Latest / Baba ji Vijay Vats / 12 Feb 25 - शक्तिपात के लिए कौन-कौन योग्य है? स्थितप्रज्ञ का अर्थ क्या है? विराट में कैसे समायें?
Transcript
- 0:22सुशीला बाबा जी आपने मुझे दीक्षा के लिए वक्त दिया, 18 तारीख।
- 0:44मैं कुंभ स्नान करके आपसे दीक्षा लेने आउंगी।
- 0:54ऐन वक्त पे 4:00 बजे के बाद पहुँच जाउंगी।
- 1:00अपनी कृपा बनाए रखें। सुशीला मत आना, बेटी मत आना।
- 1:43इस काम के लिए मैंने बोलना शुरू किया।
- 1:52ये दो गुलाब बनते उससे तो मुक्त हुए ना?
- 2:08जब कुंभ स्नान करके तुमने सारे पाप धो दिए तो तुम मुक्त हो गयी।
- 2:18मेरे पास क्या लेने आओगे? कुंभ स्नान प्रयागराज में
- 2:27त्रिवेणी संगम पर स्नान करके तुम मुक्त हो गयी समझ लो।
- 2:34तो यहाँ मेरे पास मुक्ति के लिए अंगूठा लगवाने की आवश्यकता क्या
- 2:41है? कोई कारण रह जाता है।
- 2:55बात क्या है? असल में, असल में बात यह है, मैं
- 3:00बहुत पहले बता चुका हूँ। दुविधा से मुक्त हो जाओ अगर
- 3:13दुविधा में रहोगे। दुविधा में दोनों गए।
- 3:20माया मिली न राम, अगर इतना ही विश्वास था, कौन हटे तो फिर मेरे
- 3:37पास क्यों आ रही हो दीक्षा लेने के लिए?
- 3:42बाबा गुरु बनाने के लिए हार है, गुरु की आवश्यकता मुक्ति के बाद
- 3:48कहाँ रह जाती है हर हर गंगे किया त्रिवेणी संगम में।
- 3:58स्नान किया तो मुक्त हो गया। मोक्ष मिल गया।
- 4:04उसके बाद न गुरु की आवश्यकता, न मोक्ष की आवश्यकता, न मोक्ष तक
- 4:11जाने की किसी विधि की आवश्यकता। इसलिए पुतरी मत आना इस दोगलापंथी
- 4:25को नष्ट करने के लिए मैंने ये चैनल शुरू किया था ध्यान से सुनना
- 4:35असल में तुमने देखा कुछ? तुम लोगों के बताने कहने पर आ
- 4:46जाते हो, लिख देते हो, रजिस्टर करवा देते हो मुक्त हो जाएंगे और
- 4:52सवाल बढ़ा है। सवाल बड़ा है कि एक बाबा के
- 4:57अंगूठा लगाने से तुम मुक्त कैसे हो जाओगे?
- 5:01सवाल जायज बात आस्था की है, बात श्रद्धा की है और अब तुम मेरी बात
- 5:18को ध्यान से समझ लेना। जब तलक आस्था एक ईश्वर पे ना हो
- 5:28जाए तुम्हारी आस्थाएँ बाइफर केटर हैं बाइफर केटर नहीं मल्टी फर्क।
- 5:40वहाँ भी आस्था वहाँ भी आस्था जंड के आगे भी झुक गए, खेत्रपाल के
- 5:46आगे भी झुक गए, लाला वाले के आगे भी झुक गए कंगा स्नान भी करा है,
- 5:53मक्का मदीना भी करा है सब करा है। इसी को कहते हैं मल्टीडाइमेंशनल
- 6:03होना मेरा प्रयास कोई काम न आएगा क्योंकि मैं देख रहा हूँ।
- 6:142500 वीडियो बोलने के बाद भी तुम जस के तस हो 70% लोग।
- 6:26मुझे खुशी है इस बात की 70% लोग कहते हैं बाबा आपने जीना सीखा
- 6:33दिया? क्योंकि ये मान्यताओं के जो बोझ
- 6:42थे आपने हटा दिया और यही दुख का कारण था।
- 6:51समझ आया कि इनका अर्थ कोई नहीं। मैं तो यह भी कहता हूँ कि देखिए
- 7:01महंगाई का ज़माना मांगता मैं किसी से नहीं।
- 7:16किसी से मांगा हो तो शिकायत कर देना, मैं कभी मांग लूँगा, तुम
- 7:27कुछ दे जाओ। वहाँ मेरे लिए धर्म संकट पैदा
- 7:33होता है। नहीं रखता तो तुम्हारी भावनाओं को
- 7:38टेस्ट पहुँचती है। बाबा ने स्वीकार नहीं किया तो रख
- 7:46लेता हूँ क्योंकि तुमने खुशी से दी डाका तुम्हारा चोरी तो की
- 7:54नहीं? तुम्हारी जेब तो काटी नहीं तुमने
- 7:59खुशी से दिया वहाँ रखना ही बनता है ठुकराना नहीं बनता क्योंकि
- 8:10प्रेम के लम्हों में अर्पित किए गए यह फूल।
- 8:18मैं तुम्हारा हृदय है, ठुकरा दूंगा तो लाश हृदय पे लगेंगी,
- 8:27हृदय टूट जाएगा इसलिए ठुकराने की हिम्मत जुटा नहीं पाता, प्रेम से
- 8:34स्वीकार कर लेता हूँ। बहुत से लोग कहते हैं बाबा आप तो
- 8:48मजेदार गद्दे के ऊपर बैठो। अगर आप बैठ जाओ हमने तो पुराने
- 8:54में जाना है वहाँ जाएंगे यहाँ आप बैठ जाना आप ही तो बैठोगे।
- 9:05क्या सिद्धू के लिए बाजी? इसको तुम ज़िन्दगी कहते हो,
- 9:11ज़िन्दगी का रस बड़ा प्यारा है वो छनकते हुए घुंघरू की आवाज।
- 9:24और सरब और मस्ती में उठते हुए संगीत तुम्हें लुभा जाते हैं और
- 9:35यही ज़िन्दगी है। बड़े मज़े की बात है और अफसोस हुए
- 9:41हैं। ईश्वर ने एक एक कण अपने हाथों से
- 9:47बनाया, इतना प्यार डाला इसमें के खुद ही इसमें समा गया।
- 9:55इससे ज्यादा वो कर भी कह सकता था। परमात्मा ने इतना प्यार उंडेला कण
- 10:03कण में अपनी बनाई हुई सृष्टि क्या खुद ही समाहित हो गया इसमें इससे
- 10:16ज्यादा? प्यार वो आपको क्या दे सकता है?
- 10:20सलमान वो आपको क्या दे सकता है? और तुम इसके आनंद का एक कजररा भी
- 10:30कभी स्वाद नहीं चखे हो। तुम मान्यताओं के आधार पर जिए
- 10:37जाते हो जो कि जीना नहीं होता। सच पूछो तो मरने से बदतर होता है।
- 10:55मुझे शांति को 4 साल हो गए। चार वर्ष में एक बीज वट वृक्ष बन
- 11:06जाता है। तुम वहाँ की वहाँ थ्योरी हो।
- 11:21मत आना, जो मुक्त हो ही गया, उसे आना भी नहीं चाहिए।
- 11:32क्यों कराना बात मुक्ति की है? मेरे पास पांच 4 दिन पहले एक
- 11:48संदेश आया बाबा आपने बुलाया 18 तारीख को।
- 11:5618 तारीख को आप नाम दान दोगे। मैंने कहा नाम दान लेना है, आप
- 12:06नाम दान लेना है तो मत आना, वो तो चौंकी।
- 12:16नाम दान लेना है तो मत आना और अगर इन बेड़ियों से मुक्त होना है इन
- 12:31जंजीरों से इन झाड़ झाड़ियों से। इन कांटों से इन चोभन से मुक्त
- 12:41होना तो फिर आ जाना हिस्सा खत्म बुलाया है अभी।
- 12:56लेकिन अगर नाम नाम लेना है बाबा नाम तो दिया नहीं तो फिर पहले से
- 13:03ही बता देता हूँ कोई नाम होगा वो छीन तो लूँगा, मैं नाम लूँगा,
- 13:14नहीं तो मैं और बहुत है। और भी गम हैं जमाने में मोहब्बत
- 13:25के सिवा बहुत लोग इंतजार में बैठे हैं नामदान लेना तो वहाँ चली
- 13:37जाना। दूसरा प्रश्न बाबा आप हमेशा एक
- 13:55शब्द उच्चारित करते हैं, भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं यह
- 14:04अर्जुन। तो स्थिति प्रज्ञा हो जा यह
- 14:12प्रज्ञा हम तो बुद्धिमान ही को कहते है, यह कौन सी प्रज्ञा है
- 14:19कृपा करके इसका अर्थ विस्तार से समझाने का कष्ट करें अनूप।
- 14:42बुद्धि व्यक्तिक समझ है एक व्यक्ति की समझ है बुद्धि और
- 14:57अस्तित्व की समझ है। प्रज्ञा तुम्हारी बुद्धि, बुद्धि
- 15:13तुम्हारी बुद्धि बुद्धिमानी। और अस्तित्व की बुद्धि प्रज्ञा
- 15:25बड़े सरल शब्दों में समझाने का उपाय कर रहा हूँ।
- 15:34तुम्हारी बुद्धि बहुत ही छोटी है। नेगलिजबल नगण्य उसकी कोई बहुत
- 15:45ज्यादा क्षमता नहीं, लेकिन जीस प्रज्ञा की बात।
- 15:55भगवान कृष्ण करते हैं वह प्रज्ञा अस्तित्व की प्रज्ञा है, अस्तित्व
- 16:03की बुद्धि है सारे अस्तित्व की, बुद्धि सारे अस्तित्व की, बुद्धि
- 16:12उसे प्रज्ञा। तो कृष्ण कहते हैं, इस संकीर्णता
- 16:19को छोड़ दे, अपनी संकीर्ण बुद्धि को छोड़कर अस्तित्व की विराट
- 16:29प्रज्ञा में स्थित हो जा। एक स्थान से उठना है और दूसरे
- 16:37स्थान पर जाना है। बस इतना सा फासला है इतनी सी
- 16:45यात्रा है, अपनी बुद्धि को छोड़ना है यह बड़ी।
- 16:56नगरजीवल है नगण्य है, छोटी है, शुद्र है, संकीर्ण और विराट की
- 17:06बुद्धि में जाना अस्तित्व की बुद्धि में जाना।
- 17:15वह प्रज्ञा है। यह सफर बड़ा प्यारा है।
- 17:25पहले तो इस बात को ध्यान से समझना अगर तुम ने जहाँ बैठे हो वहाँ से।
- 17:32कहीं और जाना है तो क्या करोगे? सबसे पहला कदम जहाँ बैठे हो इस
- 17:42स्थान को छोड़ना पड़ेगा, फिर यात्रा करनी होगी।
- 17:51फिर वहाँ जाना होगा जो तुम्हारा गंतव्य स्थल है तो बुद्धि से
- 18:02प्रज्ञा की तरफ बुद्धि वैकतिक है। और प्रज्ञा सामूहिक है।
- 18:16बुद्धि तुम्हारी है प्रज्ञा विराट की है तो तुम्हारी बुद्धि से चल
- 18:27रहा है। विराट की बुद्धि तक पहुंचना है,
- 18:31सीधी सी यात्रा है, बड़ी सरल है, तुम्हारी बुद्धि में भेद भरे हैं,
- 18:43नफरत भरी है। लड़ाई झगड़े, फसाद, कानून, दावे,
- 18:54झूठ, कफर, तूफान, राजनीति सभी प्रकार की।
- 19:07झूठी, मुठी व्यवस्थाएँ समाज की हूँ या सिद्धांतों की हूँ ये
- 19:21तुम्हारी बुद्धि में है। यहाँ से उठना है क्योंकि तुमने
- 19:33यात्रा करनी है। विराट की बुद्धि तक की यात्रा
- 19:40करनी है व्यक्तिक बुद्धि से। विराट की बुद्धि तक जाना प्रज्ञा
- 19:49तक जाना प्रज्ञा इसे ही कहते हैं तो अपनी बुद्धि के स्थान को
- 19:54छोड़ना होगा। इसलिए जैन फकीरों ने कहा।
- 20:04कि हमारे पास आने से पहले जहाँ जूते उतारते हो, वहाँ बुद्धि को
- 20:09भी उतार देना, बुद्धि के ऊपर अपनी जूतियों को रख लेना या जूतियों के
- 20:18ऊपर बुद्धि रख लेना कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 20:26तो फिर हमारे पास। आना।
- 20:49जे। तुम प्रेम मिलन की चाह।
- 21:03से तलीधर घर मेरे आंख, घर मेरे आंख।
- 21:21ये तो प्रेम मिलन की चार। शीश को तली पे रखना होगा इस
- 21:36बुद्धि को ज्योतियो को ऊपर। और फकीर कहते हैं मेरे पास आ जाओ
- 21:44यही कहते हैं कृष्ण सर्वधर्माण प्रत्यक्ष नौमिका शरण भक्ष, यह
- 21:51धर्म जूतियों की जगह निकाल के आना भाई।
- 21:58तुम कुछ भी हो तुम्हारी व्यक्तिगत प्रज्ञा को तुम जिसे व्यक्तिगत
- 22:07बुद्धि कहते हो, व्यक्तिगत प्रज्ञा को जूतियों की जगह निकाल
- 22:13आना और फिर यात्रा करना। विराट की प्रज्ञा की तरफ लेकिन
- 22:27तुम ऐसा कर नहीं पाते। कबीर के भी सिर्फ वचन है।
- 22:34संतों के सिर्फ वचन है तुम सुन लेते हो दौरा देते हो कर कहाँ
- 22:40पाते हो? भला अपना शीश अपना अहंकार काट के
- 22:50अपनी तली पे रख देना कोई आसान बात है, बहुत मुश्किल है।
- 23:01मुश्किल से मुश्किल कठिन से कठिन तम काम इससे कठिन तम काम कुछ भी
- 23:07नहीं बलिदान देना हो तो अपने अहंकार का दे देना बकरों का मत
- 23:14देना नो नो ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा।
- 23:27सतीप्रज्ञ हो जा अर्जुन विराट की प्रज्ञा में चला जा अपनी संकीर्ण
- 23:35बुद्धि को छोड़ दे तुम्हारी संकीर्ण बुद्धि में मृत्यु का भय
- 23:43कूट कूट कर भरा हुआ है। इसलिए अर्जुन कप रहा है।
- 23:49बुरी तरह रोम रोम उसका कंपन है। थर्रा रहा है देख देख कर इन
- 24:01समूहों को बली से बली लोक। भीष्म देखते हैं, द्रोण देखते
- 24:09हैं, जिनसे धनु और विद्या सीखी और पांडवों के पास कौरवों से कम है
- 24:22सेना। पांडवों के पास सात अक्षोणी सेना
- 24:34है। कोरवों के पास 11 है।
- 24:36अक्षोणी सेना चार अक्षोणी सेना को फर्क बहुत है।
- 24:48दरअसल अर्जुन। इतनी विराट सेना को और इतने
- 24:54धुरंधर बलशाली व्यक्तियों को देख कर घबराता है।
- 25:03दूसरे शब्दों में कहूं तो मृत्यु से घबराता है।
- 25:19मृत्यु से तुम डरते हो उसका मूल कारण मैं बहुत बार बता चुका हूँ
- 25:27क्योंकि जो मरेगा उसे तुम अपना हो न समझते हो।
- 25:32यही मूल कारण है और तुम्हें लाख समझाया कि।
- 25:41संत बोल बोल कर चले गए बेचारे किसी को सलीब नसीब हुई, किसी का
- 25:55शरीर। काट दिया गया।
- 25:59किसी का सर धड़ से रखकर दिया गया, किसी को जहर दे दिया गया।
- 26:07सिर्फ उन लोगों के द्वारा जिनका निहित स्वार्थ सिर्फ जीन था।
- 26:15या राज़ करना था? ये दो निहित स्वार्थ होते हैं
- 26:22जीने की इच्छा और ज़ोर जबर करने की इच्छा।
- 26:27राज़ करने की इच्छा ये दो इच्छाएं।
- 26:36व्यक्ति को पाप करने पे मजबूर कर देते हैं, पर महावीर कहते हैं कि
- 26:45इन दोनों इच्छाओं को त्याग दो जी वैष्णव को त्याग।
- 26:52जीने की इच्छा को साथ शब्द बड़े हलके हैं शब्द जब कर्म में तब्दील
- 27:01होता है तो तुम थर्राते हो। वही अर्जुन है जो कह रहा था हे के
- 27:07शव। मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य
- 27:15में ले जाओ, मैं देखूं तो मुझसे लड़ाई करने के लिए कौन कौन धुरंधर
- 27:23आया है? और जब अर्जुन चला गया, कृष्ण ले
- 27:35गए। दोनों सेनाओं के मध्य में ही ले
- 27:37गए और उसने अवलोकन किया। अपनी सेना को तो उसे पता ही था
- 27:46सेना तो विपक्ष की देखना होती है। कि कौन कौन मेरे विरुद्ध मेरे साथ
- 27:54युद्ध करने पर मेरी बलि लेने पर उतारू देखा महारखी रेशमा, पिताम
- 28:07गुरु तृण कृपा चार यत्रत दुर्योधन विशाल फौज तो कंप गया, बाकी तो
- 28:23बहानेबाजी थी सही तो मौत का डर। थर आने लगा और किसी तरह वक्त पास
- 28:33करने लगा। यह टाइम पास था।
- 28:36गीता टाइम पास में बन गई। सब बचने के बहाने थे और बचने के
- 28:44बहाने में व्यक्ति देरी करता है। पूछ लूँ ये भी पूछ लूँ वो भी पूछ
- 28:49लूँ ध्यान उधर ले जाऊं ध्यान इधर ले जाऊं बचने के प्रयास होते हैं
- 28:54सारे व्यक्ति मरने से डरता है युद्ध के एक क्षणों में।
- 29:09भला कोई व्यक्ति बात करें, सांख्यिकी बात करें।
- 29:17योग की बात करें, हठ योग की कोई इनमें तारतम में बैठता है।
- 29:29नहीं बैठता। युद्ध के क्षण में युद्ध की बातें
- 29:33होनी चाहिए। युद्ध के मैदान में खड़े हैं, ये
- 29:37तो शंखनाद हो चुका है। गीता बड़ी लंबी है, 700 स्लोक
- 29:49हैं। तुमने कहा बाबा आप कहते है स्थिति
- 30:00प्रज्ञा हो जा ये कृष्ण ने कहा अर्जुन को हाँ, बिलकुल सरल सी बात
- 30:10आपकी समझ में आ भी जाएगी। व्यक्तिगत प्रज्ञा से बैराट की
- 30:24प्रज्ञा में उतर जाओ और ये खोपड़ी तुम्हारे यहाँ और बैराट की
- 30:38प्रज्ञा तुम्हारे अंतः स्वयं। ये जो अन्नदनाद यहाँ से आ रहा है,
- 30:48ये ध्वनि जहाँ से उदगम स्थल है इसका जिसे डॉक्टर लोग दिनेश कहते
- 30:57हैं और उनके खुद भी है ये। दवाइयों से ठीक ना वहाँ पहुंचा
- 31:06उदगम स्थल से बेचारे डॉक्टर क्या जानें के ऋषि उस स्थल में पहुँच
- 31:17गया जहाँ से ये आवाज़ का आगाज। होता है।
- 31:24वह तो सिर्फ कानों में आती हुई इस झंकार को सुनता और कहता रोग है,
- 31:31तरह तरह की बातें हैं। मैं क्या जवाब दूँ के सवाल का।
- 31:41देखने के बाद सारे प्रश्न समाप्त हो जाते हैं।
- 31:44जब देख लिया उद्गम स्थल कहाँ से आता है?
- 31:47ये ओमकार का नाद जो बाहर आते आते तक थोड़ा बदल कर अन्नदनद का सुर
- 31:56पकड़ लेता है। उसमें तब्देर हो जाता है।
- 32:03कृष्ण कहते हैं, अपनी वैयक्तिक अप्रज्ञा को छोड़कर जिसे हम
- 32:08बुद्धि कहते हैं, विराट की प्रज्ञा में चला जा यानी विराट की
- 32:15बुद्धि में चला। तो क्या होगा?
- 32:22तुम्हारी शुद्र बुद्धि बेराट बुद्धि में प्रवर्तित हो जाएगी और
- 32:28तुम्हारी शुद्र बुद्धि में जो मैंने पहले बताई?
- 32:33इच्छा है त्वेशा है, आग है, बदले की भावना है, किसी ने कभी
- 32:40बेइज्जित किया था, किसी के आगे कभी झुके थे उसकी जलन है।
- 32:56कैसे बदला लूँ उससे यही उधेड़बुन में तुम्हारा दिन भी गुजर जाता
- 33:04है। रात भी गुजर जाती है वैतिक
- 33:14प्रज्ञा में यही सब कुछ कूड़ा कबाड़ा है भेद?
- 33:19सभी बेकार हैं सभी विचार हैं ऐसा न हो जाए वैसा न हो जाए इरादे
- 33:26बांधता हूँ सोचता हूँ, छोड़ देता हूँ इरादे बांधता हूँ सोचता हूँ,
- 33:37छोड़ देता हूँ। कहीं ऐसा न हो जाए, कहीं ऐसा न हो
- 33:44जाए, शंका उत्पन्न होती है। तुम दृढ़ संकल्प नहीं हो पाते और
- 33:49देवी की तरह सुशीला ने प्रश्न पूछा मैं कुंभ और शिनान करके आपके
- 33:55पास आऊंगी। दीक्षा लेने के लिए फिर दीक्षा की
- 33:58जरूरत क्या रह जाती है? बढ़िया घर बैठो, आराम करो, मुक्त
- 34:04हो गए गंगा ने तुम्हारे पाप धो दिए ना?
- 34:11वो तो त्रिवेणी है सरस्वती, यमुना।
- 34:16गंगा त्रिवेणी संगम ने आपको कहा था मेरे जीजाजी रेलवे में थे,
- 34:34उन्होंने सारे तीर्थ किये। पंडितों के हिसाब से सारे पाप
- 34:44नष्ट हो जाने चाहिए। जीव का कैंसर हो गया, सड़के मरे
- 34:55मैं शास्त्रों की लिखी बात नहीं बोलता, आँखों देखी बात बोलता हूँ।
- 35:03कर्मों को कैसे मिटाओगे लेकिन मनुष्य ठग है इस शब्द को मनुष्य
- 35:17ठग है। और ठग खुद है और दूसरों की ठगी
- 35:23में आ जाता है। आसान तरीके ढूंढता है और मुक्ति
- 35:32का इससे ज्यादा सरल तरीका और क्या होगा?
- 35:40एक बार मैं गंगा चला गया, किसी काम से गया था तो मेरे सास के
- 35:47मित्र कहें लेकिन थोड़ा गोता लगा लूँ।
- 35:48मैंने कहा लगा लो आप भी लगा लो, मैंने कहा मैं भी लगा लेता हूँ
- 35:54क्या है? मैंने गोता लगा लिया।
- 36:03आपको सच बताऊँ मुझे होटल में आकर दूसरी बार नहाना पड़ा क्योंकि
- 36:08मेरे सारे शरीर में कार्यरत लगे कोड ही वहाँ जाते हैं कोड हटाने
- 36:18के लिए। क्योंकि हमारे धर्मों ने फैला
- 36:24दिया कि पाप कर्मों के कारण ही कोढ़ उठता है और उसी पानी में
- 36:32तुमको होता लगाओ और कौड़ी तो थोड़ी सी ज्यादा देर रुकेगा और
- 36:37उसके सारी मवाद पानी में बह जाएगी।
- 36:41और उसी पानी में तुमको होता लगा होगा एक स्त्री मुझे पूछने लगी
- 36:53मुझे पीरियड मैं क्या करूँ? मैंने कहा मत जाओ, कहती जाना तो
- 37:00है, वैसे ही चली गई, अब क्या होगा इसका?
- 37:08उस पानी को तुम पियोगे के तुम्हारे रोम को शुद्ध करेगा
- 37:16अशुद्ध करेगा बुद्धि है तुम में। साफ सुथरा आदमी वहाँ जाता है नारब
- 37:33तीर्थ नारब मक्के वो तीर्थों में है नमक्कों में है।
- 37:49बलिशा कहते हैं, रबदा तेरे अंदर वर्ष दाग ते न नजर न आ 10।
- 37:55की कित्ता जावे? प्रत्येक प्रकार के पाप कर्म करने
- 38:07वाले जब उनको पापों का फल मिलता है।
- 38:13गंगा की तरफ तो कर लेते है गंगा दो देगी पापा को पाप तो तुम करो
- 38:27दो ही गंगा। ये कहाँ की फॉर्मूलेशन तुम लेके
- 38:34किसी मैथमेटिशियन से पूछो वो कहेगा नहीं इट्स नॉट पॉसिबल जो
- 38:42करेगा वो भरेगा और गीता का तो ज्ञान ही यही है।
- 38:51जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान ये है गीता का ज्ञान नहीं
- 38:58तो भगवान कृष्ण ने कह देते वो क्यूँ कहते मेरे सर में आजा वो
- 39:04क्यूँ कहें? कि शुद्र प्रज्ञा को छोड़कर विराट
- 39:12प्रज्ञा में आ जाओ। वो भी कहते थे गंगा स्नान कर ले
- 39:17लेकिन तुम मल्टीडाइमेंशनल हो बहु आयामी हो तुम।
- 39:31और वहाँ जाने के लिए एक आयामी होना पड़ता है जहाँ सारे भेद खत्म
- 39:38हो गए और कोई आयाम न बचा और फिर एक वीख हो गया।
- 39:47शून्य ही बचा किसी को नागार्जुन शून्य वाद कहते हैं।
- 39:52अद्वैत दो नहीं हैं, एक है और एक भी मट जाय और शून्य वाद नागार्जुन
- 40:01का शून्य वाद जो मैंने कहा इनर्शिया।
- 40:11कौड़ी वहाँ जाते रोगी वहाँ जाते हैं।
- 40:16यह तो थोड़ा कम बुद्धि रखने वाला भी समझ जाएगा।
- 40:21जो पाप करेगा वो पाप धोने के लिए जाएगा।
- 40:28और जो पाप धोने के लिए जायेगा और बार बार गोद लगायेगा, उसने ज्यादा
- 40:33पाप की अभी एक खबर में पढ़ रहा था।
- 40:37एक राजनेता ने 10 डुबकी लगाई। एक राजनेता ने बस एक ही डुबकी
- 40:43लगाई, मैंने कहा 10 वाले ने पाप ज्यादा किये होंगे भाई।
- 40:47नहीं संतुष्टि हो गई, उसकी 10 ही लगाने पड़े।
- 40:53एक वाले ने कम किए होंगे। सीधा सा गणित है गंदे मंदे बैले
- 41:05कुचैले। तुम किस तरह जीवन को ढो रहे हो?
- 41:10तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई स्वाद नहीं, कोई मज़ा नहीं तुम्हारी
- 41:14ज़िन्दगी का ढूंढ़ते फिरते हो मज़ा और गलत दिशाओं में।
- 41:23पदार्थ में ढूंढ़ते हो, पधवों में ढूंढ़ते हो, मान सम्मान में
- 41:27ढूंढ़ते हो, भोजन में ढूंढ़ते हो, अंतरंग क्षणों में ढूंढ़ते हो,
- 41:35औलाद में ढूंढ़ते हो, खुद में कभी नहीं ढूंढ़ते हो।
- 41:43खुद से बाहर ढूंढ़ते हो? प्रकशन कहते हैं कि खुद में ढूंढो
- 41:54यह भीतर की यात्रा है। वैयक्तिक बुद्धि से।
- 42:05बैराट की बुद्धि तक की यात्रा वैक्तिक प्रज्ञा से बैराट की
- 42:12प्रज्ञा तक की यात्रा श्रद्धालु शब्दों में बोला मैंने ओह कैसे
- 42:18करनी? मैंने पिछले वीडियो में यही तो
- 42:23कुछ बोला जो समझाया जा सकता था। बार बार भी कहता हूँ तुम्हें वह
- 42:39समझाया जाता नहीं वह शब्दों में आता।
- 42:43नहीं। वह इशारों में भी नहीं आता।
- 42:49तुम शब्दों को पकड़ लेते हो, बहस करते हो, शास्त्रार्थ करते हो, वह
- 42:54इशारों में भी नहीं आता क्योंकि इशारों के टॉप को तुम पकड़ लेते
- 42:58हो। मैं कहता हूँ वो रहा चंद्रमा, तुम
- 43:01इसको पकड़ लियो कहाँ है यहाँ तो है नहीं।
- 43:08वह समझ में नहीं आता, लेकिन समझाने का एक प्रयास जरूर करते
- 43:19हैं। संत जिसने स्वाद चख लिया।
- 43:25वह कुछ बोलेंगे नहीं तो नाचेगा जरूर नाचने से तुम्हें पता चले,
- 43:32नाच ले जों गूंगा गुड़ खाये के कहे कौन मोक स्वाद जीवा तो नहीं
- 43:41है मुख में? बोल तो नहीं सकता लेकिन गुड़ खा
- 43:46लिया है क्या करें? मेरा नाच के प्रकट करते है नानक
- 43:54गा के प्रकट करते हैं कबीर सुरती में उतरकर प्रकट करते हैं बुद्ध।
- 44:03शिलावत हो जाते हैं, महावीर भी शिलावत हो जाते हैं, चैतन्य झूमते
- 44:11हैं। यह प्रगटी कर रहा है उस आनंद का
- 44:19जो तुमने पिया। और तुम्हारे आज के संत मेकअप करते
- 44:30हैं, काला पीला माथा कर लेते हैं पर दाढ़ी खोलवा लेते हैं।
- 44:41यह नरजीबाग किस मूर्ख नहीं होता है, लेकिन मेकअप तो मेकअप ही होता
- 44:57है, मेकअप करके तुम्हें लुभाने की चेष्टा करते हैं।
- 45:01और फिर इनसे कुछ कह दो तो यह रोने लग जाती है।
- 45:09सारी दुनिया इनके रोने पर भावुक हो जाती है और इनके संग हो जाती
- 45:15है। अगर कोई मूर्ख रोने लगे तो तुम
- 45:18उसके संग हो लोगे। ऐसा ही तुम करते हो क्योंकि तुम
- 45:28भी मूर्ख हो, मूर्ख मूर्खों के सरदार के दुख नहीं देख सकते, वो
- 45:40गलत रोए, वो ठीक रोए लेकिन तुम्हारी सहानुभूति उसके साथ।
- 45:51सतिप्रग हो जा अपनी शुद्र बुद्धि को छोड़ थोड़ा भीतर खिसक धीरे
- 46:00धीरे गुरु चलेगा। ज़रा होले, होले चलो मेरे।
- 46:14साजना, हम भी पीछे हैं तुम ज़रा। होले, होले, चलो।
- 46:26मेरे साजना। हम भी पीछे हैं तिहा गुरु और
- 46:35शिष्य दोनों चलेंगे संग संग शुद्र बुद्धि को छोड़ दो।
- 46:47विराट बुद्धि में जाओ बस यही मतलब है स्थिति प्रज्ञा होने का और
- 46:57यहाँ मिलेंगे आग बदले की भावना शतरंज जब बसाते हुए मस्तिष्क।
- 47:06कैसे यहाँ राज़ करना है अब ये तो जीत लिया अब अगला कैसे जीतना
- 47:18जिनको ये पता नहीं के अगले क्षण जीवित रहेंगे हमारे यहाँ शहर में
- 47:24एक वृद्ध हुआ करता था धीर फैमिली में।
- 47:31उसने कोई भी व्यक्ति चलाया था, मैं उस वक्त आठ का काम करता था।
- 47:35कमीशन एजेंट का किसी मित्र के साथ तो कोई जमींदार नहीं है क्या आप
- 47:43इसे तो उसके ऊपर गवाही डरवानी है? तो उसके पास जो भी कोई चला जाता
- 47:54उसे कहता धीर साहब यहाँ साइन कर दो, हाँ हाँ कर देता हूँ मैं और
- 47:58वृद्ध मरने के करीब एक बार हमारे साथ हुए ऐसे।
- 48:09पर नोट भरा और उसका ग्वाही डलवा दिया।
- 48:13सामने तो वो था नहीं, सब झूठ चलता है, पैसे वो ले गया था।
- 48:24लेकिन उसके सामने दस्तखत कौन करे ये भ नहीं दस्तखत करने देता,
- 48:33लेकिन वह कहता हाँ, मैं गवाह ही दे दूंगा, चिंता मत करो, मेरे
- 48:37सामने लिए हैं, चाहे नहीं लिए हैं, मैं गवाह ही दे दूंगा।
- 48:43के हाँ, हाँ, मेरे सामने लिए मैंने देखा ये आदमी तो कांप रहा
- 48:48है। मैंने कहा ये जीवित भी रहेगा तब
- 48:52तक क्योंकि आजकल न्यायिक व्यवस्था ऐसी ही कुछ है।
- 48:59दो दो सालों की तारीखें ढल जाती हैं।
- 49:09मैंने ऐसे केस भी देखे दो दोस्तों में जिसने पैसे लिए, उसने उल्टा
- 49:20केस कर दिया कि नहीं, मैं नहीं लेने पर वो हार गया।
- 49:24खैर जी हार गया न्यायप्रियता का सबूत है।
- 49:30जज साहब विमान था बस एक न्यायप्रणाली के पर यकीन बाकी है।
- 49:40राजनीतिज्ञों पर से विश्वास उठ चुका है, रोज़ देखते हैं।
- 49:50सामूहिक सर्वश्रेष्ठ गद्दी नशीं जनता के आगे बोलता है कि यह है
- 49:58पार्टी ने गपड़ा किया इतने 1000 करोड़ रुपए का और चक्की पीसिंग
- 50:05पीसिंग लेकिन चक्की तो नहीं पीसिंग?
- 50:12अगले दिन वित्त मंत्री बनी। मुझे क्या बात बोलती हो?
- 50:22अरे भाई बोल तू अगर गलत हो तो बताओ।
- 50:28सिंघों के नहीं ले लड़े, सिंघों के नहीं ले लड़े, हंसों की नहीं
- 50:37पात, लालों की नहीं बोरियां संत न चले जमात।
- 50:52सिंघों का समय नहीं होता है, शेर अकेला होता है और हंसों की
- 50:59पंक्तियाँ नहीं होती हैं। संत संतो की जमात में होती है एक
- 51:10संत मिल जाए बहुत। लालों की नहीं बोरियां लाल तो
- 51:23एकाध ही बहुत होता है बेशकीमती होता है संत न चले ये जुमात जीस
- 51:34दिन जमात होने लगेंगी संतों की। उस दिन दुनिया में इतना दुख नहीं
- 51:41होगा, गदियां शांत हो जाएगी, वैर भाव से मुक्त हो जाएगी, बह से
- 51:46मुक्त हो जाएगी, एक साथ द्विष्य मुक्त हो जाएगी, बदला लेने की
- 51:50भावना समाप्त हो जाएगी। संत और सिंघा अकेला ही रहता है।
- 52:15मूर्खों की टोलियां होती हैं, मूर्ख टोरी बना के खुश है चाचों
- 52:23को भी ले लूँ, ताओं को भी ले लूँ और रिश्तेदारों को भी ले लूँ।
- 52:27ज़ोमतो को भी ले लूँ, जीजा को भी ले लूँ सब को ले लूँ, दुनिया को
- 52:34भी संघ ले लूँ, अच्छे कर्म करोगे तो सारे संघ आ जाएंगे, बुरे कर्म
- 52:43करोगे तो अपने भी साथ छोड़ जाएंगे।
- 52:47बस अपने साथ वो ही रहेंगे जो चिपके हुए लोग हैं।
- 52:55चिपके हुए लोगों के साथ तो बेटा कतल करके भी चला जाए तो माँ छाती
- 53:00से लगा लेती है, कोई बात नहीं बेटा।
- 53:05यह मोह लेकिन संतों में मोह नहीं होता।
- 53:15संत अकेला होता है और ध्यान रखना। अब यह सूत्र आपको बता दूँ जीवन
- 53:21का। अकेले हुए बिना संतत्व नहीं मिलता
- 53:28यू हैव टू बी अलोंग भीतर से तुम अकेले ही हो बस वहाँ जहाँ जाना है
- 53:38वो एक ही है। और जो डुबकी लगा के आए उस तीर्थ
- 53:42में उन्होंने बाहर आके बाबा नानक ने कहा एक ओंकार, वो एक है, उसका
- 53:50फैलाव बहुत है, अनादि है, आनंद है, लेकिन है एक।
- 53:59कोई भेद नहीं, कोई त्रेड नहीं, कोई लकीर नहीं, कोई उसमें अलगाव,
- 54:05तो तुमने इस भेद बुद्धि से चलना है।
- 54:15अभेद बुद्धि तक जाना है। बहुत से शब्द इस्तेमाल कर रहा हूँ
- 54:23ताकि आपको समझ पड़ जाए जो समझ में नहीं आता इशारे कर रहे हैं, जिसके
- 54:33इशारे होते हैं, बोल रहा हूँ। जो लिपियों में समाता नहीं, उसको
- 54:47बोल रहा हूँ और वहाँ जाकर तुम अकेले हो जाते हो, बस यही सूत्र
- 54:59था जब तक तुम भीड़ में हो। मैंने बाबा से पूछा आपने मुझसे
- 55:10कहा, कम्यून मत बना लेना मत लो उस स्थान पे जाना है जहाँ कोई कम्यून
- 55:23नहीं होता वहाँ तो सारा ही कम्यून एक है वहाँ जाना है।
- 55:31तुम खंड खंड को जोड़कर कम्यून बनाओगे।
- 55:34एक एक आदमी को जोड़कर कम्यून बनाओगे वो कम्यून होगा भी नहीं,
- 55:38वो तो भीड़ होगी। तुम उस कम्यून में उतर जाओ जो
- 55:46ऑलरेडी कम्यून है। जो विराट है वो कम्युन है, वो
- 55:50जर्रे जर्रे से बना हर जर्रे पे उसकी मोहर है हर जर्रे में वो खुद
- 55:57आप है उसकी मोहर रही है स्टेम्प्ड है वो।
- 56:13पूछा सतिप्रज्ञ हो जाओ, ये प्रज्ञा है, हम तो बुद्धि को
- 56:20समझते हैं। बुद्धि भी प्रज्ञा है, लेकिन
- 56:25वैयक्तिक प्रज्ञा है तुम्हारी अकेले की आपकी।
- 56:32और एक प्रज्ञा सामूहिक होती है। वैक्तिक प्रज्ञा को छोड़कर
- 56:41सामूहिक प्रज्ञा में प्रवेश करना है।
- 56:44इसे ही अंत यात्रा कहते हैं। बस इतना सा काम है।
- 56:49जिसे कहते हैं बुले शाह रबदा की बाणों उतरो, पुटना तेरधरण
- 57:03तुम्हारी वैक्तिक प्रज्ञा से पट लो, इसे उखाड़ लो इसे और विराट
- 57:09प्रज्ञा में शीत हो जाओ। बस यही उपदेश भगवान कृष्ण देते
- 57:15हैं। भगवान कृष्ण भी अलग अलग शब्दों का
- 57:17इस्तेमाल करते हैं, अलग अलग डाइमेंशन से बोलते हैं।
- 57:24क्यों? शायद शायद कोई शब्द, कोई इशारा
- 57:29कारगर हो जाए। उनकी भी इच्छा यही है तो अगर
- 57:37कारगर हो गया तो इसका भ्रम टूट जाएगा।
- 57:43भ्रम टूट जाएगा तो कपना बंद कर देगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
- 57:49शब्दों में थोड़ा सा बदलाव होता लगा हुआ नहीं, लेकिन तैयार हो गया
- 57:56शब्द एक काम कर देते हैं। हम क्यों बोलते हैं बोलने से
- 58:06पहुँच सकते हो। लेकिन वो कोई बरला, एक आध करोड़ों
- 58:10में एक कोटिन में कोई एक लेकिन बोलने से तुम तैयार जरूर हो
- 58:16जाओगे। सुनते सुनते सुनते सुनते सुनिए
- 58:20दुख पाप का नाश सुनते सुनते तुम। तैयार हो जाओगे तुम्हारी भूमि
- 58:28तैयार हो जाएगी। फिर हम आसानी से बीज बो सकेंगे।
- 58:32उसमें तुम जो हम शक्तिपात करेंगे उसको सहन के युग।
- 58:48पिछले 2 साल, 3 साल, 4 साल हम इंतजार करवातें हैं, हम देखते हैं
- 58:55अब वीडियो सुनते हो सुनते हो क्रिया जो करते हो ध्यान में जाते
- 59:00हो कुछ नहीं करने में जाते हो। या राधे राधे करते रहते हो देख कर
- 59:08परख कर फिर बुलाते हैं। हमारी पंजाबी में कहावत है
- 59:13गदड़ाधी काल नल बेर नहीं पकते होंगे, तुम जल्दबाजी करोगे, मुझे
- 59:20पता है। लेकिन संत को कोई जल्दी नहीं संत
- 59:26की सिर्फ एक ही आंतरिक इच्छा है कि तुम कैसे इन बेड़ियों से मुक्त
- 59:32हो जाओ, जो है नहीं, कैसे आँखें खुल जाए, आँखें हैं।
- 59:39लेकिन तुम नीचे बैठे हो, तुम शपथ देख रहे हो?
- 59:54संत की चाहत है भगवान कृष्ण कहते हैं व्यक्ति प्रज्ञा से बेराट की
- 1:00:02प्रज्ञा तक पहुंची जा, यह है इसका सार।
- 1:00:09इसे शार शब्द कर लो। आखिर में क्या पाओगे?
- 1:00:20यही पाओगे सो हम वो मैं ही हूँ तत्व मासी शेत के तू तुम ही हो
- 1:00:28शेत के तू तुम ही हो परमात्मा। तेरे जिहा।
- 1:00:38मेनू और न। कोई में जे है लख ते नु।
- 1:00:51जे मेरे बीच है, है गुनाह दे तो बख्शिंदा के नू जे मेरे बीच है
- 1:01:08गुनाह दे। तू वक्त से दात के नू।
- 1:01:17तेरे जैसे मुझे बस तू ही है और मेरे जैसे तुझे लाखों है।
- 1:01:28तेरे जेहाब में नु होर न कोई मैं जे।
- 1:01:37हे लख ते नु जी मेरे। विच ऐब न होवे।
- 1:01:48तुम बक्षिंदा के नून तुझे बक्षनहार कौन कहता है?
- 1:01:56अगर मेरे में गुनाह ना होते तो तू बक्षनहार कैसे कहलाता, तू बक्श तक
- 1:02:03से? तुम बक्श दा के नू रखिये, चरना,
- 1:02:14दे खोल, तुम बक्श दा के नू रखिये, चरना दे खोल।
- 1:02:26मेरा वालिया वालिया मेरा वालिया सांया मेरा वालिया सांया।
- 1:02:44रखी चरना, देखो मेरा वालिया। श्री कृष्ण गोविन्द?
- 1:03:02हरे मुरारी हे नाथ नारायण वसुदेव। श्री कृष्ण।
- 1:03:15गोविंद हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव?
- 1:03:28श्री कृष्ण। गोविंद हरे मुरारी हे न।
- 1:03:41हाथ नारायण वासुदेव हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:04:00श्री कृष्ण। गोविंद, हरे मुरा हे नाथ नारायण
- 1:04:14वासुदेव। पितुमात स्वामी सखा हमारे पितुमात
- 1:04:33स्वामी सखा हमारे। हे नाथ न रायण वसुदेव हे नाथ
- 1:04:52नारायण वसु। देव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी
- 1:05:10ए नाथ नारायण वासुदेव। श्री?
- 1:05:16कृष्ण गोविंद, हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव व।