Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 Dec 24 - मृत्यु के डर से कैसे बचा जाए? मृत्यु के भय से पार कैसे जाए?
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- 0:03आशुतोष बाबाजी प्रणव ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ सवाल मृत्यु के भय से।
- 0:21छुटकारा कैसे मिले? बड़ा सुंदर सवाल है, वाकये ही
- 0:34ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ है, ऐसे सवाल पूछा करो।
- 0:42कुछ भीतर की गांठें को नहीं। मृत्यु के भय से छुटकारा कैसे हो?
- 1:00दो तरीके हैं पहला मोर्चा। दूसरा जागृति मोर्चा तुम रात को
- 1:20सो जाते हो, मोर्चे तो हो जाते हो।
- 1:31क्या तुम्हे सारी रात पता चलता है कि कौन तुम्हें मारने के जिज्ञासा
- 1:41से आया था और वह वापस चला गया? कौनकौन तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक
- 1:55दे? किसकिस ने तुम्हारे शोएपुरों के
- 2:02पास फेरी लगा दी? तुम्हें पता चलता है कारण मोर्चा
- 2:14मोर्चा में तुम्हें नजीवन का पता चलता है तुम सांस लेते हो, लेकिन
- 2:21पता नहीं होता। दिल धड़कता है लेकिन पता नहीं
- 2:29होता तुम सोए पड़े होते हो। तुम्हें आसपास के वातावरण का कुछ
- 2:41भी तो ज्ञात नहीं होता। चारों दिशाओं से बेपरवाह हुए,
- 2:57लापरवाह हुए तुम आराम से निद्रा मगन हो जाते हो।
- 3:06और निद्रा की उस मगनता में तुम्हें मृत्यु का भय नहीं आता और
- 3:17यह अनुभव ज़िन्दगी से जुड़ा हुआ है।
- 3:25ज़िन्दगी के से जुड़ा हुआ सवाल। उसका जवाब ज़िन्दगी से ही दे रहा
- 3:35जब से जन्मे हो तुम सो रहे हो, रोज़ सोते हो, लेकिन तुम्हे कभी
- 3:42ख्याल नहीं आया कि रात को जब तुम गहन निद्रा में होते हो?
- 3:51तो क्या ऐसा होता है कि कोई चिंता नहीं होती, तनाव नहीं होता,
- 3:57मृत्यु का भय नहीं होता या तो निद्रा में चले जाओ।
- 4:08मोर्चा में चले जाओ, मूर्छित हो जाओ ये पहला तरीका है और प्रकृति
- 4:19तुम्हें रोज़ सुझाती है प्रकृति तुम्हें रोज़ लेके जाती है उस
- 4:24तर्क पे। क्या तुम्हें कोई आस पास का पता
- 4:29नहीं होता? सोने में मृत्यु का भय समाप्त हो
- 4:41जाता है क्योंकि सोना एक मोर्चा है।
- 4:52जब आदमी मरता है अंतिम वेला में तो प्रकृति उसे मूर्छित कर देती
- 5:01है, मूर्छित इसीलिए नहीं करती। कि यह दर्द से बचा रहे।
- 5:10दर्द तो होता ही नहीं ये जो हमारे शास्त्रों में लिखा है जैसे
- 5:19हजारों हजारों भिक्षुक डंक मार रहे हों, इतना दर्द होता है
- 5:25मृत्यु के भीतर। नहीं, तुम्हें डराया जा रहा है
- 5:28सिर्फ ऐसा होता कुछ नहीं। मृत्यु बड़ी सहज सी अवस्था है
- 5:37शरीर की। बस कनेक्शन टूटना होता है।
- 5:45चेतना के साथ जड़कर और प्रकृति उसका ऑपरेट करती है।
- 5:56उस ऑपरेशन में तुम्हें दुख नहीं होता, दर्द नहीं होता।
- 6:02वो पहली बात तो ये समझ लेना कि जो तुम्हारे शास्त्रों में लिखा है
- 6:11कि मौत के वक्त हजारों बिच्छू के काटने जैसा दर्द होता है, यह सत्य
- 6:19नहीं है। अनुभव के आधार पर जब कसता है कोई
- 6:23संत तो पाता है ऐसा कुछ भी तो नहीं था सहज है भगवान कृष्ण कहते
- 6:39हैं। दूसरे अध्याय में वासान सी
- 6:43जीर्णनी अर्थात विहाय नवानी घृणाती नरो प्राणी तथा श्री रानी
- 6:53विहाय जीर्ण अनन्याणी संयाति नवानी दे।
- 7:02जैसे तुम नहा कर वस्त्र बदल लेते हो।
- 7:08ऐसी ही मृत्यु के वक्त आत्मा शरीर को छोड़ देती है, नए वस्त्र पहन
- 7:17लेती है। यह वस्त्र छोड़ देती है और दूसरे
- 7:22अर्थों में कृष्ण कहते हैं यह शरीर तुम्हारा वस्त्र है, वासांश
- 7:30जीरणा नीयता वृहार और तुम कटे फटे।
- 7:37ज़रा जीर्ण हुए बोधे हुए जामे को छोड़ देते हो बस इसे ही मृत्यु
- 7:50कहते हैं। ज़रा भी तो दुख नहीं होता है
- 7:54इसलिए मृत्यु से कभी गबराना ने। डरना है तुम डरते हो सिर्फ इस
- 8:03कारण से कि न जाने मृत्यु में कैसी कैसी पीड़ा होती होगी
- 8:10क्योंकि इससे पहले तुम्हारा अनुभव नहीं है।
- 8:15मैं ज़िन्दगी में करीब सात आठ बार मरा हूँ बिलकुल मृत्यु की
- 8:20गहराइयों में उतरा उन तलों को छुआ लेकिन ज़रा भी कोई दर्द नहीं हुआ,
- 8:27कोई परेशानी नहीं हुई। मुझे उस विराट ने चाहा।
- 8:36कि अभी इस शरीर की जरूरत है तो उस विराट ने अपनी सरजना में इसे
- 8:44बरकरार रख लिया। आप आज मुझे सुन रहे हो?
- 8:58मृत्यु से भय का पहला उपाय मैंने बताया मोर्चा रात को सो जाते हो,
- 9:06मूर्छित हो जाते हो डर लगता है तुम्हे मृत्यु से भूल जाते हो,
- 9:10मृत्यु को भूल जाते हो। सभी तनावों को भूल जाते हो,
- 9:17चिंताओं को भूल जाते हो, विपत्तियों को भूल जाते हो, आफतों
- 9:22को भूल जाते हो, क्यों भूल जाते हो, क्योंकि नींद मोर्चा देती?
- 9:38इसलिए तो मनुष्य रोज़ रोज़ शाम गमों को भुलाने के लिए शराब पीता
- 9:45है और शराब से मूर्छित हो जाता है।
- 9:51इतनी पीता है। कि मोर्चा आ जाती है और मूर्चों
- 9:57में सारे दिनभर के तनाव, कलश, कलह, चिंताएं सब भूल जाती हैं।
- 10:13तुम भूल जाते हो जब शराबी होते हो तब भी भूल जाते हो।
- 10:22नींद में होते हो तब भी भूल जाते हो और जब तुम्हारी मृत्यु आती है।
- 10:32तो प्रकृति तुम्हें भुला देती है। सबसे पहले प्रकृति तुम्हें
- 10:39एनेस्थीसिया देती है एनेस्थीसिया तुम भूल जाते हो।
- 10:48तो मृत्यु से डरते नहीं, ना मूर्छित होते हो जब ज्यादा शराब
- 10:55पी होती है तब भी मृत्यु से नहीं डरते बल्कि कुछ लोग तो शराब पीते
- 11:01ज्यादा साहसी हो जाते हैं कुछ लोग।
- 11:06साहसी होने के लिए शराब पीते हैं, यह उलटी बात है मोर्चा में डर
- 11:18नहीं लगता। मोर्चा में खुशी भी नहीं होती।
- 11:26रात सोये सोये तुम खुश भी नहीं होते रात सोये सोये तुम डरते भी
- 11:31नहीं। मृत्यु का कोई भय नहीं होता।
- 11:40पहला तरीका है मोर्चा और जो सबक तुम्हें सीखाना नहीं पड़ेगा।
- 11:53प्रकृति रोज़ सखा देती है प्रकृति रोज़ तुम्हें मोर्चा में ले जाती
- 11:59है कितने तरो ताज़ा फील करते हो तुम भुला देते हो सब।
- 12:13और तुमने कभी नहीं सोचा कि यह जो मैं सुबह भूल जाता हूँ जो रात को
- 12:22सोया पड़ा था तो फिर कुछ भी तो याद नहीं रहा था।
- 12:30क्या चिंता है मुझे क्या तनाव है मेरे बॉस ने धड़क दिया अदालत में
- 12:39तुम्हारे ऊपर क्या आरोप लगा? तुम अपराधी सिद्ध हुए, शायद
- 12:49तुम्हें पता न हो। फांसी की सजा से युक्त व्यक्ति भी
- 12:56सोते हैं और उस सोने के क्षण में अपनी फांसी का डर भूल जाते हैं।
- 13:05थोड़ी देर के लिए सोते हैं लेकिन सोते हैं।
- 13:13मोर्चा मृत्यु को मृत्यु के भय को भुला देती हैं समाप्त नहीं करते
- 13:22हैं मोर्चा से मृत्यु का भय। भूल जाता है व्यक्ति पहला तरीका
- 13:33यह है पर मैंने तुमसे समझाया कि मौत में भी प्रकृति यही
- 13:41फॉर्मूलेशन बरतती है। नींद में भी मृत्यु यही
- 13:47फॉर्मूलेशन बरती है। और मूर्चा जब तुम शराब पीते हो तो
- 13:56भी प्रकृति यही फार्मूला बरतती है तो मैं मूर्छित कर देती हूँ।
- 14:04प्रकृति के पास एक ही फार्मूला है।
- 14:09तुम्हारे दुख दर्द बुलवाने का तो है मोर्चा तो अब आगे चलेंगे
- 14:21इसीलिए। गमों की निराशा में डूबा हुआ
- 14:26व्यक्ति मर जाता है जब मरना चाहता है क्योंकि मर जाएगा तो परमूर्जा
- 14:38आ जाएगी और परमूचन कुछ भी तो पता नहीं चलेगा।
- 14:46ये सभी चीजें मोर्चा देती हैं चाहे शराब पी लो, चाहे सो जाओ,
- 14:55चाहे मर जाओ और कोन नहीं है। जिसने मरने का सोचा नहीं ज़िन्दगी
- 15:08में मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा कोई व्यक्ति धरती पर नहीं जिसने
- 15:16कम से कम 10 बार मरने की बात सोंची न हो।
- 15:22लेकिन किन्हीं कारणों से। वह मर नहीं पाया?
- 15:42मौत कभी भी मिल सकती है। लेकिन जीवन कल न मिलेगा मरने
- 16:06वाले। सोच समझ ले फिर तुमको ये परिणाम
- 16:20मिलेगा। बस एक ही पल होता है, मृत्यु और
- 16:26जीवन के वे। तो तुम्हें मोटिवेशन स्पीकर कहते
- 16:33हैं। मरो मत क्योंकि आज अंधेरा है,
- 16:42गमों का कल सुहाना दिन भी आएगा। सूरज भी निकलेगा सूरज को निकलने
- 16:54से कोई रोक सकता ना रात। वर कहाँ है मैं माँ?
- 17:04अँधेरा किसके रोके रुका है? सवेरा रात भर कहाँ है?
- 17:23महिमा अँधेरा किसके रोके रुका है सबेरा।
- 17:40सुवाई। कभी कभी तुम ऐसी बातें सुनकर मरने
- 17:50का ख्याल छोड़ देते हो, लेकिन मूलभूत बात तो ये है कि तुम
- 17:58मूर्छित होना चाहती हो सदा के लिए।
- 18:02नींद कुछ देर की मूर्च्छ है, शराब थोड़ी सी देर की मूर्च्छ है और
- 18:11नींद ज्यादा देर की मूर्च्छ है हैं तीनों मूर्च्छ है।
- 18:19पहला थ्री का है मोक्ष मोत बेगम को भुलाने का पहला थ्री का मोर्चा
- 18:31जो कि प्राकृत्य का है नेकफ्रूट रोज़ सिखाती है तुम्हें प्रकृति।
- 18:39अगर प्रतीति तुम ये न सिखाती, तो तुम पागल हो जाते।
- 18:48मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि कोई व्यक्ति 9 दिन से ज्यादा जाग नहीं
- 18:54सकता। जीसको दंड देना हो, रातों की
- 19:01नींदें छीन लो, रातों की नींदें छीन लो।
- 19:13जीसको बुरी से बुरी भयंकर से भयंकर सजा देनी हो।
- 19:20चाइना में ऐसी व्यवस्था थी के घनघोर अपराधी को सोने नहीं दिया
- 19:29जाता था। सोने न देना।
- 19:33बड़े से बड़ा दांता है इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ जी भर के सो 10
- 19:40घंटे सो ब्रह्म मुहूर्त में उठना, नाम जपना पाठ करना।
- 19:55ये सब बकवास है। नींद के अंकें नींद अमृत है एक
- 20:07बात बताऊँ? अगर मान लोगे तो बड़ा सुख पाओगे,
- 20:21किसी भी कीमत पर नींद को बेचना मत।
- 20:29किसी भी कीमत पर नींद को वैसे न मत मजबूरी हो।
- 20:37बात अलग है लेकिन ये तुम्हारी तुच्छ कीमतें।
- 20:46राम राम जपना है। राधे राधे जपना है।
- 20:50डेढ़ बजे जाकर संत के दर्शन करने हैं और संत है क्या?
- 20:56माँ की का फुथूरा। कैसे नचतू है?
- 21:06कैसे नचतू है डरियो फिर तू है माटी का पुत्र?
- 21:20कैसो नर्च संत जीके दर्शन करने हैं डेढ़ बजे इतने सस्ते में नींद
- 21:31को कुर्बान मत कर देना। नींद वो बहुमूल्य हीरा है जो
- 21:37परमात्मा की दात है जैसे जीवन है। वैसे ही नींद है, जीवन के संग
- 21:43नींद है मृत्यु के संग तो पक्की पक्की नींद है चिर निद्रा हम कह
- 21:51देते हैं ये चिर निद्रा में सो गया तो इन मूर्खों के पीछे लग
- 21:57गया। किसी भी कीमत पर नींद को मत गंवा
- 22:03देना उलट लगेगा। तुम्हें लगेगा बाबा परतका रहे
- 22:13हैं, मार्ग गलत सुझा रहे हैं। लेकिन देखिए मैं अपने अनुभव से
- 22:21बोल रहा हूँ जीसको जचिता है मेरी बात को स्वीकार कर ले जीसको नहीं
- 22:37जचता। उसके गले में कोई फंदा नहीं डाल
- 22:41रहा हूँ। बस ज़रा आजमा के देखना जीतने महान
- 22:50पुरुष हुए हैं। इस धरती पर वो ज्यादा देर सोए
- 22:56हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन 10 घंटे सोता था
- 23:05नित को, किसी कीमत पे बेचना मत अगर मजबूरी हो कोई बीमार है,
- 23:12हॉस्पिटल में हो किसी कारण से रात को जागना पड़ रहा है।
- 23:20जीवन मृत्यु का सवाल है, किसी की देखरेख करनी है तो अवश्य ही नींद
- 23:27को बलि झगड़ा दो लेकिन इतने सस्ते, सस्ते जागरण में जाना है
- 23:38जगराता है। साथिया आज हमें नींद नहीं आयेगी,
- 23:52सुना है तेरी महफिल में। रत जगह है, सुना है तेरी
- 24:03महफिल्में रत जगह है। आँखों ही आँखों।
- 24:11में रहन कट जाएगी। सुना है तेरी महफिल्में रत जगह
- 24:23है, सुना है तेरी महफिल्में रत जगह है।
- 24:30इतने सस्ते में नींद को मत भेज देना।
- 24:34ये वो बहुमूल्य हीरा है जो किसी कीमत में पाया नहीं जाता।
- 24:49अभी 15 दिन पहले मेरे पास मध्य प्रदेश ग्वालियर से एक लड़की आई।
- 24:56स्पेशल कार के ऊपर आए थे, वो पता क्या लेने आए थे?
- 24:59नींद नहीं आती बाबा क्या करें? एक दवा भी लेती हूँ, नींद के
- 25:12चिकित्सकों को दिखा लिया, नींद आती है, मैंने कहा।
- 25:22ये कर लिया करो, तरीका बढ़ा दिया उसने और 2 दिन के बाद उसका मैसेज
- 25:32आया, बाबा नीत आ गए, बहुत अच्छी नीत आ गई।
- 25:38क्या हुआ? सिर्फ नींद के लिए कहाँ ग्वालियर
- 25:43कहाँ पंजाब में गिद्दड़वा नींद न आए तो उपाय करना।
- 25:54देखिए इन माटी के पुत्र को देखने के लिए रात रात भर जागना।
- 26:04इन जगरातों में रात रात भर बैठना शुभ नहीं और ध्यान रखना ये नींद
- 26:15एक बार गुम हो गई फिर से ना मिलेंगे।
- 26:21जैसे पहले मैंने शेयर बोला मौत कभी भी मिल सकती है, मौत कभी भी
- 26:33मिल सकती है, लेकिन जीवन कल न मिलेगा।
- 26:42मरने वाले सोच समझ ले कल को फिर ये पाल न मिलेगा आज अगर तुने किसी
- 26:52भी कारण से सस्ते सस्ते कारण से उस संत का दर्शन करना है।
- 27:01काली पीली दाढ़ी किए है माथे पे लगाए हैं और डेढ़ बजे दर्शन करना
- 27:06है रात उल्लुओं के जागने के लिए होती है आदमियों के जागने के लिए
- 27:15नहीं होती। उल्लू ही जागते हैं रात को और
- 27:20उल्लू ही जगाते हैं रात को नींद को कुर्बान मत कहते हैं।
- 27:29किसी भी कीमत पर यहाँ तक की परमात्मा की कीमत पर भी नींद को
- 27:35गवा मत। तुम सोचोगे बाबा शायद कुछ ज्यादा
- 27:47बोल गए हैं नहीं कम बोला है अभी परमात्मा को दांव पे लगा देना
- 27:58क्योंकि जिसे तुम परमात्मा कहते हो रात को जागना।
- 28:02और पत्थरों की मूर्ति को माँ माँ करके चलाना और सारी रात भर बालाजी
- 28:10बालाजी करके तालियां बजाना ये ब्रह्मात्मा है।
- 28:18ये तुम्हें घर से नींद न दे पायेंगे ध्यान रख लेना।
- 28:22नींद अगर एक बार घूम गई तो बस कल को फिर ये पल ना मिलेगा मरने वाले
- 28:31सोच समझ ले शायद इतना ही काफी होगा आज तो।
- 28:43अब हम दूसरे पहलू पर आए हैं। मृत्यु के भय से बचने का पहला
- 28:51उपाय मूर्च्छ। और ध्यान रखिए अगर दूसरा उपाय भी
- 29:02हुआ नहीं तो पहले से ही काम चलाना बेहतर है।
- 29:11चूक मत जाना, नींद को कुर्बान मत कर देना।
- 29:19दूसरा उपाय मेरे घर के सामने जब मैं छोटा था 1516 साल का एक
- 29:34बुजुर्ग रहते थे। बड़े कम थे, खड़े ही ज्यादा थे,
- 29:41मुझसे पूछते बेटा बड़ा होकर क्या बनेगा?
- 29:49मैंने कहा बाबा मुझे क्या पता मैं क्या बनूँगा?
- 29:57एक काम करना बेटा और कुछ भी बन जाना चौकीदार मत बनना मुझे उसकी
- 30:06बात समझ ना आती है और कुछ बन जाना चौकीदार मत बनना।
- 30:17उस वक्त इतनी समझ नहीं थी। परिपक्व नहीं था मस्तिष्क साधारण
- 30:25भाव से मैं पूछ लेता भव क्यों बेटा?
- 30:34चौकीदार कुछ पैसों के लिए रात की नींद खराब कर देता है, लेकिन कुछ
- 30:41पैसे खर्च करके नींद नहीं मिलती बड़ा सुन्दर बाकी उसका मेरा हृदय
- 30:47के ऊपर छप गया लेकिन समझ बाद में आया।
- 30:52चौकीदार कुछ पैसे के लिए अपनी नींदें खराब कर देता है लेकिन
- 30:58उन्हीं पैसों को देखकर नींद वापस नहीं मिलती मेरे ही समझों में कुछ
- 31:07ना आता लेकिन वो शब्द। हृदय पटल पर छेद जाते तो थोड़ी
- 31:17समझने लगी तो बात समझ में आई यह बाबा क्या कहना चाहते थे मुझे?
- 31:31सब बन जाना, उल्लू मत बनना, उल्लू अपनी नींदों को खराब कर देता है
- 31:47और अगर पैसा कमाना हो तो उल्लू के ऊपर ही क्यों लक्ष्मी को बैठाया
- 31:52गया? जो रातों की नींदों को खराब करता
- 31:57है। जो दो नंबर के चोर उचक्कों का काम
- 32:01करता है, जो रात का काम वैसे आजकल तो दिन दहाड़े भी चोर उचक्के
- 32:08सरेआम घूमते हैं सरकारों में बैठे हैं।
- 32:17और सही पूछो तो सरकारों में ही ज्यादा बैठे हैं।
- 32:24जनता तो बेचारे चोर उचक्कों से डरी डरी सहमी सहमी घरों में बैठी
- 32:31रहती है। उल्लू वाहिनी लक्ष्मी रात की
- 32:39नींदों को हराम करके ही आती है और फिर आने के बाद उसकी चौकीदारी में
- 32:46रातों की नींद हराम हो जाती है। इधर कुआं उधर खाई मारो, छलांग की
- 32:54तरफ मरोगे। पहले कमाने में रात की नींद नहीं
- 32:59कमाई फिर चौकीदारी में रातों की नींद कमाई लेकिन रातों की नींद
- 33:05गुम गई। दूसरा तरीका दूसरा तरीका है सुरति
- 33:24मस्ती मस्ती का सागर तुम्हारे भीतर लहलहा जाए।
- 33:36उस उपवन की परम सुगंधी तुम्हारे प्राणों को घेर ले इसे हम कहते
- 33:47हैं, थोड़ा थोड़ा जागना और थोड़ा थोड़ा।
- 33:53मस्त होना मदमस्ती इसमें मधवी है। थोड़ी थोड़ी मोर्चा भी है शराब की
- 34:03और थोड़ी थोड़ी होश भी है दोनों जिसके भीतर हैं वह मस्ती।
- 34:17वह सुरती वह खुमारी या तो मूर्छित हो जाओ या खुमारी में आ जाओ दो
- 34:32हित रहते हैं मृत्यु के भय से बचने के लिए।
- 34:40मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है मधुशाला वह नहीं
- 34:48जहाँ पर मदिरा बेची जाती है भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह
- 34:56मधुशाला। जहाँ मस्ती की भेंट मिलती है,
- 35:01मेरी तो मधुशाला वही है। हरबंशराय बच्चन के ये शब्द बड़े
- 35:05प्यारे हैं। भीतर की मस्ती की बात करते हैं
- 35:13उसी कुमारी की जीस कुमारी की बात। कबीर और नानक करते हैं।
- 35:24मृत्यु से मृत्यु के भय से बचने का दूसरा उपाय सुरते उस सागर में
- 35:40डूब जाना जहाँ मृत्यु की आग पहुंचती है भगवान कृष्ण कहते हैं,
- 35:52नयनम देहाती पांव का हाँ आग जैसे जलाती है।
- 36:04नैनम् षदन्ति शस्त्रण शस्त्र जैसे काटते हैं वह मधुशाला ऐसे ही
- 36:14मस्ती भी नहीं काटी जाती क्योंकि जो वस्त्रों से कटता नहीं।
- 36:23जो आग से जलता नहीं वही तो मधुशाला है, वो कटता भी नहीं।
- 36:32वो जलता भी नहीं और वो मस्ती का सागर भी है इसलिए हम कहते हैं
- 36:38सत्य चित आनंद। आनंद उसका रूप है आनंद उसका
- 36:46पुरस्कार है आनंद उसका स्वभाव है, तो कुंवारी में उतर जाओ खुमार से
- 36:59युक्त व्यक्ति ये परमाने कहाँ डरते हैं मुझसे?
- 37:10कहाँ डरे? गुरु तेग बहादुर?
- 37:14औरंगजेब के न्योता देने पर उनके सामने बैठ गए नंगी तलवार औरंगजेब
- 37:27के बिलकुल सामने बैठ गए। चौंकड़ी मारकर उतारो, मेरा शीश इन
- 37:44परवानों के भीतर आग लगी होती है। जद्दबातों की कुर्बानियों के।
- 37:57क्यूँ? क्योंकि ये परमाने मौत से नहीं
- 38:00डरता है तो या तो सो जाओ, मुहर्त हो, जाओ या परमाने बन जाओ।
- 38:11शी स तली पे रख लो जो शी स तली पे धर न सके वह प्रेम गली में आए
- 38:24नहीं आना चाहिए उनको भूले भटके आ जाते हैं लोग।
- 38:30उनका कसूर नहीं भूले, भटके आ जाते हैं बेचारे, लेकिन सी सतली पर
- 38:37रखने की हिम्मत नहीं होती। जब राम किशन परमहंस ने विवेकानंद
- 38:44के सिर के ऊपर हाथ रखा तो विवेकानंद।
- 38:51दिखने में लगते थे। शीश दे देंगे लेकिन दिया नहीं।
- 38:55क्या? कायरा निकले, जब उस तल पे पहुंचे,
- 39:04जहाँ भीतर छलांग लगाने को होती है?
- 39:07और गहरे और गहरे और गहरे और वहाँ जाकर कम हो गए सामने मृत्यु खड़ी
- 39:13थी और डर के बाहर आ गए स्वामी जी मेरे तो माँ बाप भी हैं, भाई बहन
- 39:19भी हैं मेरे अभी सभी के परवर्ष मेरे जिम्मे हैं।
- 39:28तो रामकृष्णा ने कहा अच्छा तुम्हारे माँ बाप भी हैं तो फिर
- 39:34तुम बाहर आ जाओ, फिर तुमने तुम के ऊपर शीश रख न सकोगे।
- 39:44यह तुम्हारे बस की बात नहीं है और विवेकानंद अधूरे रह गए और तभ के
- 39:52अधूरे रहे रहे। मर गए सारी उम्र अधूरे ही है उस
- 40:00आनंद की एक झलक को जो देखी थी सटोरी की झलक।
- 40:05उसको फिर से देखने के लिए तड़पते रहे, तरसते रहे आखिर तक वो पत्रों
- 40:12में लिखते रहे अपने मित्रों को कि मैं मैं उस झलक को फिर से निहारना
- 40:19चाहता हूँ। जो गुरुदेव अपना हाथ शीश पे रख के
- 40:31मुझे उसकी झलक दिखाई, एक क्षण के लिए मैं उस झलक को तरस गया।
- 40:43वो झलक ही ऐसी है क्या करेगा? कोई जब उस झलक को देख लेता है तो
- 40:51साहस, साहस, लाखों करोड़ों, अरबों गुनाह हो जाता है और मृत्यु उसके
- 41:00सामने बोवनी बढ़ जाती है। फीकी पड़ जाती है।
- 41:11जब से सुना है मरने का नाम जिंदगी सर पे कफन बांधे कातिल को ढूंढ़ते
- 41:21हैं तो कातिल को ढूंढ रहे थे गुरु तेग बहुत।
- 41:30और औरंगजेब के सामने चौकड़ी मार के बाट गए।
- 41:35चलाओ तुम्हारी नंगी तलवार तुम तो छीबते फिरते हो तुम तो सात कूचों
- 41:43में छप जाते हो। तुम तो सात महलों के द्वारों के
- 41:47भीतर छिपा लेते हो, अपने आप डरे डरे से लोग हो मृत्यु से इसलिए ये
- 42:00राजनीतिक लोक कई जन्मों तक। कई जन्मों तक डरे ही रहेंगे
- 42:09क्योंकि संस्कार संस्कार डरने के हैं।
- 42:16मर ना जाऊं, मर ना जाऊं इसलिए सामग्री इकट्ठी करते हैं मेरा नाम
- 42:22अमर रहे, मर ना जाऊं। इसलिए ओहदा इकट्ठा करते हैं, नाम
- 42:27इकट्ठा करते हैं, छोटी छोटी बातों के ऊपर झगड़े होते हैं।
- 42:33मुझको मुख्यमंत्री बना दो, मैं मिनिस्टर नहीं बनूँगा।
- 42:45और करोड़ों की जनता इन मूर्खों का मुखड़ा निहारती रहती है।
- 42:52ये कल्याण करेंगे, तुम इस आशय में बैठे होगे।
- 42:58ये तुम्हारा जिंदगी का स्तर ऊंचा उठाएंगे।
- 43:02तुम इस उम्मीद लगाए बैठे हो नहीं नहीं ये खुद का जीवन सुधारने के
- 43:09लिए राजनीति में प्रवेश के राजनीतिज्ञ कभी दूसरों का जीवन
- 43:15सुधार नहीं सकता। वह अव्वल दर्जे का लोभ ही होता है
- 43:23और जिसके भीतर लोग ने वह राजनीति में नहीं आएगा, वह अपना कर्तव्य
- 43:31करेगा पूर्ण और विदा हो जाएगा। गद्दी पर बैठने वाले लोग लोग भी
- 43:42होते हैं और कायर होते हैं इनकी आकांक्षाएं वासनाएं खुद की ही
- 43:49बहुत हैं तुम्हारी जरूरतों को पूरा करना।
- 43:56ना इनके बस से बाहर इनके बस के अंदर है ना ये पूरा करना चाहते
- 44:03हैं। मेरे एक शिष्य ने मुझसे पूछा बाबा
- 44:08मेरे लिए जीवन को सुखी जीने का कोई संदेश?
- 44:14मैंने कहा हाँ बेटा, एक बात को याद रखूं।
- 44:18शिवम में राजनीतिक व्यक्ति से राजनीतिक यानी शत्रुंग से बैठाने
- 44:27वाला दाम लगाने वाला। न हाथ मिलाना, न गले लगना, क्यूँ
- 44:37बाबा उससे क्या हो जायेगा? मैंने कहा, लासानी रंगों से भरे
- 44:40होते हैं ये लोग, बस तुम ऐसा समझ लो जैसे कीचड़ के तालाब में तुम
- 44:48छलांग लगा लो तो क्या होगा? बाहर जब निकलोगे तुम्हारा चेहरा
- 44:54मोहरा कैसा होगा? पानी का तालाब नहीं है, कीचड़ के
- 45:00तालाब होते हैं ये लोग तो गलती से भी न तो इनसे हाथ मिलाना मैंने
- 45:07अपने बच्चे से कहा न इनके गले मिलना।
- 45:11क्योंकि इतनी खतरनाक लासानित रहेंगे तो मैं भी कह रहा हूँ पर
- 45:17कोई मजाक नहीं कर रहा हूँ कोई किसी के विद्वेष के कारण नहीं बोल
- 45:23रहा हूँ, एक शक्ति को उजागर कर रहा हूँ।
- 45:30कि राजनीतिक व्यक्तियों के पास से निकल मत जाना, वोट डालना न डालना
- 45:38तुम्हारा अपना अधिकार है और इच्छा है क्योंकि इनकी तरंगें इतनी
- 45:45खतरना होती है। लोभी व्यक्ति की तरंग।
- 45:53यह विकार क्यों बताया? ऋषियों ने इन्हें विकार क्यों
- 45:58कहा? काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार यह
- 46:03पंच विकार क्यों कहे? तुम देखना काम से भर्व हुआ
- 46:09व्यक्ति उसकी आँखों में झाँकना शरारत का तूफान देखेगा तुम्हें उस
- 46:16दरिंद के भीतर दो घड़ी पहले जो इतना शांत लगता था।
- 46:25के बुद्ध की शांति भी शर्मा जाए और उस व्यक्ति को कामग्रस्त देखकर
- 46:31तुम उसकी आँखों में झांकना महा शैतान लगेगा।
- 46:37क्या हुआ काम का? वेद ही ऐसा है।
- 46:46यह मनुष्य को राक्षस बना देता है, दैत्य बना देता है, ऋषियों ने इन
- 46:54विचारों की संख्या इसलिए की है ऊर्जा तो है क्या?
- 47:00जैसे तरंगें तो हैं, लासानी भी और आसानी भी।
- 47:04लेकिन लासानी तरंगें विध्वंस करती हैं, आसानी तरंगें निर्मित करती
- 47:11हैं, एक डिस्ट्रक्टिव है, एक कंस्ट्रक्टिव है।
- 47:27कामी हो, क्रोधी हो, लोभी हो, मोहग्रस्त हो, एक अंधाधृत राष्ट्र
- 47:44मोहग्रस्त था, सारे पुत्र मरवा दिए?
- 47:52सारी जनता उम्रवादी 40,00,000 लोगों का हत्यारा अकेला
- 48:00धृतराष्ट्र अंधा इसलिए ठीक कहते हैं बाबा।
- 48:07कि अंधे लोगों पे ज्यादा यकीन मत करना।
- 48:10ये पिछले जन्म के जिल्लर होते हैं तो कुछ देख कर ही कहा होगा बाबा
- 48:17ने। ऐसे तो बाबा बोलते हैं अंधे लोगों
- 48:23का संघ मत करना। तो किसका संकर?
- 48:29तो कृष्ण कहते हैं, आचार्यों, उपासनों में आचार्य का संकर,
- 48:37जिसकी वृत्ति सरल है, जिसकी वृत्ति सहज है, जिसकी वृत्ति कोमल
- 48:44है, निर्मल है। क्रोध का आवेग नहीं, क्रोध की
- 48:53लासानी तरंगों से भरा नहीं पड़ा वो कोई गरदा कीचड़ नहीं, साफ
- 48:59सुथरा है जैसे अभी अभी नहा के आया हो यही।
- 49:05भगवान राम कहते हैं। निर्मल मान जन सोई मोहे पा।
- 49:23निर्मल मान जन। सोई मोई मोहे।
- 49:28कपाट छलछेत्रना बा? छल क्षेत्र स्वराग रख कर बात करना
- 49:55मुझे अच्छे नहीं लगते, भगवान राम कहते।
- 50:07क्यों मैं मु्द्दे से बटका नहीं हूँ मु्द्दे के ऊपर हूँ?
- 50:18ये बेसिक फाउंडेशन है। इनसे हीन हो जाना, इन बोकारो से
- 50:25हीन हो जाना, निर्मल हो जाना कोई मल न रहे, कबीरा मन निर्मल बायो,
- 50:33जूं गंगा कुनीर। पाछे पाछे हरी फिर कह तो कबीर
- 50:40कबीर अब तो तुम परमात्मा के पीछे पीछे फिरते हो, फिर कबीर कहते हैं
- 50:45जब तुम्हारा मन अनर्मल हो गया नेक्स्ट कपट हो गया, अच्छा छिदरी
- 50:53हो गया। तो परमात्मा तुम्हारे पीछे पीछे
- 50:57फिरेंगे। कह तो कबीर, कबीर ये फाउंडेशन
- 51:08इनकी फाउंडेशन पर खड़ी होती है सुरती की अमरत।
- 51:14इन फाउंडेशन्स पर खड़ी होती है आनंद की इमारत, ये है नीम ये है
- 51:26नीम इनके ऊपर चुनी जाती है वो इमारत मस्ती की।
- 51:34मस्ती की इमारत, खुमारी की इमारत, आनंद से झूमता हुआ व्यक्तित्व,
- 51:50मस्ती से सारा गौर हुआ व्यक्तित्व।
- 51:55इसी नीम पर उछलता है। इसी नीम पर असरा जाता है।
- 52:04किसी और नीम पर मस्ती का फूल खिलता है।
- 52:10ध्यान रखें ना यह फाउंडेशन है। ये नींव है इस नींव के ऊपर ही
- 52:17खेलेगा। यह फूल जो परम सुगंधि से युक्त कर
- 52:22देगा। सारे विश्व के वातावरण को थोड़ा
- 52:28सा इसका वैज्ञानिक पहलू भी बता दो।
- 52:33सैटिफिकल डायमेंशन सच बोलोगे तो कोई बोझ न रहेगा दिमाग पर तुम
- 52:44मल्टीडायमेंशनल न हो सकोगे और जब तुम मल्टीडायमेंशनल होते हो।
- 52:51तब तुम्हारी शक्ति अनेक दिशाओं में बिखरनी शुरू हो जाती है।
- 52:55कन्डेन्स नहीं होती एक जगह पे कछुए की तरह जैसे हमारे अवतार थे
- 53:02कच्छ पवतार जब तुम हिंसा करते हो तो तुम्हारा मन चयन में नहीं आता।
- 53:13तुम्हारी सारी शक्ति बिखरने लग जाती है क्योंकि जस के प्रति
- 53:18हिंसा की है। फिर वह बदला भी लेगा।
- 53:23फिर तुम्हें उससे डर भी लगेगा, फिर रातों की नींदें भी हराम
- 53:28होंगी। फिर तुम कम करोगे और तुम्हारी
- 53:34शक्ति व्यर्थ में व्यय हो गया। हस्ते चोरी मत करना क्योंकि जिसकी
- 53:43चोरी करोगे। वो तुम्हें कभी भी पकड़ लेगा,
- 53:52जांच बिठा देगा, कोई कंप्लेंट कर लेगा एडीसी के पास तुम कंप्लेंट
- 54:05फिर हो गया? और ध्यान रखना शिखर व्यक्ति ही
- 54:12वहाँ उतर सकता है। अपने भीतर कंपता हुआ व्यक्तित्व
- 54:17भीतर उतरने के सामर्थ्य नहीं रखता, इसलिए मैं बार बार कहता हूँ
- 54:23ठहर जाओ, ठहर जाओ। आप काम पर ठहर जाओ, कपो मत
- 54:33ब्रह्मचर्य अपनी एनर्जी को बिखैर देना।
- 54:45जैसे तुमने काम में, क्रोध में, लोभ में, मोह में अहंकार में
- 54:51बिखेरते, ऐसे ही ब्रह्मचर्य को खोकर तुम अपनी शक्ति को बखेर देते
- 54:58हो, और बात तो शक्ति के बिखरने की है।
- 55:04शक्ति बिखर गई तो तुम खाली रह जाओगे, सोने रह जाओगे, शक्ति
- 55:13एकाग्र हो गई है, एक स्थान पर तो तुम पा जाओगे, जीसको पाना चाहते
- 55:17हो और खुशी का मुकाम तुम्हारे पान सोमेगा।
- 55:28मोह किसी व्यक्ति से तुम मोह करते हो, ये मेरा फलां ये मेरा फलां
- 55:35मोहोए की चपकाहट है और चपकाहट तुम्हारी शक्ति को वहाँ चपकाए
- 55:41रखती है। और भी कई दिशाओं में तुम्हारी
- 55:45शक्ति झिपकी रहती है तो मल्टीडाइमेंशन फिर होकर ऐसा ही
- 55:54लोभ है। ऐसा ही अहंकार है।
- 56:02तुम जो नहीं होते वह अपने आपको दिखाने की चिष्ठा करता तुम फिर
- 56:07मल्टीडाइमेंशनल हो गए, तुम एक आयामी ना रहे तुम बहुआयामी हो गए
- 56:17और इस मार्ग पे बहुआयामी होना। सबसे बड़ा बाधा है एक आयामी हुमा
- 56:35केन्द्रित होना, वन डाइमेंशनल होना।
- 56:41वहाँ पहुंचने की काब्रियत है आपकी आप क्वालीफाई कर दे अगर आप एक
- 56:51डाइमेंशनल हो गए अपनी सारी शक्ति को बिंदु भी एकत्रित कर लिया और
- 56:57तुम योग्य हो गए। तुमने क्वालीफाई किया?
- 57:04अब तुम अपने भीतर उतर सकते हो और बात थी भीतर उतरने की।
- 57:12इसलिए मैंने इतना कुछ शब्दों की व्याख्या की।
- 57:19हमने भीतर जाना है क्योंकि यह मस्ती की खोज है बाहर न मिलेंगे
- 57:31जहाँ है वहाँ मिलेंगे बाहर पदार्थों में है नहीं।
- 57:39इसलिए वहाँ मिलेंगे नहीं। भीतर उसका समुद्र है, इसलिए भीतर
- 57:47से मिलेंगे और उस मस्ती को लेने के लिए तुम्हें भीतर जाना पड़ेगा।
- 57:54भीतर जाओगे कैसे इन सब चपकाहटों से हटकर?
- 58:04इन सब चिपकाहटों से अपने आपको अलग करके नॉन आइडेंटिफिकेशन में आकर
- 58:14तुम किसी के साथ चिपटे न रहो, चाहे दानव हो चाहे पदबी हो।
- 58:25और फिर धनपदवी कारोबार, उपाधि, मान सम्मान इससे बाद अपने शरीर के
- 58:35साथ ही चिपटना रह जाता है। असली मुकाम तो अभी बाकी है।
- 58:42फिर धीरे धीरे शरीर से चिपकना भी कम कर दो और कम करते करते एक वक्त
- 58:49ऐसा आ जाएगा जब शरीर तुम्हारे सामने अलग बुरा होगा बस उस घड़ी
- 58:55तुम्हारा भ्रम टूट गया। अपने आप को शरीर से अलग देखे ना?
- 59:03नॉन आइडेंटिफिकेशन नॉन क्लिंगनेस तुम चिपके नहीं रहे किसी के साथ
- 59:12जिसके साथ चिपके थे उससे अलग देख लिया अपने आप को शरीर को अपने आप
- 59:16से अलग देख लिया। विचारों को तुम सदा ही देखते रहते
- 59:22हो अपने आप से अलग तुम देखते हो कि विचार तुम्हे तंग करते हैं, तो
- 59:29तुम विचारों को देखते हो ना? तुम देखते हो कि ये विचार मुझे
- 59:34तंग करता है तो तुम दृष्टा हुए ना इसके?
- 59:38ये तुमसे अलग हुए ना जब तुम स्क्रीन पर चलती हुई फिल्मों को
- 59:46देख रहे हो तो फ़िल्म तुम नहीं हो।
- 59:50स्क्रीन के ऊपर चलती हुई रंगदार तस्वीरें तुम नहीं हो।
- 59:56ये बात तुम्हारी समझ में तुरंत आ जाती है।
- 1:00:01इन चबकहटों से हटकर अपने भीतर जाना होता है।
- 1:00:06मैं मस्ती की बात कर रहा हूँ, ध्यान रखना।
- 1:00:10पहले मैंने मोर्चा की बात की थी, मैं तो प्रकृति ले जाती है।
- 1:00:17रोज़ रात को तुम उस मूर्छा में जाती हो, तुम्हें मृत्यु का भय
- 1:00:24नहीं रहता उस परम सुसुक्ति के भीतर लेकिन मोर्चा होती है, शांति
- 1:00:33होती है। ठहराव होता है, कोलाहल हीनता होती
- 1:00:38है, साइलेंस होती है, चुप्पी होती है, बस एक चीज़ नहीं होती, आनंद
- 1:00:47नहीं होता, मस्ती नहीं होती। मोर्चा के भीतर बाकी सब होता है।
- 1:01:01आनंद का फूल नहीं खलता है। वह फूल खेलेगा जब तुम जागेजागे
- 1:01:08अपने भीतर जाओगे। रात को सो लो, इसलिए मैं कहता हूँ
- 1:01:17रात को पूरा सो लो। बहुत से लोग मुझे कहते हैं बाबा
- 1:01:22सुबह क्रिया योग करके जब ध्यान में बैठते हैं तो नींद आ जाती है।
- 1:01:30तो दो ही कारण हो सकते हैं या तो रात को तुम्हारी नींद पूरी न हुई
- 1:01:35हो और अगर रात को नींद पूरी हो गई तो फिर ये योग निद्रा है।
- 1:01:41तुम्हें खुश होना चाहिए, दो ही कारण हो सकते हैं।
- 1:01:48क्रिया योग के बाद जब तुम ध्यान में उतरते हो तो नींद तुम्हें घेर
- 1:01:52लेती है तो सिर्फ दो कारणों है या तो तुम्हारी नींद रात को पूरी
- 1:01:58नहीं हुई। तुम कैसे शांत महात्मा को डेढ़
- 1:02:032:00 बजे देखने चले गए होगे, दर्शन करने असहमत करो।
- 1:02:10या नींद पूरी हो गई तो फिर ये योग निद्रा है जीसको योगी भी तरसते
- 1:02:19हैं वो योग निद्रा है, क्रिया योग करो, खूब करो, पूरी मस्ती से करो।
- 1:02:27क्रियायोग को करते वक्त भी तुम्हे मस्ती आएगी और बाद में भी मस्ती
- 1:02:35आएगी। योग निद्रा के द्वारा हो या मस्ती
- 1:02:42के द्वारा हो मस्ती आएगी क्रियायोग के बाद तुम ध्यान में
- 1:02:46बैठो। ध्यान में तुम अपने भीतर सरकना
- 1:02:52शुरू हो जाओगे, जब सब कुछ छोड़ दोगे।
- 1:02:57ध्यान का मतलब ही सब कुछ छोड़ देना होता है।
- 1:03:01जब तुम सब कुछ छोड़ दोगे, तुम परम रिलैक्स हो जाओगे।
- 1:03:07तो क्या होगा? प्राकृतिक रूप से तुम अपने ही
- 1:03:11भीतर उतरना शुरू हो जाओगे और अपने भीतर उतरने शुरू हो गए तो आज और
- 1:03:23कल और। बरसों और नर्सों और जैसे जैसे
- 1:03:29वक्त बीतता जाएगा और तुमने अगर यह अभ्यास न छोड़ा, तुम बैठते ही
- 1:03:37रहे, तुम कुछ नए करने में बैठते रहे।
- 1:03:46तो तुम अपने भीतर जाना शुरू हो जाओगे भीतर अपने भीतर तुम उतरना
- 1:03:52शुरू हो जाओगे आज और गहरे कल और गहरे परसों और गहरे नर्सों और
- 1:04:00गहरे। रोज़ रोज़ तुम अपना पड़ाव बदलोगे
- 1:04:04और देखो ये पड़ाव गहरा बहुत है, इतना गहरा है।
- 1:04:10इसीलिए तो विवेकानंद को इतना वक्त लग जाता है।
- 1:04:15ऐसा है जैसे बहुत गहरा कुआं हो और कुआं।
- 1:04:19जैसे आसमान से धरती पर इतना गहरा तुम डरोगे और डरना ही वादा है
- 1:04:32डरने के लिए ही तुम प्रश्न पूछा है कि मृत्यु के वैसे कैसे बचे?
- 1:04:39या तो बचाएगी मोर्चा सिंपल वे है सो जाओ, नशा कर लो।
- 1:04:57के प्राकृतिक या सुरथ खुमारी रस लींता मस्ती वो झूमना वो नृत्य या
- 1:05:16उसमें उतर जाओ। दो ही रास्ते हैं, तीसरा कोई
- 1:05:19रास्ता नहीं तुम बीच में अटके नहीं रह सकते, कोई मार्ग नहीं बीच
- 1:05:25में रहने का या तो इधर जाओगे या उधर जाओगे एक तरफ़ चलना ही होगा।
- 1:05:39अगर मृत्यु से भय लगता है और तुम इस मृत्यु से मुक्ति चाहते हो,
- 1:05:45वसे तो दूसरा तरीका अपनाओ यह परमानेंट मुक्ति।
- 1:05:51यह रात की नींद वाली मुक्ति नहीं है।
- 1:05:54मुक्ति तो तब भी मिलती है कुछ लम्हों के लिए, लेकिन यह जो
- 1:06:01मुक्ति आएगी यह प्योर प्योर तुम्हारे सारे बंधन टूट जाएंगे।
- 1:06:13तुम बंधनहीन हो जाओगे, तुम लिबरेट हो जाओगे।
- 1:06:22फुल लिबरेशन और इसकी अखंड नजारा होगी।
- 1:06:27कभी टूटे गए। तुम उस प्रेम के समुद्र में खो
- 1:06:37जाओ तुमने देखा है प्रेमियों के भीतर इतना उत्साह कैसे आ जाता है?
- 1:06:45प्रेम सच्चा हो तो साहस अपने आप आ जाता है कारण।
- 1:06:51कारण प्रेम तुम्हें अपने भीतर ले जाता है उस साहस के समुद्र में जो
- 1:06:58कि तुम्हारे भीतर है प्रेम की वो घड़ी तुम्हें अपने भीतर खिसका
- 1:07:05देती है और उस समुद्र के दर्शन करवा देती है।
- 1:07:10और तुम छलांग लगा लेते हो सुप्रेम के दरया में नहा के बाहर आते हो
- 1:07:15तुम्हारे संग आता है साहस कोकी वह साहस का किजाना प्रेम प्रेम से
- 1:07:30पहुंचा जा सकता है। वहाँ ये शब्द अलग अलग हैं।
- 1:07:33बात एक ही। वो साहस हो, वो प्रेम हो, वो
- 1:07:38करुणा हो, वो आनंद हो, वो मस्ती हो, वो अपना आपा गंवाना हो, वो हो
- 1:07:52तो तुम लाखों साल तक भी करते रहो। बहुत से लोग मोह को प्रेम समझ
- 1:07:59लेते हैं, नहीं मोह प्रेम नहीं है, मोह मानता है, प्रेम मुक्त
- 1:08:06कहता है, और इस प्रेम की एक पल तो मैं मुक्त कर जाता है।
- 1:08:18ज़िन्दगी की न। टूटे लड़ी प्यार कर ले घड़ी तो
- 1:08:34घड़ी। जिंदगी?
- 1:08:38की नाटो ते लड़ी प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी।
- 1:08:52लंबी लंबी उमरिया को छोड़ो लंबी लंबी उमरिया को छोड़ो प्यार की।
- 1:09:11एक। घड़ी है बड़ी प्यार।
- 1:09:19की एक घड़ी है। बड़ी प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी।
- 1:09:31हो? ज़िन्दगी।
- 1:09:35के न टूटे लड़ी प्यार कर ले घड़ी तो घड़ी।
- 1:09:50लंबी लंबी उमरिया को छोड़ो लंबी लंबी उमरिया को छोड़ो प्यार की।
- 1:10:08एक घड़ी है बड़ी प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी प्यार कर ले घड़ी दो
- 1:10:26घड़ी। और तुम मृत्यु के भय से मुक्त हो
- 1:10:31जाओगे, प्यार तुम्हें मृत्यु के भय से मुक्त कर देगा।
- 1:10:37धन्यवाद।