Latest / Baba ji Vijay Vats / 18 Aug 25 - ये कौन-सी शक्ति है जो हमें आने वाली घटनाएँ दिखा देती है? त्रिकालदर्शी बनने का रहस्य!
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- 0:05स्वामी प्रेवानंद नत मस्तकों में आपके चरणों में स्वीकार करें
- 0:17बाबा। स्वप्नों के द्वारा मुझे निकट
- 0:23भविष्य में होने वाली घटनाएं महत्वपूर्ण घटनाएं दिखाई देती रही
- 0:29हैं, विशेषकर। इनके साथ मेरा कोई संबंध भी नहीं
- 0:38होता है। आज तक इन 45 वर्षों में सैकड़ों
- 0:44घटनाएं हैं। इस जीवन में मैंने ऐसे कोई ध्यान
- 0:51साधनाएं। निरंतर गहनता और पूरी लगन के साथ
- 0:55कभी नहीं थी यहाँ आपसे दीक्षित हूँ और सभी शिष्यों के चरणों में
- 1:01नमन करता हूँ। सनातन के रिष्यों ने परमात्मा की
- 1:24तीन परारुपों की व्याख्या की सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान और
- 1:35सर्वज्ञ। दुर्भाग्यवश ओश्व जी ने सर्वज्ञ
- 1:48शब्द का अर्थ बदल दिया। जानबूझ के नहीं बदला।
- 2:00क्योंकि सर्वज्ञता जानी नहीं थी, तो कोषों ने सर्वज्ञता का अर्थ अब
- 2:07खंगाल लो। उषा जी ने सर्वज्ञता का अर्थ दिया
- 2:17वह जो जानने योग्य है। जिसने जान लिया, वह सर्वज्ञ हो
- 2:25गया। वह जो जानने योग्य है उसके जानने
- 2:34से सब जान लिया जाता है। उसे सर्वज्ञ कहते हैं।
- 2:41ये सनातन का दुर्भाग्य था। सनातन ने व्याख्या बिल्कुल ठीक की
- 2:50थी। सर्वज्ञ यानी जो सब कुछ जानता है।
- 2:59जो सब कुछ जानता है, हर घट में उसका निवास है, हर जर्रे में उसका
- 3:11निवास है और वह सब जानता है। ये परमात्मा की मेहमान नहीं है,
- 3:23यह उसका एक गुण है, लेकिन जब शब्दों के अर्थ समझना है तो
- 3:38शब्दों की परिभाषा बदल दी जाती है।
- 3:44वर्धमान को महावीर की किताब से नवाजा गया और जब आरएसएस को महावीर
- 3:55का अर्थ नहीं पता था तो उन्हें सावरकर ने।
- 4:01वीर के खिताब से सुशोभित कर दिया। क्योंकि वीर किसे कहते हैं आरएसएस
- 4:14वाले जानते हैं। शब्दों के अर्थ जब तुम्हें पता
- 4:20नहीं होता तो तुम अर्थ ही बदल देते हो ताकि पचड़े में पड़ना ही
- 4:28ना पड़े। इसी तरह ओशो ने भी सर्वज्ञ का
- 4:36अर्थ बदल दिया। सिनाथन ने सर्व के कार्थ किया था
- 4:42जो सब जानता है बहुत भविष्य वर्तमान तीनों कालों का क्या था
- 4:55त्रिकाल दर्शी। उसे सर्वज्ञ कहा।
- 5:02सनथ रोशु की अपनी मजबूरी है। अपनी मजबूरी यह है कि उसे उस
- 5:13स्तर। पर पहुंचेगा।
- 5:17ईमानदार है। ईमानदारी के कारण वह अर्थ न बता
- 5:24सकेंगे जो सनातन्य बता है, इसलिए खुद का अर्थ खोजना पड़ेगा।
- 5:33तो उसने अर्थ खोज लिया जब तुम उससे तल पर नहीं होते।
- 5:39जीस तल की व्याख्या किसी अन्य व्यक्ति ने अन्य अन्य की है, तो
- 5:44तुम शब्दों के अर्थ बदल लेते हो। यही सर्वज्ञ के साथ हुआ, सर्वज्ञ
- 5:54शब्द के साथ। बड़ी धृष्टता भी है।
- 6:04सर्वज्ञ का सही सही अर्थ जो सब जानता है त्रिकाल दर्शी क्या
- 6:11होगा? क्या हो गया, क्या हो रहा है उसी
- 6:20को? सर्वाक कहते हैं, लेकिन कैसे कह
- 6:22पाएंगे बुध? मैं बुध को ऐसे ही नहीं नकारता
- 6:30क्योंकि बुध को अगर तुम पूजने लगे।
- 6:34अगर तुम बुद्ध के पीछे हो लिए तो बुद्ध तक तो चले जाओगे बिलासक तुम
- 6:43स्वयं को तो जान, लेकिन जागवेलकर कहते हैं।
- 6:51कृष्ण कहते हैं, कबीर कहते हैं नानक कहते हैं और मैं कहता हूँ
- 7:00राहतें और भी हैं बसल की राहत के सिवा अभी रिलैक्सेशन आर दयार्ड।
- 7:15इससे ज्यादा भी कुछ खोजना बाकी है।
- 7:20अभी राह कंप्लीट हुई ना अभी राह मंजिल तक गई नहीं तो मैं चेरला
- 7:33होगा। इसी बात के कहने से तुम नाराज हो
- 7:39जाते हो। तो हो जाओ।
- 7:49तुम्हारी नाराजगी से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 7:55मैंने जो जाना जैसा जाना। कृष्ण ने जो जाना जैसा जाना कबीर
- 8:01नानक ने जो जाना जैसा जाना, वैसा बोल दिया और ओशो ने जो जाना वैसा
- 8:08बोल दिया। बुद्ध ने जो जाना वैसा बोल दिया।
- 8:16इसलिए इन लोगों के अलावा मैं कुछ आज कल के लोगों को या भविष्य में
- 8:25अतीत में गए हुए लोगों को जो गुजर गए सलमान के भाव से बोला करता हूँ
- 8:33मार्कर्स नीच से। चारवाक मेरी दृष्टि में सम्मान
- 8:41रखते हैं, क्यों ईमानदार है ईमानदारी से बोलती है ईश्वर नहीं
- 8:55है। आचार्य हैं प्रशांत ईमानदार बोल
- 9:04दिया क्योंकि ईमानदार है कैसा जानते हैं वैसा बोलते क्या है?
- 9:13आपको पढ़ाने वाले सर लोग है। अमानदार जैसा जानते हैं, बोलते थे
- 9:21आप सिर्फ फीस वसूल कर लेते हैं, उनका हाथ भी बनता है लेकिन अगर
- 9:31कोई सर ये कहने लगे। अगर प्रशांत ये कहने लगे हैं कि
- 9:41मैं व्याखयित कर दूंगा गीता को, मैं व्याखयित कर दूंगा अष्ट्राव
- 9:48कृतिका को उपनिश्चित कर, यहाँ में उसे मूवी को।
- 9:58संसार की बातों को व्याखाहित कर सकता है क्योंकि संसार की बातें
- 10:02बुद्धि से व्याखाहित होती हैं और बुद्धि इस में प्रखर है।
- 10:08हर लोगों के पास दीक्षा होती है। वो व्याख्याय कर देंगे, किसी बात
- 10:14को लेकिन करेंगे अपने ढंग से और अपने ढंग से भी ईमानदारी से
- 10:19करेंगे। उन पर कोई लांछेन नहीं लगाया जा
- 10:24सकता बेईमानी का, लेकिन ऐसी ईमानदारी का भी क्या करें?
- 10:32जो तुम्हें तुम्हारा लक्ष्य ना दे सके।
- 10:38ऐसी ईमानदारी को क्या चाहता है जो तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य आनंद तक
- 10:44पहुंचाना है? फिर तुम्हारे लिए तो सारा गलत हो
- 10:50गया ना? जो कॉम्पिटिशन रखना चाहता है,
- 10:55मुकाबला करना चाहता है। आई ए एसआइ ए एस वगैरह जो बनना
- 10:58चाहता है बन जो पैसे क्लियर करना चाहते हो कॉल लेकिन जब यह व्यक्ति
- 11:06मैंने बहुत बार बोला जब जस्टिन सर लोग।
- 11:15आध्यात्मिक था मैं घुस गए, 1 दिन घुस ही जाएंगे क्योंकि डालरों की
- 11:26खनखनाहट। लोभ के गए बिना अपना मूल्य खोती
- 11:32नहीं, इन शब्दों को ठीक हाँ, सर्कल दे दो डालरों की खनखनाहट
- 11:40लोभ के गए बिना अपना मूल्य खोती नहीं डॉलर मूल्यवान रहते हैं।
- 11:51जीस समय इनसर लोगों ने अजामिल की कथाएं कहनी शुरू कर दीं।
- 11:57उस समय आध्यात्मिकता बेड़ा गर्क हो गया।
- 12:02जीस समय आचार्य प्रश्नते गीता की व्याख्या करनी शुरू कर दी अष्टा
- 12:13उपनिषद का व्याख्यान करना शुरू कर दिया।
- 12:16हुसन ये तीनों गए क्यों? क्योंकि इन्हें व्याख्यात किया जा
- 12:32सकता है। जीस तर्क से बोले गए उस तर्क को
- 12:35छूकर और मैं भलीभाँति जानता हूँ, ये वहाँ पहुंचे हैं।
- 12:48ना तो मेरे दिमाग की कार है, ना मेरा पूर्वग्रह है, मेरा दर्शन है
- 12:59और इस दर्शनों से मैं कष्ट हूँ और जब मैं बिल्कुल।
- 13:10100% अस्वस्थ हो जाता है तभी किसी की काट करता हूँ।
- 13:20इसलिए जो भी नए नए जो भी नए नए आ रहे हैं।
- 13:28जरूरी नहीं है। सभी लोग के कारण कोई ऐसा भी आ
- 13:33सकता है जो करुणा का भाव लिया। आज कोई ऐसा भी आ सकता है जो आपको
- 13:42बांटने के लिए आया है। 1000 हाथों से बांटते 100 हाथों
- 13:49से इकट्ठा कर ऐसा भी तो हो सकता है लेकिन मैं जब तक परिपूर्ण रूप
- 14:00से 100% कन्फर्म नहीं होता। तब तक मैं किसी का न तो कटाक्ष
- 14:08करूँगा, ना नंदा करूँगा। अगर कटाक्ष करूँगा तो उसका बकायदा
- 14:14आपको तर्क दूंगा। सत्य का तर्क आप मेरे वीडियो के
- 14:24इतिहास को खंगाल। जहाँ जहाँ भी मैंने जीस चीज़ का
- 14:30खंडन किया, साथ में उसका तर्क दिया कोई भी वीडियो उठा लो ऐसे
- 14:36मैं बोलता है मेरे भितरे के चैतन्य की धारा है।
- 14:48वह सब जानता है आपके भीतर भी है सभी के भीतर है सबसे पहले मैं
- 14:59उससे आश्वस्त होता हूँ। उस।
- 15:05चैतन्य की धारा से जोवाव आते हैं। मैं प्रसारित कर देता हूँ आपको और
- 15:14वो चैतन्य की धारा सर्वज्ञ है, मैं आपसे क्यों पूछती हूँ क्योंकि
- 15:23लाजिम है मैं जानता नहीं? इतना ही नहीं है।
- 15:29मैं हूँ ही नहीं, ये सत्य है, चौंकना मुक्त मैं हूँ ही नहीं।
- 15:40तो फिर ये बोल कौन रहा है ये उसके द्वारा बनाया हुआ सर्जना का यंत्र
- 15:47आप एक खेल खेल खिलाड़ी। अब मैं खेल रहा हूँ।
- 15:53वे खुद ही अपने बनाए यंत्रों से जो बोलता है वह बोलता है।
- 16:00मैं वरदान डालता भी नहीं और डाल सकता भी नहीं।
- 16:06और मैंने ये अच्छी तरह से देख लिया है।
- 16:09जान लिया है कि मैं हूँ ना प्रेम प्रकाश आनंद ने जो प्रश्न पूछा,
- 16:22कभी कभी होने वाली घटनाएं मुझे दिख जाती हैं और हो जाती हैं।
- 16:29बहुत से संतों ने अलग अलग शब्दों में से बोला है कमिंग इवेंट्स
- 16:36कास्ट देयर शेडप्स बिफोर लाउसे ने कहा जो होता है।
- 16:45अच्छा होता है और परिवार तुम्हे करता है और तुम्हारे भले के लिए
- 16:56करता है, तुम्हें शायद पता नहीं अगर वह तुम्हें दुख देता है।
- 17:09हाँ इसको सर्किल में अगर वह तुम्हें दर्द देता है, कोई बिमारी
- 17:16देता है, बड़ी से बड़ी बिमारी देता है।
- 17:23तो यह शरीर को सुधार गृह की तरह इस्तेमाल करना चाहिए।
- 17:28जैसे हम जेल में बंद कर देते हैं, किसी को जेलों का नाम हिंदी में
- 17:34सुधार गृह होता है, सुधारने के लिए परमात्मा में कष्ट देता है,
- 17:41दुख देता है। पीड़ा देता है अभाव देता है कि
- 17:54तुम इस पाठशाला में सबक शीघ्र एक अद्भुत बात तुम्हें बताता हूँ।
- 18:04ये जो आता है परमात्मा का दिया हुआ दुख, दर्द, कष्ट, कृष, अभाव,
- 18:09पीड़ा, जीसको तुम धक्के मार कर भगाना चाहते हो, बिलकुल उससे ही
- 18:20कुंती मांग लेती है भगवान से। भगवान मेरी झोली दुखों से भर दो,
- 18:33वो मूलभूत तत्व को समझ गई है इनको आप।
- 18:40सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल भी कर सकते हो।
- 18:43परमात्मा तक जाने के लिए यहाँ सिर्फ हँसना खेला हँसीबो खेलेबो
- 18:53खरीबो तयान यही मात्र साधन नहीं। यहाँ दुख, दरिद्र, अभाव, पीड़ा,
- 19:01कष्ट, क्लेश, चिंता, सीता, अग्नि और रोक विरोध की सब सीढ़ियाँ बन
- 19:12सकती हैं अगर तुम इनका इससे मर करो।
- 19:18लेकिन तुमने इनका इस्तेमाल किया ही नहीं बुढ़ापा मैंने बोला बेरी
- 19:28ने काश तुम बुढ़ापे का सत्य जान लेते।
- 19:35जब शरीर कफ है, बुरी तरह कफ है, यह बिलकुल वही दशा है जब तुम
- 19:43परमात्मा के करीब हो। अच्छा वृद्धावस्था में बिलकुल सेम
- 19:48दशा होती है, तुम इसका फायदा उठा सकते हो।
- 19:53लेकिन तुम वृद्धावस्था से डरते हो।
- 19:58वो सनातन बड़ा समय था। सनातन ने कहा तीनो तो आश्रम
- 20:07बनाये, उनको छोड़ दो, तुम करो जो करना है।
- 20:13जवानी में सीखो, यौवन में भोगो और वाण प्रस्थ में दोनों तरफ ध्यान
- 20:25रखें। संसार को भी देखे, परमात्मा को भी
- 20:30देखा। लेकिन सन्निष्ट होते ही 75 वर्ष
- 20:33की आयु होते ही तुम अन्निष्ट हो जाओ, कारण प्रकृति तुम्हें स्वयं
- 20:45से मार्ग दे देती है। कारण तुम शरीक नहीं हो, जवानी में
- 20:56ना जान सकोगे। बचपन में ना जान सकोगे इतनी
- 21:00प्रज्ञा है बुद्धि विकसित नहीं, जवानी में ना जान सकोगे क्योंकि
- 21:08शरीर बड़ा बलिष्ठ है। बलिष्ठ शरीर से भोगना तुम चाहोगे
- 21:15छोड़ना नहीं चाहोगे। यह मनुष्य की आदत है वाण प्रस में
- 21:23भी तुम आधे आधे हो, कभी उदर खिस के लिए, कभी उदर खिस के लिए।
- 21:30लेकिन सनातन कहता है कि विचित्र के बाद।
- 21:38ही गोल्डन पीरियड है तो सनाथ ने कहा कि 75 के बाद तुम सन्यास
- 21:49लेना, सन्यास ले लेना क्या कारण? प्रकृति ही तुम्हारे लिए वो
- 22:01व्यवस्था पैदा कर रही है कि तुम उस व्यवस्था का इस्तेमाल करके
- 22:08ओढ़ियों को प्रयोग करके छत के ऊपर पहुँच जाओ।
- 22:15शरीर कपेगा ऑटोमेटिक कपेगा यू कैनट ओब्स्ट्रक्ट दट।
- 22:25तुम उसमें बाधा नहीं बन सकते रोक नहीं सकते सहेजे, सहेजे कपेगा।
- 22:33क्योंकि हार्ट ठीक से खून नहीं सप्लाई कर रहा है और जहाँ खून की
- 22:40सप्लाई नहीं होगी, वहाँ ट्रेम ब्लिंग होगी।
- 22:43शरीर कपेगा मैं तुम्हें कहता हूँ। इस स्थिति का इस्तेमाल करो शरीर
- 22:56कांपे तुम अपने आप में केंद्रित हो जाओ, वहीं सारी शक्ति को तुम
- 23:03खैच खाच के एक स्थान पर ले आओ, शरीर कांपेगा क्योंकि व्रत हो गया
- 23:10है। खून की सप्लाई नहीं हो रही है।
- 23:13शरीर का अपना धर्म है, शरीर का अपना नियम है, शरीर के नियमों में
- 23:19आवध जहाँ खून सप्लाई नहीं होता वो ट्रिम्बल होता है तो शरीर खपेगा
- 23:27और तुम अपने आप में आ जाओगे। कछुए के तरह उस अवस्था में जब
- 23:36तुमने शरीर कपता हुआ देख लिया और तुम अकंप अवस्था में खड़े रहे तो
- 23:41फर्क साफ हो जाएगा मैं अकंपू हूँ। यह कपने वाला शरीर मैं नहीं जीस
- 23:58भेद को तुम जवानी में नप जान सके उस भेद को तुम।
- 24:07वृद्धावस्था में जान लो सहजे सहजे जान लो इसलिए कबीर ने कहा।
- 24:15सहजे समाधि बलों रसन तो। सहज समाधि भली रसन।
- 24:31तो सहज सहज जो समाधि लग जाए, तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ेगा और
- 24:38बुढ़ापे में तुम क्या करते हो? शरीर का सारा तंत्र अस्त व्यस्त
- 24:44हो जाता है। हार्ट ठीक से ब्लड फेंक नहीं पाता
- 24:51और जहाँ ब्लड नहीं जाएगा वो ट्रैवेल करेगा।
- 24:54कपेगा कपेगा जो तुम चहकर भी कपा नहीं सके योगनवस्था में।
- 25:03वह सहजे सहजे खप गया। वृद्धावस्था में बस तुमने क्या
- 25:10करना? वो ही जो मैंने कहा था कछुए का
- 25:15अवतार क्यों माना गया? पशु कभी अवतार होते हैं, पशुओं
- 25:19में तो इतनी चेतना होती नहीं। जो इतनी कान्शस्नस विकास करें।
- 25:27लेकिन फिर भी कछुए को की अवतार किसी कारण से कहा गया है कछुए की
- 25:36तरह सारी चेतना को अपने में इकट्ठी कर रहा है।
- 25:42जैसे कछुआ अपने सारे अंगों को एक स्थान पर एकत्रित कर लेता है।
- 25:47तुमने कछुआ देखा, कभी नहीं देखा तो देख लेना हार्ट खोल होती है,
- 25:54उसके ऊपर जब चाहे शरीर को निकाल लेता है, बाहर पांव को चल पड़ता
- 26:05है। जब उसे कोई डर, भय लगता है तो वो
- 26:10अलर्ट हो जाता है। वह अपने सारे शरीर को खेच लेता
- 26:16है। ऐसे ही तुम सारी चेतना को एक
- 26:20स्थान पर खेच लेना। शरीर कम्पेगा वृद्धावस्था के कारण
- 26:27तुम होगे स्टेबल अकम् शरीर होगा अनस्टेबल और तुम स्टेबिलिटी में
- 26:36सहज हुए, स्थिर हुए तुम उस अनस्टेबल चीज़ को ठीक से देख
- 26:41लोगे, जान। इसे ही तो इसे ही तो प्रबुद्धता
- 26:54कहते हैं और प्रबुद्धता किसका नाम है अपने आपको जान लेना।
- 27:07जुदा उससे जो तुम नहीं एक कम्प रहा एंड यू अरे गोइंग टु ऑब्जर्व
- 27:21ऑब्जर्व में तुम लगे हो तुम लगातार निरंतर।
- 27:27देख रहे हो उस सकंपते हुए ऑब्जेक्ट को शरीर तुम्हारे लिए
- 27:32ऑब्जेक्ट हो गया। तुम देखने वाले हो गए जैसे फ़िल्म
- 27:40की स्क्रीन पर तुम फ़िल्म के। कहानी को चलते हुए देखते हो ऐसी
- 27:50ही भरतावस्था में तुम शरीर को कमता हो देख और तुम अकंप खड़े हो।
- 28:02स्टेबिलिटी को अनस्टेबिलिटी नजर आ जाएगी।
- 28:06भेद साफ हो गया। तुम शरीर नहीं हो, मन कपेगा उसी
- 28:12अवस्था में तुम कंपते हुए मन को देख सकते हो शरीर कपेगा तो शरीर
- 28:17का सीधा सीधा इफेक्ट पड़ेगा मन पर ये दोनों एक ही है मन कपेगा शरीर
- 28:26कपेगा शरीर कपेगा तो वृद्धावस्था में शरीर कांपेगा तुम अकंप खड़े
- 28:35खड़े स्टेबर्टी के भीतर उस कँपते हुए शरीर को उस कँपते हुए मन को
- 28:44न्याय। भेद सब हो गया यह जो कंप रहा है
- 28:53और मैं कौन हूँ जो कंप नहीं रहा हूँ जो सिर्फ देख रहा हूँ ओब्जर्व
- 29:02कर रहा हूँ। तो भेद साफ हो जाएगा।
- 29:07तुम इनसे कुछ अलग हो, जो कम रहा है शरीर और मन तुम उससे कुछ अलग
- 29:16हो साफ समझा जाएगा वृद्धावस्था में।
- 29:24इसलिए सनातन ने वृद्धावस्था को परमात्मा तक जाने के लिए
- 29:30सर्वश्रेष्ठ पौड़ी बना दिया। नहीं पहुँच सके तीनों आश्रय में
- 29:36कोई बात नहीं, चौथा बड़ा सहज आश्रम है।
- 29:46फरीद कहते हैं फरीदा होया 100 वर्ष का कंबने लगा शरीर।
- 29:54फरीद कहते हैं कि मैं 100 वर्ष का हो गया और मेरा शरीर कंपनी लगा।
- 30:01बस यहीं देखना है कि कौन कांप रहा है।
- 30:05तुम सोये सोये तो नहीं देख रहे के स्वपन कौन देख रहा है?
- 30:10लेकिन जागे जाके तो वृद्धावस्था में तुम देख सकते हो सोये सोये भी
- 30:15तुम जाग सकते हो। अगर तुम चाहो तो थोड़ी कॉन्शसनेस
- 30:23गहरी होनी चाहिए। तो तुम जैसे ही स्वप्न आएगा, तुम
- 30:29देखोगे सब के मन की सक्रीन के ऊपर सुप्न चल रहा है और जैसे ही तुम
- 30:38जाग कर देखोगे ओब्सर्वर की तरह देखोगे वह सुप्न।
- 30:44बिखर जाए, लेकिन स्वप्न में जागने का अभी तुम अभ्यास नहीं कर पाए तो
- 30:57सनातन कहते हैं, कोई बात नहीं, तीन आश्रम तुमने खो दिए बचपन खेल
- 31:06में खो। जवानी नींद भर सोया बुढ़ापा देख
- 31:12कर रोया बुढ़ापा एक वरदान भी हो सकता है अगर तुम बनाना चाहो तो बस
- 31:25इसे गंपते हुए। वर्धावस्ती में कांपते हुए शरीर
- 31:30को मात्र निहार लेना तो मैं छत पर पहुंचा देगा।
- 31:38हींग लगे न फटकड़ी रंग भी चौथा चोखा दे।
- 31:46चौथी व्यवस्था को इसलिए सबसे शानदार व्यवस्था कहा गया क्योंकि
- 31:51इसमें तुम कुछ नहीं करोगे। इसमें सब प्रकृति द्वारा
- 31:55प्रतिबाधित होगा। प्रकृति तुम्हारे शरीर को कमाएगी।
- 32:02और तुम आकाम्प हुए हुए उसे कांपते हुए शरीर को और मन को निहारोगे जो
- 32:08जवानी में न कर पाए, वह बुढ़ापे में स्वाम्य भी हो जाएगा तो
- 32:17स्वामी प्रेम प्रकाश ने पूछा। कभी कभी होने वाली घट में मुझे
- 32:29साक्षात रूप से दिख जाती हूँ और वो हो जाती हूँ तो तुम सभी
- 32:38परमात्मा हो। और अगर मैं इन मूर्खों को समझाता
- 32:46हूँ, व्यंग्यात्मक शब्दों से, कटु शब्दों से इनका निराधर करने के
- 32:54शब्दों से तो सिर्फ इनको आगाह करने के लिए।
- 33:02बहुत जन्म बीते मेरी माथो है जन्म तुम्हारे लिखे और सब कुछ तो हो
- 33:10गया है बीत गया यौन बीत गया बचपन बीत गई प्रो अवस्था।
- 33:21मूर्ख मन अब तू जाग गया क्यों झूठ पे झूठ बोले जा रहा है?
- 33:30क्यों और दुखों को निमंत्रण दे रहा है?
- 33:34तू जाग सकता है, तू वहाँ पहुँच सकता है।
- 33:42जहाँ बोलना चाहते हो वे तुम बोलना पाओगे, अब तो तुम बोलने की जैसे
- 33:56तुम्हें बिमारी लग गई है, फिर ऐसा वक्त आएगा।
- 34:03अगर तुमने थोड़ा सा भी प्रयास कर लिया है, अपने उस अंतःस्थल में
- 34:10गोता लगाने का साहस कर लिया। ये साहस है ज्वारी जैसा साहस मैं
- 34:17कहता हूँ, लेकिन तुम मेरे शब्दों को गलत पकड़ लेते हो।
- 34:23मैं कहता हूँ जुआरी जैसा साहस तुम ज्वारी हो जाते हो जुआ खेलने लगता
- 34:31है, मैं कहता हूँ उस शराब को चखने से पहले यहाँ मैखाने की शराब को
- 34:40चख लो पता चल जाएगा स्वाद कैसा। तो तुम शराब को ही चखने जाते हो।
- 34:46मुझे कमेंट आते हैं लोगों के धर्मपत्नियों आप उन्हें हमारे
- 34:50बच्चे बिगाड़ दिए, हमारे पति बिगाड़ दिए।
- 34:53माओं के कमेंट आते हैं, पत्नियों के कमेंट आते हैं, ठीक है।
- 35:03लेकिन कसूर मेरा नहीं, मैं कहता हूँ जब तुम जानते ही नहीं देखा
- 35:12नहीं परमात्मा को तो तुम याद कैसे करोगे जब तुमने शराब की रंगत चखी?
- 35:22तो तुम जानो कि कैसे वह पर्म स्वाद कैसा, इसलिए थोड़ी सी थोड़ी
- 35:27सी पीके देख लो अरजा क्या है ये जो रोकेंगे डेरे वाले फिर छोटी
- 35:37शराब के लिए रोकेंगे तो बड़ी शराब कैसे पिला पाएंगे?
- 35:42छोटे से ही तो शुरू करना होता है छोटे शराब के नशे से तो मैं रोक
- 35:55दिया अबाइड कर दिया तो बड़े शराब के नशे से।
- 36:02ये कैसे पहुँच गए हैं? क्योंकि पहुंचाती है व्यग्रता अब
- 36:09यहाँ समझ लेना। बात को छोटी शराब को पीकर इन्हें
- 36:16व्यग्रता नहीं हुई कि बड़ी शराब कैसी होती?
- 36:20यही व्यग्रता पैदा करने में असमर्थ होते हैं, डेरे वाले सूख
- 36:25जाते हैं, बस पांच नामों में उलझ जाते हैं और ध्यान रखो वह परमाम
- 36:37एक बार की वे तुम वहाँ पर। साहस से पहुँच गए, तुमने जम्प कर
- 36:43लिया फिर लोग कहेंगे बोलो और तुम बोलो वो अवस्था पर मौन की है तुम
- 36:51सिखाते हो बोलना पांच नाम जपो राधे करो राम करो बोलो।
- 36:59नहीं, वहाँ जाकर तो चुप हो जाता है, व्यक्ति चाहता है, बोलता हुआ
- 37:05तो भी नहीं बोल सकता। मुझे बड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
- 37:09बोलने में 35 वर्षों का मान और बाबा का आदेश के बोलो बड़ी दुविधा
- 37:17में फंसा। उनको ये शिकायत है के हम कुछ नहीं
- 37:34कहते। कुछ नहीं कहते।
- 37:47उनको ये शिकायत है कि हम। कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं कहते।
- 38:09अपने तो ये आदत है के। हम।
- 38:18कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं कहते उनको ये।
- 38:33शिखा यकी है। और अगर मैं बोलता हूँ तो तुम
- 38:48तूफान उठा लेते हो। कुछ कहने पे तूफान उठा लेती है,
- 39:02दुनिया उठा लेती है दुनिया। कुछ।
- 39:15कहने पे तूफान उठा लेती है, दुनिया उठा ले।
- 39:29ती है दुनिया उसमें ये कह के हम कुछ नहीं कहते।
- 39:51कुछ नहीं कहते अपनी तो ये के हम। कुछ नहीं कहते।
- 40:12कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते।
- 40:26अगर महने पे आहते। पर उसकी।
- 40:37इनायत है के हम। उसकी।
- 40:43िनायत है के हम कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं कहते अपनी तो ये आदते।
- 41:02है। हालात भी ऐसे हो जाते हैं।
- 41:09मजबूर बहुत करता है यह दिल तो जुबां को।
- 41:22मजबूर बहुत करता है यह दिल तो जुबां को यह दिल तो जुबां को।
- 41:41हालात ही कुछ ऐसे हैं हम हालात ही कुछ।
- 41:52यूं हैं के हम। हालात ही कुछ।
- 41:58यूं हैं के हम। कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं कहते।
- 42:13अपनी तो ये आदत है। जन्मो जनों से सदियों सदियों से
- 42:31तुम्हें बोलने की आदत पड़ गई है। यह आदत ही संस्कार।
- 42:40कोई बड़ी प्राणी है, जानवर भी बोलते हैं, अपनी भाषा में बोलते
- 42:47हैं, ये बोलने की आदत बड़ी पुरानी है।
- 42:53कितने जनम बीते। और बोलते बोलते हमें संस्कार पड़
- 43:00गया बोलने का। इसी संस्कार को तोड़ने के लिए संत
- 43:06पुरुष कहते हैं चुप हो जा, घर ईश्वर है, हो न बोलना है चांदी।
- 43:14खामोशी है सोना चुप हो जा अगर ईश्वर है हो ना जब उसकी इनायत हो
- 43:26गई मजबूर बहुत करता है ये दिल तो जुबान को।
- 43:33मजबूर बहुत करता है ये डेल तो जुबा को पर उसकी इनायत है क्या हम
- 43:41कुछ नहीं कहते पर उसकी इनायत है कि हम कुछ नहीं कहते, अपनी तो ये
- 43:49आदत है कि हम कुछ नहीं कहते। जन्मो।
- 43:53जन्मो से तुम्हे बोलने का संस्कार हो गया है।
- 43:57जब तुम्हे पहली बार खामोशी का चस्का लगेगा, उस खामोशी का स्वाद
- 44:05आएगा तो ये चस्का इतना गहरा लगेगा।
- 44:11कि तुम तुम बोलना तो ओके मजबूर बहुत करता है।
- 44:17ये दिल तो जुबां को है जब उसकी रहमों कर्म बरस जाती है।
- 44:25नदरी मोख द्वार। तो चुप्पी आती है और फिर लाख
- 44:36दुनिया कहे कहाँ बोल पाते हो? बड़ी मुशक्कत करनी पड़।
- 44:47मुझे बोलने के लिए 35 वर्ष का मन कैसे टूटा ये मैं ही तो जानता
- 44:58हूँ। ईश्वर का कम था पर सब उसका ही है।
- 45:06जब जान लिया ना मैं हूँ ना मेरा खुश तो फिर उसका हुक्म वह जैसा
- 45:16चलाये चला लेगा तुम एक बात का ध्यान रखना।
- 45:25जन्मो। जन्मो के संस्कार तुम्हारे साथ
- 45:27चिपटे पड़े हैं, तुम्हें बोलने के एडिक्शन तुम बोलने के आदी होकर एक
- 45:35बिमारी है अब चुप होना ना गवार गुजरता है।
- 45:44तुम ऐसे चुप न हो, चुप होने का व्यास मत कर उसकी एक बूंद पी
- 45:52लेना, बस तुम चुप हो जाओगे, ये जो रोकते हैं, डेरे वाले हैं, तुम मत
- 46:02मानना। तुम थोड़ी सीपी ही लेना और फिर
- 46:08देखना उसका नजारा है और फिर एक बात कह सुन मुझे शिकायत ना है के
- 46:17बाबा जी तो पीता ही जाता है और फिर इसको ही मत पीते जाना।
- 46:23मैं कहता हूँ उसकी एक बूंद चख लेना यहाँ से तो सिर्फ शुरुआत
- 46:28होती है, कैसा होगा उसका नशा, कैसी होगी उसकी खुमारी?
- 46:35यहाँ तो सिर्फ प्राथमिक पाठशाला की।
- 46:39पहला अध्याय पढ़ना होता है एम् अनार लेकिन एम् अनार का नहीं
- 46:44होता, ये बात ख्याल में रख लेंगे। खैर, खरगोश का नहीं होता ये बात
- 46:49ख्याल में रख लेंगे तुम बहक भी सकते हो तुम चिपक भी सकते हो।
- 46:57होशियार यार जानी ये रास्ता ठगों का कहीं इन शब्दों से ठगे मत जाना
- 47:05इधर भी ठगे जा सकते हो और उधर भी ठगे जा सकते हो होशियार यार जानी
- 47:13ये रास्ता ठगों का यहाँ ज़रा नजर चुकी तो।
- 47:16माल दोस्तों का के बड़े खुशहाल होंगे तुम्हें ठगेंगे किसी बात
- 47:28ठगेंगे तर्कों से बात समझा के तुम्हारी खोपड़ी को तोड़ देंगे।
- 47:36देखो तुम ओले से न जाने इनका तर्कों में।
- 47:40वो तड़का तीर्थ है वो तर्कों में आता नहीं शब्दों के जाल में उलझ
- 47:47मत जाना ये जंजाल है ये जंजाल तुम्हें ग्रस न ले ये जंजाल, नहीं
- 47:52तो डसा हुआ है तुम्हें खामोश खामोश।
- 48:04इस संसार तुम्हे बोलना ही तो नहीं देता किसे बोलने दिया जो जान क्या
- 48:15उसने बोलना चाहा उसके हुक्म में? तो उसे सलीब दे दी गई।
- 48:24जहर का प्यारा पूरा क्या? हांस पांव काट लिए गए।
- 48:31वह जुबानी हुई क्या कुछ नहीं हुआ? लेकिन तुम खबरदार रहे ना इनके
- 48:43तर्कों से। इनके शब्दों से इनकी कांटों से
- 48:49तुम सावधान रहना एक बात को ख्याल में रखना तुमने कुछ नहीं कहना।
- 48:56अपनी तो ये। हाँ, आदत है कि।
- 49:01हम इसे आदत बना लेना, इसे संस्कार बना लेना, वहाँ पहुँच जाना जहाँ
- 49:08भुला नहीं जाता है अपनी तो ये। आ जाते हैं कि।
- 49:17हम। कुछ नहीं कहत कुछ नहीं कहते।
- 49:35उनको ये शिकायत है। जब नहीं बोलोगे तो शिकायत करें।
- 49:44बोलो कुछ यही तो के साथ चुप हो गया भुला न गया।
- 49:51तो वहाँ के राजा राजा को तकलीफ है।
- 49:56बोलो कुछ बोलो तो अल्लाह ने कहा ये शहर ये देश छोड़ना ज्यादा ठीक
- 50:06रहेगा? रातों रात देश को छोड़ना चाहा
- 50:10लेकिन राजा लोग ज्यादा चालाक होते हैं।
- 50:15वो शतरंज की वेसाकते बनाने में ज्यादा कुशल होते हैं।
- 50:20उन्होंने सब जगह पहरे लगा दिया। देखना ये बूढ़ा।
- 50:26कहीं किसी द्वार से टपक न जाए। बाहर इसे जाने मिलते हैं।
- 50:33इसे कहना भी कुछ नहीं, बड़ा प्यारा व्यक्ति है।
- 50:40इसे वो परम प्रेम मिल गया है। यहाँ जाकर खामोश हो के हाय बोला
- 50:46नहीं सर, लेकिन इससे कहना हम यहाँ से जाने नहीं देंगे।
- 50:52पहले ये लोग का आगे येलो पेंसिल लिख के जाओ।
- 50:56तुमने क्या बोल के जाओ, तुम्हें क्या देखा?
- 51:05लाउ जे जिधर जाता सेना तैनात, मृत्यु जाने नहीं दिया पीछा
- 51:13छुड़ाना चाहता था झूठ मैंने बोल सकता था।
- 51:21आखिरी एक प्रहरी समझदार था, उसने पांव छोड़ दिया।
- 51:29उसने कहा प्रभु अगर आप कुछ न लिख के जाओगे तो हम जैसे अज्ञानियों
- 51:35का क्या होगा हम पैकर? लव जी का हृदय बस ही जी, क्या
- 51:50उन्होंने पेंसिल ली, कागज लिया और उसपे अल्फाज़ लिखे वह बोला नहीं
- 51:58जा सकता। इट कैन नॉट बी एक्सप्रेस्ड।
- 52:06या ही कैनट बी एक्सप्रेस्ड ही कैनट बी डिफाइन्ड तुम कहते हो कुछ
- 52:16बोलो। अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं
- 52:22कहते। उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं
- 52:27कहते। जैसे ही अपने भीतर जाओगे, मन
- 52:35बोलेंगे बोलने की आदत है। जन्मो जन्मो सदियों सदियों पुरानी
- 52:41आदत है, मन की तासीर हो गई है। ऐडिक्शन हो गई है, मन का संस्कार
- 52:47बन गया है पहले जो आँखों को औरतों को सी लेना।
- 52:58जोगा को सी लेना और अपना ध्यान अपने भीतर उतरने देना कोई प्रयास
- 53:06न करना उतर जाएगा। फिर तुम उस मकान पे पहुंचोगे यहाँ
- 53:12स्वामी प्रेम प्रकाश तुमने बोला? मुझे आने वाली घटनाओं का पता चल
- 53:19जाता है। तुम वहाँ पहुँच जाते हो तो सर्व
- 53:23व्यापक है, सर्व शक्तिमान है सर्व मैंने कहा वो सोने इसकी डेफिनिशन
- 53:34क्या करे बेचारा? झूठ बोल नहीं सकता, ये मानता है
- 53:39सच देखा नहीं कैसे? कहते हैं जो देखा नहीं वह होता है
- 53:47न आप उसको कह पाएंगे, न बुद्ध कह पाएंगे, न कृष्णमूर्ति कह पाएंगे
- 53:54ही कैनट बी एक्स्पस्ट। ही कैनट डू ए डिफ्रैंट यही है
- 54:00उसकी तो बोल नहीं पाए कुछ?
- 54:16उसके बारे में जीसको मैं रहस्य कहता हूँ कृष्ण जीसको मैं कहता
- 54:25हूँ यही फासला रह गया। और इसी फासले को शब्दों से परखा
- 54:35जा सकता है। बुध कहेंगे अप दीपोभ अपने दीपक
- 54:46स्वयं बनो, वे कहेंगे तुम तुम ही हो तुम्हारे भाग्य के निर्माता।
- 54:56लेकिन कृष्ण तुम्हें मूर्ख जान पड़ेंगे यहाँ किसने कहेंगे तुम हो
- 55:03ही नहीं, तुम कैसे कह सकते हो तुम अपने भाग्य की रेखाएं खुद बना
- 55:11सकते हो कृष्ण तो यही कहेंगे। और बुद्ध के अनयायियों को सुखु तो
- 55:19मिल जाएगा, आनंद ना मिलेगा, विश्राम तो मिल जाएगा।
- 55:23विश्राम तो नींद में भी मिल जाता है, लेकिन वो कैसा विश्राम जो
- 55:32आनंद न दे? रस तो उस ईख में भी होता है, जो
- 55:38ईख बहुत ऊंची हो जाती है, लेकिन रस होता है, स्वाद कहाँ होता है,
- 55:47फीका होता है, वह मीठा स्वाद नहीं होता, शहद सा।
- 55:54प्रस्तोत है लेकिन पानी जैसा होता है बुद्धा की शांति मोर तवाता है
- 56:09बुध जब नजर आएँगे। तो उनके चेहरे पे खुशी न हो, उनके
- 56:18चेहरे पे संगीत न हो चक उनका हृदय वीणा के झंकार से जंगकृत न हुआ
- 56:24होगा इसलिए बुद्ध कहेंगे तुम ही कर सकते हो।
- 56:33उसको भी करेंगे, तुम कर सकते हो, व्याख्यायित करेंगे, शब्दों में
- 56:38सब करेंगे, रहस्य को भी व्याख्यायित करने की चेष्टा
- 56:43करेंगे, कर नहीं पाएंगे बाद में इसलिए मैं सदा ही कहता हूँ।
- 56:51विज्ञान भैरव तंत्र पर बोले तो लेकिन कहाँ बोल पाए नहीं बोल पाए।
- 56:59इससे अच्छा तो न बोलते क्योंकि ये सही पर भाषा नहीं है।
- 57:05उसने जब देखा नहीं। और मैंने तो वर्षों को नहीं सुना
- 57:11इतना सुना है, लेकिन इतना नहीं सुना बस इतना सा सुना है जैसे
- 57:22किसी सब्जी को देखना हो के गढ़ गई है कि नहीं तो थोड़ा सा टुकड़ा।
- 57:28डाल के टेस्ट करना होता है। इतना से इतना सा देखा है उसे क्या
- 57:35बोलता है? क्या है इसकी मंशा और इतने से ही
- 57:41पता चल जाता है। इसमें नमक नहीं है, बेस्वादि है।
- 57:47और नमक के बिना स्वाद होगा क्या नहीं होगा?
- 57:53पर महात्मा ने समुद्र के पानी में भी नमक डाल दिया और देखिए उसकी
- 58:00कुशलता तुम्हारे खून में भी नमक डाल दिया।
- 58:05समुद्र के पानी में भी नमक डाल दिया।
- 58:07नमक के बिना शाद का साधन ईख कितनी ही ऊंची हो जाए, गन्ना कितना ही
- 58:17ऊंचा हो जाए, जब चखोगे तो रस न म और रस विहीन।
- 58:26रस विहीन एक किसी काम का नहीं होता है।
- 58:33पहुँच जाओगे वहाँ कोई शहंशाह ना बचेगा, कोई आग तुम्हें जला ना
- 58:41पाएगा। कोई शस्त्र तुम्हें काट न पाओगे,
- 58:49तुम अपने आपको जान सकोगे तुम शांत हो जाओगे अगर यही कामना है तो बुध
- 58:55के तन पे रुक जाना। बुध हुई तो रुक गए।
- 59:01खुशोभित रुक गए, जान लिया महेश शरीर ने इतने जानने से सब
- 59:12व्याधियाँ खत्म हो जाती हैं। ध्यान रखना क्या रोग के मट जाने
- 59:20से? व्यक्ति सवस्थ हो जाता है बस यही
- 59:26मुश्किल सवाल आते हैं जो तुमसे सुलझाया ना क्या ये फैसला तुमसे
- 59:36मिटाए क्या? हम सयाया न गया, हम से भुलाया न
- 59:55गया, हम सया न गया। तुमसे बुलाया न गया फासला प्यार
- 1:00:15में दोनों से मिटाया। न गया फासला प्यार में नो नो सी
- 1:00:33मिटाया न गया हम से आया। ना गया।
- 1:00:44तुमसे बुलाया ना गया। कृष्ण से बुलाया ना क्या बुद्ध से
- 1:00:59जाया ना? क्या ये फासला फासला ही बना रहा
- 1:01:04है? इसलिए 25 वर्ष से यही है।
- 1:01:14जाना पड़ेगा। मंदिर वहाँ पर जाकर ही पूर्ण होती
- 1:01:20है, उससे पहले पूर्ण नहीं होती। उससे पहले तो पथी का पथी की रहता
- 1:01:27है। माना काटे ना चुभेंगे माना धूप
- 1:01:33गर्म न होगी हवाएं तुम्हारे शरीर को भेदेंगी नहीं, वो ठंडी हो चाहे
- 1:01:40गर्म हो लेकिन। और रोग का न होना क्या सवस्थ होना
- 1:01:46होता है, क्या सवस्थ होना होता है?
- 1:01:49स्वयं को जान दिया लेकिन जान न होना नहीं होता को जान दिया मैं
- 1:02:00कौन? लेकिन श को जान न श होना नहीं
- 1:02:04होता बस इस बात का हाँ सर्किल बन जाता श को जान न श को होना नहीं
- 1:02:14होता, जैसे समुद्र खारा है पानी। जान लिया, लेकिन समुद्र में
- 1:02:28एकाकार ना हुए तो क्या समुद्र हो गए जो पानी की बूँद समुद्र में
- 1:02:36समाई नहीं, बूँद समाई नहीं समुद्र में।
- 1:02:41उसने टिप्स तो जाना, बस उसको छू के निकल आए समाये ना वो अभी अधूरी
- 1:02:54ही बनी रहती फासला प्यार में। दोनों से मिटाए न गया।
- 1:03:04वह तुम्हें कभी नहीं कहेगा मेरे में मिल जाओ, आके आमंत्रित करे
- 1:03:12प्रोत्साहित करेगा। हुक्मरान नहीं बनेगा, डिक्टेटर
- 1:03:21नहीं बनेगा, तुम्हें आज्ञा नहीं देगा, तुम स्वतंत्र हो, तुम्हारी
- 1:03:27स्वतंत्रता आखिरी दम तक बरकरार रहेंगी?
- 1:03:30तुम चाहो तो मिल जाओ, तुम चाहो तो न मिलो।
- 1:03:36बिल्कुल आखिरी जंपिंग पॉइंट पे तुम वापस आ सकते हो नहीं चाहते तो
- 1:03:44मत मिलो डोन्ट मर्ज अगर चाहते हो तो लगा दो चलान बस इतना सा फर्क
- 1:03:53है। बुध कृष्ण होने के लिए लालायित
- 1:03:58है। तुम बहाने कुछ भी बना दो, मैं
- 1:04:01जानती हूँ कृष्ण होने को लालायित है।
- 1:04:08कृष्ण हुए बिना उदाहरण नहीं है। बेहतर उतरोगे एक मुकाम आएगा।
- 1:04:16स्वामी प्रेम प्रकाश करना वह मुकाम आएगा जहाँ यू कैन सी वट विल
- 1:04:25हैपन वट एस हैपन हो क्या गया अतीत?
- 1:04:34होगा क्या भविष्य? अब क्या हो रहा है?
- 1:04:38वर्तमान इसे ही तृकाल दर्शी कहते हैं यह मुकाम आएगा यह सहे जी भी
- 1:04:47किसी को आ सकता है कि नहीं मौन लम्हों में तुम बैठे हो कोई विचार
- 1:04:52नहीं कर रहा। सब तरफ सन्नाटा है।
- 1:04:58साउंड ऑफ साई लें तो तुम्हें सुन रही है वो अनाहत नाक की मीठी मीठी
- 1:05:04ध्वनि और तुम उसे बड़े प्यार से सुन रहे हो, रात के कोलाहल हीन
- 1:05:12वातावरण में। हवाएं ठंडी बह रही है तुम उसके
- 1:05:19स्पर्श से आज़ाद हो रहे हो तुम सब जान रहे हो ऐसा मुकाम आएगा रास्ते
- 1:05:33में। लेकिन अभी तो संसार में चिपके धन
- 1:05:41से, शौहरत से, गद्दियों से, परिवार से, संबंधियों से,
- 1:05:50रिश्तेदारों से। पड़ोसियों से लेकिन ये चपकाहट
- 1:05:59कहीं ऐसा ना हो वहाँ तक बनी रह जाए तो बहुत मुश्किल हो जाएगा।
- 1:06:08तुम आखिरी पड़ाव पर भी आके वापस मर सकते हो वहाँ जाकर तुम्हें सब
- 1:06:14पता चलेगा। भविष्य में क्या हुआ, वर्तमान में
- 1:06:19क्या हुआ, अतीत में क्या हुआ? सब कोरे कागज़ की तरह साफ़
- 1:06:26मिलेगा, लेकिन। अटका मत जाना, पता भी चल गया तो
- 1:06:30क्या होगा, पता भी चल गया तो क्या होगा?
- 1:06:38महाभारत में वेध व्यास जन्मेजय को कहानी सुना दे वेध व्यास को पता
- 1:06:48था क्या होगा? तो जन्मे जा बड़ा क्रोधित हो
- 1:06:57जन्मे जा कहते जब तुम जैसे त्रिकारदर्शी वहाँ बैठे थे।
- 1:07:03क्या तुम इस महान विध्वंस को रोक न सकते थे?
- 1:07:10तो वेदवश बोले पुत्र हो। यही तो मुश्किल है हम कौन हैं?
- 1:07:19रोकने वाले नहीं रोक सके, नहीं रोक सकते थे, जान सकते थे ये
- 1:07:29होगा। और वो और खड़े खड़े देखते हुए
- 1:07:43विनाश का वो मजार देखते रहे। सप नजर फूल से मौत जू है शूल से
- 1:07:57लूट गए श्रृंगार सभी भाग के बबूल से और हम खड़े खड़े।
- 1:08:09बहार देखते रहे कारवाँ गुजर गया बहार देखते कारवाँ गुजर गया बहार
- 1:08:26देखते। कारवां गुबार के स्वप्न झरे फूल
- 1:08:35से, मीत चुभे शूल से मीत शूल के जैसे चुभ गए लूट गए श्रृंगार।
- 1:08:48सभी भाग के बबूल से श्रृंगार करना था।
- 1:08:54बाघ के फूलों से लूट गए सिंगार सभी भाग के बबूल से और हम खड़े
- 1:09:00खड़े बाहर देखते रहे। कारवां गुजर के आपको बाहर देखते
- 1:09:05रहे। रास्ते में आएगा सब कुछ तुम देख
- 1:09:14सकते हो क्या होगा? लेकिन वहाँ खहर जाना, मेरी बात को
- 1:09:21याद रखना, जान भी जाओगे तो क्या होगा?
- 1:09:26प्रख्यात हो जाओगे ज्योतिषियों की तरह भविष्य भक्तों की तरह मिलेगा
- 1:09:33कुछ आखिर में और हम खड़े खड़े हैं कारवां की संख्या को बाहर देखते
- 1:09:43रहे। धन्यवाद।