:45मनुष्य के जीवन के सभी समाधान बजाते है?
- 0:55पंजाब के सुल्तान पर लोखी बेई नदी का किनारा काली बेई भी कह देती
- 1:08हूँ। नदी को पूर्णमासी के व्रत कार्तिक
- 1:15काम है। बहते हुए पानी में पांव डाले गुरु
- 1:27नानक देव जी महाराज और मरदाना। जो यंत्र बजाते थे जब गाते थे
- 1:41बाबा प्रभात बजाते थे मृदा इतना प्यारा शुद्ध।
- 1:58सर्द जाता था क्योंकि आवाज के साथ जैसे ब्राह्मण ठहर गया, आज भी ऐसा
- 2:10ही था। पूर्णिमा का वो चंद्रमा।
- 2:17धीरे धीरे अपने जन्म उत्कर्ष पे से गुरु नानक देव और मर्दाना नदी
- 2:31में पांव लटकाए हुए ठंडे पानी का आनंद ले रहे थे।
- 2:41अब थोड़ा सा तुम्हें बता दूँ अक्सर ये प्रबोधि की घटनाएं समाधि
- 2:50सम्बोधि की घटनाएं इसका चंद्रग्रहण से क्षमा करें।
- 2:58चंद्रमा, शिखा जुड़ाव है चंद्रमा की कलाओं का पानी के साथ विश्वेष
- 3:12जुड़ाव होता है। हमारी धरती का 70% पानी।
- 3:23हमारे शरीर में भी 70% पानी है और समुद्र का पानी अगर आप चखोगे तो
- 3:34बिलकुल वही खारा होगा जो हमारे शरीर का खून होता है।
- 3:41सम स्वाद होगा वैसा ही खराब होगा। इन दोनों का घनिष्ठ संबंध है।
- 3:54कैसे पुणमास की रात को? ज्वार उठता है।
- 4:02समुद्र में वो ज्वार का कारण है। चंद्रमा की कलाएं पूर्ण हुई और जब
- 4:15कलाएं तोपन होती हैं पूर्णता में। तो समुद्र के पानी का उछाल बड़ा
- 4:27ऊंचा हो जाता है। 100 100 मीटर तक ऊंची लहरें उठती
- 4:32है। जिन्हें हम ज्वार कहते हैं उसके
- 4:36बाद भाटा आता है। ज्वार लहरों का उठना और वाता
- 4:42लहरों का बैठना चंद्रमा के साथ इसका गहन सहमत है।
- 4:54खगोलीय घटनाओं में सबसे ज्यादा नजदीक अगर कोई है तो वो चंद्रमा
- 5:07है 3,84,000 किलोमीटर। जब उसकी आभाएं छूती है तो पानी
- 5:25में ज्वार उत्पाश। इसलिए एक बात को ध्यान से समझ
- 5:31लेना आपके शरीर का रचनात्मक फॉर्मूला रसायनिक फॉर्मूला।
- 5:39संरक्षण बिल्कुल वो ही है जो समुद्र पीस पूर्णमासी के दिन जब
- 5:54समुद्र उछलता है लहरों के रूप में।
- 5:58वो ही जल आपके भीतर है, उसी मात्रा में नमकीन वो भी भीतर से
- 6:06उछले पड़ता है, क्योंकि चंद्रमा की करने सिर्फ समुद्र के ऊपर नहीं
- 6:12फेंकती, समस्त जगत के ऊपर फेंकती है।
- 6:18जो भी इसके प्रभाव क्षेत्र में आता है, इसमें कोई आश्चर्य की बात
- 6:28नहीं है जब चाँद पूरा हो। तो यह अनएक्सपेक्टेड घटनाओं से
- 6:42समाधि के घट जाए, क्योंकि चंद्रमा का पूरा हुआ आपके भीतर ज्वार पैदा
- 6:50करेगा, जैसे समुद्र के भीतर किया। और लहरें 100 मीटर तक भी ऊपर उठ
- 6:57जाती है। इससे ज्यादा भी हो जाती है।
- 7:00आपके भीतर भी वैसे ही तूफान उठता है, क्योंकि समुद्र के पानी के
- 7:07संग रचना बिल्कुल वही है जो आपके खून की संग रच।
- 7:15तो आपके भीतर भी खून भी उछाले मानता है।
- 7:27भावनाओं का तूफान उठ जाता है। इस चंद्रमा की पूरी चाँद को देखकर
- 7:38प्रेमी को प्रेसी और प्रेसी को प्रेमी याद आता है।
- 7:46कारण क्या है प्रेम की उन तरंगों का उच्चतम शिखर पे चले जाना?
- 7:58और प्रेम कैन्सेस्नेस का उच्चतम स्वरूप है।
- 8:04जब तुम उच्चतम स्वरूप में पहुंचोगे तो तुम समस्त विश्व के
- 8:09प्रति प्रेमपूर्ण हो जाओगे। मैं अक्सर घटना सुनाया करता हूँ
- 8:16संपत्ति के पास मैं एक सूअर से गले मिला हूँ, जो लेवड़ा तुबड़ा
- 8:26वो 3 दिन कैसे बीताये? मेरे भीतर उसकी स्मृति नहीं बनी।
- 8:36आज भी कंगाल ता हूँ वो 3 दिन स्मृति शून्य होते हैं।
- 8:48पूर्णमासी की रात यह चंद्रमा पूर्ण।
- 8:54अक्सर बुद्ध भी होते हैं तो पूर्णमासी का दिन होते हैं।
- 9:01हम व्यास पूर्णिमा भी गुरु पूजा भी पूर्णिमा के दिन ही करते हैं।
- 9:07उसका कारण यही था कि पूर्णिमा के दिन तुम गुरु के स्वर्ष में जैसे
- 9:11ही आओ। वह पूर्ण होता होगा चंद्रमा अपने
- 9:18शबाब पर और तुम्हारे भीतर का आध्यात्मिकता का चरम अपने शबाब
- 9:27पर। और उस घड़ी में जब तुम गुरु के
- 9:33समीप हो, तो यह शबाब अपने ऊंचे तुम शिखर को छू सकता है।
- 9:45गुरु पूजा का और कोई महत्त्व नहीं था।
- 9:47गुरु के समीप अच्छा हुआ एक समुद्र की तरह है, वही नमकीन पानी है।
- 10:02शिष्य के भीतर भाई और गुरु उस दिन चंद्रमा बन गया।
- 10:07अपनी कलाओं को पूर्ण करता है तो यव चन्द्रमा के साईं से मिलती
- 10:22हैं। तरंग की पूर्ण शबाब होता है।
- 10:28प्रेम। पूर्ण ऊंचाईयों के उत्तर प्रेम और
- 10:33तुम्हारी श्रद्धा श्रद्धा का पूर्ण हो जाना ही संभव है।
- 10:42मैं तुम्हें बहुत बार कहा कुछ भी करो।
- 10:48पूर्णता से कर्म तो ये कर्तव्य कर्म भी तुम्हारे लिए संबोधित हो
- 10:57जाएगा। बस पूर्णता से करने का एलम
- 11:02तुम्हें आया यही जोक है तुम्हारे विद्या।
- 11:09कर्म करते हो सारा दिन रात दो भाग बस पूर्णता से नहीं होता।
- 11:22जीस दिन तुम पूर्णता से किसी भी काम को करने में दक्ष हो गए।
- 11:30उस दिन परमात्मा ज्यादा दूर है। परमात्मा से क्री तो कुछ है भी
- 11:35नहीं आता दूर हो जाता है आपके कारण क्योंकि आपके भीतर वो
- 11:48अपूर्णता जगती नहीं। आपकी बाहें गुरु से ईद नहीं करते
- 12:06गुरु से लिपटते नहीं आपकी तरंग न। और अगर ऐसा हो जाए तो ईद बन जाए।
- 12:14उसी दिन ईद हो या या के ना हो, मेरे लिए ईद हुई।
- 12:27वही दिन एक हो जाता है। अक्सर पूर्णमासी कोई घटनाएं घटती
- 12:40हैं। अक्सर उसका एक भौगोलिक कारण यही
- 12:48जो मैंने तुम्हें बताया कोई भी चीज़।
- 12:54चर्म पे होती है अब देखोगे उस दिन आत्महत्या में भी ज्यादा महत्त्व
- 12:58नहीं होती है। उस दिन एक ऐसा क्षण भी आ जाता है
- 13:11कि तुम जीना नहीं चाहते। वैराग्य अपने चरम पर होता है।
- 13:17अगर प्रेम अपने चरम पर होता है तो वैराग्य भी अपने चरम पर होता है।
- 13:30उस चन्द्रमा की कसुस्य। सभी चीजें पूर्णता में लीन हो
- 13:38जाती है, इसलिए पूर्णिमा के दिन ज्यादा प्रबुद्ध क्यों होंगे?
- 13:46क्योंकि जीस काम में चले थे वो लोग उस दिन पूर्णता को उपलब्ध हुआ
- 13:50भूकाम। ध्यान से सुन वो काम जीस मिशन पर
- 13:58चले थे। उस दिन पूर्णता को उपलब्ध हुआ,
- 14:02उसमें सहायक हुई चंद्रमा की भक्ति पूर्णता में तुम जाना चाहती थी।
- 14:12तुम टोटली इन्सर्ट होना चाहते थे, लेकिन बाहर की व्यवस्थाएँ?
- 14:18परिस्थितियां बाहर की ठीक नहीं हैं और उस दिन बाहर की
- 14:24परिस्थितियां 100% आपके अनुकूल हो जाती हैं, चमत्कारी का ढंग से।
- 14:30आपको पता भी नहीं चलता एक तूफान सा वक्त है भीतर से और तुम्हारा
- 14:41मन करता है कि कहीं खो जाऊं डूब जाऊं लीन हो जाऊं।
- 15:07निगाहें मिलाने को जी चाहता निगाहें मिलाने को जी चाहता है।
- 15:27जी। चाहता।
- 15:32आक न जाने आक न जाने को जी चाहता। मेरा नहीं मिला हूँ ने को जी तुम
- 15:55प्रेमिका। के पास बैठे प्रेमी के पास बैठे
- 15:58तुम आ तो जाते हो लेकिन जाने कुछ नहीं करते।
- 16:04कुछ अज्ञात कसी शह आज के दिन में आज की रात कुछ सुनहरी लम्हे लेके
- 16:12आई तुम जहाँ भी बैठे हो जो भी कुछ कर रहे हो।
- 16:24बहुत से लोगे ने मुझे प्रश्न पूछा बाबा इसकी महजता की प्रज्वल क्या
- 16:31होता है? पूर्णमासी को जो तुम काम कर रहे
- 16:33होते हो और तिथियों में पूर्ण नहीं हो पाता क्योंकि बाहर की
- 16:39परिस्थितियां आपका साथ नहीं देती, लेकिन पूर्णमासी की तिथि आपको साथ
- 16:44देती है। बात की परिस्थितियां आपके अनुकूल
- 16:46हो जाती हैं। आप जो करना चाहते हो, पूर्णता से
- 16:51कर लेते हो, पसंद डूब जाते हो, लीन हो जाते हो और इस लीन होने की
- 16:56चेष्टक ने बहुत बार की चेष्टों से तुम लीन हो ना सके।
- 17:04आज जो परिस्थितियां पूर्ण हैं, तुम्हारे अनुकूल डूबने चल रहे हो,
- 17:09तुम महासागर में उसे आनंद ले, लेकिन कहीं कोई बाधा तुम्हें रोते
- 17:17रहती है। तुम टोटल टीम हो, समान नहीं हो
- 17:23सकते, अपने आपको पूर्ण रूप से तुम डुबो नहीं सकते।
- 17:30उसका कारण मात्र एक ही है। बाहर की परिस्थितियां तुम्हारा
- 17:36संघ नहीं देती। बस उस दिन जो गुरु काम करता है।
- 17:42वो चाँद भी कर देता है इसलिए ब्यास पूर्णिमा को इतना महत्त्व
- 17:49दिया गया। गुरु पूजा के लिए बाहर का जो
- 17:55अट्मोसफियर उस दिन होता है कभी भी नहीं होता है।
- 18:03चंद्रमा का पूर्ण होना, कलाओं से पूर्ण तुम्हारे मन का पूर्ण
- 18:10वैराग्य, विरह की अग्नि जल रही और गुरु का सान्निध्य मिल जाए।
- 18:18और तुम चले हो मुक्ति की तरफ ज़ंजीरों को काटने की तरफ उस परम
- 18:23आनंद के सागर में डूबने की तरफ, लेकिन हो नहीं पाया।
- 18:31जो इससे पहले कभी नहीं हुआ वो इस दिन घट जाता है।
- 18:40क्यों घटता है? क्योंकि बाहर का सरकमस्टंसेस आज
- 18:50अनुकूल होते हैं। तुम्हारे मन के पर तुम्हारा मन
- 18:54डूबना चाहता है। जहाँ।
- 18:56बाहर का सर्कमस्टैंस उसे धक्का दे रहा है।
- 19:01पुष्कर के तहत तुम उस सागर में विलीन हो जाते हो जहाँ जाने से आज
- 19:10तक डरे थे। जहाँ बुद्धि ने 1000 बार सोचा था
- 19:15जाऊं कि न जाऊं, कहीं भी ऐसा तो नहीं कि वो हो ना?
- 19:23कहीं ऐसा तो नहीं और भी तो भ्रम फैला रहे हैं।
- 19:28ये गुरु भी ऐसा ही। उस दिन तो हमारी बुद्धि डाक ली
- 19:35जाती है। प्रेम के द्वारा श्रद्धा का जन्म
- 19:41होता है, नास्तिक तक का पूर्व हो जाती है।
- 19:50प्रेम का लबो लिवास ऐसा होता है चारों तरफ आपके रोए रोए को
- 19:56आच्छादित कर लेता है प्रेम से रो अमृत वर्ष नहीं लग जाता है सारी
- 20:01तरफ से देखिये बार की घटनाएं। भौगोलिक घटनाएं बाहर चंद्रमा
- 20:10पूर्ण शबापे गुरु के पास चले, वो भी पूर्ण शबापे रह गए थे।
- 20:22तुम जो इनसर्ट होना चाहते थे टोटली लेकिन हो ना पाते थे, वैसे
- 20:29एक कमी तुम्हारी थी। बाकी सब था इससे पहले भी बड़े
- 20:35क्षण आये, मरहले आये और चले गए, लेकिन आज वो क्षण आया जब तुम्हारा
- 20:43भी मन तैयार है टोटल टीम में जाने के लिए उस सम्पूर्णता में लीन
- 20:48होने के लिए आये तुम्हारा भी मन। दृढ़ता को पकड़ लिया है।
- 21:00सारी संगरचनाएँ आपके अनुकूल हैं। हवाएं आपके अनुकूल बेहाल हैं।
- 21:07सारी सृष्टि ऐसा मालूम पड़ता है जैसे विश्वामित्र हो गई हो।
- 21:12आज के दिन विश्वामित्र हो जाती है सृष्ट।
- 21:17सृष्टि तुम्हारे सहयोग करती है और जिसने जीतने बिरहा से उसे आवाज
- 21:24लगाई जिसके भीतर जितनी तड़प जगी उसे पानी की और तड़प उस दिन
- 21:32सम्पूर्ण हो गए। उस दिन सम्पूर्णता को उपलब्ध हो
- 21:38जाता है व्यक्ति का प्रत्येक कर्म।
- 21:44अगर कोई जीन की तमन्ना नहीं रखता तो वह आत्महत्या कर लेता है।
- 21:49वो आत्महत्या का इसलिए? मैं कहता हूँ पूर्णमासी को जिनके
- 21:56मन में नेगेटिव विचार आते हैं, घर से न करे क्योंकि चंद्रमा की आई
- 22:04हुई ये किरण तुम्हारे मन के उस गहरे शलों पर बैठी हुई आत्महत्या
- 22:11की। प्रवृतियों को बाहर खींच ले दी और
- 22:15बाहर खींच के तुम्हारे क्षेत्र में ले आएगी और तुम चाहते या न
- 22:19चाहते हुए भी उस जघन्य अपराध को कर बैठोगे, क्योंकि बाहर की सारी
- 22:29व्यवस्थाएँ। तुम्हारे मन अनुकूल है।
- 22:32आज हवा बह रही है तुम्हारे मन के अनुकूल तो पहली बात तो ध्यान रखना
- 22:40बहुत बार पूछा गया कुछ क्या होती है खासियत इस पूर्णमासी के
- 22:48चंद्रमा बुद्धपूर्ण हुए। और वे बहुत से संतपूर्ण हुए गुरु
- 22:56नानक देवपूर्ण हुए कार्तिक महीने के पूर्णमासी पूरा बेहतर का सर्कल
- 23:09ब्लड। वो लंघी मारता है, जम्प करता है
- 23:20और बाहर का सर्कमस्टैंसेस से सहयोग देता है।
- 23:28बस वो काम जो हो न सका, वर्षों में उस लम्हों में हो जाता है वेह
- 23:38के पल हो, पूर्णमासी की रात हो, गुरु का सांनिध्य हो।
- 23:47वो घटना कट गई जो तुमने ही चाहि थी।
- 23:52पूर्णमासी की चाँद का चंद्रमा के तिरंगों ने तुम्हारे अचेत मन के
- 23:58गहरे से तुम्हारा बिरहा निकाल लिया, तुम्हारा बैरा गे निकाल
- 24:04लिया। तुम्हारी विषवासनाएँ ठप हुई और
- 24:10तुम्हारी बिरहा की अग्नि प्रदीप्त हुई, गहरी से गहरी थलों में बैठी
- 24:16हुई तुम्हारी मुक्त होने की कामना चेतन में आ जाती है।
- 24:22चेतन मन में, अचेतन से खींच लेती है यह करना।
- 24:31और जो काम तुमसे कभी नहीं हो सका वो उस दिन हो जाता है।
- 24:37शरद पूर्णिमा की रात को मेरे साथ भी ऐसा हुआ।
- 24:41बुद्ध के साथ भी ऐसा होता है बुद्ध पूर्णिमा गुरु नानक देव के
- 24:47साथ भी। कार्तिक महीने की पूर्णमासी में
- 24:50बहुत से शांत पूर्णमासी का चंद्रमा सिर्फ आपके भीतर की
- 25:00आकांक्षाओं को उद्वेलित कर देता है।
- 25:04हिला देता है समुद्र की लहरों की तरह।
- 25:11और वो जो कभी समुद्र शांत सा लगता था, गंभीर सा लगता था।
- 25:17आज उखड़ा उखड़ा सा लगता है। आज सैकड़ों मीटर तक जाती हैं उसकी
- 25:22लहरें आसमान को जैसी चोंगियाँ आ जाती हैं, जैसे चाहती हैं कि
- 25:28चन्द्रमा को छूके वापस आ जाएं। मसाज तुम्हारी कल्पनों को पर लग
- 25:35जाते हैं। कल्पनाएं वास्तविकता में आज बदल
- 25:39जाती हैं। पूर्णमासी पूर्णमासी की राह ऐसी
- 25:42रात है इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ। सभी पूर्णमासी की राहत को कि एक
- 25:56साधना का पथ बना लेना चाहिए, पूरे खेले चंद्रमा को अपने आप को सौंप
- 26:05देना। ये डॉक्टर हूँ संभालो मैं तेरे
- 26:14हाथों की गर्व से अब तू मुझे नचा कैसे निचाएगा अब तू मुझे अपने
- 26:28प्रेम में बगो अपने रस से। लब भर दे और तुम पाओगे कुछ ही
- 26:39दिनों में तुम्हारी भीतर की मनोरथ को पूरा करते हो और पूर्णमछी को
- 26:49जक। तुम्हारी उठती हुई भीतर से विराह
- 26:55की तरंगों को चंद्रमा इंदाद करेगा।
- 26:59आज बाहर का माहौल तुम्हारी अनुकूल है।
- 27:02हवाएं तुम्हारे वार में बहती हैं। इसका लाभ था।
- 27:19बैंग नदी के किनारे पर बैठे पांव लटकाई पानी के भीतर सात में
- 27:25मर्दान। प्रकट प्रेमी बात सुना जिसकी
- 27:29तरंगें हमारे साथ घुल मिल गईं। गुरु शिष्य का ये प्रकार अन्यन्य
- 27:38प्रेम शताब्दियों तक जिंदा रहेगा। मर्दाना और गुरु नानक देव मित्र
- 28:02गुरु शिष्य का समन। अचानक बैठे बैठे गुरु नानक देव
- 28:11नदी में उतर गए। जैसे स्नान करने स्नेक्स नदी आके
- 28:20गहरे पानी में चले गए। और गहरे पानी में क्या गए?
- 28:29मर्दान प्रेम से आँखें मूंदे बैठा रहा।
- 28:32जब जाख खुली तो देखा नानक नहीं कहाँ गए, कब के गए हुए मुझे तो
- 28:40याद नहीं रहा। मैं तो खो गया, इस से चंद्रमाकी
- 28:46दीप सिक्स मुझे तो अपना अंतर खींच के ले गया, वक्त का पता नहीं चला
- 28:53कितने बच गए, लेकिन नानक का हो गया आसपास आवाज़ दी पुकारा।
- 29:02लाने की आवाज कहीं से नहीं आती। थोड़ी देर के लिए ढूंढ़ते रहे।
- 29:10इधर उधर लेकिन कहीं नहीं हो रहा है।
- 29:18फिर आखिर में सोचा की नानक नदियां में डूब गए।
- 29:26भाग के गए घर में ग्रामीण खबर दी। नानक नहाने उतरे थे, नदी में
- 29:34लापता है। फिर आई।
- 29:37और कहानी कहते हैं कि 3 दिन 3 दिन गुरु नानक उस नदी में रहे।
- 29:51कहानियों पौराणिक है, लेकिन मैंने तुम्हें कहा कि सिम्बोलिक
- 29:57रिप्रजेंटेशन की तरह बड़ा महत्त्व।
- 30:08एक शब्द है अंग्रेजी का कमिंग इवेंट्स कास्ट देयर शैडोज बिफोर?
- 30:17संभोधि की घटना घटने से पहले समाधि की घटना घटने से पहले 3 दिन
- 30:22पहले तुम्हें पता चल जाएगा क्या होगा या गौर से सुन तुम्हारी चाल
- 30:31बदल जाएगी। चाल हंस की तरह हो जाएगी।
- 30:38ऐसी मस्ती से चाल चलोगे तुम और मृग की तरह तुम बुलाएंगे, मरोगे,
- 30:48प्रेमपूर्ण चाल हो जाएगी। 3 दिन पहले थोड़ा सा जाग के
- 30:52चलोगे? पूर्णमासी के वक्त खास तौर से
- 31:00भीतर के साक्षी को जगा के चलो हाथ उठा तो देखना कि हाथ उठा पांव ने
- 31:11डग भरे। तो देखो के पांव के कदम आगे गया
- 31:14है। आँखें खुलीं तो देखना आँखें खुलीं
- 31:20कानो ने कुछ सुना, कोई मधुर झंकार, कोई अनाहत नद की आवाज तो
- 31:26देखना की नात गुज रहा है। साक्षी को दृढ़ करना है साक्षी
- 31:37में ही तलीन रहना साक्षी में ही स्थिति रह जाए तुम्हारी ऐसा जीना
- 31:44उसकी जिंदगी को, उस दिन की जिंदगी को।
- 31:52महत्मबुद्ध जारे थे, सातवें आनंद था, महत्मबुद्ध जाते जाते,
- 32:01उन्होंने अपना हाथ ऐसे किया नाक के ऊपर से आनंद ने पूछा बनते?
- 32:10जी आप क्या कर रहे है? नाक में कोई मक्खी तो है नहीं, आप
- 32:18तो ऐसे करिये जैसे किसी मक्खी को हटा रहे हो।
- 32:23वो तो बोले हाँ। आनंद थोड़ी देर पहले की मक्खी बैठ
- 32:28गई थी। मैंने बेहोशी की तरह उन्हें उड़ा
- 32:32दिया था लेकिन तब मैं बेहोश था। बाद में ख्याल आया की यह क्रिया
- 32:42तो बेहोशी में हो गई और बेहोशी में जो तुम करते हो उसका संस्कार
- 32:46बेहोशी की तरह ही बढ़ जाता है। और इन्हीं संस्कारों के कारण ही
- 32:51तो हम उलझे हुए हैं। हमने गलत संस्कारों को मान लिया,
- 32:59तूल दे दिया, दोहराते रहे उसे और आज उसी का परिणाम हम भोग रहे हैं।
- 33:10गलत तो मान्यता ही हमने थोप नहीं है।
- 33:15मैं शरीर हूँ, मैं विचार हूँ, तुम विचारों के साथ लिप्त हो जाते हो,
- 33:22एक आकार हो जाते हो, शरीर के साथ लिप्त हो जाते हो।
- 33:26बस आज की रात लिप्तता से मत देखना साक्षी से देखना पाम उठा तो पाम
- 33:34उठा तुमने देखा तुम साक्षी साफ वेद नजर आएगा जो उठा वो पाम जिसने
- 33:44देखा वो मैं साक्षी। हाथ उठा और देखना हाथ मुख बोला तो
- 33:55देखना मुख बोला जीवा हिली, आँखें खोली और उसने कोई दृश्य देखा तो
- 34:05देखना। आँखों ने दृश्य देखा और तुम उस
- 34:11देखने वाली आँखों को देख रहे हो यह प्रयोग करना कोई भी इंद्रिया
- 34:21कोई काम कर रही हो। उसको जागते देखने यही जागरणता
- 34:31जिसकी परिभाषा आज बदली गई, तुम चिल्लाने को जागरण कहते हो, आज
- 34:39तुम्हारी सहारी हरदासीं महज एक कर्मकांड है।
- 34:44जागरण कर्मकांड है परमात्मा का शमण कर्मकांड है तुम सुमरण जिसे
- 34:52कहते हो वो तुम करते हो वाहेद्रु सतना।
- 34:59तुम रेपेटिशन करते हो रिपीट। वह गुरु, वह गुरु, वह गुरु, ये आज
- 35:10कर्मकांड कांड इसका सत्य ये था कि वो तुम्हें याद करता है जैसे
- 35:16प्रेमिका की याद तुम्हें आ जाती है।
- 35:20शह जैसे तुम चलते होगे और उसकी याद तुम्हारे मन में उतर जाएगी।
- 35:24यद्यपि तुमने सोचा भी नहीं था कि उतर जाएगी याद इस घड़ी प्रेमिका
- 35:31याद आएगी इस घड़ी प्रेमी याद आएगा, तुम्हें ख्याल भी नहीं।
- 35:40तो समझन की याद आती है की नहीं जाती यहीं तुम चूके हो।
- 35:47बाबा अच्छे भले स्मरण कर रहे हैं। चार 4 घंटे बैठ जाते हैं बहन का
- 35:50सब बेकार तुम अपने आपको मूर्छित करने का उपाय मात्र कर रहे हो।
- 35:56नाम कोई भी हो। हल्ला हो, शिव हो, राधा हो, राम
- 36:05हो, कृष्ण हो, गोविंद हो, कुछ भी हो तुम अपने आप को बेहोश करने का
- 36:14प्रयास करें। क्योंकि कुछ भी तुमने दोहराया
- 36:18तुम्हारी शक्ति, वह हुई बोलने में शक्ति वह होती है जबकि स्वर्ण
- 36:26स्वर्ण कोई बोलने की प्रक्रिया नहीं थी।
- 36:29स्वर्ण याद करने की प्रक्रिया भी नहीं थी इसको गहरी से समझना।
- 36:35कभी किसी एकांत लम्हों में तुम्हें तुम्हारी प्रेमिका भी याद
- 36:43है और प्रेमिका भी याद है तुम्हारा मन का कमर फेल गया, उसकी
- 36:50पंखड़ियाँ खुल गई। प्रेमिका की खुशबू विखरनी शुरू
- 36:55हुई। वो प्रेमी हो या प्रेमिका और
- 37:02तुम्हारी ज़हन में वो बस गई लेकिन याद आई तुमने किया है।
- 37:15और फिर उस घड़ी में तो अगर तुम प्रेमिका को बनाना भी चाहो तो याद
- 37:25आते ही चली जाएगी तो स्मरण जो था उसको कर्मकांड में तुमने डाल के
- 37:33विकृत कर लिया। प्रभु का शरण आता है, तुम चेष्टा
- 37:45मत करना, चूक जाओगे जिसने चेष्टा की वो चूक प्रेमिका की याद आती है
- 37:54जैसे प्रभु की याद आए ऐसे। याद न जाए बीते दिनों की याद न
- 38:16जाए। बीते दिनों की जा के न आए जो दिन
- 38:31दिल क्यों भुलाए उन्हें दिल। क्यों भूला याद ना या।
- 38:49प्रियंका की याद को तुम धकेलना चाहते हो?
- 38:52यह बैरन किस वक्त याद आ गई? बनाना चाहते हैं जिन्हें हम भूलना
- 38:59चाहिए। वो अक्सर याद आते हैं।
- 39:02भला हो इस मोहब्बत का वो क्यों कर याद आते हैं?
- 39:07ऐसी होनी चाहिए तुम्हारे मन की स्थिति जब ऐसे वो याद आने लग जाए।
- 39:18तो समझो स्मरण परिपूर्ण हुआ तुम्हारे करने से कभी स्मरण नहीं
- 39:25हो पाया। ये तो ये कर्मकांड मैंने पहले ही
- 39:28भी कहा तुम याद करते हो? मैला पकड़ के बैठ जाते हो, 4 घंटे
- 39:38परमात्मा का नाम जपते हो और तुम्हारा मन अहंकार से भर जाता
- 39:43है। मैंने 400 माला की 4 घंटे मैंने
- 39:48जाप किया। जैसे तुमने कोई उपकार कर दिया हो।
- 39:51परमात्मा को याद रखना तुम परमात्मा पे उपकार कभी नहीं कर
- 39:54सकते वो जिसने सारी धरती पे उपकार किया वो सारी उम्र तुम्हें देता
- 39:59ही चला गया हो दाता दे लें दा थक का जुगा जुगा अंतर खाई।
- 40:09तुम खाते ही चले जाते हो वो देता ही चला जाता है वो नहीं थकता तुम
- 40:15खाते खाते थक जाते हो जो सवनम तुम आज करे हो कभी नहीं पहुंचोगे तुम
- 40:27यह समरण है यह शक्ति का व्यय है। तुम जुबान से बोलते हो, तुम कहते
- 40:36हो जीवा पवित्र हो जाएगी। नहीं जीवा नहीं शक्ति गवादी बोलने
- 40:41में, क्योंकि प्रत्येक कर्म हमारी शक्ति को कम करता है।
- 40:50और तुमने स्मरण को भी कर्म में डाल दिया तो तुम्हें एनर्जिलस्नेस
- 40:58हो जाएगी। थोड़ी देर में तुम थक जाओगे।
- 41:002 घंटे, 4 घंटे जैसी किसी की एक्वेसिटी है, कोई चार 4 घंटे याद
- 41:06करता रहता है। कोई बच्चा 2 घंटे पढ़ता है, कोई 4
- 41:10घंटे कोई 10 मिनट पढ़ता है अपनी अपनी और जब तुम थक जाते हो तो तुम
- 41:16सो जाते हो। मन में यह संतुष्टि दी कि मैंने
- 41:24आज का काम पूरा किया, होमवर्क पूरा किया।
- 41:28परमात्मा ने कभी नहीं कहा तुम्हें कब कहा किस ग्रंथ में कहा बताओ
- 41:34कभी नहीं कहता परमात्मा अगर ग्रंथ में ये कहा तो तुम कहीं समझने में
- 41:38चौंक गए हो। परमात्मा कभी नहीं कहता, मेरा
- 41:42उपकार चुकाओ। परमात्मा समय जानता है कि मेरा
- 41:45उपकार चुका है या नहीं। ये चुकाने के कैसे बेचारे तुम
- 41:54अपने माता पिता तक का उपकार नहीं चुका सकते।
- 41:58परमात्मा का उपकार कैसे चुका पाओगे?
- 42:02यह मूड प्रथा ही है तुम्हारी जो तुम्हें तोड़ देनी चाहिए अतिशीघ्र
- 42:07जितनी जल्दी हो सके जिंदगी भर तुम नाम जपते रहे नहीं मिलेगा वो
- 42:18क्योंकि वह उतरता है वह याद नहीं किया जाता।
- 42:21तुम्हारी याद करने से कभी नहीं आता वो क्योंकि याद करने के वक्त
- 42:27तुम बीज़ी होते हो। याद में बीज़ी होते हो और जैसे ही
- 42:33तुम बीज़ी हुए व्यस्त हुए, वह आना भी चाहेगा तो आ नहीं सकेगा
- 42:38क्योंकि तुम व्यस्त हो। तुम एक कारोबार कर रहे हो इट्स
- 42:42बिज़नेस, ये बिज़नेस है ये व्यापार और चाहे तुम दुकानदारी
- 42:48चला रहे हो, चाहे ऑफिस में तुम कंप्यूटर चला रहे हो, चाहे तुम
- 42:52बाला लेके राम राम कर रहे हो। ये एक व्यापार है क्योंकि थिस इस
- 42:57बिज़नेस तुम बीज़ी लाखों बार वो तुम्हारे दर पे आया तुम्हारे
- 43:05दरवाजे को कस कटाया लेकिन निराश वापस चला गया जिसे तुम बुलाते हो
- 43:09जिसे तुम कहते हो वो आता नहीं, वो तो रोज़ आता है।
- 43:19तुम कभी जाप के देखना तुम ए व्यस्त हुए उलाहना देने से पहले
- 43:26अपने आप की स्थिति को देखना तुम कभी नॉन बिज़नेस में गए, तुम सदा
- 43:33ही बीज़ी हो गए? और वह उतरता है नॉन बिजेनस के
- 43:39क्षणों। जब तुम व्यस्त नहीं होते तुम कुछ
- 43:44नहीं कर रहे होते। यू अरे टोटली एम्प्टी यू अरे नॉट
- 43:50डूइंग एनीथिंग कुछ भी नहीं कर रहे हो खाली बिलकुल खाली तब उतरती है
- 43:56याद प्रेमिका कुछ? तुम देखो ना राम राम करते हुए
- 44:01तुम्हारी प्रेम का भी याद नहीं आएगी, फिर चला ही जाओ, राधा राधा
- 44:10करते रहो, चला ही जाओ, इसलिए मैं इन मूड लोगों को कहता हूँ।
- 44:16कि तुम इतना पाप मत करो, आने वाली संस्कृति को तुम उलझा के मत जाओ,
- 44:21हाथ जो डालो, जो जानता है उसकी बात को समझो अगर तुमने नहीं पाया
- 44:30है कोई हरजा नहीं अपना पैसा टका तुम कमा लो और एक तरफ़ जाके हो
- 44:35जाओ, बैठ जाओ। गुमराह मत करो, मानवता को इससे
- 44:39बड़ा कोई पाप नहीं। लेकिन आज हर व्यक्ति संसारिक हो,
- 44:48राजनीतिक हो, आध्यात्मिक हो, वह श्रेय पाने की होड़ में लगा।
- 44:56हम इन शब्दों को ठीक से ध्यानपूर्वक समझ लेना धन का
- 45:02स्वास्थ तो तुमने चख लिया और जब धन का स्वाद चख लेते हैं वो श्रेय
- 45:09पाने की यात्रा में दौड़ पड़ते है।
- 45:14श्रेय ले लो। चंद्रयान थ्री बनाएंगे वैज्ञानिक
- 45:25पहुंचाएंगे वैज्ञानिक रियाय का इस्तेमाल करके रंगों का इस्तेमाल
- 45:31करके और जब चंद्रयान उतर जाएगा। चंद्र की धरती पर तो राजनीतिक आ
- 45:37जाएंगे। तिरंगा ले के झंडे।
- 45:42फिर झूमना चाहिए, लेकिन वक्त पे इसके वक्त होते हैं जुर्माने के
- 45:4815 अगस्त को जुमाव से या किसी खास मरहली को जुमाव से।
- 45:54ऐसे ही श्रेय लेने के लिए मत झंडियाँ दिखाया करो ये तुमने
- 46:02बनाया नहीं जीसको तुम झंडी दिखा रहे हो।
- 46:06यह हजारों व्यक्तियों की मशक्कत से बनी है।
- 46:08चीज़ वंदे भारत। और तुमने सारा श्रेय लेने की
- 46:16चेष्टा भर की है, लेकिन क्या श्रेय तुम्हारे साथ जाएगा?
- 46:25राजनीतिक लोग श्रेय के बहुत भूखे होते हैं और यह श्रेय लेने की
- 46:34रूढ़िवादी परम्परा तुम्हें नरक में धकेल देती है।
- 46:38इन श्रेय लेने के लम्हों को तुम नॉन विजीनैस के लम्हे बना लेते
- 46:45काश, तो तुम वास्तव में जीस चीज़ की आकांक्षा किए हो जोड़ों जुड़े
- 46:52फिरते हो। ये भिक्षा पत्र उठा के जो तुम वोट
- 46:56मांगते हो इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी।
- 46:58कभी नॉन बिज़नेस के क्षणों में बड़ा सुधार बहेगी।
- 47:03के तुम्हे तृप्त करतेगी और जो तृप्त ऐसे हो के तुम के मांगने की
- 47:08रूचि ही नहीं पैदा हो गयी। लेकिन जब तक हर व्यक्ति आज श्रेय
- 47:19लेने की फिराक में है। राजनीतिक व्यक्ति जो करता नहीं,
- 47:26जो कर सकता नहीं, उसका भी श्रेय लेने की फिराक में है।
- 47:30क्या हो जाएगा मूड हुए हो? क्या तुम ये मूर्खताएं बंद नहीं
- 47:38कर सकते? तुम्हारा ही नुकसान है?
- 47:48किसको मूर्ख बना रहे हो? वक्त तुम्हारी मूर्खता को उजागर
- 47:54कर देगा। तुम आज लोगों को उल्लू बना रहे
- 47:59हो, कल को मौत तुम्हें उल्लू बना देगी, धड़म से गिर जाओगे कौन नहीं
- 48:04गिरा सिकंदर नहीं गिरा कि डायबिटीज़ नहीं गिरा।
- 48:11के अरस्तू नहीं गिरा के पलटू नहीं गिरा चाणक्य नहीं गिरा के कौन
- 48:16गिरा 1 दिन सभी टूट जाती है, बिखर जाती है, बिखरना हमारी नियति है।
- 48:30हर व्यक्ति श्रेय लेने की फराक में और उस मूड आत्मा को यह नहीं
- 48:34पता कि श्रेय लेना, एक बादल और ये ऐसी मूर्खता राजनीतिक लोग या
- 48:45धनाढ्य लोग ही करते हैं। जो व्यर्थ के कंभों में सारा दिन
- 48:51भर रात गुजारते थे। धार्मिक व्यक्ति, प्रबुद्ध
- 48:57व्यक्ति ऐसा काम नहीं करेगा, ऐसे मूर्ख सा नहीं करेगा।
- 49:02प्रबुद्ध व्यक्ति बिल्कुल इससे उलट है।
- 49:07प्रबुद्ध व्यक्ति कहेगा। जीस सर लिखे जीस ए लिखे तिस सर ना
- 49:14जप जी साहब लिखते हुए बाबा नाना कहते हैं जिसने ये लिखें, यह उसके
- 49:19सिर की एजाद नहीं है। कितनी शानदार जप जी साहब लिख दी।
- 49:26ऐसे गुण तत्वों से रईसों से भरी हुई जपजी बाबा लिखते हैं और फिर
- 49:32लिखते हैं तो श्रेय नहीं लेते। ये हैं अध्यात्म जिसके इस यंत्र
- 49:43से उपजता है। जिसके इस यंत्र में मेहरबान हुई
- 49:50प्रकृति परमात्मा अपना अमृत उड़ेला।
- 49:55उसने सच कंठ से वह लिखता है जिसे ये लिखे तिसरना जिसने ये लिखे
- 50:02उसकी खोज नहीं है सर के। जब फरोमाइल थे जैसे उसका हुकुम
- 50:10जैसे उसने ऊपर से उतारा सचखंड में से जो शब्दावली मैंने वो वो लिख
- 50:14ली। शांत श्रेय लेने का प्रयास नहीं
- 50:21करेगा। संत की यही पहचान अगर संत में नजर
- 50:26न आए तो समझ लेना कि वह वृहद उतरा नहीं।
- 50:34अगर कोई शंकर झंडी उठा के शास्त्रार्थ करने की फराक में
- 50:38श्रेय लेने के लिए बद्ध है। मुझे घोषित कर दो सबसे प्रबुद्ध,
- 50:49मैं ही हूँ सबसे बड़ा आचार्य मैं ही हूँ शंकराचार्य तो सुनते होना
- 50:56स्वभावित क्यों कर रहा है ये ऐसी मूर्खता?
- 51:03बाबा नानक ऐसा नहीं करते, बाबा नानक उदासियाँ निकालते हैं
- 51:08उदासियों का मतलब लोगों को वो जागृत करते हैं।
- 51:14लोग सोए हैं उनको बताना पड़ेगा जाकर।
- 51:20बाबा कहते हैं, वह है एक ओंकार। वह एक मैंने देखा बस ये दो बातें
- 51:28हैं। कहने को तीसरी कोई बात है ही नहीं
- 51:31कहने को फिर से सुनिए इन शब्दों को।
- 51:38संत कहेगा वह है, इसलिए उसके पांव उठते ही चले जाएंगे।
- 51:44मक्का मदीना की तरफ वह है और मैंने देखा है बात खत्म, तुम लाश
- 51:55चिल्लाओ, तुम लाश पूछते हो। लेकिन तुम अनाड़ियों से पूछते हो,
- 52:00मोड़ों से पूछते हो मूर्खों से पूछते हो जिनको उसका और छोड़ पता
- 52:05पता ठोर ठिकाना कोई मालूम नहीं तुम उनसे पूछते हो उनसे क्या
- 52:10पूछते हो जिन्हें पता ही नहीं? वो तो खुद ही गीता का ज्ञान दे
- 52:16रहे हैं। बिना डुबकी मारे गीता में उपनिषद
- 52:21का ज्ञान दे रहे हैं बिना उस स्थल पे जाए हुए जहाँ से उपनिष्ट का
- 52:25ऋषि बोलता है जा के बल के जीस स्थल से बोलते हैं वहाँ कहाँ गए
- 52:29हैं ये रुको और कब गए हैं किस वक्त के ज़रा बता दो।
- 52:35कौन सा लम हाँ इनके लिए खाली था फुर्सत का लम कब उतरे ये
- 52:41कॉम्पिटिशन लड़ते रहे यूपीएससी की हयास लग गए अधिकारी बने राज़ किय
- 52:48लेकिन उसके बाद देखा कि थोड़ी सी संभावनाओं उधर जा दें।
- 52:54बुद्धि है वो कबुलरी है, ज्ञान है, संग्रह है, भंडार सारे
- 53:00न्यूरोन भरे पड़े हैं, सब कुछ तो है तो चलो फिर थोड़ा सा।
- 53:11हम भी श्रेय इकट्ठा कर लेते है। चार मीडियों को नौकरी भी मिलेंगे,
- 53:20पुण्य भी हो जाएगा, बेरोजगारी बहुत है और श्रेय भी मिल जाएगा।
- 53:28और ऐसे प्रचार करने वाले झूठ हैं लोग आप तुम्हें बहुत मिल जाएंगे
- 53:32आज के जमाने में, खास तौर से जबकि बेरोजगारी जन्म पे जीस दिन
- 53:40हिंदुस्तान से बेरोजगारी चली गई, उस दिन कोई झूठ बोलने को तैयार
- 53:45नहीं हुआ। यह इन विचारों की मजबूरी है।
- 53:52यह जो तंत्र झूठ बोल रहा है, इनका कसूर कोई नहीं।
- 53:56इन्हें लोभ दिया गया है। इन्हें धन का लोभ दिया गया है।
- 54:00भेद खाया गया है जो राजनीतिक व्यवस्था कोरप्ट है और 1 दिन पहले
- 54:10हमारा टीक अधिकार उससे ब्लेम लगाता है।
- 54:14तुम्हारी पार्टी में इतना घटाला किया।
- 54:18अगले दिन वो गंगा स्नान कर लेता है फिर उनकी पार्टी में मिल जाता
- 54:22है। जिसने लूटा था उसको खजाने की चाबी
- 54:26दे दी जाती है। ये है राजनीति श्रेय चाहिए,
- 54:33सिक्के चाहिए, धन चाहिए, गोल्ड चाहिए, डॉलर चाहिए।
- 54:43लेकिन संत कहता नहीं ये धन नहीं, यह ऋण है, जितनी जितनी तुम झूठ
- 55:00बोलोगे, ऋण चिढ़ता ही जाएगा। यह तुम्हें माइनस करेगा।
- 55:05नेगेटिविटी भीतर उमड़ती ही चली जाएगी।
- 55:10फिर तुम डांटने में क्षण लगाओगे तुम दूसरे व्यक्ति को जो झूठ बोल
- 55:18रहा है तुम्हारे बराबर। उससे पूछोगे हैं तुमने कभी राधा
- 55:26के चरणों में बैठ के उसके अमृत को पिया है?
- 55:34ऐसी ऐसी मोड़ों की बातें करते हैं ये लोग।
- 55:38मेकअप करते हैं, बाहर से काला पीला लगा लेते बाबा श्रेय नहीं
- 55:46लेते राजनीतिक लोग भैस से ग्रस्त लोभ से ग्रस्त श्रेय लेने का।
- 55:58प्रयास करते हैं। हर चीज़ को जो किया नहीं,
- 56:00इन्होंने जो कर सकते नहीं, उसका श्रेय लेने की चेष्टा करते हैं,
- 56:05जानते बूझते हुए कि श्रेय साथ नहीं जाएगा।
- 56:09किसका श्रेय साथ किया है? नाम साथ जाते हैं।
- 56:18और नाम अगर साथ चला भी जाए तो उस व्यक्ति को फर्क क्या पड़ता है?
- 56:22आज महात्मा गाँधी के तुम मलाई पहनोगे क्या?
- 56:25महात्मा गाँधी की तस्वीर पे भूत के ऊपर गोली चला लो खुश हो लो
- 56:30लेकिन महात्मा गाँधी को कोई फर्क पड़ेगा इसा को आज फिर लटका दो।
- 56:40ईशा को फर्क पड़ेगा? प्रस्तुति कांड करो, उसको फर्क
- 56:44पड़ेगा सिर्फ तुम्हारी मूर्खता को फर्क पड़ेगा।
- 56:53यहाँ हमारे मुख सर के पास एक कवर है।
- 56:59शायद हुन्नूर खान के मैं पक्का नाम नहीं हूँ जी यार वहाँ सिख लोग
- 57:05जाते हैं, जूते मार के आते हैं यानी जो घर में जूते चलाने थे
- 57:10उन्होंने अपने बाल बच्चों पे पत्नियों पे अपने दुश्मनों पे।
- 57:16वो सारा गुब्बार वहाँ पे निकाल लेते हैं।
- 57:18एक तरफ एक तरह से कैथल हो जाता है, घर आके वो काम नहीं करना
- 57:24पड़ता, उस बाजार के ऊपर कर देते हैं, मन हल्का हो जाता है।
- 57:33भाई कबर के ऊपर गए हुए कितने वर्ष हो गए?
- 57:38नूर खान को को तुम कबरें खंगाल रहे हो कहीं उसका अता पता नहीं वो
- 57:43किसी और गर्भ में बैठा होगा और तुम उसके जूतियां मार रहे हो कोई
- 57:50अर्थ है या कि तुम पागल हो गए हो? तुम पागल हो के उसकी याद आती है
- 57:58कि नहीं जाती इसको सर्किल में ले लेना बाद को याद आया करती है उसकी
- 58:08इसलिए बाबा को। फ़िक्र इस बात का नहीं है कि मैं
- 58:12उसको भूल गया। बाबा कहते हैं हे वृहद आत्मा मैं
- 58:19तो तुम्हें बोलूँगा ही मैं अलग मैं भूल न हरा तू वक्ष न हरा।
- 58:34तेरे जह मेंनु और न कोई मैं जे हे लखतेनु तेरे जह।
- 58:48मेंनु और न कोई। मैं जे हे लख तै नु जय मेरे बिछू
- 59:01ए हे पुनौंदे। जे मेरे विजय।
- 59:10है व न हूँ दे तू? बख्शिंदा के न हूँ बख्शिंदा के नू
- 59:21रखे चर न दे कॉल मेरा। जी, मेरे विचार बना होते है, तू
- 59:44वक्षेण मैं गुना। मैं वो से भरा हूँ मेरा तिल तिल
- 59:51रोम रोम मैं गुलना कह रहा हूँ और तो भक्षण के संत की पहचान।
- 1:00:08संत डंकू अर्थ होता है जमीन पे गिसटता और अहंकारी व्यक्ति आसमान
- 1:00:18को छूता हुआ अर्श पे इतना फर्क है दोनों में।
- 1:00:28और रात उन्मासी की रात कार्तिक का महीना हवाएं ठंडी चल रही हैं,
- 1:00:37पत्तों की गड़गड़ाहट वातावरण में कुछ महक है।
- 1:00:463 दिन पहले पता चल जाता है व्यक्ति को और 3 दिन बाद तक ये
- 1:00:52घटना होती रहती है। मैंने अपनी बायोग्राफी में जिक्र
- 1:00:57किया कि 3 दिन मेरे साथ ऐसा हुआ। 72 घंटे मुझे बताएंगे।
- 1:01:02उसकी स्मृति आज तक में खोजा लेकिन नहीं खोजे गए ढूंढा लेकिन नहीं
- 1:01:07ढूंढे गए। वो 3 दिन बड़े अहम होते हैं।
- 1:01:13क्यों होते हैं? क्योंकि तुम वही हो जाते हो जो
- 1:01:19विषयों का मालिक। विश्व का संघर्ष है वह वक्षणहार
- 1:01:34वो तारणहार, वो पालनहार, वो मरणहार 3 दिन तुम वही हो जाते हो।
- 1:01:45ठंडी हवाएं, पत्तों की गड़गड़ाहट, हवाओं में कुछ नमी भी है।
- 1:01:55कार्तिक के महीने में हवाएं ठंडी भी हो जाती हैं और केली नदी में
- 1:02:05पांव लटका है। बैठे थे, नानक गायब हो गए।
- 1:02:093 दिन तक पता नहीं लगा, लेकिन 3 दिन के बाद सहसा नदी से बाहर आते
- 1:02:16हैं और उनकी प्रथम दृष्टि पड़ती है मर्दाना पे।
- 1:02:27प्रथम शब्द उनका ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान है सब इंसान मैं
- 1:02:38हैरान कोई पशु अपने आप को मुसलमान ही है तू ने कहती सिखिया ऐसा ही
- 1:02:45ने कहती। यहूदी नहीं कहता कोई पशु पंछी
- 1:02:57नहीं कहता की मैं यहूदी हूँ, मैं हिंदू हूँ, मैं मुसलमान हूँ, उनके
- 1:03:01लिए कोई सेवा ही नहीं कब पाकिस्तान से हिंदुस्तान में आ
- 1:03:05जाएं? उनको पता ही नहीं चलता, लेकिन एक
- 1:03:08मानव मूर्ख ऐसा है कि उससे पता चलता है कि बाउंड्री क्रॉस हो
- 1:03:13गया। कब हिंदू हो गया, कब मुसलमान हो
- 1:03:17गया? वाह बनानक सबसे पहले दृष्टि डालते
- 1:03:23हैं मर्दाना। और थोड़ी सी बात को गहरे में ले
- 1:03:28जाना जो पहली दृष्टि गुरों की पड़ती है।
- 1:03:33प्रबुद्ध व्यक्ति जो ताजा ताजा हो के आया है उसे नदियां में छलांग
- 1:03:37लगा के उसका अमृत रस्पी के जो बाहर आया है, बहुत ताजा है।
- 1:03:42उसने समुद्र पी लिया है। तो ज़रा देखो उसने जिसने समुद्र
- 1:03:45पी लिया है, उसके भीतर कितना रस और झलकता होगा?
- 1:03:50कितने रस का भंडार वो संघ लेकर आए।
- 1:03:52वो प्रथम दृष्टि पड़ी, अपने शिष्य और मित्र मर्दाना के पार निहाल हो
- 1:04:01गया। बस मर्दाना नानक का होके रह गया,
- 1:04:05उससे प्रथम दृष्टि का वर्णन संबोधि के बाद और मर्दाना नानक का
- 1:04:13होके रह गया। श्रद्धा के लिए सेवक नानक के हाथ
- 1:04:18में ही मर्दाना ने प्राण दिए। नर्दा हाँ।
- 1:04:22नानक के होते हुए मर्दाहणानी प्राप्ति है?
- 1:04:33वो रात ऐसी गुजरी वो रात कयामत की रात थी।
- 1:04:44कयामत की रात उनके लिए पाखंडों के लिए कयामत की रात, तुम्हारी थोक
- 1:04:51नाओं के लिए तुम्हारी मान्यताओं के लिए तुम्हारे ब्रह्मों के लिए
- 1:04:56वो कयामत की रात थे। बाबा के रिओ प्रेम और आनंद की
- 1:05:05सौगात थी बाबा उस समर्थ को पीके बाहर आया और उस संदेश को सारी जगत
- 1:05:15में। दूर दूर तर्क फैला दिया।
- 1:05:20संत दो बातें ही बोलता है, संत ही कहता है मैं कहता आंखन देखी तुम
- 1:05:35शास्त्रों की लिखते बताते हो? मैं आंखम देखी कहता तुम कहते
- 1:05:42कागज़ की लेखी और मैं कहता हूँ कहते की संत कहता है, वह है,
- 1:05:54मैंने देखा है बस संत का ये शब्द प्रमाण समझ लेना।
- 1:06:04उसके भीतर से आती हुई करणों की तरंगे तुम्हे छू जाएँगी।
- 1:06:08जब वो बोलेंगे ए एहसास कराएगी तुम्हे, तुम कहती हो पहचान कैसे
- 1:06:15पाएं? क्या तुम ठंडी हवाओं को पहचान
- 1:06:18नहीं पाते? घर में कम से?
- 1:06:20शीतल हवाएं चलती हैं। मौसम आता है वसंत का क्या तुम
- 1:06:30खिलते हुए फूलों को देख नहीं पाते?
- 1:06:33सरसों पे लगे हुए पीले पीले फूल। क्या तुम चलती हुई ठंडी हवाओं को
- 1:06:39महसूस नहीं कर पाते? बस ऐसे ही तुम पहुंची हुए व्यक्ति
- 1:06:44को महसूस करोगे, ज़रा उसके करीब जानवर दूर से बातें न बनाना, उसके
- 1:06:52सान्निध्य को पकड़ना बिल्कुल तुम उसकी मौजूदगी पाओगे।
- 1:06:59यही संत की पहचान जो तुम्हारे हृदय को छू लेगा तो तुम्हारे
- 1:07:09सांसों के साथ तुम्हारे प्राणों में उतर जाएगा।
- 1:07:15उसका आनंद तुम्हारे भीतर तक जाएगा और तुम्हें रूपांतरित कर जाएगा।
- 1:07:26जो नानक नदी में उतरे थे, जो नानक नदी से बाहर आए, दोनों एक नहीं
- 1:07:32थे। एल।
- 1:07:36वह द्विज हो गए थे, उनका जन्म दूसरा हो गया था।
- 1:07:39पहले वाले नानक न रहे, दूसरा जन्म हो गया, द्विज हो गए, दूसरी बार
- 1:07:47जन्म हुआ। एक माता से जन्म मिलता है।
- 1:07:51एक जन्म देता है परमात्मा उसे द्विज्य कहते हैं।
- 1:07:54दूसरी बार जन्म हुआ, नानक द्विज हो गए, पहले वाला गया वह विदा हो
- 1:08:06गया। 1313 से हुई इसकी शुरुआत।
- 1:08:12नवाब दौलत खां के मोदी खाने में अनाज को तोरने का काम करते थे।
- 1:08:22अचानक शक्ति ऊपर से उतरा उसे सतौरी की झलक कहते हैं और सत्य
- 1:08:27ऊपर से उतरा। सत्य क्या था सब मेरा है, यह सत्य
- 1:08:36उतरता है सतोरी की पहली चाट के रूप में सब मेरा है तुम्हारा कुछ
- 1:08:42भी है और यह आया भी उस वक्त। जब झरोखों से बाहर था नान कतुल
- 1:08:54रहे थे 12131313 और ये झरोखा भितरुत 1313 की गिनती तेरे में
- 1:09:06बदल गई 13 सब तेरा सब तेरा। वह उतरा, ऊपर से सब मेरा और बाबा
- 1:09:14बोले सब तेरा वहाँ से होती है शुरुआत जीवन की संतोरिक
- 1:09:22आध्यात्मिकता के जीवन की शुरुआत यहीं से होती अगर तुम्हें यह
- 1:09:27फरमान नहीं आया ऊपर से। तो तुम झूठे और मक्कार तुम लोगों
- 1:09:34को ठग रहे हो बातों से, चालाकियों से शब्दों से, लफ्जी से और ध्यान
- 1:09:45रखना तुम लाग चतुराई कर। सेठ से स्याण अप्पन लाखों वे ताई
- 1:09:49का न चले नार तुम लाखों स्याण पे कर लो, समझदारियां कर लो, तरकीबें
- 1:09:55बरत लो, शतरंज के जाल बिछा लो, लाखों लाखों को चल लो।
- 1:10:03लेकिन तुम्हारी संघ एक भी नहीं जाएगी, मतलब तुम्हारी कामयाबी एक
- 1:10:07भी नहीं होगी। सभी फेल हो जाएंगे, कामयाब क्यों
- 1:10:12नहीं होगी? क्योंकि तुम्हारी सभी सालों में
- 1:10:15द्रव्य मिलेगा, ओहदा मिलेगा, क्षय मिलेगा, रस्न आएगा, आनंद न आएगा।
- 1:10:25और जिसके जीवन में रस नहीं, बाबा नानक ने उस दिन रस पी लिया, वह रस
- 1:10:35तुम्हारे भीतर उतर जाए और जिसने वो रस नहीं पिया।
- 1:10:43सृष्टि का सारा पदार्थ उसके लिए बेकार है।
- 1:10:56तकदीर की में कोई फूलों? डाली से बिछुड़ा हुआ होलू तकदीर
- 1:11:15कि मैं। कोई भूल हूँ।
- 1:11:22डाली से बिछुड़ा हुआ होलो? 713 नहीं, 713 नहीं।
- 1:11:40संघ दुनिया चले भी तो क्या है? एक तोना मिला एक तोना मिला।
- 1:11:59सारी दुनिया मिले भी तो क्या है? मेरा मन्ना खिला, मेरा मन्ना
- 1:12:14खिला। मेरा दिल ना खिला सारी बगिया खिले
- 1:12:24भी तो क्या है एक तू ना मिला? अगर तू न मिला तो सारे संसार के
- 1:12:36पदार्थ में जाएं, तुच्छ भी बेकार है, आज नहीं कल न जाने कौन सा पल
- 1:12:49मौत की अमानत हो और मौत तुमसे छीन लेंगे।
- 1:12:54इकट्ठा करो लेकिन याद रखो वो पल आएगा 1 दिन जब तुम्हारा जिंदगी
- 1:13:04में लिया हुआ सारा श्रेय धुल दूषित हो जाएगा।
- 1:13:07श्रेय लेने वाला ही मिट्टी के उपर दम से घर जाएगा।
- 1:13:15फिर कौन बचेगा? कहाँ गया श्रेय?
- 1:13:20श्रेय लेने वाला ही न बचा क्यों मुड़ता में उलझे हुए हो?
- 1:13:31थोड़ा होश में रहो। बहुत बेहोशी के लम्हों में जी लिए
- 1:13:39थोड़ा होश में आओ, वह याद आता है प्रेसी की तरह याद आता है।
- 1:13:51और जब याद आता है तुम उसे पी लेना, उसे धक्के मत देना, पैसे को
- 1:14:00तो तुम धक्के देते हो नहीं इस वक्त क्यों आ गई?
- 1:14:06अभी तो दफ्तर का काम था। यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ते लेकिन
- 1:14:15परमात्मा को हृदय में बसा लेना तुम क्या बसाओगे वह खुद ही उतर
- 1:14:19जाएगा इतना मीठा है, इतना अमृत है, तुम्हें बसाना थोड़ी ही
- 1:14:23पड़ेगा। नहीं तो अपने भीतर तुम्हारे गहरे
- 1:14:27तलों तक उतर जाएगा। तुम रोक नहीं पाओगे चाहते हुए
- 1:14:29बिना रोक पाओगे और चाहोगे भी नहीं किसने ठुकराया उस अमृत को उसका
- 1:14:36स्वाद ही ऐसा निराला होता है कोई ठुकरा नहीं पाता उसे।
- 1:14:50नॉन बिज़नेस में आने की चेष्टा करो।
- 1:14:55काम धाम तो कभी खत्म नहीं होंगे और तुम्हें पता भी नहीं कब तुम
- 1:15:00धरम से गिर जाओगे और काम धाम करने वाला कोई नहीं बचेगा।
- 1:15:08समझ लो ये मौत न बनाता परमात्मा तुम कहीं के भी नहीं रहते
- 1:15:16अध्यात्मिकता ज़रा भी नहीं आती, धरती पे ये मौत ही है।
- 1:15:22जो तुम्हें आध्यात्मिकता की तरफ खींच लेती है, तुम लाख सपने
- 1:15:28समझोते हो, लेकिन जैसे ही मौत की वास्तविकता तुम्हारे सामने तांडव
- 1:15:33नृत्य करती है, तुम कब बजाते हो? वह वास्तविकता है।
- 1:15:39इट्स ए अल्टीमेट ट्रुथ लाइफ। श्रेय लेने की चेष्टा मत कर अपने
- 1:15:50मुखोटे को सर्वव्यापी बनाने की चेष्टा मत करना, ये सर्वव्यापी हो
- 1:15:55भी नहीं सकता और आखिर में एक बात तुम सर्वव्यापी हो।
- 1:16:03बनाना सर्बव्यापी बनाना एक पागलपन है।
- 1:16:09तुम सर्ब शक्तिशाली हो धन कमाना शक्ति कमाना यह एक मूडता है तुम
- 1:16:16सर्वज्ञ हो सब जानते हो यह सूचनाओं का गर्दा लिवास।
- 1:16:23दिमागों में वरन एक बादलपन है, मेडनेस है, मूर्खता है, मूर्खता
- 1:16:28है, कोई इकट्ठा करना चाहते हो? तुम सूचनाओं को थोड़ा उतरो, भीतर
- 1:16:35तुम पाओगे, तुम सर्वव्यापी पहले से ही तुम सर्वज्ञ पहले से ही हो,
- 1:16:40तुम सर्वशक्तिमान पहले से ही हो। काश मेरी बात तुम्हारे हृदय में
- 1:16:46उतर जाए, तुम्हारा शक सुबह समाप्त हो जाए, तुम उस क्षण में उस वेला
- 1:16:54में उतर जाओ, जो वेला श्रद्धा की वेला कहलाती है।
- 1:17:01यह एक सत्य है जो तुम्हारे अंतःस्थल को छू ले।
- 1:17:051 दिन और तुम्हारा रोमा रोमा खुशबू से भर जाता है।
- 1:17:12इसी कामना के साथ संत जन्म लेता है और इसी कामना के साथ संत विदा
- 1:17:18हो जाता है। धन्यवाद।