Latest / Baba ji Vijay Vats / 22 Jan 25 - ईश्वर प्राप्ति के लिए क्या योग्यता आवश्यक है? कोरे कागज हो जाओ! कबीर उस तल पर पहुंच कर भी चोरी क्यों करते हैं?
Transcript
- 0:16मुक्ते शरणन नगर्जनों का शून्य बात कल आप बोलने से शुरू हुए थे,
- 0:33लेकिन बोले नहीं। कृपया नागार्जुन का शून्य बाद
- 0:41इसके ऊपर अवश्य प्रवचन करें। एक प्रश्न और।
- 0:52आपके बोलने से लगता है कि आपने सभी ग्रंथों का अध्ययन किया है,
- 1:05इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे। संबोधि से पहले क्या आपने सभी
- 1:12शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था? इस मामले में मैं भाग्यशाली रहा,
- 1:31बहुत भाग्यशाली रहा कि संबोधि से पहले मैंने कोई शास्त्र नहीं पढ़ा
- 1:40था, कोई शास्त्र का मतलब। कोई शास्त्र?
- 1:49यहाँ तक कि मैं आरती भी नहीं जानता था।
- 1:57अध्यात्म का काखा गाह मुझे नहीं आता था और तुम्हें भी एक बात
- 2:06समझता। हूँ।
- 2:13जितना पढ़ते जाओगे उतना खोते जाओगे क्योंकि जितना लिखा
- 2:22ब्लैकबोर्ड पे ध्यान रखना उसे डस्टर से मिटा देना होता है।
- 2:33उसके दस्तखत सिर्फ खाली ब्लैकबोर्ड पे होते हैं, कुछ भी
- 2:42लिखा, कुछ भी लिखा तो वह सिग्नेचर नहीं कहेगा।
- 2:51थोड़े शब्दों को ज्यादा समझना इस मामले में मैं बहुत भाग्यशाली था।
- 3:03नहीं पता था कुछ साइंस का स्टूडेंट था।
- 3:09बस मेढक जीर्ण होता था कॉकरोच खरगोश अगर पता था तो इनके बारे
- 3:18में पता था अगर आप कहो योग वशिष्ट, पतंजलि, महावीर बुद्ध मैं
- 3:28कुछ नहीं जानता था। और तुम्हें भी कहूंगा तुम भी कुछ
- 3:35मत जानना अगर पहुंचना है तो देखिए या तो सूचना ही संग्रहित कर लेना
- 3:44संसार की हूँ या अध्यात्म की हूँ। या खुशी प्लेज़र, आनंद, मस्ती,
- 3:58खुमारी अगर इसको चाहते हो। तो सूचनाओं को डिलीट कर देना
- 4:09फॉरवर्ड कर देना सर ये करना ही पड़ेगा अगर तुम सोचो की पदार्थ के
- 4:21बारे में जानकर। पदार्थ के रहचायिता के बारे में
- 4:26आसानी से जाना जा सकता है। तो तुम गलती में हो यू आर ऑन
- 4:30मिस्टेक तुम्हारी सोच गलत दिशा में जा रही है और तुम्हें
- 4:41तुम्हारे मार्गदर्शक बज जाते हैं। पृथु ने पूछा है, फिर इतनी बातें
- 4:52आप कैसे जानते हो? देखिये एक बात समझना जो भाषाविद्
- 5:00है जो भाषा का ज्ञान रखता है। जो लैंग्वेज का मास्टर है वह सभी
- 5:08किताबों को पढ़ लेगा। कोई नोबल हो, कोई धार्मिक ग्रन्थ
- 5:13हो, कोई भी साहित्य हो, सभी को पढ़ लिखा लैंग्वेज आनी चाहिए।
- 5:22बस मैं लैंग्वेज का मात्र हूँ जिसके बारे में शास्त्र कुछ बोलते
- 5:31हैं, मैं उसके पास पहुँच गया। हूँ।
- 5:42अब मैं कोई भी शास्त्र पढ़ सकता हूँ और कोई भी शास्त्र पढ़कर उसका
- 5:48मतलब बता सकता हूँ, लेकिन अगर तुम कहो कि सभी शास्त्रों का ज्ञाता
- 5:54हूँ मैं तो तुम गलत कहते हो। सभी शास्त्र जिसके बारे में बोलते
- 6:03हैं, मैं उसका क्या था एक बार फिर समझ लो काम की बात है बुनियादी
- 6:13बात है। ये मत समझना कि मैं सभी शास्त्रों
- 6:19के बारे में बोल लेता हूँ तो सभी शास्त्रों का मैं ज्ञातता हूँ।
- 6:25सभी शास्त्र जिसके बारे में बोलते हैं, मैं उसका ज्ञात हूँ।
- 6:32मैं उसके पास पहुँच गया हूँ। ऐसे व्यक्ति को सर्वज्ञ कहा गया
- 6:36है। तुम सर्वज्ञी की परिभाषा गलत ले
- 6:40लेते हो, तुम सर्वज्ञी की परिभाषा ले लेते हो कि वह तो कंप्यूटर भी
- 6:47जानता होगा। अपना कबीर कंप्यूटर कैसे चला सकते
- 6:53हैं? नानक एआई का प्रयोग कैसे कर सकते
- 6:57हैं? नहीं, ये तुम्हारी बात की इजादें
- 7:03हैं और इजादें होती ही रहेंगे इजादें बाहर के तल पे हैं, इजादें
- 7:09होती हैं सफीर पे और तुमने पहुंचना होता है केंद्र पे।
- 7:17आज कुछ इज़ादे जो हैं वो कल और बढ़ जाएंगे।
- 7:24लेकिन उससे जिसने वो तत्व जान लिया जिसके जानले से सब शास्त्र
- 7:33जान लिए जाते हैं। वह सर्वज्ञ हो गया।
- 7:41सारे शास्त्र पढ़ने से कोई सर्वज्ञ नहीं होता, सर्व ज्ञात
- 7:45नहीं हो जाता, सर्व कलाओं का निश्रणात नहीं हो जाता।
- 7:50वह बस एक को जान लिया। जिसके बारे में सभी शास्त्र बोलते
- 7:57हैं। सभी किताबें बोलते हैं तो तुम सभी
- 8:02जान लोग है। लाओ से जरूरी बात नहीं कि सारी
- 8:08भाषाओं को जानते हैं। भाषाओं तो रोज़ नई खड़ी होती है।
- 8:14सभी भाषाओं को नहीं जानता वो सभी भाषाओं में जो लिखा गया है
- 8:21परमात्मा के प्रति उस तत्व को वह जानता है इसलिए वो है सर्वज्ञ है।
- 8:32सर्वभज्ञ के अर्थ के आप किसी भी शास्त्र का कोई भी शब्द निकाल लो,
- 8:39उसका अनुवाद जो मैं भाषा जानता हूँ, उसमें आप कर दो उत्तर मेरे
- 8:45से ले लो अगर तुम कलको कहो। मैं तो गाड़ी भी चलाना नहीं जानता
- 8:55जब सीखी। ही नहीं, मैं।
- 9:00साइकिल चलाना जानता हूँ मोटर साइकिल चलाना जानता हूँ, अगर कहो
- 9:06गाड़ी चला लो नहीं जानता। तो गाड़ी चलाने का मास्टर मुझे
- 9:12बुद्धू कह सकता है। कोई हर्ज नहीं है लेकिन गाड़ी
- 9:17चलाने में बुद्धू हूँ। उस तत्व को जानने में वह बुद्धू
- 9:26है जो रोज़ ड्राइविंग करता है। इधर से उधर लाखों यात्रियों को
- 9:31लेके जाता है। सांसारिक विद्याओं को एकत्रित
- 9:39करना उस एक के बारे में जानना नहीं होता।
- 9:47इसलिए मैं सदा से कहता हूँ ये सार लोग जो तुम्हें स्वपन दिखाते हैं,
- 9:52सुनहले ये बना देंगे, वो बना देंगे, आई एस बना देंगे, डीसी लगा
- 10:01देंगे, कोलेक्टर लगा देंगे, लगा देंगे।
- 10:07विलशक लेकिन बात तो यहाँ खत्म होती है कि कुछ भी लग जाओ चैन
- 10:16मिलता है बात कलेक्टर रखने की कहा।
- 10:29बात चीफ मिनिस्टर या प्राइम मिनिस्टर बनने की कहाँ है?
- 10:35अध्यात्म की सारी बात आनंद पर खत्म होती है और संसार की सारी
- 10:44बात सूचनाओं पर खत्म होती। संसार में जीतना है तो सोचना ही
- 10:53ज्यादा चाहेंगे, आनंदित मस्त होना है, खुमारी में झूमना है तो
- 11:03परमात्मा को जानना चाहिए। ये दो रास्ते अलग हैं तुमने गड्ड
- 11:09मड्ड कर दिया है। कोई क्या करे और तुम भौचक्के हो
- 11:15गए हो तुम रुढ्द खुर्द हो गए हो सब बीच में चला जाता है, संसार भी
- 11:23और पर मत। ना तुमने संसार ठीक तरह से जाना
- 11:29और ना तुमने परमात्मा जाना एक खिचड़ी सी बन गई है सब चीजों की,
- 11:36मैं कहूंगा खिचड़ी में कहना ठीक नहीं।
- 11:39अन्नकूट बन गया है अन्नकूट में चावल गिरा दिया जाता है चल मोली
- 11:44चल बैंगन। चल पालक जो कुछ आया पटक दिया, बीच
- 11:50में जो मसाला आया बीच में पटक दिया।
- 11:54वह अन्नकूट बन जाता है और अन्नकूट में कुछ भी मिला।
- 11:59दो आलू मिला दो। बैंगन मिला दो, पलक मिला दो साग
- 12:07बना दो, जो चाहे मिला दो तुम अन्नकूट हो।
- 12:14अन्नकूट स्वाद तो बहुत होता है। तुम्हारे टेस्ट बड्स को बड़ा
- 12:20स्वाद देता है। हर वो चीज़ जो तुम्हारे टेस्ट
- 12:24वर्ड्स को स्टिमुलेट करती है, उत्तेजित करती है, वो तुम्हें
- 12:28स्वाद लगती है, इसीलिए कोई भी इंद्री है जो तुम्हें स्टिमुलेशन
- 12:36देती है। तुम कहते हो बड़ा मज़ा आया है।
- 12:41हँसा मत करो, स्टिमुलेशन को तुम मज़ा कहते हो और यहीं चूक जाते हो
- 12:52क्योंकि तुम्हें पता नहीं है कि स्टिमुलेशन मज़ा नहीं है नॉन
- 12:59स्टिमुलेशन। स्टिमुलेशन खुशी देता है मज़े की
- 13:05और नॉन स्टिमुलेशन आनंद की ठहराव देता है आनंद की शीतलता देता है,
- 13:15वट वृक्ष की छाया की तरह है। इस संसार की तप गर्मी के प्रभाव
- 13:22से बचने के लिए तुम उस शिक्षा की शीतलता का आनंद मानते हो।
- 13:35आपके बोलने से लगता है कि आप सब वस्त्रों को पढ़ें थे।
- 13:39नहीं, ये मेरा सौभाग्य रहा, शस्त्र वस्त्र में बाद में पढ़े
- 13:48और अभी भी शस्त्र नहीं पढ़े। अगर सही पूछो तो तुम्हारा प्रश्न।
- 13:55मेरे लिए उत्तर बनके आता है तो मैं रोज़ यही कहता हूँ तुम्हें आई
- 14:00ऍम जस्ट ए साइलेंट लेक पुट सम पुट सम स्टोन थ्रो सम स्टोन एंड दी
- 14:10वेव्स विल अराइज़। दैट वेव्स विल अराइज़ एंड दैट विल
- 14:18बी योर आंसर। तुम इस शांत मन जेल में कंकड़ियाँ
- 14:27फेंको लहरें उठेंगी? और वो जो लहरें उठेंगी वो आपका
- 14:34जवाब होगा। इसलिए मुझे कभी रुलाना मत देना,
- 14:42बहुत लोग मुझे उलाना देते। बाबा आपने मेरी बेइज्जती कर दी,
- 14:45मैंने बेजते नहीं, तुमने कंकड़ ही इस दृष्टि से मारा होगा।
- 14:52मैं उसके लिए जिम्मेदार हूँ। जीस ढंग से कंकड़ मारा, उस ढंग से
- 14:58वेब्स उठीं लहरें उठीं और वो लहरें तुम्हारी कंकड़ियां का
- 15:02प्रणाम थी। इसमें मेरा कुछ नहीं है, मैं फिर
- 15:07मौन हो जाऊंगा। जब तुम्हारी कंकड़य्या का प्रभाव
- 15:13क्षीण हो जाएगा तो मैं फिर मन हो जाऊंगा।
- 15:16मैं सदा से मन हूँ जानता वानता मैं कुछ नहीं जिन्हें तुम शास्त्र
- 15:26कहते हो, कल वो नहीं थे, आज वो हैं।
- 15:30बहुत सी पुस्तकें ऐसी हैं जो 10,000 साल पहले नहीं थी।
- 15:36आपको बता दूँ ये गीता भी 10,000 साल पहले नहीं थी, ऋग्वेद हुई
- 15:4210,000 साल पहले नहीं थी, बहुत सी किताबें जो नहीं थी।
- 15:49तब कौन क्या पढ़ता? था।
- 15:57मैं कुछ नहीं पढ़ा और ये मेरा परम सौभाग्य रहा।
- 16:03अगर मैं कुछ पढ़ लेता तो मैं गायब हो जाता।
- 16:10मैं इस मस्ती और इस आनंद के प्यारे को चूम नहीं करता था।
- 16:18मैं वंचित रह जाता है इस मस्ती से, फिर प्रकृति मुझे पहचाती
- 16:25लाखों जन्मों के बाद। पहुँच तो हर व्यक्ति जाता है उसकी
- 16:36कान्शस्नस की तरक्की में प्रकृति बहुत धीरे धीरे योगदान देती है तो
- 16:44तुम इस शंका में मत रहना कि कोई व्यक्ति श्रद्धा के लिए अज्ञा
- 16:49नहीं रह जाएगा नहीं, यह गलत है। धीरे धीरे प्रकृति जैसे पत्थर से
- 16:54तुम्हे आज मानव तक ले आएगी, वैसे मानव से तुम्हे महामानव तक भी ले
- 17:01जाएगा, संबोधि तक भी ले जाएगी, प्रकृति का दायित्व है, प्रकृति
- 17:07का कम है। पहुँच तो सभी जाएंगे, सभी होने
- 17:13वाले परमात्मा हैं, इसीलिए सभी को प्रणव है, आज नहीं, कल, परसों,
- 17:23नर्सों सभी भगवान हो जाएंगे, पत्थर भी भगवान हो जाएगा।
- 17:29यही सनातन ने हमें सिखाए पत्थर के आगे भी नत मस्तक हो, जड़ता की चरम
- 17:38सीमा, चैतन्य का नेगलिजबल उसके आगे नत मस्तक हो जाओ।
- 17:45क्यों ये होने वाला परमात्मा है? यात्रा यहाँ से शुरू बेशक हुई हो,
- 17:53लेकिन अंत इसका अंजाम इसका परमात्मा है।
- 18:02आगाज़ इसका पत्थर है अंजाम। इसका परमात्मा है कि तुमने पूछा
- 18:14कि लगता है कि तुमने सारे शास्त्र पढ़ लिए?
- 18:16बाबा और फिर सारे शास्त्र पढ़ लिए तो परमात्मा में उतर आया।
- 18:23मैं बड़ा प्रसन्न हूँ, आई वास् जस्ट ए ब्लैकबोर्ड।
- 18:28एम्प्टी ब्लैक बॉक्स, कोरा कागज़। हे मन मेरा लिख दिया नाम उसपे
- 18:45तेरा। गोरा कागज था ये मन मेरा लिख दिया
- 18:56नाम उस पे तेरा अगर उसके। सिग्नेचर चाहिए।
- 19:06अगर तो ऐसे ही टक्करें खानी हैं संसार में तो देखिए तुम स्वतंत्र
- 19:13हो, तुम भटक भी सकते हो, तुम सीधा रास्ता भी पकड़ सकते हो तुम मालिक
- 19:24हो। यही तुम्हारी महत्ता है कि ईश्वर
- 19:29ने तुम्हें इतना अधिमान दिया है। स्वतंत्रता का अधिमान तुम चाहे तो
- 19:35बटको कितना बड़ा मान है यह। सृष्टि का आगाज़ करता सृष्टि का
- 19:44रचना करता सज्जन हरा तुम्हें इतना मान देता है कि तुम स्वतंत्र हो,
- 19:50कुछ भी करने के लिए क्या यह मान कुछ कम है?
- 19:57तुम चाहो तो भटक सकते हो। लेकिन अगर उसके सिग्नेचर चाहिए तो
- 20:07योग्य होना पड़ेगा। योग्यता क्या है?
- 20:11कोरा कागज था ये मन, मेरा लिख दिया नाम।
- 20:21उस पे तेरा तुम कोरे। कागज हो जाओ, मैं रोज़ कहता हूँ
- 20:33शास्त्रों को आग लगा के ये गंगा किस लिए है?
- 20:39ये पवित्र नदियां किस लिए हैं बहादुर?
- 20:41इनमें आग बड़ी पवित्र होती है। जला दो इनमें ये भार हैं तुम्हारे
- 20:50नुरॉन्स पहले खाली हो जाओ और तुम्हें एक बात बताऊँ।
- 20:57जो शस्त्र तुमने आज फूंक दिए, जब तुमने फूंक दिए कोरे हो गए तो
- 21:05अपने सिग्नेचर कर देगा। यह एक क्वालिफिकेशन है।
- 21:16उसके दस्तखत होने के लिए यह एक अनिवार्य योग्यता है।
- 21:24डस्टर से मिटा दो, जो लिखा है और वो दस्तखत कर देगा, वो आता तो
- 21:32बहुत बार है। लेकिन तुम्हारा मनुष्य पटल इतना
- 21:38भरा पड़ा है, वह दस्तखत करे भी तो कहाँ करे?
- 21:44वापस चला जाता है तुमने कोई सहनकारी नहीं छोड़ा और शास्त्रों
- 21:52को आज फूंक दो। कोरे हो जाओ, कोरे हो जाओगे तो वो
- 21:57दस्तखत कर देगा और अब ध्यान से सुनो बात जब वो दस्तखत कर देगा तो
- 22:03इन सभी शास्त्रों को तुम लिखने के योग्य हो जाओगे जो फुके थे तुमने
- 22:10तुम स्वयं अपने हाथों से लिखो। खुद अपने शास्त्र अपने हाथों से
- 22:19लिखो बुद्ध का यही फरमान अपदिबो भव अपने शास्त्र खुद लिखो दूसरों
- 22:27को लिखे शास्त्र क्यों पढ़ते हो वो बोझ हैं दिमाग पर?
- 22:34दीज़ अरे फॉरेन मैटेरियल्स वो विजातीय अद्रव्य हैं, वो फेंकने
- 22:41योग्य हैं। विजातीय अद्रव्य हमेशा ही फेंकने
- 22:44योग्य होता है। देखिये, हमारा शरीर अवांछित
- 22:48तत्वों को बाहर फेंक देता है। पसीने के जरिए मलमुत्र के जरिए
- 22:55अवांछक तत्वों को रखता नहीं वह तुमने पूछा कि सभी शास्त्र पढ़े
- 23:07हैं, भाषा आनी चाहिए। फिर तुम कोई भी किताब पढ़ सकते
- 23:16हो, उपन्यास भी पढ़ सकते हो, धर्म ग्रंथ भी पढ़ सकते हो।
- 23:22भाषा का ज्ञान आवश्यक है। ये बेसिक है, जिसके बारे में
- 23:30शास्त्र बोलते हैं वहाँ पहुँच जाओ।
- 23:35शास्त्र लिखने के योग दूसरों के शास्त्रों पर निर्भर न करो वो
- 23:41तुम्हारे लिए वो जाए और सारी दुनिया दूसरों के लिखे शास्त्रों
- 23:47को ढो रही है। और चल्ला रही है कि हम दुखी हैं
- 23:56और दुख का कारण यही है। दूसरों के शास्त्रों के बोझ को
- 24:01लिए फिरना कोई बाइबल का बोझ उठाए फिरता है।
- 24:05कोई वेदों का बोझ, कोई गीता का, कोई ग्रंथ साहब का।
- 24:10कोई कुरान का, कोई प्राणों का सभी बोझ ढो रहे हैं।
- 24:16असल में इनकी मंशा कुछ और है, ये खुद भी अपनी मंशा को नहीं जानते
- 24:26और जानते हैं तो आपको नहीं बताते हैं।
- 24:30इनका कुछ निहित स्वार्थ है, वो कोई भी हो, धन भी हो सकता है,
- 24:37पदवी भी हो सकती है, कोई संपत्ति भी हो सकती है, कोई मान सम्मान भी
- 24:44हो सकता है, कोई प्रशंसा भी हो सकती है।
- 24:47कुछ भी चाहत अगर तुमने की। तो वो चाहत तुम्हारे लिए बैरियर
- 24:55बन जाएंगे। तुम आगे नहीं जा पाओगे और बहुत से
- 25:01लोग धर्म का उपयोग इन चाहतों के लिए करते हैं, अपनी नीयत स्वार्थी
- 25:07के लिए। भागवत की कथा कह देंगे ₹50,00,000
- 25:13लगेगा अरे भाई ऐसा है क्या? भागवत की कथा कुछ काम का है
- 25:22उसमें? कुछ काम?
- 25:28का नहीं वो फेंकने योग्य किताबें हैं।
- 25:32बहाने योग्य जलाने योग्य किताबें हैं, उनको पढ़ने का 50,00,000
- 25:37लेते हो ये तो तुम बुद्धू बन जाते हो और वो तुम्हें बना लेते हैं।
- 25:47जब तुम्हें टैक्ट आ गया तो तुम खुद ही लोगों को बुद्धू बनाना
- 25:51शुरू कर दोगे, इसलिए तो आज ही यूट्यूब पे इतने बाबा हैं, आप
- 26:00देखो सभी अपनी अपनी किस्मत आजमाते हैं।
- 26:06कोई सुने न सुने, जानते बांधते कुछ नहीं और कबीर को तो अगर कोई
- 26:13सुनने भी न आएगा तो कबीर तो मस्ती में उस प्रभु की महिमा का गीत
- 26:21गुनगुना के बड़ा प्रसन्न हो गए। कोई सुनने भी आ जाए तो भला कोई
- 26:32नभी सुनने भी आ जाए। तो भला एक और पूछने लगा।
- 26:48तानसेन तुम्हारे गुरु कौन हैं? तो तानसेन बोला महाराज मेरे गुरु
- 26:57हैं स्वामी हरिदास जैन मैं उन्हें सुनना चाहता हूँ।
- 27:06क्या मुझे उनके पास ले चलोगे? जब तुम इतना अच्छा गाते हो,
- 27:15तुम्हारे गाने से मेघवर्ष जाते हैं, दीपक जल जाते हैं।
- 27:23गर्म हवाएं लू ठंडी हवाओं में बदल जाता हूँ बिरहा के आंसू निकलने
- 27:31लगते हैं, दीपक बोझे जाते हैं। तो जिसे तुमने सीखा वह कैसा होगा?
- 27:44वह कैसा करता होगा? तानसेन बोला, क्षमा करना महाराज,
- 27:55मेरी तरह वह बकाऊ नहीं। तब लोग ईमानदार थे।
- 28:03सोलहवीं सेंचुरी के पूर्वार्ध में अकबर के जमाने की बात है।
- 28:16हरिदास आध्यात्मिक म्यूजिशियन था। वह जब गाता था तो हवाएं लहरें ठहर
- 28:29जाती थीं। आसमान आंसू बिखेरता था, रोता था
- 28:36आसमान बिरहा के गीत सुनकर। और अस्तित्व झूमता था।
- 28:48उसके झूमर सुन का है तो बोला कि मैंने आपके गुरु को सुनना है।
- 28:58जब तुम इतना अच्छा गाते हो, तुम्हारा गुरु कैसा होगा?
- 29:04एक बार मुझे मिला लो, तानसेन बोला महाराज, क्षमा करना, लेकिन बेहद
- 29:14बिकाऊ नहीं है। वह चंद सिक्कों पर बिकने वाला
- 29:20नहीं। तुम ऐसा मत सोचना कि तुम उसके पास
- 29:26जाकर बैठ जाओगे और कहोगे हम गीत सुनना चाहते हैं और सुना देंगे,
- 29:33ऐसा नहीं। कबीर और नानक भी ऐसा नहीं है।
- 29:39मेरा भी ऐसा नहीं है। मीरा से कहो, नाच के देखाओ तो
- 29:42नहीं नाचेगी और जब नाचेगी तो स्वेच्छा से नाचेगी नाचेगी दखावे
- 29:50से नहीं नाचेगी। भीतर से वो लहर उठेगी और नाच
- 29:54आएगा। भीतर से आनंद की वो मीठी लहरें
- 30:00उठेंगी। नानक गायेगा भीतर से सुरती की वो
- 30:06लहर आएगी और कबीर झूमेंगे। अमृत बरस रहा है भक्तों नाचो।
- 30:18वह बिकाऊ नहीं है महाराज क्षमा करना अकबर तो बढ़ गया, राजा था
- 30:26राजहट, बालहट, त्रियाहट ये तीनों मशहूर हैं।
- 30:39तानसेन बोला ठीक है, लेकिन देखिए वह गाता है, लेकिन जब उसकी इच्छा
- 30:53होती है तब गाता है। वह तुम्हारे कहने से नहीं गायेगा
- 31:00विराट के कहने से गायेगा विराट जब लहरें उत्पन्न करेगा तो वह गायेगा
- 31:08और सही पूछो तो वह नहीं गायेगा हरिदास नहीं गायेगा भगवान गायेगा
- 31:14हरिदास के मुख से गायेगा। तो इंतजार करना होगा कब उसके गाने
- 31:22की इच्छा हो विराट के और कब वो हरिदास के गले का उपयोग करें?
- 31:30क्या ठहर पाओगे? देन लग सकते हैं।
- 31:32प्रभु कोई बात नहीं। अकबर बोला हम इंतजार कर लेंगे
- 31:38बाहर हमारी साजो सामान ले चलो, सारा सामान उठाया, घोड़े, हाथी
- 31:49वगैरह खाने की सामग्री पूरी फौज डेरा डाल लिया दूर।
- 31:58वो जब वो गाएगा तो शहंशाहे आलम हवाएं तुम्हें बताएंगे कि हरिदास
- 32:10गा रहे हैं। क्योंकि हरिदास के भीतर वह विराट
- 32:16गायेगा और विराट के गाने की खबर तो मैं पहुँच ही जाएगी।
- 32:23हवाएं रसीली हो जाएँगी, हवाओं में लचक आ जाएंगे, चलो।
- 32:33चल पड़े जाके डेरा डाल लिया, इंतजार किया दो 3 दिन बीत गए,
- 32:38नहीं गाया बैठे रहे, इंतजार करो वह जब गायेगा तो गायेगा उसको
- 32:50मजबूर नहीं किया जा सकता ना उसको खरीदा जा सकता है।
- 32:55वह बिकाऊ मार नहीं है, वह वक्त का पाबंद भी नहीं है।
- 33:07इतने बजकर इतने मिनट पर ही गायेगा नहीं, वह तो मौज का पाबंद है।
- 33:15मौज जब गाने की होगी तो गायेगा अन्यथा नहीं गायेगा पांच 7 दिन
- 33:25बीत गए, बैठे रहे अचानक आंधी रात और एक स्वर व।
- 33:34अलाप लगा, अलाप लगा और हवाएं महक उठीं।
- 33:42चारों तरफ सुगंदी बिखर गई, आसमान की लहरें ठहर गईं, आसमान रो पड़ा।
- 33:52धरती ने खुशबू बिखेरनी शुरू कर दी, वृक्षों के पत्ते ठहर गए,
- 34:02हिलना बंद कर दिया, पत्ते भी सुनने लगे।
- 34:09बा। मुश्किल ऐसी वेला आती है कि
- 34:11हरिदास गाय वह किसी को दिखाने के लिए नहीं कहते।
- 34:20यही फर्क है राजनीतिज्ञ में और आध्यात्मिक व्यक्ति में राजनीतिक
- 34:30दिखावे के लिए करता है। है।
- 34:33अध्यात्मिक व्यक्ति दिखावे के लिए नहीं करता, आनंद के लिए करता है।
- 34:40जब आनंद का सुरूर गले से ऊपर आ जाता है तो गायन निकलता है तो वह
- 34:47विराट गाता है। एक अलाप लगा और अलाप चलता ही
- 34:55क्या? फिर गायन उभरा, सर उभरे और न जाने
- 35:01कितना वक्त बीत गया। पूरी रात हरिदास गाते रहे।
- 35:11पूरी रात गुजर गई। सुबह का सूरज निकल आया।
- 35:17हरिदास अब भी गा रहे थे। वक्त का कोई पता न चला समय ठहर
- 35:28जाता है। सब उहा बहुत ठहर जाती है।
- 35:36मन बोलता नहीं है, मन सुनता है बस यही बात महावीर ने कहा कि श्रावक
- 35:44बन जाओ, जब श्रावक बनोगे। तो बनोगे तो मन ठहर जाएगा, ठहरा
- 35:51हुआ मन सुन सकता है, भागता हुआ मन सुन नहीं सकता, एक छोटा सा चुटकी
- 36:06लाता है। सबसे बढ़िया अजूबी बात जो कहेगा
- 36:16असंभव बात जो कहेगा उसको प्रथम पुरस्कार मिलेगा बच्चों को कहा
- 36:20गया सबसे अजूबी बात सबसे नामुमकिन बात इम्पॉसिबल बात?
- 36:30जो कहेगा उसको प्रथम पुरस्कार मिलेगा।
- 36:33सभी ने अपनी अपनी बातें कही और प्रथम कौन आया?
- 36:38प्रथम आया जीस। बच्चे ने लिखा कि मैं जा रहा था
- 36:47बाहर डोडी में। एक चार पाई पर चार औरतें बैठी थीं
- 36:55और चारों बोल रही थीं। सुन कोई भी नहीं रहा था।
- 37:01अक्सर ऐसा ही होता है देखना और तुम तुम भी तो ऐसे ही हो।
- 37:10दूसरा भी बोल रहा है तुम भी बोलना शुरू कर देते हो दोनों शोर मचा
- 37:15रहे हैं, सुन कौन रहा है? सुन कोई भी नहीं रहा यही भगवान
- 37:20महावीर कहते हैं कि श्राव को बन जाओ, सब में के श्रवण की कला
- 37:26सिखरो। और सम्म्य के श्रवण की कला वही
- 37:29सीख सकता है जो ठहर गया हो। ठहरा हुआ मन सुन सकता है, वह
- 37:38सुनने की काबिलियत से भर जाता है। सीखने की कला से भर जाता है
- 37:43शिष्य। शून्य की कला से भर जाता है
- 37:47श्रमिक और ये दोनों एक ही बात है, तुम उससे सीखना चाहते हो जो आनंद
- 37:56का खजाना है और तुम उसे सुनना चाहते हो, जो आनंद का खजाना है।
- 38:05और ये संभव हो पायेगा जब तुम ठहरोगे तुम्हारा मन ठहरेगा, लेकिन
- 38:12बात तो यही है, झगड़ा तो यही होता है, मन ठहरता।
- 38:17नहीं। हरिदास गाते रहे, मन ठहरा और जब
- 38:26मन ठहरा तो वक्त का नहीं पता चलता।
- 38:30वक्त कहते किसे हैं अब यहाँ एक बात समझ लेना।
- 38:41तुम्हारा एक कल्प ब्रह्म का 1 दिन क्यों वह ठहरा ही हुआ है तुम एक
- 38:53कल्प तक बोलोगे, एक कल्प तक। जखाई मारोगे तो पूरा कल्प बीत
- 39:04जाएगा, लेकिन ब्रह्म बोलेंगे नहीं, ब्रह्म का 1 दिन होगा और
- 39:09मैं कहता हूँ बनाने वालों ने यह भी गलत बना दिया।
- 39:15ब्रह्म का 1 दिन भी कहाँ होगा? ब्रह्म का तो एक क्षण भी नहीं
- 39:19बीतेगा। क्योंकि वो सदा ठहराये, वो सदा
- 39:23सिधर तुम्हारा 1 दिन और देवताओं का एक वर्ष तुम्हारा एक वर्ष और
- 39:38देवताओं का 1 दिन मतलब। देवताओं का मन तुमसे ज्यादा ठहरा
- 39:46है, जिसका मन जितना ठहरा उतना वक्त ठहर गया।
- 39:54ब्रह्म का मन बिल्कुल ठहरा। ब्रह्म का मन ही नहीं है।
- 40:01तो तुम्हारा कल्प भी बीत जाये, तुम्हारे सहस्त्रो कल्प भी बीत
- 40:05जाये, ब्रह्म का तो एक क्षण भी नहीं बीतेगा, वह सदा से मन है और
- 40:12सदा मन रहे का इसलिए शास्त्रों में लिखा।
- 40:20कि तुम्हारे इतने कल्प बीत गए और ब्रह्म के इतने दिन बीत गए, गलत
- 40:24था। ब्रह्म का कुछ भी नहीं बीतता
- 40:29ब्रह्म सदा मून है, जो परम मून की अवस्था में है।
- 40:33सदा से है आध सच जुगाद सच है भी सच नानक हो उसमें भी सच।
- 40:39वह सदा मौन ही रहेगा। सच यही है जो बोलता है, बोलना तो
- 40:48बकवास है। नाम चाहे राम हो, नाम चाहे कृष्ण
- 40:52हो, नाम चाहे राधा हो, नाम चाही, सीता हो।
- 40:58कुछ भी बोलो बकवास बोलना ही बकवास है, ठहरना ही सो का सागर है।
- 41:10अगर सो का सागर चाहते हो तो ठहरना सीखो, बोलना बंद करो।
- 41:18बोल चाहे कुछ भी रहे हो गाली निकाल लेना, राधे राधे कर लेना
- 41:23बराबर ठहरना सीखो, आज नहीं कल तुम बेला पछताओगे इन सर्कसियों के
- 41:36आगे। क्या सीखोगे तुम?
- 41:40ये बिचारे खुद ही नहीं सीखे, ये तुम्हें बोलना सिखाएंगे और अफसोस
- 41:53की बात है कि तुम्हारा मन पहले से ही बोल रहा है, तुम मन के बोलने
- 41:58से ही। दुखित हो पहले से ही तुम्हारा मन
- 42:02बड़ा ऊह कर रहा है, ऊपर से तुम्हें और बोलना सीखा देते हैं
- 42:08ये तुम्हारे मित्र नहीं हैं, तुम्हारे दुश्मन हैं ये तुम्हें
- 42:14शांति में। आनंद की नींद सोने नहीं देंगे,
- 42:22तुम्हारी नींदों को बेकार कर देंगे कभी दर्शन करो इनके कभी
- 42:31इनका कहा हुआ नाम जपो और तुम वासनाओं से भरे हुए हो।
- 42:38तुम्हें कुछ न कुछ चाहिए और कुछ न कुछ चाहिए तो ये व्यक्ति ये मूर्ख
- 42:45तुम्हें लूट लेते हैं, कोई मंत्र देके लूट लेता है, कोई नाम देके
- 42:53लूट लेता है। बस तुम लूट जाते हो, तुम लूट जाते
- 43:00हो, तुम विराट नहीं हो पाते, तुम जीतने कहो, अदने से वो भी लूट लिए
- 43:08जाते हो इसलिए मैं सदा पुकारना हूँ।
- 43:14मेरे जाने के बाद मेरी बातों को याद करो के आज इनकी कोई कीमत नहीं
- 43:21है। इंसान सदा से ऐसा रहा है।
- 43:25इंसान ने कीमत पाई मुर्दो की। जब वह व्यक्ति चला गया तो उसके
- 43:30इतिहास खंगाले गए। जब व्यक्ति जीवंत था तो उसके पास
- 43:36भी नहीं फटके। कारण कारण अगर जीवंत व्यक्ति के
- 43:42पास जाओगे तो वह तो आ गया। बहुत से लोग मुझे कहते हैं पापा
- 43:48देखो हिम्मत तो कर रहे हैं। लेकिन ब्लॉक मत कर देना हिम्मत तो
- 43:56कर रहे हैं, लेकिन उस तरह मत बोलना।
- 44:13हिम्मत तो कर रहे हैं लेकिन उस तरह मत बोल ब्लॉक मत कर देना पूछ
- 44:22तो रहे। हैं।
- 44:22हम नहीं। मेरा कोई भेजा थोड़े ही खराब है।
- 44:32मैं ब्लॉक इसलिए करता हूँ कि यहीं ठहर जाओ, बस आगे मत चलो ये जो पूछ
- 44:37रहे हैं जो पूछने योग्य हैं पूछने योग्य तो सिर्फ एक बात है पर मौन
- 44:44में उतरें कैसे पहले ही से तुम? इस बोलते हुए मन के सताए हुए हो,
- 44:54पहले ही से तुम इस शोर गुल मचाने वाले मन के सताए हुए हो, ऊपर से
- 45:03ये। कोई किस्त दिनों बाद टोपी डाल के
- 45:13कोई काली पीली दाढ़ी करके तुम्हें बोलना सीखा रहे हैं।
- 45:19तुम पहले से ही बोलने के खिलाड़ी हो, मन के बोलने से पहले ही बड़े
- 45:24तंग हो। ये दौड़ते हुए को भगा देते हैं
- 45:33ज़ोर से जैसे घोड़ा चल रहा है छांटे, मार और तेज हो जाओ और तेज
- 45:40हो जाओ थोड़ा सा तेजी से जमा करो तो सब इच्छाएं पूरी हो जाएंगी और
- 45:45तुम इच्छा उनके गुलाम। बस ये तुम्हारी कमजोरी है और ये
- 45:51लोग तुम्हारी कमजोरी का लाभ उठा लेते हैं।
- 45:54इन्हें पता है कि तुम इच्छाओं के बोलाम पता हो न पता हो कई बार न
- 46:03भी पता हो तो फिर ऐसे मूडानंदों को बोलना भी नहीं चाहिए।
- 46:09जब नहीं पता है तो चुप हो जाओ, खुद आनंद ले लो चुप्पी का, मौन का
- 46:14स्वाद बड़ा निराला होता है, लेकिन फिर कहते हैं हमें अवकार भी करना
- 46:20है क्या खाक उपकार खेलना है, बोलते हो को और बुलाओगे?
- 46:28भागते हुए उनको और दौड़ाओगे यह पुण्य हैं क्या पाप क्यों इतना
- 46:33पाप कमा रहा है? कहाँ दोगे?
- 46:38पहले ही से कुछ पाप करके आए हो जो आज ऐसी दर्शाएं हो गई हैं।
- 46:45धनव होगा। धन तो उनके पास भी बहुत होता है।
- 46:51आप समझे जाओ मान होगा मान तो मिट्टियों को भी आज मिलता है, यह
- 47:00देखो पत्थरों को मान मिलता है। पत्थरों को मान मिलता है, मंदिरों
- 47:09में और है क्या पत्थरे हैं और क्या है तुम्हारे मंदिरों में और
- 47:18क्या है शास्त्र पड़े हैं इनके आगे नत मस्तक हो जाते हो।
- 47:24इनमें जीवन भी नहीं है। फिर भी नत मस्त हो जाती है तो
- 47:29मुड़ताओ की तो पहले ही बहुत अति हो चुकी है।
- 47:32कोई इन शास्त्रों को सर्पेट हो रहा है।
- 47:37सुबह सुबह लोड्स भी कर लगा लिए जाते हैं।
- 47:43एक ग्रंथ ही मेरे पास है। मैंने कहा तुम रोज़ पढ़ते हो?
- 47:47जब जी पढ़ते ही हो या गुणते भी हो, क्योंकि तुम्हारे चाल चरित्र
- 47:55से तो नहीं पता लगता कि तुम गुणते भी हो, तुम सदा भटकाव की स्थिति
- 48:01में रहते हो? बस इतने रुमाले आ गए, इतने इकट्ठे
- 48:06करो और क्या होता है और प्रधान बन जाओ।
- 48:14मैंने एक दृश्य देखा, एक औरत आई गुरुद्वारा के प्रधान में ₹500 का
- 48:20नोट पांव में रख दिया। प्रधान कहने लगा देवी ये ₹500
- 48:27मेरे पांव में क्यों रख रहे हो? ये धन गुरु ग्रंथ साहब जीके अर्पण
- 48:33करो वो स्त्री बोली महाराज प्रधान जी घूम फिर के आ तो आपके ही पास
- 48:42जाएंगे। मैंने कहा, इतनी भी मशक्कत क्यों
- 48:45करनी सीधा आपके ही चरणों में चढ़ा दूँ, आ तो जाएंगे आपके ही पास बस
- 48:51ये लोग ऐसा ही काम करते हैं। तुम्हें पता नहीं होता तुम्हारी
- 48:57आस्थाओं से खिलवाड़ करते हैं और जगह जगह तुम्हारी आस्थाएँ चिपकी
- 49:02हुई हैं। और आस्थाओं से खेलना इनका काम है।
- 49:08यह धार्मिक नहीं है। राजनीतिक लोग राजनीतिक लोग
- 49:13आस्थाओं से खिलवाड़ करते हैं, आस्थाओं का व्यापार बनाते हैं।
- 49:22ये धार्मिक नहीं है। धार्मिकता का लेबल लगा है सिर्फ
- 49:27धार्मिक होना और धार्मिकता का लेबल लगा लेना बिल्कुल अलग बात।
- 49:32है पूछा। है।
- 49:37क्या आपने सारे शास्त्र पढ़े थे? कबीर ने कहा एक साध है सब है
- 49:46जिसके बारे में शास्त्र बोलते हैं वहाँ चले जाओ थिस इज़ ऑथेंटिक।
- 49:52यह प्रमाणिक है शास्त्र जिसके बारे में बोलते हैं तुम वहीं चले
- 49:58जाओ। बस फिर तुम जो बोलोगे वो शास्त्र
- 50:03बन जाएगा और जीवंत शास्त्र के पास जो होता है, वो मुर्दा शास्त्र
- 50:10में नहीं होता। मुर्दा शास्त्र तो सिर्फ मैं बोल
- 50:16रहा हूँ। मैं बोल रहा हूँ तुम्हारे लिए
- 50:21नहीं बोल रहा हूँ यादव करो, तुम सुन रहे हो ये तुम्हारी इच्छा है
- 50:29लेकिन तुम्हारे लिए बोल नहीं रहा हूँ, मुझे लोग कह देते हैं बाबा
- 50:33आपको थोड़े से कम लोग सुनते हैं, मैंने कहा इतने भी सुन लें तो ठीक
- 50:38है। चलेगा।
- 50:40इससे कम भी सुन लें तो भी चलेगा। तो फिर बाबा बोलते के सिला मैं
- 50:46बोलता हूँ उस अंधकारमय युग के बच्चों के लिए उन भावी पीढ़ियों
- 50:53के लिए जब घोर अंधकार होगा और कोई व्यक्ति एक शब्द बोलने का।
- 50:58फ़ीस लिया करेगा तब ये मेरी बातें उनके लिए स्वर्णिम सिद्ध होंगे।
- 51:08उनके लिए बोल रहा हूँ मैं विचारों के लिए, अपनी ही भावी पीढ़ियों के
- 51:13लिए कि उनको दाम न चुकाने पड़ें, झूठ के।
- 51:18और होंगे भी झूठे, क्योंकि सच्चा व्यक्ति परमात्मा का नाम बेचा
- 51:23थोड़ी करता है। परमात्मा का नाम तो बेचा करते
- 51:27हैं, महंगे कवि वो लेते हैं 10 मिनट का ₹20,00,000 और तुम मज़े
- 51:34से दे देते हो महंगे कवि। और परमात्मा के नाम को बेचते हैं।
- 51:43ध्यान रखना गुरु नानक ने कभी परमात्मा का नाम नहीं बेचा।
- 51:49कबीर ने परमात्मा का नाम नहीं बेचा।
- 51:52मीरा ने नाम नहीं बेचा। कबीर को जो सुनने आते हैं।
- 52:00जब प्रवचन समाप्त हो जाता, गरीब थे, जो लाए थे, छीनी छीनी चदरिया
- 52:09बनकर अपना परिवार बोलते थे। प्रवचन समाप्त हो जाता।
- 52:17तो कबीर बड़े प्यार से कहता है नम्रता से भक्त जनो, भोजन करके
- 52:23जाना, खाली पेट न जाना, भूख लग गई होगी और इतनी सहजता से और इतनी
- 52:31भीतरी अंतरंग प्राणों से आवाज़ निकाली।
- 52:36कि चाहे राजा भी क्यों ना हो, उन शब्दों से मोहित हो जाता, बैठ
- 52:43जाता, भोजन करके जाना प्रभु। सामग्री होती नहीं।
- 52:58लोई अपना काम निष्ठापूर्व करती है पुत्र कमाल कहता, पिताश्री, आप
- 53:06सभी को कह देते हो इतना भोजन की सामग्री मैं कहाँ से लेके आऊँ?
- 53:12मैं दिहाड़ी दप्पा करके कुछ कमाई करता हूँ, कुछ आप कमा लेते हो,
- 53:19सभी का भोजन पूरा आता नहीं है, क्या किया जाए?
- 53:23क्या मैं चोरी करूँ कभी? मैंने कहा बिल्कुल करो क्या है?
- 53:32कबीर जानते हैं कबीर जानते हैं कबीर अपनी विराटता को जानते हैं।
- 53:39कबीर के लिए चोरी नाम की कोई चीज़ नहीं होती।
- 53:43कबीर कहते हैं ठीक चोरी कर लो, देखो आए हुए भक्तों को खिलाना तो
- 53:49है। कुछ भी कर लो कमाल तो सुन के चोरी
- 53:58करो भक्तों के लिए चोरी करो इससे अच्छा अब कहा मत करो के काके जाना
- 54:05कुछ ये तो मैं मजबूर हूँ मैं नहीं बोलता।
- 54:10ये तो मेरे अंतः प्राण बोलते हैं, मैं मजबूर हूँ कमर हाँ, चोरी कर
- 54:15लेंगे तो तुम कोई गोदाम देख लो उस दिन में उस गोदाम में रात में
- 54:21जाके पाड़े लगा देंगे सर्दी सर्दी की रात जनवरी फरवरी का महीना।
- 54:31कमाल कहता ठीक थोड़ा भीतर से घृणित अंदाज में बोला कई बार
- 54:42पुत्र पिता को पहचान नहीं पता और कई बार पिता पुत्र को पहचान नहीं
- 54:47पाते। ये अजीब माया है।
- 54:49संसार के तो पुत्र पिता को पहचान नहीं सका, उसने कहा ठीक फिर मैं
- 54:58ले आऊं, सामान ले आओ, ले आया, कहीं ले आया, छैनी हथौड़ी ले आया।
- 55:06सारा सामान ले आ जैसे पाड़ लग सकता था।
- 55:11कबीर कहने लगे मुझे रात को जगा लेना भाई नींद गहरी आती है, घोड़े
- 55:19बेच के सुनता हूँ, कोई बात नहीं मैं जगा दूंगा कमाल कहने लगा।
- 55:26आंधी रात भाई कमाल ने जगाया पिता श्री उठो क्यों सब ठीक है?
- 55:35हाँ सब ठीक है, चलो चोरी करने नहीं जाना हाँ हाँ चल पड़े।
- 55:42कोई जानते हो? गुलाम देखा दिल में हाँ देखा,
- 55:47किसी सेठ का गोदाम था और वो सेठ कबीर को सुनने आता था।
- 55:56उनके मीठे प्रवचन हृदय की गहराईयों में उतर जाते थे।
- 56:04कमल ने कहा यह गोदाम रहा हलो, यहाँ पाड़ लगा लेते हैं, थोड़ा सा
- 56:09तुम मेहनत करो, मैं ईंटे तोड़ता हूँ, कच्चा स्थान तोड़ता हूँ, तुम
- 56:15कस्सी से उसे बाहर निकालना रेल मिलके पाड़ निकाल दिया।
- 56:23तो कबीर ने कहा देखो बेटा तुम जवान हो, मैं वृद्ध हूँ, ये कनक
- 56:31की इतनी बुरी मुझसे खींची नहीं जाएगी।
- 56:34आओ हम दोनों लक के से खिंच लेते हैं।
- 56:38एक बोरी बाहर तो कमाल से बोले ऐसा कर पुत्र तेरी पेट पे लदा देता
- 56:48हूँ तू घर ले जा मैं इसको ठीक करके आता हूँ कहीं कोई जानवर, कोई
- 56:55सूअर, कोई गाय। सारा खराब न करता है।
- 57:03उसने कहा ठीक है कबीर ने लदा दिया पेट पे कमाल चले लेके धीरे धीरे
- 57:13गली लम्बी थी। और ईंटों को जैसा नहीं लग गए।
- 57:19ऊपर नीचे कभी पहाड़ बंद कर दिया तो कमाल ठहरा।
- 57:26देखता रहा कि कब पिताजी आए तो साथ साथ चलेंगे।
- 57:32वृद्ध हैं, थोड़ा दिखना भी कम हो गया है।
- 57:34रास्ता न भटक जाए। रात गहरी है, अंधेरी है पाट बंद
- 57:46कर दिया कहते ऐसा कर बस तू एक क्षण के लिए ठहर जा।
- 57:51मैं थोड़ा बता दूँ किसको? बता दें, इस मालिक को बता दूँ?
- 57:59उसने आवाज़ लगाई। सेठ जी जाग रहे हो सेठ सोते तो
- 58:04हैं नहीं, सेठों को नींद नहीं आती है, सेठों को गोली खाके भी नींद
- 58:14नहीं आती क्योंकि वह जो हराम का माल इकट्ठा किया।
- 58:20वह सोने नहीं देता, लोगों की नींदों को छीनने वालो, तुम नींदों
- 58:30की तमन्ना करते हो, दूसरों को दुख देने वाला, खुद सुखी होने की
- 58:38कामना न करें। तो नींद तो आती नहीं, सेठ तो जाग
- 58:45ही रहा था, उसने कहा हाँ जी, बाहर आया देखा कबीर पहली मंजिल पे था
- 58:53भाग के आया नीचे पांव पकड़ लिए गुरूजी आप?
- 58:57हाँ। आप किस लिए कि तो मैं ये तुम्हारे
- 59:02गोदाम में से एक बोरी कनक चोरी करके ले जा रहा हूँ वह सेठ तो
- 59:14रोने लगा। आंसुओं से पांव धुल गए।
- 59:22इतना रोया इतना रोया अपने मुँह पे चप्ट लगाई कित्ता गुरु देव मुझे
- 59:33पहले समझना। हम इतने लोग रोज़ वहाँ खा के आते
- 59:37हैं कहाँ से आएगा भाई? मानी ये नहीं करता कालाबाजारी ये
- 59:44नहीं करता राजनीति ये नहीं करता बिकाऊ माल ये नहीं पार्टी इसने
- 59:49नहीं बदली कहाँ से आएगा? हमारा फर्ज बनता है गोदामों में
- 59:57भरा पड़ा हम आपके घर पहुंचा देते, आप जाइए इस बोली को यहीं छोड़
- 1:00:03देंगे, मैं खुद बंदोबस्त कर दूंगा और इसके बाद।
- 1:00:10आप इसका फिगर भी मत करना सारी जिम्मेदारी मेरी अगर ऐसा ने कहा
- 1:00:21ओनली दे विल एंटर इन मैं गॉड्स किंगडम हू विल बी इनोसेंट जस्ट
- 1:00:26लाइक ए चाइल्ड बच्चा कह देता है मैंने चोरी की पिता जी ₹1 की चोरी
- 1:00:32की। बिलकुल बालमन ऐसा ही व्यक्ति।
- 1:00:38निरमल मलजन सोइ मोहिभाबा निरमल मनजन।
- 1:00:54सोई मोही भव मोह कपट चल चैत्र न भव।
- 1:01:08मुझे कपट, छल छिद्र हेरा फेरी ये अच्छी नहीं लगती और वो व्यक्ति
- 1:01:17मेरे पास आता भी नहीं। गुफाओं में बैठकर समर्द्धिस्त
- 1:01:22होने का ड्रामा मत करो। हम जानते हैं राजनीतिक लोग।
- 1:01:28अपने भीतर नहीं जा सकते, कूड़ा भरा है, कचरा भरा है, हेरा
- 1:01:37फेरियां, बेईमानी, झूठी सब भीतर भरा पड़ा है, कैसे जाओगे तुम्हें
- 1:01:43खुद डर लगेगा खुद से? ड्रामे बाजी बंद झूठ बोलने वाला
- 1:01:53पतंजलि ने सबसे पहला नियम बनाया सत्य उससे आगे चले परमात्मा तक
- 1:02:03पहुंचने का सबसे पहला पहला पहला। अष्टांग योग में यम का पहला सूत्र
- 1:02:10सत्य जो झूठ बोलता है वह तो आशान होता है, सत्य से शुरू करना होगा
- 1:02:20और झूठ बोलने वाले खुद को अवतार मनाने पर उतारू हो जाते हैं।
- 1:02:25जब बात अलग है, बात चलती नहीं, नींद नहीं आती, दूसरों का खून
- 1:02:36जूझने वाले, दूसरों की नींदों को हराम करने वाले खुद चैन से कैसे
- 1:02:41सोयेंगे? तुम भी अपने आप को थोड़ा सा।
- 1:02:44जाती मार के देख लेना भीतर तुम भी इस रोग से ग्रसित तो नहीं हो तो
- 1:02:49अवश्य ही कहीं ना कहीं तुमने दूसरों के नींदे आराम की तो
- 1:02:55तुम्हें भी नींद नहीं आती। दूसरों की महफिल में रतजगे करने
- 1:03:01वाले। तुम्हारे भी रतजगा ही होगा।
- 1:03:06ये रतजगा तुम्हारे लिए विशाल आयोजन है मेरे लिए दुख के
- 1:03:19परिणामों का फल है। पाप है साथिया आज।
- 1:03:25हमें नींद नहीं आएगी, सुना है तेरी महफिल में रत जगा।
- 1:03:35है। सुना है तेरी?
- 1:03:38महफिल में रत जगह है। आँखों ही आँखों में रहन।
- 1:03:48कट जाएगी सुना है तेरी महफिल्में रत जगह है सुना?
- 1:03:57है। तेरी महफिल में रत् जगह है ये
- 1:04:04रत्जगा कराने वाले परमात्मा इनकी बुद्धि फेर देता है।
- 1:04:09ये धार्मिक अनुष्ठान करके रात को जागते हैं।
- 1:04:12अवश्य ही लोगों की रातों को छीना होगा, नींदों को छीना होगा।
- 1:04:18रातें सोने के लिए होती हैं, जागने के लिए नहीं होतीं, जागने
- 1:04:23का तो सिर्फ श्राप कुछ ही लोगों को मिला है उल्लू और उल्लू सही
- 1:04:29चुनाव लक्ष्मी के वाहन के रूप में।
- 1:04:34यह दूसरों की लक्ष्मी का हरण करते हैं।
- 1:04:38उनकी सवारी उल्लू ही होनी चाहिए। लक्ष्मी भी खुद रात को जागती है,
- 1:04:44उल्लू भी रात को जागता है। यह तालमेल तुम्हें बैठाना आता
- 1:04:48नहीं है। तुम अगर।
- 1:04:52जागरणों का आयोजन करते हो बड़ा भव्य आयोजन होता है बड़ा एक एक
- 1:04:59चौंक के भीतर बड़े बड़े जुनोट्स लगते हैं, फिर पाप कर रहे हो।
- 1:05:07पाप के कारण जागरण का आयोजन किया। और फिर पाप कर रहे हो जाग करोड़ों
- 1:05:14लोगों को जगाने तुम कहते हो भगवान का नाम कानों में पड़ जाएगा अरे
- 1:05:20नाम कुछ कानों में पड़ जाएगा उससे क्या होता है नींद हराम हो जाएगी
- 1:05:25मेरे पास रोज़ लोग आज इतने बाबा नींद नहीं आती तुमने वो वहाँ से
- 1:05:30आए थे न? वहाँ से मध्य प्रदेश से उन्हें
- 1:05:33दवाई बताई थी। हमें भी बता दो।
- 1:05:38मैंने कहा फिर ये जागरण वगैरह बंद कर दोगे?
- 1:05:44बस यही है पर्व का कारण लोगों के नींदों को हराम मत करो।
- 1:05:53सबक सीखो कुछ बातों से परमात्मा तुम्हें किसी न किसी तरह जैसे
- 1:05:59विषम पिताम की बुद्धि खत्म करती वरदान था, स्वेच्छा से मृत्यु का
- 1:06:06वर्ण कर सकता था। पहले ही दिन रोया, रोया।
- 1:06:11वृद्ध ज्ञात और चाहता तो वरदान था लेकिन वरदान क्या करेगा?
- 1:06:16ज को मैं गारूण दुख दें ही ताकि मति पहले हरि भीष्म पिताम की तथा
- 1:06:24कतिथ तथा कतिथ पिताम की। महारथी कि उसके आगे कोई ज़ोर चलता
- 1:06:33है उसने मति हर लिया है, हम तो उत्तरायण में जब सूर आएगा तब
- 1:06:44त्यागेंगे का, प्राणों को बर्दाश्त कर लेंगे कष्ट क्लेश।
- 1:06:49दर्द सब बर्दाश्त कर लेंगे, लेकिन सूर्य जप्त के तरण में नहीं संपरण
- 1:06:57ऐसे ही मतिहार लेते हैं। हम तो जाप से करवा चूके हैं,
- 1:07:05दूसरों की नींदों को हरण करोगे, खुद भी जापोगे।
- 1:07:10खुद को कष्ट देने वालो तुम उस अमृत की लालसा करते हो।
- 1:07:17लोग मुझे कृष्ण का वो वचन सुना देते हैं, जब सारा संसार जागता है
- 1:07:24तो मेरा योगिस होता है। जब सारा संसार सोता है तो मेरा
- 1:07:30योगी जागता है। हाँ।
- 1:07:34लिखा है लेकिन इसका अर्थ तुम्हें पल्ले पड़ा?
- 1:07:39अर्थ का अनर्थ करने वालों कभी भीतर जाके देखा जहाँ जागरण होता
- 1:07:45है। हर घड़ी जागरण चलता है वहाँ हर
- 1:07:49घड़ी महा रास होता है हर रास चेतना राधा नचाती है।
- 1:07:57हर वक्त वहाँ तुम कभी पहुंचे उस निधि वन में कभी गए।
- 1:08:04के बाहर बाहर के ड्रामेबाजी के बंद कर दो।
- 1:08:13जिन्होंने लोगों के चैन छीने होते हैं, रातों की नींद छीनी होती है,
- 1:08:20वो जगरातें कराते हैं, महामइ कहें।
- 1:08:24मेरी बातों को गौर से समझ लेना न मुझे पागल कुत्ते ने काटा है न
- 1:08:31मैं पागल हूँ मैं बिलकुल चैतन्य हूँ मैं बिलकुल साक्षी हूँ दुष्ट।
- 1:08:44लोगों के खूनों को बेचोगे। लोगों के धनों को अपनी जेबों में
- 1:08:52डालकर तुम्हें नींद ज्यादा नहीं आएगी।
- 1:08:54ध्यान रखना नींद खोएंगे। क्योंकि ये पैसा कमाया लोगों की
- 1:08:59नींदों को हराम करके और अब रिएक्शन देर इस एन इक्वल एंड
- 1:09:05अपोज़िट रिएक्शन तुम्हें भी वही कुछ मिलने को है।
- 1:09:11आज लोगों को अपने इशारों पर निशाओगे।
- 1:09:15कल को लोगों के इशारों पर नाचने के लिए तैयार भी हो जाऊं।
- 1:09:20बाबू की कहानी फिर खुद के ही वॉल्वर से मरना पड़ता है हेटर को,
- 1:09:30लेकिन मूर्ख इन बातों से, इतिहास से।
- 1:09:33इतिहास का फायदा भी है और नुकसान भी है।
- 1:09:38नुकसान तो ये कि व्यर्थ में फूला फरोरी रहती है और फायदा ये कि
- 1:09:43उससे कुछ लाभ उठा लो। उसने ऐसा किया था, उसे ऐसा परिणाम
- 1:09:49भोगना पड़ा। मैंने कुछ नहीं पढ़ा था और ये
- 1:09:54मेरा सौभाग्य रहा। कोरा कागज़ था, बड़े आराम से आके
- 1:10:01उसने दस्तखत कर दिया तुम तरसते हो।
- 1:10:04मैंने कल के प्रवचन में कहा था अगर कुछ मांगना है परमात्मा।
- 1:10:10तो परमात्मा के दर्शन मत मांगो, दर्शन तो हो जाएंगे परमात्मा पे
- 1:10:16विश्वास मांग लो ऐसी कृपा कर दो प्रभु के मुझे तेरे पर अटूट
- 1:10:25विश्वास हो जाए उसे श्रद्धा कहता है अखंड विश्वास।
- 1:10:31उसी का नाम है श्रद्धा जिसे तुलसीदास ने कहा कि श्रद्धा
- 1:10:35विश्वास को या व्यायाम बिना न शन्ति।
- 1:10:44आज फिर रह गया नागार्जुन का शून्य वाद कर कोई बात नहीं।
- 1:10:50कहीं कोई कुछ भागता नहीं है। नागार्जुन का शून्य बात बड़ा
- 1:10:54प्यारा है। वह कई प्रवचन मांगेगा, लेकिन उससे
- 1:11:00पहले बीच में तुम प्रश्न और अड़ा देते हो।
- 1:11:07ये 10 मिनट का ₹20,00,000 लेने वाले तुम्हें सत्य नहीं बता सकते
- 1:11:12क्योंकि जिससे सत्य का पता चल गया उसकी मांग खत्म हो जाती है।
- 1:11:19इन शब्दों को आप एक एक शब्द को अच्छी तरह से सुन लिया करो।
- 1:11:25न जाने फिर ये शब्द सुनने को मिले, न मिले ये महंगे कविओं की
- 1:11:31बातें ये बिकाऊ माल है, तानसेन की तरह हरिदास की तरह नहीं।
- 1:11:40हरिदास तो तब गाता है जब वह विराट चाहता है।
- 1:11:47इनकी तमन्ना कुछ और है कुछ राज्यसभा की टिकट इनको मिलती
- 1:11:50नहीं, विचारों को कोई भरा करता हूँ, मैं भी फरियाद कर देता हूँ
- 1:11:58कि कोई पार्टी भला कर दे, इनको राज्यसभा की टिकट दे दे।
- 1:12:02विचारों को बूढ़े हुए जाते हैं। बिकाऊ मार है तुम चाहे कोई लेवल
- 1:12:14लगा लो, लेकिन हमारी दृष्टि में तुम बिकाऊ मार ही रहोगे तो कोठे
- 1:12:25पे बेच देती है अपने शरीर को? और तुम रंग मंचों पे भेज देते हो
- 1:12:32अपनी प्रतिभा को दोनों बिकाऊ धन्यवाद श्री कृष्ण।
- 1:12:41गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण,
- 1:12:53वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविन्द, हरे मुरारी।
- 1:13:04हे नाथ नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद, हरे, मुरारी
- 1:13:16हे नाथ नारायण वासुदेव। एम् मुसाफिर क्यों पसरता है यहाँ
- 1:13:33एम् मुसाफिर क्यों पसरता है यहाँ? यह।
- 1:13:40किराये पे मिला तुझको मकां यह किराये पर मिला तुझको मकां
- 1:13:55कोठड़ी। कोठरी खाली कराली जाएगी, जबतरी
- 1:14:11जबतरी। डोली निकाली जाएगी।
- 1:14:21बे मुहूर्त के उठा ली जाएगी। जब तेरी।
- 1:14:33श्री? कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
- 1:14:42नारायण वासुदेव। श्री कृष्ण।
- 1:14:48गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:14:59सर्वधर्माण प्रत्यजमा मैक शरणं। सर्वधर मान प्रत्यय मा मेकुम
- 1:15:19शरणम, ब्रजु शरणम ब्रजु। अहं तम सर्व वा दिव्य मोक्ष
- 1:15:38स्वामी मा सुचो। पितुमात स्वामी सखा हमारे पितुमात
- 1:15:58स्वामी सखा हमारे। हे नाथ नाराजन वासुदेव, श्री
- 1:16:11कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:16:22श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव ओहे पख।
- 1:16:42लग गई। इधर वख लग गई, उधर वख लग गई लग
- 1:16:59वाले ना? कदे भी सौंदे लगी वा लेना कदे भी
- 1:17:12सौंदे तेरी की में अख लग गई। ये शब्द की तरफ इशारा करते हैं।
- 1:17:21वह तत्व जो कभी सोता नहीं जिसकी लग जाती है उस तत्व तक पहुँच जाता
- 1:17:30है जो कभी सोता नहीं। लग्गी वा लेना कदेवी सौंदे।
- 1:17:40तेरी की में अख लग। गई तू कैसे मूर्चित हो गया?
- 1:17:47जैक जैक बी अवर? अख लग गई दोहे पख लग गई।
- 1:18:01दोनों तरफ लग गए। संसार में भी लग गए, परमात्मा भी
- 1:18:06लग गए है दुर्वख लग। गयी वो दुर्वख लग गयी।
- 1:18:16श्री कृष्ण गोविंद। हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:18:29श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी। हेनाथ नारायण वासुदेव पितुमात
- 1:18:42स्वामी सखा हमारे पितुमात स्वामी सखा हमारे।
- 1:18:54हेनाथ नारायण वासुदेव, श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ?
- 1:19:12नारायण, वासु, देवा और। धन्यवाद।