Latest / Baba ji Vijay Vats / 19 Jan 25 - दुनिया का सबसे पहला इंसान कौन था जो जागृत हुआ? क्या कृष्ण भी वासना में बंधे हुए थे? Osho!
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- 0:25आनंदमूर्ति मेहता बाबा जी एक प्रश्न जो मुझे सनातन धर्म में
- 0:38विश्वास करने से रोकता है। क्या आप उसका निराकरण कर पाएंगे?
- 0:55जो सभी वासना से मुक्त हो गया? जिसकी इच्छाएं गिर गई तृष्णाएं
- 1:04कल्पनाएं गिर गई जिससे समझ आ गया कि मैं कौन हूँ?
- 1:14उसके बाद भी भगवान कृष्ण? 1,61,081 बच्चे पैदा करते हैं।
- 1:39मुझे ये समझ नहीं आता हमारे बड़े से बड़ा वैव्यचारी दुराचारी।
- 1:49भी इतना अंतरम लक्षणों में नहीं जाता होगा जितना भगवान कृष्ण
- 1:54करें। यह क्या है प्रभु अगर आप मेरी इस
- 2:04बात का जवाब दे दें? तो मैं सनातन धर्म को मानना शुरू
- 2:10कर दूंगा आनंदमूर्ति मेहता। पहले आप इस फर्क को ठीक से समझ
- 2:35लो। ज्ञानी और ज्ञानी में भेद क्या
- 2:41है? एनलाइटन एंड नॉन एनलाइटन पर्सन
- 2:51व्हाटस दी डिफेंस? ज्ञानी वह जिसने अपने आप को जान
- 3:00दिया मैं हूँ कौन? वास्तव में कौन शरीर हूँ, मन हूँ
- 3:10या उससे परे? आनंद स्वरूप सत्य चेत आनंद।
- 3:19मैं हूँ क्या वास्तव में और अज्ञानी वह जो वास्तविकता को नहीं
- 3:28जानता अपने होने की सत्यता से परिचित नहीं है।
- 3:37जो मान्यताओं से परिषद है। लोगों ने कह दिया लोगों ने जो नाम
- 3:44रख दिया वही उसका नाम हो गया। हमने अपने नाम खुद नहीं रखे।
- 3:55हमारे माँ बाप ने रखे अज्ञानी व्यक्ति नहीं जानता कि वह वास्तव
- 4:09में कौन है ध्यान से समझना एक एक शब्द को।
- 4:15और ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि मैं वास्तव में कौन हूँ और जो ये
- 4:21जानता है मैं वास्तव में कौन हूँ वह ये भी जानता है कि मैं वास्तव
- 4:25में क्या नहीं हूँ, लेकिन अज्ञानी व्यक्ति न कि ये जानता है।
- 4:34कि मैं कौन हूँ और नय जी जानता है कि मैं कौन नहीं हूँ अज्ञानी
- 4:40अंधकार में है अज्ञानी रौशनी में है उसका एक एक पल।
- 4:50और शनाई में गुजरता है। प्रश्न आपका बहुत बढ़िया है।
- 5:00शायद इन प्रश्नों की वजह से ये गुत्थियां हल हो जाए जो कि
- 5:09श्रद्धा के लिए बनी रहती हैं। और मुझे आश्चर्य होता है आज तक
- 5:17कथा वाचक तो बहुत लेकिन इन गुत्थियों को सुलझाने के बजाय और
- 5:24और उलझाते रहे। कहानियों में रंग दिया गया।
- 5:34उदाहरणों में रंग दिया गया। सत्य से परिचित नहीं थे ये लोग जो
- 5:43सनाथिन की व्याख्या कर रहे थे। तो ठीक किया तुमने प्रश्न कर लिया
- 5:52ऐसे खतरनाक तरह के प्रश्न मेरे बैठे बैठे मुझसे पूछ लो, मैं नहीं
- 6:00समझता, क्योंकि अतीत में देख रहा हूँ।
- 6:03अतीत में किसी ने ऐसे प्रश्नों का निवारण किया नहीं।
- 6:07कृष्ण कोई आज तो जन्मे है कृष्ण को जन्मे को 5000 साल से ज्यादा
- 6:16हो गया और 5000 साल से किसी ने इस प्रश्न को पूछा नहीं और किसी ने
- 6:23जवाब नहीं दिया। अगर पूछा होगा तो डालमटोल कर दिया
- 6:29होगा, कोई कहानी गढ़ती होगी। सीधा सीधा जवाब नहीं दिया गया।
- 6:35जिससे के सनातन की सटीकता का पता रखें।
- 6:41सनातन का प्रचार प्रसार हो सके ये लोग।
- 6:48सनातन का खूब प्रचार कर रहे हैं, क्योंकि इनमें अपना अनुभव नहीं
- 6:54है, बस स्वय अनुभव का अभाव अंधकार पैदा करता है, जिसकी खुद की
- 7:03गुत्थियां नहीं सुलझें। दूसरों को कैसे सुलझायेगा यही
- 7:09वैसा है, आज मानवता है। तुमने प्रश्न बहुत स्टीक किया और
- 7:20ऐसे प्रश्न सिरे के प्रश्न होते हैं।
- 7:24अब मैं तुमसे ये कहता हूँ आवाहन करता हूँ ऐसे प्रश्न मेरे बैठे
- 7:30बैठे मुझसे पूछ लो, अन्यथा मैं अंधकार ही अंधकार देख रहा हूँ जब
- 7:38उन गोल्डन पीरियड्स में जिनको तुम अतिशोभ कहते हो?
- 7:44उनमें इन बातों का जवाब नहीं मिला तो आगे तो घोर अंधकार अंधकार का
- 7:50सामरज्य जाने को शेष है। प्रश्न अति सूक्ष्म है।
- 8:03गहरा है, जटिल है और अगर आपकी सनातन के ऊपर श्रद्धा नहीं बन रही
- 8:15है तो तुम बिल्कुल ठीक हो। कम से कम तो मोरू फ़िल्म है।
- 8:24कम से कम तुम इन प्रखंडियों के पीछे आँख मूँद के नहीं लगे हो।
- 8:31तुम अंत भक्त नहीं हो और मुझे खुशी है जीतने अन्त भक्त कम
- 8:39होंगे। अंधानुसरण नहीं करेंगे।
- 8:43बात को विचार करके देख के फिर फैसला करेंगे, उतना ही प्रकाश
- 8:52होगा। इस संसार में और प्रकाश का आनंद
- 8:57कुछ और होता है। झूठ में वह आनम का नहीं होता जो
- 9:09सत्य में होता है, सत्य से गुथियां होती हैं।
- 9:16और गुत्थियों के खुलने से बंधन खुलते हैं और बंधन से बंधन के
- 9:23खुलने से मुक्ति आती है। प्रश्न बिल्कुल सटीक किया, अब
- 9:32इसका जवाब शुरू करें। तो शांत होके बैठ जाइए, एकांत में
- 9:38बैठ जाइए, कोलाहलहीन वातावरण में बैठ जाइए, अपनी सारी शक्तियां को
- 9:46बाहर से समेट लीजिए जैसे आपने कुछ नहीं करना, सिर्फ इस वीडियो को ही
- 9:53सुनना है। आप कान ही बन जाओ, सिर्फ सिर्फ
- 9:59सुनो इसे ही शरावत कहा महावीर ने मैं अंधानुकरण करने को नहीं कहता
- 10:11सुनना परखना। मनन करना, कसौटी पे अपने अनुभव के
- 10:18भीतर जाना और देखना ये ठीक है या गलत है?
- 10:29कृष्ण सनातन इन्हें अवतार कह के बात खत्म कर देता है।
- 10:36नहीं बात नहीं खत्म होती। कृष्ण बच्चे पैदाब करते हैं एंड
- 10:50ही इज़ एन एजेंट बिना शक दीजिए हम इसको गहराई से बिजली शिप करते
- 11:01हैं। एनलाइटन्ड एंड नोन एनलाइटन्ड
- 11:08पर्सन्स की व्याख्या मैंने कर दी, जो खुद को वास्तविक रूप से जानता
- 11:14है। मैं कौन वह एनलाइटन्ड यानी
- 11:18ज्ञानी? जो खुद को जानता नहीं वास्तव में
- 11:23कि मैं हूँ कौन और मैं कौन नहीं हूँ?
- 11:27वह अज्ञान हूँ, ये सीधी सीधी पर बादशाह ले लीजिए।
- 11:34चलो आगे चले। किसी व्यक्ति को ज्ञान हो गया और
- 11:45ध्यान रखना किसी भी व्यक्ति को किसी भी वक्त ज्ञान हो सकता है।
- 11:53क्यों? क्योंकि जो तुम हो उसमें कब छलांग
- 11:59लग जाए कोई पता नहीं। लेकिन क्या होगा?
- 12:07उन विचारों का? क्या होगा?
- 12:09अचेतन मन का जो बराबर है तो एक रास्ता तो मैंने बताया कि चेतन को
- 12:16खाली करते जाओ, खाली करते जाओ, क्रिया योग के द्वारा खाली करते
- 12:20जाओ। तो जब सब खाली हो जाएगा, देर तो
- 12:25लगेंगी बहुत लगेंगी लेकिन जब सब खाली हो जाएगा तो जो रह जाएगा वो
- 12:33तुम हो प्रकाश स्वरूप आनंद स्वरूप सत्य चेतन।
- 12:47और दूसरा तुम सहज भी। जैसे अष्टावक्र कहते हैं।
- 12:53जनक को जनक तो इस जीवन में मुक्ति की बात करता है।
- 13:05मैं तुम्हें घोड़े के एक पायदान से दूसरे पायदान तक पांव रखने में
- 13:10जितना वक्त लगता है, इतने वक्त में ही प्रबुद्ध कर सकता हूँ कर
- 13:19सकते हैं बिलाशक तुम जो हो। वास्तव में जो हो, उसमें किसी भी
- 13:29वक्त छलांग लग सकती है। क्या हुआ ऊँगली मार का, क्या हुआ?
- 13:39वाल्मीकि का कोई तप नहीं किया। नांगली मरने किया नरक्ष न करने
- 13:47किया। उल्टा ना जपे ते जाना।
- 14:03बाल में एक भय ब्रह्मसमानो नाम भी उल्टा और कोई तप भी नहीं और कोई
- 14:19विधि भी नहीं। और बाबा कहते हैं कि विधि की कोई
- 14:24आवश्यकता नहीं। ज़ोर न जुगति छोटे संसार इस संसार
- 14:32से मुक्त होने के लिए किसी भी जुगती में कोई ज्योर नहीं है तो
- 14:36बाबा कहते हैं कि कोई जुगति मत करो, छोड़ दो सब युक्तियों को।
- 14:45जो भी करते हो, अपने आपको दण्ड देते हो, अपने अहंकार की पुष्टि
- 14:53करते हो। मैंने ये किया, वो किया तप किया
- 14:57मैंने व्रत किया, अपवास किया माला फेरी।
- 15:04तीर्थ गया आज गया सब करना गिना देते हो तुम उससे तुम्हारा अहंकार
- 15:13फूलता है, बढ़ता है कर्तन और अहंकार जड़ है ज्ञान अज्ञान के।
- 15:22ज्ञान का दुश्मन है अहंकार तो तुम किसी भी वक्त भीतर छलांग ले सकते
- 15:34हो। वाल्मीकि ले गए ऊँगली मार ले गए,
- 15:39बुद्ध की मौजूदगी में ले गए अब जो बात कही नहीं जाती।
- 15:45क्योंकि कोई उस वक्त साक्षी नहीं था हुआ क्या?
- 15:51बुद्ध की मौजूदगी में अंगुली माल भ्रमण हो जाता है यानी ब्रह्म का
- 15:57ज्ञाता हो जाता है, लेकिन होता है बुद्ध की मौजूदगी।
- 16:04अब तक उंगलियां काटी, सिर काटे, उनकी उंगलियां काटी और गले में
- 16:12डालनी और एक ऊँगली शेष रहती थी तो वो उस रास्ते से जाने लगे।
- 16:22सभी शिष्य रुक गए। लोगों ने कहा ग्रामवासियों ने इधर
- 16:25से मत जाओ भाई क्योंकि यहाँ एक डाकू है, अंगुली मार वो मार देता
- 16:33है सब को उनकी ऊँगली गली में डाल देता है।
- 16:37उसने प्रण लिया है। और एक ऊँगली की कमी है उसके पास
- 16:43बस एक ऊँगली पूरी हो गई तो वो छोड़ देगा हत्या, उसका प्रण है तो
- 16:51मत जाओ। शिष्य डर गए।
- 16:57लेकिन बुद्ध नहीं डर रहा है बुद्ध कहाँ डरता है?
- 16:59जो डर जाए वो बुद्ध नहीं होता खुद कहने लगे कोई बात नहीं मैं जाऊंगा
- 17:13शिष्य पांव पड़े हाथ जोड़ के खड़े होकर रोने लग गए आँखों में आंसू।
- 17:22बड़ा रोका ग्राम वासी नगरोका मत जाओ, प्रभु वह तुम्हें मार देगा
- 17:33उसे एक ही ऊँगली की आवश्यकता है बहुत दिनों से उस स्थान से।
- 17:40किसी भी दिशा से कोई व्यक्ति आया नहीं।
- 17:43सबको खबर लग गई कि एक अंगुली की जरूरत है और कोई नहीं जाता तो मत
- 17:52जाओ। पांव पड़ गए जाने से रास्ता रोक
- 17:56लिया। रास्ते में बिछ गए।
- 18:00लेकिन बुद्धा जब पीछे बैठे है, शी से तो डर गए शी से तो पीछे आने से
- 18:12भी डरे है? वह डरेगा ही?
- 18:18जिसे स्वयं का सम्यकबोध नहीं हुआ डरना स्वभाव बताया सम्यकबोध होने
- 18:27के पश्चात डर नहीं होगा, यह एक लक्षण है चलते चले गए, चलते चले
- 18:38गए। दूर से देखा पतझड़ का मौसम सूखे
- 18:43पत्ते गिरे और आज कोई इन सूखे पत्तों पे चल रहा है अंगुली माल
- 18:50के कान खड़े हो गए ले मेरा शिकार आग्रा बड़े दिनों से इंतजार थे।
- 18:57कोई नहीं आया। आज एक शिकार सूखे पत्तों की चर्म
- 19:03राहट, उसके ऊपर चलते हुए कदम और उसके पत्तों की झरझर करती आवाज़
- 19:15अगली मार के कानून में पड़ी है। अगली बार बहुत खुश हुआ।
- 19:21आज मेरी मुराद पूरी हो गयी। कोई तो है जो आ रहा है पर बस आज
- 19:29मेरी सुगंध पूरी हो जाती है। कुछ देर में सामने से वो दाती
- 19:36दिखाई पड़े। पीत वस्त्र दारी है एक व्यक्ति
- 19:43है, बड़े आराम से सहज भाव से चला रहा है, कोई भैर नहीं है।
- 19:54परम शांति है। चेहरे पर इसे खबर नहीं होगी।
- 19:59मेरी किसी ने बताया नहीं होगा, किसी ने डराया नहीं होगा।
- 20:05ये ऐसे कैसे निर्भीक मुद्रा में चला आ रहा है?
- 20:11लेकिन बुद्ध हैं, बड़ी शांति से चले आ रहे हैं।
- 20:17पतझड़ के सूखे पत्तों की चर्म राहत उसके कानों में लगातार सुनाई
- 20:23पड़ रही है। हल्की हल्की हवाएं।
- 20:29पर अंगुली माल आँखें फाड़े देख रहा है।
- 20:32अपने स्वीकार को ये कैसा व्यक्ति है?
- 20:41अद्भुत छटा है इसके मुखबार कौन है ये?
- 20:48ऐसे कैसे निर्भीकता से और किसी ने रोका नहीं?
- 20:53बहुत लोग हैं, सभी तरफ से रोकते हैं।
- 20:56कितने दिनों से यहाँ से कोई नहीं गुजरा।
- 21:01इस व्यक्ति को किसी ने रोका नहीं। बुध धीरे धीरे चलते चलते बस 20
- 21:11कदम दूर और चलते आ रहे हैं। बुध का शांत मुखड़ा देखकर अगली
- 21:23माल वे एक बार तो कंपा। इतनी निर्भिकता से होती है, लगा
- 21:36कि इसे वार न कर देना चाहिए। चेतावनी दे देनी चाहिए।
- 21:40इसे अगर छोड़ भी दूँ तो कोई हर्ज नहीं, न जाने क्यों तरस जाता है।
- 21:46इसको तो मारने को दिल नहीं करता। यह कुछ अद्भुत तरह का व्यक्ति है।
- 21:56वह चिल्लाता अगुन तक रुक जाओ, रुक जाओ।
- 22:05मैं अगली बार हूँ मैंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करनी एक व्यक्ति
- 22:12को और मारना और तुम मेरे आखिरी शिकार हो, मेरे शिकार मत बनो,
- 22:18लेकिन बुद्ध हैं कि जैसे सुनाई नहीं पड़ा धीरे धीरे पतझड़ के उन।
- 22:25जरे हुए पत्तों पर धीरे धीरे चलते आ रहे हैं।
- 22:29सहज गति से ना मंद हुए ना तेज़ हुए उसी शांत मूत्र में धीमे धीमे
- 22:40कदम आगे उठ रहे हैं। एक बार तोंगली माल ज़िन्दगी में
- 22:49प्रथम बार डर रहा हो और ये कैसा व्यक्ति है ये बहरा भी नहीं लगता।
- 23:01अजीब सा मुखड़ा है इसका सुंदर, सलोना, शांत ये कौन है ये इसको तो
- 23:14मारने का भी दिल नहीं करता। कैसे मरूंगा इसको?
- 23:20उसने फिर चेताया, आगों तक तू मत आ, तू मेरा शिकार मत मान।
- 23:26आखिरी बस एक व्यक्ति की जरूरत है, मुझे उस व्यक्ति को मार लेने दे,
- 23:34फिर तू चाहे आ जाना। शर में थोड़ी कोमलता थी लेकिन बुध
- 23:43हैं के चले आ रहे हैं और बुध तो अब चार कदम दूर रह गए हैं।
- 23:55बुध को देखते ही। उसके प्रभाव में आते ही उसके हाथ
- 24:02में पकड़ा हुआ कांपा हाथ से छूट गया कपने लग गया उसका सिरिस जीस
- 24:12कांपे से वो काटा करता था गर्दन। वो कापा धरती पे जाग रहा, एक आवाज
- 24:20हुई है और मूर्ति मत खड़ा अंगुली माल लगातार बुद्ध को निहार ही जा
- 24:30रहा है। बुद्ध उसके करीब आ रहा है।
- 24:36अब बोलने की साहस भी नहीं, न जाने क्यों जुबान को किसी ने पकड़ लिया
- 24:44है, जुबान को किसी ने बांध लिया है, आवाज़ है कि निकलती?
- 24:55बुध और आ गए बस करीब आ गए एक कदम दो और अगली मार को पता भी न चला
- 25:11कब वो बुद्ध के चरणों में जा पड़ा भूल गया कापा।
- 25:19भूल गया गल में डाली हुई वो उंगलियां जिनका वध किया था भूल
- 25:28गया वैर भाव यह व्यक्ति की अपूर्व अलौकिक प्रतिभा।
- 25:36उसे भी तब्दील करके झर झर आँखों में आंसू और सिर बुद्ध के चरणों
- 25:48में इतना रोया इतना रोया बुध के पांव धुल गए।
- 26:05बुद्ध ने उठाया अंगली माल को गले से लगा लिया, बोले अंगली माल तू
- 26:18आज ब्राह्मण हुआ तेरे सभी पाप। प्रायश्चित के रूप में ढल गए,
- 26:29आंसू बनकर मेरे पांव धो गए, अब तुम दुखी मत हो बहुत प्रायश्चित
- 26:41हुआ, इतनी देर रोया, तेरे सभी पाप दुब गए।
- 26:46अब चल मेरे साथ क्या हुआ एक पल में जब तबदीली होती है तुम अपने
- 27:01स्वय में। तुम अपने घर में जब चाहे छनांग ले
- 27:06सकते हो, कितने भी पापी हो और प्यारे हो, कितने दानी हो, लुटेरे
- 27:18हो, दुखी हो या सुखी हो। बाहर से क्या हो इससे कोई फर्क
- 27:29नहीं पड़ता। देखिए अपने घर जिसने कतल किया वो
- 27:37भी अपने घर आकर सो जाता है। जिसने बेईमानी की ठगी की, चोरी की
- 27:43कुछ भी किया अपने घर तो वह भी आकर सो जाता है तुम्हें अपने घर आने
- 27:51से कोई नहीं रोक सकता तुम अपने घर में जब चाहे आ सकते हो।
- 28:01कुछ भी करके आ सकते हो, पाप भी पुण्य भी, लेकिन अपने घर में
- 28:09तुम्हें कोई नहीं रोकेगा अंश और जो अपने घर को जान के।
- 28:19वह ज्ञान जो अपने घर में प्रतीक्षित हो गया उसे कृष्ण
- 28:24भगवान ने कहा तू स्थिति परज्ञा हो जा अर्जुन वह अमृत तत्वों को
- 28:32प्राप्त हो गया। खुल गई आँखें।
- 28:36और अपने घर में जैसे ही विराजमान होता है अर्जुन तत्यक्षणीय दो
- 28:41शब्द बोलता है नष्टो मोह समृति लब्था याद आया मेरा घर कौन सा है?
- 28:53मेरा मोह नष्ट हुआ, मैं और घरों को।
- 28:56अपने घर समझ रहा था, स्वय का सच्चा घर मिल गया।
- 29:04असली घर में आगमन हुआ। मैं अपने घर में प्रतिष्ठित हुआ
- 29:10नृष्ट उम होगा मेरा व्रत का चिपका हट टूट गई।
- 29:17समृत कर रब था मुझे मेरा घर याद आ गया, याद आ गई वो दीवारें अपने घर
- 29:26में कोई कभी भी आ सकता है कोई रुकावट।
- 29:35अगली माल रत्नाकर अपने घर में पहुँच गए और अर्जुन भी अपने घर
- 29:43में पहुँच गए। उसका मोह नष्ट हो गया।
- 29:52उसे याद आया ये पुती पुती सी दीवारें वो ही हैं।
- 29:58ये मेरा घर है ये जहाँ का वातावरण बनावट हाँ इसे ही छोड़ के गया था।
- 30:06मैं बिल्कुल याद आया। कोई सूक्ष्म लोक में किसी का
- 30:14प्रश्न हो तो मुझे बताता हूँ। नहीं, मैं आगे चलूं।
- 30:23वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई। बभोली दास्तां लो फिर याद आ गई
- 30:47नजर के सामने। घटा सी छा गई नजर के सामने, घटा
- 31:04सी छा गई वो भूली। दास था लो फिर याद आ गई।
- 31:20याद आ गई बाहुली दास्तां वही दीवारें हैं वही रंग है जिससे
- 31:28दीवारें पूरी थीं। वो ही फर्श है, वो ही कालीन है,
- 31:34वो ही सब है हाँ ये मेरा है, बस ये ही याद आता है।
- 31:42इसे ही ज्ञान कहते हैं तुम्हें तुम्हारा घर याद आ जाए, तुम अपने
- 31:48घर में प्रतिष्ठित हो जाओ। ऐसी ही स्थिति परज्ञा कहाँ है?
- 31:52अपनी प्रज्ञा में ठहर जा और सुन अंगली मार्ग भी यहाँ पहुँच गया।
- 32:07रत्नाकर। भी यहाँ पहुँच गया।
- 32:12एक अध्याय समाप्त हुआ। अब तुम्हारा प्रश्न उसका है।
- 32:23फिर जब ये पहुँच गए, इन्होंने स्वयं को जान दिया।
- 32:29तो कृष्ण भोग क्यों करते हैं? क्यों करते हैं एनलाइटन परसेंट के
- 32:43शब्द बेकार खत्म हो जाते हैं इस दुविधा के अंदर?
- 32:51मैं सन्नातन को एक्सेप्ट नहीं कर पाता, सही है तुम्हारी दुग्ध
- 32:58लेकिन कसूर तुम्हारा नाम कसूर उनका है जो इस गांठ को खोलना पड़ा
- 33:07है। वरन ये गांठ रास्ते में अड़ती न
- 33:14हूँ, सनातन तो बिल्कुल सरल है, बिल्कुल सीता है, धर्म कभी असहज
- 33:22नहीं होता, धर्म सदा ही सरल होता है।
- 33:26धर्म सदा ही सहज होता है इसलिए कबीर ने कहा सहज समाधि बलि रे
- 33:32साधो, सहज समाधि बलि जब व्यक्ति पहुँच जाता है अपने घर में।
- 33:47तो एक बात ईजाद करो, मेहनत में कहा था जब दे ही जाता है नए शरीर
- 33:54तो साथ में एक पोटली लेकर जाता है सुपर कंप्यूटर कह दो, पोटली कह दो
- 34:05आधुनिक भाषा में। सुपर सेंस सिर्फ कंप्यूटर कह दो
- 34:10प्राणी भाषा में पोटली कह दो कर्मुख बात वही है, उसमें फीड है
- 34:19सारा कुछ तुम्हारे प्रारब्ध और तुम्हारे संस्कार।
- 34:32तुम्हें स्वयं का पता चल गया। अब ये दुग्धा वाली बात है लेकिन
- 34:39खोपड़ी बिगड़ी है। जो खोपड़ी से बैठे बैठे सोचेगा वो
- 34:44दुग्धा में रहेगा। इसलिए तो मैं कहता हूँ इन खोपड़ी
- 34:51वालों से अगर आया एस करना आई पीएस करना तो जान अगर अपने भीतर उतरना
- 34:57तो इनके पास मत जाना जे उलझा देंगे।
- 35:04मुश्किल तब नहीं होती जब ये तुम्हें आई ए एस बनने का फार्मूला
- 35:08बताते हैं। वो तो बड़े साफ लोग हैं, वो तो
- 35:13तुम्हें सीधा तुम्हारे ऊपर कोई खर्च नहीं करता।
- 35:17वो कहते हैं, देखो भाई तुम पढ़ोगे यह सिलेबस है, हम पढ़ा देते हैं।
- 35:23ये फ़ॉर्मूला है ये गणित का हिसाब है कैसे सॉल्व करना तुम्हें बता
- 35:28देते हैं तेरे को लेकिन मुश्किल तो पैदा होती है, कोई आईडियाज का
- 35:33अधिकारी लोभ खा जाता है। अब लोग भी मेरे चरण में पड़े हैं।
- 35:39सलूट ना मारें सिर्फ। वासनाएँ जगती है, वासनाएँ प्रगाढ़
- 35:59होती हैं, बराड़ होती हैं, फैलती हैं।
- 36:07कल तक सपना था आई ए एस अधिकारी बनो आज सपना हो गया लोगों को अपने
- 36:16प्रभाव में गर्म हो क्योंकि कॉम्पिटिटिव माइंड तो है बोल भी
- 36:25अच्छा सकता हूँ बोलारा है। जो कर क्या उसमें सूचनाओं की भीड़
- 36:35भरी पड़ी है। न्यूरॉन जो सारे भरे पड़े हैं
- 36:40खाली कभी बैठे नहीं मन में कभी उतरे नहीं।
- 36:46उन लम्हों का आनंद कभी उठाया नहीं जिनके उठाने से अपने स्वभाव तक
- 36:53पहुंचा जाता है, अपने घर को तलाशा जाता है, अचानक से घोषणा कर देते
- 37:00हैं एहम ब्रह्मस में। अचानक से उपनिषद की व्याख्या करनी
- 37:05शुरू कर देते हैं। अचानक से गीता पकड़ लेते हैं।
- 37:08हाथ में बस यहाँ दुविधा होती है मुझे सर लोगों से कोई तकलीफ नहीं
- 37:16है। ये बड़े ही ईमानदार हैं, लेकिन
- 37:20तकलीफ है उन अचार्यों से। जो आयश होकर अपना दायित्व नहीं
- 37:26निभाते। ये बेईमान है जो अपनी इस तार्किक
- 37:35बुद्धि से गीता की विवेचना करेंगे, अष्टावक्र गीता की
- 37:41विवेचना करेंगे और अपने श्री की विवेचना करेंगे।
- 37:45सायंसा के प्रश्नों का जवाब दें, कोई आपत्ति नहीं।
- 37:49आपत्ति तब होती है जब अनुभव की बातें खोपड़ी से व्याख्यान करने
- 37:55शुरू हो जाती हैं। उसे मैं पाप कहती हूँ, जिसका काम
- 38:03उसी को साझे है। और करें तो ठेंगा बजा, ये उल्टे
- 38:17में गिरेंगे बतीसी तुड़वा लेंगे निश्चित क्योंकि अभी ज्यादा गगरी
- 38:30छल का सजा है, गगरी भरी है आदि सूचनाओं आनंद से खाली है और मोक्ष
- 38:46मांगता है। आनंद।
- 38:47ज्ञान तो उसके पास भी बहुत है। शास्त्र तो उसने भी बहुत पढ़े है।
- 38:53गुरुओं के पास तो उसने भी बड़े चक्कर लगाए हैं, बड़ी सेवाएं की
- 38:57हैं। उसने लंगर बहुत भोगताएं हैं, उसने
- 39:00भी कमी है, आनंद की कमी है। और सिर्फ मात्र दिखावा करने से
- 39:14आँखें बंद करके ऊपर ध्यान लगाने से 2 मिनट के लिए विज्ञानी नहीं
- 39:21है वो जाते। ज्ञानी तो अटल गहराईयों में जाकर
- 39:26स्वयं को जानने का नाम है अपने घर को जिसने जान लिया और जीस घर को
- 39:34जानकर कृष्ण की मौजूदगी में जीस घर को जानकर अर्जुन कहते हैं नष्ट
- 39:42मौका। समृद्ध था मेरा मोहनिष्ठ हो गया,
- 39:48मुझे याद आ गया मैं कौन मेरा घर कौन क्षमा करूँ?
- 39:56आपकी शक्ति का समय मैंने व्यर्थ में बर्बाद किया।
- 40:03लेकिन कृष्ण हैं कृष्ण बड़े त्यालू हैं करूणा, अवतार करुणा के
- 40:12अवतार हैं। सभी सूचनाओं का जवाब दे देते हैं
- 40:25ये लेकिन यहाँ आके फंस जाते हैं बड़े टेढ़ेस वाले इसका जवाब नहीं
- 40:34दे पाएंगे यहाँ आके अड़ जाते हैं कौन जवाब दे इसलिए तो कोई जवाब
- 40:40नहीं मिला आज तक। रास रचाते हैं कृष्ण महारास रचाते
- 40:46हैं रात छोड़ो, तुम रास रचाते हो दो चार बच्चे होते हैं, 1020 होते
- 40:54होंगे इसके तो 1,61,000 81 बच्चे हैं, महा राष्ट्र रचाते हैं और
- 41:10बहुत से सामाजिक प्राणी आंखोवंत कर लेते हैं।
- 41:18यहाँ तो तुम खजुराहो की मूर्तियाँ देख के आँखें बंद कर लेते हो,
- 41:25भीतर कुछ भी चल रहा हो बाहर इन मूर्तियों को देख कर चित्रकारी को
- 41:31देखकर आँखें बंद कर लेते हो राम राम, राम, राम, राम, राधे।
- 41:38क्या राधे राधे भाई यही कुछ तो होता है?
- 41:45राम राम, राधे, राधे क्या कर रहे हैं?
- 41:52नहीं मिला होगा जवाब किस लिये दिया नहीं होगा किसी शास्त्र में
- 41:56यह जवाब नहीं। कहानियों हैं, व्याख्यान हैं,
- 42:02बड़ी रसरी का अंदाज में बोले गए हैं और कहानियों सुनाने वालों को
- 42:11इसके भीतर का तथ्य नहीं पता। अब आगे की बात शुरू करें।
- 42:30सूक्ष्म से कोई प्रश्न नहीं आया। आपके ही प्रश्न को आगे बढ़ाता
- 42:36हूँ। यहाँ तक ठीक हो गया।
- 42:42आदमी ने जान लिया, व्यक्ति ने जान लिया मैं हूँ कौन शरीर हूँ,
- 42:50भावनाओं हूँ, इमोशन्स हूँ या सबसे परे वो हूँ जो हिलता नहीं जुलता
- 43:00नहीं, कमता नहीं। लिप्त नहीं होता मैं कौन?
- 43:09यह जानने के बाद अब यहाँ पर समझने वाली बात है।
- 43:15गौर से समझना अगर न समझाये तो बार बार इस वीडियो को सुनना।
- 43:20यह आपके क्लेश बहुत गहरे क्लेश जो जन्मो जन्मो से आज कटेंगे, मैंने
- 43:40शब्द कहा कोई भी जा सकता है। मंदिर मस्जिद जाने वाला, पांच
- 43:48वक्त की नमाज़ पढ़ने वाला, रोज़ मंदिर में जाने वाला, रोज़ माला
- 43:56फेरने वाला, ईमानदारी से काम करने वाला भईया।
- 44:01सदना कसाई अनिका, गणिका वैश्ययी तुम समझी नहीं सके।
- 44:08सनातन को यक तरफ़ा हो कि तुमने सोचा लेकिन भूल गए।
- 44:20सिक्के के पहलू दो होते हैं। दिखता एक है बस एक सिक्के का पहलू
- 44:29देखकर तुमने दूसरा समझा के होता ही नहीं, लेकिन दूसरा भी होता है।
- 44:42प्रश्न बिल्कुल जायज है। हम भीतर तो चले गए लेकिन जो हो
- 44:48गठड़ी बांध के ले के आये थे कर्मों की उनका क्या होगा?
- 44:58उनको भोंके थे, यहाँ भी बात खत्म हो गई।
- 45:02मैंने कर्म फिलॉसफी में बताया। कि जब कोई व्यक्ति प्रबुद्ध हो
- 45:08जाता है तो भौंकता तो वह भी है, लेकिन प्रबुद्ध होने से पहले वह
- 45:17सफीर पे बैठा होता है। अब इस बात को ध्यान से समझ लेना
- 45:21तो समझ में आएगी। अन्यथा सिर के ऊपर से गुजर जाएगी।
- 45:27जब तक तुम अज्ञानी हो तब तक परिधि पे बैठे हो।
- 45:33गोले की परिधि के ऊपर किसी भी स्थान पर तुम बैठे हो, लेकिन यू
- 45:40आर ऑन सफियर। और जो सिफीर पे बैठा है उसको अपने
- 45:49कामो का फल स्वयं भोगना पड़ेगा समझना भगत को बार बार सुन लेना
- 46:01इसको सिफीर पे बैठा हुआ व्यक्ति जो कर्म किया।
- 46:06जिसने कर्ता भाव से कर्म किया उसे भोगता भाव से भोगना पड़ेगा।
- 46:13सरल शब्दों में मैंने ये बताया जो परिधि में बैठा है व्यक्ति आम
- 46:21इंसान अर्जुन। जो अपने घर पे जाने से पहले था
- 46:28कम्प रहा था उस अर्जुन की बात करता हूँ मैं व्हेन ही वास् ऑन
- 46:36स्फेयर जब तक कोई भी व्यक्ति स्फेयर पे बैठा है परी दी पे बैठा
- 46:43है गोले की। तब तक उसने जो कर्म किए वो उसे
- 46:50भोंकने पड़ेंगे, एक्शन आएँगे और रिएक्शन उसके पास से गुजर जाएंगे।
- 47:00वह भोंकेगा दुखी होयेगा रोयेगा। अगर वो भीतर छलांग लगा गया, अपने
- 47:06होने में इसी की चर्चा कर रहा हूँ।
- 47:10ध्यान रखना परिधि से आजा केंद्र पे अब केंद्र पे और परिधि पे बड़ा
- 47:21अंतराल है बड़ा फासला है। केंद्र पे बैठा हुआ व्यक्ति परिधि
- 47:28पे घटनाओं को देखता है भुगता नहीं फिर सुन लो मेरी बात को कई बार एक
- 47:36बार एक बार की कही हुई समझ नहीं आती।
- 47:42परिधि पे लगी आग केंद्र पे बैठा व्यक्ति आग को देखता है आग में
- 47:48चलता नहीं लेकिन परिधि में बैठा हुआ व्यक्ति परिधि पे लगी आग में
- 47:56जलेगा आग को देखेगा ना? यही फर्क है उस अर्जुन में जो
- 48:08परिधि में बैठा था और उस अर्जुन में जो आज केंद्र पर आ गया है।
- 48:16वह अर्जुन जिसने अपना गाड़ी धनुष फेंक दिया है, युद्ध नहीं करूँगा,
- 48:23मैं अपने गुरु को नहीं मार सकता, अपने पिता को नहीं मार सकता, अपने
- 48:30भाइयों को नहीं मार सकता, मैं युद्ध नहीं करूँगा, भगवान।
- 48:38कहकर मध्य भाग में बैठ गया। रस के और कृष्ण ने अपना उपदेश
- 48:46शुरू किया। यह परिद्वीप बैठा हुआ अर्जुन है
- 48:56जिसने धनुष फेंक दिया। जो कहता मैं युद्ध नहीं करूँगा और
- 49:12जब कृष्ण करते हैं शक्तिपात कृष्ण जानते हैं।
- 49:17यह भ्रम में है, लिप्त है, सत्य से वंचित है।
- 49:25असती का? बोलबाला है असती से चिमटा हुआ है,
- 49:30आखिरी हथियार होता है ऐसे व्यक्ति के पास अर्जुन जैसा व्यक्ति तैयार
- 49:37है। उसकी भूमि बिलकुल तैयार है।
- 49:40उसमें बीज बोया जा सकता है। तुम भी जब तैयार हो जाओगे,
- 49:49तुम्हारी जमीन जब तैयार हो जाएगी, तुम में भी अंकुर फूटने की
- 49:55संभावना हो जाएगी। अर्जुन में संभावना है।
- 50:03शक्ति बात सहनी की और कृष्ण शक्ति बात कर देते हैं तुम जान के तू है
- 50:12कौन? बस इतनी सी बात ज्यादा देर नहीं
- 50:19लगी। ये 700 शलोक कैसे बोले गए?
- 50:24ये समय का अंतराल होता है ध्यान से सुनना।
- 50:30700 शलोकों को पढ़ने में बड़ी देर लगेंगी, लेकिन अंतराल होता है
- 50:37जैसे ब्रह्मा का 1 दिन। और आपका 1 दिन कितना फर्क है?
- 50:51ब्रह्मा का 1 दिन आपके एक चार युगों के बराबर?
- 50:59और उसका 1 दिन बीतता है, वहाँ बड़ा स्लो चलता है।
- 51:04यहाँ आकर वष्ट हो जाता है तो कृष्ण फेंकते हैं।
- 51:08उस स्थल से जीस स्थल से टाइमलैसनेस है वहाँ समय
- 51:15नेग्लिजबल। गति से चलता है।
- 51:19वहाँ से फेंकते हैं ये 700 श्लोक जो जवाब देते हैं बाहर आकर ये
- 51:26गीता 700 श्लोकों में भी भक्त हो जाती है।
- 51:32ये गीता बोली कैसे गई ये आपको अभी तक समझ नहीं आया होगा।
- 51:37लेकिन डाइमेंशनल डिफरेंस इस देर जहाँ से बोले गई, वहाँ समय जैसे
- 51:44चलता है और जहाँ पर बोली गई, वहाँ समय जीस गति से चलता है देर इस ए
- 51:52लॉट ऑफ़ डिफरेंस बिटवीन दट टू। दोनों डाइमेंशन में बड़ा फर्क है।
- 52:00कृष्ण जी स्तर से बोलते हैं, वो सेंटर है भूकेन्द्र।
- 52:06अर्जुन जीस स्तर से सुनता है, वह स्पीयर है, वह परिधि है तुम जीस
- 52:12स्तर पे सुनते हो, वो परिधि है। इस लिए तुम्हें 700 श्लोक पढ़ने
- 52:19में बड़ा वक्त लगेगा। कृष्ण को ये सारी श्लोक बोलने में
- 52:25कोई वक्त नहीं लगा। 7 मिनट में सारी गीता समाप्त हो
- 52:29गई। सब कुछ आ गया बीच में शंखनाद से
- 52:38लेके आकर जब स्नेका हुक्म कीजिए मैं क्या करूँ नष्टों मौका समृद्ध
- 52:47लब था मुझे बताइए हुक्म कीजिए मैं क्या करूँ?
- 52:54ये सारा कुछ होने तक धनुष उठाने तक 7 मिनट का वक्त लगा, लेकिन तुम
- 53:03कहोगे गीता तो पढ़ी नहीं जाती, ठीक कहते हो क्योंकि गीता उस तल
- 53:08पे नहीं पढ़ी जाती। जीस तल पे बोली गई।
- 53:13मेरे ख्याल में तुम समझ गए होगे ये एक छोटा सा प्रश्न था, सूक्ष्म
- 53:20से आया हुआ इसका जवाब मैंने आपको भी दे दिया।
- 53:33केंद्र में जब पहुँच जाता है भक्त अपना आपा जान लेता है, भोग जलते
- 53:39हैं परी देव पर अक्शॅन रिएक्शन होता है परी देव पर और तुम बैठ के
- 53:46केंद्र पर तुम देखते हो? अपने कर्मों और कर्म के फल को तुम
- 53:54जानते भी हो, ये कर्म मैंने किये और मेरे किये हुए कर्मों का फल ये
- 53:59आया लेकिन तुम भोगते नहीं, तुम कहो कि बड़े अन्याय की बात है तो
- 54:04तुम आ जाओ केंद्र ओके भाई तुम न्याय कर लो।
- 54:10तुम्हें कौन रोकता है? लोग कह देते हैं ये तो भगवान की
- 54:15सृष्टि में अन्याय है। मैं कहता हूँ अन्याय नहीं है।
- 54:18विधान, अन्याय और विधान में बड़ा फर्क है।
- 54:28तुम परिधि पे बैठे क्यों हो सारे संत दिन भर रात लगे हैं कहाँ
- 54:34समझते हो तुम तुम अन्याय होने क्यों देते हो?
- 54:39तुम भी परिधि से छलांग लगाओ, केंद्र में आ जाओ फिर दूसरे
- 54:45बहुकारेंगे ये तो अन्याय है। हमने तो होगा, उसने तो देखा तो
- 54:51भाई तुम भी देखने वाले हो जाओ तुम्हें कौन रोकता है तुम भी
- 54:56तृष्ठा बन जाओ, तुम भी साक्षी हो जाओ, तुम भी ओब्सर्वर बन जाओ,
- 55:04तुम्हें कोई नहीं रोकता तुम्हें तुम्हारे घर में आने से कोई नहीं
- 55:07रोकता। रोक नहीं सकता।
- 55:16कृष्ण केंद्र पर आके और जो करते हैं परिधि पर करते हैं केंद्र पर
- 55:24कुछ किया नहीं जाता, केंद्र तो निर्लिप्त है।
- 55:31केंद्र तो आनंद से भरा हुआ सुगद्दी से भरा हुआ, मुस्कुराता
- 55:37हुआ खेल खलाता हुआ नाचता गाता हुआ कुछ नहीं करता।
- 55:51तुम्हारे संग समाया हुआ है। सर्बव्यापी सदा अलेफा सर्बव्यापी
- 56:07सदा अलेफा। तोहे संग समान तोहे संग समा काहे
- 56:23रे बनढु धन जाए। वह तो निर्लिप्त है, सदा तुम्हारे
- 56:32संग है, तुम उसे खोजने जाते हो। बाद में वह तुम्हारे भीतर है, पर
- 56:40सुपरी दिल से शिलांग लगानी है, केंद्र तक जाना है और ये सारी
- 56:46घटना भीतर घटती है बाहर में। तुम ढूंढ़ते हो बाहर सभी संत
- 56:52तुम्हें बहर्मुखी से अंतर्मुखी करने पर ज़ोर दे रहे हैं, लेकिन
- 56:57तुम हो के जाते नहीं तुम बाहर ही शोर मचाना चाहते हो बस इस शोर को।
- 57:08बचाने वाले लोग और होते हैं शोर मचाओ, ये कहने वाले लोग मूड होते
- 57:15हैं तुम्हें अपने घर में आने से कोई नहीं रोक सकता है तुम्हें
- 57:21दूसरे के घर में जाने से रोक सकता है अपने घर में आने से।
- 57:28तुम्हें कोई नहीं रोक सकता। अपने घर के तुम मालिक हो, जब चाहे
- 57:34जा सकते हो जब चाहे हो सकते हो आ गए तुम अपनी मर्जी से आगे छोड़ के
- 57:40दूर निकल गए। घर तो वहीं है।
- 57:45दादू। दूजा को ने दूजी मन की दौड़ दौड़
- 57:52मिटीशन सह गया वस्तु ठोर की ठोर जीस घर को छोड़ के आए थे ना वो
- 57:58उसी ठोर ठिकाने बैठी, वो नहीं हिली।
- 58:04तुम्हें तुम्हारे घर पे जाने से कोई नहीं रोक सकता वह तुम्हारी
- 58:10संपत्ति है, निजी संपत्ति है तुम्हारा निजी अधिकार है उस पे
- 58:15तुम्हारे घर पे तुम्हारा निजी अधिकार है, दूसरे के घर पे
- 58:21तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। दूसरे के घर में जाने से तुम्हे
- 58:24कोई रोक सकता है? राधा अपने घर में तुम्हे क्यों
- 58:27आने दिखा जूती उठा लेगी। कुण्डी की नाक वाली ज़रा राधा के
- 58:42घर में बढ़ के दिखाओ। उल्लू के पट्टो।
- 58:48क्या मजाक बता रखा है अपने हाथों में जाओ, कोई नहीं रोकेगा,
- 58:56बिल्कुल नहीं रोकेगा ये कोई मजाक हुआ राधे के घर में चले जाओ ऐसे
- 59:03कैसे चले जाओ? वो तिल्ली वाली जूती है, उसके पास
- 59:11किशन क्यों नहीं भोंकता है? अब देखिए जहाँ तक बादशाह हो गया
- 59:20दो पुराब हमने पार कर लिए तीसरा पुराब आ गया।
- 59:25तीसरा पड़ाव आ गया कि हमारे अचेतन मन में संसार भी हैं प्रबुद्ध तो
- 59:34तुम हो गए अपने आपको जान लिया बिलकुल ठीक।
- 59:41तो फिर तुम कहते हो अपने आप को जिसने जान लिया।
- 59:49बहुत तरह के लोग हो सकते हैं जिनकी वासनाएं कम हैं, जिनकी
- 59:58वासनाएं। कम से थोड़ी जाता है जिनकी वासन
- 1:00:04बहुत जाता है। कई तरह के लोग हो सकते हैं जैसे
- 1:00:11केंद्र तक जाने के लिए परिज से बड़े रास्ते हैं।
- 1:00:18किसी भी रास्ते से तुम जा सकते हो, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति के
- 1:00:26अचेतन मन में अलग अलग चीजें भरी होती हैं।
- 1:00:35अपने घर तक तो वो छलांग लगा के। रह गया।
- 1:00:41उसका अचेतन जीस गठड़ी को वो साथ लेके चला था।
- 1:00:48आज उसे समझ आ गई कि मैं हूँ कौन? तो इन कर्मों का क्या होगा?
- 1:00:53तो मैंने कहा कि कर्म भुक्त के जाने पड़ेंगे।
- 1:00:58अगर कोई प्रबुद्ध हो गया है, उसे भी भुगत के जाने पड़ेंगे।
- 1:01:04अगर कोई प्रबुद्ध नहीं हुआ है तो उसके तो और जुड़ते जाएंगे।
- 1:01:10जो प्रबुद्ध हो गया उसके नए बनने। बंद हो जाएंगे, क्रियान्वयन बंद
- 1:01:15हो जाएगा, प्रारब्ध उसे भुगत कर जाना होगा।
- 1:01:20अब हम थोड़ा सा और आगे चलें। अगर तुम यहाँ तक समझ गए हो तो तो
- 1:01:27प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अलगअलग तरह की कामनाएं भरी पड़ी।
- 1:01:33मैं कबीर नहीं चाहता कि मेरे पास रोल्स रॉयस नहीं चाहता।
- 1:01:43यह समझलों की उस वक्त थी नहीं, लेकिन ओशो चाहते 93 रोल्स रॉयस
- 1:01:51कार्य हैं। लेकिन फिर भी चाहते हैं क्या सर
- 1:01:56में मारना है भाई लेकिन इच्छा है अब उनके चेतन मन में जब भरा पड़ा
- 1:02:05है, संस्कार और संस्कारों के हिसाब से जीवन जिएगा बात समझ।
- 1:02:13ज्ञानी हो गया, रस्सी जल गई, बल नहीं है क्या समझाती है?
- 1:02:24बात ज्ञानी हो गया देकन संस्कार कर्म भी भोग लेगा।
- 1:02:32बिल्कुल ठीक जो कर्ता भाव से किये वो भोगता भाव से भोग लेगा।
- 1:02:41लेकिन मैं कहता हूँ रस्सी जल गई जो बांध सकती थी लेकिन बल कहाँ
- 1:02:48गया? उस जली हुई रस्सी में देखना बल
- 1:02:53वैसे ही लगेंगे। आपको दिखे इन बलों को मैं कहता
- 1:02:59हूँ संस्कार ये संस्कार उसको घसीटेंगे, उन संस्कार के कारण।
- 1:03:11कोई तो वैरागी जीवन जिएगा, कोई पकौड़े सिकोड़े कचौड़ी सिकोड़ी
- 1:03:21खायेगा समोसे चाउ मन चुग्गा। ये सब चलेगा, ये संस्कार काम
- 1:03:32करेंगे। थोड़ी सी गहरी बात है, बहुत गहरी
- 1:03:35बात है इसको फिर से समझ लेना बंधन टूट गए, रस्सी जल गई।
- 1:03:47लेकिन रस्सी के बल ना गया। वो रस्सी के बल क्या हैं?
- 1:03:52संस्कार ये बात तो बड़ी गहरी है लेकिन समझ आ जाएगी इसको बार बार
- 1:04:01सुनना, रस्सी को जला के देख लेना। देखोगे?
- 1:04:06रस्सी बांध नहीं सकती। अब पहले रस्सी बांध सकती थी, जब
- 1:04:11तक जली नहीं थी। अब रस्सी बांध नहीं सकती, क्योंकि
- 1:04:17रस्सी ही जल गई है। लेकिन तुम कहोगे जब रस्सी ही जल
- 1:04:20गई है तो तो देखना उसमें बल मिलेगा तुम्हें जली हुई रस्सी।
- 1:04:26काली पड़ गई होगी लेकिन बल साफ दिखेंगे।
- 1:04:30वो बल संस्कार कहलाते हैं। व्यक्ति उन्हीं दिशाओं में जीता
- 1:04:37है जिन दिशाओं में उसने प्रबुद्धता से पहले जीवन जीया
- 1:04:42होता है। धीरेधीरे बातें आपकी समझ में
- 1:04:49उतरेंगी। कृष्ण मस्ती में जीते हैं, शुरू
- 1:04:55से ही रास हर जाते हैं, महा रास हर जाते हैं।
- 1:05:03ये बल हैं बल जो रस्सी के भीतर है, लेकिन ये बेकार में समझलो बात
- 1:05:20को। रस्सी का ओरिजिनल होना और रस्सी
- 1:05:28का जलने के बाद उसके भीतर के जो वॉल होते हैं, इन दोनों में बड़ा
- 1:05:36फर्क है। वो रस्सी बांध सकती है।
- 1:05:39बिना जले जो थी, जो जल गई और उससे बांध नहीं सकती, उसको तो थोड़ा सा
- 1:05:45हाथ लगाओगे भुर जाएगी वहाँ बस ऐसे ही रह जाते हैं तुम्हारे संस्कार,
- 1:05:53लेकिन व्यक्ति जिसने प्रबुद्धता से पहले का जन्म दिया।
- 1:05:58बात का जीवन करीब गरीब वैसा ही जीता है।
- 1:06:04बंदा फिर भी नहीं है, वो चाहे तो बदल सकता है लेकिन आमतौर से जीता
- 1:06:12वैसा ही है। कृष्ण को नहीं भाँते हैं।
- 1:06:19ये आचार्य लोग तुम्हे सिखाएंगे के इन बंधनों से सावधान रहे लीव इन
- 1:06:25में रह लो ऐसा कर लो वैसा कर लो सब बकवास बात तो ये है रस्सी के
- 1:06:36अस्तित्व को मिटा दो। बंधन के अस्तित्व को मिटा दो बल्
- 1:06:44तो फिर भी रहेगा, लेकिन उन बलों में कोई जान नहीं होगी और बल्त
- 1:06:53में बांध नहीं सकें क्या? उन्हें संस्कार कहते हैं।
- 1:07:00संस्कार सिर्फ मात्र लकीरें होती हैं, जो पानी के गुज़रने के बाद
- 1:07:08बन गई होती हैं। ऐसे ही तुम्हारी संस्कार है।
- 1:07:19अब हम फिर से लौट चढ़ें, सारी चीज़ को स्पष्ट कर दें, ज्ञानी और
- 1:07:28अज्ञानी अज्ञानी तो वैसे ही रहेगा।
- 1:07:34उसको तो हम छोड़ देते हैं। ज्ञानी जब अपने घर में लौट आएगा
- 1:07:43स्थित हो जाएगा पक्का पक्का अर्जुन अगर तुम ये कहो कि अर्जुन।
- 1:07:54स्थिर तो हो गया। एक बार उसका भ्रम तो मिट गया,
- 1:08:00लेकिन उसने बंधन नहीं काटे। रस्सी नहीं चली।
- 1:08:06एक बार ने दिखा दिया कि देखो तुम हो कौन कम क्यों रहे हो?
- 1:08:12बस इतना सा और उसने धनुष उठा दिया।
- 1:08:17गहरी बातें हैं, गहराई से ही सुननी पड़ेगी।
- 1:08:22उसने धनुष उठा लिया और युद्ध किया।
- 1:08:28युद्ध करके कितना? खून खराबा हुआ 18 सोनी से न मारे
- 1:08:33गए सारे बलवान मर गए थोड़े से बच्चे पांडवों में कोरबों का एक
- 1:08:41बच्चा यू यूसुफ धृतराष्ट्र का बेटा था लेकिन गंधारी का नहीं था,
- 1:08:48दासी का पुत्र था। लेकिन अर्जुन सदा के लिए मुक्त
- 1:08:57नहीं हुआ। अभी परिधि पे है।
- 1:09:01क्षणिक रूप से उसे केंद्र पे लाया गया था घसीट के जैसे रामकृष्णा
- 1:09:08परमहंस विवेकानंद को क्षणिक रूप से लेके गए थे उस तल्प।
- 1:09:13जहाँ जाकर वो कंप गया था वो डर गया था।
- 1:09:16बोला मेरे माँबाप हैं प्रक्रिया अधूरी रह गई।
- 1:09:24प्रश्न तो बड़े वेग से किया था लेकिन आगे?
- 1:09:32बाप मिल जाएगा ये उसे पता नहीं होता।
- 1:09:35दीपिका न चुप गए, आगे सही गुरु मिल गया।
- 1:09:42उसने हाथ रख दिया कि यह ले शक्तिपात की यह बर्दाश्त नहीं कर
- 1:09:48सका कं। तो राम कृष्ण ने हाथ उठा लिया,
- 1:09:54ठीक मेरे माँ बाप तो आजा मैं हिंसक नहीं हूँ।
- 1:10:02अहिंसक रूप से अगर तू जाना चाहता तो मैं तुम्हें ले जाता।
- 1:10:08नहीं जाना चाहता। कंपनी तो सभी को होता है।
- 1:10:11आज ही प्रश्न आया था मैं कहीं सहस्रा से न निकल जाऊं भाई, इतना
- 1:10:17संकल्प तेरे मैं कहाँ? पहले अपने भीतर उतनी शक्ति तो
- 1:10:26उत्पन्न कर लें। संकल्प तो पैदा कर ले के कपाल को
- 1:10:34फाड़ के निकल जाए, लेकिन नहीं बस शब्दों के भय से कपना है।
- 1:10:43सिर्फ ये अहंकार के तरीके हैं बचने के।
- 1:10:50ये नहीं जानते, मैं जानता हूँ मैं इसलिए जानता हूँ कि मैं इन्हीं
- 1:10:58गलियों में रेत उड़ाता हुआ गुजरा हूँ, मैं इन्हीं गलियों में खेला
- 1:11:06हूँ। इन्हीं गलियों में मेरे वस्त्र
- 1:11:09निबड़े हैं। इन्हीं गलियों में मेरा हुलिया
- 1:11:12बिगड़ा है इसलिए मैं अच्छी तरह से जानता हूँ, बखूबी इन गलियों को
- 1:11:18जानता हूँ तो मुझसे कुछ छुपा लूँ। मैं इन गलियों का पक्का खिलाड़ी
- 1:11:28हूँ, इसलिए तुम लाल चाहे बहानेबाजी कर लो, मेरे तुम्हारी
- 1:11:38बहानेबाजी चलेगी। ना मरना पड़ेगा अगर उस आनंद में
- 1:11:45जाना है। रोज़ कहता हूँ मैं।
- 1:11:49रोज़ गाके सुनाता हूँ ये तो प्रेम मिलन की चा।
- 1:12:06जेतों प्रेम मिलन की चा शीश तलीधर।
- 1:12:21घर मेरे आओ, सिसतली घर घर मेरे आओ, घर मेरे आओ।
- 1:12:40घर मेरे आँ जे तो प्रेम मेरन की चा अंकार को काटो सर को नहीं
- 1:12:57काटना है। मेरे शब्दों को सुनकर मुझे कमेंट
- 1:13:02आता है, बाबा अभी लेके आऊं सिर्फ ये सिर नहीं चाहिए तुम्हारा सिर्फ
- 1:13:10वो चाहिए जो तुम्हें भी नहीं पता हो जिससे तुम भी अज्ञात हो, लेकिन
- 1:13:15मैं उसे बखूबी देखता हूँ। वो भ्रम का सिर चाहिए, तुम्हारा
- 1:13:22वह इल्यूजन का सिर चाहिए। तुम्हारा वो जो तुमसे गलती हुई
- 1:13:29है, जो तुम इस भ्रम में उलझे हो, इल्यूजन में हो।
- 1:13:38कि मैं हूँ कौन? यह सिर चाहिए मुझे तुम्हारा ये
- 1:13:45सिर नहीं चाहिए, ये तो पदार्थ है ये तो तुम्हारा है भी नहीं, यह तो
- 1:13:51पदार्थ होगा तुम इसके कौन लगते हो तुम मालिक थोड़ी हो।
- 1:13:57तुम्हें तो मिला है एक घर की तरह तुम इसका उपयोग कर रहे हो, इसको
- 1:14:01मत काटना और इसको काटने से कुछ नहीं होगा।
- 1:14:06बहुत से मूर्ख लोग जीभ चढ़ा देते हैं।
- 1:14:09काली के चढ़ाई जाओ, काली प्रसन्न हो जाएगी काली है ही नहीं प्रसन्न
- 1:14:16क्या? क्यों मूर्ख बने हो?
- 1:14:22दीज़ आर ऑल सिम्बोलिक रेप्रेसेंटेशन्स सभी प्रितिकात्मक
- 1:14:28चिन्ह हैं। ऐसा होता कुछ नहीं है ना कोई शेर
- 1:14:33की सवारी वाली शंख वाहनी दुर्गा है।
- 1:14:39न कोई काली है, न कोई शीतला है। गधे के ऊपर बैठी हुई, न कोई उल्लू
- 1:14:45के ऊपर बैठी हुई लक्ष्मण ये सब तुम्हारे बनाए हुए व्यापारियों
- 1:14:53के। लूटने के ढांक न शंकर है, न
- 1:15:06पार्वती है, न गणेश है, न हनुमान है।
- 1:15:13खैर, अब बात आ गई, मुझसे पूछ लेते हैं फिर आप कौन से शंकर के पास?
- 1:15:20बिल्कुल जाता हूँ। अब थोड़ा सा भ्रम निरित कर दूँ।
- 1:15:25इसके लिए बहुत बड़े टॉपिक की जरूरत पड़ेगी, फिर विस्तार से बता
- 1:15:29दूंगा। शुरूआत में जब चली ये रचना।
- 1:15:37कहाँ से चली कोई नहीं जानता या करता सेठी को सजा आप कर जानें सोई
- 1:15:46उसे ही पता है कब चली लेकिन जीस शंकर के पास मैं जाता हूँ।
- 1:15:57ही वास दी। फर्स्ट पर्सन टू बी एनलाइटन ऑन
- 1:16:01दिस अर्थ इस धरती का प्रथम ज्ञानी व्यक्ति वह था।
- 1:16:14बह है अभी भी है फर्स्ट पर्सन टु बी एनलाइटन पहला व्यक्ति था जो
- 1:16:25एनलाइटन हुआ उसने राह दिखाई दुनिया को।
- 1:16:34के एक और तत्व है जो तुम्हारी भी वहाँ तक जाओ आनंद में खो जाओ,
- 1:16:50मस्ती में झूम उठो, नाचो। ये तांडव वगैरह तो तुम्हारे सब
- 1:16:55बनाए हुए हैं, वो नाचते हैं मस्ती में उस ज्ञान उस ज्ञान को पीकर
- 1:17:09प्रथम व्यक्ति जो पहुंचा। ज्ञान तक जो ज्ञानी हुआ वह शंकर
- 1:17:19है और तुम देखना हो विज्ञान भैरव तंत्र में किसने बोला?
- 1:17:28ये विधियों किसने बताईं? ऑल दी वेज़ अरे ओरिजिनेटेड बाय
- 1:17:38सिवा शंकर ही बताते हैं तुम्हें मुक्ति का मार्ग, क्योंकि वो पहले
- 1:17:44व्यक्ति हैं, सब विधियों को जानते हैं तो इस भ्रम में मत रहे ना।
- 1:17:56जो आपको भ्रम्या के हाथ में तसूल होगा, डमरू होगा और ऐसा बगंबर
- 1:18:03लपेटें होंगे। देखिए ये तो उनकी सिद्धियां हैं,
- 1:18:08आपके पास भी हो सकती हैं। मैंने भी बहुत देर तक यह सिधियों
- 1:18:13का रखा है। चाहूं तो अभी प्राप्त कर सकता हूँ
- 1:18:20लेकिन जब जीने का ही मन ना रहा, जी वीणा ही मर गई।
- 1:18:29जैसे महावीर की जीवेशणा मर गई तो फिर सिद्धियों का कौन क्या करेगा?
- 1:18:37सब फानी है यहाँ मिटेगा तो पाकर भी क्या करेंगे मूर्खों की बातें?
- 1:18:48शंकर के पास ये सभी सिद्धियां हैं।
- 1:18:52अनिमा लगिमा महिमा, गरिमा और चाहें अपने शरीर को जैसा बना सकते
- 1:18:58हैं और इन देवताओं को जिनको हम देवता कहते हैं, देवियां कहते
- 1:19:03हैं। इनके पास यह स्थितियां हैं, जैसा
- 1:19:06भी रूप चाहें। बना लेते हैं अनिमा, लगमा, गरिमा,
- 1:19:14महिमा ये सभी सिद्धियों के अपना आठ सिद्धियां और नौ न दिए आपने ये
- 1:19:20सुनी होंगी इनका विस्तार से कभी हो सका वर न करूँगा।
- 1:19:24वैसे इसकी जरूरत नहीं है। और तुम्हारे बहुत से शास्त्रों
- 1:19:30में लिखा है, नारद वहाँ चले गए, ये नारद कोई है तो है नहीं?
- 1:19:37इंद्र कोई है तो है नहीं, समझाने के लिए कुछ बना लिए गए थे जैसे
- 1:19:41तुम अलजबरा के सवाल सुलझाने के लिए कह देते हो।
- 1:19:46ए इस इक्वल टु सेवेन बी इस इक्वल टु टू अब ना तो ए का मतलब कोई
- 1:19:53सास्य है ना बी का मतलब कोई दो से है।
- 1:19:57समझाने के लिए ये फ़ॉर्मूलास है। ऐसे ही दीज़ आर और।
- 1:20:07इलेक्ट्रिसिटी ये पावर है बस समझाने के लिए बनाती है, शेर की
- 1:20:15सवारी है, उल्लू वाहिनी है अब क्यों बैठेगी भाई इतनी नखरे वाली
- 1:20:22लक्ष्मी? उल्लू पे क्यों बैठे?
- 1:20:27हाँ यहाँ मंत्रालय ठीक से नहीं लेते।
- 1:20:32गृह मंत्रालय ना मिले तो आकड़ जाते हैं और लक्ष्मी जो समृद्धि
- 1:20:38की बालिका है वे उल्लू पे क्यों बैठेगी भाई?
- 1:20:44जब कोई बढ़िया सा अपना वाहन चुनेगी, कोई मोर चुनेगी, कोई
- 1:20:49बढ़िया सा पंछी सुनेगी, अपनी उल्लू के ऊपर क्यों बैठे हैं?
- 1:20:55लेकिन ये आपने बना दिए मोड़ों के बनाए हुए, तो आप मान लेते हो
- 1:21:02क्योंकि आप भी मूड हो। अब हम अगले पोषण पे चलें
- 1:21:12कर्मभोगले का संस्कार संस्कार के कारण जैसे उसने जीवन जिया।
- 1:21:23वैसा जीवन व्यक्ति जी मैंने अपने जीवन में खाना बहुत कम खाया।
- 1:21:35राम जी का रोल करता था, एक वक्त खाना खाता था, वैसे ही संस्कार
- 1:21:39पड़ गया। अब मैं भोजन लेता ही नहीं।
- 1:21:43इसमें कोई त्याग व्याग की कोई बात नहीं बैठा हूँ।
- 1:21:49कहीं जाने का मन नहीं करता इतना घूमा, इतना घूमा नहीं जी करता और
- 1:21:57फिर भीतर इतना आनंद है। जाएं तो जाएं कहाँ?
- 1:22:04यही है सब कुछ वहाँ क्या मिलेगा वहाँ कोई भी नहीं है अपने भीतर
- 1:22:15जाने में जो मज़ा वो बाहर की किसी वस्तु में।
- 1:22:19जो सुख छज्जु ते चुवारे ना बल्ख ना बुखारे इसका गहरा मतलब निकलता
- 1:22:25था आध्यात्मिक आपने इसका गहरा मतलब आध्यात्मिक कभी निकाला नहीं
- 1:22:31जो सुख छज्जु दे चुवारे ना बल्ख में बुखारे क्यूँ जाएंगे हम बाहर?
- 1:22:39संस्कारों से व्यक्ति जिएगा। ज्ञानी होने के बाद भी अज्ञानी तो
- 1:22:46जिएगा, उसको तो छोड़ दो उसकी तो मैं बात भी नहीं किया, आज ज्ञानी
- 1:22:51की बात भी की है, ज्ञानी जिएगा संचकारों से।
- 1:22:59तो कृष्ण बच्चे पैदा करेगा, लेकिन जानता है कि शरीर की काम शक्ति
- 1:23:07बच्चे को पैदा करती है, बच्चे उसके नहीं ध्यान रखना।
- 1:23:13इसलिए सारा कुल नष्ट हो जाता है। यदुवंश, उसकी आँखों के सामने
- 1:23:18गांधारी उसे कह देती है। मैं तुझे इस श्राप देती हूँ कि
- 1:23:24जैसे मैंने अपनी आँखों से अपने कुल का नाश होते देखा।
- 1:23:29वैसे हे कृष्ण वासुदेव। तू अपने कुल को नाश होते हुए अपनी
- 1:23:36आँखों से देख तो कृष्ण क्या कहते हैं एवं मस्तुमाते तथा तो ऐसा ही
- 1:23:47होगा। कृष्ण को कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 1:23:52उसके बच्चे राज़ करें, उसके बच्चे आपस में लड़के मर जाए, माटी है,
- 1:23:59माटी का खेल है, माटी को पुतलों कैसा नजद है।
- 1:24:09ये बातें अगर समझ में आ जाएं तो सौभाग्य शादी हो न समझ में आए तो
- 1:24:20फिर से कोशिश करना है। प्रश्न गहरा था रॉस राइस कारों
- 1:24:29में? घूमे वो ही बन के संस्कार 93 से
- 1:24:36भी नहीं 193 भी आ जाए तो भी नहीं। इनको चैन नहीं पड़ेगा।
- 1:24:41भीतर से इनके संस्कार मांगते ही रहेंगे अन्यथा एक की ही जरूरत बस
- 1:24:47एक से ही काम चल जाता। दूसरे की भी क्या जरूरत थी?
- 1:24:55हम पुराने मॉडल लेके पुराने जूते लेके दो 2 साल घूमा लेते हैं, नए
- 1:25:01मॉडल की जरूरत नहीं पड़ती जूतों की भी और यहाँ ओशो को।
- 1:25:11एक रॉस राइस से चलता नहीं है। क्या माज रहा है?
- 1:25:14फिर तुम कहते हो आई लाइट में आई लाइट है, बिल्कुल है उसने जान
- 1:25:19दिया खुद को कैसे कहें नहीं है जो जाना वो कहना पड़ेगा।
- 1:25:29जो हुआ वो कहना पड़ेगा गलत हुआ तुम्हारी नजरों में या ठीक हुआ
- 1:25:33तुम्हारी नजरों में हमारी नजरों में जो हुआ सो हुआ या ठीक हुआ ना
- 1:25:40गलत हुआ। तुम औरों के घर के झगड़े न हक, न
- 1:25:52छेड़ तुम तुझको पराई क्या पड़ी अपनी न बैठ तू हे मानव तू खुद
- 1:26:01दुखी है और दुखी है। स्वयं की अज्ञान के कारण और इस
- 1:26:09अज्ञान को तू ही मटा पाएगा। दूसरा है अतः जितना शीघ्र तो हो
- 1:26:16सके अपने अज्ञान को मटाके उस सत्य चित आनंद के पास बैठ के।
- 1:26:24सतीप्रज्ञ हो जा रहा मेरे दृष्टि में शायद पूरे प्रश्नों का जवाब
- 1:26:34मैंने दे दिया है। वक्त भी गना हुई चला है, लेकिन
- 1:26:42किया क्या जाए? जवाब तो पूरा ही देना पड़ता है।
- 1:26:49श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण।
- 1:27:01वासुदेव, श्री कृष्ण, गोविंद हरे मुरारी नाथ नारायण, वासुदेव।
- 1:27:18पितमात स्वामी सखा हमारे पितमात स्वामी सखा हमारे हेनाथ नारायण
- 1:27:36वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे
- 1:27:46नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
- 1:27:59हे नाथ नारायण वासुदेव?