Latest / Baba ji Vijay Vats / 24 Dec 24 - गीता का ज्ञान - स्वधर्म और कर्तव्य धर्म क्या है? इसके भीतर कैसे उतरा जाए?
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- 0:15दूसरा अध्याय व्यक्ति शुल्क शैय, धर्म अपित चार वेक्षना।
- 0:32तू कम पे तू मरहसी धर्म्याध्य युद्धाशयो अन्यत्र क्षत्रृश्य न
- 0:46विद्यत्य। कृष्ण अर्जुन को युद्ध भूमि में
- 1:03लड़ने के लिए व्याख्यान कर रहे हैं।
- 1:09तुम कहोगे, पच्चीसवें श्लोक से लेके 30 तक क्या हुआ?
- 1:20कृष्ण बार बार एक बात को दोहराते हैं और उसमें कुछ नया नहीं है
- 1:28आपके लिए। दूसरी बात आप अपने ध्यान में रखनी
- 1:36मैं आपको जीवन को जीने का ढंग बताता हूँ।
- 1:43कृष्ण अर्जुन को युद्ध में लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं।
- 1:50दोनों का मकसद जुदा जुदा है। तुमने कोई जंग नहीं लड़ना है।
- 1:55मेरे बोलने का डंक मैं वही वही शोक सुनूंगा जो आपके लिए हितकर
- 2:07होंगे। क्योंकि आपने आप कोई युद्ध
- 2:10क्षेत्र में नहीं खड़े हो। कोई ऐसी संकटकालीन अवस्था नहीं आई
- 2:16है कि शंखनाद हो चुका है। सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं।
- 2:23टकराने के लिए ऐसा कुछ भी नहीं। तुम्हारी स्थिति अर्जुन जैसी नहीं
- 2:34है। अर्जन के कंधों पर बड़ा भारी
- 2:43कर्तव्य है। युद्ध लड़ना और जीतना तुम्हारे
- 2:49कंधों पर ऐसा कोई कर्तव्य नहीं। गीता में जीवन को जीने के बड़े
- 2:59शानदार ढंग हैं। वो ही निचोड़ निचोड़ के मैं इसमें
- 3:06से निकालूंगा और वही तुम्हें समझूंगा कि भगवान कृष्ण जैसे खुद
- 3:16जिए, वैसे तुम भी कैसे जीओ मज़े से नाचते गाजते।
- 3:23कोई बैन नहीं, वो उछल भी नहीं है, वो स्वच्छंद भी नहीं है, स्वतंत्र
- 3:33है। भाष्य तो सिर्फ भाष्य कार्य करते
- 3:42हैं, वो एक एक शब्द को खंगाल रहे हैं।
- 3:46ये कामदर्शकों का है। जीवन का रस निचोड़ना गीता में से
- 3:55मुझे भलीभाँति आता है। मैं शब्दों को बाद में देखता हूँ,
- 4:05पहले कृष्ण के पास जाता हूँ। कृष्ण के पास जाके कृष्ण के
- 4:13शब्दों को बाद में निहासता हूँ क्या कहते हैं कृष्ण?
- 4:20तो फिर मैं नहीं बोलती फिर बोलते हैं कृष्ण आइए।
- 4:28हमेशा लोक के लेते हैं कृष्ण ने धर्म दो तरह के बताए हैं, चौंकना
- 4:41मत कृष्ण कहते हैं, एक तो स्वय धर्म है और एक।
- 4:52कर्तव्य अधर्म है स्वय धर्म और कर्तव्य धर्म अगर स्वय धर्म में
- 5:08जाना है। तो कर्तव्य धर्म से मुक्त हो के
- 5:16स्वयधर्म में निकल जाओ, शब्दों को बहुत शांति से सुनना है, भीतर उतर
- 5:22जाएंगे अगर स्वयधर्म में उतरना है।
- 5:29स्वय धर्म का अर्थ होता है जो तुम खो दो हो, स्वय हो।
- 5:34जो और कर्तव्य धर्म का अर्थ है, जो तुम्हारा कर्तव्य है, ये दोनों
- 5:41अलग अलग हैं। तुम हो तो आनंद का स्वरूप।
- 5:49वो तो तुम हो लेकिन तुम्हारे कुछ कर्तव्य भी हैं कर्तव्य हैं,
- 5:58बच्चों का पुष्ण करना है। समाज की तरफ भी देखना निर्भर का
- 6:12सहारा बनना है। दुखियों दीन दरिद्रों का कोई उपाय
- 6:18देखना है वो तुम्हारे कर्तव्य कर्म है।
- 6:23कर्तव्य कर्म प्रत्येक व्यक्ति के अलग अलग होते हैं।
- 6:27राजा के कर्तव्य, कर्म, जनता का हित सोचना है।
- 6:34शिक्षक का कर्तव्य, कर्म, बच्चों का हित सोचना है।
- 6:41ये कैसे इंटेलीजेंट बने? किस ढंग से इन्हें समझाऊं?
- 6:49डॉक्टर का कर्तव्यकर्म मरीज को रोग मुक्त करना है वैज्ञानिक का
- 6:59कर्तव्यक्रम। इस जगत में क्या रहस्य है?
- 7:09उसको खोजना है। बिमारी का इलाज खोजना है,
- 7:15सूक्ष्मता में उतरना है और जो स्पेस के वैज्ञानिक हैं।
- 7:25कैसे रॉकेट बने कैसे दूसरे ग्रहों पे जाएं नहीं बाहर का ज्ञान
- 7:36कर्तव्य करब है भीतर का ज्ञान। भीतर के ज्ञान के लिए तुम्हें कुछ
- 7:47नहीं करना होता है बाहर के ज्ञान के लिए तुम्हें बहुत कुछ करना
- 7:53होता है भीतर के ज्ञान के लिए तुम्हें किसी चीज़ की जरूरत नहीं
- 7:58है बाहर के ज्ञान के लिए। बाहर के कर्तव्य गर्म के लिए
- 8:03तुम्हें बहुत से इन्स्ट्रुमेंट्स की जरूरत है बराबर समझते रहना आज
- 8:14तक तुम धर्म को भी नहीं समझता है और अन्य समझने के कारण।
- 8:23धर्म ने आज तुम्हारी ये गति घस दी है।
- 8:27कोई भी मूर्ख आके धर्म की परभाषा कर देता है और तुम उसके पीछे हो
- 8:32लेते हो, शायद तुम्हें पहला व्यक्ति मिला होगा।
- 8:41जिसने कहा होगा कि धर्म दो हैं, एक भीतर का सहधर्म एक बाहर का
- 8:48कर्तव्य, धर्म तुम्हारा कर्तव्य क्या है?
- 8:55जीने हेतु तुम्हारा कर्तव्य क्या है?
- 9:00वो तुम्हारी आजीविका के लिए तुम जो काम करते हो और तुम्हारा
- 9:07स्वैधर्म क्या है? उसमें आजीविका का कोई स्वाद नहीं
- 9:13है, वो तुम्हारी बेसिक नीड जो है। वहाँ तक पहुंचना है उसके लिए क्या
- 9:22करें? अब इनको अच्छी तरह से समझ लेना।
- 9:25ये दो धर्म हैं। स्वय धर्म में कैसे जाया जाए और
- 9:33कर्तव्य धर्म में कैसे जाया जाए। कर्तव्य धर्म तुम कुछ भी हो सकते
- 9:41हो। डॉक्टर, खिलाड़ी, इंजीनियर,
- 9:48वैज्ञानिक, टीचर और बहुत से हैं और कोई पेंचर लगाता है।
- 9:56उसका धर्म है पेंचर लगाना। कोई डॉक्टर है, उसका धर्म है,
- 10:06रोगी को रोगमुक्त करना और ये कर्तव्य कर्म एक है स्वय धर्म की
- 10:14बात कृष्ण इस वक्त। स्वधर्म की बात करते करते कर्तव्य
- 10:25धर्म की बात को बीच में फंसा देते हैं बड़े जबरदस्त साइकोलॉजिस्ट
- 10:35ऐसे मनोवैज्ञानिक हैं कृष्ण के कर्तव्य कर्म को।
- 10:42स्वयधर्म में फंसा देते हैं और अर्जुन समझ नहीं सकता।
- 10:52इस उलझन को और कृष्ण की बराबर कोशिश है कि यह लड़े क्यों?
- 11:03क्योंकि लड़ना इस वक्त इसका धर्म है कर्तव्य था वैसे भी ये
- 11:12क्षत्रिय है, ध्यान रखना क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मण क्षत्र
- 11:22ये चारों अगर अपने धर्म को लीनता से निभाना शुरू कर दें तो ये स्वय
- 11:30धर्म में पहुँच जाएंगे। इस शब्द को फिर समझ रहे हो ये
- 11:36चारों जो वर्ण बनाए थे। इनको बाद में बहुत विकृत कर दिया।
- 11:41पांडव ने लालच के लिए नाम ले दिया।
- 11:50मन्नू का मन्नू कहते हैं कि ब्राह्मणों को दान करो।
- 12:02कृष्ण कहते हैं, भूखों को दान करो, जरूरत भूखों को है,
- 12:09ब्राह्मणों को स्वय धर्म तुम्हारा इस वक्त क्या धर्म है?
- 12:18और जीवन में बहुत से धर्म तुम्हें मिल जाएंगे।
- 12:21तुम चाहे टीचर हो, चाहे तुम डॉक्टर हो, चाहे तुम मजदूर हो,
- 12:32तुम सड़क पे जा रहे हो, कोई वृद्ध कर गया, तुम्हारा क्या धर्म है?
- 12:37उसको उठाना, अशक्त को सहारा देना देखना कोई चोट फुट लगी तो उसके
- 12:47करीबी डॉक्टर के पास जाके मर्म पट्टी कराना चैत हमारा धर्म है
- 12:51तात्कालिक धर्म। धर्म को किन्हीं और अर्थों से
- 13:02विकृत कर लिया गया और निजी फायदों के लिए उनका प्रयोग किया गया।
- 13:10लेकिन कृष्ण की ऐसी कोई तमन्ना नहीं है।
- 13:14कृष्ण बहुत ही ईमानदार हैं। कृष्ण बेईमानी को झेल नहीं सकते,
- 13:22कृष्ण अत्याचार को झेल नहीं सकते और पांडवों के ऊपर अत्याचार हुआ
- 13:29है। जो दंड उन्हें मिला वह सिर्फ।
- 13:35बेईमानी के कारण मिला जो जुआ खेला गया धृतराष्ट्र के द्वारा सबसे
- 13:43पहला कलंक लगाया गया धृत्य क्षमा करना, जो देश के द्वारा जो देश
- 13:49बड़ा सत्यवादी है। तो इंद्रप्रस्थ बड़ा शानदार बना
- 13:54दिया। उसने दुर्योधन की आंख थी,
- 14:03इन्द्रप्रस्थ बेईमानी खेली गई। मामा शकुनी को साथ लिया गया।
- 14:13और शतरंज जुआ खेलने का कार्यक्रम बनाया गया।
- 14:18उत्सव भी होते थे तब और उत्सव का एक रूप दे दिया गया कि चलो शतरंज
- 14:26खेलें, पाशा खेलें और पाशा फेंकने का।
- 14:31दक्ष शकुनि ने बेईमानी की बेईमानी से इंद्रप्रस्थ जीत लिया
- 14:40इंद्रप्रस्थ नहीं देता। पांचों पांडव जीत लिए सारा
- 14:48इंद्रप्रस्थ जीत लिया। सभी खजाना जीत लिया।
- 14:54सभी सेना जीत ली और यहाँ तक कि उनकी धर्मपत्नी द्रौपदी भी जीत
- 15:02लिया। बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है।
- 15:14उसके बाद फैसला हुआ कि चलो हम वापस कर देंगे।
- 15:20ध्यान रखने की सारी बेईमानी थी, चालाकी थी, शतरंज की बसातें थी
- 15:26राजनीतिज्ञों की। टेडीमेडी चालू में बोला व्यक्ति
- 15:32फंस जाता है राजनीति की टेडीमेडी चालू में युद्धस्तर भी फंस गया,
- 15:39बड़ा था छोटे भाई कुछ नहीं कह सकते, आज्ञाकारी थे पिता किस मानो
- 15:45से मानते थे। तो 12 वर्ष का वनवास एक वर्ष का
- 15:52अज्ञात वर्ष। उसके बाद तुम आओगे अगर ढूंढ लिए
- 16:00गए तो फिर 13 वर्ष अगर न ढूंढे गए तो तुम्हें तुम्हारा इंद्रबस्त
- 16:04मिल जायेगा। नहीं ढूंढे गए तो दुर्योधन ने सुई
- 16:15की तीखी नोक के बराबर भी तुम्हें जगह नहीं दूंगा।
- 16:20तुमने जो करना है कर लो बगैर युद्ध के।
- 16:26मैं कुछ देने वाला नहीं हूँ युद्ध करूँगा उसे मान था वैशम पे द्रोण
- 16:34पे कृपाचार्य पे अपने बहुल पे अपने शोभ्राताओं पे।
- 16:45युद्ध करो और ले जाओ, एक शर्त रख दी उसने कृष्ण शांतिदूत बन के आए
- 16:54पांच गांव ही दे दो, कहते तुम पांच गांव की बात मत करो, युद्ध
- 17:00करो, ले जाओ। कृष्ण को भी उसने चैलेंज कर दिया।
- 17:07ऐसे तो मैं सुई की नोंक के बराबर भी तुम्हें जगह नहीं देने वाला,
- 17:14युद्ध करो, ले जाओ स्पष्ट संदेश। कृष्ण ने युद्ध का विकल्प फूंका,
- 17:25युद्ध की घोषणा करके निकल गया ये है सारी कहानी अब युद्ध के मैदान
- 17:36में खड़े हैं दोनों। हम युद्ध के मैदान में नहीं खड़े
- 17:41हैं। ध्यान रखना जिन्होंने भी गीता का
- 17:46अनुवाद किया उनमें से कोई भी ना बाल गंगाधर तिलक जिन्होंने भी
- 17:55अनुवाद किया। वो युद्ध के मैदान में खड़े हुए
- 18:00अर्जुन से संबोधित नहीं थे। उन्होंने बड़ी शांतिप्रिय ढंग से
- 18:06अपने आश्रमों में बैठकर अपने महलों में बैठकर घरों में बैठकर
- 18:13झोंपड़ियों में बैठके। उसका अनुवाद किया।
- 18:23परिस्थितियां बिलकुल विपरीत कहाँ युद्ध का मैदान और कहाँ तुम्हारा
- 18:32शांत आश्रम मकान तो ध्यान रखना। के कृष्ण जो बोलते हैं वो
- 18:40तुम्हारे लिए आवश्यक हो। सारी बातें ये जरूरी नहीं है,
- 18:46इसलिए सभी 700 स्लोक का अनुवाद करने का कोई तुक नहीं बनता।
- 18:55सिर्फ वो ही श्लोक। जो तुम्हें जीवन की दिशा दे सकते
- 19:01हैं और संत का उद्देश्य ही यह होता है कि तुम्हारा जीवन कैसे
- 19:11सुख में हो जाए। कैसे तुम नाचो, कूदो खेरो, गओ
- 19:18हँसो बस यही उद्देश्य होता है संत क्योंकि संत खुशहाल हो गया है
- 19:30किसी एक तल पे जाके। उसके सारे भ्रम नष्ट हो गए और वो
- 19:37चाहता है कि तुम भी उस तल पे चले जाओ, यही उसकी आकांक्षा मात्र है।
- 19:44ये सारी गीता में से में कोई व्याख्याकार नहीं हूँ।
- 19:58और तुम कोई जंग नहीं लड़ रहे। युद्ध के मैदान में बोली गई गीता
- 20:07बहुत से श्लोक इसमें तात्कालिक वक्त की जरूरत के हिसाब से बोले
- 20:14गए। लेकिन आज तात्कालिक वक्त की जरूरत
- 20:18के हिसाब से मैं वही शब्द बोलूँगा, वही शुल्क उठाऊंगा जो
- 20:24तुम्हारी ज़िन्दगी को परिवर्तित कर सके।
- 20:27परिवर्तित तुम दुखी हो, निश्चित ही दुखी हो।
- 20:34आग लगी है। मन का वेग तुम्हें बड़ा तंग करता
- 20:40है, तुम्हारा मन हर वक्त चलता ही रहता है, कभी रुकता नहीं और तुम
- 20:49इस मन के चलने से बड़े दुखी हो। आज तुम्हारे लिए ये प्रश्न है उस
- 20:59वक्त अर्जुन के लिए वो प्रश्न था अर्जुन की जरूरत वो थी, तुम्हारी
- 21:08जरूरत कोई युद्ध जीत न है नहीं इसलिए आज के प्रसंग में।
- 21:13जो जो श्लोक तुम्हें अवश्य कहेंगे वो मैं उठाऊंगा।
- 21:18गीता के संदर्भ से उसे तुम्हे बताऊँगा।
- 21:23कृष्ण के तप पे जाके कृष्ण के हिसाब से कृष्ण से पूछ कर उसकी
- 21:30व्याख्या करो। सारी गीता के 700 शलोकों को कहने
- 21:38का कोई अर्थ नहीं बनता। यहाँ बहुत से अगर गौर से देखोगे
- 21:43तो सारी गीता में बात ही एक दो हैं, ज्यादा नहीं।
- 21:50उसी शब्द को दोहराया गया है, फिर फिर से पुनरुत्त किया गया है नैनम
- 21:57छिद्दंती शास्त्रण नैनम दहती पावका।
- 22:01इससे अगला क्या है? अछे देओ, अकले देओ असुष्य क्या
- 22:06फर्क हुआ इसमें? बहुत से समार्थ समान अर्थक शब्द
- 22:17बहुत से श्लोकों में बोले गए हैं और उनकी पुनवृत्ति करने की कोई
- 22:23आवश्यकता नहीं। मैं कोई व्याख्याकार नहीं हूँ।
- 22:29आपके जीवन को आज आपका ज्वरंत प्रश्न वो है तुम दुखी हो,
- 22:39निश्चित ही तुम दुखी हो और तुम। सुखी होना चाहते हो?
- 22:51तुम सुखी कैसे हो? ये भी तुम्हें बताऊँगा और फिर सुख
- 22:59से तुम्हें तृप्ति नहीं मिलेंगे। ये भी तुम्हें बताऊँगा।
- 23:04और फिर तृप्ति कहाँ मिलेंगे? ये भी तो मैं बताऊँगा।
- 23:08बस आज मेरे लिए यही युद्ध है, यही कुरुक्षेत्र है, आज कोई युद्ध
- 23:15नहीं हुआ, कोई झगड़ा नहीं है, कोई जमीन बांटी नहीं है, तो चलिए।
- 23:24हम इस शब्द को आगे लेके चलते हैं। कृष्ण धर्म दो तरह के बताते हैं
- 23:31सहधर्म पोष सहधर्म के बाद कर्तव्य, कर्तव्य, कर्म, कर्तव्य,
- 23:40धर्म। स्वय धर्म के लिए तुम्हें कुछ
- 23:46नहीं करना है और स्वय धर्म तुम्हारी मंजिल है।
- 23:54ये बिल्कुल आखिरी बात है जो मैंने कही के सुख से तुम्हें कुछ नहीं
- 23:58मिलेगा। सुख से सुविधाएं तो मिलेंगी,
- 24:06खुशहाली भी होगी, लेकिन सुख से आनंद नहीं मिलेगा और आनंद वो रस
- 24:13है जो तुम्हारे जन्मो जन्मो की तड़पन को मिटा देता है, आनंद के
- 24:21बिना। ये गीता सम्पूर्ण नहीं होता है।
- 24:27अगर तुम जीस तन पे जाके कह दोगे नष्टो मोहा समृति लब्धा वह आनंद
- 24:34का क्षण नष्टो मोहा। मेरा मुँह टूट गया, इल्लुसिओन बंक
- 24:43हो गया, समृद्ध लब्धा मुझे याद आया मैं कौन उसी क्षण आनंद की
- 24:56ज्ञान, गंगा का रस? तो मैं प्रवाहित होना शुरू हो
- 25:02जाएगा और इसी ज्ञान गंगा आनंद के रस को पीकर इतना साहस आ जाता है
- 25:13कि अर्जुन अपना फेंका हुआ गाड़ी भनोक्ष उठा लेते हैं।
- 25:18मैं युद्ध करूँगा। मैं युद्ध करूँगा वासुदेव और इसी
- 25:26ज्ञान गंगा के आनंद रस को भी कर तुम भी कहोगे, मैं जीऊंगा।
- 25:38उस सतर्क पे जीऊंगा जहाँ खुमारी ही खुमारी है, आनंद ही आनंद है,
- 25:46सुगंध ही सुगंध है, झरोखे, झरने बहते हैं, हवाएं चलती हैं।
- 25:59और मंद मंद मुस्कान तुम्हारे होंठों पे चला रहे थे तुम्हारा
- 26:05रोम ब्रोम तृप्त रहता है। उस अवस्था में तुम्हें पहुंचाना
- 26:14मेरा लक्ष्य है। मैं चाहता हूँ तुम भी वहाँ पहुँचो
- 26:23और मैं जो कोई किताबों से ज्ञान ले के नहीं बोल रहा हूँ अब यहाँ
- 26:29थोड़ा सा हम इस प्रसंग को बाद में शुरू करेंगे, तो मैं समझा दूंगा।
- 26:39अज्ञानी व्यक्ति पहले शास्त्रों को पढ़ता है फिर साधन करता है।
- 26:45ध्यान रखिएगा मेरी बातों को और इसमें से कुछ निकलेगा।
- 26:53वो तुम्हारी समझ में आ जाए तो तुम धन्य भागी हो।
- 27:00अज्ञानी व्यक्ति पहले शास्त्रों को पढ़ता है।
- 27:07अज्ञानी व्यक्ति पहले शास्त्रों को पढ़ता है।
- 27:11मैं बार बार बोल रहा हूँ। फिर वह परमात्मा की तरफ जाने की
- 27:20चेष्टा करता है। ऐसा व्यक्ति परमात्मा तक
- 27:27पहुंचेगा। करीब करीब।
- 27:32नामुमकिन है। गबराना मत थर्राना मत मेरी बातों
- 27:35से और तुम सभी ये कर रहे हो अज्ञानी व्यक्ति सबसे पहले
- 27:48शास्त्रों को पड़ेगा फिर परमात्मा की खोज में निकलेगा।
- 27:59ज्ञानी व्यक्ति पहले परमात्मा को पिएगा, फिर उसके रस को बांटेगा।
- 28:05यही फर्क है ज्ञानी और अज्ञानी के भीतर इस शब्द को फिर समझो,
- 28:14क्योंकि इसकी बड़ी आवश्यकता है आज।
- 28:17सारे संसार को आवश्यकता है, सारा संसार उलझा हुआ है।
- 28:25अज्ञानी व्यक्ति पहले सूचनाओं को संग्रहित करेगा और जिसने सूचनाएं
- 28:32संग्रहित कर ली वो तो गया। वो न पहुँच पाएगा।
- 28:40तुम कहोगे बाबा क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?
- 28:43हाँ बिल्कुल खराब हो गया। जो ऐसी अटपटी बातें करता है जो
- 28:51किसी शास्त्र में वर्णित नहीं है। मैं शास्त्रों से कोई लेना देना
- 28:56नहीं, मैंने जीवन से कुछ लेना है और जीवन ही तुम्हें सीखाना है,
- 29:02जीना ही तुम्हें सीखाना है इसलिए रोज़ कहता हूँ सूचनाओं को
- 29:09संग्रहित मत करना। देखिये मेरी एक बात सुनिए।
- 29:14जितनी सूचनाओं का संग्रह होगा आपके निग्रांज में उतना तुम
- 29:19स्वेतक पहुंचना मुश्किल से मुश्किल मुश्किल से मुश्किल और
- 29:25फिर एक वक्त ऐसा आएगा कि असंभव हो जायेगा असंभव नामुमकिन।
- 29:36ज्ञानी क्या करता है? ज्ञानी किसी शास्त्र को नहीं
- 29:42पढ़ता ज्ञानी सीधा कूड़ा कागज़ अपने भीतर उतरता है पर बड़ा आसान
- 29:54है। कोरे कागज़ के लिए परमात्मा तक
- 30:00पहुंचना बड़ा आसान है। इसलिए मैं कहता हूँ कि 25 साल जो
- 30:09पहला बनाया था आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम।
- 30:15तुम्हें इस बात का पता नहीं। ब्रह्मचर्य आश्रम में ही व्यक्ति
- 30:21इस अवस्था में व्यक्ति उस तल को छू ले सब है उसके पास।
- 30:31जो पतंजलि ने महावीर ने बुद्ध ने शर्तें लगाईं, सत्य बोलता है वो
- 30:37गुरुकुल में रहता है, हिंसा नहीं करता, चोरी नहीं करता क्योंकि
- 30:45चोरी करने जैसा कुछ है नहीं। गुरुकुल में भर पेट भोजन मिल जाता
- 30:50है। अच्छी नींद लेता है कोई फिक्र
- 30:54नहीं होता, कारोबार का सत्य है, अहिंसा है, अस्त्रि है,
- 31:01ब्रह्मचार्य तो है वहाँ कानूनन है गुरूपुर में 25 वर्ष तक
- 31:07ब्रह्मचारी। अब प्रियग्रह जोड़ता कुछ है नहीं,
- 31:12जोड़ने को है भी क्या? यहाँ से चले जाना है ये पांचों की
- 31:18पाँचों शर्ते और उससे आगे नियम की पाँचों शर्ते सोच, संतोष, तप,
- 31:22स्वाध्याय, ईश्वर प्राणी था। ये ब्रह्मचर्य आश्रम में सिखाई गई
- 31:28थी। और ये दसों की दसों गुरुकुल में
- 31:33सिखाई जाती थी और तुम ये मत सोचना के गुरुकुल से आकर व्यक्ति तत्व
- 31:43में लीन होता था और पृमात्मा को पा जाता था।
- 31:45तुम इस गलती में मत आना। मैंने उन युगों को जिया है, मैं
- 31:53तुम्हें पहले भी बताया हूँ, पर मैं कोई ऐसी बात नहीं कहता जो
- 31:59शास्त्रों से बड़ी हो। शास्त्रों से मेल खा जाए तो बात
- 32:03अलग है, शास्त्रों से मेल खाएगी ही।
- 32:08क्योंकि एक अकेले व्यक्ति का यह अनुभव नहीं है।
- 32:13कोई भी पहुँच सकता है। इसके ऊपर कोई एकाध कार सर्व
- 32:18सुरक्षित नहीं है। इसके ऊपर सभी का अधिकार है।
- 32:22जो भी वहाँ पहुंचा उसने जान लिया। ब्रह्मचार आश्रम के 25 वर्ष पूरे
- 32:32होते होते सभी के सभी उस तल को छू लेते थे।
- 32:44फिर मज़ा आता था गृहस्थ का फिर मज़ा आता था वाण वस्त का और फिर
- 32:53मज़ा आता था सिन्हस का। तुम बिल्कुल उल्टा आज बिल्कुल
- 33:01उल्टा पाश्चात्य ने बिल्कुल उल्टी पर नाली विकसित कर दी है।
- 33:09ब्रह्मचर्य आश्रम में जितना खोया जाता है, खोया जोड़ा जाता है तो
- 33:19सूचनाएं सूचनाओं को जोड़ लो। आई ए एस कर लो यूपीएससी का एग्जाम
- 33:27दे दो जाजू बन जाओ कोलेक्टर लग जाओ तुम्हारे पास, आज डिग्रीज़
- 33:33हैं क्षमा करना प्रबुद्धता नहीं। तुम्हारे पास डिग्रीज़ है कागज की
- 33:50और तुम क्वालिफाइड हो, लेकिन तुम्हारे पास बुद्धा नहीं है,
- 33:55प्रबोध नहीं हो तुम। गलती ये हो गई कि तुम सूचनाओं को
- 34:01प्रबुद्धता मान बैठे यहीं तुम मार खा गए और मैं काले ने बड़े से
- 34:11बड़ा ध्वंस मैं काले ने। बड़े से बड़ा ध्वंस अगर
- 34:20हिंदुस्तान का किया तो गुरुकुल पद्धति का छीन जाना था।
- 34:27पहले 25 वर्ष इतने निर्दोष होते हैं और मैं तुम्हें एक बात बता
- 34:36दूँ। 12 वर्ष की उम्र तक तुमने जो सीख
- 34:38लिया वो तुम्हारी ज़िन्दगी भर की सम्पदा है, उसके बाद तुम कुछ सीख
- 34:43नहीं पाते। सीख जिसे मैं कहता हूँ, जो आंतरिक
- 34:48प्राणों में उतर जाती है, वो सीख उसके बाद तो सिर्फ न्यूरोन् में।
- 34:54जमी हुई धूल रह जाती है सूचनाएं सूचनाओं का संग्रह मात्र तुम कर
- 35:01पाते हो जिसे मैं सीख कहता हूँ। जिससे शिक्षत उत्पन्न होता है वह
- 35:1012 वर्ष की उम्र तक। तुम सीख लेते हो और उसके बाद धीरे
- 35:17धीरे धीरे 25 वर्ष तक तुम अपना शिष्यत्व पूरा कर लेते हो।
- 35:23ये थीं प्रणाली हमारे गुरुकुल के इन्वेंशन थी, लेकिन मैकाले ने
- 35:29हमारे लिए पद्धति छीन ली। बड़ा शैतान था, बड़ा शैतान था,
- 35:39जड़ तक चला गया कि ये लोग इतने समझदार क्यों हैं, इतने आज्ञाकारी
- 35:48क्यों हैं? इतना मिठास क्यों है इनके भीतर?
- 35:55क्या है खूबी? और वो जड़ तक गया।
- 36:01जड़ तक जाकर उसने कुछ लोगों का सहारा लिया।
- 36:05जयचंद्र जैसे लोग भी होते हैं। उन्होंने बता दिया अगर कि ये
- 36:11पद्धति अगर छीन लेंगे इनसे तो हिंदुस्तान में और कुछ भी नहीं
- 36:15है। पर उसने गुरुकुल पद्धति छीनी,
- 36:20कॉन्वेंट पद्धति शुरू कर दी, आज कॉन्वेंट स्कूल्स के भीतर।
- 36:27हम अडमिशन कराने के लिए बच्चों को तरसते हैं और कॉनवेंट को चलाने
- 36:36वाले लोग महामूर्ख होते हैं। उनमें कोई किसी प्रकार के समझ
- 36:45नहीं होते। जिन्हें मैं समझ गया था।
- 36:52पाश्चात्य ने पूर्व को इससे बड़ा नुकसान और कुछ नहीं दिया।
- 36:57उन्होंने हमारी विद्या ही छीन ली। जो हमारी जान थी, जो हमारे जीने
- 37:03का ढंग था वो छीन लिया। इससे बड़ा वो नुकसान हमें दे भी
- 37:12नहीं सकते थे। सवै धर्म, कर्तव्य, धर्म।
- 37:26कृष्ण बताते हैं इस वक्त कर्तव्य, धर्म और कृष्ण कहते हैं अर्जुन को
- 37:33हे अर्जुन, अब तो तेरा स्वय धर्म। ये समझ के कर्तव्यधर्म ही तेरा
- 37:42स्वयधर्म है क्योंकि कृष्ण बखूबी जानते हैं कि स्वयधर्म तू कहीं
- 37:48जाता नहीं है। उसको पाने के या उसको छोड़ने की
- 37:56बातें बेकार हैं। वो ना कभी हमसे अलग हुआ है और ना
- 38:04हम उसको अलग कर सकते हैं। सदा से हमारे साथ है और सदा हमारे
- 38:10साथ रहेगा। उसको पानी खोने का स्वाद ही कहाँ
- 38:14उठता है? स्वयं धर्म की बात मत कीजिए।
- 38:18अष्टावक्र कहते हैं कि तुम जो हो उसे कभी खो नहीं सकते हैं।
- 38:29यू कैनट लूज़ यूरसेल्फ़ बात ठीक है।
- 38:36तुम अपने आप को खो नहीं सकते और कृष्ण भी जानते हैं कि स्वय धर्म
- 38:44को ना तो पाया जाता है, ना खोया जाता है।
- 38:48स्वय धर्म तो अटल है, अचल है, निष्कम्प है।
- 38:54उसको खोना और उसको पाना दोनों बातें मूर्खता की अगर तुम कहते हो
- 39:02कि मुझसे मेरा स्वय धर्म छीन लिया, आनंद छीन लिया तो तुम गलत
- 39:06हो, आनंद तो तुम्हारे भीतर है, तुमने तल बदल लिया।
- 39:16तुम शांत जगहों से उठकर लड़ाई झगड़े वाले स्थान पर तुम चले गए
- 39:26तुम अपने शांत घर को छोड़ दिया। उस घर में चले गए जहाँ लड़ाई है,
- 39:35झगड़ा है, दुख है, संतप है, दर्द है, पीड़ा है, चिंता है, चिन्तनाय
- 39:42है, तुम उठे हो, तुमने सहधर्म को छोड़ दिया, और तुम?
- 39:50स्वय धर्म से परे निकल गए और वहाँ का दुख वहाँ का दर्द, वहाँ की
- 39:58पीड़ा, वहाँ की चिंता, वहाँ का तनाव तुमने अपना जान लिया, यही है
- 40:08तुम्हारा ब्रह्म। और कृष्ण कहते हैं ये बात क्षणभर
- 40:14की है। अष्टावक्र कहते हैं क्षणभर की बात
- 40:19के लिए सारे जीवन तुम परेशान होते हो, जिंदगियां दांव पे लगा देते
- 40:25हो फिर आते हैं लोभी लालची। दुष्ट गुरु जो कहते हैं हम
- 40:31तुम्हें पहुंचा देंगे ये लो पांच ये लो राधे राधे ये लो राम राम
- 40:39तुम पहुँचोगे कृष्ण कहते हैं राम राम राधे राधे पांच नम तुम्हें
- 40:46नहीं पहुंचाएंगे। तुम पहुंचे ही हुए हो और जो
- 40:51पहुंचा ही हुआ है, उसका पहुंचने का सवाल ही नहीं पैदा होता कि वह
- 40:59कोई तरकीब, लड़ाई, कोई विधि अपनाई, कोई फॉर्मूला अप्लाई करे।
- 41:06किसी मंत्र का उपयोग करें। सवाल ही नहीं पैदा होता।
- 41:13कृष्ण कहते हैं, स्वय धर्म वह जिसे तुम छोड़ नहीं सकते भला राधे
- 41:23राधे के सहारे। तुम अपने तक कैसे पहुंचोगे कोई
- 41:28तर्क है तुम्हारे पास पांच नाम के सहारे राम राम के सहारे तुम स्वे
- 41:36तक कैसे पहुंचोगे? कोई तर्क है तुम्हारे पास नहीं
- 41:42है, है भी नहीं। सत्य भी यही है।
- 41:45तुम अपने आप को कभी खोये नहीं तुमने क्या किया है तुमने अपने उस
- 41:52शांति निकेतन को छोड़ दिया है जहाँ शांत गंगा की निर्मल धारा
- 41:58बहती है जहाँ ठंडी हवाएं चलती हैं जहाँ सुगंधित।
- 42:05बाग बगीचों से लिपटी हुई हवाएं तुम्हें उद्वेलित करती हैं।
- 42:11तुम्हें शांति देती हैं तुमने वो स्थान छुड़ा वह स्थान तुमसे दूर
- 42:17नहीं गया यहाँ समझने जैसी बात है, वह स्थान तुमसे दूर नहीं गया, वह
- 42:23स्थान तो वहीं है। और वही रहेगा तुम वहाँ से छंट के
- 42:30तुम वहाँ से दूर निकल गए तो? दादू कहते हैं, तुम निकले हो दू
- 42:39से तुम दूसरे स्थान पर आ गए हो। तुमने अपने आप पर छोड़ दिया जब
- 42:49तुम वापस आओगे तो पाओगे दादू दूजा को नहीं दूजी मन की दौड़ मन की
- 42:57दौड़ के पीछे लग गए और तुमने अपना घर छोड़ दिया और तुम्हारा घर।
- 43:03शांति का पूंज है, शांति का खजाना है, शांति का सरोवर है, वह तो
- 43:11वहीं है, दूजी मन की दौड़ तुम्हारे मन की दौड़ के पीछे तुम
- 43:18लग गए और तुम भटक गए। दौड़ मिट्टी अब वो ढंग बजाते हैं
- 43:30ढंग वो ही जीस रास्ते से गए थे। उसी रास्ते की तरफ़ बैठ कर लो,
- 43:39दूसरी तरफ़ मुख कर लो। दौड़ गई।
- 43:45संशय मिटा जैसे ही तुम्हारी दौड़ समाप्त हो जाती है तो तुम्हारी
- 43:54संशय मिट जाते हैं। क्या कहा?
- 43:56अर्जुन ने आखिर में क्या कहा? स्मृति रल्ला बुद्ध मुझे याद आया,
- 44:13मुझे याद आया मैं को नष्टो मोहा मेरा इल्यूज़न।
- 44:20समाप्त हुआ। जब दौड़ बैठती है तो इल्यूश़न
- 44:27समाप्त होता है और दौड़ कब मिटती है?
- 44:30जीस तरफ पिट थी उस तरफ मुख कर लो जीस तरफ मुख था उस तरफ पिट कर।
- 44:37श्री कृष्ण गोबिंदु। हरे मुराई हिनाथ नारायण वासुदेव
- 44:55श्री कृष्ण गोविंद अरे मुरारी हेनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण
- 45:13गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 45:32पितमात स्वामी सखा। हमारे पिता मात स्वयं सखा हमारे
- 45:50अनाथ नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी
- 46:08अनाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद।
- 46:16अरे मुरारी पितमात स्वामी सखा, हमारे पितमात स्वामी सखा हमारे।
- 46:34हेना थनरा यन वासुदेव, श्री कृष्ण बिंद हरे मुरारी।
- 46:52नाथ नारायण, वासुदेव। धन्यवाद।