Latest / Baba ji Vijay Vats / 17 Jun 25 - तरंगों का रहस्य! मैं बाहर क्यों नहीं जाता? सतोरी की झलक देखे बिना अध्यात्म अधूरा!
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- 0:01बाबा जी नमस्कार, अल्फाज़ हुसैन, पाकिस्तान से बाबा आपने सब कुछ
- 0:18बताया। हम आपके वीडियो को बड़े चाब से
- 0:23सुनते हैं जहाँ पाकिस्तान में आपके मधुर कंठ से निकली हुई आवाज
- 0:39हमें भक्ति विभोर कर जाती है। आपने सभी प्रश्नों के जवाब दिए एक
- 0:46प्रश्न मेरा भी जवाब दीजिए, आप 13 वर्ष से एक जगह क्यों बैठे हैं?
- 0:56बाहर क्यों नहीं निकलते? और अन्य क्यों नहीं खा लेते हैं
- 1:06अन्य? नहीं तो फल खा लिया करो, जूस पी
- 1:09लिया करो, इसका अवश्य ही कोई रहस्यत्मक कारण होगा आध्यात्मिक
- 1:15कृपया में विस्तार से समझाने का कष्ट करें।
- 1:19अलफाज़ हुसैन पाकिस्तान जिसने संसार की संगति की वह उलझित गया
- 1:37और जिसने। अपने अंतस की संगति के वह सुलझ
- 1:43गया। रहीम का एक तो कदली सीप, भजंग मुख
- 1:52सात, एक गुण तीन जैसी संगत बैठिए। तैसों ही फलते स्वाति नक्षत्र में
- 2:02एक बूंद आसमान से गिरा करती है। रहीम कहते अगर वो केले के पत्ते
- 2:10में पड़ जाए वृक्ष में पड़ जाए तो केला बन जाती है मीठा।
- 2:17कद ली सीप के मुख में पड़ जाए। समुद्र में तो मोती बन जाती है और
- 2:27साँप के मुँह में पड़ जाए बुजुंग मुख तो जहर बन जाती है।
- 2:36स्वात एक। गुण हूँ जैसी संगत बैठी है।
- 2:42तैसों भी फलतें संगति का प्रभाव है।
- 2:48काश आपको वो संगति मिल गई होती। यही समझाने की चेष्ठा में संलग्न
- 2:58हूँ दिन भर रात पांच वर्ष हो गए लोगों की संगति की, मित्रों की
- 3:10संगति की, प्रेमी प्रेमिकाओं की संगीत की।
- 3:15पदार्थों की संगति के संसार की संगति के एक दफ़े अपनी संगति भी
- 3:25कर लो, अपने क्रीप भी आ जाओ रहीम की तरह वैराग्य को बरने दो।
- 3:45एक मोदक से तमन्ना थी तुम्हें सोने की एक मोदक से।
- 4:05तमन्ना थी तुम्हें छू मैं की। नहीं।
- 4:22जज़बाती करिबाजा आह जी बस में। नहीं जज्बाती करी, बाजा धो रहकर न
- 4:54करो। बात करी बाजाओ दूर रहकर ना करो।
- 5:07बात करी बाजाओ याद रह जाएगी ये रात।
- 5:16कई बार जाओ बिरहा की आग को इतना पैदा करो प्यास इतनी लग जाए के
- 5:29बिना उसके पिए प्यास ना बुझे तुमने चेष्टा की पदार्थों से बूझ
- 5:36जाए ये प्यास। बोगों से बूझ जाएगी प्यास अच्छा
- 5:46खाना खा लूँ, अच्छे सैर से पार्टी कर लूँ, तीर्थ यात्रा कर लूँ, हज
- 5:55कर लूँ। मक्का मदीना हो, गंगासागर चला
- 6:00जाऊं बाहर कहीं भी भटक लो, जब तक तुम भीतर की संगति न करोगे।
- 6:16और जस्तन तुमने अपने भीतर की संगति कर ली, उस दिन उसी के ऊपर
- 6:23रह जाओ। कबीर कहते हैं भक्तों नाचो वह बरस
- 6:34रहा। नाचो वह बरस रहा, लेकिन बात ये है
- 6:50तुम भी चाहते हो तुम भी चाहते हो, मैं उसके गले लग जाऊं।
- 6:59तेरे आने की खुशी में सिर्फ मैं जागा नहीं तेरे आने की खुशी में
- 7:07सिर्फ मैं जागा नहीं हूँ तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न
- 7:13था। बर्ष का लेकिन तुम्हारी तड़प भी
- 7:25तो होनी चाहिए। तड़प का पैदा होना अनिवार्य।
- 7:34आग दोनों तरफ लगे जकतरफा आग कोई आग नहीं मात्र खिंचा होता है।
- 7:48सर्द जकों से। भड़कते बदन में शोले सर्दजनों से।
- 8:09भड़कते हैं। बदन में शोले जान ले लेगी ये।
- 8:30करी बाजा जान ले ले गी ये बरसात करी।
- 8:47बाजा दूर रहकर ना करो बात करी बाजा शरद झोंकों।
- 9:06से। भड़कते हैं।
- 9:07बदन में सोले जान ले लेगी यह बरसात करीब वो तो बरस रहा है।
- 9:20कबीर कहते हैं सारे संत कहते हैं वह बरस रहा है, हर पल बरस रहा है।
- 9:28लेकिन तुम में पीने की जिज्ञासा कब उतरेगी?
- 9:32सवाल तो यही है हर पल, हर घड़ी वो बरस रहा है निरंतर अखंड धारा उसकी
- 9:44धारा। कभी टूटती नहीं बात तो तुम पीना
- 9:51कब जाओ इस पर निर्भर करती है और काश तुम्हारे भीतर उसको पीने की
- 10:03प्यास से जाएं। पानी तो सदा उपलब्ध है, वह तो हर
- 10:14धरे झर्रे में बहिए प्यास बजाने वाला पानी बहिए, लेकिन प्यास भी
- 10:21तो लगनी चाहिए। सारा धर्मदार कम पर है तुम्हे
- 10:34प्यास लगी ही नहीं, मैं रोज़ देखता हूँ ऐसे ऐसे कमेंट आते हैं
- 10:40पांच 5 साल। हो गए उनको।
- 10:42मुझे सुनते हुए और मैं सोचता हूँ कि 5 साल हो गए, इन्होंने सुना
- 10:51क्या तो पाता हूँ कि इन्हें कुछ नहीं सुना क्योंकि अभी दुविधा
- 10:58बाकी है, तुम्हारी मान्यताओं तुम्हारी चिपका हटें।
- 11:09कोई कहीं चिपटा बैठा कोई कहीं चिपटा बैठा।
- 11:13यही तो तुम्हें मुक्त नहीं होने देता।
- 11:15फिर तुम कहती हो, हम बंधन में हैं बाबा चिपटे खुद हुए हो?
- 11:25अभी एक मेरा शिष्य था, 5 साल से मुझे सुन रहा था कोषों के बारे
- 11:30में आपने मैंने कहा वहाँ जाओ जहाँ तुम्हारी चिपका हटी मट जाए और
- 11:42मैंने उसे ब्लॉक कर दिया। बस मेरे पास कोई ऑप्शन है
- 11:53तुम्हारे प्रश्न तुम्हारी का टिप्पणियां तुम्हारी प्यास की खबर
- 12:00नहीं देतीं। खैर, मेरे बोलने का कोई अभी प्राय
- 12:05भी नहीं रह जाता। मेरे बोलने का भी प्राय तो ही है
- 12:12अगर तुम प्यासी भी हो अगर तुम्हारे भीतर पानी पीने की कामना
- 12:20भी जगे। ऐसे रेगिस्तान में भटकते हुए जब
- 12:25तुम्हारा रोवा रोवा पानी पानी पुकारना, तब मैं उतरूं और उसे
- 12:33पियो तो तुम निहार हो जाओ। तुमने पूछा, पुत्र, तुम बाहर
- 12:50क्यों नहीं निकलते? 1213 वर्षों से भोजन क्यों नहीं?
- 12:57अन्न क्यों नहीं खाते भोजन तो मैं करता हूँ खूपड़ खूपड़ बातें करने
- 13:06में मुझे ज़रा भी जकन है। उतने से लेता हूँ जितनी कैलोरीज
- 13:11मेरे शरीर को चाहिए बस दिल धड़कता रहे फिर फिर सांस लेते रहे।
- 13:18भीतर की अंतर्प्रणाली ठीक से काम करती रहे और दो घड़ी के लिए तुमसे
- 13:26भी मुखातिब हो जा। तुम।
- 13:33भी मेरे पास आ कर तेरा वह तू गुजर जाता दो घड़ी के लिए रमजानें।
- 13:51किधर जाता है तेरे पास आके मेरा वह तू गुजर जाता है दो घड़ी के
- 14:08लिए गम जाने। किधर जाता है तेरे पास आके मेरा
- 14:20वह तू गुजर जाता है? जीस दिन उसके पास चले गए तुम वो
- 14:28संगत ही ऐसी है। इसलिए सभी धर्म ग्रंथों में ये
- 14:34बात मिलेंगे की अपनी संगति को बिगाड़ मत लेना।
- 14:38बस उनके कहने का अर्थ यही था सत्य संगति में बैठना जो सत्य है, जो
- 14:46असत्य है उसकी संगति मत कर लेना। और तुम तो असक्ति की संगति कर रहे
- 14:50हो, हर वक्त जिसने राम नाम सत्तू जना है, तुम उसको मैं समझे बैठे
- 14:58हो, हर वक्त की संगति दिन भर रात की और इसी।
- 15:05गलत संगत के कारण ऐसी वर्दी का टिप्पणियां आती हैं।
- 15:12तुमने ऐसा बोला बाबा तुमने ऐसा बोला बाबा मैं कुछ नहीं कहता,
- 15:18मेरे पास तो एक अंगूठा है, मैं ब्लॉक कर देता हूँ भाई तुम नहीं
- 15:23सुनना चाहते तुम्हें प्यास लगी नहीं।
- 15:26लगने दो कोई बात नहीं इतनी जल्दी भी क्या है गिरते पड़ते, 1 दिन
- 15:39पहुँच ही जाओगे क्योंकि वो तुम्हारा आंतरिक मुकाम है जो
- 15:44तुमने कभी खोया इतनी जल्दी भी मत करो।
- 15:51धीरज और प्रतीक्षा ये दो बातें मेरे ध्यान में रखना तुम कहोगे ये
- 15:58दो बातें मैंने क्यों कही? धीरज, धीरज रखो, वह मिलेगा जब
- 16:07मिलेगा मिलेगा। और एक बात और भी बता दो नहीं
- 16:12मिलेगा तो नहीं मिलेगा यह चौंकिए मत, तुम कहोगे बाबा नहीं मिलेगा
- 16:20तो नहीं मिलेगा तो फिर और दूसरी बात मेरी याद का मैं कहता हूँ
- 16:25प्रतीक्षा भी रखना कि वह आएगा। नहीं मिलेगा तो नहीं मिलेगा।
- 16:32फिर तो मार्कस्वादी मेरा दूसरा शब्द बोलने का मात्र कारण ही यही
- 16:39है। प्रतीक्षा भी बनाई रखना कि वो 1
- 16:43दिन आएगा उतरेगा। तुम्हारे भीतर और तुम्हें नहला
- 16:47जाएगा, वो ही है तीर्थ सना सही वो ही है यात्रा बाकी सभी तुम्हारी
- 16:56यात्राएं व्यर्थ हैं बकवास हैं। ऐसी छात्राओं पे कभी मत जाना ये
- 17:09तीर्थयात्राएं ये गंगा सागर, ये कुंभ स्नान, ये आज की ऐसा पागलपन
- 17:14छोड़ दो आज तुम्हारे भीतर। तीर्थ तुम्हारे भीतर स्नान हमारे
- 17:25भीतर बाहर के स्नान से उसकी मैल छूटती है, जो तुम हो, शरीर की मैल
- 17:34छूटती है, नहा तो तुम भोज लेते। तीन बार नहा लेते हो तुम ये
- 17:40कर्मकांडी ब्राह्मण तीन बार नहा लेते हैं लेकिन मैल छूटती है भीतर
- 17:49के कबीरा मान निर्मल भयो, जू गंगा को नीर, ऐसा होता है मन।
- 17:57तो फिर स्नान करने का फायदा क्या होगा?
- 18:02उस तीर्थ में स्नान कर लो जहाँ एक डुबकी लगाई बस चरा कर तन झुकाई ते
- 18:11करे दिल के आईने में थी तस्वीरें यार।
- 18:21होशियार की तस्वीर हमारे दिल के आयने में सदा सी है वर्ष तो गया
- 18:26था इतना अप्राप्य नहीं है, सदा मौजूद है और सदैव प्राप्त है।
- 18:36बस तुम उतरने की कामना पैदा कर इसे ही बिरहा कहती है मीरा इसे ही
- 18:45आग कहती है बिरहा बिरहा की अग्नि जब मीरा को जलाती है दुख देती है।
- 18:56तो वह स्वाद ऐसा की तड़पता भी है, रुलाता भी है, ओह उस ऐसा सुख भी
- 19:05कहीं नसीब नहीं होता, ये कुछ दर्द ही ऐसा है।
- 19:13जिसमें बहुत सी बूँदें आनंद की हैं।
- 19:18बस ये आनंद का स्वाद छोटा नहीं जाता तो मेरा कहती है मैं क्या
- 19:26करूँ? घूँघट उगड़ गया।
- 19:32तो मैं क्या करूँ? प्रीत तो हो गई तो मैं क्या करूँ,
- 19:42जियो? मैं ऐसा जान थी।
- 20:15इत न करियो को। जो मैं ऐसा जानती।
- 20:26प्रीत किए दुःख होय नगरे डंडोरा बूटती प्रीत ना करियो कोय।
- 20:34और खुद कहाँ छोड़ पाती ये बात बोल के भी मीरा खुद प्रीत को कहाँ
- 20:41छोड़ पाती है क्योंकि इस प्रीत के?
- 20:46बेरहा की याद में एक आनंद का रस्म है, वह नहीं छोड़ा जाता, वो तो
- 20:56शीज ले लो लेकिन आनंद का रस दे दो लाख से लाई मीरा।
- 21:04नगर में ढिंढोरा पीटती प्रेत न करिओ कोई लेकिन खुद से बाहर नहीं
- 21:09है। क्या है ऐसा जो प्रीत से बाहर
- 21:13नहीं आने देता? वही रस, वही स्वाद जिसे मैं आनंद
- 21:18रहता हूँ, काश तुमने उसकी एक बूँद चख ली होती।
- 21:26बोला ही चला जाता हूँ, बोला ही चला जाऊंगा उस आनंद के रस की एक
- 21:39बूंद मीरा फिर होती है फिर लाख वृहा की अग्नियों से जलाये।
- 21:46लेकिन उस साख से बाहर नहीं हो पाते।
- 21:49क्यों जानती है कि ये आग जीसको बसम करेगी?
- 21:55वह मेरा अहंकार होगा, व्यर्थ जल जाएगा, सार्थक जल सकता नहीं।
- 22:03नैनम दाह दीपा वका। व्यर्थ जल जाता है, सार्थक जल
- 22:11सकता ही नहीं, यही तो कृष्ण कहते हैं ऐसा क्या हुआ?
- 22:27यह बाहर ही नहीं निकला। देखिए ये तो बाबा की आज्ञा है।
- 22:3735 वर्ष तक अपने भीतर ही गुम रहा पीटर पीटर।
- 22:43और मुझे पता न था बाबा कि मुझे कह देंगे उठो भाई क्या?
- 22:48हुआ बाबा? उठो तुम्हारी जरूरत है उठो
- 22:56तुम्हारी चार अल्फाज़ अलफाज़ हुसैन तो मैं कहता हूँ।
- 23:03उठो तुम्हारे चार अलफाजों की आज जरूर आज बिपासु भटक रहे हैं इन
- 23:14चार अलफाजों के लिए तुम कहते हो जब आप बिरहा के गीत कहते हो तो
- 23:20आँखों से झरझर आंसू बहने लगते हैं।
- 23:26बिल्कुल ठीक कहते हो पुत्र झर झर आंसू बहेंगे, जो अपने भीतर के अंत
- 23:38स्थल से बोलेंगे? भीतर से लपड़ तपड़ के आया हुआ वो
- 23:42आनंद का रस आपको रोने पे भी विश कर देगा वो रोओगे किस लिए किसी
- 23:48दुख के कारण नहीं रोओगे बिरहा के कारण रोओगे जैसे मीरा रोती है और
- 23:55नाचती भी है। देखिए मज़े की बात आँखें रो रही
- 23:58हैं अचकबाह रही। पांव नृत्य कर रहे हैं।
- 24:04ये है दोहरा मापदंड क्यों? क्या तुम आदमी रहो ये आदमी न छे
- 24:13लेकिन ये बात तुम समझ न पाओगे। मेरा रोती है, इसलिए रोती है।
- 24:27आवन कह गए। हज न आए।
- 24:37आवन कह गए आज हूँ न आ रहे। प्ले।
- 24:48नहीं माँ रि खबरिया। महबूब हो गए सांवरिया।
- 25:14भूल गए सांग अरे यार। क्या तुम मुझे भूल गए हो क्या
- 25:22तुम्हे मेरी याद कभी नहीं आती, मैं यहाँ तड़प रही हूँ तेरे बिना
- 25:30जैसे पानी बिना नहीं। तड़पे।
- 25:35ऐसे ही मीरा कहती मैं तड़प रही मेरा की आग मुझे जलाई जाती है और
- 25:42तुम क्यों भूल गए? मैंने तुम्हे बहुत बार कहा है।
- 25:53कल भी कहा एक बार। जीस तरह से भी हो सके उसकी एक झलक
- 26:02देख लो सतौरी की झलक सतौरी की झलक तुम्हें विश्वास हो जाएगा कि वह
- 26:08है इसके बिना अध्यात्म में कोई रास्ता नहीं आगे चलने का।
- 26:16श्रद्धा, विश्वास, रूपणों या व्यायाम बिना ना कश्यप विश्वास के
- 26:22बिना नहीं चला जाता। नहीं देखता।
- 26:24विश्वास की डोरी तो आवश्यक है, इसका सहारा लेना पड़ेगा।
- 26:31दागा कच्चा लगेगा, लेकिन बड़ा पक्का है।
- 26:36सटोरी की झलके में तुम्हें विश्वास हो जाएगा, वो है और उसी
- 26:43विश्वास के सहारे कच्चे धागे के सहारे तुम अट्टहास करती मंजिलें
- 26:52के ऊपर खोद जाओगे। मुझे किसी ने कल पूछा था एक
- 27:01प्रश्न वो भी साथ लेते चले के भगत के लिए सबसे मुश्किल वक्त कौन सा
- 27:10डिफिकल्ट टाइम क्रिस्टल टर्न सतोरी से समाधि तक का?
- 27:18रास्ता सबसे मुश्किल रास्ता है उससे पहले तो तुम अज्ञानी हो मूड
- 27:27हो, तुम्हें पता ही नहीं उसकी थोड़ी सी खोज खबर तुम्हें कहीं से
- 27:32आई कोई प्रेम नहीं बरसा तुम पर। कोई तड़प नहीं बरसी तुम पर अभी
- 27:42तुम्हारे आँखें बंद हैं, तुम नैना मूंदे बैठे हो?
- 27:46सबसे मुश्किल वक्त है सतोरी से लेकर संबोधित तक की यात्रा बड़ी
- 27:52मुश्किल है पल पल रौना और पल पल उसकी याद आना।
- 27:57अजीब। दुविधाएं दिल को दिए क्यों दुख
- 28:12बिरहा के दिल को दिए क्यों? दुःख बिरहा के।
- 28:26यह सटोरी में विवाह शुरू हो जाती है, लेकिन मंजिल भी आई।
- 28:40महल बना के तोड़ दिया। क्यों महल बना के एक आस हो जाती
- 28:54है के हाँ वो है और शीघ्र ही मिल जायेगा।
- 29:00हास दिला, के वेधर दी हास दिला। के वेधर दी।
- 29:18फेर लिखा है, नजरिया आस दिला के वो वेदर दिही फेर लिखा
- 29:47है। नजरिया भूल गए सागरिया भूल गए
- 30:01सागरिया। सतौरी से यात्रा शुरू होती है से
- 30:07ही उससे पहले तुम्हारे सारे कमेंट बेकार है।
- 30:13काश तुम्हें सतौरी का अनूप हो जाता इसलिए मैं रोज़ कहता हूँ कुछ
- 30:19भी करो, कुछ भी करो। संतोरी की उसी झलक को देख लो,
- 30:26तुम्हें विश्वास हो जाए कि कोई अदृश्य शक्ति है उसके बिना तुम
- 30:30नहीं चल पाओगे। तुलसीदास का ये शब्द बड़ा कीमती
- 30:33है श्रद्धा, विश्वास, रूप यू नो या व्यायाम बिना ना पशन बस यही एक
- 30:41धागा है। लगता कच्चा है, लेकिन बड़ा पक्का
- 30:44है, स्टील से भी ज्यादा पक्का है इसके सहारे तुम अट्टहास करती हुई
- 30:50मंजिलें को छू दोगे, कूद जाओगे तुम और अगर ये न मिला।
- 31:00तो फिर और सारे जगत की चीजें तुम इकट्ठी कर लो उपाधियाँ तुम पालो
- 31:06गौरव तुम इकट्ठा कर लो सरे तुम ले लो, सब तुम्हारा हो जाये।
- 31:13इस अनुसार में जो भी कुछ है सब्र ना मिले।
- 31:20संतोष न मिले, तृप्ति न मिलेंगे और जैसे तृप्ति ही नहीं मिले वो
- 31:25भटकता ही रहा जब आवे संतोष धन हो सब धन दूर, सम्मान फिर छोड़ दो ये
- 31:36जो लोग। बरा बराया घर छोड़ के चले जाते
- 31:38हैं। बुद्ध जैसे महावीर जैसे ये पागल
- 31:43नहीं है, बहुत समझदार हो गए हैं। कहीं किसी कोने में ब्रह्म
- 31:51महेंद्र के किसी कोने में परमात्मा ने समझ भक्षी है।
- 31:56उतार दिए और और चुपचाप आंधी रात्रि को बाद घर से भागे।
- 32:07ये कुछ चोरु चक्के थे, कोई अपराध किया था इन्होंने?
- 32:16सब छोड़छाड़ के भागे जो तुम पाना चाहते हो, जिसके लिए भिक्षापत्र
- 32:24उठाए हों, जिसके लिए बेईमानी करते हो, झूठ बोलते हो, कफर तुलते हो,
- 32:30सुबह से शाम तक के देखो चैनल वाले क्या कुछ करते हैं।
- 32:36जो देखा नहीं वो बोलते हैं तुम पिछले जन्म में कौन थे, यह दंड
- 32:43तुम्हें क्या मिला, क्यों मिला, किस पाप का परिणाम है, इनको खुद
- 32:49नहीं पता। लेकिन क्या करें?
- 32:54ये पापी पेट का सवाल है बिलकुल भाई से भी तो पालना है महंगाई का
- 33:05जमाना, झूठ न बोलेंगे तो भूखे मरेंगे।
- 33:17बस ये मजबूरी है, देखा देखा कुछ नहीं और कोई भी हो मैं सरे आम नाम
- 33:26बोलता हूँ, सरे आम कहता। हूँ ये।
- 33:32राधे राधे करो कहने वाले। ये आचार्य लोग जो आपके सब
- 33:38प्रश्नों का जवाब देते हैं, इनका खुद का समाधान भी हुआ है।
- 33:45कौन है ये इन्हें नहीं मालूम। काश इन्हें पता लग गया होता तो
- 33:52तुमने पूछा पुत्र तुम 14 वर्ष से निकले क्यों नहीं?
- 33:57ये भी किसी कोने में बैठ के आराम पर मर के उस रस को पी रहे होते,
- 34:06उसमें डूब रहे होते, अठखेलियां कर रहे होते कभी।
- 34:16उस अमृत के स्वास्थ्य को छोड़ के बाहर कोई आया है श्रेय लेने के
- 34:21लिए नहीं आया। वह जानता है ये श्रेय देने वाले
- 34:26लोग यहीं नहीं रहेंगे और श्रेय लेने वाला व्यक्ति भी नहीं रहेगा।
- 34:33जब कुछ भी नहीं रहेगा ना श्रेय लेने वाला, ना श्रेय देने वाला तो
- 34:39फिर बचेगा क्या? फिर श्रेय लेने का अर्थ क्या है?
- 34:43यहाँ मुझे चारबा की याद आ जाती है।
- 34:46जब कर्ज लेने वाला और कर्ज देने वाला दोनों ही बसमभूता से देहज से
- 34:52पुनर आगमनम कुत्ता है। ये श्रेय लेने वाले और श्रेय देने
- 34:57वाले दोनों में से कोई भी नहीं बचेगा।
- 35:00तो फिर तुम श्रेय लेके करोगे क्या?
- 35:04भस्म भुतहस्य देयहस्य पुनर आगमनम कुतह।
- 35:09जब कोई आता ही नहीं जिसने कर्ज दिया, जिसने कर्ज लिया, दोनों ही
- 35:15खाक हो जाते हैं, वसम हो जाते हैं।
- 35:18फिर किसने ऋण लिया, किसने ऋण दिया?
- 35:26दोनों ही तो खत्म हो गए, भस्म हो गए, गंगा जी में प्रवाहित हो गए।
- 35:35सबसे मुश्किल यात्रा है सतौरी वहाँ से उडई की शुरू होती है।
- 35:44इंतजार, प्रतीक्षा बाणसी शुरू होती है।
- 35:50हमें दो शब्द क्यों बोले धैर्य और प्रतीक्षा शुरू होता है इंतजार
- 35:55पहले पहले धैर्य नहीं आता। सटोरी की झलक देखने के फौरन बाद
- 36:02प्रतीक्षा शुरू होती है। पहले प्रतीक्षा शुरू होती है।
- 36:06कब आओगे, कब आओगे? प्यारे हमारे।
- 36:17आँखों किताबें आओगे कब मारे पास राजस्थान के प्यारे हमारे आँखों
- 36:33किताबें। आओगे कब मार पास कब?
- 36:41आओगे हमारे पास मेरा कहती ये दर्द तो दे गए इसलिए कहते हैं ओह बे
- 36:54धरती? आस दिलाख फिर ली काहे नजरिया?
- 37:08मैं। भूल गए सब भईया चैन नहीं आता,
- 37:12करार नहीं आता, उलाहने ताने चलते हैं।
- 37:16रात भर जाग जाग की रात कट जाती है।
- 37:21चाँद भी अब नजर नहीं आता। अब।
- 37:31सितारे भी काम निकलते हैं। चाँद भी अब नजर नहीं आता।
- 37:43अब सितारे भी कम नहीं करते हैं। देखिए कितनी गिनती की होगी इस
- 37:47व्यक्ति ने। सितारे कम नहीं करते।
- 37:56याद मैं तेरी जाग जाग के हम रात भर कर।
- 38:09बदलते हैं और घड़ी दिल में तेरी अल्फत के धीमे धीमे।
- 38:26चिराग जलते हैं। धीमे धीमे चिराग जलते हैं हर घड़ी
- 38:37दिल में तेरी उल्फत के धीमे धीमे चिराग जलते।
- 38:46ऐसी व्यवस्था होती है। लेकिन स्टोरी से पहले।
- 38:52इसलिए मैं तुम्हें कहती हूँ कि कमेंट करने से पहले थोड़ा सा अपने
- 38:58भीतर अपनी अवस्था को देख ले। कितने मूड हो तुम कितने अज्ञानी
- 39:05हो तुम तुम्हें तुम्हारी अवस्था पे, तरस नहीं आती संतों को
- 39:12तुम्हारी व्यवस्था पे तरस आता है बोलते हैं, बोलते ही चले जाते हैं
- 39:18बिना किसी कारण। और गजब की बात कि तुम्हें
- 39:24तुम्हारी इस सिचुएशन पे तरस नहीं आता ना तुम्हारी आँखें छल छलकती
- 39:38हैं। ना तुम्हारा हृदय दुखता है, ना टी
- 39:42सूखती है हृदय में तुमने कुछ खो दिया, इसका भाव भी तो नहीं होता
- 39:51है तुम कुछ पालु इसकी जिज्ञासा भी तो नहीं होती।
- 39:59ये सटोरी से पहले की अवस्थाएं हैं पुत्र इसलिए मैं तुम्हे रोज़ कहता
- 40:09हूँ, किसी तरह भी अपना आपा छोड़ के।
- 40:17देख लो क्योंकि विराट हाथ हैं जो तुम्हें निचाती हैं।
- 40:25ऐसे ही तो जगत में इतना इतना भार बिना किसी लेंटर के बिना किसी
- 40:31सपोर्ट के खड़े नहीं रह सकता। ये ध्रुव तारा कहते 2000 गुना
- 40:38ज्यादा बड़ा सूरज से और सूरज कितना बड़ा लगता है तुम्हे और
- 40:452000 गुना ज्यादा बड़ा कहाँ छोर है उसका कहाँ अंत है उसका कहाँ
- 40:54आगाज है उसका? और तुम उसके बारे में कमेंट करते
- 41:01हो, कहाँ उलझ गए तुम सो रहे हो जाग रहे हो ना सोते हो ना जागे हो
- 41:13तुम मुर्छित हो। थोड़ा थोड़ा बहुत शुक्रिया
- 41:18तुम्हें और थोड़ा थोड़ा तुम सो भी रहे हो।
- 41:24ये बीज की अवस्था बड़ी दुखदायी होती है।
- 41:27तुम उसको भी पाना चाहते हो जो सदा सी है खिंचाव है उसका।
- 41:33और तुम इसको भी छोड़ना नहीं चाहते, जो कंकड़पथर इकट्ठे कर लिए
- 41:37हैं। संसार में मेरे पास लोग आ जाते
- 41:42हैं। बाबा 30 साल हो गए नाम लेते कैसे
- 41:44छोड़ दूँ? मैंने कहा मत छोड़ो, कौन कहता है
- 41:48छोड़ दो, मैं तो नहीं कहा तुम्हे छोड़ो।
- 41:52मैं कहता हूँ इससे मिलता नहीं जब भेजो छोड़ने को नहीं, मैं कहता
- 41:58हूँ राधे राधे जपते हो पांच नाम जपते हो 1000 नाम जपते हो, जपते
- 42:04रहो, मैं नहीं कहता छोड़ दो, मैं कहता हूँ मिलेगा नहीं।
- 42:11छोड़ो के तो तुम जब ऊब जाओगे, ये मैं कभी नहीं कहूंगा, छोड़ दो।
- 42:21ये जरूर कहूंगा कि मिलेगा नहीं और झपो थोड़ा सा तेजी से झपो मैराथन
- 42:30की दौड़ लगाने चले हो। थोड़ा और तेज दोड़ो जल्दी थक जाओ
- 42:35चेरखड़ी को मालिक की चेरखड़ी को और घूमा दो तेजी से रब रब रब मैडम
- 42:43जल्दी थक जाओ एनर्जी लेसनेस हो जाओ थोड़ा जल्दी।
- 42:59बिरहा की आँख अगर जलें नहीं तो तुम्हारे भीतर परिवर्तन भी कैसे
- 43:12होगा बिरहा की आग जलना जरूरी है तभी तो पानी उलेगा।
- 43:22ये आग ही तो उबालेगी पानी को और वह आग चरम पे पहुंचनी चाहिए।
- 43:28100 डिग्री पे 99 डिग्री तक पानी वाश पर नहीं बनता।
- 43:32ट्रांसफर्मेशन नहीं होती सिर्फ एक डिग्री का फर्क रह जाए तो
- 43:39ट्रांसफर्मेशन नहीं होती। बस एक डिग्री और वह जो तरल था कल
- 43:48तक आज इवैपरेट हो गया वास्व बन गया और उड़ गया आसमान में मेघों
- 43:55के साथ कलोल कर रहा है। तुमने प्रश्न पूछा पुत्र अलफाज़
- 44:03हुसैन क्या? 12 वर्ष 13 वर्ष से निकले क्या
- 44:09है? ऐसा कोई लकवा मार्ग है नहीं।
- 44:16कोई हाथ पांव चूकना टूट गया है नहीं कुछ नहीं टूटा है, टूटा था
- 44:20ठीक हो गया कोई बिमारी है नहीं बल्कि ज्यादा सवस्थ हूँ।
- 44:29पहले बीमार था, अब तो सारी दुनिया मुझे बीमार लगती है।
- 44:37पहले पागल था अब तो सारी दुनिया मुझे पागल था ना लगती है और देखो
- 44:45पागलों के संग कोई रहता है इसलिए दूर बैठा हूँ तुम पागल हो।
- 44:55तुम फाक कौन नहीं किस गढ़ी कोई पत्थर उठा के मार दे, पता चलता है
- 45:06इसलिए तुमसे दूर बैठा हूँ दरवाजा बंद करके।
- 45:17जब से उसका दीदार हुआ, उस परम प्यारे का दीदार हुआ।
- 45:25फिर कहीं और जाने का मन ही नहीं हुआ।
- 45:31जो सुख छज्जू दे चुवारे न बल्क न बुखारे।
- 45:37तुम्हारी बाहर की किसी भी शान शोकत में वो सुख को नहीं जो मुझे
- 45:49मिला उस घड़ी। जो सुख पायो राम भजन में जो।
- 46:15सुख पायोराम भजनों में वो सुख ना ही ना ही ना ही।
- 46:35अमरी में मन्नड़लाग्यो मेरो औरम फकीरी में।
- 46:51फकीर, मैं। मन।
- 47:02डु लागो मेरो होरो। जब फकीरी में मन लग जाता है।
- 47:13उस अस्तित्व की संगत मिल जाती है तो वहाँ जो आनंद है उसे छोड़ने का
- 47:22मन नहीं करता। यह है वास्तविकता इसी अंडरलाइन
- 47:26करना। जब तुम अपने अंत समय उतर गए, उस
- 47:37फकीर के पास चले गए जो सच में फकीर है जो चाहता नहीं कुछ फकीर
- 47:46वह है नहीं जिसने सब छोड़ दिया है।
- 47:50फकीर वह जिसे कुछ चाहिए नहीं शहंशाह वही जिसे कुछ चाहिए चाह
- 48:05गयी चिंता मटी चाह गयी चिंता मटी मनुवा बेपरवाह।
- 48:16मनुवा बेपरवाह जीसको कछु ना चाहिए वही सहनसा बसीर ही फकीरी का है
- 48:27डेफिनिशन जीसको कुछ नहीं चाहिए। कोई राज़ नहीं चाहिए, कोई पाठ
- 48:37नहीं चाहिए, कोई मशरूम नहीं चाहिए खाने को कोई सैर करने के लिए हवाई
- 48:44जहाज नहीं चाहिए, कोई वोट नहीं चाहिए, कोई नोट नहीं चाहिए।
- 48:51कुछ भी तो नहीं चाहिए, वही तो फकीर होता है और जीसको फकीर में
- 48:57आनंद आने लगा। वह किसी और की कामना करेगा क्या
- 49:06जो उस मुकाम पे जाके बैठ के? यहाँ कोई?
- 49:15तमन्ना शेष नहीं रहती चदपालियापेट कलंदर दा बुहक।
- 49:28खुल गया आपने हम दर्दा। बुहा खुल गया अपने अंदरदा सुखवासी
- 49:57हाँ सुखवासी हाँ सुखवासी हाँ। उसे मन दरिंदा जी फिर चढ़ दिया।
- 50:15जी। फिर चढ़ दिया ना लें दिया।
- 50:24जी थे चढ़ दिया ना लें दिया वहाँ चले जाते हो तुम यहाँ तुम्हें कोई
- 50:38खुशी उतेजना नहीं देती। जब मैं कोई दुख तुम्हें शोक नहीं
- 50:43देता, तुम अंधेरे में डूबते नहीं हो जहाँ जाके तुम कुछ खो नहीं
- 50:49सकते और पानी को कुछ है नहीं कुछ भी तुम्हारे लिए अप्रप्य नहीं
- 50:57रहता, कृष्ण कहते मैं हूँ। जीसको कोई भी तो कमी नहीं है और
- 51:06मुझे कुछ कुछ भी अप्रत्य नहीं है और मुझे कोई भी कमी नहीं है उस
- 51:13सतर्क पर जब व्यक्ति पहुँच जाता है वह हो जाता है फकीर और वही
- 51:17होता है सच्चा अमीर। हाँ, ये बातें शब्दों में बड़ी
- 51:24विरोधाभासी लगेंगी। लेकिन सत्य में ये एक जो तुमने
- 51:31पूछा बितर क्यों बैठा हूँ? क्योंकि उसकी संगति लग गई?
- 51:45लाली मेरे लाल की। जिसे।
- 51:52देखो तितला लाली खोजन। मैं चली लाली खोजन।
- 52:10में। मैं।
- 52:17भी हो गई ला। मैं चला था खोजने से फिर कुछ
- 52:30पाऊंगा, लेकिन वहाँ जाके पता चला कि पाने को कुछ है नहीं।
- 52:43संसार में सब मेरा है अहम् ब्रह्मास्व अनल हक मैं ही तो हूँ
- 52:52क्या पाना है? कोई कमी थोड़ी है लेकिन पता चलता
- 52:56है वहाँ जाकर और जिसे पता चल गया। जीसको कछु होना चाहिए वो ही
- 53:06सहिंसा वो क्यों डंबर करेगा, क्यों लोगों के सरेआम पंडाल में
- 53:15प्रश्नों का जवाब देगा? गहरे से देखोगे तो इसमें कुवासन
- 53:20हो पाओगे? ऊपर ऊपर से देखने में जैसे समुद्र
- 53:27के उपरी तहों में हीरे मोती जौहरत मिलते नहीं हीरे मोती जौहरतों को
- 53:33खोजने के लिए उसकी तह में जाना होता है।
- 53:37इसलिए तुम अचारों को सुनते हो ना? लेकिन अंत में पाओगे जुगा झाड़
- 53:42दोगे? यह धूल थी धूल के सिवा कुछ भी तो
- 53:48नहीं था हीरे ज्वाला तो सदा चु के रह गए यही पाओगे, सुन लो कौन
- 53:56रोकता है? 1000 आचार्य बैठे हैं 1000 सर लोग
- 54:05बैठे हैं और प्रत्येक व्यक्ति कहते हैं मुझे आज वो याद आई।
- 54:11गुरु तेग बहाद की समय के बाद सभी कहते हैं मैं गुरु, मैं गुरु, मैं
- 54:17गुरु। और अमरु तो बेचारा फिर उसका तो
- 54:24जहाज बच गया, जान बच गयी, मॉल बच गया, मक्खन शाह लुबाना जहाज डोरा
- 54:37भयंकर तूफान आया, समुद्र में कपड़े लगा सब कुछ पायलट भी हार
- 54:44गया पायलट ने कहा हम गए जहाज गया इतना भीषण तूफान मैंने ज़िन्दगी
- 54:53में कभी नहीं देखा। अपने अल्लाह को समर्पण स्मरण कर
- 55:04लो। आखिरी वक्त में जो तुम्हारी खुदा
- 55:09हैं उसको याद कर लो तो मारसन शाह लोगान बोले हे वाह गुरु।
- 55:20हे वाहे गुरु, सच्चे पाश हम मुसीबत में फंस गए भयंकर तूफान ये
- 55:33इतना बड़ा जहाज ये डमंडोर हो रहा है अटके दिया कारा।
- 55:37अब डूबा तब डूबा जहाज के भीतर पानी भरना सोते है।
- 55:44सच्चे पाशाह कृपा कर रहम बरसा। और बोल रहा है मैं तुझे सोह
- 56:01अशरफियाँ भेंट करूँगा। देखिए दान नहीं होता ये भेंट और
- 56:05दान में फर्क है दान करके तुम अहंकार में आ जाते हो भेंट करके
- 56:13तुम अहंकार में नहीं आते क्या? बड़े मज़े क्यों आते?
- 56:18इसलिए दान मत करना, डोनेट मत करना, यू नीड नॉट टु डोनेट
- 56:23एनीथिंग उससे तुम्हारा अंकार बढ़ जाएगा भेंट करना भेंट स्वरूप माता
- 56:30की भेटी नहीं खाते, बस वैसे ही भेंट करते।
- 56:38भेंट देने से अहंकार मजबूत नहीं होता, बस भेंट चढ़ा दिया।
- 56:50मखिंसा दबाने ने कहा हे परवर्तिका हे सच्चे पाश।
- 56:56मुसीबत का वक्त है कुछ सूझता नहीं तेरे सिवा एक तू ही है दरंका तू
- 57:07कृपा कर तू अपनी मेहर बरसा है। और मैं तुझे भेंट सुनो 100
- 57:19अशर्फ़ियाँ दान करूँगा सब कुछ लूटा जाता है लगता है मेरा कुछ
- 57:24रहेगा नहीं इसलिए दान देने की तो हैसीत मुझ में है नहीं 100
- 57:36अशर्फ़ियाँ वेइट् कर दूंगा तेरे शरणों में।
- 57:41बस अपनी कृपा बरसाते अपने रहम में से एक बूँद हमें भी देते हैं
- 57:49हमारे ये जहाज थम जाए ये तूफान और हम सुरक्षित अपने स्थान पर पहुँच
- 57:56जाए। बिल्कुल ऐसा ही हुआ, तूफान रुक
- 58:03गया बच्चों चाहे क्या नहीं कर सकता सृष्टि को बनाने वाला जीस
- 58:11एआई को तुम खोज रहे हो यहाँ से बैठे बैठे हजारों मीलों तक तुम।
- 58:17गाइड करते हो इन ड्रोन्स को क्या वह गाइड नहीं कर सकते हो?
- 58:21तुम तुम ड्रोन्स को गाइड कर रहे हो, तुम चंद्रयान तीन को गाइड कर
- 58:29रहे हो क्या वह कहीं दूर बैठा तुमसे?
- 58:36तुम्हें निचा नहीं सकता कठपुतली की तरह अकेले तुम ही निचा सकते हो
- 58:42ड्रोन को और मिसाइल को वह तुम्हें नहीं निचा सकता।
- 58:49यह बाकी सोच निकालता हूँ यह सोच बहुत होली आज तो विज्ञान भी खोज
- 58:55कर। अब कहाँ मुँह छुपाओगे अब कहने को
- 59:01क्या रहेगा? थम गया तूफान, किनारे लग गया
- 59:12जहाज। और माँ के निशा लुहान अपना सारा
- 59:15सामान ले के उतर गया। अब देखिए कि पहले सबसे पहले गुरु
- 59:21को वंदन करो, जिसने बजाया नवम गुरु गुरु तेग बहादुर जी थे,
- 59:29लेकिन पता नहीं था। सच्चा संत अपने आपको डिक्लेर कब
- 59:34होने देता है? मुझे अलेक्जैंडर पोक की कुछ
- 59:42शब्दियां जाग होती हैं, पंक्तियाँ बस वही संतों की पंक्तियाँ।
- 59:51लेट मी लिव उनसीन अन्नोन एंड अनले मेंटल लेट मी डाइ स्ट्रीट फ्रॉम
- 59:58दी वर्ल्ड एंड नॉट एस्टन टेल व्हेर आई लाइ मुझे ऐसे जीने दो।
- 1:00:10उनसीन अननोन। मुझे कोई जाने ही ना मुझे देखता
- 1:00:14हुई भी कोई पहचान ही ना एंड डाल ले व्हेन लेट मी डाई?
- 1:00:19और मुझे ऐसे मरने दो जैसे कोई पता ही ना लगे, कोई मर गया।
- 1:00:27स्टील फ्रम दी वर्ल्ड मैं ऐसे सुरा दिया जो संसार से, नाटे
- 1:00:33स्टोन कोई कब्रगाह के ऊपर लिखा हुआ शिला लेख ये ना बताये मैं
- 1:00:42कहाँ दफन। बड़ी प्यारी परकृतियाँ शुरू से ही
- 1:00:48मेरे हृदय में समाती रहेंगे। इन परकृतियों से मेरा कुछ अजीब
- 1:00:55रिश्ता है। वेतर का सच्चा गुरु कभी नहीं
- 1:01:01चाहता, वह छिपना चाहेगा। वह उघड़ना नहीं चाहेगा, वह मीडिया
- 1:01:11नहीं रखेगा। बस ये लक्षण है कुछ सत्य के
- 1:01:17खोजियों इन लक्षणों को पहचान कर ही गुरु को खोजना।
- 1:01:24क्योंकि यहाँ जो आता है वो चला जाता है।
- 1:01:27तथागत की तरह तथागत भी चले गए। सब चले जाएंगे और हम भी चले
- 1:01:36जाएंगे और तुम भी चले जाओगे। कौन बचा उसके सब?
- 1:01:46जो सदस्य है आज सच जुगाद सच है भी सच नानक खुशी भी सच वो ही रहेगा
- 1:01:56बाकी कुछ नहीं रहेगा, उसके सिवा उसके सिवा कुछ नहीं रहेगा।
- 1:02:07बाहर आया, पोटली निकाली, 100 अशर्पियां गिनी, बाहर आकर देखा,
- 1:02:15गुरुओं की किताब लगी है, पांडार लग गए हैं, किसने खिस्ती टोपी पहन
- 1:02:19रखी है किसी ने दाढ़ी पीली कर रखी है।
- 1:02:27कोई मोर मुकुट लगाए बैठा, कोई वैजयंती मारा डाले बैठा नकली
- 1:02:35गुरुओं की भरमार भरे भरे उसने पोटली में हाथ मारा।
- 1:02:42आवाज आई खन टन कान खड़े हो गए फिर तो आ गया भाई मुर्गा आ गया फंस
- 1:02:53गया मुर्गा मखन शालुमाना हाथ जोड़ के खड़े हो गए।
- 1:03:08हे गुरूजी महाराज मुझे बताइए नवम बादशाह कौन?
- 1:03:18तो सभी शिष्य ये पाले होते हैं ना?
- 1:03:20मीडिया वाले ये कहते हैं ये बैठे हैं देखो दिखता नहीं त्रिपुण्ड
- 1:03:25सजाए। ये दाढ़ी पीली की है, ये जुड़ा
- 1:03:31जटाए जटा जूट हो गए, ये गुर वही तो है हाँ हाँ, हाँ बस यही है।
- 1:03:41देखा तो आगे भी गुरों की लंबी कतार लग गई।
- 1:03:48लंबी कथा। आज।
- 1:03:54कुछ वक्त जल्दी ही बीत रहा है माखन शालवाना ने जखलजा तो बहुत
- 1:04:03है। फिर कौन असरी कौन नकली?
- 1:04:09मैं तो इतना प्रबुद्ध भी नहीं हूँ, मैं तो अज्ञानी, अज्ञानी
- 1:04:14व्यक्ति को ज्ञानी की पहचान कैसे आएगी?
- 1:04:18तुम कहते हो गुरु बनाइए जान के पानी पिए छान के मैं कहता हूँ भाई
- 1:04:23गुरु जानने की तुम्हारे पास चिंता है क्या?
- 1:04:27लुटेरे बैठे हैं जहाँ अरे भाई लुटेरे हैं, दुकानदार हैं।
- 1:04:38फिर क्या करे? माखन शरवाना ने कहा ये तो मुश्किल
- 1:04:43है गुरु को, मैं तो नहीं पहचान पाऊंगा कच्ची बुद्धि वाला मैं
- 1:04:48अज्ञानी ज्ञानी को कैसे कह सकूँ जिसने इतने बड़े संकट से उभार
- 1:04:54दिया? इतना बड़ा जहाज?
- 1:04:56और इतना भीषण तूफान रोक लिया उसको मैं मेरी शुद्र बुद्धि कैसे
- 1:05:02पहचानेंगी नहीं पहचानना हूँ? फिर ऐसे वक्त में विवेक काम करता
- 1:05:11है। विवेक कांख।
- 1:05:16ऐसा करो तुम पहचान तो नहीं सकते माखन तुम दो दो, देखते जाओ सभी को
- 1:05:27और क्या हो सकता है और कोई हल भी तो नहीं दो सर्फियां टेक आगे गुरु
- 1:05:35बुला रहे थे। आ जाओ इधर आ जाओ, आ जाओ ये चीखते
- 1:05:41चलाते मीडिया वाले ब्रेकिंग न्यूस ब्रेकिंग न्यूस क्या हुआ?
- 1:05:47वो जो अतवादी पकड़ के लाये थे उसको लघु शंका आ गई।
- 1:05:50पेशाब आ गया अरे फिर चलाने की क्या बात है भाई?
- 1:05:56भूख लगी पेशाब आया है कि नेचुरल प्रोसेसेस ऐसा चिल्लाने की क्या
- 1:06:02जरूरत है? लेकिन ये बांड होते हैं।
- 1:06:08क्राई के ऊपर लिया हुआ है। प्रत्येक राजा के दरबार में ये
- 1:06:14होते ही हैं। इनको अनदेखा नहीं किया जा सकता।
- 1:06:20ये होते ही हैं पुराने राजा अपने दरबार में बाण रखते थे, वो अपने
- 1:06:27कुल की वंशावली कहते थे। इस कुल में इतने इतने शेर वीर।
- 1:06:34शूरवीर महोदय हुए इतनी ख्याति प्राप्त हुए चक्रवर्ती थे, उनकी
- 1:06:42शिलागाह करते हैं, इनको भांड कहते हैं, आज हम मीडिया कह लेते हैं दो
- 1:06:52टेक दिए अगले। फिर वो बुलवाने लगे दो वहाँ की,
- 1:06:58फिर सब सब तरफ दो, दो देखते चले गए और कोई विवेक ने कहा और कोई हल
- 1:07:04भी नहीं है क्षण से मैं रहूँगा तो क्षण से तो विनाश करता है।
- 1:07:15दो दो टिकता गया। वह जाने को ही था।
- 1:07:19सब जो बैठे थे तम्बुओं के नीचे सब खत्म हो गए थे कि कोई फकीर तरह का
- 1:07:32व्यक्ति कहने लगा। किसी संत को तलाश रहे हो?
- 1:07:39हाँ हाँ गुरु को तलाश रहे हो, लेकिन यहाँ तो सभी कहते हैं मैं
- 1:07:45गुरु मैं गुरु। यह सिर्फ गुरु तेग बहादर के वक्त
- 1:07:51की कहानी नहीं है। इसी कहानी से तंग आकर गुरु गोबिंद
- 1:07:58सिंह जी को दिखना पड़ा। गुरु मान्य ग्रंथ यह तुम्हें भ्रम
- 1:08:03नहीं देगा, यह जो भी देगा वो ज्ञान की बात देगा।
- 1:08:09देह धारी को गुरु मत बनाना। यह ऊबे हुए व्यक्ति की बात थी
- 1:08:18जिसने साक्षात अपनी आँखों से देख लिया इन नकली गुरुओं का तमाशा
- 1:08:25सर्कस। वहाँ से बुलवाने लगे नकली गुरु का
- 1:08:33भी बुलाएगा या मीडिया को लगा देना या अपना प्रचार तंत्र फैला देना,
- 1:08:42ये चारों तरफ पुलिस तुम्हें पकड़े हुए है और तुम ऐसे खड़े हो ये
- 1:08:49क्या है? ये अपना तुम प्रसार ही तो कर रहे
- 1:08:57हो अटाइसमेंट तो है किसी ना किसी प्रॉडक्ट की अटाइसमेंट है ये कोई
- 1:09:05धन इकट्ठा कर लो, दुगना कर लो, 10 गुना कर लो, 50 गुना कर लो और
- 1:09:09क्या होगा? तुम्हारे दो जो सिक्के हैं वही धन
- 1:09:13है, लेकिन मीरा के लिए ये धन नहीं है।
- 1:09:19मीरा के लिए धन कुछ और है। राम रतन धन पायो जी मैंने राम
- 1:09:41रतन। धन।
- 1:09:44पा। वस्तु अमोलक दी, मेरे सत गुरु
- 1:09:57वस्तु अमोलक। दी।
- 1:10:02मेरे सत गुरु। वास्तु अमोलक दी मेरे, सतगुरु दी
- 1:10:21मेरे सतगुरु। कृपा कर अपना आयो जी, मैंने आयो
- 1:10:35जी मैंने राम रतन धन पायो उसके। लिए धन कुछ और राम रतन धनपाया।
- 1:10:46वहाँ जहाँ जाके आराम मिल जाता है राम आ आ राम राम के पास आ गए हम।
- 1:11:03दी मेरे सत गुरु दी मेरे सत गुरु दी मेरे सत गुरु।
- 1:11:23कृपा कर अपना आयो जी मैंने राम रत्न धन पा।
- 1:11:40जाते हुए रागी बोले एक। छोटी सी झोपड़ी लगती है दिखती है
- 1:11:47सामने हाँ उसमें तेकू कमला तेकू कमला कहते हैं उसे करो तेक बहादुर
- 1:11:55को तेकू कमला कहते थे। ऐसे लोग कमरे की तरह रहते हैं,
- 1:12:00बाल बिखरे हुए कोई शृंगार नहीं। कोई मेकअप नहीं है।
- 1:12:07सारे मेकअप तुम्हे भरमाने के ढंग है।
- 1:12:12तुम कैसे भरम जाओ? दूसरा कोई कारण नहीं है।
- 1:12:19स्त्री मेकअप करती है। ध्यान से समय पुरुष मेकअप करता
- 1:12:23है। सिर्फ अपने विरोधी साक्ष तंत्र को
- 1:12:27खींचने की चिष्ठा का प्रयास ये गुरु लोग इतना कुछ करते हैं
- 1:12:36ग्राहकों को खींचने का प्रयास। इस बात को अंत में ले जाना और इसे
- 1:12:45परीक्षा की कसौटी बना लेना। ये एक मपदंड है गुरों को परखने
- 1:12:49का। उसने कहा, चलो उसके पास भी चलते
- 1:12:53हैं, थोड़ी बच गई हैं। कोई बात नहीं चले, उसके पास देखा
- 1:13:10दरवाजा बंद था। झोपड़ी, छोटी सी झोपड़ी जैसे
- 1:13:12हमारे बाबा धर्मदास की समाधि नहीं, यहाँ बस छोटी सी कबाड़ है
- 1:13:20भीतर वह बैठे। जैसे राम किशन परमहंस समाधि में
- 1:13:25दिन होते थे, छोटी सी कुटियों में बैठते थे जाके थोड़ा सा हल्का सा
- 1:13:35प्रेशर डाला खिड़कियों पे खिड़की नमा दरवाजे थे वो।
- 1:13:44और खुल गए हो भीतर जो देखा बड़ा आलोकिक था आलोकिक आज तक ऐसा नूर,
- 1:13:57ऐसा नूरानी चेहरा। माखन शालवाना में कभी धरती में
- 1:14:03देखा नहीं था ऐसा गुरु जो का स्वरूप देखकर मंत्र मुग्ध हो गया,
- 1:14:18रोशन लम्बा हो जाएगा, ध्यान रखना। जाके प्रणाम किया, थोड़ी देर बैठा
- 1:14:29रहा, इंतजार किया, गुरूजी की आंख खुली, आशीर्वाद दिया और
- 1:14:36माखनशालवाना ने दो ये शर्तियाँ निकाली बांटी।
- 1:14:43गुरु तेग बहादुर कहते हैं, माखन शाह सूखे सोह के देवे दो, यह कोई
- 1:14:59उल्हाना नहीं था। यह एक बताने का चेष्टा क्रम था कि
- 1:15:06गलत जगह बेटे का है। आज पहली बार गुरूजी ने अपने मुख
- 1:15:12से ये प्रकट किया कि नवम गुरु में प्रथम बार माखन शालूबा।
- 1:15:23सूखे सो ते देवे दो मन्नत तो तुमने सो की मांगी थी, दिया तुमने
- 1:15:34दो और अपना कुर्ता यहाँ से उखाड़ दिया सारा खून से रतपथ।
- 1:15:41रकम ये देखो इन कंधों के सारे सारा भार उठा के मिले इसको पार
- 1:15:49कराया नत मस्तक। जब सच्चाई सामने होती है तो नत
- 1:15:56मस्तक हो जाता है। इसी संगति की बात मैं करता हूँ।
- 1:16:03शक्ति की संगत होने के बाद तुम वहाँ से उठ नहीं सकोगे।
- 1:16:07फिर माखन से अदबाना गुरु तेग बहादुर का हो के रह गया।
- 1:16:15ये संगति होती है जब तुम मेरे पास आती हो जाना।
- 1:16:21तो तुम बाहर से बड़ी लाशानी तरंगें साथ लेके आते हो, इस संसार
- 1:16:28में बाहर धूल है, गरदा है। हजारों लाखों लाखों तरह के कीटाणु
- 1:16:34हैं। सभी रोगों के कीटाणु हैं और उसके
- 1:16:38साथ तरंगें भी हैं। कुछ अच्छी भी हैं, कुछ बुरी भी
- 1:16:42हैं लेकिन बुरी ज्यादा है। उस धूल धमास को तुम साथ लेके आ
- 1:16:47जाते हो। इन्हें मैं लासानी तरंगें कहता
- 1:16:51हूँ और ये बड़ी खतरनाक है तरंगें। जो तुम्हें दौड़ाती हैं ये लासानी
- 1:16:59तरंगे तुम्हें भगाती हैं। ये तुम्हें दौड़ने पे विवश करती
- 1:17:04हैं। इनकी नेचर है।
- 1:17:09ये लासानी तरंगें जब तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होती है।
- 1:17:12रोय रोय से तो ये तुम्हे दौड़ाती है इसलिए संसार इतना दौड़ाता है
- 1:17:23इसलिए मैं कहता हूँ जिसने दौड़ना बंद करना हो।
- 1:17:29क्योंकि सबसे। बड़ी से बड़ी बाधा तुम्हारी।
- 1:17:32उस तत्व तक पहुंचने की दौड़ है और संसार की लासानी रंगों में अगर
- 1:17:38तुम उलझोगे। तो वह तुम्हें दौड़ना सिखाएगी।
- 1:17:41लासानी तरंगे हमेशा दौड़ना सखाती हैं और आसानी तरंगे हमेशा तुम्हें
- 1:17:47ठहरना सखाती हैं। ये तुम्हें भेद कर दिया मैंने तो
- 1:17:53बाजार में सब लासानी तरंगे हैं लासानी तरंगे यानी कि सभी?
- 1:17:59अपेक्षाओं से भरे हुए, वासनाओं से भरे हुए इच्छाओं से भरे हुए तृप्त
- 1:18:05कोई नहीं, अतिरिक्त आत्माएं यहाँ घूम रही हैं वह शरीरदारी हों।
- 1:18:12व अश्चरीली हों। सभी अतिरिक्त आत्माएं इनके संग
- 1:18:17तुम चले आ रहे हो लेबर। सब गर्दा गुबार साथ लिए मेरे पास
- 1:18:23आ जाते हो जान और मैं उसकी सत्यसंगति में बैठा हूँ उसका मदर
- 1:18:31रस भी रहा उस आनंद की बरसात। तो हर किसी पे होती है तुम पे।
- 1:18:37भी होती है। और।
- 1:18:41उसे पीता रहता है। सारी रात वहीं जो योगी कहते हैं
- 1:18:48भगवान कृष्ण संसार तुम्हारा सोता है, मेरा योगी जागता है।
- 1:18:56रात को मैं जागता हूँ उसको पीता हूँ, सारी रात पीता हूँ, सारी रात
- 1:19:01पिए ही चला जाता हूँ। और इतना पीता हूँ इतना पीता हूँ
- 1:19:11और। फिर जब जाग खुलती है तो।
- 1:19:144:00 बजे तक मुझे। होश नहीं है किसके कारण?
- 1:19:19सारी रात छुपी है सारी रात इस व्रत को पीने के कारण और मदहोशी
- 1:19:29का नशा ओह, खुमारी का नशा, नाम, खुमारी, नान काचड़ी।
- 1:19:40उसे लतपथ होता हूँ। इसलिए 4:00 बजे।
- 1:19:45से पहले जो मेरे पास आ जाते हैं फ़ोन।
- 1:19:47करता हूँ मैं कई बार? उठाता हूँ फिर और कई बार उठाता
- 1:19:52हूँ। और तुम गुस्सा कर जाना कर जाते हो
- 1:20:00कभी मैं जवाब नहीं देता, होश में नहीं होता।
- 1:20:06मैं तो होश। आनंद।
- 1:20:09में हूँ, मस्ती में हूँ। इसलिए हमने दीक्षा का वक्त चार के
- 1:20:18बाद रखा। लोग कहते हैं ब्रह्म मुहूर्त में
- 1:20:20रख लेते हैं। मैंने कहा तब तो मेरे पीने का
- 1:20:23वक्त जब मेरे पीने का वक्त। है तो।
- 1:20:29पीऊंगा जोडूंगा फिर ही? वितरित करूँगा।
- 1:20:31ना? तो पहले जोड़ने दो, पहले पीने दो
- 1:20:35फिर बाटूंगा सांज तिलक बाटूंगा। तुम आते हो बाहर से लुबड़ते बड़ते
- 1:20:44लासानी। तरंगों से और जब तुम एक बार
- 1:20:46प्रवेश करते हो, इस घर की दीवारें।
- 1:20:51और पहले बार घर के दीवारें आज आसानी तिरंगों को।
- 1:20:56पीपी के अपने। भीतर समा समा के परचूर भंडार अपने
- 1:21:01भीतर समाई हो गया और वो अनंतकाल तक बरसती रहेंगी।
- 1:21:08बहन से। वहाँ जो भी कोई बैठेगा, मस्त हो
- 1:21:12जायेगा। मन मस्त हुआ।
- 1:21:17फिर क्या बोल मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल तुम भी ऐसे ही अवस्था
- 1:21:28में आ जाओ। फिर तुम आते हो।
- 1:21:31तुम सोते हो चार? बजे तुम्हें सो काम है।
- 1:21:38जाना भी है। वापस भी जाना है।
- 1:21:43फॅक्टरी का? क्या?
- 1:21:44होगा। काम का क्या होगा?
- 1:21:451000? श्रृंकाएं हैं तुम्हारे मन में
- 1:21:47लेकिन जैसे ही तुम प्रवेश करते हो, द्वार के भीतर तुम लाख।
- 1:21:52बातें सोच के आते हो बाबा? से ये पूछेंगे वो पूछेंगे ये
- 1:21:56कहेंगे वो कहेंगे लेकिन यहाँ आते मस्त हो जाता।
- 1:22:02भूल जाते हो मैं क्या? पूछ रहा।
- 1:22:09हूँ यह है अचानक नहीं। अकारण नहीं होता इसके पीछे कर वो
- 1:22:17तिरंगे यहाँ। बिखरी पड़ी हैं उनको तुने भी?
- 1:22:19पी लिया। और पी लिया तो सब दुख दर्द तुम
- 1:22:22भूल गए एक बार भी और जब तक तुम उसकी गिरफ्त में रहोगे, तुम्हें
- 1:22:27याद नहीं आएगा फिर तुम यहाँ आ गए यहाँ आसानी तिरंगे हैं यहाँ कोई
- 1:22:37ऐसा आता ही नहीं। सिर्फ मैं ही रहता हूँ, मैं ही
- 1:22:40मैं और अपने प्रारूप में। अनंत प्रारूप में।
- 1:22:47खुले हृदय से। यहाँ आसीन।
- 1:22:50मैं सदा ही रहता हूँ बाहर कौन जाए?
- 1:22:55बाहर कौन है? मेरे सिवा।
- 1:22:58कोई है, कोई नहीं, मैं ही जहाँ जाऊंगा जहाँ जाइएगा।
- 1:23:11हमें। जहाँ जाएगा हमें खायेगा अजी रूठकर
- 1:23:30अब कहाँ जाएगा। कहाँ?
- 1:23:38जाइएगा जहाँ जाइएगा। वह हमें पाइएगा कहाँ जाऊं बाहर
- 1:23:43मैं सब जगह। अपने आपको पता हूँ।
- 1:23:50मेरे। इलाह कुछ और तो है नहीं।
- 1:23:55अनल हक मैं ही तो हूँ और कौन है मेरे सिवा?
- 1:24:00कोई भी नहीं। कहाँ जाऊं, किसके पास जाऊं?
- 1:24:07और? मेरे से ज्यादा मदहोशी में और
- 1:24:09कौन? मेरे से ज्यादा सरूर में और कौन?
- 1:24:13क्यों जाऊं नहीं जाता? क्यों बोले, मन मस्त हुआ, फिर
- 1:24:19क्यों बोल रहा है, क्यों जाऊं? कहाँ जाऊं जाने की कोई जगह नहीं,
- 1:24:28लेकिन तुम आते हो, जैसे ही दरवाजे के भीतर प्रवेश करते हो।
- 1:24:35तो तुम भी झूमने लगते हो वो हवाएं ही ऐसे।
- 1:24:38नशीले होते हैं उनका पैगाम। दूर दूर तक जाता है।
- 1:24:44वो तुम्हें भी घेर लेती हैं अपने आगोश।
- 1:24:46में। कोई भी आएगा उसकी जद में।
- 1:24:51वह प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। फिर तुम यहाँ आ जाते हो, माहौल
- 1:24:58बिल्कुल अलग है। बैठे रहते हो, शिक्षा ले लेते हो।
- 1:25:08फिर तुम सोचते हो कि बाबा जाने को मन नहीं करता।
- 1:25:12पहले मन। करता था।
- 1:25:16निगाहें मिलाने को जी चाहता निगाहें।
- 1:25:26मिलाने। को जी।
- 1:25:30चाहत हैं निगाहें मिलाने को जी चाहत, एक बार वहाँ जाऊं देखूं।
- 1:25:43क्या तो इतना शोर शराबा है? क्यों?
- 1:25:50इतनी गहमा गहमी जाके देखे तो यहाँ जाते हो, लेकिन यहाँ के सुरूर भरे
- 1:25:58माहौल में से निकलना नहीं चाहते, आके न जाने।
- 1:26:04को। जी।
- 1:26:07चाहता। है, आके न जाने को जी चाहता है
- 1:26:20निगाहें मेरा ने को जी चाहता। फिर आके ना जाने को जी चाहता।
- 1:26:29है। जहाँ बैठ जाऊं होगा थोड़ी देर बैठ
- 1:26:33सर। बस यही तुम्हें सीखाता हूँ मैं।
- 1:26:40जीस मुकाम पे, मैं चला जाता हूँ यहाँ से कुछ सीख के।
- 1:26:45जाओ। तुम्हारे भीतर बिल्कुल वही मुकाम
- 1:26:48है बिल्कुल और तुम इस मुकाम। पे आ सकते हो?
- 1:26:56यहाँ से अगर जाओ तो ये सीख के जाओ कि हम भी हम भी उसी मुकाम पे
- 1:27:02पहुँच सकते हैं क्योंकि वो सबके भीतर है।
- 1:27:10ऐसे घट में भी वह हो रखे जाने। का जो अज्ञानी होता है वो जानता
- 1:27:16नहीं लेकिन यहाँ से सीख के जाना कि तुम्हारे भीतर भी वो है जहाँ
- 1:27:22भी जाओ वहाँ जाकर। तुम कोशिश करना।
- 1:27:27की तुम अपने अंत स्थल में। पहुँच जाओ जैसे मैं बैठा हूँ, फिर
- 1:27:32बाहर जाने को जी नहीं करेगा फिर कुछ भोगने को।
- 1:27:37कुछ विषय वासनाय। विकास कुछ बाकी नहीं रहेगा।
- 1:27:43क्योंकि यहाँ माहौल है ठहर जाने का, आसानी तरंगें ठहराती हैं, अब
- 1:27:50इन बातों को निचोड़ के रूप में बोल रहा हूँ तुम समझने का प्रयास
- 1:27:54करना लासानी तरंगें संसार में तुम क्यों भाग रहे थे क्योंकि लासानी
- 1:28:00तरंगें दौड़ाती हैं। और आसानी तरंगें ठहराती हैं और ये
- 1:28:06आसानी तरंगें तो मैं। तुम्हारे भीतर से।
- 1:28:09सहज ही उपलब्ध हो जाएंगी। ज़रा भीतर उतरो तो उस तल पे
- 1:28:16उतरोगे। तो तुम तुम्हे कोई हाथ पकड़?
- 1:28:19के उस जगह पे नहीं ले के जाएगा। अपने अंत में तुम।
- 1:28:25स्वयं उतरोगे। रास्ता गुरु से ले लो, मार्गदर्शक
- 1:28:30है गुरु। फिर फिर तुम वहाँ चले जाओगे।
- 1:28:42जैसे अब मेरा दिल नहीं। करता कहीं जाने का।
- 1:28:45कुछ खाने का कुछ पीने का मैं जीता हूँ सिर्फ।
- 1:28:54कि शरीर चलता रहे, शरीर चलता रहे। तो तुम्हें कुछ बता सकूंगा।
- 1:29:005 साल। तक।
- 1:29:02शरीर चलाने के लिए मैंने खाया तो मैं इतनी बातें बोल सका।
- 1:29:10आने वाली पीढ़ियां इसका लाभ उठा ले।
- 1:29:13तो कृतकृत हो जाऊंगा मैं धन्य भागी हूँगा मैं।
- 1:29:19यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर अंत समय उतर जाए।
- 1:29:23उस मुकाम पर जहाँ मैं पहुंचा किसी की बात नहीं करता मैं, मैं खुद की
- 1:29:29बात करता हूँ तुम भी वहाँ पहुँच जाओ ऐसी।
- 1:29:34प्रार्थनाएँ, परम पिता से। पर अंत में तुम पाओगे तुम ही परम।
- 1:29:43विदा हो लेकिन ये अंत बात है। अभी तुम कहोगे।
- 1:29:48तो वह सिर्फ कल्पना होगी जैसे काशी के गंगा घाट में।
- 1:29:56महिला लिए हो, तुम जाप करते हो शिव हम शिव हम वो तो कल्पना और
- 1:30:02कल्पना सत्य नहीं होती। सत्य के लिए तो उस मुकाम को छूना
- 1:30:06होगा, उस मुकाम को छूना होगा और वह बैठना होगा।
- 1:30:10आचार्य उगासनम आचार्य के पास बैठना होगा।
- 1:30:15और आचार्य तुम्हारे विद्या बैठे हैं, बाहर नहीं आते बाहर तो सिर्फ
- 1:30:20कल्पनाएं। ही हैं आचार्यों की।
- 1:30:24पूछा है ये थोड़े सूक्ष्म से स्वर लगे हैं के आपका क्या बिगड़ता है?
- 1:30:34अगर कोई पांव हाथ लगा दे नहीं उस अवस्था में तुम।
- 1:30:37पांव हाथ मत लगाना जब तक मैं जग न जाऊं।
- 1:30:434:00 बजे से पहले अगर कोई। यहाँ आता है तो पांव को मत।
- 1:30:46छूना ये। तुम्हारे लिए भी हितकारी नहीं
- 1:30:51होगा और मेरे लिए तो। होगा ही नहीं।
- 1:30:54क्योंकि तुम्हें कोई फर्क पड़ेगा तुम पूछ।
- 1:30:56सकते हो? कि सवाल सूक्ष्म से यार तुम्हें?
- 1:31:00कोई फर्क पड़ेगा नहीं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, मुझे
- 1:31:04कोई फर्क नहीं पड़ेगा जो। वास्तव में मैं हूँ।
- 1:31:09फर्क पड़ेगा इस यंत्र को। इस जुगाड़ खाने को फर्क पड़ेगा इस
- 1:31:24सारे यंत्र को उपकरण को फर्क पड़ेगा अगर तुम उस अवस्था में
- 1:31:31मुझे टच कर दोगे। तो मुश्किल हो जाएगा तुम भी
- 1:31:38अज्ञात। से आके बाहर से आए।
- 1:31:40और पैरों के। हाथ लगाए।
- 1:31:42देखिए ये 20 और हैं 10 और 10 पांव के यहाँ से चेतना।
- 1:31:48जलती है हर वक्त। यहीं से जलती है।
- 1:31:54रोम रोम से भी। जलती है, लेकिन सबसे ज्यादा।
- 1:31:57इन 20 बोरों से सबसे ज्यादा? ऊर्जा और चेतना निकलती है।
- 1:32:04संत की। इसीलिए संतों।
- 1:32:07के हमने चरण। स्पर्श किया है।
- 1:32:10क्योंकि उनके जो। चरणों के उंगलियों के पोर।
- 1:32:13थे। वहीं से वृहद शक्ति बाहर निकाली
- 1:32:18और संतो ने अपने ये पोर आपके सिर पे रखे सर्कल पूरा हुआ बर्तन पूरा
- 1:32:24हुआ तुमने पांव के पोर छुए। और संत ने अपने हाथों के पोर
- 1:32:32तुम्हारे सच्च कंड पे रखे सहस्रार पे रखे ब्रह्म यंत्र पे रखे सर्कल
- 1:32:37पूरा हुआ। यही था पांव हाथ लगाने का महत्त्व
- 1:32:44और यही था आशीर्वाद देने का महत्त्व सिर पे हाथ रखने का
- 1:32:48महत्त्व। जो विवेकानंद के सर के ऊपर स्वामी
- 1:32:52राम किशन पर मनस ने हाथ रखा था। अगर तुम 4:00 बजे से पहले आ जाते
- 1:33:00हो। तो ये गलती मत।
- 1:33:03करना उससे नुकसान होगा। मेरा भी होगा मेरा यानी यंत्र का।
- 1:33:11मैं तो वो तत्व हूँ नैनं। छदन्ती शस्त्रणाणी।
- 1:33:14नैनं धाती पावकानय चैनम के लिए धन त्यापोने सुश्याति मारो ता, लेकिन
- 1:33:21मैं यंत्र नहीं। हूँ ये ध्यान रखना।
- 1:33:25ये यंत्र विनाश का? भक्ष 1 दिन मट जाएगा, इसको फर्क
- 1:33:35पड़ेगा और अभी इससे काम लेना है इसके बैठे बैठे जब तक।
- 1:33:42मैं आसीन हूँ इस। घर में।
- 1:33:45इस यंत्र में जब तक मैं आसी हूँ, तब तक ही तुम्हारे काम पडूंगा
- 1:33:52उसके बाद। काम तो पडूंगा डेक्कन।
- 1:33:55कम उसके बाद कहीं चेतना को उतार दूंगा।
- 1:34:02फिर वहाँ से चलाऊंगा सरकार जितना हो सकेगा, लेकिन जब तक मैं शरीर
- 1:34:11में बैठा हूँ, तब तक बोल सकता हूँ बस यही।
- 1:34:16फायदा है और जब मैं शरीर से बाहर हो जाऊंगा तब सारी चेतना तो
- 1:34:20बिल्कुल यही होगी। ऊर्जा भी यही होगी।
- 1:34:23कान्शस्नस भी यही होगी, लेकिन बोलना चाहूंगा यंत्र नहीं होगा
- 1:34:30यंत्र क्या इसलिए? इस यंत्र को संभालने।
- 1:34:33की पूरी चेष्टा तुम भी करना और मैं भी करता हूँ।
- 1:34:39और जब मैं बुला लूँ के ठीक आ जाओ। तब मैं सारे।
- 1:34:45जो मैंने ढंग आजमानी। वो मैं सारा कुछ करके बैठता हूँ
- 1:34:49तुम फिर पांव को हाथ लगाते हो, कोई बात नहीं फिर तुम्हें
- 1:34:54आशीर्वाद भी। मिलेगा।
- 1:34:55फिर तुम्हें दीक्षा भी मिलेंगे। सब मिलेगा।
- 1:34:59लेकिन अचांचक आके ऐसे पांव के हाथ मत लगाओ गड़बड़ हो जाएगी अब
- 1:35:06समझाती तुम्हें बाहर से। आते हुए लासानी तरंगों को।
- 1:35:09लेकर यहाँ आसानी तरंगें यहाँ आके तुम्हें खुशी महसूस।
- 1:35:14होती है यहाँ पर आके। जाने को दिल नहीं करता।
- 1:35:17इस कारण समझा गया क्योंकि आसानी तरंगे तुम्हें ठहराती हैं और तुम
- 1:35:22ठहरना चाहते हो। तुम दौड़ना नहीं।
- 1:35:27चाहते दौड़ दौड़ कर। थक गए हो कितने जन्मों से दूर ही
- 1:35:31तो रहे हो? बहुत ही जन्म बीत हैं मेरे।
- 1:35:38ये जन्म तुम्हारे देखे? इसलिए तुम ठहरना चाहते हो?
- 1:35:45बड़े जन्मो से, तुम। भटक रहे हो, भाग रहे हो भटकना
- 1:35:50याने भागना, ठहरना याने पहुँच ही जाना।
- 1:35:58तो यहाँ से ठहरना सीख के जाना, थोड़े से वक्त के लिए आए, एक चीज़
- 1:36:06संग लेके जाना, क्या ठहरना? अब जैसे मैं ठहरा हूँ तो मुझे कई
- 1:36:13बार जड़ वत पाओगे। जड़ है।
- 1:36:17इसलिए हमने भगवान बुद्ध की ओर भगवान महावीर की जो मूर्तियां
- 1:36:22बनाई, वो जड़ वत् बनाई। और हमने सारे मंदिरों में
- 1:36:29मूर्तियां लगाईं। जड़ की लगाईं।
- 1:36:33कि जब तुम पहुँच जाओगे तो ऐसा हो जाएगा।
- 1:36:37तुम्हारा बाहरी स्वरुप, तुम्हारा जी यंत्र, तुम्हारा जी उपकरण ऐसा
- 1:36:46ऐसा हो जाएगा, बिलकुल कोई हिलजुल नहीं।
- 1:36:52बुद्ध की तरह जस्ट। लाइक ए स्टेट्यू ये।
- 1:36:57तुम्हे याद कराने के लिए था ये। तुम घंटा लगाते हो मंदिरों के
- 1:37:03बाहर ये पहली आवाज? में 1 घंटे की आई भीतर।
- 1:37:08जाओ बाज नाद अनेक अशंका। बड़े तरह के नाद फिर आएँगे जा ठकर
- 1:37:18दे डेरे बढ़िया जीथे वज़दे नाद 1000 इश्क दी नमी नमी बहार एक
- 1:37:30घंटे की। हे प्रभु, मुझे उस स्तर पर ले जाओ
- 1:37:34एक प्रकार की मूक। मांग हे प्रभु, मुझे उस स्तर पर
- 1:37:41ले जाओ। जहाँ ऐसी आवाज आती है घंटा या ने
- 1:37:45आनंद? फिर और भी बहुत रहती आवाजें आती।
- 1:37:53ये सारे बाहर के सिम्बोलिक रिप्रजेंटेशन अप्रीविएशन थे।
- 1:37:58जो भीतर घट रहे हैं उनका बाहर विश्वास दिलाने के लिए याद दिलाने
- 1:38:04के लिए जस्ट टु रेमेम्बेर बट इस हैपनिंग इनसाइड यू।
- 1:38:13सब भीतर जो घट रहा है वो याद कराने के लिए बाहर हमने।
- 1:38:16प्रतीकात्मक चिन्ह बना दिया। तुम यहाँ आते हो आसानी तरंगों
- 1:38:25में। ठहर जाते हो जाने का मन नहीं
- 1:38:27करता। ऐसे ही।
- 1:38:31तुम घर बैठे हुए इन तरंगों को पैदा कर सकते हो यहाँ से जाओ, ताश
- 1:38:36भी तो खिलते हो कमीन में। बैठते हो?
- 1:38:41500 1000 लोगों। के बीच में बैठते हो प्रत्येक के
- 1:38:45शरीर के रोम रोम। लासानी तरंगें उगलते हैं और तुम
- 1:38:50सब की तरंगों को पी के आ जाते हो फिर भारी हो जाता है चैन नहीं
- 1:38:56आता, तुम्हें पता ही नहीं चलता ये कूड़ा कपड़ा मैं कहाँ से लेके आ
- 1:39:00गया? यह सिनेमा हॉल में गए थे भाई वहाँ
- 1:39:03से लेके आ गए। ये बाजार में गए थे।
- 1:39:07वहाँ से ले के आ गए। मुझे 13 वर्ष हो गए।
- 1:39:11मैं बाजार में ज्ञान लासानी रंगों से बहुत दूर सिर्फ एक ही प्रकार
- 1:39:18के तरंगे जो मुझे मस्त रखते हैं और जब कभी 1015 मिनट 5 मिनट के
- 1:39:25लिए मैं। कहीं जाना पड़ता है।
- 1:39:27बीमार हो गया तो हॉस्पिटल में डॉक्टर के पास है, शरीर है इस
- 1:39:34षडयंत्र के। लिए दवा भी चाहिए।
- 1:39:37इसको भोजन भी चाहिए तो वहाँ वहाँ। के तरंगे देखकर मैं घबरा।
- 1:39:43जाता हूँ हे भगवान। कहाँ था में भी याद आती है पुरानी
- 1:39:56यहाँ मैं भी 1 दिन भटक रहा था इन गलियों कुचों में।
- 1:40:01धूल घमासों में मैं भी। खेला हूँ और इन्हीं को जीवन माना
- 1:40:07जबकि जीवन तो यही है जो मैं आज जी रहा हूँ।
- 1:40:14तो यहाँ तुम आते हो, फर्क है बाहर से लासानी तरंगन तुम घूम रहे हो,
- 1:40:22हमारा मन भागेगा और भक्त वह मन क्या सोचेगा तन कमालू पदवी कमालू
- 1:40:27श्रेय कमालू जो तुमने किया नहीं? उसका श्रेय कमाने में लग जाओगे।
- 1:40:33कौन देगा श्रेय जो आज है और कल नहीं है और श्रेय लेने वाला आज है
- 1:40:39और कल नहीं होगा ऐसे कुछ। व्यर्थ की बातों को तुम कमाने में
- 1:40:49निकल जाते। हो वो पदार्थों जो तुम्हारी संग
- 1:40:52नहीं जाएगा ऐसा ऐसा। कुछ तुम्हारा मन तुम्हें भटकाएगा
- 1:40:57दौड़ता। हुआ मन भटकाता है और ठहरा हुआ मन
- 1:41:03तुम्हें आनंद में डुबोरता है। और कोई प्रश्न तुमने कहा क्यों
- 1:41:13बैठे हो? बस ये कारण है मैंने।
- 1:41:15बताया पुत्र अल्फाज़ हुसैन। ये है कार।
- 1:41:22मेरा। जैसा।
- 1:41:25तुम्हारा यहाँ से जाने को ये नहीं करता वैसा ही मेरा यहाँ से जाने
- 1:41:30को ये नहीं करता जब तक। शरीर में बैठा हूँ।
- 1:41:36इस यंत्र को मैं ठीक रखने की। चेष्टा कर रहा।
- 1:41:39हूँ। इसको भोजन वगैरह की व्यवस्था।
- 1:41:42सही मात्रा में। सही दे रहा हूँ उछलता रहे।
- 1:41:48ज्यादा कृष्ण भोजन वगैरह मैं नहीं देता सिर्फ 300 ग्राम।
- 1:41:51दूध लेता हूँ एक बार का तीन बार मैं दूध लेता हूँ, ये मेरा पक्का
- 1:41:56रूटीन है पिछले 13 वर्षों से। 24 मई को मुझे चौदहवाँ वर्ष लग
- 1:42:02गया। जब कोई वनवास नहीं है, यह
- 1:42:06स्वेच्छा से दिया हुआ वनवास बस जैसे मन।
- 1:42:11में बैठता ना आदमी? ऐसे ही मुझे वनवास का आनंद आता है
- 1:42:15और मैं समझ पाता हूँ भगवान ने वनवास के दिन कैसे गुजारें होंगे।
- 1:42:19बड़े प्यारे गुजारें होंगे। इसलिए वो खुश हुए जब वनवास की
- 1:42:27उन्हें। हुकम हुई तो बड़े प्रसन्न हुए
- 1:42:31बेदर्श। तुमने पुत्र पूछा मैंने तुम्हें
- 1:42:37प्रश्नों का जवाब दे दिया। और किसी का कोई प्रश्न हो।
- 1:42:40वीडियो तो लंबी हो चुकी है, थोड़ी सी और पांच चार मंथ बोल दूंगा,
- 1:42:43कोई फर्क नहीं। पड़ता।
- 1:42:49हर कृष्णा, कृष्ण, कृष्णा, हर हर हर राम।
- 1:43:07रामा रामा हर हर, हर कृष्णा, हर कृष्णा, कृष्ण, कृष्णा।
- 1:43:26हर हर हरराम, हरराम, हर हर, हर हर कृष्ण।
- 1:43:56धन्यवाद।