Latest / Baba ji Vijay Vats / 25 Jul 25 - ध्यान करते समय घटने वाली अनोखी घटना | ध्यान के गुप्त सूत्र! Ramkrishan & Vivekanand Story.
Transcript
- 0:02बाबा जी प्रणाम पिछले दिनों आप राम किशन परमहंस और विवेकानंद की
- 0:15जीवनी की अहम घटना सुनार रहे थे। राम किशन पर मंस विवेकानंद के सर
- 0:27पे हाथ रखते हैं, शक्तिपात करते हैं।
- 0:35विवेकानंद अपने भीतर उतरना शुरू कर सकते हैं।
- 0:41एक मुकाम पे जाके विवेकानंद चिल्लाते हैं स्वामी जी, मेरे माँ
- 0:53बाप भी हैं, भाई बहन भी है। और विवेकानंद के सिर के ऊपर से
- 1:04हाथ उठा लेते हैं रामकृष्णा परमहंस आपके श्री मुख से निकले
- 1:17हुए ये वचन। कि मुझे इस बात की समझ नहीं आई
- 1:27क्यों राम किशन परमहंस ने ऐन वक्त पर शक्तिपात करना रोक दिया?
- 1:41फिर उन्हें क्या करना चाहिए था? हमारे पूछने का विपय सिर्फ यही
- 1:47है, जाने अनजानी ऐसी घटना हमारे साथ हो जाए तो हम क्या करें?
- 2:00प्रदुमन प्रश्न बहुत अच्छा किया बेटा क्योंकि ऐसी घटना गुरु के
- 2:12बिना भी हो सकती है। कैसे?
- 2:21जैसे तुम एकांत में बैठे हो, कुछ न करने के मूड में हो, खाली बैठे
- 2:31हो तो मैंने आपसे कहा। जब तक आप बीज़ी हैं, आप व्यस्त
- 2:40हैं, वह प्यारा नहीं आता, वह मात्र तभी आता है जब आप अव्यस्त
- 2:53होते हो। और अव्यस्तता के क्षण किसी भी
- 3:00व्यक्ति में, किसी भी वक्त, किसी भी स्थान पर हो सकता है।
- 3:09किस घड़ी में तुम बैठे हो तुम्हारे चित का आकाश।
- 3:18खाली हो गया कोई मेघना बचा न श्वेत, न कला कुछ न बचा तुम्हारा
- 3:33चित का आकाश। निर्मल और खाली हो गया।
- 3:40ये घटना तुम पे भी घट सकती है और बिना गुरु के भी घट सकती है।
- 3:45गुरु की गैरमौजूदगी में भी घट सकती है।
- 3:58आपने पूछा क्या करना चाहिए था? श्री राम किशन परमहंस को इसी
- 4:09अवस्था में आकर्षक पुकारना है और। इसी अवस्था में आके विवेकानंद ने
- 4:18पुकार रहा स्वामी जी मैं गया मेरे माँ बाप भी हैं, ये घटना तुम पर
- 4:33भी गड़ सकती। क्योंकि तुम जब साधना करते हो तो
- 4:41किसी भी क्षण उस निष्क्रिय मोड में उतर सकते हो।
- 4:47हम जहाँ। कुछ परिश्रम नहीं होता।
- 4:56सारी दुनिया परिश्रम हीनता की अवस्था में सोई पड़ी होती है।
- 5:03तुम निर्लिप्त मेघ शून्य, चिराग से घृण होते हैं।
- 5:14वहचित की निर्मल खाली अवस्था किसी पर किसी घड़ी की आ सकती है।
- 5:24जरूरी नहीं कि तुम। ध्यान की अवस्था में ही हो।
- 5:33तुम कुछ नहीं करते हो, बस इतना काफी है कुछ नहीं करते।
- 5:46वक्त तुम्हारा चित कोमल होता है। और चित्र का आकाश मेघ शून्य होता
- 5:59है, वह आच्छादित नहीं होता किसी प्रकार के विचार भावनाएँ।
- 6:13अनुपस्थित हैं। इस वक्त वह कोई नहीं है।
- 6:19मातृचेतना के सिवा सिर्फ चेतना साक्षी समग्र रूपे।
- 6:32और तुम्हारा निर्मल चित्र कोई शोर नहीं, विचारों का कोई शोर नहीं
- 6:43भावनाओं का एकदम से खा लिया। कहीं ढलते सूरज की छाँव में,
- 6:55अकेले बैठे हुए किसी खेत खलिहान में, अपने कमरे में, अपने घर की
- 7:05छत पर। अपने बगीचे में टहलते हुए ये घटना
- 7:14तुम्हें भी घट सकती है। ये किसी की भभौती नहीं है विशेष
- 7:20व्यक्ति की। यह तुम्हारी भी बिपौती बन सकती
- 7:28है। इसलिए ध्यान रखना इन शब्दों को
- 7:33सभी व्यक्तियों को सुन लेना चाहिए और जरूरी नहीं।
- 7:36वह क्या मानता है, क्या नहीं मानता है।
- 7:41वह आस्तिक है, वह नास्तिक है। वह क्या करके आया है ये भी कोई
- 7:49जरूरी नहीं है। बस सिर्फ उसके चित्त की दशा मेघ
- 8:00आच्छादित ने। मेघ शून्य खाली तुम हो और वह परम
- 8:13चेतना है, यही मौका है तुम हो। और वह परम चेतना है, लगातार
- 8:24तुम्हें निहारती हुई हर वक्त जो तुम्हारे भीतर दिया जलता है
- 8:30शाक्षित्व का, वो तुम उसे देख रहे होते हो।
- 8:41वह साक्षी लगातार निरंतर तुम्हें निहार रहा होता है।
- 8:47श्रद्धा की भांति बस यही क्षण आ गया तब डर लगेगा।
- 9:00पहली दफ़े तुम अपने भीतर खींच लिए जाओगे, एक अज्ञात शक्ति फोर्स ऑफ
- 9:09ग्रेविटेशन की तरह तुम्हें अपनी तरफ खींची और तुम तेजी से उस तरफ
- 9:15जाते हुए महसूस करोगे, अपने आपको तुम डर जाओगे।
- 9:21क्योंकि जब भी कोई नया घटता है तुम्हारे भीतर और पहले से नहीं
- 9:27घटा होता तो तुम उस अनुभव से डर जाती हो।
- 9:32यह मनुष्य का स्वभाव है। तुम डर जाओगे डर कर तुम छर ला भी
- 9:46सकते हो, विवेकानंद की तरह तुम पुकार भी कर सकते हो कोई बचाव मैं
- 9:55तो गया। बस इसी घड़ी में पहुंचे थे
- 10:04विवेकानंद और इसी घड़ी की आवश्यकता होती है इसी घड़ी का
- 10:08इंतजार होता है गुरु को और इसी घड़ी में जरूरत होती है शिष्य को
- 10:16गुरु की। जब गुरु आके उसे थाम ले गुरु उसको
- 10:25डाईड से बंधाये पुत्र गबराओ यह वेरा घबराने की नहीं?
- 10:38यह वेला तो तुम्हें भर्म सुपदाई केंद्र की तरफ ले जाने के लिए एक
- 10:45साधना पत्र तुम घबराने की बजाय सिधर रहो, वह चुम्बक तुम्हें अपनी
- 10:55तरफ खींच लेगा। देखो मैं मौजूद हूँ, मैं बैठा हूँ
- 11:02और राम कृष्ण तो जानते हैं कि वह तत्व कभी मरता है, जो तत्व इसे
- 11:13खेच रहा है चुम्बक बनकर। जीस तत्व की तरफ यह खींचा जा रहा
- 11:20है जो खींचा जा रहा है वह कभी मरता है वह मात्र विलीन हो जाता
- 11:30है जैसे। बूंद सागर में समाहित हो जाती है।
- 11:44एक चला अपने गंतव्य की ओर गंगा ने गंगोत्री का मार्ग छोड़ा, सागर की
- 11:58तरफ बहस चली। धन्य भाग है जो उसका सफर पूरा हो
- 12:11रामकृष्णा बखूबी जानते हैं तो अगर नहीं जानते तो फिर वो शक्तिपात
- 12:19नहीं कर सकते थे। ये लक्षण।
- 12:25वह शक्तिपात कर सके, इसका सीधा सार्थ है।
- 12:34वो जानते हैं वह भीतर का तत्व जो इसे खींच रहा है।
- 12:41और यह है नरेंद्र नाम का इलूशन जो खींच रहा है उस तरफ यह मरेगा
- 12:53नहीं, बस यही भरती रह जाती है तुम्हें।
- 12:59तुम कहते हो मैं को मारना है, मैं तुम्हें कहता हूँ, मैं को विलीन
- 13:06करना है इतना फर्क रह जाता है मैं को मारना है शब्द के भीतर भी एक
- 13:15प्रकार की हिंसा हो जाती है। मैं को विलीन कर देना है और
- 13:24क्षुद्र से विराट हो जाना है। इसमें कोई घबराहट नहीं है।
- 13:33अगर हम अपने शिष्यों को ऐसे पढ़ाये।
- 13:40मेरे को मारना नहीं है, मेरे को विलीन करना है समाहित करना है उस
- 13:55परम आनंद के समुद्र पे। यह में जो समाहित होने जा रहा है।
- 14:03ये दुखों की एक पोटली है, दुखों का एक पंडाल है और जब तक यह विलीन
- 14:16ना हो जाएगा समुद्र के भीतर। जो सुखों की खान है जो आनंद की
- 14:22खान है तब तक ये आनंद स्वरूप न हो सकेगा।
- 14:33इसी क्षण का इंतजार गुरु को सदा रहता है कब शिष्य पर?
- 14:42यह समय आ जाए, घटना घट जाए और ये घटना घट गई।
- 14:53यह अवस्था आ गई है, विवेकानंद पे वह चलाएगा।
- 14:58स्वाभाविक है। पहली बार आई है, अज्ञात है अननोन
- 15:05है, इससे पहले कभी जानी नहीं। प्रथम बार दर्शन कर रहा है, उसका
- 15:14स्वाभाविक रूप से घबराना। बनता है शिष्य तो घबराएगा घबराने
- 15:26के सवर कुछ कर भी नहीं सकेगा लेकिन गुरु गुरु न तो वो खेत
- 15:35खलिहान, वो रस्ते गलियाँ कुचियाँ। सब छाने।
- 15:41वह तो भरीमाती परिचित है और एक रोज़ का नहीं, रोज़ रोज़ उतरता
- 15:47है। उस जगह पर हजारों हजारों बार जाता
- 15:50है, आता है वह रास्ता उसके लिए अनजान नहीं रहा।
- 16:00वह उसके लिए बाएं हाथ का खेल जैसे कर सर्दा हुआ ड्राइवर चालक वह गीत
- 16:10भी गुणगुनाता है, गीत भी सुनता है और गाड़ी भी चलाता है।
- 16:19कहीं ब्रेक मारने पड़ जाए तो ब्रेक भी मारता है, कलश भी दबाता
- 16:24है, रेशी भी दबाता है। सब करता हुआ भी वो गीत गुण गुण
- 16:29आता है। इसके रोज़ के आने जाने का अभ्यास
- 16:38करने का फलीभूत अभ्यास के रूप में हुआ यह विद्या, यह कला उसके भीतर
- 16:50रम गई। रोने रोने से प्रकट हो रही है
- 16:53स्वाभाविक। उसे अब गाड़ी चलाना नहीं पड़ता,
- 16:59गाड़ी उसके इशारे से चलती है। ये अवस्था है रामकृष्णा और शिष्य
- 17:10पहली बार चला। शेष का हर बढ़ाना स्वाभाविक था,
- 17:17चाहे वो कितना ही नास्तिक रहा हो। मृत्यु से घबराता है, नास्तिक भी
- 17:27मृत्यु से घबराता है आस्तिक। क्योंकि मौत तुम्हारे लिए अज्ञात
- 17:36है आज तक तुमने आज तक मौत देखा नहीं है, पहली तक ही आएगा, जब भी
- 17:43आएगा तो मौत तुम्हारे सामने खड़ा। तो लाजिम है कि तुम घबरा जाओ, कप
- 17:55जाओ और ऐसा ही होगा नरेंद्र नाथ कफे कफे मृत्यु को देखकर कफे।
- 18:16दो चीजें हैं। एक तो वह है अपने इलूशन के साथ वह
- 18:23छोटी चेतना का अंश, जो पाथर से चला था अपने देही को संघ ले के।
- 18:35एक तो वह है नेरोल और दूसरा वो परमसाक्षी यो सदा सी साक्षी है
- 18:43सदा तुम्हारे भीतर बाहर मौजूद सर्पव्यापी सदा अलेप्पा।
- 18:54तोहे संग समाये वह सदा तुम्हें निहार रहा है तुम सदा उसकी दृष्टि
- 19:06में हो तुम सदा उसकी दृष्टि के क्षेत्र में हो वह हर घड़ी
- 19:12तुम्हें देख रहा है। बस दो ही है तुम हो और हरी है
- 19:23मौका है, इसलिए मैं कहता हूँ मेरे देखे रामकृष्णा से गलती हो गई।
- 19:36ये कहीं भूल हो गई। मैं आज तक इसे समझ नहीं पाया।
- 19:41मैंने बहुत बार बोला, इसी वेला में जरूरत होती है शिष्य को गुरु।
- 19:51और इसी वेला में रामकृष्णा ने अपना वर्ध हस्त उठा लिया तो क्या
- 19:59करना चाहिए था? देखिये तुम पर भी यह घटना कट सकती
- 20:02है कभी कभी किन्हीं अज्ञात घड़ियों में।
- 20:12तुम कहीं बैठे हो, डूबते हुए सूरज को देख रहे हो, जिल बनते और हुए
- 20:23हल्के हल्के तारे उनकी परछाई सी महसूस होती है।
- 20:31ढलती हुई सांझ किनारा करने वाली हल्की हल्की हवाएं मंद मंद
- 20:38मुस्कान लिए चल रही है। तुम्हारी तन बदन को छूकर वह
- 20:45ढकेलियां करें। ऐसे में तुम्हारा मन ठहर जाता है,
- 20:56बस बात बन गई। मन का ठहरना ही तुम्हें अपने भीतर
- 21:03ले जाएगा। लेकिन ये घटना घटेगी जब तुम ये
- 21:10व्यस्तता के क्षणों में आओगे। जो व्यक्ति परमात्मा को मानता भी
- 21:17है, नास्तिक है। या वह मंदिर जाता है या वो मंदिर
- 21:25में ही रहता है? इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता
- 21:31जब वो मूर्तियां सदा ही उसका कटाक्ष करता है।
- 21:41जिसने कभी ध्यान भजन किया नहीं जिसने कभी तीर्थंकर संकल्प किया
- 21:46नहीं जो मस्त है अपने ही कामों में मस्त है दायित्वों में,
- 21:55संसारिक कामों में। किसी भी व्यक्ति पर ये घटना घट
- 22:03सकती है। क्यों?
- 22:06क्योंकि दो चीजों का मौजूद होना लाजिम है एक तुम्हारा इल्यूश़न
- 22:15तुम्हारी उस छोटी चेतना के साथ तुम्हारा देही?
- 22:22और दूसरा वह विरा तत्व जो निरंतर तुम्हें निहार रहा है।
- 22:32बीच में क्या फंस जाता है। बीच में ये मेघ मंडली फंस जाती है
- 22:40विचारों की, भावनाओं की, तुम्हारे ज्ञान की, तुम्हारी सूचनाओं की ये
- 22:54बीच में बाधा बनकर। तुम्हें आर पार देखने नहीं देती,
- 23:00ट्रांसपेरेंसी देखने की तुम्हें आती नहीं, ये घटना कभी नहीं घटी।
- 23:11आज प्रथम बार ऐसे ही घट रही है। और कोई पता नहीं कौन जाने किस
- 23:23घड़ी इस जिंदगी की शाम हो जाएगी। किसी पर भी ये घटना घट सकती है।
- 23:37इसलिए प्रत्येक व्यक्ति नास्तिक है या आस्तिक है।
- 23:43परमात्मा जब उतरता है तो कोई योग्यता नहीं देखता।
- 23:50एक ही योग्यता देखता है और वो योग्यता तुम पैदा नहीं करता।
- 23:58परमात्मा देखता है छिद्र कहाँ से टपक जाऊं और तुम व्यस्त हुए हुए
- 24:07भरे हुए हो। तुम छिद्र नहीं बनाते नहीं देते
- 24:15उसे उतरने के लिए। किसी न किसी काम में सदा ही तुम
- 24:22व्यस्त रहते हो। तुम कोई होल नहीं छोड़ते।
- 24:28कोई सुराख नहीं छोड़ते, जिसके भीतर से परमात्मा की किरण तुम्हे
- 24:34उतर जाये। और उस क्षत्र को बनाने के बजाय
- 24:43तुम रोज़ रोज़ इस ठोसत्व को और घना गहरा किये जाते।
- 24:58आज तीर्थ यात्रा जाना है। आज व्रत उपवास करना है, आज काली
- 25:10पीली माता के दर्शन करने हैं। आज फलांधान में जाना है।
- 25:18तुम इन सभी बकवासों में व्यस्त रहते हो जीसको तुम भी जीनुस कहते
- 25:28हो, मोलभाव करना, तोल वाट करना मात्र वही व्यापार नहीं।
- 25:40इसके अलावा और भी ज्यादा व्यस्तताएं बहुत यह तो थोड़ी देर
- 25:45के लिए होती हैं। बाकी दिन भर रात में जो भी 100
- 25:52घंटे होते हैं। लेकिन चौबीसों घंटे में तुम कभी
- 25:58देखना अपना टाइम टेबल कभी चेक करना, तुमने कभी कहीं अपने टाइम
- 26:06टेबल में लिखा इन क्षणों में मैं कुछ नहीं करूँ।
- 26:16आई विल नॉट डू एनिथिंग ड्युरिंग दिस टाइम आई विल बी एंड ओनली विल
- 26:27बी मैं सिर्फ होऊंगा ऑर सिर्फ होऊंगा?
- 26:35अब ये भाषा अगर तुम्हे समझ में आ जाये तो तुम धन करूँगा, कुछ नहीं
- 26:42मात्र होऊंगा अगर ऐसी अवस्था कहीं तुम पर उतर जाये।
- 26:57किसी कोलाहल भरी भीड़ में, किसी बीहड़ जंगल में, किसी खेत खलिहान
- 27:04में, किसी चहरते हुए, पंछियों की आवाज में, किसी ताल तलैया के
- 27:15किनारे। कहीं भी ये घटना घट सकती है
- 27:23क्योंकि ये घटना बाहर की नहीं है। यह वैश्यालों में भी घट सकती है।
- 27:31मदीरालों में भी घट सकती। पूजा ग्रहों में भी घट सकती है।
- 27:39इसके लिए कोई नियत स्थान नहीं। बस एक ही शर्त है नियत स्थान कोई
- 27:51नियत अवस्था है। वह नियत व्यवस्था क्या है?
- 28:00चित का मेघ आच्छादित न हो तुम्हारा चित निर्मल आकाश की तरह
- 28:09हो जाये। चिदाकाश।
- 28:16न कुछ आ रहा है, न कुछ जा रहा है, न कोई विचार है, न कोई भावना है,
- 28:25न कोई याद है, न कोई समृद्धि है, न कोई कल्पना है, बस तुम हो।
- 28:34निरहुल अवस्था में तुम हो और तुम ही देखता हुआ वह विराट साक्षी है
- 28:42ये दो वह क्षण बड़ा स्वभाती शल्य यह मत सोचना कि मैं तो पाठ पूजा
- 28:53नहीं करती। मैं तो ध्यान नहीं हवन नहीं करता,
- 29:00मैं तो कोई कर्म कांड नहीं करता, वैसे कुछ भी ना करता हूँ तुम
- 29:06अच्छे से अच्छा कर्म करके आया हो तुम बुरे से बुरा कर्म करके आये
- 29:12हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 29:19कर्मों की व्यवस्था अलग से तुम्हें अपना पुरस्कार या दंड
- 29:24देगी। उसका तुम्हारे मेगा आच्छादित होने
- 29:31या। न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 29:39मैं तुम्हें कहता हूँ शिफ्ट की अवस्था निर्मल हो निर्मल का मतलब
- 29:50यह मेघ। श्वेत मेघ या काले मेघ या गड़कते
- 29:55हुए मेघ या गरजते हुए मेघ या बरसते हुए मेघ कोई भी नहीं चित का
- 30:02आकाश खाली। गई वो भूली दासता लोग फिर याद आ
- 30:44गए। नजर के सामने घटा सी सा गई।
- 31:10वो घोलिदा सीता। तुम्हें फ़ौरन याद आ जाएगा तुम हो
- 31:20उस छोटी चेतना के संग जहाँ से सफर शुरू किया था और देह के साथ।
- 31:26सारा सफर तय हो गया और एक भाग्यशाली घड़ी आई जब तुम हो और
- 31:36वह विराट है, बस आँखें चार हैं। और प्यार होगा।
- 31:50हम खींचने लगे उस तरफ निश्चित रूप से घबराओगे क्योंकि देही के लिए
- 32:00यह बिल्कुल नया अनुभव है। इससे पहले हुआ नहीं।
- 32:07और एक और बात है देही? जैसे ही उसकी किरणों के प्रभाव
- 32:13में आएगा देही गलेगा यानी अहंकार गलेगा अहंकार गलेगा तो मिटेगा।
- 32:24मिटेगा तो घबराएगा घबराएगा तो चिल्लाएगा स्वामी जी मेरे माँ बाप
- 32:30भी हैं मैं गया मुझे बचा दो बस ये वही घड़ी थी जहाँ गुरु की
- 32:39आवश्यकता होती है। और नहीं जाने क्यों परमहंस चूक
- 32:47गए। शायद दो ही बाते मेरी समझ में
- 32:51आती। एक तो अगर थोड़ी देर और रख देते
- 32:57बस 10 मिनट के बाद थी। विवेकानंद कपता खूब कपता कुछ नहीं
- 33:04कर सकता था। वह राम किशन पर मनस के हाथों की
- 33:11कठपुतली थी एक पपट था। पर मन से न चाहते और हाथ न उठाते
- 33:18तो कुछ नहीं कर सकता था। वेकन छटपटाता रहता, आनंदित भी
- 33:26गहरा होता। उस घड़ी में तुम दो चिथिये हो
- 33:30जाते, मरने से डरते भी हो। और उस मरने में जो आनंद आता है,
- 33:38उसमें डूबना भी चाहते हो। ध्यान से सुन लेना इस बात को उस
- 33:48घड़ी में तुम्हारी चित्र की दो अवस्थाएँ।
- 33:56क्योंकि तुम्हारा देही उन किरणों के प्रभाव में आ गया जिन्हें परम
- 34:03प्रेम कहता है और परम प्रेम के किरणों के प्रभाव में आने से।
- 34:11तुम्हारा अहंकार गलता है, जहाँ प्रेम होता है, वहाँ अहंकार नहीं
- 34:15होता, अहंकार अगर प्रेम के संबंध में आ जाए, प्रेम के दायरे में आ
- 34:22जाए तो अहंकार गलना शुरू हो जाता है जैसे बुद्ध और अंगरी माल के
- 34:27किस्से। अगली माल खूंखार राक्षस व्यक्ति
- 34:38को मारता और उसकी ऊँगली गले में डाल लेता और आनंद से भरा हुआ
- 34:46बुद्ध। बहुत ही चले हैं वो भी माल की तरफ
- 34:58अगली माल कहता रुक जा अब उन तक तेरी इतनी जुर्रत आज तक इतनी
- 35:06जुर्रत कोई नहीं कर सका है रुक जा वरना मर जाएगा ना जाने क्यों?
- 35:12मुझे आज तुम पे तरसा रहा है लेखनबुद्ध मौन आनंद से लिपटे
- 35:25लिपटे धीमी धीमी चाल से पग को आगे बढ़ाते हुए अंगरी माल की तरफ से
- 35:34ही चले जाते हैं। मैंने कहा अहंकार जब प्रेम के
- 35:44प्रभाव में आता है तो गलता है। यही अंगुली माल के साथ हुआ।
- 35:55उसकी सारी हत्या की योजनाएं सब हिंसक मन गलना शुरू हो गया।
- 36:05कंपना शुरू हो गया और इस कंपनी में उसका हाथ का कांपा छूट गया।
- 36:18सास काका प छूटते हुए धरती पे टर्न नसीब वाले अगली माँ तो और
- 36:25क्या ये क्या हना बना है? ये कुछ बोलता भी नहीं और मैंने
- 36:36सावधान भी दिया। मेरे नाम तक से लोग डरते है और यह
- 36:42तो मेरे सामने आ रहा है और मेरी तरफ आ रहा है बस ऐसे ही तुम
- 36:51तुम्हारा भ्रम इलूशन की वो पोटली जिसे मैं देय ही कहता हूँ।
- 37:02आकाश मंडल से किरणें आ रही हैं। सच खंड से परमहंस अपनी किरणों को
- 37:08बिखेर रहे रामकृष्णा सधे हुए व्यक्ति हैं, सधे हुए व्यक्ति हैं
- 37:19रामकृष्णा। ये वो व्यक्ति हैं जो छोटी सी
- 37:23उम्र में राम का नाम लेने से सविकल्प समाधि में खो जाते हैं।
- 37:33एक अंशों की कतार। आकाश से उठती हुई दिख जाती है
- 37:40श्वेत वर्ण और गदाधर देखते हैं उसकी तरफ गदाधर की आँखें हनुषों
- 37:53की उस कथा को देखते हुए। सुदी वुदी खो देती हो जमीन पे घर
- 37:58जाता है वह। वह पुराना व्यस्त है।
- 38:09परमहंस पराना व्यस्त है समाधियों का सविकल्प समाधि को भी अच्छी तरह
- 38:15जानता है। निर्विकल्प समाधि को भी अच्छी तरह
- 38:18जानता है। ऐसा गुरु उसके सम्पन्न बैठा है
- 38:25साथ और अच्छी तरह से जानता है वो। लेकिन मैंने बहुत विश्लेषण करने
- 38:33पर भी। एक ही पुख्ता विश्लेषण पाया।
- 38:43दूसरा विश्लेषण भी आता है मन में लेकिन वो बुगना सिद्ध होता है।
- 38:51सिर्फ एक विश्लेषण ये आता है कि राम किशन परमहंस के पास वोकबुलरी
- 38:57नहीं था। शब्दावली नहीं थी, भाव थे, बहुत
- 39:03भाव थे, प्रेम था, समर्पण था, आनंद था, सब था, वोकबुलरी नहीं
- 39:13थी, शब्द नहीं थी। और राम किशन ने सोचा होगा अगर मैं
- 39:23इस एक व्यक्ति का कल्याण कर दूंगा, अगर इसके ऊपर से हाथ न
- 39:28हटाया तो यह तो पहुँच गया। बस 10 मिनट की बात है ज्यादा से
- 39:34ज्यादा। और इसको अगर रस गहरा आने लगे तो
- 39:41या खुद ही छलांग ले लेगा। मेरी आवश्यकता भी नहीं।
- 39:46मैंने पहले भी कहा, वहाँ कंपन भी होता है।
- 39:51वहाँ रस भी बड़ा गहरा होता है। जितना गहरे रस में तुम जाओगे,
- 39:57उतना ही आनंद भी तुम्हारा गहरा खिलेगा।
- 40:01शायद किसी किसी मुकाम पर आकर गुरु भी दो चित्त हो सकता है।
- 40:13एक तरफ सारी दुनिया मेरे उस अनुभव को समझ जाए, क्षेत्र में ये बात
- 40:23भी है और क्षेत्र में ये बात भी है कि अगर ये पहुंचेगा तो ये मन
- 40:29हो जाए। मेरी दृष्टि में यही बात ज्यादा
- 40:34पुख्ता उमड़ती है। अगर ये पहुँच गया तो इसकी मुखरता
- 40:41खत्म हो जाएगी। वोकबुलरी कितनी भी हो, यह भवन हो
- 40:48जाएगा। यह शबाबिक भी है।
- 40:54कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो पहुंचने के फौरन बाद बोलना शुरू किया हो।
- 41:01थोड़ा वक्त चाहिए संभलने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए।
- 41:08वो जो रस गिरा जो जरा। उसको समाहित करने के लिए थोड़ा
- 41:13भक्त चाहिए। एक दम से न बोल पाएगा।
- 41:20बुध भी मौन हो गए थे। महावीर भी मौन हो गए थे, नानक भी
- 41:26मौन हो गए थे। सभी मौन हो जाते हैं, मौन होने
- 41:29वाला रस है। क्योंकि मौन ही तो पिया तुमने परम
- 41:35मौन पिया तुमने और परम मौन पीकर अगर तुम मौन न हुए तो परम मोहन
- 41:41क्या खाक पिया तुमने अगर ये पूरी सलाग ले गया?
- 41:50तो यह मौन हो जायेगा? अनसापयो?
- 42:18मानसरोवर ताल तलैया। ताल तले या क्यूँ डोले मन मस्त
- 42:39हुआ? हाँ फिर क्यूँ बोले मन मस्त हुआ
- 42:48हाँ फिर क्यूँ बोले? फिर नहीं बोलेंगे।
- 42:57ये बात ज्यादा शुद्ध नजर आती है। दूसरी बात जो सोचा वो कर दिया चलो
- 43:10यहाँ तक पर्याप्त है। जंकचर पॉइंट के करीब ले के आगया
- 43:16आलम तो वहाँ भी गहरा है वहाँ भी व्यक्ति जो सोचेगा हो जाएगा जंकचर
- 43:28पॉइंट के थोड़े से नीचे अगर व्यक्ति जाएगा।
- 43:32तो वहाँ बाबा नानक के ये शब्द साकार होते मिलेंगे, जो मांगू
- 43:36ठाकुर अपने ते सोई सोई देब रहे, बस तुम जो मांगोगे, कल्पवृक्ष आ
- 43:43गया। जंक्चर प्वाइंट ही कल्पवृक्ष है।
- 43:47यह संसदीय क्षेत्र ही कल्पवृक्ष है।
- 43:54ज्ञान तो पूरा पा लिया अब ये सब कुछ कर सकता है जो ये चाह तो
- 44:02क्यों ना इसको यहीं छोड़ दूँ? गुहार भी लगा रहा है, चिल्ला भी
- 44:08रहा है। तो मेरे पास कारण भी है हाथ उठाने
- 44:13का यह मुझे भुलाना नहीं दे सकेगा। गुरु जी हाथ क्यों उठाया प्रचार
- 44:25तो फिर भी मेरा कर सकता है समझ तो इसे आ गया मैं क्या बोलना चाहता
- 44:32हूँ? बखूबी समझ गया और समझ भी गया था
- 44:35वेलाशक समझ क्या गया था, वह तो कर भी गया था।
- 44:43एक पंडित जी को कहा कि बोरियों में बांध ले, सब मूर्तियों को
- 44:47गिरा दे, कुएं में इतना संकल्प भान हो गया था।
- 44:53और मैंने आपको पिछले प्रवचन में समझाया कि जैसे जैसे आप अपने गहरे
- 44:57में उतरोगे संकल्प गहरा होता जाएगा और वह संकल्प करेगा काम
- 45:05तुम्हारी बुद्धि का सोचना, संकल्प करना काम नहीं करेगा।
- 45:11वह भीतर जैसे जैसे जाओगे, अपने अंतर के अंदर जितना गहरा मुकाम,
- 45:18तुम्हारा उतना गहरा संकल्प और उतना गहरा फैलाएगा तुम्हें उतना
- 45:24मीठा फैलाएगा। ये दो बातें हो सकती हैं।
- 45:29दूसरी बात। रामकृष्णा के हिसाब से ठीक लगी
- 45:34होगी। मालिक थे तो उन्होंने हाथ उठाना
- 45:41ठीक समझा, गुहार भी लगा रहा, डर भी रहा है, कंप भी रहा है, लेकिन
- 45:46ये तो जानते हैं कि मरेगा नहीं। बखूबी जानते हैं, वह तत्व कभी
- 45:53मरता नहीं और यह तत्व भी नहीं मरेगा।
- 45:57आनंद से थोड़ी ही मरेगा आनंद से कभी मरता है व्यक्ति नहीं मरता
- 46:04पीड़ा से मर सकता है घावों के। लक्ख्मों के ताप ना सहते हुए
- 46:11व्यक्ति मच सकता है, लेकिन आनंद का कोई घाव नहीं होता, आनंद की तो
- 46:17मरहम होती है, आनंद के तो फूल होते है, जो तुम्हे सुखद अनुभूति
- 46:25देते है। सहज जे ठंडी फिजाओं से तुम लहरा
- 46:29उठते हो, दो बातें हो सकती हैं, मूर्ख तो नहीं थे, बहुत समझदार
- 46:43थे, परमहंस थे। फैसला सोच समझ के लिया होगा,
- 46:50लेकिन एक बात मैं जानता हूँ। रामकृष्णा यहाँ आकर शिनशय में
- 46:56जुड़ पड़े होंगे। मैं नहीं कह सकता कि रामकृष्णा को
- 47:03क्या करना चाहिए था। रामकृष्णा खुद मुख्य प्यार है।
- 47:08खुद के मालिक हैं, खुद की शक्ति के मालिक हैं, जो किया ठीक किया,
- 47:16लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूँ कि अगर मैं राम कृष्ण की जगह होता
- 47:20तो मैं हाथ नहीं उठाता, क्योंकि यही वेला होता है।
- 47:27जब शिष्य पकारता है गुरु को अन्यथा गुरु को शिष्य पकारता है
- 47:39गुरु को शिष्य पकारता है आपत काल कल ये की बेटियां का फ़ोन आया
- 47:46मुझे। तीन बार फ़ोन आया, मैंने उठाया
- 47:56फिर उसका मैसेज आया वौइस् मैसेज आया मेरा पुत्र घर से चला गया,
- 48:02झगड़ ठीक तो है कहीं कुछ हो तो नहीं गया, कृपया कीजिए उसको
- 48:08बुलाइए कल ही की बात। यह इमरजेंसी है जैसे डॉक्टर सभी
- 48:22का इलाज कर रहा है, किसी की खांसी है, बल्कम है, जुकाम है, बुखार है
- 48:28या रोज़मर्रा की बीमारियां है और किसी एक पेशेंट को कोई इन्जेक्शन
- 48:33लगाया पेंसिलीन का वो रिएक्शन कर के।
- 48:37तो डॉक्टर इमरजेंसी की तरफ भागेगा जीसको रिएक्शन किया है, पेन्सिलिन
- 48:43सबको छोड़ देगा, उसकी तरफ भागे तो हमारे लिए ऐसी चीजें इमरजेंसी
- 48:50होती है, छोटा बच्चा है, घर को छोड़ के आया है।
- 48:56मैंने बाबा से पुकार लगाई, बाबा देख बाबा ने कहा आ जाएगा तुम
- 49:03चिंता मत करो, मैंने मैसेज फॉर्वर्ड कर दिया तुम चिंता मत
- 49:07करो, धैर्य रखो, भय आ जाएगा और करीब घंटे के बाद।
- 49:14उसका मैसेज आया बेटी का कि बच्चा से ही सलामत घर आ गया है।
- 49:21ये होती है इमरजेंसी अब डॉक्टर ने देखना है कि मेरी प्रायती क्या?
- 49:37अगर मैं रामकृष्णा की जगह होता मुझे पात्र मिला होता हाथ तो मेरे
- 49:46व्याकुल बड़े क्या करूँ? जीतने पात्र थे।
- 49:54मैंने हाथ रख दिया। जो और पात्र होगा उनको अपना
- 50:03वर्गाहस्त दे ही दूंगा, तुम चिंता मत करो, तुम तुम्हारी चिंता कम
- 50:10किया करो। क्योंकि मैं तुम्हारी चिंता
- 50:12ज्यादा करता हूँ मैं अगर रामकृष्णा की जगह होता तो उसको
- 50:23टपा देता, तू एक तो चल कल की कल देखेंगे तू तो टप।
- 50:35तू तो पहुँच तू तो बिल्कुल करीब है मैं हद क्यों करता चिल्लाता
- 50:43रोता कुछ भी करता लेकिन मुझे पता है जितना जितना गहरा जाएगा उतना
- 50:48ज्यादा चिल्लाएगा क्योंकि उतना ज्यादा दे ही गलेगा।
- 50:53और देही गलेगा? तो ये डरेगा और डरेगा तो पकार
- 50:57उठेगी, पकार उठेगी थर्राएगा कपेगा रोम रोम इसका थर्राट बनकर रह
- 51:03जाएगा। उतने ही पकार भी तेज हो गए।
- 51:12कोई ऐसा तो है कि रामकृष्णा की स्थिति में से निकले नहीं, हजारों
- 51:17बार निकले हजारों शाह नरगिस अपनी बेनौरी पे रोती है बड़ी ही
- 51:29मुश्किल से होता है चमन में दीदा बर पैदा।
- 51:35बड़ी मुश्किल से इस मुकाम पर कोई व्यक्ति पहुंचता है जहाँ
- 51:38विवेकानंद पहुंचे लेकिन फिर भी रामकृष्णा ने हाथ क्यों उठा लिया?
- 51:45उसका यही कारण होगा मुख हो जाएगा। बोलेंगे ना?
- 51:56लेकिन काश विवेकानंद बोले बोल के भी कहाँ बोल पाए?
- 52:04सारी उम्र इसी चीज़ का पश्चाताप करते रहे।
- 52:10उस वेला को मैं क्या कहूं, अभागा था वो क्षण जब मैंने अपने गुरु से
- 52:17फरियाद की थी कि गुरू जी मेरे माँ बाप हैं, भाई बहन हैं, उन अभागे
- 52:25क्षणों को शर्क। ना खुद पहुंचा ना किसी को पहुंचा
- 52:38सका। अटक गया पश्चात्य सभ्यता में जाकर
- 52:49रोगी हो गया। ऐसी कौन सी बिमारी थी जो उसके
- 52:53नहीं आदि हो गया?
- 53:10विवेकानंद, जो हजारों लाखों व्यक्तियों की तकदीर बदल सकता था?
- 53:24वह अपने ही शिष्य के बाबत इस फैसले से जरूर भौचक्का हुआ होगा।
- 53:35किसी को नहीं पहुंचा सका। सिर्फ एक निवेदिता बहन दोस्त के
- 53:39साथ आई। वो भी अगले जन्म में पहुँच पाई।
- 53:44उस जन्म में वो भी नहीं पहुँच पाई और विवेकानंद अभी तक वैसे ही फिर
- 53:57रहे हैं जैसे थे। आंसू छलक आते हैं।
- 54:08कभी कभी ऐसी कहानियों याद करके दिल का दर्द घना हो जाता है।
- 54:17सारा दर्द आँखों में आंसू बनकर अश्क बनकर छलक जाता है।
- 54:24हृदय रोता है, एक व्यक्ति पहुँच जाता है, मैं ना नहीं बोलता,
- 54:34लेकिन उसके संपर्क में तो लोग आते हैं, असहनी तरंगों से युक्त हो
- 54:39जाता है। उसके तरंगों से बहुत से लोग
- 54:42परिवर्तित हो जाते हैं और बहुत से भी जाते हैं और इता तो बिल्कुल
- 54:48मौन भी नहीं होता। अभी तो 39 वर्ष का था जब वो मरा
- 54:56उससे बहुत पहले की यह घटना। 1863 की मकर संक्रांति जब
- 55:11नरेंद्रनाथ 20 वर्ष के थे, 12 जनवरी 1863 का जन्म था उनका।
- 55:21और 14 जनवरी 1883 को मकर संक्रांति के दिन सुबह 10:00 बजे
- 55:30के बाद की घटना है। जब रामकृष्णा पर मनस ने
- 55:35नरेंद्रनाथ के सिर के ऊपर हाथ रखा।
- 55:41अब सोचिए, 20 वर्ष की अवस्था क्या रही?
- 55:44तार्किक था, ब्रह्म समाजी था, नास्तिक था, घोर नास्तिक था छोटा
- 55:55सा बच्चा। 20 वर्ष का बच्चा इतना प्रप्रोड़
- 56:00नहीं होता लेकिन उसकी वलक्षणता के कारण उसमें प्रूढ़ता कुछ ज्यादा
- 56:06थी बस अभी 1 साल पहले जैसे कॉलेज में।
- 56:17नरेंद्र पढ़ते थे, वहाँ मुलाकात हुई।
- 56:20राम किशन के साथ। 81 या 82 की घटना है, 1881 या 82
- 56:31की घटना है। नरेंद्र नाथ उस वक्त प्रेसी
- 56:36टेन्सी कॉलेज कोलकाता में पढ़ा करते थे।
- 56:40छात्र तब से मुलाकात हुई। निरंतर आना जाना बना रहा उड़ यह
- 56:52है घटना मकर संक्रांति 14 जनवरी 83 की है।
- 57:0412 जनवरी को उनका जन्म था 63 का 1863 20 वर्ष के पूर्व हुए थे अभी
- 57:152 दिन पहले। अभी कोई इतनी प्रौढ़ता की उम्र
- 57:23नहीं थी। अभी बुद्धि इतनी विकसित भी नहीं
- 57:29हुई थी। अभी इतना अनुभव भी नहीं है जो
- 57:33थोड़ा बहुत अनुभव था और ब्रह्म समाजियों का नास्तिकवाद का अनुभव
- 57:37था। तरक करना बेहतर जानते थे।
- 57:41तार्किक क्षमता बहुत थी, विलक्षणता बहुत थी, तिक्षण बुद्धि
- 57:45बहुत थी, लेकिन सब तिक्षण बुद्धि नष्ट हो गए।
- 57:54जब मुख हुए, विचार खो गए, भावनाय खो गए।
- 58:00और गहरे गड्ढे में उतरने लगे। विवेकानंद तो चिल्लाए, मेरे देखे
- 58:10उस वक्त रामकृष्णा परमर्श को हाथ नहीं उठाना चाहिए था, जो पहुंचता
- 58:14है उसको पहुंचने दो, एक दिया जल जाए तो काफी है।
- 58:19एक दिए से सारे संसार के दिए जलाये जा सकते हैं।
- 58:24मेरी अपनी मान्यता है, लेकिन रामकृष्णा ने जो किया वो ठीक
- 58:28किया। यही घटना अगर मेरे साथ घटी होती
- 58:34में हाथ नहीं उठा। हजारों शाह नर की सपने बेनरी पे
- 58:41रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में लीदा भर पैदा ऐसी घटनाएं
- 58:50रोज़ नहीं होती। इनका हृदय कुछ खास सुर संगमों से
- 58:59सजा होता है। मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मकसू
- 59:13होते हैं। ये वो नगमा है जो हरसाज पे गाया
- 59:16नहीं जाता ना हर कोई नरेंद्रनाथ बन सकता है, ना हर कोई परमहंस
- 59:27रामकृष्णा बन सकता है। ये घटनाएं कभी कभी घटती हैं।
- 59:33कभी कभी घटती है और आगे आगे तो बड़ी दुर्लभ होती जा रही है।
- 59:40शायद कोई वक्त आएगा जब सारी मानवता एकदम से पकार उठेगी कि
- 59:50परमात्मा है नहीं। कोई जलता हुआ कोना किसी दीपक से
- 59:57जगमगाएगा नहीं, उसकी रौशनी बाहर न सके।
- 1:00:05ऐसा वक्त बहुत ज्यादा दूर है ऐसे अंधकार भरी राते।
- 1:00:12अभी चल रही है, लेकिन अभी अंधकार में योग पूर्ण रूप से आना बाकी
- 1:00:18है। अभी अंधेरी रात है मात्र काले
- 1:00:25बादल छाये नहीं। वो काले बादल जो गरसते नहीं सिर्फ
- 1:00:31बरसते हैं। जिनका घोर अंधकार हाथ को हाथ नहीं
- 1:00:38देखने देता। अमावस्या की रात में ऐसी घोर काली
- 1:00:46घनी घटाएं अभी आनी बाकी है। तेज देखो तेल की धार देखो वक़्त
- 1:00:57देखो वक़्त के कारनामे देखो तपुषा पुत्र मैंने सारी चीज़ बर्तांत से
- 1:01:08तुम्हें बता दी। यह प्रवचन सभी को सुन लेना चाहिए
- 1:01:19क्योंकि किसी पर भी ये घटना घट सकती है।
- 1:01:22उसकी बुद्धि नास्तिक है या उसकी बुद्धि आस्तिक है, इससे कोई फर्क
- 1:01:26नहीं पड़ता। वह सभी बाधाओं और सीमाओं को तोड़
- 1:01:30के आता है। जब भी आता है।
- 1:01:35उसके लिए आने की मात्र एक ही शर्त है या समझो एक ही पोज़ीशन है और
- 1:01:43वो है तुम्हारी अव्यस्थता और तुम्हारा पता नहीं तुम कब अव्यस्थ
- 1:01:47हो जाओ। झट से बोल उतर आएगा उसको कहीं दूर
- 1:01:54से नहीं आना पड़ता वह तुम्हारे पास ही है, बाट जो रहा है कि कब
- 1:02:04तुम विचार शून्य हो जाओ, भाव शून्य हो जाओ।
- 1:02:11कब तुम ये बादल छाँट दो? तुम्हारा चित्र निर्मल हो जाए,
- 1:02:16कोई घटना न रहे और कोई श्वेत बादल भी न रहे, चित विचार शून्य हो
- 1:02:26जाए, चित का आकाश बिल्कुल खाली हो जाए।
- 1:02:32और उसको कहीं चलकर नहीं आना पड़ता।
- 1:02:34सच्चखंड से वो यहीं मौजूद है। यहीं यहीं इसी वक्त अन्यथा
- 1:02:44तुम्हारी किसी क्रियाकलाप को रिकॉर्ड न कर सकता।
- 1:02:51और तुम उसको कितने ही इग्नोर करते रहो, ईशा वश में तुम सर्वम यति
- 1:02:56किंच जगत या आम जगत। वह इस जगत के कण कण में व्याप्त
- 1:03:01है और सही कहो तो जगत का कण कण ही वो है।
- 1:03:06जेता कित्ता तेता ना? बिन नामी नाहीं कोठा इज़ प्रेसेंट
- 1:03:13एवरीवेयर कहीं से चल के नहीं आएगा और सत्यकंठ से उतर के नहीं आएगा
- 1:03:19वो वो तुम्हारे पास ही तो है बात जो हो रहा है कि कब तुम अव्यस्त
- 1:03:26हो जाओ। तुम कौन हो क्या मानते हो?
- 1:03:30किस धर्म के हो, किस जाति को ये पूछेगा नहीं वो बस वो सिर्फ एक ही
- 1:03:37देखेगा। संभावना हो कि क्या मैं उतर सकता
- 1:03:44हूँ? इसने कोई स्पेस भाटी छोड़ी।
- 1:03:48कोई छिद्र पैदा किया अपने अहंकार के बीच में से जहाँ से मैं गुजर
- 1:03:52जाऊं, बस संकीर्ण सा रास्ता चाहिए उसे तुम्हारे भीतर उतरने के लिए
- 1:03:58एक छोटे से मार्ग की जरूरत है। उसे जीस दिन जीस घड़ी जीस पल तुम
- 1:04:05वो रास्ता महिया करवा दोगे परमपिता परमात्मा।
- 1:04:10उसी घड़ी उसी क्षण उसी पल वह उतर जाएगा और तुम्हें याद आ जाएगा उसी
- 1:04:20घड़ी ऋषि को शमण कहते हैं याद आ जाएगा तुम कौन?
- 1:04:29वो भोले जास्ता लो हीर याद आ गई। नज़र के सामने घटा से।
- 1:05:00छा। गई वो भूली दास कहाँ लो फिर याद आ
- 1:05:20गई। नजर के सामने घटा।
- 1:05:33सी। धन्यवाद।