Latest / Baba ji Vijay Vats / 3 Oct 25 - देही और चेतना की यात्रा, पत्थर से परमात्मा तक का सफर! मुक्त किसने होना है? देही क्या है?
Transcript
- 0:16दशम द्वार क्या होता है बाबा? कृपया करके इसको विस्तार से
- 0:30समझाने का कष्ट करें क्योंकि हमने अक्सर सुना है कि सिद्ध योगी?
- 0:47दशम द्वार से ही अपने प्राणों को साथ लेकर निकलते हैं।
- 1:00बड़ा गहरा सवाल है उत्तरी कविता? इसका पूरा खाका हमें समझाना होगा।
- 1:19डिफरेंट पार्ट्स में मैंने समझाया है, लेकिन आज मैं एकीकृत करके इस
- 1:28सारी प्रोसेसर को समझाने का यत्न करूँगा।
- 1:34यह भौतिक शरीर एक यंत्र है। यह अष्ट द्वारपुरी है पहले सुनिए।
- 1:51नव द्वार पूरी ने अस्तित्व पर यह छिद्र दो कांत, दो आँखों के चार,
- 2:07एक नाक। पांच एकमुका छः मल द्वार और मूत्र
- 2:20द्वार 2008 अस्त द्वार पूरे तुम कहो कि शास्त्रों में तो नौ द्वार
- 2:28पूरे लिखा है लिखा है। शास्त्रों में तो नरक और स्वर्ग,
- 2:35नरक और स्वर्ग के योजन भी लिखेंगे।
- 2:37कितने दूर और शास्त्रों की बात करना उचित नहीं है और मैंने
- 2:48शास्त्र भी पढ़े। तो मेरी बात को सुनो, प्रश्न मुझे
- 2:56किया है। यह अष्ट द्वारपुरी है नाकों के ये
- 3:05जो दो नॉस्ट्रिल्स है। यह एक ही हो जाते हैं भीतर जाकर
- 3:11नैसोफेरिंग और फिर ट्रेकियों के द्वारा फेफड़ों में जाते हैं यह
- 3:19द्वारी की कानों के दोषी हैं। बिलकुल ठीक आँखों के दोषी हैं
- 3:26बिलकुल ठीक। और तुम्हें थोड़ी सी संग्रहित
- 3:31कहना समझा दूँ। वैसे ये मेडिकल से संबंधित बात
- 3:37है। आंखें अपना चित्र बहती हैं, नर्वस
- 3:46सिस्टम को। और कान भी अपनी श्रवण जो आवाज़
- 3:51सुनी जाती है और नर्वस सिस्टम को भेजती है उसकी आगे प्रतिक्रिया
- 3:59होती है संक्षेप में तुम्हें समझाती है, जीस व्यक्ति का ही कान
- 4:03काम करता है। अगर कहीं बंदूक की आवाज सुनेगी तो
- 4:10वह आपको एक्यूरेट डायरेक्शन नहीं बता पाएगा कि यह बंदूक की गोली
- 4:15कहाँ से आवाज आएगी? लायें बाएं पीछे आगे कहाँ से आए
- 4:24जजमेंट नहीं कर पाएगा। दोनों का मतलब ही है ये कंपैरिजन
- 4:29करके बता देना। दोनों आँखों का मतलब ही है तो ये
- 4:34अपनी सूचनाएं भेजती हैं। नर्वस सिस्टम के पास ये दो अलग
- 4:38क्षेत्र हैं। कान के दो छिद्र अलग क्षेत्र हैं,
- 4:43लेकिन नॉस्ट्रिल के दो छिद्र। यह तो बिल्कुल साथ में जाके
- 4:50फेयरिंग्स में मिल जाते हैं और फेयरिंग्स ट्रैक या एक नली है
- 4:57उसके द्वारा दोनों फेफड़ों में हवा चले जाते हैं।
- 5:02और फिर दोनों फेफड़े जब स्वास्थ्य को बाहर निकालते हैं तो वह
- 5:06ट्रैकियों के जरिये ही आता है। यहाँ सर्व विज्ञान की बात करोगे
- 5:15तो बात बड़ी लंबी हो जाएगी। या तो मैं बाद में समझाऊंगा।
- 5:22एक बार जो प्रश्न पूछा है, उसका उत्तर सुन लो, आप जानता तो मैं भी
- 5:29हूँ नव द्वार पूरी कहते हैं, लेकिन मैं अष्टद्वार पूरी कहता
- 5:35हूँ, तो नवम द्वार कौन सा है? तीसरी आंख?
- 5:43आठ द्वार खुले हैं, दो द्वार बंद है, तीसरे अंक का द्वार बंद है,
- 5:54दक्षिण द्वार बंद है अब यहाँ तक। आप अच्छी तरह से फिर फिर सुन लो
- 6:04इस बढ़िया को क्योंकि आगे चलेंगे तो तुमने क्या सुना पहले यह अगर
- 6:14ठीक से समझ आया तो तुम आगे चल पाओगे।
- 6:21ये 10 से द्वार हैं। यह भौतिक शरीर है, इसके भीतर
- 6:29दूसरा सूक्ष्म शरीर दे ही जिसे मैं कहता हूँ दही कनवास्क हैं।
- 6:39थोड़ा मुश्किल मामला है। और चेतना पैनवास को बड़ा मुश्किल
- 6:44मामला है उनके लिए जो जानते है जिन्होंने देखा नहीं कोई कहेगा
- 6:49दिमाग में कोई कहेगा हरदा में कोई कहेगा गुंडा रणनी के पास लेकिन
- 6:56नहीं दे ही। सारे शरीर में मौजूद है इट्स ए
- 7:02फोटोकॉपी। इस शरीर की पार्थव देय की
- 7:07फोटोकॉपी है। इसलिए ये जो रोहें फिर रहे हैं
- 7:14अदृश्य रोहें ये बिलकुल। भौतिक शरीर जैसे देही का रूप
- 7:23मैंने वर्णन किया, बिल्कुल सोल शरीर जैसा उसकी फोटोकॉपी।
- 7:32फोटोकॉपी का मतलब कुछ शेष नहीं रहा।
- 7:39तो देही का निवास? कहाँ होता है?
- 7:43सारे शरीर उसका निवास है तो यह पार्थिव देह होगी।
- 7:55सतुर शरीर इसके भीतर रोए रोए में एक विद्युत का शरीर होता है।
- 8:06तुम देखना मजेदार बात है तुमने देखा नहीं, अगर कोई लंगड़ा
- 8:12व्यक्ति मर जाता है जिसकी एक टांग है जिसकी दोनों टांग है।
- 8:21तो वह जब तुम्हें सूक्ष्म शरीर में दिखाई पड़ेगा वो तुम्हें दो
- 8:27टैंक दिखेंगे। सतुल शरीर उसका एक टंका था।
- 8:38दे ही उसका दो टांग है। क्या हुआ?
- 8:45दे ही उस वक्त की फोटो है जब यह गर्व में खींचा।
- 8:49क्या उस वक्त सारे अंग पूर्ण थे? लेकिन धीरे धीरे जैसे जैसे कर्मों
- 9:02का विखंडन होता चला गया तो इसकी एक शरीर यानी लात कम हो गई।
- 9:1112। टूट गई किसी एक्सीडेंट में?
- 9:18किसी कारण से टूट गई, लेकिन वो फोटोकॉपी तो उतनी ही रहेंगी।
- 9:26अगर आप अंधे हो गए हो तो आपका सूक्ष्म शरीर दो आँखों वाला होगा
- 9:33बड़ी मजेदार बात है। सतूल देह बिल्कुल देही।
- 9:44इसकी कॉपी नहीं होता देही उसकी कॉपी होता है जिसने जैसा जन्म
- 9:54लिया। अगर किसकी आँखें बार में चली गई
- 10:02तो मरने के बाद देही की आँखें मिलेंगी आपको अगर बाद में चली गई
- 10:09तो ध्यान से समझना मैं एक शब्द से बोल रहा हूँ।
- 10:13बाद में शरीर चला गया। हाथ चला गया, पांव चले गए, लकवा
- 10:20हो गया तो जब यह शरीर से बाहर आएगा तो लकवाग्रस्त नहीं आएगा।
- 10:27अब ये आपको बात अच्छी तरह से सुन लेना इसको यह वही व्यक्ति बता
- 10:35पाएगा। किसने देखा, किसने नहीं देखा?
- 10:44वह तो सूक्ष्म शरीर के होने को भी इंकार कर देगा।
- 10:51वह तो चेतना के होने को भी इनकार कर देगा, आत्मा के और परमात्मा के
- 10:55होने को भी इनकार कर देगा। उसकी बात अलग है।
- 11:00मैं बात उसकी करता हूँ, जिसने देख लिया दे ही बिल्कुल वैसा होता है
- 11:12कैसा ये दे? अगर जन्म के बाद कोई अंग उसका
- 11:18घाटा टूटा फूटा तो फोटो कॉपी वैसे ही रह गई जैसा उसने जन्म लिया।
- 11:33ये दर्शन की बात है ये दिमाग की बात।
- 11:39हम अक्सर दर्शन की बातों को फिलॉसोफिकल दार्शनिक वे से सॉल्व
- 11:47करने में लग जाते हैं जो कि अक्सर गलत होते हैं।
- 11:52परमात्मा को भी हम शाब्दी करते हैं।
- 11:55डिफाइन करते हैं, व्याख्या करते हैं, एक्सप्लेन करते हैं जो कि
- 12:00गलत होता है और सुनिए एक प्रश्न को बीच में ले लेते हैं।
- 12:17एक शि शेख गुरु के पास किया। गुरु पंजाबी जानता था, लेकिन इतनी
- 12:24नहीं जानता था। उसने पंजाबी में लिख दिया राधे
- 12:32पहले भी बात बताई हुई है मैंने। तो राधे में जो आपकी मात्रा है वो
- 12:40आंधी पड़ती है? उसने मात्रा पूरी कर दी तो पड़ा
- 12:50गया गधे राधे अगर। आंधी मात्रा होती है आपकी?
- 12:59अगर पूरी मात्रा तो गधे तो बैठा बैठा पढ़ रहा है गधे गधे गधे तो
- 13:09व्यक्ति ने आके पूछा नहीं भाई ये राधे है।
- 13:14ये गधे नहीं है राधे है, मैंने कहा राधे हो या गधे हो कहता गधे,
- 13:27गधे करने से परमात्मा नहीं मिलेगा।
- 13:32मैंने कहा अगर राधे राधे कहने से मिल जाएगा तो गधे गधे कहने से भी
- 13:37मिल जाएगा। अगर गधे गधे कहने से नहीं मिलेगा
- 13:42तो राधे राधे कहने से भी नहीं मिलेगा।
- 13:47राम को भी अगर आप आपकी मात्रा में है आंधी लगा दो।
- 13:53और पूरी लगा दे तो गम बन जाएगा, गम गम गम गम गम गम गम कहने से भी
- 14:01वो ही इफेक्ट पड़ेगा अगर भाषा से ही परमात्मा मिलता है मेरे शब्दों
- 14:09को। आह, सूक्ष्मता से सुनने की चेष्टा
- 14:12किया करूँ। कहते नहीं बाबा यह तो मैं नहीं
- 14:20मानता मिलेगा तो राधे के हिसाब से मिलेगा।
- 14:24गधे के हिसाब से क्यों मिलेगा? मैंने कहा फिर राधे के हिसाब से
- 14:28क्यों नहीं मिलेगा? बात नाराज ही का है।
- 14:33न गधे का है, न राम का है, न गम का है।
- 14:38बात है तुम्हारे उस समय इन्सर्ट होने का तुम समा जाओ और समा के खो
- 14:46जाओ तुम्हारी राख भी न बचे। उच्चारण करने वाला, न बचे, जॉब
- 14:57करने वाला, न बचे जब ही बचे जॉब करने वाला, न बचे बात खोने की है,
- 15:08बात शब्दों के नाम की नहीं। अगर गधे से नहीं मिलेगा तो राधे
- 15:15से मिलेगा अगर हम से नहीं मिलेगा तो हम से भी नहीं मिलेगा।
- 15:24असली बात है राधे राधे करते करते। तुम राधे में ही समझो तीदोनी मेनू
- 15:40अखुरन तीदोनी मेनू अखुरन ज़ाहिर ना?
- 15:51राम चंद्र राम जनकृति मेहता अपनी रंजन भाई ट्रांसफर होना
- 16:00ट्रांसफॉर्मेशन होना चाहिए। जाप करने वाला खोजा है।
- 16:11नाचने वाला खोजा नृत्य ही बचे, कर्म ही बचे करता, खोजा गहरी बात
- 16:20है, बात मिलती है तुम्हारी खोजानी।
- 16:33तुम अपने भी नाम का जप कर सकते हो और जीस, कृष्ण और राधा के नाम का
- 16:40जप करते हो। किसी का नाम तो यहाँ राधा होगा
- 16:44मेरे चैनल पे बहुत सी राधाएँ हैं। वह अपने नाम का जप भी कर सकते
- 16:50हैं। क्या दिक्कत है?
- 16:56कोई भी तो दिक्कत नहीं है। फना हो जाना है?
- 17:06असली बात है तुम्हारी फना होने की?
- 17:10असली बात नाम की नहीं है कि राम है के लाये नहीं तो राजनीतिक बात
- 17:17नहीं। असली बात है तुम फना हो जाओ, तुम
- 17:26जल जाओ, तुम राख भी न बचो। तुम्हारा नामो निशान भी न बचा।
- 17:34तुम्हारा इलूशन टूट जाए, तुम खो जाओ और फिर एक रह जाए अभी दो।
- 17:52तुम ना जाने किस जहाँ में खो गए तुम ना जाने किस जहाँ में खो गए
- 18:10हम। भरी दुनिया में तनह हो गए तुम न
- 18:24जाने कैसे जहाँ में खो गए। बस ये खोजा जब मैं था तब हरी नहीं
- 18:37अब हरी है मैं ना प्रेम गली आती सा करी तामे दो ना समा दो न रही
- 18:47मसला ये है मेरे कहने का। दो न रहे, एक रह जाए, अद्वैत रह
- 18:55जाए, दूसरा खोजा फिर तुम पाओगे वह जो एक बचा उसे ही एक।
- 19:10वह जो एक वचा उसे ही अहम् ब्रह्मस्म कहते हैं वह जो एक वचा
- 19:17उसी को कहते हैं एको अहम् द्वितीय नस्ते।
- 19:29तत्वमशीष्वेत के 411 वचे दूसरा कुछ है दूसरा चाहे कुछ भी है।
- 19:50नाचने वाला खो जाए, नाच बचे कृत बचे कर्त खो जाए हम प्रसंग पे आते
- 20:01हैं अब एक छोटा सा व्हाट्सएप पे मैसेज आए।
- 20:11देखिए व्हाट्सएप मेरा निजी घर है। किस घर में तुम बिना पूछे घुस
- 20:19जाते हो? कोई अच्छी बात नहीं और जो चाहे
- 20:26नजला में जाते हैं। तो आज के बाद मैं व्हाट्सएप के
- 20:32ऊपर सारे नंबर डिलीट करता हूँ। जो भी न्यायगा मैं डिलीट करता हूँ
- 20:39जब कमेंट सेक्शन खुला है। आप कमेंट सेक्शन में अपनी
- 20:50मुड़ताएं मूर्खताएं या कष्ट, तकलीफ, कमियां, अभाव, दुख, दर्द,
- 20:56तकलीफें क्यों नहीं? दर्द अभी एक कमेंट आया मुस्कान।
- 21:08बाबा मैंने आपके चमत्कार का वीडियो देखा है, किसने ग्रुप में
- 21:14डाल दिया था? मुझे फेक लगता है।
- 21:25आप मुझे रियल चमत्कार दिखाइए, मुझे दिखाइए।
- 21:32मैंने कहा बेटी यह शिष्यों के लिए है, तुम्हारे लिए नहीं, ये आप
- 21:41क्या खेल खेल रहे हो? सारे दिन की थकान से नवरात हो के
- 21:49शिष्यों के सामने खेल खेल रहा हूँ तुम्हें जैसा लगता है मुझे कोई
- 21:58आपत्ति नहीं। इसलिए एक शब्द बोला गया गुरु घूम
- 22:06के गुरु गाँव भर गया, पागल भी हो न गुरु गुरु कह रही होता बुद्धि
- 22:15से स्वीकार न करें। क्योंकि अक्सर उस तल पर पहुंचने
- 22:19वाला व्यक्ति थोड़ा थोड़ा पागल तो होता ही है पहले और वहाँ पहुँचकर
- 22:25तो पूरा ही पागल हो जाता है। जितनी मात्रा में प्रोपोर्शनेट
- 22:32मस्ती उतनी मस्त मात्रा में पागल। थकावट के बाद बच्चों ने कहा हमें
- 22:50कुछ पुरस्कार दीजिए, अब मुझे तो पता नहीं था पुरस्कार मांगेंगे,
- 22:56मैंने कहा ये दो पुरस्कार, रोहित ने कहा पुरस्कार तो हम ही चाहिए,
- 23:02मैंने कहा तुम भी ले लो। हम खेल रहे हैं हसन खेल हनुमान का
- 23:09जाप इतनी गहरी बातों को बोलने वाला मैं खुद भी हस रहा हूँ क्या
- 23:21हसन जुर्म है क्या? अगर तुम्हें फेक लगता है तो तुमने
- 23:27देखा क्यों? और अगर फेक लगता है तो मुझे क्या
- 23:38आपत्ति है? मुझे ज़रा भी आपत्ति नहीं है।
- 23:42मैं कब साबित करना चाहता हूँ कि फेक नहीं?
- 23:49हम खूब हँसे लुत्फ लिया, सारे दिन के थके हुए थे तुम्हें हमारे
- 23:56हँसने पे हो सकती है तो मैंने कहा बेटियां हँसता है।
- 24:04अगर दीक्षित है तो फ़ौरन कोई और गुरु बना ले तो हमें हंसने भी
- 24:17नहीं देगी। क्या हम चमत्कार दिखाएं?
- 24:21हम हँसे, हम रोए तुमने क्यों देखा वह वीडियो?
- 24:31और ध्यान रख बैठिए मैं ये हाथ की सफाईयां दिखाने के लिए नहीं यहाँ
- 24:36बैठा हूँ ये तो मन के चाव हैं, कुछ और भी हैं जो हाथ की सफाईयां
- 24:45नहीं। किसी के बच्चा नहीं, बच्चा किसी
- 24:52के लड़का नहीं है। लड़का ये हाथ की सफाई और ये भी
- 25:01हाथ की सफाई नहीं है, जो दिखाया है मैंने।
- 25:04लेकिन मैं तुम्हारी परतिथि से इनकार नहीं करता क्योंकि मैं कोई
- 25:09तानाशा तुमने जैसा माना मानते रहो, तुम्हारा क्या है?
- 25:18तुम तो राधे राधे कहने वालों को कहोगे वो तो पार हो जाएगा से
- 25:22सेकंड में? शोर मचाने वाला भी पहुँच ही जाएगा
- 25:25तो तुम्हारी इच्छा है तो तू जल्दी कर तो ब्लॉक कर दिया।
- 25:32मैंने उसे मेरे पर्सनल चैनल पर बिना खुशी मत आ रखो।
- 25:42कमेंट सेक्शन में पहले पूछा करो प्रश्न जो पूछो लोग तो सीधी काली
- 25:50कर देते हैं, वो भी रात को 2:00 बजे भाई मैं कोई मदारी नहीं था।
- 26:02ये काम मदरियों का है। अगर हाथ की सफाइयां देखनी है तो
- 26:12मदरियों का खेल देख लियो का, पर मैंने कब कहा मुझे पूजो?
- 26:21मैं एक चमत्कार जरूर दिखाता हूँ, बशर्ते कि तुम।
- 26:26मेरी कहो, हुई बातों के ऊपर चलो, उससे बड़ा चमत्कार इस सृष्टि में
- 26:33कोई है ही नहीं। जो मैं कहता हूँ वो तुम करती हैं?
- 26:43क्रियायोग करो न कुछ करने में बैठो, अपने भीतर उतरने का प्रयास
- 26:50करो, इस अचेतन को खाद्य करो, अवचेतन को खाद्य करो फिर देखो।
- 27:02मेरे पांव में गंगरू बंधा दे कि फिर मेरी चाल देख ले।
- 27:15फिर देखो कैसा आनंद है और उससे बड़ा चमत्कार भी है।
- 27:25ये लंबे, लंबे, लटके लटके मोह लिए तुम फिरते हो संसार में और मैं ही
- 27:31यहाँ अकेला 13 बरसों से अकेला बैठा हूँ मुझे कोई तमन्ना?
- 27:49मैं अकेला कोई हम दम न रहा कोई सहारा न रहा।
- 28:08हम किसी के न रहे, कोई हमारा न रहा।
- 28:25कोई हम दम न रहा, कोई सहारा न रहा।
- 28:40हम। ना रहे कोई हमरा ना रहा।
- 28:54सब सहारे तोड़ दिए। कोई सहारा ना रहा कोई हम दम रहा
- 29:00ना रहा। कोई गमें शरीक न रहा, कोई गम ही न
- 29:07रहा गमें शरीक किसे करो हम किसी के न रहे सब टूट गए, रस्ते कोई
- 29:19हमारा न रहा। सब टूट गया।
- 29:23कोई दोस्त, कोई मित्र, कोई शत्रु, किसी भी प्रकार का कोई संबंध न
- 29:31रहा, संसार से न शरीर से संबंध रहा, न वासनाओं से संबंध रहा, न
- 29:38इच्छाओं से संबंध रहा। न कुछ योजनाएं रही, न कुछ
- 29:44स्मृतियां रही, न कुछ आर जो है अब न किसी का इंतजार है तो चलिए हम
- 29:58इस पर संघ पे चले, यह दे जड़। इस देह के भीतर देही जिसे सूक्ष्म
- 30:08शरीर कहते हैं, वह एक ऊर्जा का समूह है।
- 30:14इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा का समूह उर्स देही के साथ लगा।
- 30:24एक चेतना का छोटा सा अंश, जो अनंत विराट में फैला हुआ जहाँ से शक्ति
- 30:33लेता है वह छोटा सा चेतना का अंश जिसने पत्थर से यात्रा शुरू की और
- 30:40यहाँ तक पहुंचा। और बिलकुल अंत तक हमारा साथी का
- 30:44सच्चा साथी है। इसे ही चेतना कहते हैं।
- 30:49इसे ही आत्मा कहते हैं, अब बात को अच्छी तरह से खोल लेना, क्योंकि
- 30:56प्रश्न बहुत बाद में पूछे गए। तो ये मत पूछा करो बाबा आपने पहले
- 31:01क्यों नहीं बताया? हर काम समय पे होता है, समय से
- 31:10पहले कुछ नहीं मिलता। और समय के बाद भी कुछ नहीं मिलता।
- 31:18बिल्कुल समय पे ही मिलता है। मैं भी समय पे बोलता हूँ समय से
- 31:25पहले कुछ बोलता हूँ नहीं नहीं आज प्रसंग आया तो तुम ये कहोगे पहले
- 31:32क्यों नहीं बताया आज ही बताना समय ही आ जाएगा।
- 31:40हाँ वो जो क्या गुर गूंगे गुर बांवरे गुर के रेयो दास गुरु जब
- 31:47भेजो नरक में तो सर के रखेयो दास बात तो पूरी कर गया था।
- 31:56दोहा पूरा नहीं किया तो गुरु अगर तुम्हें कोई मार्ग बता दे, टें
- 32:03टें करे अपना नाम बोलो राम राम करो गम गम करो राधे राधे करो, गधे
- 32:11गधे करो हाथी हाथी करो। छींटी छींटी करो मच्छर मच्छर करो
- 32:17लेकिन बात ये है जिसे करने से तुम्हारा आफा खो जाए, वहीं मुक्ति
- 32:27का दौर। जीस करने से आपा मिट जाए,
- 32:38तुम्हारा आपा चिपका हाथ इलूशन भ्रम यह टूट जाए यह मिट जाए भ्रम
- 32:51मिट जाए इलूशन मिट जाए। तुम गलती में थे, ये समझ में अजय
- 32:59बस उसे ही ज्ञान कहते है। ये कहते हैं कि फिर आप संतो की
- 33:13निंदा क्यों करते जो कहते राधे राधे करते रहे निंदा मैं इसलिए
- 33:18नहीं करता कोई राधा से नहीं मिलता।
- 33:24राम से नहीं मिलता, अल्लाह से नहीं मिलता, वह गुरु सतनाम से
- 33:28नहीं मिलता, ये नहीं कहता फिर तुम मेरी बात को अभी समझे, मैं कहता
- 33:37हूँ चाहे गधे, गधे करो। चाहे जिसे तुम अश्लील शब्द कहते
- 33:43हो, उन्हें गाली, वह भी बोलना शुरू कर दो, लेकिन परिणाम आना
- 33:52चाहिए कि तुम्हारा आपाक होना चाहिए।
- 33:56जीस सभी कृत्य से तुम्हारा आपका होता है जीस से भी कृत्य से
- 34:02तुम्हारा ब्रह्मकता एल्यूजमटता तुम्हें सत्य दिखता तुम्हें ज्ञान
- 34:10दिखता उसी क्षण अज्ञान मर जाता है और ज्ञान क्या है?
- 34:15ज्ञान है कि जिससे तुम अपना हो ना समझते हो आज तक समझते रहे कितनी
- 34:24जोड़ियाँ बीत गईं तुमने समझा के मैं तेरे मन में यह इलूशन है।
- 34:34और मैं तुम्हें ये कहना चाहता हूँ के राधे राधे से व्यक्ति पहुँच
- 34:39सकता है, गधे गधे से पहुँच सकता है, कोई गाली निकालना शुरू कर दे
- 34:44उससे भी पहुँच सकता है तुम तो बात राम राम की ही करते हो, अल्लाह की
- 34:48ही बात करते हो, मैं कहता हूँ गाली भी निकाल दो और वो श्रद्धा
- 34:52बन जाए कमर। बहुत से शब्द एक भाषा में भगवान
- 34:58का नाम है और वो ही शब्द दूसरी भाषा में गाली, लेकिन अगर उस शब्द
- 35:09से तुम्हारा आपा खो जाए, चिपका हट मर जाए, इलूशन खत्म हो जाए, भ्रम
- 35:14खत्म हो जाए। तुम्हें ये समझाय ज्ञान हो जाए कि
- 35:18मैं कौन हूँ हू एमआइ और इससे बड़ा चमत्कार कोई नहीं बैठी है।
- 35:24मुस्कान मेरी बात सुन ये चमत्कार अगर तुम देखना चाहती हो तो
- 35:31तुम्हें तुम्हारे भीतर जाना पड़ेगा।
- 35:38मैं मार्ग बता सकता हूँ, मैं किसी को गुमराह नहीं कर सकता तो मैं
- 35:49इन्हें क्यों गलत करता हूँ? मैं क्यों इन्हें, लफंगे, बदमाश?
- 35:56चोर उचक्के क्यों कहता? क्योंकि ये खुद वहाँ तक पहुँच
- 36:03गया। इसीलिए मैं इन्हें कहता हूँ
- 36:07तुम्हें नहीं कहती? मैं कहता हूँ कि यह अज्ञानी हैं,
- 36:15सिर्फ बोल रहे हैं, भाषण कर रहे हैं, प्रवचन नहीं है।
- 36:19यह प्रवचन और भाषण में बड़ा फर्क होता है।
- 36:24प्रवचन करते हैं, संत प्रभाषण करते हैं।
- 36:31स्यास्त्र। लेकिन भाषण करता उस पर नहीं गया
- 36:41होता। जीस राशि की मैं बात करता हूँ
- 36:46प्रवचनकर्ता उस स्थल पर गया होता है जिसकी मैं बात करता हूँ जहाँ
- 36:52राशि ही राशि जहाँ दुख नहीं। दरिद्रता नहीं, कष्ट नहीं, क्लेश
- 36:59नहीं, चिंता नहीं, चिंता नहीं, रोग नहीं तकलीफ नहीं वहाँ पहुँच
- 37:09ही जाओगे तुम गुरु ने तुम्हें कुछ भी दे दिया।
- 37:13तो मैं ये नहीं कहता कि पांच नाम तुम्हें नहीं पहुंचा सकते।
- 37:21मेरी बात को तुम गौर से समझे ही नहीं हो और ये समझना थोड़ा
- 37:24मुश्किल भी है। मैं कहता हूँ ये जो तुम्हें पांच
- 37:32नाम देते हैं, ये पहुंचे नहीं। पांच नाम जपने से नहीं, तुम
- 37:39पूछोगे पांच नाम के भीतर तुम खो जाओ, तुम बचो ना, जपते जपते सब
- 37:47समाप्त हो जाए टाइमलैसनेस एंड इगोरसनेस तुम्हें ये ना पता होगा
- 37:53कि तुम बैठे कौन कहाँ हो? कौन हो वक्त मिट जाए वक्त की
- 38:03गिरफ्त से पार होने का वजूद खत्म, बस वही तो सच खंड है तो मैं सीधे
- 38:12सीधे इनको टारगेट करता हूँ। मैं नाम को टारगेट कहाँ करता हूँ
- 38:18नाम की परिभाषा बताता हूँ, नाम है फैलाव विस्तार उस अखंड का और उस
- 38:30अखंड को कोई जान नहीं सका। इस नॉट ओनली अन्नोन बडारसो अननो
- 38:36एबल। नाम तो न कभी तुम जान पाओगे, न
- 38:43जाना जा सकता। मैं टारगेट करता हूँ इनको जो इतने
- 38:51बड़े बड़े कम्यून बनाए बैठे हैं, नाम की तो बिल्कुल ही मैं फिक्र
- 38:56नहीं करता। क्योंकि नाम का एक जरिया है।
- 39:02असल तो तुम्हें उस दशम द्वार में जाना होता है, खोना होता है अब आए
- 39:10हम प्रसंग पे क्योंकि वक्त बहुत हुआ जाता है।
- 39:24ये देह देह के अंदर देही और देही के साथ ही चेतना का एक छोटा सा
- 39:30अंश जो तुम्हारा सच्चा साथी सदा संग रहेगा।
- 39:35अंत तक देही पहले धीरे धीरे बनता है और देही किसे कहते हैं
- 39:41माननेताओं को। पत्थर थे तो हल्की शिविर को
- 39:49नेग्लिजिबल तुम्हारे बेतरती की मैं शरीर हूँ, मैं पत्थर हूँ अगर
- 39:55कोई बहुत व्यक्ति गहरे में उतर जाएगा तो गहरे में उतर के शायद।
- 40:00उन भक्तों को सुन सके कि कोई रथ मेरे ऊपर से गुजर रहा है।
- 40:07बहुत बारीक बात है तुम पेड़ थे तो तुम शायद जान सको कि मेरे छाओं
- 40:18में कभी बुद्धा के बैठे थे। कभी भगवान राम ने या भगवान कृष्ण
- 40:26ने मेरी किसी शाखा पे बैठकर मुरली बजाई थी किसी?
- 40:37राम ने कभी जाते हुए मेरी डालियों को छुआ बहुत गहरी स्मृतियों में
- 40:47तुम पाओगे तुम्हें मिलेंगे और यह सारी स्मृतियां।
- 40:57और तुमने उस वक्त यह माना कि मैं पेड़ पर कभी किसी जल में स्नान भी
- 41:05किया होगा और कभी कोई जल दिया भी होगा।
- 41:11कभी आज के कुछ लोग कहते हैं कि पानी में मेमोरी होती है, बस यही
- 41:15मेमोरी होती है। कभी भगवान राम ने गंगा का जल पिया
- 41:21था, कभी कृष्ण ने भी पिया था, किसी पेड़ के साथ लिपटा था, कोई
- 41:30मजनू लैला लैला करते हुए। किसी वट वृक्ष की छाँव में कोई
- 41:41राँझा बैठा था अपने गमों और भैंसों को चराने के लिए कोई नानक
- 41:53बैठे थे किसी छाँव के नीचे। वट वृक्ष की इच्छाओं के नीचे बैठ
- 42:01के विश्राम किया था और अपने अंतश में खो गए थे।
- 42:08लेकिन तुम उस वक्त मान रहे थे कि मैं पीढ़ हूँ, मैं सरीफ।
- 42:15पत्थर थे तो भी मैं शरीर हूँ, पेड़ थे चल नहीं सकते थे फिर भी
- 42:22मैं शरीर यूनीसेल्युलर तुम शरीर में आये, अमीबा में आये तो अभी
- 42:30मैं शरीर। मल्टी सेल्युलर में आए तो भी मैं
- 42:34शरीर हूँ फिर चलने लगे तो भी शरीर हूँ।
- 42:38ये मान्यताएँ जुड़ती ही कहीं यह मान्यता पहले एक ठीक में पत्थर
- 42:47हूँ। मैं अकेला ही चला था जानवे मंजल
- 42:50मगर। मैं अकेला ही चला था।
- 42:54रानी के मंजिल मकर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
- 42:59आज कारवां बन गया। लोग साथ आते गए और कारवां बनता
- 43:04गया तुम पत्थर थे, तुम पेड़ थे, तुम अबीमा थे, तुम जानवर थे।
- 43:10तुम उड़ने वाले थे, तुम जल में रहने वाले थे लेकिन शरीर था मंथ
- 43:20मैं अकेला ही चला था। पहले ये भ्रांति छोटी थी।
- 43:25शुरू शुरू में भी यात्रा शुरू हुई थी।
- 43:27वहाँ से चेतना का एक अंश आपके साथ ही चिपक गया था।
- 43:32ये यात्रा मैंने बहुत बार बताई है फिर से दौरा दूँ पक जाएगी तो सबसे
- 43:40पहले एक मैं अकेला ही चला था, मैं चली।
- 43:47रानी वे मंजिल मकर धीरे धीरे तुम्हारे रूप बदलते गए, पेड़ हुए,
- 43:57जानवर हुए, मल्टी सेल्यूलर हुए, चलने वाले हुए, उड़ने वाले हुए
- 44:03लोग साथ आते गए और ये भ्रम। ये है ब्रह्मा एक के ऊपर एक दूसरी
- 44:16तह जमती गई और आज एक विशाल चट्टान हिमालय बन गया।
- 44:27हे ना मान्यताओं का जो के भ्रम? चेतना अलग है और तुम्हारी
- 44:39मान्यताएँ तुम्हारे इल्यूज़न तुम्हारे ब्रह्म अलग, तुम्हारी
- 44:46चेतना धीरे धीरे धीरे धीरे बढ़ती है संग संग।
- 44:51पत्थर से पेड़ हुए, पेड़ से जानवर हुए, उड़ने वाले हुए, चलने वाले
- 44:57हुए, तैरने वाले हुए, जलचर हुए, फलचर हुए, नब्जर हुए तो चेतना
- 45:05धीरे धीरे बढ़ती गई। अब संघ संगली चले हम पहले तो
- 45:13मोलाधार पे थे, चेतना बढ़ी स्वादिष्टान प्यार खे, चेतना बढ़े
- 45:30रूप बदले, बाहर से भी और चेतना बढ़ी भीतर से भी।
- 45:36यह पैरेलल है तो मेरी संग संग तुम भी यात्रा करना, चेतना के नमन
- 45:50चेतना मतलब हर से शुरू होती है। मतलब धार के आगे थोड़ी सी चेतना
- 46:01पड़ी है तुम पत्थर से पेड़ हुए जल हुए, अग्नि हुए आकाश हुए ये सब।
- 46:17जड़ता के ही रोग है। अगर पानी जड़ है और पानी में
- 46:24मेमॅरि है तो पत्थर में क्यों नहीं?
- 46:30पत्थर भी तो इन पंचभौतिको में आता है मिट्टी नहीं आती है।
- 46:39पंचभौतिक पदार्थों में पत्थर भी आता है, पानी भी आता है, आगना भी
- 46:46आता है, वायु भी आता है, आकाश भी आता है।
- 46:55और अगर पानी में मेमोरी है, तो पत्थर में क्यों फिर रेत में
- 47:00क्यों नहीं? लेकिन है वहाँ चेतना छोटी छोटी?
- 47:10लेकिन एक बात को याद रखना बराबर चलते चलिए न एक छोटा सा अं,
- 47:16यात्रा के शुरू में चेतना तुम्हारी संघ चली थी और दे ही
- 47:21बनता गया दे ही क्या है? दे ही यह भ्रम भ्रम याने मान्यता
- 47:28के मैं शरीर हूँ। पत्र कहता।
- 47:30मैं पत्थर हूँ मैं सर, लेकिन उसके संग जो चेतना चलती है, उसकी चेतना
- 47:37उतनी से ही है। बस पत्थर के पत्थर से वह पेड़
- 47:44हुआ, थोड़ी चेतना बढ़ी, फिर उसके नीचे नानक भी बैठे।
- 47:50उसके नीचे गुरु गोविन्द सिंह भी बैठे।
- 47:52घोड़ा बांधा, बुद्ध ने भी कठोर साधना की, महावीर भी बैठे, राम भी
- 48:03किसी वक्त विश्राम किए, कृष्ण जी बैठे, सभी बैठे।
- 48:10कृष्ण ने भी उसकी डाली पे बैठ के मुरली बजाई, चेतना थोड़ी थोड़ी
- 48:18बढ़ती गई, साथ संग असंग चले जाना। मैंने कहा।
- 48:23स्वरूप बदलते गए, चेतना भी बढ़ती गई।
- 48:27वो चेतना कौन सी बढ़ी? वो चेतना वो बढ़ी जो तुम्हारे संग
- 48:31चल अब उसने पूर्णता की तरफ जाना है।
- 48:43यात्रा इतर शरीर की बढ़ती जाएगी, शरीर जड़ता से चेतना की तरफ
- 48:50प्रवाहित होगा और चेतना का भी स्तर बढ़ेगा।
- 48:56क्वांटिटी। क्वालिटी तो उसमें एक ही है जितना
- 49:03प्रेम आनंद शक तुम देखो पत्थर में भी आइटम है, पानी में भी है आवाज
- 49:16में भी है। सब में एक तरफ पदार्थ बढ़ता है,
- 49:27दूसरी तरफ चेतना बढ़ती है। पैरलल जितना जितना आपने तरक्की की
- 49:40शरीर की, उतनी उतनी ही आपकी चेतना की तरक्की हुई।
- 49:47और जब शरीर जब चेतना इतनी ऊंची हो गई या कह दो शरीर ऐसा मिल गया कि
- 49:53उस चेतना को खपाने के योग्य था बड़े भाग मानस था न पावा तो वह जो
- 50:02चेतना का सूक्ष्म अंश था। वह इतना विराट हो गया विशाल हो
- 50:07गया कि वह मानव शरीर को बर्दाश्त कर सकता था तो शरीरों की संरचना
- 50:17बढ़ती गई। पत्थर से बना पुरुष।
- 50:24और चेतना बढ़ती गई। बिलकुल मैंन्यूटली थी, बिलकुल
- 50:31छोटी थी, उससे इतनी बड़ी चेतना हो गई।
- 50:35इसे ही चेतना का विस्तार कहते यात्रा है चेतना की।
- 50:47लेकिन चेतना को चलने के लिए यात्रा के लिए रथ चाहिए।
- 50:52वह रथ है जड़ता का, तो जड़ पहले पत्थर था, अब मनुष्य का शरीर।
- 51:09लेकिन है अभी वो ही पंचतत्व का पुतला बड़ा हर कौन?
- 51:22पदार्थ का तो स्वरूप बढ़ा चेंज हुआ बढ़न चेतना बढ़ी जो आपके संग
- 51:32चली। शुरू से इसको ध्यान से समझ लेना
- 51:38ने बारीकी से शायद आपको किसी शास्त्र ने नहीं समझाया होगा।
- 51:47मुक्त किसने होना किस बूंद ने समुद्र में मिलना और कब मिलना इसी
- 51:56चेतना ने मुक्त होना किस्से मैं शरीर हूँ।
- 52:03रास्ते में जो स्मृतियां आईं, पत्थर में भी स्मृतियां थी।
- 52:07मेरे ऊपर से कोई रथ गुजरा, पेड़ में भी स्मृति थी।
- 52:11मेरी इच्छाएं तले कोई बैठ पानी में भी स्मृति थी, किसी ने मुझे
- 52:16पिया, अग्नि में भी स्मृति थी। किसी ने मेरा उपयोग किया या कोई
- 52:23मेरे भीतर जला सतित्व के कारण उसे भी सिमरती थी।
- 52:33आकाश को भी स्मृति थी, आकाश में तो सारे संसार की।
- 52:40ऐसा सिंधु एक रिकॉर्डर है जो कृष्ण कभी भूल गए, जो तुमने कभी
- 52:46बोला वो खोतन आकाश एक बहुत शानदार रिकॉर्ड है उसके भीतर आज रिकॉर्ड
- 52:54है आज तक दुनिया में जो घटा, कहीं थोड़ा सा खटका हुआ।
- 53:00तो आकाश में रिकॉर्ड हो गया है आकाश एक हार्ड डिस्क की तरह है,
- 53:07जो की बहुत बड़ा है हार्ड डिस्क देखिए कितना बड़ा हार्ड डिस्क है
- 53:14जिसमें सारे। संसार की सभी आहटें सभी स्मृतियाँ
- 53:25नोट हैं। किसने कब क्या बोला सभी रिकॉर्ड
- 53:29है और तुम कंगाल सकते हो, इसका वेह है थोड़े थोड़े इशारों से
- 53:37समझोगे। तो बात भी पूर्णता में हो जाएगी।
- 53:40वक्त भी कम तो पत्थर की यात्रा धीरे धीरे बढ़ती गई और चेतना उसकी
- 53:50जो संघ चली थी वो भी बढ़ती गई और चेतना के बढ़ने से।
- 53:57व्यक्ति के शरीर की आकृति भी वैसी ही बनती गई।
- 54:02यह परमात्मा का एक संरचना है। चेतना बढ़ेगी तो वैसा ही तन
- 54:11मिलेगा। उसे हम भाग्यश्री कहते हैं।
- 54:14बड़े भाग मानस तन पावा। उसकी कृपा, उसका रहमो कर्म,
- 54:27क्योंकि तुम सिर्फ दावा कर सकते हो तुम्हारा है तो क्वेश्चन तुम
- 54:36कह सकते हो जब तक प्राण है, जब तक जान है की ये मैं ये मेरा।
- 54:43जब गिर पड़ोगे प्राण निकल जाएंगे तो तुम्हारा कमाया हुआ कोई और
- 54:53दावा करेगा कि यह मेरा लड़ेंगे आपस में बच्चे?
- 55:00तुम तो कहते तो मेरा है कहाँ गया तुम्हारा, तुम तो शरीर को कहते
- 55:07थे, मेरा आज धरती के ऊपर खाक छन रहा है तुम तो शरीर को कहते थे,
- 55:14मैं हूँ आज कब्रों में दबा पड़ा है।
- 55:18तुम तो शरीर को कहते थे, मैं आज आग में जलकर मुट्ठी भर राख हो गया
- 55:27ये मैं कहाँ गया, तुम क्या हो और तुम्हारा क्या?
- 55:37मैं शुरू से ही कहता हूँ तुम्हारा सिर्फ दावा है, है वह कुछ नहीं और
- 55:46आखिर में ज्ञानी उसी को कहा जाता है जिसने जान लिया कि जहाँ मेरा
- 55:54कुछ नहीं, ऐसा तो है ही। जहाँ मैं भी नहीं और जब वो जानता
- 56:01है कि मैं ही नहीं हूँ तो उसकी मूर्ति बंद हो जाती है।
- 56:12क्यों गूंगा गुड़ खाई के जब ज्ञानी को पता चलता है उसने गुड़
- 56:17खा लिया, उसका स्वाद कहे कौन मुख्य स्वाद?
- 56:23बताने वाला रहता नहीं क्योंकि वो होता ही नहीं, वह मिट जाता है तो
- 56:32दो यात्राएं बिल्कुल पैरल चले एक पत्थर की।
- 56:41शरीर बदलते गए, लेकिन यात्रा तो चेतना की थी।
- 56:47चेतना के बढ़ने के अनुरूप ही शरीर की आकृति बदलती और जब तुम।
- 56:59ऐसी चेतना पर पहुँच गए कर्मी आवे कपड़ा तो उसके रहमो कर्म से,
- 57:06तुम्हारी चेतना बढ़ी है तो सब उसका रहमो कर्म।
- 57:13मैंने पहले भी कहा तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं है यहाँ तक कि तुम ही
- 57:17नहीं। तो उसके रहमू कर्म से बाबा ने
- 57:23बड़ा सुंदर शब्द कहा है कर्मी आवे कपड़ा उसके कर्म से उसके रहम से
- 57:30उसकी कृपा से तुम्हें ये कपड़ा शरीर शरीर को कपड़ा कहते हैं।
- 57:36और कृष्ण भी शरीर को कपड़ा कहते हैं।
- 57:39दूसरे अध्याय में भाषां श्री जृणान्यता विहाय नवानी कृष्णा
- 57:44तीनरो प्राणी तथा श्री राणी विहाय जृणान्यनयानी सयाति नवनिदेही।
- 57:52कपड़ा ही तो कहते हैं कृष्ण। जैसे प्राणों वस्त्रों को त्याग
- 57:56करके तुम नए वस्त्र पहन लेते हो तो कृष्ण ने करता है।
- 58:00इससे शरीर को वस्त्र ही तो कहा ना तो वस्त्र ही बाबा नारायण ने कहा
- 58:06कर मिया वे कपड़ा, उसकी रहमत से ये कपड़ा मिलता है, ये कपड़ा है।
- 58:15तुम इसे मैं कह देते हो तो यह तुम्हारा आज्ञा और सभी आज इस
- 58:25कपड़े को मैं माने बैठ मैं हूँ मैं कौन हूँ।
- 58:33मैं चपरासी हूँ, मैं कौन हूँ, मैं मैं हूँ, मैं चीफ एस हूँ, मैं एम
- 58:39एलए हूँ, मैं एमपी हूँ, मैं सेट हूँ, मैं गरीब तुम खुश भी नहीं
- 58:46तुम हो ही नहीं। न तुम गरीब हो, न तुम जेकारी हो,
- 58:51न तुम राजा हो, न तुम रंग हो, रात को सो जाते हो, तुम्हें तुम्हारी
- 58:54असलियत पता नहीं चलती, क्या बताओ सोए सोए तुम क्या हो?
- 59:03गौर से सोचना। एकांत में किसी घर के कोने में
- 59:08किसी बाग बगीचे के कोने में बैठ जाना और सोचना कि जब तुम गुड
- 59:14सुसुते में गए थे तो तुम कौन थे और राजा थे या र?
- 59:23प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया थे। प्राइम मिनिस्टर राष्ट्रपति ऑफ
- 59:26अमेरिका थे या किसी मामूली दफ्तर के अंदर लगे हुए बैल बजाने वाले
- 59:32चपरौसी थे, कौन थे तुम उस गहन में उसके पास तुम चले जाते हो?
- 59:46इसको सर्जन हारा कहते हैं और सर्जन हारे के पास जाके तुम्हारी
- 59:53सुध वुध भूल जाती है या मेरे पास लोग आते हैं बाबा घर से तो हम लिख
- 59:59के आए थे। ये ये प्रश्न पूछेंगे कि बाबा से
- 1:00:03बतियाएंगे लेकिन यहाँ आकर भूल गए प्रश्न मैंने कहा बेटा यही होता
- 1:00:11है अपने भीतर जब तुम जाओगे, यह तो मात्र एक ट्रेलर है यहाँ आकर जो
- 1:00:16तुमने देखा। असली फ़िल्म तो तुम अपने भीतर
- 1:00:20देखोगे यहाँ सिर्फ यहाँ से तुम ट्रेलर देखोगे कि जैसे बाबा के
- 1:00:27पास आके हम पूछ गए क्या पूछना था भूल गए याद नहीं रहा।
- 1:00:40रात को तुम रोज़ भूल जाते हो, तुम राजा हो, याद रहता है पीएम से
- 1:00:47पूछो, क्या तुम्हें याद रहता है रात को जब सो जाते हो कि तुम
- 1:00:50प्राइम मिनिस्टर हो? कंगाल से पूछो से पूछो गरीब से
- 1:00:56पूछो अमीर से पूछो धनपति से पूछो इंडस्ट्रियलिस्ट से पूछो क्या जब
- 1:01:02तुम सो जाते हो तब तुम्हें पता होता है कि तुम इंडस्ट्रियलिस्ट
- 1:01:06हो, गरीब हो, तुम्हारे सर पर कर्जा है, कर्जदार हो।
- 1:01:11तुम आदमी हो या उर्थ हो, ये तुम क्या हो तुम्हें पता होता है फिर
- 1:01:20जब पता नहीं होता सात 8 घंटे फिर क्या ऐसा तो नहीं है कि वो बात
- 1:01:28सत्य है? तो सारी रात तुमने देखी या ये बात
- 1:01:34सत्य है जो खुली आँखों से तुमने देखी नहीं ये खुली आँखों से जो
- 1:01:41तुमने देखा इसको अगर शंकराचार्य माया कह दें कोई कोई अतिशक्ति भी
- 1:01:47नहीं। इस प्रकार से तो कहा भी जा सकता
- 1:01:52है क्योंकि जब तुम रात को सोए तो तुम क्या थे?
- 1:02:04सकते में जो आखिर में तुम जानते हो वो थे।
- 1:02:08तुम कुछ भी नहीं थे तुम थे ही नहीं सारी रात तुम सोए, तुम थे भी
- 1:02:20ये बताओ मुझे थे तो कौन थे? सारी रात तुम सोए बस वो सत्य है
- 1:02:33क्योंकि सत्य के करीब थे तुम परमात्मा तुम्हारे भीतर है और रात
- 1:02:39को तुम अपने भीतर चले जाते हो। वह तुम्हारे दिन की सर्कस से
- 1:02:47ज्यादा सत्य। और उस सत्य के पास जाके ज़रा
- 1:02:53बताना मुझे तुम कौन थे थे भी तुम पाओगे कि प्राइम मिनिस्टर जो था
- 1:03:03दिन में एंकड़ी कर रहा था, छः बार कपड़े बदल रहा था।
- 1:03:07झूठे सच्चे वायदे कर रहा था। अच्छे दिन ले के आऊंगा लेकिन जब
- 1:03:13सुसुक्ति में गया तो भूल गया कि मैंने वायदा किया।
- 1:03:17कर्जदार दिन में मांगने वाले आ रहे हैं, कैदी को पता होता है फिर
- 1:03:22मैं कह दिया सजा यास्त। गरीब को नहीं पता होता धरे धरे
- 1:03:29कंगाल को नहीं पता होता कर्जदार धनी को नहीं पता होता बेरोजगार और
- 1:03:36प्रेमिष्ट को नहीं पता होता उस समर पे जाके, तुम्हें नहीं पता
- 1:03:44होता। तुम कौन थे?
- 1:03:47पहला बात तो ये और दूसरा तुम थे भी कि नहीं तुम नहीं थे रात को
- 1:03:56अगर होते तो ज्यादा ना होते। तुम्हें सुबह पता चलता है जब
- 1:04:01थोड़े से पूरे तुम एनर्जेटिक हो जाते हो।
- 1:04:05तो मनुष्य के पर्दे पर एक चलता है सपना बस तब तक तुम जो थे वो कौन
- 1:04:11थे? बताओ मुझे सपने से पहले तक सारी
- 1:04:15रात तुम कौन थे और थे भी या नहीं थे?
- 1:04:19बस वही तुम्हारी असलियत है। बाकी तो सब ड्रामा है।
- 1:04:22बाकी तो सब तुम्हारा तोहफा हुआ है।
- 1:04:26जा अगर तुम्हें तुम थौकते हो में तुम उसके पास जाते हो जो सत्य है
- 1:04:33क्योंकि वो भीतर है और भीतर ज्यादा शक्ति का पता चलता है।
- 1:04:39पर बिल्कुल अपने भीतर तुम गुम हो जाओगे, लुप्त हो जाओगे, एकाकार हो
- 1:04:44जाओगे, विलेन हो जाओगे, मिल जाओगे, घुल मिल जाओगे, हो सकते
- 1:04:53है, तुम रहोगे ही नहीं, इंटरमिंगल्ड हो जाओगे।
- 1:05:05सत्य वही है जो अपने भीतर जाके पता चलता और दिन में तो तुम साधना
- 1:05:12के द्वारा तो भीतर नहीं गए, लेकिन प्रकृति के द्वारा तो भीतर तुम
- 1:05:15चले गए ना चलो यहीं से थोड़ा सा तुम इशारा ले लो छोड़ो।
- 1:05:23राम राम को राधा रातों को ध्यान को भी छोड़ो, सब छोड़ो, समाधि को
- 1:05:28भी छोड़ो लेकिन में आ जाओ, यहीं से इशारा ले लो।
- 1:05:34समझदार कहते हैं कि अगर प्रमाण ना मिले प्रत्यक्ष न मिले तो प्रमाण
- 1:05:41से सहारा ले लो। अनुमान से सहारा ले लो, तो अनुमान
- 1:05:49लगाओ की तुम कौन थे राख और थे भी या नहीं थे।
- 1:05:58वह सत्य के ज्यादा करीब है जो रात को तुम थे और दिन को जो तुम हो वो
- 1:06:06सत्य से बहुत दूर है। इसलिए उपनिषद ने कहा वह पास से
- 1:06:13पास है, रात को वह पास से पास हो जाता है।
- 1:06:17और वह दूर से दूर है। दिन में दूर से दूर हो जाता है जब
- 1:06:21तुम रात को कुछ नहीं होते और दिन में प्रमिस हो जाते हैं, वो जो
- 1:06:27झूठ बोलता वो जो कहता अच्छे दिन आएँगे, वो जो कहता बेरोजगारी खत्म
- 1:06:32होगी, 2,00,00,000 रोजगार लेके आऊंगा।
- 1:06:39सत्य से बहुत दूर होता है पर कोई बहुत बड़ी बात नहीं है।
- 1:06:45फासला इतना नहीं तुम जब चाहो अपने भीतर चले जाओ शु शुबती तो तुम्हें
- 1:06:52लेकर ही जाती है निद्रा प्रकृति। तो तुम थोड़ा साधना के द्वारा
- 1:06:57अपने विद्रोह स्थल पर उतरो और देखो तुम हो कौन क्या वो ही हो
- 1:07:02जिसने गप मारा था? क्या वो ही हो जिसने झूठ बोला था?
- 1:07:07जिसने सो शरारतें करके ये गद्दी अध्यायी थी?
- 1:07:11क्या ये सपना है? यह सत्य है या फिर वो कौन था जो
- 1:07:16रात को तुमने देखा? सत्य दो नहीं होते, सत्य होता है
- 1:07:22या तो वो सत्य है जो तुमने रात को देखा, शांत थे।
- 1:07:26बिलकुल तुम्हें पता नहीं तुम कौन थे?
- 1:07:30या तुम ये सत्य है जो तुम कहते हो कि मैं हेकड़े करते हो छाती 56
- 1:07:36इंच फलाना फलाना वो ये वो कत्लोगार्द करते हो, डिटेक्टर
- 1:07:45बनने की चेष्टा करते हो? ये सत्य है या वो सत्य?
- 1:07:50यही चौंगत से कहते हैं, चौंगत से 1 दिन सुबह उठे शीशों को इकट्ठा
- 1:07:55किया शीशे कहने लगे बताओ महाराज कि तुम चाय पानी पी लो पी लिया
- 1:08:02रात को मुझे एक सपना आया। सपने में मैं तितली हो गया और
- 1:08:11तितली भी क्या हुआ मैं एक एक फूल पे जाके, उनके पराग को चूसती हूँ
- 1:08:18उसके रस को चूसती हूँ इकट्ठा करती हूँ तितली हो गया।
- 1:08:26तो शिष्य बड़े हैरान गौर से देखा कहीं पागल तो नहीं हो गया है?
- 1:08:34बात तो बागलों जैसी ही है, सपने तो रो जाता है।
- 1:08:38सभी को तो मैं तितली हो गया तो गुरु ने कहा सुनो पूरी बात।
- 1:08:46रात को सपने में मैं तितली था तो मैं तितली ही था, मुझे नहीं पता
- 1:08:53था मैं चुआंगतसे हूँ, लेकिन अब चुआंगतसे को पता नहीं कि मैं
- 1:08:59तितली हूँ तो ये शक्ति क्या बहुत सत्य मुझे बताओ।
- 1:09:08वो सत्य के जब तुम रात को सपने में सुश्रुति में थे और तुम्हें
- 1:09:12पता नहीं मैं पीएम हूँ और तुम्हें पता नहीं मैं हूँ भी कि नहीं या
- 1:09:18ये सत्य के कतल गारथ करके लोगों की लाशों के ऊपर।
- 1:09:22चढ़कर तुम आज इस गद्दी पर बैठ गए हो।
- 1:09:25ये सत्य या वो सत्य चंगत से कहने का बताओ कि ऐसा तो नहीं कि अब मैं
- 1:09:32भूल गया हूँ कि मैं तितली हूँ यह तब मैं भूल गया था, तितली था कि
- 1:09:37मैं चंगत से हूँ सत्य क्या मैं तो इसी में उलझा खड़ा हूँ?
- 1:09:45अब तो शिक्षक बाद जची शीश हिल के भीतर से बात तो मज़े की है।
- 1:09:53पति की कहीं ऐसा तो नहीं अब तितली सपना देख रही हूँ की मैं चौंक से
- 1:10:00होगी। सपना तो तितली भी देखती है नहीं,
- 1:10:08पता नहीं, तितली को होता है, सपना देखती है कहीं देखती ही होगी जो
- 1:10:13चौण किस्से बन गई चौण किस्से ने स्वर पूछा।
- 1:10:20क्या आप तितली चौंगस्य तो नहीं होगे सपना जब चौंगस्य सपना देख
- 1:10:26सकता है कि तितली हो गया तो सत्य कौन रात को जब तुम्हें याद नहीं
- 1:10:34था कि मैं पीएम था सीएम था मैं एमए था एमपी था।
- 1:10:38मैं सेठ था, कंगाल था, चोटिल था, वो जल था तुम रोगी हो, न रोगी हो,
- 1:10:45तुम क्या हो, पहलवान हो, दुर्बल हो, तुम क्या हो जब रात के सपने
- 1:10:50में तुम्हें पता नहीं तुम कौन हो, रो हो भी के नहीं हो।
- 1:10:55तो बेहतर जाके ज्यादा सत्य के करीब होते होते फिर सच कोन ज़रा
- 1:11:02कोने में बैठते ना और देख सोचो तुम वो हो या तुम वो हो जो रात को
- 1:11:108 घंटे 7 घंटे नींद में गए। सत्य के ज्यादा करीब तो वो रखता
- 1:11:15है इतने घंटे तुम उसके पास हैं फिर ये सिर्फ तुम्हारे पर लांछन
- 1:11:26लगे, तुमने कुछ नहीं किया, सिर्फ वो सपना है?
- 1:11:31हाँ ये सपना है। ये सपना है कह नानक थर कुछ नहीं,
- 1:11:46सपने हों जो संसार संघ सका सब तजगरे कोई अन्य व्यवस्था।
- 1:11:57संघ सखा सब तज गए कोई न निब्यवस्था कह नानक, इस में एक
- 1:12:04टेक रघुनाथ तुमसे भी कहता हूँ, तुम आराम से किसी कॉर्नर में
- 1:12:17बैठते ना घर के और देखो? यह भी हो सकता है कि मैं अब बोल
- 1:12:21रहा हूँ ये सपने में तुम मुझे सुन रहे हो, कोई पक्का नहीं कर सकता,
- 1:12:30सिर्फ जागृत व्यक्ति ही कह सकता है क्या मैं बोल रहा हूँ क्योंकि
- 1:12:37जागृत व्यक्ति अपना साक्षी हो। जागृत कह सकता है मैं साक्षी में
- 1:12:43हूँ और देख रहा हूँ जम्मू बोल रहा हूँ, गले से आवाज आती है, ये
- 1:12:49यंत्र हैं मेरे, लेकिन मैं नहीं हूँ।
- 1:12:58मैं वो हूँ जो इसे बोलते हुए लबों को देखता हूँ मैं वो हूँ जो इसे
- 1:13:04गाते हुए गले को देखता हूँ और जब ये यंत्र टूट जाता है तो मैं
- 1:13:13चाहूंगी तो कैसे कर पाऊंगा? सुर न सजे, कैसे गाव सुर न सजे
- 1:13:27कैसे गाव? कैसे कब टूट गया सारा ऑपरेटर्स?
- 1:13:42भाई संत कहता है जब तेरे प्राण उड़ जाता है।
- 1:13:47उड़ जान प्राण तेरे फिर क्यों नहीं बोलता?
- 1:14:03उड़ जान प्राण तेरे फिर क्यों नी होने वाली कुंजिया?
- 1:14:20तुम फिर क्यों नहीं खोल लेना, क्यों नहीं कहता के मैं हूँ?
- 1:14:27ऐसा ही भीतर जा के होता है उस अवस्था में तुम नहीं कह सकते के
- 1:14:31मैं हूँ कि थै तेरी आंकड़ा कहाँ रहती है छप्पनी।
- 1:14:39ते किथे अभिमान वे कहाँ गया भिवंतर जो चौड़ा सीना करके फिरते
- 1:14:49थे, जब धम्म से गिर पड़ते हो, प्राण उड़ जाते हैं।
- 1:14:57उड़ जान प्राण तेरे फिर क्यों नहीं बोल दा फिर क्यों नहीं?
- 1:15:07बोलता हममे वाली कुंजिया। तेरे क्यों नहीं कॉल लगा?
- 1:15:21फिर क्यों नहीं कहता कि मैं हूँ तो मुमकिन है?
- 1:15:25किथे तेरी आंकड़ा थे किथे अभिमान आए।
- 1:15:35बंदा भरोसा कोई न ऐसी तेरी जान ओय मिटी दया बंधेया तू कादा करे मान
- 1:15:52ओय। परदा परोसा कोई ना ऐसी तेरी जान
- 1:16:03ओय मिट्टी देया। तो यहाँ से चक्करों का भी उत्थान
- 1:16:17होता है। तुम्हारी चेतना के साथ साथ मलाधार
- 1:16:23से स्वादिष्ठान से अनाह क्षमा करना।
- 1:16:26मणिपुर, मणिपुर से अनाह, अनहत से विशुद्धि।
- 1:16:36मैं शुद्ध से आपका चक्कर उत्तररोत्तर तुम्हारा आनंद बढ़ता
- 1:16:43जाएगा। मूलाधार पे कम स्वादिष्ट स्थान से
- 1:16:49उससे ज्यादा मणिपुर से उससे ज्यादा।
- 1:16:54अनाहत पे उससे ज्यादा विश्वदीप उससे ज्यादा और आज्ञा चक्कर पे
- 1:17:00बहुत ज्यादा आज्ञा चक्र पे तुम मालिक को जाते हो, एक तरह से अपनी
- 1:17:09इन्द्रियों के मालिक को जाते तो मैं इंद्रा हो जाते।
- 1:17:13आज्ञा देने में समर्थ हो जाते हो, इसलिए इसका नाम आज्ञा चक्र रखा है
- 1:17:18और जैसे जैसे चक्करों का उत्थान होता है, चक्र कूदते हैं,
- 1:17:22तुम्हारी चेतना भी ऊंचाइयों को छूती है।
- 1:17:28संघ संग चलते जाना मैं पहले भी बता।
- 1:17:36इससे ही चेतना का उत्थान करते हैं।
- 1:17:46दो चक्र तुम्हारे नहीं खोले दो द्वार तुम्हारे नहीं खोले इसे लिए
- 1:17:50अभी तो नव द्वारपुरी नहीं है अभी अस्त द्वारपुरी।
- 1:17:55ये जो दो नोस्त्रण हैं, जो में जा के ट्रैकियों के द्वारा पिपरों
- 1:17:59में विश्वास देते हैं। यह एक द्वार है, इसको तो गिन लिया
- 1:18:06क्या? जिन्होंने दो कहा उनसे पूछा मैंने
- 1:18:13तो एक ही जानो। एक ही बोलेंगे मैं वही कहता हूँ
- 1:18:19जो मैंने देखा मैं कहता हूँ आँखों देखी
- 1:18:32तो आज्ञा चक्कर से ऊपर है वो है दशम द्वार आठ द्वार विशुद्धी
- 1:18:40चक्कर आठ। ऊर्जा के हिसाब से कहता हूँ,
- 1:18:51द्वार के हिसाब से तो सारे हिसाब हैं चक्रों के हिसाब से, लेकिन नव
- 1:19:00पुरी के नव द्वार पुरी के हिसाब से देखें तो यह।
- 1:19:05अनाह यह आज्ञा और यह सहस्रार ये दो खुले बाकी है।
- 1:19:14अब वो चेतन के पास आ जाएं जो देही के संग संग चुनता है, जैसे जैसे
- 1:19:19वो इन चक्करों को पार करती है, द्वारो से ऊपर जाती है।
- 1:19:25जैसे ये मुराधार में होता है तो तुम काम बासना से ग्रस्त हो।
- 1:19:31थोड़ा ऊपर उठे स्वादिष्टम थोड़ा सोर ऊपर उठे, मणिपुर में थोड़ा
- 1:19:36सोर ऊपर उठे ना और ऊपर उठे आज्ञा चक्कर में थोड़ा सा और ऊपर उठे।
- 1:19:46सात द्वार चक तो दो द्वार अभी नहीं खुले आज्ञा का द्वार अभी
- 1:19:55नहीं खुला और जया का द्वार अभी नहीं खुला।
- 1:20:00जैसे जैसे ऊर्जा घनी होती जाएगी, प्रचुर मात्रा में होगी।
- 1:20:14हमें मनुष्य का शरीर मिलेगा। नगरी मोक द्वार सिर्फ मनुष्य पे
- 1:20:21ही नजर होती है उसकी कभी चिड़ियाएं नहीं पहुंचती।
- 1:20:26कभी हाथी नहीं पोंछता, कभी शेर नहीं पहुंचते, कभी चूहे नहीं
- 1:20:34पहुंचते, लाग सवारी कर लें गजानन की पहुंचते।
- 1:20:49तो इधर सप्त द्वार इधर 10 द्वार इधर सप्त चक्र इधर आत्मा का
- 1:20:58उत्थान तो सूक्ष्म शरीर के भीतर देही अब खिचड़ी मत बना लेना इसकी।
- 1:21:07मैं सारी चीजों को साथ लेके चला देह देह के भीतर देही और देहि के
- 1:21:23साथ लगी हुई सूक्ष्म चेतना वो हो आत्मा उसने ही परमात्मा में विलीन
- 1:21:31होना है। सफर उसका है।
- 1:21:37देही का कोई सफर नहीं देही ने तो बनना है और मित्र जाना है खाक हो
- 1:21:43जाना देही बढ़ता जाएगा, स्मृतियां जुड़ेंगी।
- 1:21:54और तुम्हारा ये संस्कार गहन होता जाएगा कि मैं शरीर और हर एक जन्म
- 1:22:02की स्मृतियां भीतर जुड़ती चली जाएँगी।
- 1:22:04तुम्हारे भीतर अगर तुम बहुत गहरी जाओगे तो थपेड़ों, पत्थरों तक की
- 1:22:10स्मृतियां, तुम जांच पाओगे। कि मैं बुध के वक्त भी था में वह
- 1:22:20पीपल का वृक्ष था, जिसके नीचे बुध इतने वर्ष तक बैठे तप करते रहे।
- 1:22:29यह सारी समितियां तुम्हारे भीतर फीड़े हैं।
- 1:22:33यह सृष्टि तुच्छ नहीं है। विराट इतने विराट किसका और छोर और
- 1:22:46पैमाना मेज़रमेंट तुम बता ही नहीं सकते इससे कभी कमतर मत आंकना।
- 1:22:54इसे तुम्हारी शूद्र संकीर्ण मानसिकता शूद्र की तरह नाप सकती
- 1:23:04है। इतने योजन इतने योजन इतने योजन
- 1:23:09लेकिन उससे कहीं वो? पातर न पातर लख आगा स आगास ओड़ क
- 1:23:19ओड़ क पालत के वेद केण एक पात्र छः सा 18 केण कतेब अस्सुलु एकतात।
- 1:23:28देखा हो त लिख के होए बैनास जो तुम नाम लेख करके जाते हो कैप्सूल
- 1:23:36को दबा के जाते थे धरती पे के आने वाली पुस्तियाँ आएँगी जानकी कहाँ
- 1:23:41एक राजा हुआ करता था एक रानी हुआ करती थी इंदिरा वो पढ़ेंगी लेकिन
- 1:23:47तुम्हें पता नहीं। जब तक ये कैप्सूल उगाड़ा जाएगा,
- 1:23:50पढ़ने वाले खत्म हो जाएंगे, भाषा को जाएगा।
- 1:23:53आज कहाँ है उन शिलालेखों को पढ़ने वाले जो कभी लिखे गए मोहनजोदड़ो,
- 1:24:01हड़प्पा उनके शिलालेखों को तुम पढ़ सकते हो, आज भाषाएँ तो हैं।
- 1:24:08लेकिन उनको बांचने वाले खत्म हैं। आज किताबें तो हैं, शास्त्र तो
- 1:24:14हैं लेकिन उनको बांचने वाले यह मूर्ख आचार्य ही हैं और कभी कभी
- 1:24:22तो ये मूर्खता सर लोग भी कर लेते हैं।
- 1:24:28तो शास्त्र तो हैं, शिलालेख तो हैं लेकिन इनको बांचने वाले, सही
- 1:24:33अर्थों को बताने वाले कृष्ण कहाँ रे अष्टमकर गीता तो है, गीता तो
- 1:24:39है लेकिन गीता को बांचने वाला कहाँ?
- 1:24:43सिर्फ वो ही बांछ पाएगा जो उस स्थल पर गया जहाँ कृष्ण गए, जो उस
- 1:24:49स्थल पर गया जहाँ अष्टाबकरगंज और ऐसा तो व्यक्ति कोई कोटे न कोई एक
- 1:24:55चलत है। कोटे न चलत एक पहुचत है कोटे न
- 1:25:00पहुंचत एक रुकत है। कौन माचेगा?
- 1:25:06अब देखिए प्रोपोर्शनेट करके देखिए क्या एवरेज ढुगी कितने लोग
- 1:25:13तुम्हें बता पाएंगे? क्या कोई आईएएस से ये देख कर के
- 1:25:20उस तरफ से ज्यादा? है लोग पांव छूएंगे ज्यादा देर तक
- 1:25:27मेरा नाम रहेगा भाई नाम नाम यहाँ किसी का नहीं रहता सिर्फ पानी पर
- 1:25:33लिखी हुई रेत के ऊपर लिखे हुए नाम हैं, थोड़ी सी अँधेरी या तेज
- 1:25:38तूफान आएगा उड़ जाएगा। तो जब तक ये कैप्सूल निकाला जाएगा
- 1:25:44इसको बांचने वाले भाषाविद् हो जाएं तो मत चेष्ठएँ करो, सब भूल
- 1:25:55जाएंगे, नाम ही मिट जाएंगे ये चेष्ठएँ तुम्हारी व्रत।
- 1:26:00तो चलिये हम प्रासंगिक रूप से इकट्ठा ले इधर सात चक्रापार कर के
- 1:26:12दशम द्वार तक पहुंचोगे। इधर आनंद में खुश अन्न में खुश मन
- 1:26:23में खुश विज्ञान में खुश आनंद में खुश या कोषों की यात्रा भी बराबर
- 1:26:30लीजिए। साथ में ताकि फिर से मुसीबत न हो
- 1:26:34तुम्हें विज्ञान में खुश। ये सारे जो कोष हैं ये चक्करों से
- 1:26:41ही समझ लेते हैं। बस किसी ने कैसे बोल दिया, किसी
- 1:26:46ने उर्दू बोल दिया, किसी ने चीनी बोल दिया, किसने फ़्रेंच सी बोल
- 1:26:50दिया, किसने हिंदी को बोल दिया, किसने तेलुगु मरठी बोल दिया?
- 1:26:59लेकिन बात एक ही है, कहने के ढंग अलग है मुक्त किसने होना है, दे
- 1:27:12ही क्या है? दे ही तो रोज़ बढ़ता जाएगा पत्थर
- 1:27:17के भीतर दे ही सिर्फ इतना ही था। एक छोटी सी लकीर कि मैं पत्थर हूँ
- 1:27:24मैं अकेला ही चला था जाने के मंचल मकर फिर पेट बने फिर अमीबा बने
- 1:27:32फिर ना जाने कितने 84 लोग लाख यूनियां कहते हैं, है तो क्या?
- 1:27:37लेकिन उसमें सब में तुमने माना के मिश्रित और वो तह जमती गई।
- 1:27:43लोग साथ आते गए और कार वहाँ बनता गया और आज ये हिमालय बन गए।
- 1:27:49आज ये मान्यता ही हिमालय के पहाड़ बन गया आज ये मान्यता ही तुम्हारी
- 1:27:53स्मृतियां, तुमने क्या कुछ किया उस जीवन में?
- 1:27:57कौन कौन तुम्हारी इच्छाम तले बैठा किस किसने पानी पिया, कौन कौन
- 1:28:01आपके भीतर सति, ये सब समितियां तुम्हारे भीतर है और आज एक विशाल
- 1:28:08सुमेरु पर्वत हिमाजा पर्वत बन गया है अब इसको ढाओ कि कैसे सत्य को
- 1:28:14देखो कैसे बिना ढाए। बेहतर हीरा छिपा उसे देख नहीं
- 1:28:19सकते, उस हीरे को पाना है हमें और वह मिलता है बिल्कुल वैसा ही आनंद
- 1:28:30जैसे तुम शिशुक्ति के पास रात को पहुँच जाते हो सब भूल जाते हो।
- 1:28:35मैं हूँ ये भी भूल जाते हो ये सत्य है इसलिए ये बोलती बंद हो
- 1:28:43जाती है। जुबान तो है लेकिन बोले कैसे
- 1:28:53अल्फाज़ भी हैं। लेकिन अलफाज़ कमतर पड़ते हैं,
- 1:29:00सतीक है, शब्द नहीं है तो इशारे भी कमतर पड़ते हैं।
- 1:29:05मैं कहूँ वो रहा है चंद्रमा तो तुम इसके टॉप के ऊपर देखोगे नहीं।
- 1:29:09चंद्रमा पापा है ही नहीं, टॉप के ऊपर होता।
- 1:29:15शब्द भी कमतर, भाषा भी कमतर इशारे भी कमतर।
- 1:29:24तब हम मोरल में आ जाए ना जागृत, तुम्हें पता चलेगा तुम्हें सिंचाई
- 1:29:30का ना में पता चलेगा तुम्हें सिंचाई का।
- 1:29:37क्योंकि जागृत में तुम उस तत्व से बहुत दूर हो जिसे उपनिश्चित कहते
- 1:29:42हैं, वो दूर से दूर और शशक्ति में तुम उसके पास तो हो लेकिन शशक्ति
- 1:29:49में तुम बेखुश जानोगे कैसे? तो बाबा कहते हैं वहाँ पहुंचना है
- 1:30:00जहाँ सच और झूठ का नितारा होता है।
- 1:30:10तुझे एवोल्यूशन कैसे होगी? प्रकृति शरीर बदलेंगे।
- 1:30:20पत्थर से तुम मानस शरीर में आ गए, चेतना की छोटी सी बूंद से तुम उस
- 1:30:29चेतना के स्वरूप में आ गए। इससे ही कॉन्शसनेस की बढ़ोतरी
- 1:30:33करते है, जो अब समुद्र में सामान्य के योग्य हो गए।
- 1:30:40चक्करों के हिसाब से देखें तो तुम 1000 और चक्कर में होता है।
- 1:30:47कोष के हिसाब से देखें तो तुम अनवे कोष से आनंद कोष में पहुँच
- 1:30:52चूका है। ध्यान से सुनते रहना बात अब मैं
- 1:30:56मौर्य रूप में बता रहा हूँ। कौन सा तल ठीक है?
- 1:31:02वह जो रात को हम सत्य के अंदर थे, जब कोई दरिद्र, दरिद्र ना था और
- 1:31:12धनपति धनपति ना था, किसी के पास कोई वादा ना था, डिग्री ना थी।
- 1:31:18कोई अनपढ़ नहीं था, कोई सूझवान नहीं था, किसी के पास 50 डिग्रीज़
- 1:31:24नहीं थी, कोई बाई भाषाओं को नहीं जानता था, वो सत्य या जी सत्य तो
- 1:31:32वह बनाने किसको बात को साफ करते हैं?
- 1:31:3434। कच्छ पकाई, ओथेपाई नानक गया जापे
- 1:31:43जा झूठ क्या है सत्य क्या है? कच्छ पकाई ओथेपाई क्या झूठ क्या
- 1:31:52सत्य? चोंगत् से पूछ रहा कि वह सत्य या
- 1:31:57यह सत्य तितली हूँ या चोंगत् से हूँ तो नानक के सधौता को दूर करते
- 1:32:07हैं। नानक गया जप्पे ज।
- 1:32:17वहाँ पर जाने से यह पता चल जाएगा सत्य का और लूट का फिर सुन लो इस
- 1:32:24बात को चौंतीसवीं ओढ़ी है कच्छ पकाई ओथे पाई सच और जूट का
- 1:32:31निपटारा वहाँ होता है। उस स्थल पर जाकर पता चलता है कि
- 1:32:36स्वप्न ठीक था। यह संसार स्वप्न है या माया है?
- 1:32:42सत्य है क्या व्हाट इस दी ट्रुथ जीवन का संसार का इतनी बराठ।
- 1:32:53रचना का सत्य क्या है? कच्छ बकाई ओथे पाई नान क गया जा
- 1:33:00पे जाई। वहाँ पर जाकर ही पता चलता है सच
- 1:33:08क्या है और झूठ क्या है वहाँ जाए बिना पता नहीं चलता।
- 1:33:12खोपड़ी में बैठे बैठे नहीं पता चलता सत्य क्या और झूठ क्या है?
- 1:33:19फिर तो प्रश्न उत्तर ही करते हो, यह तो ठीक लगता है बाबा माथे पे
- 1:33:28हाथ रख दोगे भीतर उतर जाऊं। यह बात उतरती नहीं गलत से नीचे बस
- 1:33:33तुम बैठे बैठे ऐसे ही बात के पथ पर होते लोग हैं, मरने से डरते हो
- 1:33:43अपने भीतर जाते नहीं हो और मैं तुम्हें अपने भीतर ले जाना चाहता
- 1:33:47हूँ। उस स्थान पर जहाँ पर कच्च पकाईयो
- 1:33:50से पाई नानक गया जा पे जाई, जहाँ पर जाकर तुम्हें समझ आ जाए कि
- 1:33:58चौंगस से सही है, या त्रि सही है। सपना यह है कि सपना।
- 1:34:08तुम चीफ मिनिस्टर हो, प्राइम मिनिस्टर हो, यह सही है कि तुम वह
- 1:34:14जो आनंद मैं तुम नींद की अवस्था में शांत मुद्रा में कोई हलचल ना
- 1:34:20थी कोई लहर ना थी। कोई शोर न था, कोई शराबा न था,
- 1:34:30कुछ करना नहीं था, कुछ फिक्र नहीं था, कुछ ये नहीं था कोई और दूसरा
- 1:34:37राजा आ जाएगा। हमारी फाइलें खुल जाएँगी, बस तुम
- 1:34:43निर्भीक थे। तुम निर्भय थे, तुम वहाँ पहुँच गए
- 1:34:51जहाँ न डर है, न भय है, न भय है जहाँ तुम हो, अकेले हो, अकेले हो,
- 1:35:01दूसरा कोई भी नहीं। अरे मिलाऊं कैसे घर जाऊं?
- 1:35:16कैसे लगा चुनरी में लगा छुपाऊं कैसे?
- 1:35:26लगा चुनरी मैला हो गई मैली मोरी चुनरिया, कोरे बदन की कोरी
- 1:35:44चुनरिया। हो गई मैली मोरी चुनरिया, कोरे
- 1:35:54बदन की कोरी चुनरिया। बाबुल से नजरें मिलाऊं कैसे घर
- 1:36:15जाऊं कैसे लगा सुनरी मैदा? छिपाओ कैसे लगा चुनरी में लाग
- 1:36:30छिपाओ कैसे घर जाऊं कैसे लगा चुनरी में लाग?
- 1:36:43छुपा हूँ कैसे इलाका चुनरी मैदा इस संसार में घूमते घूमते
- 1:36:53तुम्हारी चदरियाँ मैली। हो गई तुम डरते हो?
- 1:37:02इसमें दाग क्या है? लाखा चुनरी में दाग मिटाऊं कैसे
- 1:37:09तुम डरते हो उसके पास चलने से दो जो बेदाग जो बेलाग और उससे कुछ
- 1:37:20छुपता नहीं? छिपाऊँ कैसे?
- 1:37:26क्योंकि वह सब जानता है घर जाऊं कैसे यह तो तुम्हारे नकली घर है,
- 1:37:34इसलिए तो 150 साल यहाँ रहते हो और फिर असली घर में जाना होगा।
- 1:37:41हो गई मैली मेरी चुनरी कोरे बदन की कोरी चुनरी या कोरी थी बेदाग
- 1:37:53थी कबीर की तरह। कबीर तो जैसे उड़ते हैं, वैसे ही
- 1:38:00रख देते हैं जो किंतु धरती नहीं बड़े जत्न से ओढ़ी थी, लेकिन
- 1:38:10तुम्हारी चद्रियां मैली हो गई है, दाग लग गया है, पर वह दाग
- 1:38:15परमात्मा से ही छिपता नहीं। तुम दविदा में हो जब भी अपने भीतर
- 1:38:26जाने की चेष्टा करते हो, परमिता परमात्मा के पास जो तुम्हारा
- 1:38:32बाबुल है। तो ये दाग याद आता है ये कुकरम यह
- 1:38:46डकैतियाँ, ये चौरे हत्याएं, कष्ट, क्लेश सब याद आती हैं, ये दाग हैं
- 1:38:54तुम्हारी। कोरे बदन पे कोरी चुनरिया थीं
- 1:39:02लेकिन तुमने भाग कर कर के इस पे दाग लगा दिया इसी से डरते हो तुम?
- 1:39:15और मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। तुम ध्यान से क्यों डरते हो?
- 1:39:21तुम राम राम क्यों करना चाहते हो? तुम क्यों चाहते हो कि राधे राधे
- 1:39:25करते रहें, क्योंकि अपने भीतर जाने से डर लगता है?
- 1:39:31कौन सा मुखड़ा लेके जाऊं उस बाबुल के पास?
- 1:39:37ये है चुनरिया पे तो दाग जब गए पापों के अहंकारों के
- 1:39:44डिक्टेटरशिप्स के क्या बोला था। ये बाबुल से छिप न सकेगा बाबुल तो
- 1:40:01सर्व के है, सर्व व्याप्त क्या है?
- 1:40:05सर्व शक्तिमान है वह तो सब जानता है कि तुमने क्या कुछ किया और
- 1:40:14कोरा भेजा था परमात्मा ने तो तुम्हें?
- 1:40:18और तुमने इस चुनरिया पे दाग रिकॉर्ड किया मत सोचना कि मैं
- 1:40:24नहीं जानता कि क्यों तुम नामदारियों के पास जाते हो, मैं
- 1:40:28अच्छी तरह से जानता हूँ, भीतर जाते हुए तुम्हें मैंने बहुत से
- 1:40:34लोगों को जब ध्यान करना सिखाया, उठ के भाग गए।
- 1:40:39घबराहट होती है पापा बेहतर ये घबराहट तुम्हारी खुद की पैदा हुई
- 1:40:45है। ये पापों की घबराहट है जो तुमने
- 1:40:47पाप किया और अब तुम उन्हें निहारना नहीं चाहते कि तुमने क्या
- 1:40:52क्या पाप किया है। लेकिन नहरना तो पड़ेगा प्रत्येक
- 1:40:56दिन उसके बिना तुम शुद्ध बुद्ध ना हो पाओगे तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा
- 1:41:04हो रसेली आत्मा हो आनंद से भरपूर हो शिवा हम शिवा, हम तुम शिव सुर।
- 1:41:12देखो चोको मत, थोड़ा वक्त लगता है लग जाने दो तुम अपने भीतर उतरो और
- 1:41:24देखो तुमने क्या कुछ पाप किया, क्या कुछ पुण्य किया?
- 1:41:31और पापों से घबराओ मत बोलो, उस परमपिता परमात्मा से, उस बाबुल से
- 1:41:41के अपनी कचहरी में दंड दे कच्छ पकाई ओथेपाई नान क गया जापे जाई
- 1:41:49सच और झूठ का वहाँ? पर्दा खुल जाता है।
- 1:41:53तुम्हारा रहस्य खुल जाता है, तुम वहाँ जाओ, वहाँ जाने से तुम जीस
- 1:41:59आनंद की तलाश में हो तुम्हारा रास्ता भड़क गया है रस्ता तुम्हें
- 1:42:06तुम्हारे गुरु ने गलत बता दिया। गद्दियाँ पाकर सम्मान पाकर बखान
- 1:42:12पाकर अवतार घोषित करके मैं आनंद में ही हो जाऊंगा तुम गलती में हो
- 1:42:19किसी ने तुम्हें बहका दिया है आनंद मिलेगा तुम्हें तुम्हारे
- 1:42:24अंतःस्तर में तुम्हें तुम्हारे अपने होने में जो तुम स्वम हो।
- 1:42:29वहाँ चले जाओ, कच्छ पकाई ओथे पाई नानक गया जा पे जाई, तुम डरते हो
- 1:42:36इसलिए तुम नामधारियों के शरण में चले जाते हो।
- 1:42:42भीतर जाने में बड़ा डर लगता है क्योंकि भीतर कूड़ा भरा हुआ है,
- 1:42:47दुर्गंध है, गटर है। किया ही तुमने ऐसा है अच्छा किया
- 1:42:55हो तो सुगंध आती बाघवाँ की बगीचों की, बागों की फूलों की किया तो
- 1:43:03अच्छा है जब से जन्मे हैं। ऐसा ही कुछ किया है जो दुर्गंध
- 1:43:10हो, लेकिन घबराओ ने तुम घबराओ ने तुम मेरे क्षण में आ जाओ
- 1:43:18सर्वधर्माण पर तज्य माँ में कम क्षण मृ।
- 1:43:29तुम निश्चिंत हो के मेरी क्षण में आ जाओ, मैं तुम्हें निश्चय पाप कर
- 1:43:34दूंगा, तुम्हारा दाग धो दूंगा और फिर से चुनरिया साफ हो जाएगा।
- 1:43:45आत्मा। छोटी सी चेतना की आत्मा भी संग
- 1:43:50संग बढ़ती है यह प्रगति यह तरक्की आत्मा की है जो पत्थर में जितनी
- 1:43:59थी नेगली, जीवन अब आके विराट हो गई मानस्तर में और विराट हो गई।
- 1:44:05तब विराट में ही खोएगी उसे ही कहते हैं।
- 1:44:10बूंद समान ही संबंध में वह जो बूंद थी, वह आज इस योग्य होगी।
- 1:44:19तब इस योग्य नहीं थी जैसे आज जड़। चेतना में चमके एक आकार नहीं हो
- 1:44:27सकता आज नमक पानी में चमके एक आकार नहीं हो सकता, घोल सकता है
- 1:44:37मिल नहीं सकता डिज़र्ब हो सकता है मर्ज नहीं हो सकता।
- 1:44:46अभी तुम नमक की तरह और बनना है। हेच टू ओह की तरह पानी की तरह
- 1:44:52पानी की बूंद ही समुद्र में समा सकती है।
- 1:44:56नमक की बूंद समुद्र में नहीं समझ सकती क्योंकि केमिकल फॉर्मूलेशन
- 1:45:01अलग है। कहाँ एच टू कहाँ एनई सी एल तो अब
- 1:45:06चेतना इतनी बढ़ गई कि योग्य हो गई समुद्र में समान तब देर मत करो
- 1:45:20अवश्य चेतना को। उस परम विराट समुद्र में उतार
- 1:45:30कृष्ण में हो जाओ, कबीर में हो जाओ, नानक में हो जाओ, मीरा में
- 1:45:38हो जाओ, हजरत में हो जाओ। तुम उनके साथ एक आकार हो जाओगे,
- 1:45:52पाओगे वो वहीं हैं तो कहीं गए नहीं, अब वेला आ गया जब चेतना बढ़
- 1:46:03गई। सभी स्थानों को पार करके सभी
- 1:46:09चक्रों को पार करके मूलाधार से उठी और सहस रात तक पहुँच गए।
- 1:46:17अब वेला है कि सहस राष्ट्र से बाहर चला जाए।
- 1:46:24और उस परम समुद्र में आनंद के समुद्र में खोया जाए और उससे न
- 1:46:31मिटने वाले, न गटने वाले समुद्र में एकाकार हुआ जाए।
- 1:46:38जहाँ जो चला जाता है वो ना वापस से नहीं आता।
- 1:46:54धन्यवाद।