Latest / Baba ji Vijay Vats / 13 Nov 25 - कर्म का भ्रम या सत्य? कर्म का असली रहस्य! कर्म, भाग्य या ब्रह्मांड? कर्म का विज्ञान! Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:05प्रफुल्ल चंद्र बाबा आज कर्म की बात एक तरफ़ा हो ही जाए करता
- 0:22मनुष्य। की परमात्मा लोपुत्र आज मैं एक
- 0:31तरफ़ा कर ही देता हूँ, घनी बाड़ हो, इतनी घनी बाड़ या इतना घना
- 0:45तूफान। जिसमें सब कुछ उड़ जाता है, सब
- 0:55कुछ बह जाता है। इतना प्रबल वेग उसमें कितना ही
- 1:03बड़ा तैराक क्यों न हो? एक मुकाम ऐसा आता है।
- 1:14कि वह भी डूब जाता है कितना ही बड़ा तरा कि वह भी डूब जाता है
- 1:25अगर इतना वेग हो तूफान का और बाढ़ का।
- 1:31तो बड़े से बड़े तैराक है, दुख जाया करते हैं, बह जाया करते हैं,
- 1:36उठ जाया करते हैं, मनुष्य करता है, करता तो मनुष्य ही है, पुत्र
- 1:48बिलासक। लेकिन ज़रा सोचो सहज मन से सोचो
- 2:00इतनी वराट सृष्टि और इतनी वराट सृष्टि आपके चारों ओर?
- 2:11और सारी बराट सृष्टि की करणें आप पर पड़ रही है अपने अपने इफेक्ट
- 2:19डैल रही है धरती पे तुम पर। तो क्या अगर सर्कमस्टैंसेस इतने
- 2:35भाई हैं के सारी वृहद संरक्षण उस विराट की संरक्षण उसका कोई और छोर
- 2:47नहीं है बता दो अगर कोई और छोर है तो।
- 2:51और सभी में ग्रैविटेशन है सभी में रेंज है जैसे तुमको ईंट फेंको ऊपर
- 3:021 नीचे आ जाएगी धरती खींचडी। सारी वृहद संरचना का इफेक्ट एक
- 3:10दूसरे पर पड़ रहा है। ऐसे ही दूसरे ग्रहों के लोग भी एक
- 3:15प्रश्न पूछ लेते हैं, लेकिन शांत क्योंकि जानता है।
- 3:27कि बाढ़ इतनी घनी है कि तुम उनसे कॉम्पिटिशन नहीं कर सकते, मुकाबला
- 3:34नहीं कर सकते, लड़ नहीं सकते उन्हें हम कहते हैं
- 3:40सर्कमस्टैंसेस। मनुष्य के ऊपर इतने प्रबल
- 3:49सर्कमस्टैंसेस हैं चारों ओर और यह कोई कल्पना नहीं है थोड़ा जा के
- 3:55देखो। तुम्हारे तथाकथित समझदार
- 4:01वैज्ञानिक से पूछो कि इस सृष्टि का आदि और अंत और मध्य कहाँ कहाँ
- 4:09आगाज़ होती है? कहाँ होता है इसका अंजाम?
- 4:18वो कहेंगे अनंत है, नहीं कहा जा सकता, आइंस्टीन जैसे लोग मरते हैं
- 4:31ही इस नॉट ओनली अननोन ही इस नॉट ओनली अननोन।
- 4:37बट ऑल्सो अननोयबल। यह समर्पण का शब्द नहीं है।
- 4:43क्या वह जाना नहीं गया? ऐसा नहीं है, वह जाना ही नहीं जा
- 4:50सकता ऐसा है और उसका फॉर्मूलेशन ई इज़ इक्वल टु एम सी स्केयर समाज
- 4:56भी मानते हो। और कोई पता नहीं कोई आके इस
- 5:02फॉर्मूलेशन को यूज़ कर दे क्योंकि उसकी संरचना बड़ी बराबर है।
- 5:09बहुत सी संस्थानों ने खोजी कि जो बाद में बेकार से हो।
- 5:16झूठे सिद्धू दूसरे किसी व्यक्ति ने आके उससे ज्यादा बड़ा आविष्कार
- 5:23कर लिया तुम ज़रा सोचो इस वृहद विराट संग रचना का इफेक्ट मानव
- 5:33शरीर के मन पे पड़ता है। घनी बाढ़ आई हो, तीव्र वेग का
- 5:40तूफान आया हो या तुम्हारे ऐसा समझो, हाथों पांवों में जंजीरें
- 5:45बांधती गई हैं तो पुत्र मैं तुमसे पूछुंगा?
- 5:52हाथों में हथकड़ियाँ पांव में भेड़ियाँ वृहद वातावरण की किरणों
- 5:59ने अज्ञात रूप से अप्रत्यक्ष रूप से तुम्हें घेर लिया है जो
- 6:07तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता। संतों को दिखाई पड़ता है।
- 6:15अंधों को दिखाई नहीं पड़ता और अंधा सूझता होगा।
- 6:18ये आँखों वाले झूठ तो नहीं बोल रहे थे नहीं आँखों वाले झूठ नहीं
- 6:24बोलते तुम्हारे पास आँखें नहीं हैं।
- 6:27अंधों के पास आँखें नहीं हैं, आँखों वाले झूठ नहीं बोलते।
- 6:34तुम कहते हो आज मामला खत्म ही हो जाएगा करता कौन तुम करना तो चाहते
- 6:42हो करते भी हो लेकिन अंडर हीज सरकमस्टैंसेस करते हो?
- 6:50तो ज़रा सोच के बताओ क्या तुम करते हो?
- 6:56सारी यूनिवर्स की तरंगें एक दूसरे ग्रह नक्षत्रों पर पड़ती हैं कि
- 7:02नहीं पड़ती हैं एक दूसरी आकाश गंगाओं पर?
- 7:09पड़ती है, नहीं पड़ती है एक स्टार दूसरे पे प्रभाव डालता है नहीं
- 7:15डलता है इतनी वृहद सृष्टि का तुम इतनी जल्दी से निर्णय कैसे कर
- 7:20पाओगे? नहीं तुम निर्णय नहीं कर पाओगे
- 7:26पुत्र। यू विल हैव टू डिफीट तुम्हें
- 7:33हारना ही होगा, मैं तुम्हें डिस्कर्ज नहीं कर रहा हूँ खोजते
- 7:42जाओ खोजते जाओ। बिल्कुल खोजते जाओ क्योंकि
- 7:46तुम्हारा मन कहेगा कोई बात नहीं, आज नहीं, कल सभी कल नहीं, परसों
- 7:51परसों नहीं। नर्सों कभी तो खोज ही लेंगे,
- 7:56लेकिन करते जाओ कोई हरजा नहीं है, लेकिन संत बड़ा समयदार होता है।
- 8:06इसलिए कबीर ने कहा सभी सयाने एक मत संत ही सयाना होता है, मूर्ख
- 8:13अपनों अपनी जो कहता है, मैं करता हूँ वह मूर्ख जो कहते हैं
- 8:20सर्कमस्टैंसेस के अधीन। आदमी कर कैसे सकता हूँ?
- 8:26ये देखो तुम जेल में बंद हो सर्कमस्टैंसेस ने तुम्हें बंद कर
- 8:32रखा है क्या तुम भाग सकते हो? तुम तिहाड़ जेल के भीतर बंद हुए
- 8:41क्या चांदनी चौक के दर्शन कर सकते हो?
- 8:43घूम फिर सकते हो चाहते हो सकते हो तुम, लेकिन क्या तुम कर पाओगे बस
- 8:54ऐसी ही मानवता की मनुष्य की जनगानी?
- 9:00तुम्हारा सवाल उठाना बिल्कुल जायज है बुद्र लेकिन सवाल का जवाब भी
- 9:07मैं तरीके से दे रहा होता है। अगर ये ब्राह्मण नहीं है तो बताओ
- 9:19अगर ये ग्रह तारे नक्षत्र नहीं है तो बताओ अगर तुम नहीं हो तो बताओ
- 9:24अगर इनका इफेक्ट नहीं पड़ता है तो भी बताओ क्या सूरज का इफेक्ट नहीं
- 9:30पड़ता? सूरज की मौजूदगी में सभी पौधे
- 9:34अपना खाना बनाते हैं। क्लोरफेल।
- 9:38सूरज की मौजूदगी से जीवन है तो फिर जीवन तुम्हारे हाथ में कैसे
- 9:47जीवन सूरज के हाथ में हुआ ना जीवन सूरज के हाथ में।
- 9:55तो वह वनस्पतियां को उगाता और बढ़ाता पानी के हाथ में, धरती के
- 10:00हाथ में तुम्हारे हाथ में क्या है जब जीवन सूरज के हाथ में, पानी के
- 10:10हाथ में, धरती के हाथ में? और तुम उसी वनस्पति को खाकर या
- 10:17भोजन करके उसी का तुम बड़े होते हो ग्रह करते हो फिर यह तुमने
- 10:24किया कि प्रकृति ने किया तुम माँ के पेट में।
- 10:33पले बढ़े पिता के स्पर्म में माता के अंडाणों में तुम इन वनस्पतियां
- 10:43से ही बढ़े, पले जा के तुमने अपने प्रयास से खुद को पैदा कर दिया।
- 10:51सैब हम तुम नहीं हो, तुम अपने आप से नहीं पैदा हुए, तुम दूसरों की
- 10:58पैदाइश हो। माँ और बाप के मिलन से तुम पैदा
- 11:01हुए और फिर तुम बाहर आये जब पेट में गर्भ में गए, तुम कितने थे
- 11:10दिखाई भी नहीं पड़ते थे। फिर तुम जब बाहर आये तुम्हारा
- 11:15वज़न था 234 किलो, फिर तुम बढ़ते चले गए।
- 11:19यहीं की वनस्पतियां वगैरह खाके वनस्पतियां खाके ही भैस गायें दूध
- 11:26देती वही दूध पी लो या वनस्पतियां खा लो, फल फ्रूट खा लो।
- 11:31लेकिन है तो प्रकृति की देन ही तुम्हारा जीवन प्रकृति के ऊपर
- 11:37निर्भर है, तो तुम स्वतंत्र कैसे हो?
- 11:40वे कर्म करने में बहुत सी बातों पे बहुत सी सरकमस्टैंसेस पर तुम
- 11:47निर्भर करते हो, तुम्हारा जीवन निर्भर करता है।
- 11:52कोरोना में लोगों को ऑक्सीजन नहीं मिली, मर गया क्या तुम स्वतंत्र
- 11:57हो जीने के लिए सोच के बताना कोरोना में ऑक्सीजन के बिना तुम
- 12:07मर गए, तुम कहते हो की हम ऑक्सीजन बना सकते थे।
- 12:10तो बना लेते, फिर भी तो तुम मरते हो करोना, कोई रोज़ आता नहीं फिर
- 12:16भी तुम मरते हो लेकिन जीते हो तुम प्रकृति के कारण सर्कमस्टैंसेस।
- 12:26के कारण तुम जीते हो और सर्कमस्टैंसेस के अधीन बहुत सी
- 12:32अज्ञात करणें तुम पर लगातार बढ़ रही है, निरंतर बढ़ रही है उसी के
- 12:40कारण तुम्हारा जीवन है और उसी से प्रभावित होकर तुम कर्म करते हो।
- 12:45तो वह क्या कर्म स्वतंत्र है? मुझे ये बताओ पहले जो कर्म जो
- 12:52मनुष्य का कर्म सर्कमस्टेंसर पर आधारित है, क्या वह स्वतंत्र कर्म
- 13:05है? अनेकों वर्षों से तक ब्राह्मणों
- 13:14ने तथाकथित शूद्र जाति को नीच कहकर ठुकरा दिया, उसे कर्म नहीं
- 13:21करने दिया। शास्त्र ने पढ़ने दिया, विद्या से
- 13:25वंचित रखा किसका कसूर सर्कमस्टैंसेस जो ब्राह्मणों ने
- 13:35उपजाए पराधीन हो गए ना? क्या जिसे तुम शूत्र कहते हो?
- 13:43वह कर्म करने में स्वतंत्र थे बताओ नहीं थे भाई?
- 13:50क्योंकि बाहर की व्यवस्था 51 उन्नंजा लोकतंत्र जिसकी ज्यादा
- 13:58संख्या लोकतंत्र में यही तो गलत है, जिसके पास दो वोट ज्यादा गए,
- 14:10वह जीत गया और बाकी 49 क्या करेंगे?
- 14:13वो तो हार गए। लोकतंत्र कैसे हुआ?
- 14:18सभी के साथ न्याय कैसे हुआ? सबका साथ और सबका विकास कैसे हुआ?
- 14:27ऐसा ही ये श्रेष्ठ है तुम्हारे कर्म तुम्हें तो पता भी नहीं है।
- 14:35न जानी किन किन परिस्थितियों से प्रभावित हैं हर पल हर घड़ी सोए
- 14:41जागते दिन रात हर वक्त, हर घड़ी, हर पल अज्ञात करने विश्व ब्रहमंड
- 14:51की तुम्हारे ऊपर पड़ रही है। और तुम्हारे जीवन को प्रभावित कर
- 14:56रहे हैं और जीवन जब प्रभावित होगा तो निश्चित रूप से कर्म भी
- 15:02प्रभावित होगा। ज़रा सोचो एक व्यक्ति जहर खा लेता
- 15:09है, जहर प्रकृति का है। क्या वह उसी भाँति कर्म कर सकेगा
- 15:17जो जहर खाने से पहले कर रहा था? फिर वह स्वतंत्र कैसे हुआ?
- 15:24तुम्हें क्या पता कौन सी रेंज जो तुम्हारे ऊपर क्या गिरती है, कब
- 15:29गिरती है? कौन सी चीज़ तुम बे मेल खा लेते
- 15:34हो और वह आपसी रिएक्शन कर जाती है?
- 15:36बेहतर जाके तुम्हें पता है नहीं पता तुम्हें करते तो तुम हो।
- 15:47लेकिन परिस्थितियों के अधीन करते हो तो फिर तुम स्वतंत्र कैसे हो?
- 15:56इसलिए कृष्ण ने बड़ा प्यारा शब्द कहा कर्म में वाद कर से कर्म कर
- 16:03लेकिन कर्म परिस्थितियों के अधीन ही करेगा तू।
- 16:06कृष्ण जानते हैं, अच्छी तरह परिस्थितियों के अधीन ही करना
- 16:10होता है। जब हाथों में हथकड़ी हो, पांव में
- 16:14बड़िया हूँ और साथ में हथकणियों के साथ पुलिसवाला हथकड़ियों को
- 16:20साथ लेकर चल रहा हूँ तो तुम स्वतंत्र कहाँ हो गए?
- 16:24तुम भागना तो चाहते हो, लेकिन भागोगे कैसे भागोगे?
- 16:32तुम कर्म तो करते हो, बिलकुल करते हो, लेकिन कहाँ करते हो तुम सारी?
- 16:42विराट? व्यवस्था, ग्रह, तारे, नक्षत्र,
- 16:48उनकी ग्रैविटेशन फोर्स, उनकी अज्ञात रेंज तुम्हारे ऊपर निरंतर
- 16:54वर्ष रही है तो तुम स्वतंत्र रहे, कैसे गए?
- 16:59तुम परतंत्र ही हो गए? तुम पुत्र स्वतंत्र हो ही नहीं,
- 17:06इसलिए ये बात का स्वाद ही नहीं कि हम करते कौन करता है।
- 17:10इसलिए संतों ने कहा तुम परिस्थितियों के अधीन होकर कर्म
- 17:15करते हो, परिस्थितियों से बाहर हो के तुम कर्म कर ही नहीं सकते।
- 17:21हाथों में जंजीरें हैं, पांव में बैड़ियां हैं, हाथ पढ़ियां हैं,
- 17:30कैसे बाग सकते हो, तुम नहीं बाग सकते, फिर तुम कर्म करने में
- 17:35स्वतंत्र हुए भी कैसे लाख सोचो तुम कुछ कर्म करने की?
- 17:40यह बंधन अड़े आ जाते हैं। यह तुम्हारे ऊपर अनंत अरबों खरबों
- 17:46असंख्य गृह तारे नक्षत्र इन पिंडों की बरसती हुई।
- 17:53रेंजेस तुम्हें कहाँ कर्म करने में स्वतंत्र छोड़ती हैं?
- 18:00इसलिए संतों ने कहा तू कर लेकिन पुत्र तू कर नहीं सकेगा क्योंकि
- 18:10सभी कर्म तेरे बाहर की परिस्थितियों पर निर्भर होंगे।
- 18:19इसीलिए? फिर तो दुखी होगा तो मनवांछित
- 18:24परिणाम नहीं आएँगे, फिर तो दुख ही होगा।
- 18:27तो संतों ने एक फॉर्मूला से इचात किया कि फिर जब तू कर ही नहीं
- 18:32सकता तो फिर जो होता है उसे होने दे।
- 18:41और परिणामों को पूर्ण हृदय से स्वीकार करना है।
- 18:47एक मात्र रास्ता है सुख पूर्वक अपनी छोटी सी जिंदगानी को झेलेगा
- 18:53जिंदगी बहुत बड़ी नहीं है। तुम मानते हो कि ज़िन्दगी बड़ी है
- 18:59लेकिन बहुत छोटी है ज़िन्दगी और इतनी छोटी है कि तुम सोच भी नहीं
- 19:07सकते तुमने बड़ी जिंदगानी को भी देखा है, बड़ी जिंदगानी तुम्हारे
- 19:14भीतर बैठी है। जो असंख्य वर्षों से जिंदगानी है
- 19:23कल भी थी आज भी है कल भी वो है जिंदगानी ये तुम्हारी कोई
- 19:30जिंदगानी है या माटी का पुतला। ये पंचभौतिक शरीर ये कोई जिंदगानी
- 19:36है, ये तो जड़ है उस भीतर बैठे जिंदगानी के कारण ही ये
- 19:41क्रियान्वित है। जब उससे संपर्क टूट गया तो फिर
- 19:47तुम आंख भी न फर्क पाओगे। तुम स्वतंत्र हो।
- 19:56तो संतों ने यह कहा कि तुम कुड़ोगे क्योंकि फल तुम्हारे मन
- 20:03अपेक्षित परिणाम नहीं आएगा, तो तुम कुड़ोगे तो संतों ने एक
- 20:07फॉर्मूलेशन कहा होने तो जो होता है।
- 20:11और उसके होने को स्वीकार कर लो। जो भी परिणाम आए वो अच्छा या बुरा
- 20:16उसको स्वीकार कर लो। तुम सुखी जीवन को व्यतीत कर लोगे,
- 20:22बस यही तुम कर सकते हो। अगर भाग्यशाली हो तो?
- 20:29अन्यथा तुम जोड़ोगे झगड़ोगे इस विराट के साथ झगड़ा करना संभव है।
- 20:35क्या इस विराट के साथ झगड़ा करना संभव है?
- 20:40क्या नहीं संभव है, असंभव है यह विराट तो रोज़ भेजता जाता है।
- 20:51इसलिए तुम करते तो हो बेटा, लेकिन एक मायने में अंडर सर्कमस्टैंसेस
- 20:59करते हो बंदे बंदे करते हो और बंदे बंदे करते हुए।
- 21:04कोई करना नहीं होता। स्वतंत्र नहीं होता तो मैं
- 21:07स्वतंत्र नहीं हूँ करने के लिए क्योंकि अंडर सर्कमस्टैंसेस
- 21:12परिस्थितियों के अधीन करना भी कोई स्वतंत्र करना होता है।
- 21:17परिस्थितियों के अधीन करना तो करना होता है और फिर वो करना कैसे
- 21:23रह गया? जो प्रतंत्र है, इसलिए संत तुम्हे
- 21:28सीधी सीधी सरल बात समझाते हैं, ज्यादा पचड़े में न पड़ो, संत सब
- 21:34देख चुका होता है, पता पता छान चुका होता है।
- 21:42सब खांके उसने छान ली है, सब गले कूचे उसने खंगाली है और पाया कि
- 21:51मनुष्य करता तो है लेकिन प्रस्तुतियां के अंडर करता है।
- 21:56फिर वो स्वतंत्र कैसे होगा जैसे तुम्हारे हाथ पांव बंदे हो।
- 22:01और फिर भी तुम कुछ तो कर सकते हो, बस उतना ही कर सकते हो।
- 22:06फिर क्या खाप कर सकते हो? फिर ज्यादा गुमान मत करना करके
- 22:12दिखाएंगे। यह व्यर्थ समय बकवास है, कुछ नहीं
- 22:17करके दिखा सकते तुम। करने वाले ने कर दिया।
- 22:24ये सारा संसार बना दिया, उसने कर के दिखा दिया तुम क्या खा कर के
- 22:30दिखाओ जूं जूं विज्ञान तर्की कर रहा है।
- 22:40जानकर है ना, हैरान हो गए, मनुष्य दुखी हो रहा है, आज तुमने एटम की
- 22:47खोज कर दिया। तुम बहुत खुश हुए, लेकिन खुशी तो
- 22:52तब थी। अगर तुम उस एटम से रचनात्मक काम
- 22:56लेते, कंस्ट्रक्टिव तुमने उसे डिस्ट्रक्टिव काम दिया है।
- 23:01एटम बम बना लिया जो विध्वंस से कर सकता है और सारी दुनिया कप रही
- 23:07है। हर वक्त ज्याना मुखी के ऊपर जैसे
- 23:11व्यक्ति बैठा हुआ कंपता और मुझे बता दो ज़रा सोच के क्या यह हर पल
- 23:18का कप्पना और कम से कम से जीना भी कोई जीना होता है?
- 23:25तुम जी रहे हो, वास्तव में नहीं कहाँ जी रहे हो?
- 23:31जैसे जैसे खोजती जा रही है साइंस नई नई को तुम मात्र सुविधाएँ जुटा
- 23:39रहे हो, सुख हो रहे हो, सुख की नियुक्ति तो कांप रहे हो और
- 23:45कांपने में दुख होता है, तुम कांप रहे हो।
- 23:50एटम तुमने खोज लिया लेकिन एटम बम की दहशत तुम्हें डराती है, कंपाती
- 23:57है रात को चैन से सो नहीं सकते तुम इसे जंदगानी कहते हो तुम
- 24:06जिंदगी तो वो है जो घोड़े बेच कर रात को सो जाओ मज़े से।
- 24:10आज वो नींद कहाँ रह गई? आज वो नींद नहीं है जो हजारों साल
- 24:16पहले जब साइंस इतनी ज्यादा विकसित नहीं थी, साइंस ने तुम्हें
- 24:23सुविधाएं भी हैं जीवन का आनंद छीन लिया।
- 24:31मज़ा था उससे जयंतगानी में जब कोई भय न था, आज तुम एसी के नीचे बैठे
- 24:41हो, पंखा चल रहा है तुमने सबको गुलाम बना लिया।
- 24:47पवन को गुलाम बना दिया, पंखा तुम्हें हवा दे रहा ऐसी तुम्हें
- 24:53ठंडी हवा दे रहा हीटर तुम्हें गर्म हवा दे रहा लेकिन मन
- 24:57तुम्हारा कप रहा है, डर रहा है ये कोई ज़िन्दगी है।
- 25:09यह भी कोई जिंदगी है? कंप कंप के जिंदा, तुम जेल नहीं
- 25:13जाना चाहते तुम कंपते हो क्यों? क्योंकि तुम बंधन में नहीं रहना
- 25:19चाहते और इतने गृह तारों विशाल सृजना का।
- 25:26जो तुम्हारे ऊपर प्रभाव पड़ता है बंधनों का, वो तुम्हें मालूम ही
- 25:31नहीं है वो तुम्हें दिखता ही नहीं उससे बड़ा बंधन और तो कोई होता ही
- 25:38नहीं इतनी वराट संचार, उसका फैलाव उसका।
- 25:45वह विशाल, लगातार सभी तरंगे फेंक रहे हैं।
- 25:49चौबीसों घंटे और तुम्हें इसका पता भी नहीं है।
- 25:53तुम कहते हो मैं करता हूँ करते तो हो भाई पर उतना सा करते हो जितना
- 26:01बस हाथ पांव में बंधे हो। हथकड़ियों और बेड़ियों से और जेल
- 26:07की कैद के अंदर तुम बंद हो। तुम उतना कर सकते हो जितना के
- 26:12वहाँ कर सकते हो। बस इतना सब हमारे हाथ में है,
- 26:16इसलिए संत कहते हैं के मज़े से जीओ, ये दो पल की जिंदगी है।
- 26:22मज़े से जी लो आनंद से जी लो, तुम्हें पता ही नहीं कि तुम
- 26:31स्वतंत्र नहीं हो, उस होने को मान लो, यह सही है, जागकर देखो तुम
- 26:41सोये सोये मत रहो। संत जाग जाता है तो तुम कहता है
- 26:47कि नहीं, तुम कर्म करने में स्वतंत्र हो नहीं पाई।
- 26:52स्वतंत्रता 100% होती है और तुम तो बा मुश्किल 2% ही स्वतंत्र हो
- 27:0098%। समाज के बंधन, नियम, कानून के
- 27:05बंधन, सर्कमस्टैंसेस के बंधन परमात्मा के बनाए हुए इन गृह
- 27:11कार्य नक्षत्रों के बंधन फिर कौन करता है?
- 27:13बताओ जिसने ये गृह कार्य नक्षत्र बना दिए वही तो करता है।
- 27:20वही तो तुम्हें सर्कमस्टैंस देता है, वही तो तुम्हें वातावरण देता
- 27:25है, उसी के अधीन तुम्हें काम करना पड़ता है।
- 27:29फिर तुम स्वतंत्र कैसे रह के स्वतंत्र तो तब होते अगर किसी
- 27:36बाहरी चीज़ का तुम्हारे ऊपर प्रभाव न हो तो?
- 27:39लेकिन यहाँ तो अनंत अनंत चीजों का प्रभाव है।
- 27:44तुम्हारे ऊपर तुम्हें पता नहीं है।
- 27:47आज से जो आकाश गंगा करोड़ वर्ष पहले लुप्त हो गई, उसका प्रकाश
- 27:53तुम पर अभी आकर तुम्हें बाधित करेगा।
- 27:59और वह आकाश गंगा कब की खो गई, लेकिन वहाँ से चला हुआ प्रकाश और
- 28:06उसकी किरणें करोड़ों अरबों सालों बाद जब हमारे पास आएंगी तो इफेक्ट
- 28:13डालेगी। तुम्हें प्रभावित करेगी, तुम्हारे
- 28:17कर्मों को प्रभावित करेगी तो तुम स्वतंत्र रह कैसे गए?
- 28:24नहीं, तुम स्वतंत्र नहीं हो, तुम बस इतना सा काम करते हो इससे
- 28:29ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। इसलिए कृष्ण ने कहा, ठीक तुम काम
- 28:35करो, कर मनने वाध का रस्ते तुम्हारा अधिकार है, मन के बहलाने
- 28:40को ग़ालिब ले ख्याल अच्छा है कर तुम कुछ नहीं कर सकते हो बस यही
- 28:46कर सकते हो गतियों पर बैठ सकते हो झूठ का फर तूफ़ान तुल के।
- 28:52लेकिन उससे सुख मिलता है, मिलता है सुख किसी को मिला है।
- 28:59अगर सुख वास्तव में मिल गया होता तो एक एकांत कोठड़ी में बैठा ना
- 29:04होता, उसकी वासनाई ना खो गई होती, उसकी चाह ही ना मिट गई होती।
- 29:11उसकी जीवेशनक हो गई होती। अगर अभी भी जीवेशन बाकी है तो
- 29:17उसने क्या खाक भोंगा क्या खाक रिसाल्ट निकाला नहीं, नहीं तुम
- 29:23करने में स्वतंत्र इतने से हो कि उससे तुम तृप्त नहीं होते।
- 29:31शांत करने में स्वतंत्र है, यह बड़ी शानदार बात है अपने भीतर
- 29:37उतरो, उस जगह पहुँच जाओ, जहाँ तुम सब कुछ करने में स्वतंत्र हो
- 29:43जाओगे, वह जीवन का तत्व। जो तुम्हारी इस स्मृता जड़ शरीर
- 29:49को चेतन करता है, उसके पास पहुँच जाओ।
- 29:53तब तुम करने में स्वतंत्र हो। वास्तव में उससे पहले तुम
- 29:57स्वतंत्र ही हो। मेरी बात थोड़ी गहरी है, लेकिन
- 30:01उसको बार बार सुनना तो तुम्हें समझ आएगी तो तुम स्वतंत्र अभी तो
- 30:06नहीं हो। लेकिन स्वतंत्र हो सकते हो, उसे
- 30:10ही हमारे शास्त्रों में मुक्ति का शब्द दिया गया।
- 30:16उसे ही मुक्ति कहा गया। उसे ही मोक्ष कहा गया।
- 30:24वहीं जाकर तुम मुक्त हो सकते हो। वहीं जाकर तुम्हारी बेड़ियां
- 30:27खुलती हैं, वहीं जाकर हथकड़ियां और पांव की बेड़ियां खुलती हैं,
- 30:33उससे पहले नहीं खुलती। उससे पहले तुम लाख कोशिश कर लो।
- 30:37इस हालत में तुम मुक्त नहीं हो, नहीं हो नहीं हो।
- 30:43जहाँ मुक्त होगे वह तुम्हें रास्ता बता दिया है मुक्त होगे
- 30:48तुम अपने अंदर जाकर शांत हो जाओ सुबह उठो ऑक्सीजन ग्रहण करो, खूब
- 30:58प्राण दाई वायु ऑक्सीजन नेटेड हो जाओ।
- 31:02दिन भर काम करो, ध्यान में बैठो, ध्यान में बैठने का मतलब तुम कुछ
- 31:12न करो, आराम से बैठ जाओ, कुछ न करो, मन चलेगा चलने दो।
- 31:22चलते हुए देखो एक भक्त आएगा जब मन चल चित्र की तरह फ़िल्म की तरह
- 31:28मूवी की तरह तुम्हारे सामने चलेगा, लेकिन उसके साथ तुम एकाकार
- 31:33तदात में मत साधना तादात में साधोगे तो फिर वही जिंजाल में पड़
- 31:39गए। तुम जानो।
- 31:41कि यह एक मूवी है। 2 घंटे के बाद खत्म हो जाएगी,
- 31:45द्वार खुल जाएंगे, हम सिनेमा हॉल से बाहर चले जाएंगे।
- 31:56तुम देखते हो सिर्फ जहाँ जाकर मात्र तुम साक्षी रह जाते हो,
- 32:02ऑब्जर्वर रह जाते हो? वहीं जाकर तुम स्वतंत्र होते हो
- 32:07मात्र वहीं होती है मुक्ति उसी को कहते हैं समाधि वहीं तुम्हारी सभी
- 32:14समस्याओं के होंगे समाधान वहीं बरसेगा आनंद वहीं बरसेगा खुमार
- 32:21वहीं तुम झूमोगे नाचोगे गाओगर वहीं सच्चा।
- 32:26यहाँ तो तुम तुम्हे कोई खुशखबरी मिल जाती है तुम नाचते हो, लेकिन
- 32:30कितनी देर के लिए नाचते हो एक ऐसा भी सुख है जीसको पाने के बाद तुम
- 32:39सदा के लिए नाचते ही रहते हो नाम कुमारी नान का चढ़ी रहे धनरा।
- 32:45एक ऐसा भी आनंद है एक यहाँ का भी आनंद है तुम्हें किसी ने कोई
- 32:51अच्छी खबर सुना दी तुम्हारे मानो अनुकूल सुना दी तो तुम खुश हो गए।
- 32:56छलांगें लगाने लगे, अहंकार में फूल गए, कुप्पा हो गए।
- 33:03लेकिन घड़ी दो घड़ी की हैं फिर वो ही शान, फिर वो ही गम फिर वो ही
- 33:18तनहाई। मन को बहलाने तेरी जात चली आई है,
- 33:28फिर वो ही गम फिर वो ही शान, फिर वो ही तन्हाई है, मन को बहलाने
- 33:40तेरी जात। चल भाई अगर मन को बहलाना है तो
- 33:46उसकी याद में चले जाओ अपने भीतर उसमें डूब जाओ उस रस में ओत वरोत
- 33:54हो जाओ, गच मच हो जाओ तो तुम पाओगे असली सुख।
- 34:01अभी के सुख असली नहीं है, ये नकली प्रोजेक्ट के फूल है।
- 34:07जब तक मन ना भरे जाग ना खुले कि यह नकली है तब तक तुम भौंकते ही
- 34:15रहोगे। जीस दिन जाग खुलेगी पता चलेगा।
- 34:19यह फूल प्लास्टिक के हैं। इनकी खुशबू अपनी नहीं यह फैक्टरी
- 34:25में बनी है और यह खुशबू भी हमने बाहर से बनाई है।
- 34:30उस दिन तुम जाग जाओगे, फिर तुम्हें असली फूल मिलेंगे।
- 34:37असली बहार आएगी तुम्हारे जीवन में और उसे ही मैं कहता हूँ आनंद और
- 34:44वो ही है मोक्ष तुम्हारे ऊपर कोई बंधन नहीं होगा, समग्र सृष्टि
- 34:51बरसेगी, फिर भी। लेकिन तुम्हारे ऊपर उसका कोई
- 34:58इफेक्ट नहीं होगा। इफेक्ट लेस लेस की पोज़ीशन में आ
- 35:02जाओगे जैसे तुम बारिश में ओवर कोट पहन लेते हो।
- 35:07वॉटरप्रूफ फिर बारिश के अंदर मज़े से चलते हो, बस वहाँ वॉटरप्रूफ।
- 35:14कबच्च तुम डाल लेते हो, वह जलता नहीं कटता नहीं, गलता नहीं, सूखता
- 35:21नहीं, आनंद है, अजहर है, मरता नहीं जलता नहीं, अजहर है, अमर है
- 35:29नैनम छिद्दीन तीर्थ त्रावण नैनम दाह दी भावका।
- 35:34नै चैनम के लिए दन्त्यापुर नैशुर स्थिति मारू ताहा फिर तुम सारे
- 35:40प्रयास छोड़ देते हो गद्दियों को कमाना, धन को कमाना, जमीन
- 35:46जायदादों को कमाना ये जमीन जिन पर आज तुम्हारी मलकियां तुम्हारा नाम
- 35:50लिखा है पटवारी ने फर्द में। इससे पहले हजारों लाखों लोगों के
- 35:55नाम थे। तुम्हें पता नहीं तुम आज खुश हो
- 36:00चले हो के मेरे नाम हो गयी तुम्हारे नाम क्या खाक रह गया?
- 36:042050 साल के लिए मन का धोखा है ये ये धोखा है।
- 36:12लेकिन वहाँ जाओ जहाँ जाकर सभी तमन्नाएं खत्म हो जाती है,
- 36:20वासनाएं खत्म हो जाती है, विचार खत्म हो जाते हैं, विषय खत्म हो
- 36:27जाते हैं, वहाँ मिलता है सही समर्थन।
- 36:33फिर तुम भटकते नहीं गद्दियों के लिए धन के लिए पैर पूजने के लिए
- 36:43सुंदर चीजें देखने के लिए भोगने के लिए पहनने के लिए खाने के लिए।
- 36:50तुम भटकते नहीं, वहाँ पहुँच जाओ हंसा पायो, मानसरोवर हंसा पायो।
- 37:13मानसरोल ताल तलीया क्यों डोल? मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल मन
- 37:38मस्त हुआ फिर क्यों बोल हंसा पायो।
- 37:48मानसरोवर तेरा साहब हैं तुझे माँ तेरा साहब।
- 38:08है तुझ माँ मृगवा बन बन क्यों डोल मृगवा बन बन क्यों डोल मन मस्त
- 38:26हुआ? फिर क्यों बोले मन मस्त हुआ, फिर
- 38:34क्यों बोले धन्यवाद?