Latest / Baba ji Vijay Vats / 26 Jun 25 - Kabir's Doha | मन और दुख में वैर क्यों है? | जीवन को बदल देने वाला प्रवचन |
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- 0:00पारस गुप्ता कबीर का एक बड़ा प्रसिद्ध।
- 0:22और बाबा आपसे एक विनती कर दूँ किसी भी महान पुरुष को अब हम
- 0:35सिर्फ अपने दिमाग से नहीं समझेंगे, ना ही किसी आचार्यों से।
- 0:43न ही किसी सर लोग से अध्यात्म की बातें हम आध्यात्मिक व्यक्ति से
- 0:51ही समझेंगे। आपकी बात मेरे बहुत गहरे बैठ गए।
- 0:59जो जीस तल से बोला उसका अर्थ उसी से पूछो जो उस तल पर चला गया है,
- 1:12इसलिए बाबा कबीर का एक दो। दुख में सुमरण सब करें सुख में
- 1:22करेन कोय जो सुख में सुमरण कर दुख का ये कोय बाबा इस तोहे का गहरे
- 1:36से कहर। रहस्यत्मक विश्लेषण और व्याख्या
- 1:45करने की कृपा करें हमारी एक कहावत है।
- 1:57जिसका काम उसी को साजन और करे तो ठेंगा भजन तुमने पुत्र बहुत
- 2:08सुन्दर प्रश्न किया और जो दो पंक्तियाँ बोलीं वह कमाल थीं।
- 2:21जो उस तल पर पहुँच गया उससे ही क्यों ना पूछ ले लेकिन वो मिलता
- 2:28कहाँ है? सभी ठगी ही तो बैठे हैं।
- 2:36ठीक है, उससे पूछ लेना, लक्षणों को पहचान के पूछ लेना यह कोई
- 2:42मेकअप नहीं करेगा, नहीं बनाएगा। वह अपने भीतर जाएगा और तुम्हें
- 2:55अर्थ खोज के ला के बता देगा और तुमने आज भी पूछा कि हम सभी
- 3:09धर्मदंथों का अर्थ आपसे पूछे। कुछ जब तक सांस में सांस लें, अगर
- 3:21देखा जाए तो हमारे धर्मग्रंथों को पुनर अवलोकन करने की आवश्यकता है।
- 3:30चाहे कोई भी हो। वही व्यक्ति संक्षिप्त भाषा में
- 3:36बोले जो उस तल पे पहुँच गया। कबीर बोले तो उस तल से बोले लेकिन
- 3:47भाषा बोले पद दी गई। जब पद्य की भाषा का कोई भी अर्थ
- 3:53किया जा सकता है, इसलिए मैंने चुना गद्य की भाषा पद्य की भाषा
- 4:04के बदले मैं तुम्हें गीत गुण बना देता हूँ।
- 4:11उस रस में तुम थोड़ी देर रिलैक्स हो जाते हो और सही पूछो पुत्र तो
- 4:25कृष्ण संस्कृत में बोले, क्योंकि संस्कृत समझने वाले लोग थे।
- 4:31अर्जुन से बोले क्योंकि अर्जुन समझ सकता था उनकी बातों को, कबीर
- 4:40छंदों में बोले, दोहों में बोले उस वक्त लोग थे।
- 4:51जो इशारों की भाषा को सरते थे आज वो कॉल नहीं।
- 4:55हुई। आज बिल्कुल वो स्थिति होगी जैसे
- 5:01ट्रेन के भीतर भरी पड़ी है। खचाखच।
- 5:13कोई सीट खाली नहीं, कोई फर्श के ऊपर कोई खाली नहीं, यहाँ तक कि
- 5:18लोग खिड़कियों से भी लड़ते हैं और वहाँ तुम उस ट्रेन में चढ़ना
- 5:24चाहते हैं करीब करीब असंभव लगेगा। ये हालात है आज।
- 5:34एक चैनल पे, दूसरा चैनल चल। रहा है और प्रत्येक व्यक्ति श्रेय
- 5:38लेने की चेष्टा कर रहा है। मैं ज्यादा जनता हूँ, मेरे पास आओ
- 5:49यह श्रेय लेना भी तो? बहुत बड़ा लोग है और संत जन लोग
- 5:58को बिगाड़ कहते हैं, बुरी आदत है, उपरोध हो या लोग हो, काम हो या
- 6:10अहंकार। फिर मोहो या मद मच्छर बिल्कुल एक
- 6:21को रह बात कही गजब है सब्जेक्ट्स को पूछो।
- 6:33जो सब्जेक्ट को पढ़ें फिजिक्स अपर्णा केमिस्ट्री भरना जूलॉजी
- 6:39बर्टनी फिलॉसोफी साइकोलॉजी उन विशेषज्ञों से पूछो जिन्होंने
- 6:50डॉक्टरेट कर लिया, मास्टर डिग्री कर ली।
- 6:54लेकिन मैंने पहले भी कहा था पुत्र जीस दिन सर लोग अजा मिल की कथा
- 7:00कहनी शुरू कर दे, उस दिन समझ लेना के अध्यात्म का बड़ा गर्व हो गया
- 7:07है। क्योंकि अध्यात्म का आवासा वो
- 7:12जानते नहीं और अध्यात्म के आखिरी बिंदुओं को भोजन शुरू कर दिया।
- 7:18उन्होंने अजमेर की कथा का भी मैं कहूंगा आपसे।
- 7:27और तुम्हें लगेगा कि किस बोंधु ने।
- 7:31विकास सिद्धि बेकर्ती ने अजमेल की कथा को क्या रंग दे दिया?
- 7:38लेकिन पढ़ाने के लिए यही ढंग होते।
- 7:41हैं। दूसरा ढंग प्रयोग भी तो नहीं किया
- 7:45जा सकता। ज़रा सोच लो।
- 7:49अगर यह व्यक्ति अपने अन्तरश में खो जाए तो इसकी भाषा यही रहेंगी
- 7:55नहीं रहेंगी। आचार्य प्रशांत अगर अंदर कूद जाए
- 8:01तो इसकी भाषा ऐसी ही रहेंगी। देख अति तीखी तर्क युक्त नहीं
- 8:07भृसपूर्ण हो जाए। तार्किक है और देखिये तुम्हारी
- 8:18बुद्धि को समझाती है, थोड़ी थोड़ी हृदय में भी उतरती है, लेकिन तुम
- 8:25इस गलती में मत रहना चूक जाओगे। ये प्रशांत की बातें तुम्हारे
- 8:30हृदय को छू जाएंगी, बिल्कुल छू जाएंगी, खोपड़ी को छू जाएंगी, छू
- 8:35जाएंगी लेकिन तुम्हारे अंतश में कोई बदलाव पैदा करते नहीं कर
- 8:39पाएंगे। अंतश में गया है व्यक्ति वहाँ की
- 8:45खुशबू साथ लेके आता है। और खुशबू ही तो तुम्हें चाहिए धन
- 8:52तुम्हारे पास पदार्थ तुम्हारे पास माना कम हो सकते हैं।
- 8:56ज्यादा हो सकते हैं। लेकिन उस सतल का क्या करोगे?
- 9:01जीस सतल को तुमने कभी छूआ ही नहीं आनंद।
- 9:05और शांति की परम बढ़िया उस बगीचे में तो तुम कभी गए ही नहीं उस
- 9:15गुलशन की फिजाओं का कभी तुमने आनंद माना ही उसको क्या करोगे
- 9:24आइए। हम दोहे पे चल वक्त बर्बाद हो
- 9:30जाता है। बातों की बातों दुख में स्मरण
- 9:39उत्सव करें, सुख में करें न कॉल। जो सुख में स्मरण कारक दुःख का
- 9:47है, मैंने एक कथा कथित कबीरपंथी को पूछ लिया इस पार्टी का?
- 10:05बाबा सीद अर्थ है कि जब तुम दुखी होते हो तो तुम परमात्मा को याद
- 10:10करते हो, जब सुखी हो जाते हो, परमात्मा को याद नहीं करते हो,
- 10:15अगर तुम सुखी में ही परमात्मा को याद करना शुरू कर दो तो दुख नहीं
- 10:19आएगा। मैं इनका बिलकुल शारदी करती हूँ।
- 10:25लेकिन पुत्र तुमने तो शब्द कार था, तुम तो पीएचडी करने जा रहे थे
- 10:33और शब्द कार तो तुमने बहुत कर ली। अब तुम्हें वो अर्थ चाहिए जो कबीर
- 10:40ने धरातल से उठाये थे, जो उस अंतिम छोर से उठाये गए शब्द थे।
- 10:47उनका अर्थ चाहिए दुःख में स्मरण। सब कर पहली बात तो तुम्हें सुमरण
- 11:01की ही व्याख्या नहीं पता आगे का खाक चलो सुमरन, तुम जब को कहते हो
- 11:12याद करने को कहते हैं। जबकि मैंने तुम्हें कहा कि स्मरण
- 11:17आता है, किया नहीं जाता। उसकी याद आए।
- 11:24उसी तरह जैसे फूलों में सुगंध आती है, सुगंध पैदा की नहीं जाती,
- 11:30सुगंध आया करती है। प्रेमिका और प्रेमिका याद की नहीं
- 11:37जाती आया करती हूँ और एक वक्त तो ऐसा आ जाता जबकि प्रेमी और
- 11:42प्रेमिका की याद इतनी आती है कि तुम उसे दूर भगाना चाहते हो।
- 11:53पर वो करीब आती जाती है। तुम तंग आ जाती हो, सोते जगते,
- 11:58बैठते, खाते, पीते, उठते नाक उसी की याद बनी रहती है, परमात्मा की
- 12:07याद आती है की नहीं जाती, तुम तो करते हो?
- 12:13और उसके लिए भी बड़ा वक्त निर्धारित किया था।
- 12:18ब्रह्मवेला में बैठ जाना नींद भले ही पूरी ना हुई हो, माला पकड़
- 12:29लेना, जो नाम तुमने दिया वो नाम जप लेना।
- 12:37अभी कल के प्रवचन पे एक छोटा सा कमेंट आया था, वो बोलता चलूं, फिर
- 12:42मैं मुख्य दोहे पे आऊं ये कमेंट आया है अंकित साजन माफ़ करना
- 12:51भगवान। श्रीकांत की माता का नाम पद्मावती
- 12:57था। देवकी की माता का नाम चित्र लेखा
- 13:03था, पर यह आत्माबोध का इन बातों का।
- 13:13क्या लेना देना है सब बेकार की बातें हैं बकवास दया करें, नमस्ते
- 13:29कुछ बातें उल्टी पूछने से सही। परिणाम आते हैं।
- 13:36कंस की माता का नाम क्या था? देवकी की माता का नाम था क्या था
- 13:45बता दिया गया। मुझे पता है बेकार की बात है।
- 13:52कुछ भी नाम रहा। हो?
- 13:55क्या फर्क पड़ता है क्या फर्क पड़ता है अगर तुम राम, अल्लाह,
- 14:06रहीम सतनाम? गॉड कोई भी शब्द करें, कोई फर्क
- 14:19पड़ता है यही चीज़ मैं तुम्हें समझाना चाहता था।
- 14:28जब देवकी की माता और कंस की माता का नाम क्या था?
- 14:34ये बातें फिजूल हैं और बकवास हैं, तो क्या ये बातें बकवास नहीं हैं?
- 14:39परमात्मा का नाम क्या है, राम है, कृष्ण है, रहीम है, आला है?
- 14:47बैगरू है, सतनाम है, गॉड है या क्या है?
- 14:55क्या ये बातें बकवास नहीं हैं? यही बातें मैं कहना चाहती थी कंस
- 15:02और देवकी की माता का नाम क्या मुझे भी पता है?
- 15:10लेकिन मैं उस ब्राह्मण की काबिलियत को देखना चाहता।
- 15:14था। काबिलियत तो ज़रा भी नहीं थी, बस
- 15:18उसके चुप रहने से मैं समझ गया कि यह तो था चना बाजे कण।
- 15:28यह शास्त्रार्थ करने को कह रहा और शास्त्रार्थ महज बकवास हैं, बकवास
- 15:38की बातें हैं। इसलिए मैंने ऐसा सवाल पूछ लिया
- 15:44क्योंकि मैंने भागवत पढ़ा, हरबंश, कुरान, महाभारत पढ़ी।
- 15:54इनमें नाम नहीं थे तो लेकिन। लिखा था पक्का नहीं कह सकते ये भी
- 16:03लिखा था सांग कहीं कुछ लिखा कहीं कुछ लिखा कहीं स्त्रुत कीर्ति,
- 16:12कहीं पद्मावती लिखा कहीं चित्र लिखा।
- 16:21कहीं रानी का लिखा, कहीं रेणु का लिखा अलग अलग से नाम और।
- 16:28इन नामों से। फर्क का एक ही व्यक्ति के कई नाम
- 16:33होते हैं। यहाँ मुझे कोई बाबा जीके नाम से
- 16:39नहीं है यहाँ के पूछ लो की बाबा जीके घर जाना है वो कहते है पता
- 16:44नहीं बाबा जीके घर ही है सब यहाँ सभी बाबा जी, यहाँ तो मेरा नाम
- 16:53लेना पड़ेगा। विजय बस भी नहीं शर्मा विजय शर्मा
- 16:58तो सभी मुझे अपने अपने नामों से पहचानते हैं, लेकिन मैं कौन हूँ?
- 17:03ये तो कोई नहीं। जानता ये तो मैं ही जानता हूँ कि
- 17:10मैं क्या हूँ कौन? मैं कौन इसको जानने में क्या कुछ
- 17:21खोना पड़ता है तुम्हें अंदाजा लगेगा जब तुम कबीर का ये शब्द
- 17:31अच्छी तरह से समझोगे। बाकी बेकार की बातें हैं।
- 17:43छोड़ो बेकार की बातें कहीं। वेत न जाए रहना।
- 17:56सुहाग रात मना लो, कुछ तो लोग कहेंगे इन लोगों का काम है कहना
- 18:05छोड़ो, बेकार की बात है। कहीं बीत न जाए रहना एक ही तो रात
- 18:11आए। फिर ये रात कभी आएँगे वो रात बीती
- 18:23जाती है पर पर यही इस्लाम कहता है यही ईसाई कहता है एक ही जन्म है।
- 18:31और बीते जाता है। घनी गई, थोड़ी रही वो भी बीती जाए
- 18:41और तुमने अब तक किया क्या? महज शब्दों की लड़ाई के
- 18:47शास्त्रार्थ के तुमने किया क्या स्वयं को खोजा पदार्थ खोजा स्पीड
- 18:54की। इलेक्ट्रिसिटी की स्पीड खोजी जहाज
- 18:58कैसे बनेगा? ये खोजा फिजिक्स के सिद्धांत लव
- 19:04ग्रैविटेशन खोजा और सभी कानून खोजे।
- 19:08लेकिन क्या ये खोजा तुम्हें कौन? ये खोजें बिलकुल बिलकुल तुम कबीर
- 19:22की खोज को पूछ रहे हो। वैज्ञानिक से कार्की कम्बनों से
- 19:27ये श्रद्धा की बातें। इसे कबीर ही बता पाएंगे जो
- 19:33श्रद्धा के गहनतम तल पर उतर गए। उसकी बात है कि तुम कबीर की बातों
- 19:47का अर्थ पूछते हो? वैज्ञानिक से।
- 19:52तार्किक मन से श्रद्धा की बातें तार्किक मन जानता नहीं, श्रद्धा
- 19:58की बातें तार्किक मन को पता नहीं, लेकिन वो अपना अहम बचाने के लिए
- 20:04उसका जवाब जरूर देगा। संत हाथ जोड़ लेगा, मुझे नहीं
- 20:09पता। ये तो मैं नहीं जानता लेकिन ये
- 20:13जवाब दे देंगे ये कहेंगे हम जानते।
- 20:15हैं, बस इन्हें ही लोग सर कहते हैं।
- 20:21ऐसे लोगों को ही आचार्य कहा जाता है।
- 20:25ऐसे लोगों को ही आज सद्गुरु कहा जाता है।
- 20:30बात तो ये है कि सद्गुरु कहते मैंने कोई शास्त्र नहीं पढ़ा,
- 20:37गीता उपनिषद कुछ नहीं पढ़ा, लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि खुद को
- 20:45भी नहीं पढ़ा। अगर खुद को पढ़ लिया जाता पर
- 20:49शास्त्रों को न भी पढ़ते तो चलता लेकिन खुद को भी नहीं पढ़ते ये
- 20:54मुसीबतों पे। और फिर सारी दुनिया को ये बताएंगे
- 20:59तुम हो कौन बिना खुद वहाँ छलांग लगाये।
- 21:06जो कि तुम वास्तव में। हो हू एम आर और बताएंगे सारी
- 21:12दुनिया को और देखें कितने लोग पागल करते हैं किसने ठीक कहा था
- 21:22ठीक हिसाब से। जब भी कोई धरती पे धर्मगुरु पैदा
- 21:27होता हो ध्यान से सुन जब भी कोई धरती पे धर्मगुरु पैदा होता है,
- 21:37करोड़ों लोगों की जान खतरे में पड़ जाती है बड़ा सुन्दर।
- 21:44इसको आंचल से बांध लेना गांठ देगा।
- 21:50जब भी कोई धर्मगुरु इस धरती पर पैदा होता है, करोड़ों लोगों की
- 21:58जान मुसीबत में पड़ जाती है। क्या हो रहा है आज?
- 22:06नाम बड़ा प्यारा है धर्म युद्ध कभी धर्म के वास्तव भी युद्ध होता
- 22:11है। धर्म वह जो शांति सुखाय धर्म वह
- 22:18जो युद्ध नय हो इसके ढांगा भता है।
- 22:23और तुमने तो कमाल कर दिया तुमने तो धर्म युद्ध नाम का ही एक नया
- 22:29से गुफा खड़ा कर। दिया।
- 22:32मुस्लिम लड़ रहा है इजराइल और इजराइल अमेरिका की शेफ लड़।
- 22:40रहा है। अगर एक भाई ताकतवर है उसका मतलब
- 22:48ये तो नहीं के वो कमजोरों को सबको मार दे, लेकिन ये दुनिया है, यहाँ
- 22:56सब चलता है। सभी देशों को इस चाचा चौधरी को
- 23:03मार देना चाहिए। सभी देश इकट्ठे हो ये जो चौधरी
- 23:11में। बैठा सैकड़ों वर्षों से तुम्हारे
- 23:14सर पे एक टेटर को कभी जिंदा ना रहने दो।
- 23:21मेरा ये फार भोला दिमाग में रख लेना, क्योंकि डिक्टेटर तुम्हें
- 23:27दबाएगा वह आदमी। हो?
- 23:32या वह भावना हो। डिक्टेटरशिप की भावना तुम्हें
- 23:38दबाना सिखाती। है और दबाने का फल है कि तुमने
- 23:43बहुत कुछ दबाया काम दबाया, क्रोध, लोभ, मोह अंकार दबाया, प्रेम
- 23:52दबाया तुमने। लोगों को भी दबाया तुमने और आज
- 24:02उसके परिणाम सामने तुमने हिंसा को दबाया, आज फूट रही है तुम्हारे
- 24:08रोने रोने से हिंसा। जगह जगह बम बरसाए जा रहे हैं
- 24:14क्योंकि तुमने हिंसा को दबाया, तुम ऊपर ऊपर से अहिंसक बने रहे,
- 24:21ऊपर ऊपर से तुम बुद्ध बने रहे, गाँधी बने रहे भीतर से तो गाँधी
- 24:26बने भीतर से तो बुद्ध बने नहीं। तो हिंसा का सिद्धांत तुमने अपना
- 24:32लिया। अहिंसा परमो धर्मः तो अहिंसा दब
- 24:36गई ना? जब अहिंसा का मुखौटा लगाओगे तुम
- 24:41तख्ती। उठाओगे तुम अहिंसा की तख्ती
- 24:45उठाओगे तो क्या होगा? अहिंसा को दबाओगे?
- 24:49हिंसा महज सहज वो उठेगी उठेगी और तुमने तक्षती ले रखी अहिंसा की तो
- 24:59तुम हिंसा को दबा लोगे और परिणाम तुम्हारे सामने सारा देश सारी
- 25:06दुनिया लड़ रही है आपस में। सिर्फ वही नहीं लड़ रहा है।
- 25:12जिसके पास साधन नहीं है उसकी मजबूरी है हम इस शब्द।
- 25:31तुमने पूछा पुत्र, इसका रहस्यत्मक अर्थ क्या है?
- 25:39क्योंकि मैंने डॉक्टरेट करनी ठीक तुमने इसका अर्थ तो किया होगा?
- 25:45अब रहस्यत्मक अर्थ जो वास्तव में कबीर कहना चाहते है वह सुन?
- 25:52इतनी देर लग जाती है, मैं पास कर देता हूँ, रहस्य में पहले पहुंचता
- 25:58हूँ और फिर रहस्य से ऊपर उठता हूँ क्योंकि रहस्य में तो मन हो जाता
- 26:05है व्यक्त। पर मन से थोड़ा ऊपर उठता हूँ।
- 26:10और बिलकुल उस स्थिति में आ जा सकता हूँ जहाँ से मैं सिर्फ
- 26:14बोलूं, उससे थोड़ा नीचे गया तो मैं डूबा उससे थोड़ा ऊपर गया तो
- 26:25अर्थ में थोड़ा फर्क पड़ जाएगा। मैं बिलकुल वहाँ ठहर जाता हूँ
- 26:30स्टिर जहाँ सटीक अर्थ आपके पास पहुँच सके लो, मैं उस स्थिति में
- 26:37आ गया। दुख में सुमरन सब कर सुख में करह
- 26:47नप। इसका मूल कारण समझो।
- 26:56दुख से तुम दूर भागते दुख में तुम्हें परमात्मा की याद आती।
- 27:09दुःख वो कीमियां हैं जो मैं परमात्मा तक पहुंचा सकता है दुख
- 27:19तुम्हारा मन चाहता नहीं है कौन चाहता है मैं दुखी?
- 27:27कौन चाहता है मैं दर्द से भरा हूँ मेरा शरीर का रोम रोम दर्द से भरा
- 27:36पड़ा हूँ नहीं कोई चाहता कौन चाहता है मैं अभाव से युक्त हूँ
- 27:42कोई नहीं चाहता। कौन चाहता है मैं असहाय हो जाऊं?
- 27:51मैं मुसीबतों के भीतर निर आश्रित हो जाऊं, निरा विलंब हो जाऊं, मैं
- 27:59असुरक्षित हो जाऊं। कौन चाहता है?
- 28:04कोई नहीं चाहता तो कबीर कहते हैं, तुम्हारा मन सुरक्षा चाहता है,
- 28:15तुम्हारा मन अभाव नहीं चाहता। सभी चीजों को इकट्ठा करना चाहता
- 28:21है। सामान 100 वर्ष का।
- 28:23पर की खबर 100 बरस का सामान जोड़ लेना चाहता है।
- 28:30सच पूछो तो 100 पीढ़ियों का सामान जोड़ लेना चाहता है क्यों?
- 28:38क्योंकि मन स्वीकार नहीं करता। किस्से जहाँ तुम लाचार हो जाओ।
- 29:03मन असुरक्षा को स्वीकार नहीं करता।
- 29:06मैं धीरे धीरे बोल रहा हूँ ताकि ये शब्द तुम्हारे भीतर घनी उतर
- 29:10जाए। प्रश्न पडक प्यारा है और कबीर
- 29:15कहीं नहीं, प्रत्येक संत व्यक्ति का एक एक शब्द।
- 29:23अमूल्य है कोई कीमत नहीं। बेशकीमते तुम्हारा मन सुरक्षित
- 29:36रहना चाहता है। इसलिए जो सुरक्षित रहना चाहता है
- 29:43वो मन है जो सुरक्षा के दायरे में साथ साथ लेयर की सुरक्षा लेके
- 29:49चलता उससे बड़ा कायर बेरो और डरपोक व्यक्ति नहीं।
- 29:59गाँधी कभी सुरक्षा में नहीं चलते, उन्हें सुरक्षा मिली।
- 30:02पटेल ने कहा बापू तुम्हें लोग मार देंगे, बस इन्हीं दिनों में मार
- 30:11देंगे तुम सुरक्षा। ले लो।
- 30:15गाँधी बोले मैंने जो करना था। क्यों कर दिया?
- 30:21अब मेरी कोई जरूरत नहीं है। राज़ मैंने करना नहीं है।
- 30:24राज़ तुम करो मेरी आवश्यकता भी क्या है?
- 30:31अब कोई मुझे मारना चाहे अपनी। इच्छा पूरी कर ले सुरक्षा नहीं
- 30:36चाहिए मुझे। वही बुआ पटेल समझदार व्यक्ति हैं,
- 30:43दिमाग से काम लेते हैं लेकिन गाँधी समझदार है।
- 30:55गाँधी समर्पित हैं परमात्मा की क्षण गाँधी कहते हैं, जो होगा
- 31:01देखा जाएगा, हमारा अब कोई काम बचा नहीं और किसी लालच के वश ये काम
- 31:10किया नहीं। यह मेरा दायित्व।
- 31:12था। जितना हुआ उतना किया आने वाली
- 31:17जनता मुझे दोष दे, मुझे पूछे कोई बात?
- 31:20नहीं। गाँधी ने कब कहा मेरी भूत भरम
- 31:24गाँधी ने कब कहा मुझे राष्ट्रपिता का खिताब दो गाँधी ने कब कहा नोट
- 31:28के ऊपर मेरे चित्र शाम? गाँधी ने कब कहा मुझे महात्मा को
- 31:35तुम जिन चीजों पर विवाद करते हो कभी गहरे में सोचना कभी गाँधी ने
- 31:40वो मांगी थी फिर झगड़ा कहा है गाँधी ने मांगी नहीं तुमने उन्हें
- 31:48रंकारों से युक्त कर दिया। और खुद ही लड़ झगड़ रहे हो, गाँधी
- 31:54को मोहरा बना रहे हो, गाँधी का काम गाँधी ने कर दिया, चले गए
- 32:01तुम्हें नहीं सुहाया तुमने मार दिया, अच्छा किया।
- 32:09हैलो भैयो हरी भी सर सर से टली भला वैसे भी तो मर ही जाते बूढ़ा
- 32:15खुसट 78 वर्ष की आयु और क्या 1000 साल जीना होता?
- 32:23है। जीना जी लिया अपना कर्तव्य लक्ष्य
- 32:27पूरा कर गया जो उसने करना था लोगों का संघ लिया, सबके सबका
- 32:33धन्यवाद किया सब कोई मुझे मारना चाहता है मार दे।
- 32:42और। किसी भगत पुरुष ने मार दिया तो
- 32:47मैं एक बात बताऊँ, शायद अगर गाँधी तब जिंदा होते, कहीं दो सांस बाकी
- 32:55रह जाते तो गाँधी की आखिरी इच्छा भी वही होती जो ईसा की।
- 33:02हो ओह गॉड। पर गिव देम बिकॉज़ दे डोंट नो
- 33:07व्हॉट? उन्हें क्षमा कर देना क्योंकि ये
- 33:12नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं एक अहिंसक व्यक्ति को उसके हाथ
- 33:21में कोई तलवार नहीं। खडक नहीं डाल नहीं, उस बूढ़े
- 33:27व्यक्ति को तुम जवान व्यक्ति 139 साल का व्यक्ति अपने से डबल उम्र
- 33:33का 39, दून 78 हत्या कर रहा है। इसे तुम कायर का होगा या हो?
- 33:46अमूल मु्द्दे पे दुख में सुमरण सब करें, दुख बेशकीमती है कबीर कहते
- 33:54हैं दुख बेशकीमती है। सही जो संतत्व का इच्छुक था
- 34:03उन्होंने तो जानबूझ के दुख पैदा किया ज़रा देखो बुद्ध के पास सब
- 34:10कुछ है भरा बुरा परिवार तक्षोतास। हीरे मोती जहरात दास दासीन
- 34:22राजकुमार अकेला बारिश शुद्ध से क्रिटिकल कंडीशन्स पैदा करता है।
- 34:33वह सुरक्षित होना चाहता है। दिमाग खराब हो गया हम्म, दिमाग
- 34:40ठीक हो गया पहले खराब तुम जो सुबह से शाम तक डालरों की चमक सोने की
- 34:51चमक दमक को इकट्ठा करना चाहते हो? बुद्ध की नजरों में तुम मूढ़ हो,
- 35:02कबीर की नजरों में तुम मूढ़ हो, क्योंकि तुम सुरक्षा का ढंग
- 35:08इकट्ठा कर रहे हो। बुद्ध कहते ऐसे नहीं।
- 35:13कबीर कतई नहीं मिलेगा। इसे पहला सूत्र आज असुरक्षित हो
- 35:20जाओ, असुरक्षित हो जाओ। पहला सूत्र दुःख असुरक्षा में
- 35:31धकेलता है तुम्हें। और तुम्हारी सुरक्षा तुम्हें शोक
- 35:38करती है। मानव और असुरक्षा ये दोनों शत्रु।
- 35:50है। सुरक्षा के अंदर मन ठहरता है।
- 35:54और मन ही जड़ है तुम्हारे दुखों की बड़ा गहरा शब्द है, यहाँ से ले
- 36:03लो, इस गहरे शब्द से ले लो सब कुछ।
- 36:09बस ये गहरा शब्द ही तुम्हें डॉक्टरेट कर जाएगा।
- 36:15ये सुरक्षा से मन भागता। है।
- 36:22ये सुरक्षा में मन दुखी होता है और मन की चाहत है सुखी होना।
- 36:32और। असुरक्षा में मन दुखी होता है।
- 36:37इसलिए मन चाहता है सुरक्षा असुरक्षा में मन मरता है।
- 36:47अब समझदार लोग यही समझ जाएंगे। बस सारा जो निचोड़ है, कबीर
- 36:56असुरक्षा में मन गलता है, क्योंकि असुरक्षा मन के दुश्मन।
- 37:01हैं। सुरक्षा मन का कवच है, इसलिए तुम
- 37:06सात। दीवारों के महल में रहना चाहते हो
- 37:10या कोई गुस्से ना हो तुम सुरक्षित रहना चाहते हो असुरक्षित होना ही
- 37:17नहीं चाहते यह मन का स्वभाव। है और अगर कहीं तुम असुरक्षित हुए
- 37:24तो मन गया। पूरा सुरक्षित हुए तो मान गया अगर
- 37:29बुद्ध के घर छोड़ने का जहाँ तक कारण था कहीं भीतर से आवाज़ आई
- 37:41ऊंचा चौधराने का यहाँ। नहीं मिल सकता नहीं मिल सकता मैं
- 37:45कहता हूँ नहीं मिल सकता। बुद्ध ने जवाब क्या दिया क्या
- 37:53नहीं दिया मैं वहाँ नहीं था, लेकिन सही बात तो ये है कि अगर
- 37:57मैं वहाँ होता तो मैं ये जवाब देता कि नहीं सोच रहा?
- 38:01नहीं मिल सकता क्यों? क्योंकि यहाँ सुरक्षा है।
- 38:05हर प्रकार और सुरक्षा में मन अपने भीतर नहीं जाता।
- 38:11ये बड़ी गहरी बातें हैं। प्रेम से सुन लो, ये कबीर की
- 38:15पंक्तियाँ हैं इनके गहरे अर्थ में किसी ने समझाया ही नहीं।
- 38:19आज पहली दफ़े किसी समझदार व्यक्ति ने प्रश्न पूछा।
- 38:26मैं श्रोता से कहता, नहीं, श्रोता यह नहीं और श्रोता अवाहक खड़ी रह
- 38:35जाती पूछा था बड़ी समझदारी से। लेकिन बुद्ध ने कहा नहीं मिल सकता
- 38:42था, लेकिन मैं अज्ञानी था बस बात को उसके साथ मिला दिया झगड़ा होने
- 38:50से बचा दिया। बुध का अंत से कहता था यहाँ नहीं
- 38:58मिलेगा यहाँ सुरक्षा का घेरा है, कोई दुश्मन भी तो नहीं आ सकता
- 39:04यहाँ मुझे मेरे। चैनल कंट्रोलर वगैरह सेवा करने
- 39:15वाले लोग कहते हैं, बाबा हम यहाँ रोकने के लिए हैं, कोई अवांछित
- 39:19तत्व न आ जाए। तुम असुरक्षा में न हो जाओ।
- 39:24मैंने कहा कोई बात नहीं आने दो, आता है, आने दो।
- 39:30मर के जाएगा। चली जाने दो, मुझे कोई फर्क नहीं
- 39:38पड़ता कहते बाबा रोने लगे, हमें तो फर्क पड़ता है।
- 39:44मैंने कहा फिर तुम रोको, मुझसे मत पूछो।
- 39:49मैं नहीं कहूंगा। रोको।
- 39:51मैं कहूंगा अन्नू असुरक्षा में मन भरता।
- 39:56है। अब इसी शब्द से ही हम सारी
- 40:02व्याख्या कर देंगे। इस शब्द पे कन्डेन्स हो जाओ
- 40:05कॉन्सेंट्रेट हो जाओ मन दुख नहीं। चाहता।
- 40:12दुःख में सुमारणा सब कारण मान दुख नहीं चाहता क्योंकि दुख असुरक्षा
- 40:20है, अभाव असुरक्षा है। रोज़ प्रश्न आती है मेरे पास?
- 40:27बाबा अभावग्रस्त हूँ। मुझे कोई इंतेजामात कर दो ना।
- 40:39कि मेरा अभाव ठीक हो जाए। बिलकुल ठीक है अगर अभाव ठीक ना
- 40:46हुआ सारी उम्र तो फिर क्या करोगे? क्या आभाव में नहीं पहुंचा जा
- 40:55सकता? बिल्कुल पहुंचा जा सकता।
- 40:56है। इतना तो कभी आभाव नहीं होता कि
- 41:01तुम्हें दो फुल्के ना मिलें बाजार से।
- 41:04लेकिन बात ये है कि तुम्हारी शह और शोकत।
- 41:07गिरवी ही रखी जाती है। बुद्ध सम्राट थे लेकिन उनकी शानो
- 41:12शौकत गिरवी नहीं रखी गई। उनके भीतर आग थी।
- 41:18आग वृहा की मिलन की आग और इन शब्दों को ध्यान से सुन लेना।
- 41:25इब बिरह की आग इतनी गहरी हो जाए तो उस अमृत को पिए भी न बुझती
- 41:32नहीं। तुम्हारे संसार के कितने भी जल
- 41:37ठंडे हो, शीतल हो, फ्रिज में लगे हुए हो, उस प्यास को न बजा पाए,
- 41:43वह अग्नि ही कुछ ऐसी। इस आग में व्यक्ति जलता है।
- 41:54और इस आग में मज़ा भी बहुत है इतना मज़ा।
- 42:02संसार की तुम्हारी किसी चीज़ में इतना मज़ा नहीं है जो बिरहा की
- 42:08अग्नि में है इसलिए बिरहा की अग्नि में मीरा नाचना।
- 42:13शुरू कर देती है क्योंकि इसमें मज़ा है मज़ा तुम्हें निचादना है।
- 42:22बिरहा की अग्नि तुम्हारी आँखों में आंशका लेके आती है हम फिर
- 42:28कॉन्सेंट्रेट हो जाएं दुख में सुमरण संवकरण।
- 42:35क्यों? दुख में ऐसी क्या कीमियां हैं?
- 42:41व्हाटस ए क्रोनोलॉजी बिहाइंड इट दुख से तुम्हारा मन बचना चाहता है
- 42:58और जीस चीज़ से तुम्हारा मन बचना चाहता है बस।
- 43:04कुंजी तुम्हारे हाथों में आ गई भय से बचना चाहते हैं, भय में कूद
- 43:14जाओ, अभाव से बचना चाहता है अभाव में कूद जाओ।
- 43:27बेइज्जती से बचना चाहता है, बेइज्जती में कूद जाओ बीखा गए हैं
- 43:35गुरु के। पास।
- 43:37बीखा बड़े बड़े शेठ थे। सारी उधारी चलती थी ब्याज के ऊपर
- 43:43बाजार में सभी रनी था उनका। डेक्कन तीखा शिशुगंज में था।
- 44:00भीतर से आग उठी बिरहा की आग उठी। धीरे धीरे उठती है आग, एकदम से
- 44:07नहीं उठती वक्त लग जाता है थोड़ा सा।
- 44:13आह को चाहिए। एक उम्र असर होने तक वक्त तो लगता
- 44:19है धीरे धीरे आग उठी। बीख प्राबाग इतनी गहरी चली गई,
- 44:35बाजार में कुदारी चलती थी, सूद के ऊपर पैसा देता था, पैसा घना था।
- 44:43सुविधाएं बहुत थी लेकिन सुविधाएं कितनी भी हों।
- 44:47तुम चक्रवर्ती सम्राट भी क्यों न बन जाओ, ये अभाव तो भीतर बना ही
- 44:52रहेगा और तुम खुशकिस्मत उस दिन होगे जिसने अभाव तुम्हें तंग करने
- 44:58लग जाए, उसे ही वह की अग्नि कहते। ये अभाव का होना तुम्हारे प्राणों
- 45:05को ले ले निकाल। ले तमेश अभाव सरद झा का से।
- 45:24धधकते हैं बदन में शोले सर्द झोंको धधकते हैं।
- 45:43बदन में शोले जान ले लेगी ये बरसात करीबा।
- 46:04जहाँ ले ले गिजे बरसाती करी बाजा। दूर रह कर न करो बात करी बाजा।
- 46:31बिरहा की अग्नि पैदा होती। जब मन तूफानों में घिरता है बिरहा
- 46:39की अग्नि तेज होती है तब वो यह अच्छा बस कबीर यही कह रहे हैं तो
- 46:49बिरहा की अग्नि। को पैदा कौन करता है अभाव?
- 46:56मीरा को किस चीज़ का भाव? बुद्ध को किस चीज़ का अभाव?
- 47:01वही जो प्रेम स्वरूप सब हैं, जाड़े पदार्थ हैं, गद्दियाँ हैं,
- 47:09हीरे हैं, मोती हैं, ज्वरात हैं, सब पिता हैं।
- 47:18स्त्री है, पुत्र है, जनता है, सब है लेकिन एक नम्बर बस उसी का भाव
- 47:31तड़पाता है बाकी सब। और वही तो चाहिए पर कितनी प्यारी
- 47:43बात है क्यों उस एक के मिल जाने से बाकी तमन्नाए खत्म हो जाती?
- 47:50हैं। और तुम्हारी सारी तमन्नाएं पूरी
- 47:53होने से अगर एक तमन्ना बुरी ना हो, एक साथ है सब सद है सब साथ है
- 48:01सब। चार बेकार हो जाती हैं सारी चीजें
- 48:05अगर एक न मैं रहता हूँ। कबीर कहते है दुख में सुमरण सब
- 48:15करण दुख से मन डरता है और मन ही है जड़ तुम्हारे दुख का कारण।
- 48:30मन विदा हो जाए। तुम अमन की स्थिति में आ जाओ तो
- 48:38जंजा बातों का, झंझटों का, तूफानों का, विवादों का, कलशों का
- 48:43कष्टों का, दुखों का, दर्दों का कारण खत्म हो जाए, मन के खत्म
- 48:49होने से। सब व्याधियाँ खत्म हो जाती हैं और
- 48:53समाधियाँ आ जाती हैं। व्याधियाँ समाप्त हो जाती हैं,
- 48:58समाधान मिल जाती हैं, मन के खत्म होने से एक साथ है सब सब है एक
- 49:08साथ जाये। मन का समाधान हो जाए, मन मिट जाए
- 49:15यही समाधान मन से अमन की तरफ यात्रा हो जाए।
- 49:21दूसरा। सूत्र जाए।
- 49:26मन से अमन की तरफ अमन चैन कोई दंगा नहीं, कोई आगजनी नहीं, कोई
- 49:37तोड़। फोड़ नहीं, कोई पत्थरबाजी नहीं,
- 49:39कोई लाठीचार नहीं, सब अमन है, सुगून है, जहाँ मन है वहाँ गड़बड़
- 49:46है। जहाँ मन नहीं जहाँ अमन है, वहाँ
- 49:50शांति है और आनंद है, एक अमन के साधने से सब सध जाता है, एक असाद
- 50:00है सब सध। सब साथ है।
- 50:03सब बजाय संसार का सर को इकट्ठा कर लो, मन का समाधान न करो।
- 50:09तुम दुखी ही बने रहो तो इस एक शब्द में मैंने कन्डेन्सेशन क्यों
- 50:15किया? क्योंकि कबीर ने सारा कुछ एक शब्द
- 50:18में उड़ेल दिया। दुख में स्मरण शुरू करें।
- 50:27दुख और मन इनका बेर मन सुख के साथ जुड़ता है।
- 50:38सुख की घड़ियों में मन कहेगा आह आनंद आया मज़ा तुम्हारा दुश्मन मर
- 50:47जाए, तुम कहोगे क्या बात आज प्रभु ने मेरी बात सुन ली और तुम्हारा
- 50:56मित्र मर जाए। तो तुम छाती पीटोगे क्या हुआ जब
- 51:06मन सुखी हुआ तुम्हारे दुश्मन के मरने से तो तुम बड़े राजी हो गए
- 51:12जब मन दुखी हुआ तुम्हारे किसी अपने के मरने से।
- 51:20दुखी हुआ तो तुम भी दुखी हो तुम्हारा चयन हो गया।
- 51:26तुमने छाती फिट नहीं शुरू करती। लेकिन कबीर बड़ी उलटी पुलटी बात
- 51:35कहते हैं इसके अर्थ तुमने कुछ भी निकाल दिए लेकिन पुत्र तुमने पूछा
- 51:40कि उस सतल पे जाके इसका अर्थ 2:00 बजे तो उस सतल से ही मैं तुम्हें
- 51:45अर्थ दिए जा? रहा हूँ।
- 51:51मन और दुख का वैर मन और सुख की दोस्ती है।
- 51:55संदीप सुख में बड़ा मन मजेदार जिएगा, इसलिए सुख की कामना करता।
- 52:02है। क्योंकि मन कभी मरना नहीं चाहता।
- 52:06मन सुरक्षा चाहता है क्योंकि सुरक्षा में।
- 52:10सुख है, असुरक्षा में दुख है और जाने अनजाने बुद्ध को पता हो न हो
- 52:19बुद्ध को एक फॉर्मूला। हाथ लग गया।
- 52:22फिर कब आए, फिर आए घर एनलाइटन होने के बाद घर आए।
- 52:31पपिता ने कहा, ठीक मुझे पता था तुम आओगे, जिसके एक इशारे से 36
- 52:39प्रकार के भोजन उसकी थाली में परोस दिए जाते हैं।
- 52:42दास दासियाँ उसकी एक अंगुली के इशारे पर नाचते हैं, वो कैसे
- 52:47भिक्षा पत्र उठा के मांगेगा? कितनी देर मांगेगा?
- 52:51मैं अच्छी तरह जानता हूँ पुत्र इसलिए मैंने तुम्हे कभी नहीं
- 52:55बुलाया मुझे पता था भौंक भौंक क्या जाएगा, राजपुत्र है एयाशी
- 53:02में पाला है और मेरी जैसी एयाशी में तो कोई पुत्र आज तक पला ही
- 53:06नहीं है। बात को ठीक है।
- 53:12बुद्ध जीस आयाशी में परे उस आयाशी में कोई बच्चा आज तक नहीं चला।
- 53:20सुबह उठते ही सब जरे हुए पत्ते चुग दिए।
- 53:23जाते हैं कि इसको मृत्यु की खबर न हो।
- 53:28सब हरियाली ही हरियाली, कहीं कोई सूखा पत्ता, फूल नजर न आए, इसे
- 53:35घास का एक किचन का भी नजर न आए। सभी हरियाली ही हरियाली, उसके पास
- 53:40रहने वाले सेवक सेवकाओं को तीन बार स्नान करना।
- 53:44पड़ता। तीन बार वस्त्र बदलने पड़ते और
- 53:48खुशबू इतर से लहराती हुई चारो तरफ ज़रा भी इसको बदबू नहीं होनी
- 53:53चाहिए। कुछ ऐसे पलाबुद्ध ऐसे कौन पला
- 54:00होगा बना इस दुनिया के प्रथम व्यक्ति थे।
- 54:05प्रथम बच्चे जो इतने अय्याशी में पड़े ऐसे कोई बच्चा नहीं पड़ा।
- 54:17प्रबुद्ध कहीं जाने अनजाने समझ गए कि इससे तो नहीं मिला भाई।
- 54:25और मौत आएगी। ऊपर से प्रहार पड़ गया।
- 54:28सत्य का सत्य प्रहार कर दे और तुमने भोग लिया हो सब बस फिर वो
- 54:38दिन दूर। नहीं है जब।
- 54:41तुम अपने अंत में प्रवेश कर जाओगे।
- 54:46जब तुम जो हो वह चले जाओगे, श्रुति प्रज्ञा हो जाओ प्रहार कर
- 54:55दिया मृत्यु ने जा रहा था किसी दोस्त के सेलेब्रेशन में।
- 55:01वहाँ झटका लगा। बीमार को देखा वृद्ध को देखा कमर
- 55:04झुग्गी हुई टीबी का मरीज खांस रहा है लगातार फिर उसके बाद मृत्यु
- 55:11अर्थी। देखता है पूछता है चेतक ये कौन यह
- 55:19आदमी है? फिर क्या हो गया, बीमार हो गया,
- 55:25यह क्या हो गया? कमर झुक गई, बूढ़ा हो गया ये खास
- 55:29क्यों रहा है? इसके टीबी हो गई राज्य अक्षिमा
- 55:33ट्यूबरकरोसिस ये ठीक नहीं हो सकता, नहीं हो सकता ये मरेगा।
- 55:40मरेगा क्या मरता भी है? आदमी?
- 55:45हाँ, प्रभु, क्षमा करना। मुझपे पाबंदी है राजा को मत कह
- 55:55देना। लेकिन तुमने इतने प्यार से पूछा
- 56:00रहा न गया इतने प्यार से पूछा कि सत्य औघड़ के बाहर आ गया लब पर आ
- 56:07गया जो वहाँ पर आ गया मरता है। प्रभु और आगे से मरते हुए अर्थी
- 56:16ये कौन? ये मर गया है, अब इसका क्या
- 56:19करेंगे, इसको फूंक देंगे। अच्छा ये है हाँ ये है ठीक समझाए,
- 56:29फिर अगर मरना ही है और मरने के बाद।
- 56:35ये देखो कितना लाचार ये 10 पांच व्यक्ति इसको उठाने के लिए इतना
- 56:43भी नहीं कि जाकर मृत घाट में जाकर लकड़ियों पर सो जाए।
- 56:49लो भाई मैंने अपना काम कर दिया, तुम अब थोड़ा तीली तुम लगा दो।
- 56:58ये उठाना भी पड़ेगा की सारी जंजावात शरीर पियाते दुख और मन का
- 57:07वैर दुख में स्मरण सब करें। तुम दुखी हो तो तुम दुखी से सुखी
- 57:26होने का उपाय भी कर सकते हो। तुम दुखी हो।
- 57:32तो उस दुख को स्वीकृत भी कर सकते हो।
- 57:35ये बाबा नानक का रास्ता। है।
- 57:39और दोनों में से बाबा नानक तो एक रास्ता चुन लेंगे वो तो बाबा नानक
- 57:44का है एक्सेप्ट दट विथ। फुल हार्ड।
- 57:54फ्रॉम दी इन्नर कोर्ट ऑफ योर हॉवर तुम्हारे आंतरिक सतह से हृदय की
- 58:01आंतरिक सतह से सत्य को स्वीकार कर।
- 58:05लो। वो दुख है, वो अभाव है, वो पीड़ा
- 58:11है, वो दर्द है। वो कुछ भी है आंतरिक हृदय की
- 58:15अंतरिम गहराइयों तक उसे स्वीकृत कर।
- 58:18लो। इसे ही कन्फेशन भी कहते हैं।
- 58:23थोड़ी सी शाखा बदल जाएगी, लेकिन अब मैं शाखा बदलना नहीं चाहूंगी।
- 58:29क्योंकि अगर मैंने शाखा बदली तो इतनी दूर चला जाऊंगा और इतनी दूर
- 58:34तक सुनने की तुम्हारी आदत। है मन और दुख का वैर मन दुखी होना
- 58:45नहीं सर। मन सुखी होना।
- 58:49चाहता है थोड़ा ठहर जाता हूँ जब आज तुम्हारे भीतर उतरे मन और दुख
- 59:02का व्यय। मन चाहता है सुखी होना मन चाहता
- 59:09है सुख का साधन जुटाना, क्योंकि सुखी होना चाहता है तो सुखी होने
- 59:14के लिए सुंदर गद्दे भी चाहिए, बड़ा सा बैट भी चाहिए।
- 59:1910 20,00,000 का यह सोने का तक तो था जो लोगों के टॉयलेट्स सोने के
- 59:25होते हैं। अजब ज़माना है काश इन्होंने बाबा
- 59:37नानक का सिद्धांत समझा। सोने के टॉयलेट्स बनाने वाले उस
- 59:44धन को गरीबों में बाँट देते तो कितना सुकून मिलता है।
- 59:51अब आराम मिलता है। मेरे शब्दों को समझे ना सुकून
- 59:56नहीं मिलती, आराम और सुकून। एक बात नहीं आराम सुविधा है सुखु
- 1:00:05तृप्ति है, आराम। से सुन लो।
- 1:00:10आराम सुविधा है, सुखु तृप्ति है और तुम्हें चाहिए तृप्ति आराम
- 1:00:18नहीं चाहिए। तुम्हें सुविधा नहीं चाहिए,
- 1:00:22तुम्हें तृप्ति चाहिए। तृप्त व्यक्ति तो पत्थरों के ऊपर
- 1:00:28भी अन्य घड़े पत्थरों के ऊपर भी सो जाया करता है क्योंकि उसे
- 1:00:34परमात्मा की न्यामत नींद मिल जाती है।
- 1:00:38रूखी सुखी खाई के ठंडा पानी पी क्योंकि उसे परमात्मा की नियामत
- 1:00:45मिल गई। क्या भूख और सेठ लोगों तुमसे भूख
- 1:00:50छीन ली परमात्मा? की।
- 1:00:55तू ही तो गोगड़ो यादें आ गई। वह पचता ही नहीं है, पेट में ही
- 1:01:01पड़ा रहता है, सड़क सटता जाता है और गोकड़े बढ़िया आ जाते।
- 1:01:05हैं। तुम राजनीतिज्ञों की गोकड़े में
- 1:01:08देखना पचता नहीं। सुकुम और सविंदा ठीक रहे मन और
- 1:01:27दुःख 36 का आंकड़ा है तो उसमें औरठ दुश्मन।
- 1:01:37जहाँ दुख है वहाँ मन नहीं टिकता इसलिए कुंती बड़ी समझदार है।
- 1:01:46कुंती जैसी बुद्धिमान औरत जब तुमने पूछा कोई स्त्री है जो
- 1:01:50पहुँच गए? मैंने कहा कुंती बाहरी लक्षणों से
- 1:01:55पता चल जाता है। बस देखने वाली आँख चाहिए अंध के
- 1:02:04पास आँखें ही तो होती नहीं रंग बता देता है हरा है कि पीला है एक
- 1:02:10काला है, लेकिन अंदाजी से। यह तुम्हारे तथाकथित शास्त्रज्ञ,
- 1:02:17आचार्य और सरलोक नहीं जानते। कुछ नहीं।
- 1:02:24मतलब ये गए नहीं भीतर शब्दों का क्यों कि इनके भीतर भक्का बल ही
- 1:02:33बहुत है। डिक्शनरी भरी बूढ़ी शब्दों का
- 1:02:37अर्थ ये एक अर्थ के समान अर्थक बीज बता देंगे, लेकिन।
- 1:02:47अर्थ के भीतर जो रस छिपा है, उसकी तो एक बूंद ही काफी है।
- 1:02:56उसकी एक बूंद थी काफी है। पर वो दिन धन्य होगा जीस दिन तुम
- 1:03:02एक बूंद अमृत की प्रथम बार पीओगे प्रथम बार में क्यों कह रहा?
- 1:03:08क्योंकि अगर पीली होती तो आज मेरे प्रवचन ना सुन रहे?
- 1:03:13हाँ, आज किसी एकांत कोने में बैठे उस रस का बांध कर रहे होते यहाँ
- 1:03:24भटकते न फिरते, मेरी वीडियो जना सुनते क्या जरूरत थी आवश्यकता
- 1:03:30क्या है? बस मेरी वीडियो सुन रहे हो?
- 1:03:38इसका अर्थ साफ है कि तुमने वोहरा शुक्रिया और मैं तुमसे कहता हूँ
- 1:03:46बिलकुल सुन लो। जापान में एक व्यक्ति जो हिंदी
- 1:03:51नहीं समझता उसने मुझे सुनना शुरू कर दिया।
- 1:03:56मैं जानता था मुझे लोग कहते ये जानता तो है नहीं वह लेकिन
- 1:04:01तुम्हें सुनता है और सुनता है और। ऐसा मैं को नहीं हो जाता।
- 1:04:08सुनता है और ऐसा मस्त हो जाता है कि इसके चेहरे मोहरे ऐसे में
- 1:04:14शांति की सुगंध आती है। ये ऐसा शीतल हो जाता है।
- 1:04:24किसके मुखमंडल को निहारने का मन होता है?
- 1:04:29क्या होता है ये जानता तो है नहीं आप बोल क्या रहे हो?
- 1:04:33मैंने कहा यही जानता है मैं क्या बोल रहा हूँ तुम नहीं जानते हाँ
- 1:04:38वीर जिसे श्रावक कहते हैं यही है वो व्यक्ति।
- 1:04:42बाबा नानक किसे कहते हैं? सुनिए दुख बाप का नाश यही है वो
- 1:04:47व्यक्ति जो सुन रहा है लेकिन सुन क्या रहा है शब्द शब्दों के सुन
- 1:04:54से कुछ नहीं इसलिए रोज़ कहता हूँ लेकिन तुम्हारी समझ में कब आएगा
- 1:04:59बताये, तुम ही तो समझोगे न? तुम भीतर घुसने दोगे?
- 1:05:04बात को तो समझ आएगा, तुम बाहर से ही रिपलशन कर देते हो तो समझ क्या
- 1:05:10खाएगा कि यह व्यक्ति शब्दों को समझता ही नहीं, क्योंकि जपयनी
- 1:05:19व्यक्ति? हिंदी नहीं समझता तो फिर ये करता
- 1:05:23क्या है? हाँ यही है व्यक्ति जो समझता है
- 1:05:28कि कौन आचार्य और कौन संत? क्योंकि शब्दों के साथ लबड़ता बड़
- 1:05:34के भीतर के आनंद का कुपोषण का रस साथ आता है।
- 1:05:40यह उसको पीता है, यह फलक गिरा देता है, यह रस पी जाता है, और
- 1:05:47रसोग ऐसा हाँ वह रस है और ये जापानी व्यक्ति रस पी लेता है।
- 1:05:57जरूरत रस की रस में सब कुछ है, हो रख तो बेकार है, हो रख को फेंक
- 1:06:04देता है उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं।
- 1:06:11इसने रस पिया। इसलिए ये एक सूत्र तीसरा बताता
- 1:06:16है। बस तुम तुम सिर्फ सुनना, महज
- 1:06:21सुनना समझने की जष्टा मत करना। समझ में तो वो आएगा भी नहीं।
- 1:06:27लाख कोशिश करने के बाद भी आखिर में ये समझ आएगा क्या?
- 1:06:33कि वह समझ आता है और तुम हंस हो गए।
- 1:06:40अपनी बेवकूफ़ पे जो समझ में नहीं आ सकता था उसे समझने की चेष्टा
- 1:06:45में सारी उम्र गवा दी। सारी उम्र गँवा लई तुम जिंदड़ी है
- 1:06:5610 की प्यार विचू खटिया सारी उम्र गँवा लई तुम जिंदड़ी है 10 की
- 1:07:04प्यार विचू खटिया प्यार में क्या खटा तुम्हे?
- 1:07:10सारी जिंदगी कमा ली थी। शब्दों से क्या निकला इस जापानी
- 1:07:17बच्चे से पूछो ये एक उदाहरण बन गया।
- 1:07:22इसलिए मैं रोज़ जो तो मैं कहता था।
- 1:07:27केन को मत पकड़ो मत पकड़ो, तुम शब्दों को पकड़ते हो, तुम तुम वो
- 1:07:33ईख चूस रहे हो जिसमें रसने और तुम्हें सिर्फ सूचना ही चाहिए
- 1:07:40नीरस ढूंढ़ते हो तुम परमात्मा। को।
- 1:07:47ढूंढ़ते हो तुम रस को चूस रहे हो तुम ईख को, जिसमें रस नहीं है उस
- 1:07:59संतरे में, जिसमें सिर्फ फलक ही फलक है, भिजाती है, दिव्य है,
- 1:08:04सिर्फ रस नहीं है उसमें। लेकिन तुम्हें चाहिए रस रस है
- 1:08:13अमृत जिसकी एक बूंद तुमने पीनी है सिर्फ एक बूंद।
- 1:08:21इसीलिए मैंने कहा तुम सतोरे की झलक एक बार देखी।
- 1:08:24बस उस रस को किसी तरह पी लो, एक बूंद काफी वॅन ड्रॉप इस मोर थान।
- 1:08:33सुफ्फिसिएंट दुख में स्मरण सबका है।
- 1:08:49दुख में मन मरता है। और धन्य है वो लोग जो दुख को
- 1:08:58स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन तुम दुख का इलाज करने पर
- 1:09:07तुम कहते हो, हम तो दुख से लड़ेंगे और फिर तुम्हारे आचार्य
- 1:09:13कहते हैं, तुम्हारे समझाने वाले मार्गदर्शक कहते हैं करके दुखाये।
- 1:09:23थोवड़े पे 12:00 बजे के 2.75 मिनटों तुमने कभी ठहाके मार के
- 1:09:32हँसे तुम कभी मुस्कुराए कृष्ण की तरह।
- 1:09:40तुम कभी लाउसे की तरह बुद्ध की तरह मस्त हुए तुम कभी कबीर की तरह
- 1:09:45सुरती में गए, कभी नानक की तरह तुम्हारे मधुर कंठ से भजन का
- 1:09:53संगीत उमड़ा, तुम्हारा हृदय कभी धड़का?
- 1:09:59उस वीणा के संगीत के संग तुमने कभी जश्न मनाया?
- 1:10:06फिर क्या तुम खाक जिए जिंदगी? भर।
- 1:10:10तुम्हारा जीना मरना बराबर तुमने सिर्फ दिनों को धक्के दिए दिनों
- 1:10:18को धक्के दिए। और फिर तुम सच्चे भी नहीं हो, तुम
- 1:10:23झूठे हो, तुम्हें कोई पूछता है तुम कहते हो क्या बात है, मौज में
- 1:10:26है, ज़रा भी मौज में नहीं, झूठ बोलते हो।
- 1:10:34पतंजलि का पहला शब्द ही तुमने नहीं।
- 1:10:37अपनाया सत्य। सत्य अहिंसा, हस्ते ब्रह्मचर्य
- 1:10:41ग्रह तुम झूठ बोलते हो। लोगों के आगे नकली नकली चेहरे
- 1:10:49क्यों किया भैया? मेकअप क्यों किया?
- 1:10:51तुमने क्यों गालों पे लाली लगाई? भटकाने के लिए ये ब्राह्मण्य का
- 1:11:01एक ढांग है। गालें तो लाल नहीं हैं लेकिन लाली
- 1:11:07तो दिखानी है। मतलब भटकाने के लिए दूसरों को और
- 1:11:11भटकाना तो एक पाप है। गुरु भटका रहे हैं राधे राधे करते
- 1:11:16रहो गुरु भटका रहे हैं कि पांच नाम लेते रहो और तुम स्त्रियां
- 1:11:22भटका रही हैं। फेस पाउडर लगाकर 2020 तहें होती
- 1:11:26हैं। फेस पाउडर 80 बरस की बूढ़ी हो
- 1:11:30जाती है, 2020 से लेयर लगाकर दिखाती है कि मैं अपने जवान ये
- 1:11:37क्या है, दूसरों को ठगने का प्रयास मात्र है और क्या है संसार
- 1:11:45ही तो किसी को ठगे ठगे सब वेत्वज्ञानी।
- 1:11:48है। लेकिन उन ज्ञानियों को क्या कहोगे
- 1:11:53जो ठगते हैं? बस वो अज्ञानी है ज्ञान का चोला
- 1:11:59ज्ञान का मुखौटा ज्ञान का लबादा पहन रखा है।
- 1:12:09परमात्मा है। काश तुम्हें ये किसी स्रोत से पता
- 1:12:15चल जाए और तुम्हारी नास्तिकता सदा के लिए तुम्हारा मार्ग का स्वाद
- 1:12:21खत्म हो जाएगा। यही तो एक भ्रांति है।
- 1:12:25तुम और भ्रांतियों को तोड़ते हो। मुख्य भ्रांति को कभी तोड़ ही ले।
- 1:12:29पद मुख्य भ्रांति है कि परमात्मा है और तुम परमात्मा है।
- 1:12:37इस शक्ति का निराकरण करते हो शब्दों के द्वारा ये विकास।
- 1:12:43दिव्य कीर्ति ये परमात्मा के बारे में बातें बताते हैं कुदरती मेरे
- 1:12:48पास कुछ थोड़े से क्रिप्स भेज दिया करते हैं, मेरे मित्रगण मेरे
- 1:12:54शिष्यगण यह परमात्मा को दिमाग से ही समझा रहा है, पर मैं हस्ता
- 1:13:02हूँ। जो दिमाग से समझाया नहीं जा सकता,
- 1:13:08उसको दिमाग से समझाने वाला व्यक्ति मूर्ख ही तो हुआ करता है
- 1:13:13और उसे क्या संज्ञा दें। क्या लंकार दें उसे?
- 1:13:19वह मूर्ख है, बस इतना ही कहूंगा। और मूर्ख नहीं मूर्खानंद है और
- 1:13:28आचार्य तो मूर्खानंद का भी बाप। है।
- 1:13:31क्योंकि यह तो उपनिषद का अष्टावक्र गीता का गीता का कहें
- 1:13:38के क्या बात है। आचार्य का संघ हो, गीता के रंग
- 1:13:42हो, आओ रंग रजैया मनाएं क्या खा रंग रगिया गौगढ़ तुम्हारी आँखें
- 1:13:52थोड़ा कम खा लिया। ये भी एक प्रग्रह है।
- 1:13:58ज्यादा भोजन खा लेना, प्रग्रह जोड़।
- 1:14:02दो मांसपेशियां काम आएंगी। ये गोकड़ का आगे होना भी का एक
- 1:14:14अंग है। और जैन मुनियों के गोकड़ें देखो।
- 1:14:19भरी पड़ी इतना खा लेते हैं एक बार में क्योंकि एक बार ही खाना है तो
- 1:14:2624 घंटे की बजाय 48 घंटे का खा लेते हैं और गोगड़े।
- 1:14:30आगे आ जाती हैं। कैंप भी करना है दुख में सिमरन सब
- 1:14:36कर। दुख पर मन बैर है दोनों तो कबीर
- 1:14:48एक अल्फाज़ में मुखा देते हैं काम यद्यपि दोहा तो पूरा कर।
- 1:14:53लो। सुख में करे न कोई सुख में तो
- 1:14:57स्मरण होते है सुख के साथ तो तुम छिपट लिपट जाते हो लिपट झपट ये
- 1:15:07सुप के लम्हे कहते हो इसे यद्यपि ऊर्जा को खोने के प्रयास ढंग हैं।
- 1:15:16लेकिन तुम्हें आज तक यह कल नहीं आज ब्रह्मचर्य से शुरू करना है और
- 1:15:26ब्रह्मचर्य जहाँ निवास करता है ब्रह्म वहाँ पहुंचना है।
- 1:15:32और तुमसे एक सावधान हो गया और तुम वहाँ जाने की इच्छा पाले।
- 1:15:42हो? कि मैं उस सतल पे पहुँच जाऊं जहाँ
- 1:15:45कोई दुख न हो जहाँ कोई गांटा न चुहे।
- 1:15:49जहाँ कोई दर्द न हो जहाँ कोई आग न हो जहाँ कोई शस्त्र काटे ना जहाँ
- 1:15:55कोई आग न जलाये जहाँ कोई पानी न भगोए जहाँ कोई हवा न उड़ाए नहीं
- 1:16:02पहुंचोगे क्या खाक पहुंचोगे? दुःख में सुमरण शप करें कि बार
- 1:16:16बार तो बोल रहा हूँ कि तुमने पीएचडी करनी है।
- 1:16:21दुःख और मन इनका दंड है। एस 36 काम जहाँ मन है वहाँ दुख है
- 1:16:41जहाँ दुख है, वहाँ मन ठहरता नहीं। दुखी हो के मन कभी नहीं ठहरेगा।
- 1:16:49फिर वो दुख का समायोजन करेगा, समाधान करेगा और दो ही तरीके हैं
- 1:16:55समाधान के या तो दुख को दूर करने के उपाय खोज लो जो तुम सारी
- 1:17:00दुनिया आज कर रही हो पूंजी कमा लो।
- 1:17:06पदवी कमा लो, मान सम्मान ले लो, श्रेय ले लो जो तुमने किया नहीं
- 1:17:10झंडी तो दिखाई देंगे ना इतना कुछ तो कर ही लेंगे।
- 1:17:22श्रेय ले लो। मान सम्मान कर।
- 1:17:27इकट्ठाकट पर ग्रह कर तो तुम इसी आयोजन में जुट जाते हो।
- 1:17:39कबीर ये शब्द कहते कहते भी तुम्हारी परीक्षा ले लेते हैं।
- 1:17:43दुःख में सुमरण शभ करें अब देखो तुम दुख से बचने के उपाय खोजते हो
- 1:17:49या दुख को स्वीकार कर लेते हो बिल्कुल सी दशा, उपाय और तुम यहीं
- 1:17:54बह के जाते हो एक अक्षर पे काश तुमने दुख को स्वीकार किया होता
- 1:18:01पूर्ण ह्रदय के साथ। रोखी सूखी मिल गई, रोखी सूखी खाली
- 1:18:12ठंडा पानी पी रोखी सूखी खाई के ठंडा पानी पी देख पराई झोपड़ी मत
- 1:18:20ललचा बची। पड़ोसी चमचमाती बड़ी कार गया है।
- 1:18:26मैं उससे बड़ी लेके आऊ क्यों लेके आओ भाई तुम रांतो की नींदें क्यों
- 1:18:29खराब करते हो? वह पागल हुआ तो तुम भी होगे उसको
- 1:18:35तो पागल खाने में भर्ती कराना पड़ेगा तुम भी भर्ती होना चाहते
- 1:18:39हो। तुम पागलपन क्यों करते हो?
- 1:18:44तुम तो ठीक ठाक रहो लेकिन नहीं, मैंने भी पागल होना है, ऐसे सारी
- 1:18:54दुनिया पागल हो जाती है तो कबीर कहते है यार दो तरीके।
- 1:19:02दुख में सुमरण सब करें या तो सुमरण करो सुमरण करण से कुछ नहीं
- 1:19:08हुआ। तुम कहोगे राम राम अल्लाह अल्लाह
- 1:19:13वो वो अकबर सतना से। बैगुरू जी का खालसा बैगुरू जीके।
- 1:19:23खत्म। राम राम, राधे राधे, जय श्री
- 1:19:31हनुमान या विष्णु भगवान, लेकिन कभी तुम्हारा दर्द खत्म हुआ?
- 1:19:39कभी अभाव खत्म हुआ। कभी नाम जब से तुम्हें शांति मिली
- 1:19:48ज्यादा उलझ गए तो शक्तिहीन आ गए। एनर्जी लेस लेस में आ गए।
- 1:19:56ये तुम्हारी नाम की फल है फल ये इस बात को नहीं कहते स्मरण दुख
- 1:20:09में स्मरण सब करे स्मरण का तुमने अर्थ बदल दिया।
- 1:20:16और समझो वो क्या कहना चाहते। है।
- 1:20:19दुःख में तुम असमर्थ हो जाते हो और भीतर से प्राणों से गहरे
- 1:20:28प्राणों से ब्रह्मात्मा को पुकारना पुकार में और जब्त में
- 1:20:34बड़ा फर्क। जब सब प्रकार से तुम घर जाते हो
- 1:20:47दुखों से कहीं से कोई मार्ग नहीं मिलता, रात अँधेरी है, मिग छाये
- 1:20:54हैं, काले गरज बरस रहे हैं। गड़गड़ा रही हैं, बिजली दमक लश्क
- 1:21:02रही है और तुम अकेले हो माहौल डरावना है, भव्य है, दुखों की
- 1:21:15संकट की घड़ी में तुम अकेले। तुम्हारा साथ कोई नहीं तो एक
- 1:21:24पुकार उठती है भीतर से तुम नहीं उठाते तुम तो ठीक ठाक हो, कुछ
- 1:21:31नहीं हो रहा तुम, तुम तो वक्त चुन लेते हो ब्रह्ममूत्र में।
- 1:21:352:00 बजे उठूंगा 3:00 बजे उठूंगा 4:00 बजे तक जाप करूँगा।
- 1:21:38तुम्हारा कुछ नहीं दुख रहा है मन भटकता है।
- 1:21:45इसके बाद ही स्नान करना है। इसके बाद दुकान खोलनी है।
- 1:21:48इसके बाद ये करना, वो करना, वहाँ से उधारी लेके आनी वहाँ से उधारी
- 1:21:53देनी। माला तो कर मैं फिर है जी फिर है
- 1:22:02मुख माँ तुम नाम कोई भी राम कह दो रहीम कह दो कोई फर्क नहीं राधा कह
- 1:22:10दो, कृष्ण कह दो कोई फर्क? नहीं।
- 1:22:15माला तोकर में फिर जी वो फिर है मुकमा मनीराम मैं चाहुँ दी, शुक्र
- 1:22:23है दुकान खोल ली है, व्यापार करना है, ग्राहक तोड़ना है।
- 1:22:28उसने कहा था मैं 9:00 बजे आऊंगा। और 9:00 बजे तक दुकान पे पहुंचना
- 1:22:34है मनीराम तो कहीं और फिर आए अब देखो मैं बोल रहा हूँ तुम कहाँ
- 1:22:38कहाँ की सैर करे इधर देखो बस ये मनीराम ऐसे करता है तुम पता नहीं
- 1:22:45कहाँ कहाँ घुमे मनीराम चहुँ जैसे फिर ये तो सुम।
- 1:22:55नमाज़ पढ़ने जा रहे थे और नानक उनके गांव में गए हुए थे।
- 1:23:07बस्सी पर सालार कहने लगा। मैं नमाज़ पढ़ने चला, तुम कहते न
- 1:23:12कोई हिंदू, न कोई मुसलमान, तुम भी नमाज़ पढ़ो तो बाबा ने कहा बिलकुल
- 1:23:19मैं नमाज़ पढूंगा चलो तो मस्जिद में चले जाओगे।
- 1:23:24क्या पति है मस्जिद उसका घर है, ये सारी दुनिया उसी का तो ही घर
- 1:23:29है। चले गए।
- 1:23:32जाके नमाज़ अदा करने का वक्त आ गया, सभी बैठ गए, बज्राशन में बैठ
- 1:23:40गए लेकिन नहाने खड़े रहे। नानी कहते देखो नमाज़ मैं पढूंगा
- 1:23:46लेकिन एक शर्त है कि तुम्हें भी नमाज़ पढ़नी।
- 1:23:48होगी। तो राजा के सिपहसलार बोले बिल्कुल
- 1:23:56मैं पढूंगा मैं पढ़ने ही चला हूँ भाई आज तो जुमे की नमाज़ पांच
- 1:24:02नमाज़ करूँगा, ठीक है फिर मैं नहीं।
- 1:24:06करूँगा। और नमाज़ शुरू लेकिन नानक खड़े
- 1:24:11रहे। नानक ने ना बजरासन लगाया, ना
- 1:24:18कुरान खोली, ना नमाज़ अदा की। मिठत नेवी नान का गुण चंगिया तत
- 1:24:30नान का हर वक्त नमाज़ ही तो करते हैं, कोई पल है ऐसा नान की
- 1:24:35ज़िन्दगी में जब उन्होंने नमाज़ न की हो मिठत नेवी नान का गुण
- 1:24:41चंगिया तत ये नमाज़ ही तो है। तुम कहाँ झुके?
- 1:24:48नानक झुके ही रहे, दिल के आईने में थी तस्वीरें जाश जब ज़रा
- 1:25:00गर्दन झुकाई देख ली ये झुकने का मसला है।
- 1:25:04ये शरीर की सर्कस को झुकाने का मसला नहीं है।
- 1:25:07तुम सर्कस करते हो नवाज़ कहाँ करते हो?
- 1:25:11तुम्हारा मन तो झुकता ही नहीं है, मन तो अकड़ा खड़ा रहता है भीतर।
- 1:25:19तोहखे। उन्होंने कहा कि आपने क्या किया?
- 1:25:28आप झूठ भी बोल लेते हैं, क्यों? बाबा नहाने का आपने कहा था तुम
- 1:25:36नमाज़ पढ़ो तो मैं भी पढूंगा लेकिन आप तो खड़े ही रहे तुम आपने
- 1:25:40तो बज रहा ही नहीं लगाया? तो आप झूठ भी बोल लेते हो।
- 1:25:45कहते नहीं, मैंने एक शर्त और भी लगाई थी।
- 1:25:53अरे बहादुर एक शर्त और भी थी शर्त ठीक है, बशर्ते के तुम भी नमाज़
- 1:26:00पढ़ोगे? हाँ, ये तो थी लेकिन मैंने तो
- 1:26:06नमाज़ पढ़ी तुम्हारे सामने ये सभी साक्षी हैं, हजारों की जनता
- 1:26:11साक्षी है, मैंने नमाज़ अदा की, वो कहते फिर पेशावर में घोड़े कौन
- 1:26:17खरीद रहा? घट घट के अंतःस की जान होरे होरे
- 1:26:26की बीर पहचान तो सगुचा गए मुँह उतर गया होता शमक मेरा घोड़ा मर
- 1:26:36गया। था।
- 1:26:37पेशावर में जाके नया घोड़ा कहाँ से कर दूं, कौन सी नस्ल का कर दूं
- 1:26:42यह सोच रहा था। फिर क्या नमाज़ क्या खत अदा कर
- 1:26:46रहे थे? तुम्हारा मन चारों तरफ घूमता?
- 1:26:51है। इससे चैन नहीं है।
- 1:26:55और जब तक मन रहेगा तब तक चैन नहीं रहेगा।
- 1:27:00मन अमन में तब्दील हो जाए तब चैन आएगा, सुकून आएगा तब आएगी तृप्ति
- 1:27:08मन की ऐब्सेंस में आएगी तृप्ति फुलफिलनेस अब तो एम्प्टिनेस है मन
- 1:27:23और दुख। इनमें घनिष्ठ व्यय जब तक मन
- 1:27:29रहेगा। तुम दुख से आजाद नहीं होगे।
- 1:27:35मन गया, दुख से मुक्ति हुई, अमन की स्थिति आ गई और तुम आनंद में
- 1:27:48खिस करिये। ये मन ही है एक रोग जो तुम्हें
- 1:27:55अपने अपने खुद के तत्व तक में नहीं जाने देता, यही है बाधा और
- 1:28:04कब टूटता है? दुख में सुमरण सब करें, तुम असहाय
- 1:28:10हो जाओ। जब दुखी होते हो पर सत्यनिष्ठ
- 1:28:17व्यक्ति जो परमात्मा की खोज में निकला, वह तो दुख ने भी हो, तो
- 1:28:22पैदा कर लेगा। बुद्ध की तरह बुद्ध ने पैदा कर
- 1:28:24लिया। दुख पैदा करो, अभाव पैदा करो,
- 1:28:28कष्ट पैदा करो, पता नहीं क्या होगा, वनों में जाऊंगा, नुगे
- 1:28:31पहुँच जाऊंगा, सांप काट जाए, काट जाए, बिच्छू काट जाए, काट जाए,
- 1:28:36अभाव से मर जाएं, मर जाएं, भूखे मर जाएं, कोई बात नहीं चलेगा,
- 1:28:41सोने को सीज नहीं मिलेंगे, नहीं मिलेंगे पता है।
- 1:28:45सब दांव पे लगा देते हैं किसके लिए एक के लिए और तुम सुख के लिए
- 1:28:54सब दांव पे लगा देते हो, फिर तुम्हारी और कबीर की पटेगी कैसे?
- 1:29:02तुम कबीर होना चाहते हो? कबीर एक को पाने के लिए सब छोड़
- 1:29:08देते हैं। कबीर दुख को स्वीकार करते हैं।
- 1:29:18कबीर कहते हैं अभाव आ गया, आ गया तेरी देन।
- 1:29:24तेरी इच्छा के बिना ये दुख भी तो नहीं आ सकता था, यह भाव भी तो
- 1:29:29नहीं आ सकता था, तुने चाहा तो आया और कबीर कोई मूर्ख, थोड़े कबीर
- 1:29:37उसे एक्सेप्ट करते हैं। फ्रम दी इन्नर कोट इन्नेस्ट कोट
- 1:29:41ऑफ थेइर हर्ट। अपने मन के आंतरिक कोनों से
- 1:29:48स्वीकृत। कर लेते हैं।
- 1:29:50एक तो फॉर्मूला ये। एक फॉर्मूला जो सारा जहाँ प्रयोग
- 1:29:54कर रहा है दुख को हटाने की व्यवस्था कर दो।
- 1:29:59और दुख को हटाने की व्यवस्था में दुख के कारण पैदा करती है।
- 1:30:03एटम फर्म बना लिया, हाइड्रोजन फर्म बना लिया रोज़ क्षमताएं करा
- 1:30:08रहे हो, तुम इसके पास इतने एटम बम्ब, इसके पास इतने एटम क्या खाक
- 1:30:13शांति के भीतर जाओ। क्या खाक तुम आनंद की एक बूंद की
- 1:30:19होक सारी दुनिया बुद्धों में उलझी फिरती है जो हम गहरी क्रोनोलॉजी
- 1:30:27में चलते हैं गहरे थलों में उतरते हैं मन जब होता है दुविधा में
- 1:30:33संकट काल में आपदा ग्रस्त होता है।
- 1:30:39जब उसे कोई सहारा नहीं होता, निरावलंबा अवस्था में होता है,
- 1:30:43असुरक्षित होता है तो मन को कोई ठोर ठिकाना नजर नहीं आता तो मन
- 1:30:49आवाज लगाता है, पुकारना करता है हे परमात्मा।
- 1:30:59उपकार सच्चे हृदय से आती बहुत ही अरदास तुम उसे अरदास कहते हो, मैं
- 1:31:06उसे पुकार कहता हूँ बस यही फर्क है मैं अरदास को नकारता।
- 1:31:16हूँ। ओके, श्रद्धा है तुम्हारी तुमने
- 1:31:22वक्त चुन लिया, लेकिन परिस्थितियां कभी वक्त थोड़े
- 1:31:26चुनते हैं। अक्सीडेंट वक्त चुनता है
- 1:31:30अक्सीडेंट हुआ तुम अचानक से पैदा भी न था।
- 1:31:35पर अक्सीडेंट हो गया, दुर्घटना हो गई और पुकार उठी, लेकिन तुम तो
- 1:31:40बिना अक्सीडेंट के ही बैठ जाते हो वह गुरु राम राम करते हो राधे
- 1:31:44राधे करते हो तब उगती है पुकार असहाय अवस्था में।
- 1:31:56बेसहारा अवस्था में अवलंबन निरवलंबा अवस्था में जब तुम असहाय
- 1:32:03हो जाते हो, द्रौपदी की तरह जिनको सहारा माना मुकामना है।
- 1:32:11न पति काम आए, न भीष्म काम आया, न गुरु काम आया, न ताक श्री काम
- 1:32:17आया, कोई न काम आया, सबने गर्द ने झुका ली और द्रौपदी चीरहरण की
- 1:32:25अवस्था में निरावलंबा असहाय हुई पुकारना।
- 1:32:29है। तुम कहाँ गए महाराज, करो मत देरी
- 1:32:43अब देर मत करो बहुत देर पहले ही हो चुकी।
- 1:32:48ध्यान रखना मैं पुकार की बात कर रहा हूँ तुम्हारी अरदास की बात
- 1:32:52नहीं कर रहा हूँ अरदास की तुम्हें बकला हूँ वह तो समयबद्ध तुम्हारा
- 1:32:57तरीका है अल्फाज़ का जैसे तुम डेरों में बैठ जाते हो, मेरे पास
- 1:33:01बहुत डेरों वाले आते हो। बाबा हमें सब पता होता है, अगला
- 1:33:04शब्द क्या चलेगा? आगे कौन सा रुकाट बजेगा?
- 1:33:10फिर क्या होगा? फिर नामदान होगा।
- 1:33:12फिर क्या होगा? फिर बाबाजी पर वचन करेंगे और क्या
- 1:33:14बोलेंगे सब पता होता है। पूर्व निर्धारित होती है, लेकिन
- 1:33:18पुकार कभी पूर्व निर्धारित नहीं होती पुकार।
- 1:33:25पूर्व निर्धारित वो तो उठती है पता नहीं कब उठेगी तब उठेगी जब
- 1:33:29तुम दुख में होगे जब तुम निरवलम्ब होगे, असहाय होगे तो तुम उस क्षण
- 1:33:36में पुकारोगे कहाँ गए? महाराज करो मत दे।
- 1:33:43दुःख हरो द्वारका नाथ शरण में तेरी अब मेरी कोई शरण तो है नहीं
- 1:33:48मैं निरवलम्ब हूँ असहाय भला औरत हूँ।
- 1:33:53ये दुष्ट इनसे रक्षा। वह पुकार और पुकार के पीछे बल
- 1:34:06होता है आत्मा का, हरदास के पीछे बल नहीं होता, हरदास के पीछे कोरी
- 1:34:12लफाजी। होती है।
- 1:34:14और कोरी लफाजी से कुछ नहीं मिला करते।
- 1:34:21अरदास में जान होती। है।
- 1:34:24फिर वो बन जाती है पुकार अरदास जब गहरे मरहलों से आती है वो बन जाती
- 1:34:33है पुकार लेकिन अरदास जब समय की सीमाओं में बंध जाती है।
- 1:34:40तो वो होती है अरदास, शून्य फौका फौका रसविहीन कोरे शब्द कोरे शब्द
- 1:34:50काम नहीं आएँगे। पुकार के भीतर वो रस होता है जो
- 1:34:55मैंने कहा जिसे सुनकर जापानी पहुँच गए।
- 1:35:01मुझसे लोग पूछते हैं बाबा वो कैसे पहुंचा?
- 1:35:06जब बोरता है संत उसके साथ लिवड़ते भर के आता है, रस का वो प्यारा।
- 1:35:13क्योंकि वो रस में समुद्र में छलांग लगा के आया।
- 1:35:17और उसका एक एक शब्द रस में लिपट के आया लबट झबट कर आया और
- 1:35:25तुम्हारे कर्ण में पड़ा और हृदय में बस गया वो एक एक बूंद।
- 1:35:29जोड़ता जोड़ता घड़ा भर जायेगा एंड यू विल कॉस्ट एनलाइटन।
- 1:35:39सुनिए दुःख बाप का नाक शब्दों में बड़ी जान है समझने वाला कौन?
- 1:35:45इसलिए मैं कहता हूँ तुम्हारे सब शास्त्र बेकार अगर शास्त्र को
- 1:35:50बांचने वाला कोई नहीं कबीर का दोहा कबीर के शब्द तो पड़े हैं।
- 1:35:56क्यों कहा ओशो ने मेरे जाने के बाद जीवंत को ढूंढ लेना?
- 1:36:01वो पागल थोड़ी है दुनिया को पूरा ठिकाने लगाने वाला व्यक्ति इतना
- 1:36:07बुद्धू तो होगा नहीं, मैं जानता था, मेरे जाने के बाद नीरस तो था।
- 1:36:13ईख रह जाएगा, उसमें रसना होगा। रस कौन डालेगा?
- 1:36:18बाँजेगा कौन मेरी बातों को वहीं जो उस सतल को छू लिए और उसके
- 1:36:25अलावा कोई नहीं वो कह के गए। मेरे जाने के बाद मेरे शब्दों से
- 1:36:35मत चिपट जाना ये बहुत वो ही शास्त्रों की तरह हो जाएंगे फौके
- 1:36:40फौके लेकिन मूड है कि उनका रोज़ एक रजनी शोरूम बना लिया गया।
- 1:36:49विदेशियों ने वहाँ कब्जा कर लिया जो कुछ जानते नहीं।
- 1:36:54इनको कुछ पता ही नहीं और उस बेचारे को उसकी शिक्षाओं को मार
- 1:37:03दिया। इन्होंने टुकड़े काट काट के
- 1:37:07परोसने शुरू कर दिए और जान खा गए। ऐसे टुकड़ों में कभी हल हुआ करते
- 1:37:14है प्यार तो कबीर भूल गए, नानक भूल गए, लेकिन मैं तुम्हें बताऊँ
- 1:37:23भूल गए, लेकिन उन्हें पाचेगा कोई जो पड़ा है नसीरुद्दीन के पास कोई
- 1:37:28व्यक्ति आ गया। पढ़ा लिखा अकेला व्यक्ति था, पत्र
- 1:37:38लिख दो मेरी महबूबा के पास पत्नी थी उसकी महबूबा कहता था।
- 1:37:49नसीरुद्दीन बोले मेरे पांव में दर्द है, ठीक हॉलिडे तो फिर आ
- 1:37:56जाऊंगा, लिख दूंगा क्या? जल्दबाजी है तो पांव में दर्द है,
- 1:38:01लिखनी तो तुमने आज से है। और डाक घर में मैं पहुंचा दूंगा,
- 1:38:08तुम लिख दो हाथ से लिखना है अब ये बात सुनना बड़े प्यार और बड़ी
- 1:38:16मजेदार, बड़ी गहरी सत्यता की बात नसीरुद्दीन कहता नहीं भाई मेरे
- 1:38:23पवन में। चाहता है।
- 1:38:26अरे बाबा वो तो ठीक दर्द है लेकिन तुमने कौन सा तुमने तो लिखनी है
- 1:38:31पोस्ट तो मैं कराऊंगा ना नसीरुद्दीन कहते है मेरी भाषा को
- 1:38:36मैं ही पढ़ के आऊं मेरी भाषा ही ऐसी।
- 1:38:43मैं ही पढ़ के आऊं? मेरी भाषा किसी और से नहीं पढ़ी
- 1:38:46जाएगी। बस इस एक शब्द को अगर तुम समझ गए
- 1:38:49तो तुम सारे शास्त्रों को समझाओगे शास्त्र को लिखने वाला ही शास्त्र
- 1:38:56को बोलने वाला ही शास्त्र का अर्थ बता सकता है।
- 1:39:01तुम कृष्ण होने की चेष्टा न करो। कृष्ण के तल पर जाने की चेष्टा
- 1:39:07करो, उपनिश्चित होने की चेष्टा न करो, बचने की चेष्टा न करो, याग्य
- 1:39:17बलक होने की मत जुटाओ। अष्टावक्र महा गीता को
- 1:39:28व्याख्यायित करने की चिष्टा न करो अष्टावक्र जीस तल पर पहुँचकर यह
- 1:39:34बोले, उस तल पर जाने की हिम्मत जुटाओ, साहस तुम्हें है नहीं।
- 1:39:41अगर मैंने ये बोल दिया तो मुझको मार देंगे, सच्चाई छुप नहीं सकती।
- 1:39:48बनावट के असुरों से ये खुशबू आ नहीं सकती।
- 1:39:54कभी कागज़ के फूलों से ये कागज़ के फूज बनावटी असूल।
- 1:40:02बस जितना समझा सकते हैं इन्हें पता है हम भटका रहे हैं, लोगों को
- 1:40:09एकांत में बैठते होंगे, शायद खुद को किचोटते भी होंगे।
- 1:40:12अगर आत्मा थोड़ी भी है तो ईमानदार आत्मा हमेशा किचोटती है पाप करने
- 1:40:20के बाद। कि ये तुमने क्या किया?
- 1:40:24इतने लाखों करोड़ों व्यक्तियों को भटका दिया, तुम जानते हो कभी
- 1:40:30तुम्हारे भीतर का वो आदमी उठा जिसने तुम्हें धमकाया हो, जिसने
- 1:40:38तुमने कहा हो, लताड़ दी हो? तुम्हें शर्म नहीं आती?
- 1:40:44दूसरों को ही तुम्हें लताड़ना पड़ता है तुम्हारी आत्मा ने कभी
- 1:40:49तुम्हें लताड़ा लताड़ा तो होगा क्योंकि आत्मा सभी के भीतर
- 1:40:54क्षेत्र स्वरूप में वैद्यमान तुम आत्मा को नकार।
- 1:40:59सकते हो? लेकिन तुम्हारे नकारने से आत्मा
- 1:41:03शून्य नहीं हो जाएगा। दुख में सुमरण सब करें।
- 1:41:08दुख का 36 का आंकड़ा है। दुख से तुम बचना चाहते हो सुख को
- 1:41:21तुम गले लगाना चाहते हो, आओ ईद मना लें सुख को तुम पास बनाना
- 1:41:27चाहते हो, सुख को तुम धकेलना चाहते हो, रेपेल करते हो, सुख को
- 1:41:34अट्रैक्ट करते। और कबीर कहते हैं कि दुख में
- 1:41:40स्मरण तुम करते हो, दुख में तुम पुकारना हो।
- 1:41:45अब दो तरीके हैं दुख से मुक्त होने के दुख और मन मैंने सुर में
- 1:41:52तुम्हें समझाया। मन दुख दुश्मन है, मन और सुख ये
- 1:42:00मित्र है, तो मन चाहता है सुख मन दुख से भागता है और जहाँ मन है
- 1:42:11वहाँ दुख है वहाँ कष्ट है तकदीफ है।
- 1:42:19जहाँ सुमतिते हैं संपत्ति नाना जहाँ कुमतिते हैं वे फचर निदान
- 1:42:27जहाँ मन। है।
- 1:42:28वहाँ दुख जहाँ मन नहीं है। वहाँ सुख और मैं कहूँ।
- 1:42:35परम सुख आनंद तो। तुम मन से अमन की अवस्था में आओगे
- 1:42:42कैसे दो तरीके हैं? या तो तुम दुख को दूर करने की
- 1:42:47कोशिश करोगे। जो सारी दुनिया कर रही है उससे
- 1:42:50कुछ नहीं होगा। असुरक्षा से बचने की कोशिश करोगे?
- 1:42:55अभावों से बचने की कोशिश करोगे। अभावों को धकेलोगे मास्टर बनोगे,
- 1:43:02रिसर्चर बनोगे वैज्ञानिक बनोगे सब बनोगे ये बातों।
- 1:43:08का मैं जवाब बाद में। ये सब बनोगे तुम, लेकिन अगर तुमने
- 1:43:20सुखी होने की चेष्टा की तो सुखी होने से तुम्हारा मन बच जाएगा।
- 1:43:28क्यों मांगती है कुंती दुख? भगवान कृष्ण जा रहे हैं द्वारका
- 1:43:33माँ मैं जा रहा हूँ मांग ले जो मांगना है बेटा इंकार तो नहीं
- 1:43:39करोगे नहीं मतलब तो मेरी झोली दुखों से भर दो वृहद दुखों से भर
- 1:43:44दो और कृष्ण मुस्कुराए कृष्ण जानते हैं?
- 1:43:52उसने वो कहा है जो मांगरिया जो सिर पे सजा करता है जो काटू का
- 1:43:58नहीं, जो वास्तव में हीरे जड़ित है चकुंती झोली फैला लेती है।
- 1:44:10पुत्र मेरी झोली में दुख ही दुख टालते और जीतने ज्यादा हो सके,
- 1:44:15उतने टालते दुख तोड़ देता है मन को और तुम अमन में आ जाते हो, मन
- 1:44:24टूटा। अमन हुआ और अमन जहाँ है वह शांति
- 1:44:28है, तुमने देखा जहाँ तुम आखिर में पहुंचोगे वहाँ मन नहीं होगा वह
- 1:44:34अमन होगा और वहाँ शांति होगी और जहाँ शांति है वो आनंद है, आनंद
- 1:44:41की छाया की तरह शांति आती है। जब तुम अंत में पहुँचोगे सत्य में
- 1:44:46पहुँचोगे वहाँ पहुँचोगे जो खंडित नहीं की जा सकती तुम्हारी शांति
- 1:44:52तो बनावटी है, यह खंडित किसी वक्त भी हम कर सकते हैं, लेकिन
- 1:44:57तुम्हारे अस्तित्व की तुम्हारे होने की शांति को नहीं काटा जा।
- 1:45:01सकता। नहीं तोड़ा जा सकता।
- 1:45:04नहीं, खंडित किया जा सकता। तुम अखंड हो, तुम अखंड शांति के
- 1:45:11समूह को पुंज हो। तुम थक तो नहीं गए, मैं तो नहीं
- 1:45:20थक, मैं तो और भी फंस सकता। प्यार में कभी आदमी से क्या करता
- 1:45:26है क्या मन टूटे अमन आज मन का बेह सुख से मन चिपटता है?
- 1:45:46मन का वह है दुख से इसलिए दुख मांग लिया कुंती ने, क्योंकि वह
- 1:45:52जानती है दुख से मन टूटेगा और जहाँ मन टूटा वहाँ अब मन न आएगा,
- 1:45:58जहाँ हम न आया वहाँ शांति आएगी जहाँ शांति आनंद भी आएगा जहाँ
- 1:46:03आनंद आया वही तो रस है। दुःख में सुमरण सब करा, सुख में
- 1:46:11करा न कोई तुम सुख मांगते हो क्योंकि तुम स्मरण करना नहीं
- 1:46:15चाहते, सुख में कोई स्मरण करते देखा, सुख में तुम सिर्फ हाथ उठा
- 1:46:22लेते हो। हे परमात्मा, तेरा शुक्रगुजार।
- 1:46:27क्या खाद? सुप्रजा करो किस किस बात के लिए
- 1:46:30करो रात भर दिल धड़कता है क्या तुमने कभी शुक्र किया सुबह उठ के
- 1:46:36रात भर सांस चलती रही? क्या तुमने सुबह उठ के कभी शुक्र
- 1:46:40किया? आज तुम्हारा काम हो गया, तुम किसी
- 1:46:45बड़ी पदवी पे चले गए, तुम पास हो गए तुम फर्स्ट आ गए, तुम उच्च
- 1:46:50पदवी उच्च पदा सीन हो गए तो तुम शुक्रगुजार कर रहे हो है।
- 1:46:55नकली है शुक्रगुजार शुक्रगुजार हर स्वास्थ श्वास में होता है।
- 1:47:02वो तो चल ही रहा है तो मैं करने के थ्रू अपनों नाम जब पायो बस ये
- 1:47:10थोड़ा सा लंबा प्रसंग हो जाएगा, लेकिन तुम्हें बता दूंगा अपना नाम
- 1:47:15खुद ही जपा रहा है, तुम देखो श्वास लो सो।
- 1:47:24सो हम वो ही मैं हूँ सो वह हम अहम मैं हूँ अपनों ना में जपयो हर
- 1:47:34वक्त वह जपता। ही रहता है तुम्हारा रुआ रोवां
- 1:47:38भीतर से उसका नाम जप रहा है। वह नाम धुन है जो ओंकार का नाद
- 1:47:45बजता है। तुम्हारे भीतर हर वक्त चौबीसों
- 1:47:48घंटे देखो, ये काम तक आता है, कभी रुकता है नहीं, वह अपना नाम जप
- 1:47:55रहा है, चौबीसों घंटे तुम्हे जपने की क्या आवश्यकता है?
- 1:47:59तुम तो पागल हुए जाते हो। तुम्हारा नाम तो रिश्वत की तरह
- 1:48:03है, तुम रिश्वत दुख में सुमरण सब करे, सुख में करे वही व्यक्ति भूल
- 1:48:11जाता है, दुख में पुकार करता है, लेकिन जब सुख हाथ है तो भूल जाता
- 1:48:15है। जो सुख में सुमरण करे दुख गा ही
- 1:48:22का पोज। दुख में सुमरण होते ही सुख में
- 1:48:29सुमरण होता ही सुख में अगर सुमरण हो जाए।
- 1:48:39तो? कबीर कहते हैं, काश तुम सुख में
- 1:48:42भी स्मरण कर सको, क्योंकि सुख में पुकार नहीं उठती, दुख में
- 1:48:47पुकारना, निर्मल, निर्बल, असहाय, निरवलम् मन ही पुकार कर सकता।
- 1:48:58है। लेकिन सुख में अगर तुम सुमर्ण
- 1:49:02करना सीख जाओ दुःख काहे तो फिर कभी तुम मन नहीं बन।
- 1:49:11मन के साथ एकाग्र नहीं। हो?
- 1:49:14अगर तुम सुख में सुमरण करना सीख गए तो एक कलाकार हो गए।
- 1:49:20कि तुम फिर सुख के साथ आबदनी होगे, फिर दुख के साथ भी आबदनी
- 1:49:27होगे फिर क्या हो जाओगे? सुख और दुख दोनों से पार हो जाओगे
- 1:49:32जो तुम वास्तव में हो भी जो तुम्हारा प्रारूप है सुख और दुख
- 1:49:37से पार। वह न सुख होता है, ना सुख होता
- 1:49:41है। तुम दोनों से पार हो तुम
- 1:49:44निर्लिप्त हो। ताहे रे।
- 1:49:57बन को जन जाए। मन को जनुषा सरबया पी सदा हले प
- 1:50:31सरब। व्यापी सदा अले प तोह संग समर
- 1:50:49तोह। संग समाज काहेरे बन को जनजा
- 1:51:08काहेरे। सर्ब व्यापी वो सब जगह है झर्रे
- 1:51:16झर्रे में है तस्वीर तेरी जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है सर्ब
- 1:51:25व्यापी सदा। अले प अले प निर्लिप्त है न सुख,
- 1:51:32न दुख दोनों से पार सरबैया पी जर्रे जर्रे में है ज़रा ज़रा वो
- 1:51:40ही है ईसा वासी में दम सरबम यत किंचे जगत।
- 1:51:47झर्रे झर्रे में परमात्मा है ऐसा नहीं, इसको ऐसा कहो धरा धरा ही
- 1:51:51परमात्मा है कण कण ही परमात्मा है कण कण में परमात्मा है, ये मत पाओ
- 1:51:59सर भयापि सदा अले पा। सरबवयापी सादा अलेफा अलेफा
- 1:52:13निर्लिप्त है ना सुख से निपटता है ना दुख से निपटता है बस यही है
- 1:52:18कबीर का मिक्सर। कबीर कहते हैं, दुख में सुमरण सब
- 1:52:24करें, सुख में करें न कोई तुम्हारा व्यक्तिगत जात क्या है
- 1:52:32तुम सुख और दुख दोनों से परे हो, दुख का सहारा ले के तुम।
- 1:52:41सुख और दुख से पार हो सकते हो, सुख तुम्हें पार नहीं करेगा।
- 1:52:46ध्यान रखना दुख सूत्र है तुम्हें तो थोड़ी सी चीज़ न मिले, थोड़ी
- 1:52:53देर के लिए तुम भटक जाते हो, क्रोध में आ जाते हो, तुम्हें
- 1:52:56रोटी मिल गई, अचार न मिले। तुम थाली का अचार का क्यों नहीं?
- 1:53:04ये चटनी क्यों नहीं? ये अचार भी मुझे आम का और नींबू
- 1:53:09का और मिर्ची का सारा अदरक का सब इकट्ठा चाहिए।
- 1:53:15हम तो दाल में नमक कम हो तो फेंक देते हो।
- 1:53:21तुम डेयरलिप्त कैसे हो? गए।
- 1:53:24सरब वे आपकी सदा अले पा वो कभी लुप्त नहीं होता दिखेंगे बड़े
- 1:53:32शानदार ढंग हैं। मार्ग हैं।
- 1:53:39परमात्मा तक पहुंचने के सर्वव्यापी सब जगह हो, भेद मत कर
- 1:53:48जे नीच है, जे छूद्र है, जय स्त्री है या पुरुष है?
- 1:53:53यह उच्च जाति या नीचे जाति जो तुम्हारे पंडितों के राजनीतिज्ञों
- 1:53:58के बनाए हुए फॉर्मूले हैं, इसलिए दुखी रहते हैं।
- 1:54:03इसीलिए जरूरत पड़ती है जहाँ त्रिपुंड लगाने की क्योंकि
- 1:54:07झुर्रियां हैं और झुर्रियां मिट जाएंगे त्रिपुंड की आड़ में।
- 1:54:12चंदन के नीचे झुर्रियां। सरबबयाती सदा अले पा तोहे संग सब।
- 1:54:31तोहे संग समाय काहे रे तोहे? संग समाय काहे रे पन ढूँढन जाए वन
- 1:54:49में नहीं मिले। अगर यहाँ नहीं मिला ना तो मन में
- 1:54:53नहीं मिलेगा क्योंकि तुम्हारे संग जाएगा वो अगर यहाँ नहीं मिला तो
- 1:55:02वो तो तुम्हारे भी तरह। जहाँ जाएगा हमें।
- 1:55:11आइएगा। अजी रूठकर, अब कहाँ जाइएगा जहाँ
- 1:55:26जाइएगा। हमें पाइएगा, अजी रूठकर अब कहाँ
- 1:55:41जाइएगा, सर्बिया। की सदा?
- 1:55:49आले प भाई नहीं लिप्त है ना सुख में है, ना दुख में है, लेकिन दुख
- 1:55:56से एक रास्ता बनता है दुख एक फूसे की तरह है।
- 1:56:01जो तुम्हें जोड़ देता है ट्रांसफार्मर के साथ।
- 1:56:10दुख एक अफज की तरह काम। करता है।
- 1:56:14सुख से नहीं पहुँचोगे तो कबीर कहते हैं सुख में जो सिमरण करें,
- 1:56:20दुख का ये कहो सुख में सिमरण। बड़ी काम की बात कहते हैं, लेकिन
- 1:56:27दोहे ही दोहे में कह जाते हैं बात जो मूर्ख है वो नहीं समझेगा,
- 1:56:31समझदार है वो समझ आएगा लेकिन समझदार कौन?
- 1:56:35बाचेगा कौन जी मत गुरु बांचे सभी लोगों के कहने का ढंग यही था,
- 1:56:42छोड़ चले हम सत्य को। मैं भी चला जाऊंगा, फिर साहित्य
- 1:56:49को बांटने वाला, बांचने वाला कोई अन्य व्यक्ति चाहिएगा।
- 1:56:57फिर तुम क्या करोगे? वियोगी राम राम जबले अभी अभी आ
- 1:57:08जाओ, जीते जी आ जाओ, प्राण जबते हैं तब तक आ जाओ, फिर भी तो राम
- 1:57:14राम होती है, फिर क्या जाने के बाद आओ, फिर वियोगी राम राम जबले
- 1:57:22अभी। फिर भी तो राम राम होती है फिर भी
- 1:57:26तो राम राम हो जाती है, तू अभी क्यों नहीं जप लेता?
- 1:57:36तोहे संग सम तेरे संग संग है वो। तू यहाँ बैठे यहाँ मिल जाए, काहे
- 1:57:50रे वाण ढूंढने जाए? किसको ढूंढता है कस्तूरी कुंडल
- 1:57:55बसा मेरे को ढूंढा पर ऐसे घाट में पीव हैं मुँह रखा जाने ना
- 1:58:02तुम्हारे सात रेसिपी का। इसीलिए मैं कहता हूँ लगा दो आग
- 1:58:08नहीं, गंदे नाले में बहा न हो तो गंगा जी में बहा दो लेकिन बहा दो
- 1:58:15क्योंकि इन्हें बांचने वाला नहीं है और जो बांचने वाला है, जो
- 1:58:20बांचने की क्षमता रखता है उसे शस्त्र की आवश्यकता नहीं है।
- 1:58:26तो तुम्हारे शस्त्र उसके लिए बेकार हैं और जो बाच नहीं सकता
- 1:58:32उसके लिए भी तुम्हारे शस्त्र बेकार हैं शस्त्र तो बेकार ही।
- 1:58:36हैं। जो बाचना नहीं जानता उसके लिए भी
- 1:58:40बेकार हैं क्योंकि वो बाचना नहीं जानता।
- 1:58:44और जो बांच न जानता है, वो खुद ही शास्त्र है, उसको शास्त्रों की
- 1:58:49आवश्यकता क्या है? इसलिए बेकार हैं तुम्हारे शास्त्र
- 1:58:53बेकार हैं फूंक दो। आग लगा दो बहादुर।
- 1:58:57गंगा में इनको जीवंत गुरु के पास चले जाओ।
- 1:59:01उसके पास शास्त्र उसके पास भंडार। है, वह खुद समुद्र है।
- 1:59:07ओहे संघ समाज काहे? वन टू डन जा रहे काहे रे वन को जन
- 1:59:33जा? धन्यवाद।