Latest / Baba ji Vijay Vats / 1/3/26 - कर्म का सिद्धांत और साक्षी भाव!! आनंद का मार्ग: केवल दृष्टा बनें!
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- 0:03कर्ता और भोक्ता इनका संबंध बाबा जी कृपा करके फिर समझाने का कष्ट
- 0:14कर करता कौन? देखिए शरीर जड़ पांच तत्व का
- 0:30पुतला कुछ नहीं कर सकता। जड़ का अर्थ ही ये होता है।
- 0:39जो कोई क्रिया स्वयं से न कर सके हो जाग और आत्म चेतन चेतन का अर्थ
- 0:57जो। शक्तिमान है सिर्फ शक्ति शक्ति को
- 1:05चेतन और शरीर को जड़ है। ये दो चीजें हैं ना तो अकेला शरीर
- 1:14काम कर सकता है, जड़ है पत्थर पड़ा है।
- 1:19अगणी अलग है वायु अलग, धरती अलग और ये आकाश अलग, ये पांचों अलग
- 1:30अलग पड़े सभी जड़। इनमें से चेतन कोई भी और अगर कोई
- 1:45एक धर्म इस आकाश को आत्मा मानता है तो वो मूर्ख है।
- 1:58मैंने एक ऐसे धर्म का उल्लेख किया था जो कहता है कि नैनम चिन्दन
- 2:07तीर्थस्त्र्राणी ये आकाश अगर इसमें से तलवार फेंक दे तो यह
- 2:13कटता है नैनम दहती पांव का इसमें आग जला दे।
- 2:19तो यह जलता नहीं न चैनम क्लेदन त्याग न सुसती मारता ना पानी।
- 2:29इसे गीला कर सकता है बारिश पड़ती है बारिश पड़के हट जाती है आसमान
- 2:35ये आकाश। कब गीला होता है, ना ही वायु इसे
- 2:43सुखा सकती है। लो चलती है, ठंडी हवा चलती है,
- 2:50इसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भगवान कृष्ण का ये शब्द एक धर्म
- 2:57में अपने हित के लिए प्रयोग कर लिया है।
- 3:03क्या नैनम छिदंती शस्त्रण जो शस्त्रों से काटा न जा सके ठीक?
- 3:14आकाश वस्त्रों से नहीं कर सकता, धरती वस्त्रों से कट सकती है, हल
- 3:24चलाते हैं धरती की छाती सिर्फ। नैना दहती पांव आग उसे जलाने से
- 3:41आप आग जला दो ये आकाश को कोई हानि नहीं पहुंचेगी बिलकुल ठीक।
- 3:52लेकिन आग जला दो, पानी वास्को बन जाएगा, पानी का बिगड़ेगा न चैनम
- 4:02केलेदन त्याग को न सुस्ति। पानी उसे भौह नहीं सकता।
- 4:13बारिश गिरती है ये भीतर है। नहसोशती मारो गर्म हवाएं चलती
- 4:20ठंडी हवाएं चलती आकाश का कुछ नहीं बिगड़ता, इन शब्दों का सहारा ले
- 4:27के व्याख्या करता है ये धर्म। कि यह आकाश ही परमात्मा है, लेकिन
- 4:34वो भूल गया। बाकी तो सब ठीक चार शब्द बिल्कुल
- 4:40ठीक लेकिन पांचवा शब्द भूल गया कि ये आकाश चेतन का चेतनता को वो
- 4:51धर्म खा गया, इस आकाश में चेतनता कहाँ गया?
- 5:05इसलिए ये धर्म प्रभावित प्रज्ञा मूर्ख लोग।
- 5:15इस भगवान कृष्ण के शब्दों के द्वारा व्याख्यात वो समझ भी गए कि
- 5:25ठीक बिल्कुल ठीक। ये अवकाश के लक्षण हैं, लेकिन
- 5:29आकाश के लक्षण नहीं हैं। आकाश पांचवें तत्व के रूप में
- 5:34जाना जाता है जो कि चारों तत्वों को लपेटता है।
- 5:38गठरी की तरह हम बाजार से कुछ चीज़ लेने जाते हैं, तो गठरी साथ लेके
- 5:46जाते। इसमें बांध के ले आएँगे।
- 5:49धरती खरीदते हैं, जल खरीदते हैं, अग्नि खरीदते हैं, पानी खरीदते
- 5:55हैं, ये सारा खरीद के हम आकाश में उसकी पोटली बांध के ले आते हैं तो
- 6:02ये पोटली पांच तत्व। आकाश में बंधी हुई है चारो दोस्त
- 6:11लेकिन चेतन्य ये शरीर पांच तत्वों का पुतला है लेकिन इस शरीर से परे
- 6:21एक सत्ता है। जो चेतन है उसको हम आत्मा कहते
- 6:26है। वो कहाँ गया?
- 6:30उसका जिक्र ये धर्म नहीं करता इसलिए इस धर्म को सिद्ध पुरुषों
- 6:40ने नकार दिया कि ये कोई धर्म नहीं।
- 6:43ये सिर्फ धीमागी व्याख्या, तर्क जैसे एक मशीन है, पानी चढ़ाने
- 6:55वाली पंप है सभी चीजें हैं। लेकिन पावर के बिना कुछ चलेगी केस
- 7:06पावर के बिना कुछ चलेगी तो आपने पूछा करता और भोगता इनका फिर
- 7:17अच्छी तरह से विश्लेषण कीजिए। सुनिए।
- 7:22शरीर मुर्दा पांच तत्वों का पुत्र लेकिन शरीर मुर्दा है।
- 7:32अपने आप से कोई काम नहीं कर सकता इसलिए जैसे ही आत्मा निकल जाती
- 7:37है, शरीर से संबंध विच्छेद कर लेती है।
- 7:40शरीर कोई काम नहीं कर सकता। यहाँ तक के हेल भी नहीं सकता एक
- 7:49सिर का बाल तक नहीं हिल सकता इतना अचेतन है इतना जड़ हो जाता है चल
- 7:56रहा था किसके सहारे पावर के सहारे वो पावर क्या थी?
- 8:02आत्मा पूरन जड़ शरीर पूरन चेतन आत्मा अब ना तो जड़ कर्म कर सकता
- 8:20है। ना चेतना कोई कर्म करती है, इसको
- 8:23ठीक से समझी ये बर्फ़ जग रहा है ऊपर पावर के द्वारा रोशन आई है इस
- 8:35बल्ब की इस बल्ब के। बीच में से पावर गुजरी तो यह
- 8:42प्रकाशित हुआ बल्ब और अपने प्रकाश को विकिरण करने लग गया ऊपर बल्ब
- 8:51है प्रकाशमान है। किसके कारण प्रकाशमान है विद्युत
- 8:56के कारण? विद्युत इसमें प्रवाहित हो रही है
- 9:00तो यह बल प्रकाशमान हो रहा है और अपने प्रकाश को बिखेर रहा है,
- 9:09लेकिन अगर इसकी पावर को खींच लिया जाए, बिजली चली जाए।
- 9:15हम बटनों को बंद कर दे, तो क्या ये अपने से चल रहा था?
- 9:27ये अपने से नहीं चल रहा था। ये मुर्दा बल्ब है, ये प्रकाशमान
- 9:34होगा सिर्फ तब। जब ऊर्जा का सहयोग इसके साथ होगा
- 9:39तो हमने बटन को ऑन कर दिया। इसके बीच में से गुजरी विद्युत
- 9:44इसके बीच में से गुजरी तो इसने प्रकाश फेंकना शुरू कर दिया।
- 9:51तो ये घटना कैसे है? घटी।
- 9:54जड़ और चेतन के संयोग से ये शरीर बोलता कैसे है?
- 10:04जड़ और चेतन के संयोग से ये शरीर जड़ आत्मा चेतन।
- 10:12जैसे ही आत्मा इस शरीर में प्रवेश करती है तो यह कार्य करना शुरू कर
- 10:18देते है। जैसे ही वो चेतना शरीर से बाहर
- 10:22निकल जाती है, जैसे ही बल बूझ जाता है, ऐसे शरीर जड़ हो जाता
- 10:26है, मुर्दा हो जाता है। करता को अगर इस बिजली के बल्ब के
- 10:37नीचे मैं किसी को लंगर चकाने शुरू कर देवरात्रि का वक्त इसकी रोशनाई
- 10:45के भीतर। मैं किसी को पुण्य कर्म पर किसी
- 10:53को भूखे को भोजन कराना शुरू कर दूँ तो उसका पुण्य इस प्रकाश को
- 11:01लगेगा नहीं लगेगा और अगर मैं इसकी रौशनायी में।
- 11:10किसी की हत्या कर इसकी पीठ में छुरा घोंपे।
- 11:15तो क्या उसकी हत्या का पाप इस रोशनाई को लगेगा?
- 11:22विद्युत को लगेगा नहीं लगेगा। तो इस रोशनाई के नीचे पुण्य करो
- 11:32या इस रोशनाई के नीचे पाप करो उसकी जिम्मेवार यह है विद्युत
- 11:39नहीं है, यह पावर नहीं आत्मा एक पावर एनर्जी।
- 11:49इस एनर्जी के प्रभाव से हमारा शरीर गतिमान है।
- 11:55अगर इस एनर्जी की पावर को लेकर कुछ गलत कर्म होता है उसका पति
- 12:06कौन? और अगर इस एनर्जी के सहयोग से इस
- 12:13शरीर से कोई पाप कर्म होता है या पुण्य कर्म होता है तो उसका
- 12:18जिम्मेदार। आपने चारा काटने की मशीन देखी
- 12:35होगी। चारा काटने की मशीन के दोनों तरफ।
- 12:45दो तीखे पंख लगे, बीच में गरारी होती उसमें किसान लोग चारा फसा
- 12:55देते हैं। पूरा चारा जो काट के ले के आते
- 13:00हैं। और उस गारारियों के द्वारा वो
- 13:07ब्लेड जो होते हैं वो उस चारे को छोटे छोटे भागों में काट देते
- 13:12हैं, जौ के पशुओं के खाने के युग बन जाते हैं।
- 13:20अब वो जो मशीन है। जिसमें ब्लेड लगे हैं।
- 13:27वो मशीन जड़ अगर बिजली ना हो तो वो नहीं चलेगी।
- 13:36उसको पावर के बिना शक्ति के बिना नहीं चलाया जा सकता।
- 13:47जैसे ही शक्ति आयी, पावर हमने छोड़ी और मशीन ने चलना शुरू कर दी
- 13:54और चारा काटना शुरू कर दिया। यहाँ तक ठीक है, ये सारे कर्म हो
- 14:04रहे हैं। मशीन चल रही है विद्युत के द्वारा
- 14:09चल रही है चारा कट रहा है, सारे कर्म हो रहे हैं ठीक मशीन चल रही
- 14:20है, मशीन जड़ है पावर के कारण चल रही है।
- 14:25पावर चेतन हैं। इन दोनों के सहयोग से मशीन कर्म
- 14:30कर रही है। क्या कर्म कर रही है चारा काटने
- 14:33का? लेकिन अगर हमने गलती से या
- 14:40जानबूझकर? अपना हाथ उस चारे के मशीन के भीतर
- 14:45फंसा दिया तो क्या होगा? वो हाथ को भी ब्रेड कट थे।
- 14:57कसूर किसका? कसूर हाथ डालने वाले का चाहे उसने
- 15:11चेतन चाहे उसने अचेतन चाहे उसने बेहोशी में चाहे उसने जान के वो
- 15:19हाथ उस। चारे की मशीन में दिया तो हाथ कट
- 15:22गया। इसलिए मैं कहता हूँ कि जो कर्म
- 15:26तुमसे चेतना में होता है और जो कर्म तुमसे अचेतना में होता है,
- 15:33उसका फल समान होता है, तुम ये नहीं कह सकते।
- 15:38कि मेरे से गलती में हो गया ये काम आपको फल प्रकृति उतना ही देगी
- 15:43जैसे आग में हाथ ढल जाए, गलती से डले हाथ जलेगा, आग नहीं देखेगी के
- 15:54इसने हाथ जानबूझ के मेरे में फेंका।
- 15:58या गलती से मैं कर हाथ जलेगा? अग्नि का यह स्वभाव अगर आप हाथ को
- 16:06अग्नि में डालो हाथ कटेगा अगर आप हाथ को चारे के मशीन में डालो।
- 16:17गलती से चला गया तो भी कटेगा, जानबूझकर दे दिया तो भी कटेगा अगर
- 16:27गलती से हाथ आग में चला गया तो जलेगा जानबूझकर अगर आग में हाथ दे
- 16:34दोगे तो भी जलेगा। इसका अर्थ कर्म चाहे बेहोशी में
- 16:41हो, चाहे होश में हो, बिलकुल उनका फल यकसा होता है।
- 16:50कोई बेहद नहीं है। प्रकृति ये नहीं देखती।
- 16:55कि आपने कतल शराब पीके मूर्छित होके किया है या आपने कतल बाहोश
- 17:05किया है, बेहोश किया है या बाहोश किया है प्रकृति ये बात की है
- 17:13प्रकृति ये देखती है। कि तुमसे ये कर्म हुआ है, प्रकृति
- 17:22आपको कर्म का फल देखती है, इससे आगे की बात थोड़ी समझी हूँ।
- 17:34अब कुछ लोग कहते हैं की भावनाओं का इसमें बहुत योगदान है।
- 17:46अगर आप आपकी आग में हाथ डालने की इच्छा होगी, अग्नि तो भी उतना ही
- 17:56जलायेगी। अगर आपकी आग में हाथ डालने की
- 18:00इच्छा नहीं होगी और हाथ आग में ढल जाएगा, अग्नि फिर भी हाथ को उतना
- 18:07ही जलाये। चारा काटने की मशीन में अगर आपकी
- 18:13इच्छा होगी कि हाथ दे दें तो भी उतना ही कटेगा।
- 18:17अगर आपकी इच्छा के विपरीत आपका हाथ चला गया चारे की मशीन में तो
- 18:25भी उतना ही घटेगा। कर्म मोर्चा में करो या अमुरक्षित
- 18:33करो, कर्म का फल उतना ही मिलेगा। भावना इसमें कथी स्मृति कर्म के
- 18:45मामले में भावना का कोई योगदान कर्म प्रकृति के हिसाब से कर्म का
- 18:56फल। किस संभावना से किया गया कर्म कोई
- 19:03मत अगर डक्ट आपका पेट काट। उतना ही दर्द होगा अगर वो आपको
- 19:20एनेस्थीसिया न दे और अगर कोई आदमी अत्यारा आपके पेट में छूरा मार
- 19:28देता है, दर्द फिर भी होगा लेकिन भावना इन दोनों अलग।
- 19:35डॉक्टर की भावना आपको रोग मुक्त करने की है।
- 19:39हत्यारे की भावना आपको दुख पहुंचाने की, दर्द पहुंचाने की,
- 19:44उसकी भावना का, आपके ऊपर का असर का कोई असर?
- 19:54आपके लिए उसकी भावना डॉक्टर की भावना आपके रोग को दूर करने की
- 20:00है। जो आपका खराब पुरुष है वो काट
- 20:04देना चाहता है कैंची के द्वारा और जो हत्यारा है आपके पेट में।
- 20:13कोई ओजार मारता है आपको दुख देने के लिए डॉक्टर आपका ऑपरेशन करता
- 20:18है। आपको सुखी करने के लिए दुकारने के
- 20:23लिए भावनाओं दोनों की अलग अलग इस्तेमाल किया गया इन्स्ट्रुमेंट
- 20:29एक बराबर काटने वाला। तो यह भावना क्या काम करेगी?
- 20:37कोई काम नहीं, भावना का, कर्म के अंदर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- 20:46किस भावना से कृत्य किया गया, इसमें कोई फर्क नहीं।
- 20:53कर्म का सीधा सीधा फल मिलता है तो फर्क किस चीज़ का पड़ता है, फर्क
- 21:05पड़ता है करतापन का? बिजली के कारण ऊपर पंखा चल रहा
- 21:14है। पंखा, जड़, बिजली, चेतन बिजली
- 21:19पंखे के बीच में से गुजर रही है। पंखा हवा दे रहा मैं उस हवा का
- 21:27लुत्फ ले रहा। ध्यान से संत पंखा जड़ है शरीर
- 21:37जड़ विद्युत पंखे के बीच में से गुजर रही है, पावर इलेक्ट्रिसिटी
- 21:44बिजली पंखा घूम रहा आत्मचेतन। आत्मा के बैठे बैठे शरीर बोलता
- 21:55है, आँखें देखती है, कान सुनती हूँ, सारे कर्म हो रहे हैं, पंखा
- 22:00घूम रहा है, शरीर कर्म कर रहा है, फर्क कहाँ पड़ता है अगर मैं।
- 22:11चलते पंखे के ब्लेड्स के अंदर हाथ दे दो।
- 22:19क्या हुआ आज कट गया। कर्मचारी सृष्टि में हो रहे हैं।
- 22:31फिर समझे कर्म सारी सृष्टि में हो रहे हैं और कर्मफल भी सारी सृष्टि
- 22:43में कर्मों के अनुसार मिल रहे हैं।
- 22:47कर्म हो रहे हैं चेतन और जड़ के मिलान के कारण कर्मफल हो रहे हैं।
- 22:58पंखा जड़ बिजली चेतन चेतन जड़ में से गुजरा।
- 23:06पंखा चला हवा दी हवा उसका फर्क सब ठीक चल रहा है, कर्म सारा चल रहा
- 23:16है लेकिन अगर मैंने पंखे में हाथ डाल रहा है, हाथ कटेगा इसका अर्थ।
- 23:25अगर कर्म चलते हैं प्राकृतिक व्यवस्था में और आपने उसमें कोई
- 23:32व्यवधान खड़ा किया, आपने कर्ता बनने की चेष्टा की तो आप भोक्ता
- 23:42भी बन जाओगे। आपका हाथ भी।
- 23:47कर्मों को कर्मों के हिसाब से चलने दोगे तो ठीक कर्मों को
- 23:57कर्मों के हिसाब से चलने दोगे तो बिल्कुल ठीक।
- 24:02कर्मों के जल में व्यवधान पैदा करोगे तो तुम हुए करता और करता को
- 24:09भोगता भी भरना पड़ेगा। सर्दी का वक्त हीटर चल रहा है।
- 24:26बिजली गुजर रही है हिट डटी बीच बस हवा गर्म लग रही है, सारे गर्म हो
- 24:34रहे है, ये कमरा भी गर्म हो रहा है।
- 24:38सारे कृत्य हो रहे है। जड़ और चेतन के सहयोग से।
- 24:44लेकिन अगर मैंने उस ब्लॉवर के अंदर या उस गर्म रॉड को पकड़ लिया
- 24:54तो क्या होगा? हाथ जल जाएगा या हाथ को करंट लगा?
- 25:02मतलब क्या है? सब कर्मों के होते हुए अगर तो तुम
- 25:09उन कर्मों को देखते रहोगे होते हुए कर्मों को।
- 25:15अब चेतन और जड़ के संयोग से ये पंखा चल रहा है और मैं अगर इसको
- 25:20आराम से बैठा बैठा इसका लुत्फ लेता रहूं तो ये हवा मुझे आनंदित
- 25:28करती रही। मैं करता ना बनूँ सिर्फ इसके
- 25:34परिणाम को। आनंद से भोगु पंखा चल रहा है।
- 25:40इसकी हवा का आनंद मानो तो ठीक, लेकिन अगर मैंने इसके साथ
- 25:46छेड़छाड़ की, इसमें हाथ बसाया, मैं करता बना तो ये मुझे मेरे हाथ
- 25:52को काट देगा। मुझे भोखता भी बनना पड़ेगा अगर
- 25:58तुमने प्राकृतिक कर्मों की व्यवस्था के साथ कोई पंगा लिया
- 26:05याने कि तुम खुद करता बने तो तुम्हें उसका फल भौगना पड़ेगा।
- 26:15प्रकृति द्वारा निर्धारित कर्मों को होने दो, तब तुम्हें कोई कष्ट
- 26:21नहीं होगा। क्या कहा है प्रकृति द्वारा
- 26:30निर्धारित कर्मों को होने दो। प्रकृति द्वारा निर्धारित घटनाओं
- 26:36को घटने दो लेट दट। वी हैपन उन्हें घट जाने दो घटनाओं
- 26:47को घट जाने दो, तो तुम्हें कष्ट नहीं।
- 26:53अगर तुम उन घटनाओं को घटने नहीं दोगे या उन घटनाओं के घटने पे दुख
- 27:01या सुख प्रकट करोगे तो आप भोक्ता बन गए।
- 27:05कर्ता और अगर कर्ता बन गए। तो भौंकता भी हो।
- 27:13अगर तुम्हें कोई खुशी के बीच में शुमार हो गए तो तुम झूमोगे नाचोगे
- 27:20गाओगे अगर तुम कोई ऐसा कर्म किए जिससे दुख उत्पन्न हो गया तो तुम
- 27:26रोओगे चीखोगे चलाओ। प्राकृतिक के हिसाब से जो कर्म
- 27:33चलते हैं उनको वैसे ही चलने देना। इस व्यवस्था के अनुसार तो आपको ना
- 27:43सुख होगा ना दुख होगा। तुम घटनाओं से परे खड़े देखते
- 27:49रहोगे। उन घटती हुई घटनाओं को जो घटनाएं
- 27:57हो रही है, पंखा चल रहा है। ये बिजली चल रही है सर्दी में अगर
- 28:03कोई हीटर चल रहा है। मैं उन सारी घटनाओं को गढ़ते हुए
- 28:08साक्षी रूप से उसका आनंद मानूंगा तो मैं प्रकृति के किसी प्रकार के
- 28:16कर्मों को या घटनाओं को घटती हुई घटनाओं में व्यवधान खड़ा नहीं कर
- 28:20रहा हूँ। करता ईश्वर।
- 28:26पंखे में से विद्युत गुजरी, पंखा चला पंखे ने हवा दी।
- 28:33मैंने उसका आनंद उठाया, लेकिन अगर मैं कुछ छेड़छाड़।
- 28:43बिजली की नंगी तार को छू चलते हुए पंखे में हाथ दे दो, चलते हुए
- 28:49हीटर के अंदर हाथ फंसा दो तो मैं करता हूँ और जो करता बनेगा उसको
- 28:59भोंकता भी बनना होगा। क्योंकि हर एक करम का कोई ना कोई
- 29:05फल होता है। जैसे ही तुम करते हो तो करम का फल
- 29:12आएगा ही आएगा टु एवेरी एक्शन देर इस एन इक्वल एंड ऑपज़िट रिएक्शन
- 29:20क्या सार निकला? किसी भी कर्म को होने दोगे और तुम
- 29:28साक्षी रहो, अपने में स्थित रहोगे तो तुम्हें ना सुख होगा, ना दुख
- 29:36होगा, घटनाएं घटती रहेंगी। सृष्टि चलती रहेंगी।
- 29:45अगर तुमने प्राकृतिक घटनाओं में हस्तक्षेप करने की कोशिश की याने
- 29:51की तुमने साक्षी से कर्ता बनने की चेष्टा की, तो तुम्हें भुगता।
- 30:02सुख और दुख ये दोनों भोगने पड़ेंगे घटनाओं को प्राकृतिक रूप
- 30:11से अगर तुम गठने दोगे तो तुम्हें न सुख होगा, न दुख होगा।
- 30:18तुम सुख और दुख से पार खड़े उन सभी घटनाओं के साक्षी बने रहोगे
- 30:22देखते रहो अब मैं देख रहा हूँ पंखा चढ़ रहा बिजली की रौशनी का
- 30:33आनंद ले रहा हूँ पंखे की हवा का आनंद ले रहा हूँ।
- 30:37मैं इनसे कोई छेड़छाड़ नहीं कर रहा हूँ।
- 30:40इन प्राकृतिक घटनाओं का आनंद मान रहा हूँ, मैं इनसे कोई छेड़छाड़
- 30:46नहीं कर रहा। मैं करता नहीं बन रहा हूँ मैं
- 30:49सिर्फ आई ऍम विटनेसिंग, मैं सिर्फ इन घटनाओं को घटते हुए देख रहा
- 30:56हूँ। और इनका आनंद मानता हूँ।
- 30:58साक्षी हमेशा आनंद ही मना करता है।
- 31:03अगर तुम घटनाओं को घटते हुए देखते रहोगे तो तुम्हारा आनंद कोई नहीं
- 31:08छीन सकता अगर तुम घटती हुई घटनाओं के बीच में इंटरफेरेंस करोगे।
- 31:18तो तुम सुखी भी होगे तो तुम दुखी भी हो।
- 31:23ये है फालतू बिलकुल स्पष्ट, स्पष्ट मैंने टुकड़ों में बांट
- 31:31बांट के आपको समझाया। ईश्वर करता है बिजली ईश्वर की
- 31:45पंखा ईश्वर का सारा मटेरियल जो प्रोग हुआ ईश्वर ये शरीर ईश्वर ने
- 31:52बनाया शरीर ईश्वर चला रहा है। आँखें देख रही हैं मैं इसी शरीर
- 32:01में बैठा इन आँखों के द्वारा सारे कृत्यों को होता हुआ देख रहा हूँ,
- 32:08आनंद मान रहा हूँ। लेकिन जैसे ही मैंने इन कर्मों के
- 32:14बीच में फंसने की चेष्ठा की। कर्ता बनने की चेष्टा की।
- 32:19मुझे भोक्ता भी बनना पड़ेगा। आरए की मशीन के अंदर अगर सब कुछ
- 32:28वैसे ही घट रहा है तो चेहरा भी कटेगा।
- 32:32पशु के खाने योग्य चेहरा बन जाएगा।
- 32:36लेकिन अगर मैंने उस चारे की मशीन में हाथ फंसाने की कोशिश की तो
- 32:42मुझे दुख भी भोगना पड़ेगा। मेरा हाथ कट जाएगा तो कुछ कर्म
- 32:50अगर गलती से भी हो जाएंगे आपसे। उनके कर्मों का कोई कमी या
- 32:56ज्यादती नहीं होती। लोग कहते हैं कि जो अनाशुरती कर्म
- 33:01होते हैं उनका फल नहीं मिला करता, ये गलत है धार्मिक अनाशुरती कर्म
- 33:10या सुरती से कर्म दोनों में। फल समान ही होता है।
- 33:17इसमें भावनाओं का कोई अर्थ नहीं क्योंकि आपसे कर्म हो गया मूर्छित
- 33:24अवस्था में हुआ कि जागृत अवस्था में हुआ।
- 33:31इससे कोई कर्मों का फल का प्रभाव नहीं बदलता।
- 33:39मूर्छित होके कर्म करो या होश पूर्वक कर्म करो उससे फल में कोई
- 33:46फर्क नहीं पड़ेगा ध्यान रखना यहाँ होश पूर्वक।
- 33:51मैं विटनेसिंग से नहीं ले रहा हूँ।
- 33:54अगर आपने साक्षी पूर्वक कर्म को होने दिया फिर आप दुखी सुखी नहीं
- 34:00हो लेकिन अगर आप कर्म होश से करोगे आप होश में किसी का कतल कर।
- 34:11आप बेहोशी में किसी का कतल कर दोगे तो आपको कानून बिल्कुल सेम
- 34:18सजा देगा। आपको अग्नि में हाथ होश से डालो
- 34:24या बेहोशी में डाल जाए। उतना ही हाथ चलेगा।
- 34:32गलती से चारे की मशीन में हाथ दे लो या जानबूझ कर दे लो, हाथ उतना
- 34:40ही कटेगा। प्रकृति अपना कर्म धर्म निभाएगी।
- 34:47आपको अपने कर्मों का चाहे आपने जान के किया, चाहे आपने अनजाने
- 34:52किया, बराबर फल मिलेगा। ये मत सोचना इस भ्रम में मत रहना
- 34:59के मुझ से हो गया हो गया तो कोई बात नहीं, फल मिलेगा कर्मों को।
- 35:07चाहे आपने जान के किया, चाहे आपने अनजानी नहीं किया, तुम कर्म के फल
- 35:15से नहीं बच सकते। कैसे बच सकते हैं हम कर्म के फल?
- 35:22हम चलते हैं, पांव के नीचे कीड़े भी आ जाते हैं।
- 35:28हम बच के भी चलते हैं, आँखें कमजोर है, वृद्ध है, हमें दिखाई
- 35:34नहीं पड़ता। कोई चीज़ आ गई, पांव के नीचे आ
- 35:37गई। अगर दिखती है तो हम पांव एक तरफ
- 35:40ले जाएंगे, लेकिन अगर आँखें ही कमजोर हैं तो क्या करें?
- 35:45पाम उस छोटे से कीड़े पर रखा जाएगा कीड़ा मर जाएगा कसूर किसका?
- 35:55मुझे दिखाई नहीं पड़ा। मैंने जानबूझकर ये कर्म नहीं
- 35:59किया, लेकिन मुझे। तो क्या किया जाए?
- 36:07बस यही किया जाए कि उस कर्म का फल कर्म का फल कर्म के हिसाब से आने
- 36:16दिया जाए और जैसे कर्म को आपने होते हुए देखा वैसे ही फल को भी
- 36:22भोगते हुए देखो। शरीर के द्वारा कर्म हो गया और
- 36:35शरीर को उस कर्म का फल मिला। फर्ज करो आपने कोई पाप कर्म कर
- 36:43दिया, कोई आपके हाथ पर फोड़ फंसी हो गई।
- 36:46बहुत तंग हो, बहुत दुखी हो, दर्द हो रहा है।
- 36:50ये कर्म फल तो अगर आप ये सोचोगे कि हाय ये मैंने तो कर्म नहीं
- 36:59किया था, ये तो मुझसे हो गया था और आप दुखी होते रहो, उसका कोई
- 37:07फायदा नहीं। उस कर्म को उस कर्मफल को बराबर
- 37:19साक्षी भाव से भोगो। अगर करता बने हो तो भोगता भी उतने
- 37:29ही खुशी से भोगो, कर्म के फल को भोगो, वो चाहे आग के होश में हुए
- 37:38या बेहोशी में हुए कर्म तो फल देगा ही देगा अक्शॅन का रिएक्शन
- 37:44आएगा ही आएगा। अक्शॅन कभी नहीं देखेगा कि आपने
- 37:49गेंद दीवार के ऊपर मारी उस वक्त आप शराब पिए थे या बा?
- 37:55होस्ट वो गेंद वापस आएगी रिएक्शन गेंद को कोई पता नहीं।
- 38:03कि तुमने बेहोशी में वो गेंद दीवार से मारी और दीवार को भी कोई
- 38:08पता नहीं शराब पी के चलोगे? फोर्स ऑफ़ ग्रैविटेशन ये नहीं
- 38:18देखेगा कि आपने शराब पी आपको नहीं गर्म बेचारा शराब पी है।
- 38:23इसकी क्या गलती गलती है? फिर आप क्यों और वो फोर्स ऑफ़
- 38:33ग्रैविटेशन जब आपके टेढ़े मेढ़े चलने से आपको कोई हड्डी टूट
- 38:40जाएगी, कोई चूल्हा टूट जाएगा? तो आप ये दोष मत देना कि मैंने तो
- 38:46कोई पाप कर्म नहीं किया। ये गलती क्यों हो गई?
- 38:49ये पाप का दंड मुझे क्यों मिला? ये पाप आपने ही किया बेहोश शराब
- 39:00पीने से आप? लेकिन वो शराब की बोतल आपके मुख
- 39:05को नहीं लग गई उड़के वो शराब आपने अपनी इच्छा से पी।
- 39:13जब शराब आपने अपनी इच्छा से पी तो उसके फलस्वरूप आप बेहोश भी हुए
- 39:20मुर्षित। तो आप ये नहीं कह सकते कि मुझसे
- 39:25मूर्छित अवस्था में ये कर्म हो गया।
- 39:30आप मूर्छित जानबूझ के हुए यहाँ देखिए।
- 39:37इस बात को आप आगे रखकर पाप के फल से मुक्त नहीं हो सकते कि मैं
- 39:44क्या करूँ? मैं मूर्छित था तो आगे प्रकृति
- 39:51आपको बक्शने वाली नहीं। केतु मूर्छित क्यों हुए?
- 39:57शराब की बोतल उड़ के तो आपके मुँह को नहीं लगी तुमने पैक डाला बर्फ़
- 40:03डाली बड़े मज़े से आनंद से गटके शराब में अपना काम करना जहर पीओगे
- 40:14बराबर। जहर नहीं कहेगा।
- 40:18मुझे ना पीओ शराब नहीं कहेगी। मुझे ना पीओ और शराब नहीं कहेगी
- 40:24के मुझे पीओ जहर नहीं कहेगा के मुझे पीओ तुम अपनी मर्जी से पीओगे
- 40:32या बिना मर्जी से पीओगे? लेकिन घटनाएं घटेंगी, कर्मों का
- 40:37फल मिलेगा। उनकी व्यवस्था के अनुसार सुधा,
- 40:45सराई, अमृता अगर को पीओगे विष को पीओगे बेहोशी में पीओगे।
- 40:54या होश से पीओगे सुसाइड करने की नीत से पिओगे या गलती से पी
- 41:01जाओगे। जहर ने अपना काम करना जहर मारिक
- 41:08शराब को गलती से पी गए, वैसे पीते तो नहीं हो गलती?
- 41:15फुर से बली पी सकती हो? किसी की आग्रह करना या आपने खुद
- 41:20अपनी इच्छा से पी शराब अपने काम करेगा, आपकी बुद्धि को मूर्छित
- 41:26करेगी। उस मूर्छित अवस्था में जो कर्म
- 41:30हुआ। उसको इसका बहाना मत बना लेना की
- 41:34मैं क्या करूँ? मैं तो मूर्छता में उससे हो गया
- 41:39नहीं हुआ तुमने किया तो मूर्छित ही क्यों हुए तो मूर्छित अपनी
- 41:48इच्छा से हो। जब तुम मूर्छित अपनी इच्छा से हुए
- 41:56तो फिर कर्म के फल में आपको रियायत क्यों मिले?
- 42:02प्रकृति आपको रैयत देने वाली नहीं है।
- 42:05अगर तुम अमूर्छित अवस्था में कोई कर्म करते हो या मूर्छित अवस्था
- 42:12में कोई कर्म करते हो, आपने पूछा कि उनके कर्मों में कोई फल होता
- 42:19है? फासला कोई कमी नहीं।
- 42:24मूर्छित अवस्था में किया हुआ कर्म या अमूर्छित अवस्था में किया हुआ
- 42:29कर्म एक ही तरह के फल जैसे मूर्छित होकर शराब पिरोगे तो
- 42:40अमूर्छित हो जाओ। मूर्छितों के जहर पिलोगे तो
- 42:44मरोगे, उसको आप गलती कह सकते हो, लेकिन गलती का फल भुगतना पड़े।
- 43:02कर्म और भोग की व्यवस्था मैंने आपको विस्तार से समझाई।
- 43:07तो ये जो प्राकृतिक कर्म हो रहे हैं, इनमें अगर आप कर्ता बनने की
- 43:15चेष्टा करोगे इनमें अडंगा डालने की चेष्टा करोगे ईश्वर प्रदत्त
- 43:21कर्मों को। छेड़छाड़ करने की चेष्टा करोगे तो
- 43:27तुम करता बनो तो तुम्हें भी बनना पड़ेगा।
- 43:35अगर नहीं बनना चाहते तो साक्षी बनेगा।
- 43:43अगर कर्ता बनोगे तो भोगता बनना ही पड़ेगा।
- 43:47रही बात मूर्छित और अमूर्छित की मूर्छित अवस्था में कोई कर्म
- 43:53करोगे तो उतना ही फल मिलेगा जितना की जागृत अवस्था में कर्म करोगे
- 44:00क्योंकि कर्म का फल वो ही होगा। कोई कर्म ये नहीं देखेगा कि आपने
- 44:06ये बेहोशी में किया के होश में मेरे ख्याल में अब आप इस बातों को
- 44:13इसके फर्क को समझ गए। कर्म अगर मूर्छित अवस्था में होगा
- 44:19तो विफल उतना ही देगा। अगर बेहोशी में होगा तो भी फल
- 44:23उतने ही। ये बहुत से व्यक्ति कह देते हैं
- 44:26कि जो बेहोशी में कर्म होता है उसका फल नहीं इतना ज्यादा नहीं
- 44:30मिला करता। तुम्हारी भावना इसमें काम नहीं
- 44:34करती। तुम्हारी भावना तो है कि गलती से
- 44:39पड़ गया आग में। मैं ना जलूँ लेकिन आग का गर्म ये
- 44:46है कि जो उस चीज़ में पड़ गया उसको वो जलाएगी आग का गर्म है जना
- 44:53आप उसमें गलती से चीज़ भटक दो या जानबूझकर भटक दो।
- 44:59इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर आनंद में रहना चाहते हो तो
- 45:10परमात्मा द्वारा किए गए कृत्यों को घटनाओं को उसी तरह से घटने दो।
- 45:17कोई व्यवधान खड़े मत करो तो आपको दुख नहीं होगा।
- 45:24क्योंकि ये सारा मटेरियल उसका कुछ ऐसा चाहे कर्म करे ना करे, आपको
- 45:32उसमें कोई तरमीन करने की आवश्यकता नहीं, कोई हस्तक्षेप करने की
- 45:36आवश्यकता नहीं, वो अच्छा करे, वो बुरा करे।
- 45:41उसका माल उसने खुद पैदा किया। जैसी चाहे खेले, ना खेले आप किंतु
- 45:50परंतु करने की चेष्टा की तो आप कर्ता बनेंगे फिर भुक्ता आप
- 45:56बनेंगे नहीं तो करता खुद भुक्ता बनेगा ईश्वर जिम्मेवार कर्म का।
- 46:03ईश्वर जिम्मेदार भोग धन्यवाद।