Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Sep 25 - संस्कृत का ज्ञान होना वरदान है या बाधा? वह एकांत में मिलता है समूह में नहीं! ऐसा क्यों?
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- 0:14दविंदरपाल बाबा जी, आखिरी प्रश्न मेरा आज कल संस्कृत के ऊपर।
- 0:31बड़ा विवाद चल रहा है। जो संस्कृत नहीं पड़ा है वह
- 0:44अज्ञान मुझे संस्कृत पड़ा है। अज्ञान।
- 0:56कृपा इस प्रश्न को रहस्य के तल से जाकर विवेचना करने का कष्ट करें।
- 1:15पहली बात इसका मतलब लव से नहीं पहुँच सकते।
- 1:27लव से तो संस्कृति नहीं जानते से तो नहीं जानते।
- 1:44और कबीर नानक ये तो बिल्कुल ही नहीं जानते।
- 1:58असल में संस्कृत उस वक्त की भाषा है जब ये प्रचलित है।
- 2:07आज संस्कृत प्रचलित नहीं है। अगर मैं संस्कृत में बोलना शुरू
- 2:15हो जाऊं तो आप क्या इतनी सरलता से?
- 2:25अध्यात्म को समझ पाएंगे। अब गीता क्यों नहीं समझ पाते?
- 2:33क्योंकि गीता संस्कृत में उपनिषद क्यों नहीं सेक पाते क्योंकि वो
- 2:43संस्कृत। बुद्ध ने महावीर ने बासाई दम पर
- 2:55वक्तव्य नहीं दिया, जो प्रचलित थी उन भाषाओं के दम पर परोसे।
- 3:04पाली भाषा जो उस वक्त की भाषा थी, संस्कृत शास्त्रार्थ के काम तो आ
- 3:16सकती है और संस्कृत का ज्ञान होना उस स्तर पर पहुंचने के लिए।
- 3:31कोई उपयुक्त साधन नहीं बल्कि बात है।
- 3:42अगर ठीक से बोलूं तो किसी भी भाषा का ज्ञान।
- 3:48अब इनको ठीक से समझ लेना, किसी भी भाषा का ज्ञान, किसी भी सूचना का
- 3:57ज्ञान, किसी भी प्रकार का बाहरी क्षेत्र का ज्ञान, धन कैसे कमाएं,
- 4:06सुखी कैसे रहे? जो आजकल प्रचलित है क्योंकि हर एक
- 4:15व्यक्ति धन कमाना चाहता है। ऐसे थमनेल तुम्हें आकर्षित करते
- 4:25हैं और तुम धनी होना चाहते। आपने कहा कि रामभद्राचार्य ने ये
- 4:38कहा, इन मूर्खों की बातें मेरे सामने मत किया करो।
- 4:50शंकराचार्य स्वेतक पहुँच गए हैं, बुधवीर स्वयं तक पहुँच गए हैं।
- 5:02लेकिन कृष्ण नहीं हो गए हैं। ये बात ध्यान में रखा इसलिए जो
- 5:08कृष्ण नहीं हो गया है, वह शास्त्र शास्त्र करेगा ही करेगा।
- 5:17मेरे पास जो पोत ही लेके आ जाते हैं बाबा शास्त्र अत्रक्रे मैं
- 5:21समझता हूँ ये तोता है तोता पड़ पड़ गड्ढे लग दिए ते पड़ पड़ हो
- 5:32ये ख्वा। नानक लिखे एक गर्व से बाकी चकना
- 5:37चार कितनी शास्त्र पढ़ लो कितनी सूचनाएं एकत्रित कर लो एक बात को
- 5:46ध्यान में रखना हाँ इनको लिख लो आप सर्किल में दे दो इसको।
- 5:53परमात्मा का अर्थ है आनंद, घना, आनंद और सनंद के लक्षण हैं मदहोश।
- 6:13खोमारी परम खुशी तुम्हारा रोम रोम चहकेगा तुम्हें तलाश है खुशी।
- 6:33और खुशी के तलाश में तुम घर से निकलते हो और तुम्हारे पल्ले पर
- 6:39जाते हैं शस्त्र, मूर्ख, गुरु, गंवार, गुरु।
- 6:47अनपढ़ गुरु, अनपढ़ जो परमात्मा के बारे में कुछ नहीं जानता वो अनपढ़
- 6:55है। घर से तुम आनंद की तलाश में चले?
- 7:04वो कौन व्यक्ति है जिसका भीतर का कोई तल?
- 7:11आनंद की मांग नहीं कर रहा है। ऐसा कोई भी व्यक्ति तुम्हें नहीं
- 7:16मिलेगा। मेरी भी जिंदगी में ऐसे पल आए जब
- 7:28मैंने कहा तुम्हें आनंद चाहिए या खुशी, वैसे भी लोग सही है हमें
- 7:35खुशी। खुशी के साधन चाहिए, दानी चाहिए,
- 7:40पद भी चाहिए, डिग्री चाहिए। हम ये बनना चाहते हैं, हम वो बनना
- 7:52चाहते हैं। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति ने यह
- 7:58नहीं कहा। जब उनसे पूछा गया कि अगर तुम्हें
- 8:06आनंद दे दिया जाए तो कोई ऐतराज तो उन्होंने कहा कि ऐतराज तो कोई
- 8:16नहीं है, आनंद भी दे दो। साग्य साग्य।
- 8:22कोई बात नहीं काम चला लेंगे। आनंद साधनी धन भी दे दो, सुख के
- 8:30साधन सुविधाएं भी दे दो, पैसा देंदा भी दे दो और बड़ी से बड़ी
- 8:37पधिविधियों जो आप देना दे सकते हो।
- 8:43मैं कल बाबा से कहा बहुत से कमेंट आए, मित्रों ने भी कहा, शिष्य ने
- 8:49भी कहा बाबा से कह दो आप ठीक करते हैं ये राम किशन पर वंश की कहा
- 8:58नहीं जाता है। विवेकानंद रोज़ कहते थे माँ से कह
- 9:04दो माँ क्या नहीं कर सकती? सच में पूछो तो ये नास्तिकता से
- 9:14उठे हुए सवाल और तुम्हें इसकी भनक भी नहीं होती?
- 9:18कि तुम अभी नाश्ते हो और पुत्र तुमने पूछा, देवेंद्र पाल, ये
- 9:28मेरा आखिरी प्रश्न है आखिरी प्रश्न नहीं है क्योंकि मैं बखूबी
- 9:35जानता हूँ। कि आखरी प्रश्नों से होगा, जीस
- 9:40दिन तुम उस स्तर पर जाओगे जहाँ प्रश्न ही शेष नहीं रहेगा तो आखरी
- 9:48प्रश्न होने का सवाल ही नहीं है, समाधान मिल जाए, समाधि मिल जाए।
- 9:55फिर प्रश्न नहीं उठेंगे, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूँ।
- 10:02ऐसी चालाकी भरी बातें मत किया करो, कोई प्रश्न आखिरी नहीं होता।
- 10:12प्रश्नों की ज़ंजीर होती है कड़ी होती है।
- 10:15एक प्रश्न का जवाब दे दूंगा, बाकी प्रश्न मोबाइल खड़े रहेंगे।
- 10:28तुम मुझे धोखा देने की चेष्टा मत करो, मैं जानता हूँ आखिरी प्रश्न
- 10:37कब होगा? जीस दिन तुम समाधान में चले गए,
- 10:43समाधान में चले गए उस दिन प्रश्न ही नहीं बचेगा।
- 10:53आखिरी प्रश्न का तो सवाल ही नहीं पैदा होता, जो तुमने पूछ लिया वो
- 10:59पूछ लिया उसके बाद सवाल उठेगा ही नहीं।
- 11:02आखरी प्रश्न नामक कोई चीज़ नहीं होती।
- 11:17कहा संस्कृत का एक श्लोक और देता है।
- 11:20प्रेमानंद जी महाराज इसका अर्थ बताते है अब वो खुद मूर्ख है।
- 11:29प्रेमानंद कोई समझदार बंदा थोड़ी है।
- 11:41जैसे गुरु के पीछे करोड़ों गधे लगे हो, वो अमीर हुआ करता है,
- 11:46क्या बड़े चाल होती है? राम भद्राचार्य अव्वल दर्जे के
- 12:04मूर्ख नेत्रहीन्तु हैं, बुद्धिहीन भी हैं और संस्कृत को जानना कोई
- 12:16बुद्धिमत्ता का सबूत नहीं है। इट्स ए लैंग्वेज और कोई भी जान
- 12:24सकता है इसी मुल्क में एक शहर ऐसा है जहाँ लोग संस्कृति बोलते हैं।
- 12:33इंडिया में वह रह गया, कुदरती बाकी खो गए।
- 12:40स्थानीय भाषाएँ प्रचलन में आ गई। संस्कृत विदा होती चली गई।
- 12:45एकाध गांव बचा। वहाँ आज भी संस्कृत में बात होती
- 12:49है तो संस्कृत का जानना तुम्हारे अहंकार को तो बढ़ा सकता है।
- 13:01तुम्हारे ज्ञान कौन है? कई बार संस्कृत का जानना बाधा भी
- 13:08बन जाता है क्योंकि जानना जिसे तुम कहते हो।
- 13:17जाना जाता बुद्धि से और बुद्धि उस परम तत्व तक जाने में खल डालते
- 13:26हैं। एक मात्र बुद्धि ही ऐसा पत्थर है
- 13:40जो तुम्हें वहाँ नहीं पहुंचने देता।
- 13:46मेरे पास लोग आ जाते है, डिग्री रख देते है।
- 13:54मैं मेडिकल प्रैक्टिशनर की दुकान किया करता था।
- 13:58अपने शहर में मेरे पास मेरे पास एमआर आ जाते है मेडिकल रैप।
- 14:11उन पर अपनी क्वालिफिकेशन लिखी होती कंपनी का नाम लिखा होता।
- 14:17मैं उन्हें अटेंड नहीं करता, पेशेंट्स को अटेंड करता, गुस्सा
- 14:26खा जाते, हम तो आपको कुछ देने आए हैं।
- 14:30कोई सैंपल देखे जाए, आप रोगियों पर ख्याल ज्यादा करते हैं।
- 14:36मैंने कहा रोगी का रोग इन दवाइयों से ही ठीक होता है।
- 14:46रोगी की फिक्र जो डॉक्टर करेगा। वही सच में डॉक्टर जो सैंपल्स की
- 14:52फिक्र करेगा वो डॉक्टर नहीं है। वो तो लोग ही है
- 15:07तो बाबा कहते हैं कि पड़ पड़ गड्ढे लगती है, पूरे शास्त्र पड़
- 15:12लो पड़ पड़ ये ख्वाब कितना पड़ोगे?
- 15:20उतने ख्वार भोग है खी ख्वार भोग नानक लेखे एक गल बस काम की बात
- 15:32हुई की होती है। अगर सीखना चाहते हो तो।
- 15:37हे बाकी चकनाचार बाकी तो जीवों की लबालब है।
- 15:46खोपड़ियों का शास्त्र अर्थ है इसलिए बहुत से लोग ये विवाद उठा
- 15:53देते हैं कि हमारे शंकराचार्य को। आपने मूर्ख क्यों कहा?
- 15:58मैंने कहा क्योंकि वो मूर्ख था जो अभी भी उस तत्व को जानने के बाद
- 16:07भी शास्त्रार्थ कर रहा है। और मूर्ख के लक्षण क्या होते हैं?
- 16:17यही तुम के लक्षण होते है। जिसने जान लिया वह बलाशास्त्र
- 16:25करेगा। हंसा पायो मानसरोवर ताल तलैया
- 16:44क्यों तोड़ें जिसने उस तत्वों को जो बरा पड़ा है आनंद से उसको पा
- 16:54लिया? वह शास्त्र से क्यों करेगा, किसी
- 16:59को पराजित करने की चेष्टा क्यों करेगा?
- 17:01जिससे पता चल गया कि दोनों में ही हारा तो भी मैं हारा और जीता तो
- 17:09भी मैं जीता। शास्त्रार्थ करने वाला व्यक्ति
- 17:15इसलिए मैं कहता हूँ मूर्ख होता है, बातें ज्ञान की करता है,
- 17:21लेकिन होता मूर्ख है संस्कृत का, वोकबुलरी का सूचनाओं का।
- 17:35ज्ञान से कोई दूर तक का वास्ता नहीं है।
- 17:40अगर वास्ता है तो एक है कि अध्यात्म के रास्ते के ये रोड़े।
- 17:54तुमने अभी ये समझा नहीं, बच्चा कुछ नहीं है।
- 18:02उनका मासूम और ईशा ने कहा ओनली दे विल एंटर इन मैं गॉड्स किंगडम विल
- 18:13बी इनोसेंट जस्ट लाइक। मासूमियत है लक्षण साधन अगर तुम
- 18:30चालाक हो मासूम नहीं तो तुम अदालत में तो जीत सकते हो।
- 18:44लेकिन सत्य की कचहरी में तुम हार जाओगे आज नहीं कल और सत्य की
- 18:49कचहरी का है आनंद सुख भले ही तुम्हारे पास अम्बार हो, धन के
- 18:57जायदाद हो, बहुत ज्यादा। नामी ग्रामी हो कुछ भी हो, सुख के
- 19:04अम्बार हो, लेकिन आनंद की एक बूंद न हो तो तुम गरीबी ही हो, फिर तुम
- 19:12अमीर नहीं हुए। लाख सूचनाएं बड़ी पड़ी हैं।
- 19:22सारी न्यूरॉन्स में आनंद घुसेगा और तुमने खोपड़ी का कोई न्यूरॉन
- 19:32खाली नहीं छोड़ें। तुम डिग्री तो खा लेते हो मेरे
- 19:37पास तो? 35 डिग्री है।
- 19:42मैंने कहा तुम अव्वल दर्जे के मार्क हो।
- 19:52जितना पढ़ा लिखा व्यक्ति मेरे पास आ जाता है, मैं उसे उपेक्षित कर
- 19:56देता हूँ। मैं बोल के स्थल से रहा हूँ।
- 20:02इसको भी जांच से लेना। पढ़ा लिखा व्यक्ति मेरे पास नहीं
- 20:09पहुँच सकता। कन्नी, चालाक, श्याणा, समझदार
- 20:15मेरे पास नहीं पहुँच सकता, बाबा ने कहा।
- 20:23छः से स्याण 5,00,000 को है एक न चल लेना कितनी स्याण पे ले के चलो
- 20:36उस अंतर के उद्यान में को तुम्हें।
- 20:42अटका लेंगी, भटका देंगी, पहुँचने नहीं देंगी।
- 20:48यह सूचनाएं रास्ते के रोड़े हैं पत्थर यह गम है।
- 21:00जो तुम्हें आनंद से वंचित रखते हैं।
- 21:04घर से तो हम चले थे खुशी की तलाश में।
- 21:20खुशी की तलाश में वमराहों में खड़े थे वो ही।
- 21:36साथ हो लिए खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए।
- 21:55यूँ हस रतों के दाग मोहब्बत में धो लिए खुद दिल से दिल की बात कही
- 22:14और। रो लिए के रास्ते के पत्थर कौन
- 22:25व्यक्ति है जो घर से चलता है? जैसे आनंद की जरूरत नहीं है?
- 22:32लेकिन रास्ते में सूचनाएं खड़ी होती।
- 22:36ये क्षार खड़े होते हैं, आचार्य खड़े होते हैं, शास्त्र खड़े होते
- 22:42हैं, मार्गदर्शक खड़े होते हैं, ये गम है इनको सर मत कहा करो।
- 22:54ये गम गम के पोटले इनके सर में भरे पड़े है ये तुम्हें रोक लेते
- 23:01है गम राह में खरीदते है कोई अचार गड में गा तुम्हारी बुद्धि तो
- 23:09बड़ी प्रभावित होती है उससे। लेकिन गम को पीना पड़ता है, गम
- 23:23तुम्हें दुख देता है, आनंद नहीं देता जीन का एक ही सिलिका मैं
- 23:37तुम्हें सीखाता हूँ, उसके रजा में चलो।
- 23:47तुम्हें सब मिल जाएगा जो तुमने मांगा या तुमने चाह कोई कमी ना
- 23:58रहेंगी, तुम शहनशाह आलम हो जाओगे। उसकी रजा में चलो और जीतने ये
- 24:17शब्द आसान लगते हैं। उतने प्रैक्टिकल रूप में सर्वाधिक
- 24:25कठिन थोड़ा सा दर्द हो जाता है, तो हम कहते हैं भगवान।
- 24:33हम ही क्यों पड़ोसी को क्यों नहीं?
- 24:48जैसे ही शिकायत आए तुम परमात्मा से दूर हो गए।
- 24:58भरी मुसीबतों के पहाड़। अगर तुमने शो कराना जारी रखा,
- 25:12उसकी रजा में भी चलते रहे, फिर तुमसे बड़ा शहंशाह कोई भी नहीं।
- 25:24कुछ चीजों के परिणाम देरी से आया करते हैं, प्रोसेसिंग में देरी हो
- 25:30जाया करते हैं। जैसे आम की गुठली को मीठे फल लगने
- 25:37में प्रोसेसिंग की देरी हो जाती है, वो देरी नहीं होते।
- 25:42ऊपर सेसिंग होती है कल मैंने बाबा से कहा बाबा थोड़ी
- 26:00सी आंख की रौशनी दे दो, थोड़ा सा इमेज देख सकूँ, बिल्कुल सफेद
- 26:09पर्दा है। बाबा बोले कोई बात नहीं कल आ
- 26:19जाएंगे और आज इमेज बनना शुरू हो गया।
- 26:26जो दो महीने बाद होना है, परमात्मा आज भी कर सकता है।
- 26:37और जो आज हो ना और परमात्मा 2 साल आगे भी कर सकता है लेकिन भुगतना
- 26:47तो तुम्हें पड़ेगा देर अवेर। तुम्हारा किया तुम्हारे ऊपर
- 26:56बरसेगा तुम्हारा बोया तुम्हें काटना पड़ेगा वह दयालु है,
- 27:09परमजालु है उसकी दयालुता पे कोई शंका मत करना।
- 27:20दयालु इसलिए है कि तुम्हारे जन्म से पहले तुम्हारे जीवन के सारे
- 27:25बंदोबस्त कर देता है। तुम अभी गर्व से बाहर नहीं आए
- 27:30होते। माता के सथनों में तुम्हारे लिए
- 27:33दूध आ जाता है। और तुमने अभी आँखें नहीं खोली
- 27:38होती, तुम्हारे लिए सारा संसार भोगने के लिए विद्यमान होता है,
- 27:44फिर भी तुम परमात्मा का शुक्राण नहीं कर सकते, शिकायत करते हो?
- 27:56मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। आज कल गाँधी के बारे में थोड़ी
- 28:01स्वाद आनी शुरू हो गए। मैंने कहा देखो गाँधी चाहते तो
- 28:09प्राइम मिनिस्टर बन जाते। कौन रोकता कोई नहीं, कोई वोट चोरी
- 28:16न करनी पड़ती, कोई किसी को मरवाना न पड़ता, कोई शतरंज की चाल न
- 28:23बचानी पड़ती, कोई किसी के घर एडीसी में एक छापे न डलवाने
- 28:30पड़ता। किसी को ऑपरेशन और तंग न करना
- 28:35पड़ता बस बैरिस्टर का पैंट कोड पड़ा।
- 28:42वैसे भी अमीर थे दीवान के बेटे थे।
- 28:49पहनते और वृद्ध व्यवश्य होते। मुझे लोग कहते हैं बाबा गाँधी जी
- 28:56की इमेज का आप फायदा उठाना चाहते हो।
- 29:01मैंने कहा जब गाँधी ने ही फायदा नहीं उठाया।
- 29:09तो मैं कैसे फायदा उठाऊंगा? अगर मैं फायदा उठाने लगूं तो तुम
- 29:15समझ लेना। मैं धोखेबाजी अपने अनुभव को बताना
- 29:23अपने पिछले जन्म का। तुम्हें पता देना यह कोई निहेत
- 29:33स्वार्थ नहीं हुआ करता। हम बताते हैं अपना अनुभव संत
- 29:41बताते हैं, अपना अनुभव एक तल है जहाँ आनंद भरा पड़ा है।
- 29:46क्या इसमें उसका कोई निहित स्वार्थ होता है?
- 29:51लेकिन फिर भी वह बोलता है तुम लाखों रुपये लेके 130 मिनट का
- 29:58भाषण देते हो। और ये संत हैं कि बोले ही चले
- 30:03जाते हैं इनका मन नहीं भरता क्यों उसकी याद में रस है बड़ा?
- 30:20जब उसकी याद आती है, किसी बहाने भी याद आती है।
- 30:28जैसे प्रेमी प्रेमिका को एक दूसरे की याद आती है तो रस बभौर हो जाते
- 30:33हैं। ऐसे जब संत को प्रमात्मा की याद
- 30:38आती है। तो उसके भीतर रस बरसना शुरू हो
- 30:41जाता है। फिर उस आनंद में मगन हुआ भीगा
- 30:47भीगा बोलता ही चला जाता है थमता ये लोग कहते हैं, बेमार हुआ।
- 30:58आंख फूट गई, दांत टूट गए, ऑपरेशन कराके आए, बोल रहे हो?
- 31:04मैंने कहा बोलना। जब आनंद भीतर से उठता है तो मैं
- 31:15नहीं बोलता, आनंद बोलता है। और मेरा उस पर कोई बस नहीं होता
- 31:26क्योंकि मैंने जाम किया है। आई ऍम जस्ट एन इन्स्ट्रुमेंट उसके
- 31:32हाथों का उपकरण। बोलना ही पड़ेगा।
- 31:39जैसे मैंने कहा, चंद्रयान तीन को मुड़ना ही पड़ेगा जैसे रिमोट उसको
- 31:45मोड़ेगा घुमाएगा चंद्रमा पे उतारेगा वैसे ही करना पड़ेगा तो
- 31:55ने जान लिया। उन अदृशाहतों को और जो भी कोई जान
- 32:01लेता है उन अदृशाहतों को जो संसार को निचा रहा है, उनका सारा छल,
- 32:10कपट, फरेब, वासनाएँ, इच्छाएं, स्वाद।
- 32:16हो जाते है। घूमना फिरना, संसार घूमना, ऐश
- 32:22करना सब खत्म हो जाता है क्योंकि वह उस ऐश में चला गया जिससे बड़ी
- 32:31ऐश संसार में कहीं पे नहीं होती। जो सुख छज्जू दे चुवारे ना बल्क
- 32:41ना बुखार है तुम जैसे ऐश कहते हो काश तुम्हें एक बल के लिए उस अमृत
- 32:56की एक बूंद मिल जाए। तुम ऐसी लाखों गदियां कुर्बान
- 33:04करने के लिए तत्पर हो जाओगे। अभी तो तुम्हें पता नहीं और जिनको
- 33:13मिला। ध्यान रखना वो एकांत में मिलता
- 33:17है, समूह में नहीं मिलता। महात्मा बुद्ध के साथ जब तक चार
- 33:24पांच उसके शिष्य बैठे रहे, परमात्मा नहीं उतरा।
- 33:30इसलिए मुझे कहा गया भावा कमीनी मत बनाना।
- 33:34तब तो मैं नहीं समझा देर बाद मुझे समझाये जब वो शिष्य छोड़कर चले
- 33:46गए। इसे मिला तो कुछ है नहीं।
- 33:49इसके पास क्या लेने को धरा पड़ा है?
- 33:52चले किसी और गुरु की तलाश करें। मन का यही स्वभाव है।
- 34:01तू नहीं और सही और नहीं और सही तू अगर है हरजाई तो अपना भी यही दौर
- 34:11सही तो चले गए। तुमने शायद इस बात पे कभी सोचा ना
- 34:21हो और वो भी पहुँच गए और तुम्हें एक और बात बता दूँ हैरान मत होना।
- 34:31अगर वो चार शिष्य बैठे रहते तो वो कभी नहीं पहुँच सकते थे।
- 34:40क्योंकि ध्यान बाहर मुखी हो जाता। सांस तो लेगा आदमी खांसेगा तो
- 34:48छींक के गा तो उबासी लेगा उसका शोर।
- 34:59तुम तो राधे राधे के शोर मचाते हो।
- 35:02यहाँ श्वास का शोर भी इबादत में गल डालता है वा रहे हैं सांसों
- 35:13ज़रा अहिस्ता चला। दिल के धड़कने से भी इबादत में
- 35:20करल पड़ते हैं। दिल को जार वो भी शोर करता है।
- 35:29तुम्हारे भीतर का सारा इंस्ट्रूमेंटेशन नॉइसफुल है।
- 35:40और इस शोर से मुक्ति जरूरी है आखिरी शब्द आनंद मिलता है, मौन
- 35:51में और मौन नहीं पर मौन में। जहाँ बाबा कहते हैं चुप पै चुप न
- 36:00हो जे लाए राह ले बतार अगर तुमने होंठो को सील किया और तुम्हारा मन
- 36:09भीतर से बोलता रहा, इतना भी शोर न चलेगा।
- 36:19मन भी थम जाए मन का शोरगुल भी रुक जाए साँसों ज़रा आहिस्ता चल रहा।
- 36:34दिल के धड़कने से भी इबादत में खलल पड़ती है।
- 36:45तुमने पहुंचना है उस रस के पास वो रस शोर से नहीं मिलता मेरे अंतिम
- 36:53शब्द। और जिन्होंने नहीं पाया वो
- 37:04तुम्हें समझाएंगे। देखिये समझाने के लिए बोलना तो
- 37:08आवश्यक होता है लेकिन राधे राधे बोलो के राम राम बोलो ये नॉइस बोल
- 37:15है। यहाँ ल्वाइस नेस नेस नहीं,
- 37:23तुम्हें समझाने के लिए तो हमें बोलना पड़ता है, लाचारी है
- 37:29मजबूरी? तुम्हें चुप कराने के लिए भी तो
- 37:33बोलना पड़ता है कि चुप हो जा, तुम्हें चुप कराने के लिए थोड़ा
- 37:41शोर हमें भी मचाना पड़ता है, लेकिन वह हमारी मजबूरी है क्योंकि
- 37:49हमारी चुप्पी को तुम समझ नहीं पाओगे।
- 37:52हमारे मौन को तुम मृत अवस्था समझोगे, इसलिए बोलना आवश्यक है
- 38:02हमारा लेकिन बाबा कहते हैं, मिलता तभी जब ओंठ भी सर जाए।
- 38:12जुबां भी न बोले और मन भी थम जाए, मन का वेग भी बड़ा शोर मचाता है।
- 38:32खजा रहा तू ठहर जा रे शंधा रुक जा रहा तू ठहर जा रे शंधा।
- 38:51वेदना मिलन की रैना आज चांदनी के रातों में अरमानों।
- 39:08का मेला रुक जा चाँद ठहर जा रे, चंदा भेटे न मिलन की बेला, ऐसा
- 39:26ऐसा प्यार ऐसा नसा। ऐसा खुमार जैसे ही तुमने उस स्थल
- 39:34को छुआ, तुम कहोगे चाँद रुक जा ये रात बीतना जाए।
- 39:46वह मुश्किल से अरमानों का सवेरा हुआ है तू चल मत रुक जा रात ठहर
- 40:00जा रे छंदा। बीते ना मिलन की हरेन फिर तुम ये
- 40:10कहोगे, अब तुम बड़ी जल्दी में हो और जल्दी ही प्राणघातक हैं।
- 40:23लाखों जन्म का भोग फिर सुन लाखों जन्मों का भोग तुम्हें जितना सुख
- 40:35दे सकता है। उस रात का वो सुनहरी पल लाखों
- 40:51जन्मो के सुख पे भारी पड़ेगा, लाखों जन्मो का सुख, तुम्हें उस
- 41:05तल पर जाकर एक पल का जो आनंद लिखा है।
- 41:13तुम माथे पे हाथ मारोगे ओह पश्ताओगे क्यों?
- 41:25क्योंकि ये आनंद की घड़ियाँ। हम इसी तरह बिता सकते थे जो
- 41:32गद्दियों के लिए धन के लिए मान इज्जत के लिए वोकबुलरी के लिए
- 41:41डिग्री के लिए कागज की डिग्री पाने के लिए।
- 41:47उन लोगों के जो आज हैं वो कल विदा हो जाएंगे।
- 41:51उनमें अपना नाम कमाने के लिए है। इसलिए संतों ने ऐसे व्यक्तियों को
- 42:01नाम दिया अज्ञान, तुम जानते नहीं। भी होश हो होश में आओ, बाद में
- 42:13पछताओगे फिर पछताए हो तो क्या जब चिड़िया चुभ गई खेत।
- 42:29धन्यवाद।