Latest / Baba ji Vijay Vats / 18 Mar 26 - कृष्ण के विराट रूप में अर्जुन ने क्या देखा? मोह और प्रेम: बंधन से मुक्ति का मार्ग!!
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- 0:14कैलाश चंद बाबा जी, प्रणब, प्रेम और मफ में क्या फर्क है?
- 0:40मोह बांधता है मोह तुम्हें सीमा में ले आता है जैसे तुम अपने
- 0:51पुत्र से मोह करते हो, पत्नी से मोह करते हो, पति से मोह करते हो।
- 0:59माता पिता से मोह करते हो, परिवार से मोह करते हो, यह सीमाओं को
- 1:10बांधता है। यह तुम्हें लिमिटेशंस में ले जाता
- 1:16है। मोह, प्रेम।
- 1:24लिमिटलेस लिमिटलेसनेस महत्त्व में बांधता है, प्रेम तो में फैलाता
- 1:37है। मोह तुम्हे जकड़ता है, इसलिए मोह
- 1:43को वंतन का हक है, प्रेम तुम्हे सहलाता है, इसलिए प्रेम को मुक्ति
- 1:52कहक है, प्रेम विस्तार है, मोह सिकुड़ण है।
- 2:04महो तुम्हें सिकोड़ता है, प्रेम तुम्हें फैलाता है।
- 2:12महो तुम्हें कन्जेस्टेड करता है, प्रेम तुम्हें आसीम करता है।
- 2:23महू सीमित होता है, सीमा में होता है, प्रेम असीमित होता है, असीम
- 2:31होता है। महू।
- 2:38तुम परिवार से कर सकते हो, पड़ोसी से कर सकते हो, देश से करते हो।
- 2:50राज्य से कर सकते हो। देशप्रेम नाम का कोई शबन है जो
- 2:59प्रेम अखंड तक न चला जाए। अस्तित्व तक न चला जाए।
- 3:07वह मोह होता है शब्द बनाने वालों ने क्योंकि अनुभव नहीं था तो शब्द
- 3:17बना दिया देशप्रेम, देशप्रेम ने देशमो।
- 3:24क्योंकि बाकी देशों का क्या भोग? बाकी देश भी तो इसी धरती पे है और
- 3:33जो धरती से प्रेम करेगा बस वो धैर्य कुटुंबकम।
- 3:41वसुधा ये भी प्रेम नहीं वसुधा यानी धरती के ऊपर सभी रहने वाले
- 3:50प्राणी कोटंबय तो शब्दिये वो ठीक नहीं।
- 4:03क्योंकि मोहत में सुकुरता है और ये सारी फैलाव में विस्तार में,
- 4:11वेराट में, विशाल में कहीं कोई माप तो लें।
- 4:22वह इतना विस्तृत है कि तुम इसको पैमानों में नहीं नाप सकते, इसलिए
- 4:32वह मोह की जद में। नहीं आता, निर्मोली।
- 4:51जिनका मोह करे। तू का है ना धीर घरे?
- 5:23करे। मन्नू रे।
- 5:31जब वसुदा से प्रेम तुम कहोगे वसुदा प्रेम है वसुदा भी मोह है।
- 5:39प्रेम का कोई पैमाना नहीं, माप नहीं, तौल नहीं, प्रेम हसीन है,
- 5:47मोह सीमित है और तुमने पूछा प्रेम और मोह में क्या फर्क है?
- 5:54मैं तुम्हें बांधता है, प्रेम तुम्हें मुक्त करता है।
- 5:58हसीम तुम्हें मुक्त करता है, शुद्र तुम्हें बांधता है।
- 6:05वसुधा से भी प्रेम करोगे तो भी तुम शुद्र ही रह जाओगे, हम गैर
- 6:19अनुभवी लोगों के शब्दों को। अनुकरण अनुसरण करते हैं, लेकिन
- 6:30गैर अनुभवी व्यक्ति तो गैर अनुभवी होता है।
- 6:35उसको अनुभव तो होता नहीं उस विराट का इसलिए वह सीमित है।
- 6:44वह जीसको प्रेम कहेगा, वह प्रेम नहीं है वह मोह तुम किसी लड़के से
- 6:54प्रेम करती हो, तुम किसी लड़के से प्रेम करती हो, लड़की से प्रेम
- 6:59करते हो? यह प्रेम नहीं है, तुम शब्द कोई
- 7:06भी दे लो, कोई फर्क नहीं पड़ता। शब्द हमारे ही बनाए हुए है।
- 7:14शुरू से प्रथा चल रही संस्कार बन रहे, अब गाली भी तो शब्द है।
- 7:20और भगवान का नाम जो तुमने बनाया वो भी शब्द है, फर्क क्या है?
- 7:25फर्क तुम्हारी समझ में इस संस्कारों का है संस्कार पढ़ते
- 7:32पढ़ते कूदते गए, गहरी रेखाओं में खाई बन गए और साफ साफ पता चला
- 7:39तुम्हें। तुम उसका अर्थ समझने लगे शब्द खाई
- 7:49खोजते हैं शब्द चाहे गाली के हों, शब्द चाहे भगवान के उससे कोई फर्क
- 7:58नहीं पड़ता, वह है खाइना। क्योंकि जहाँ तक प्रेम जाता है वह
- 8:12शब्दों के पार है। शब्दातीत, वह न शब्दों में आता है
- 8:19न शब्दों से बोला जाता है। शब्दातीत?
- 8:26अक्षरों से परे अखरा, नालों, वखर जेड़ा वह असीम ही परमात्मा है जो
- 8:42तुम्हें बांध ले वह मोह। इसलिए कहा है कि ये जिन का तू मोह
- 8:53करता है, ये निर्मोही और प्रेम सबसे ऊंची घटना है।
- 8:59असीम हो जाना है, मोह उससे नीचे की घटना है, मध्य की घटना है।
- 9:07और बहुत से व्यक्ति तो बहुत ही नहीं करते, वो सिर्फ लोग करते है,
- 9:15वो तो बिलकुल गहरे खड्ढे में उतर गए पाताल में।
- 9:23जिनसे मोह भी न हो सका। मोह में भी थोड़ी सी प्रेम की झलक
- 9:26होती है। मोह में भी थोड़ा सा संबंध झलकता
- 9:32है लेकिन बहुत से लोगों से निरमौही है ये निर्मोही।
- 9:42मोहन न जाने जिनका मोह करे मन रे, तू काहे न धीर तरे ये जिनका तू
- 9:52मोह करता है ये निरमौही इतना सभी प्यार नहीं छलकाते।
- 9:59ये जो शब्दों में ही आ जाए जो भावनाओं में ही आ जाए तो तीन तल
- 10:08बताए। मैंने बीच में मोह है, जो
- 10:13निर्मोही है, वह तो घर का गया पाताल।
- 10:18और जो मोह से ऊपर उठा वह चला गया आसमान के बलंदियों में निर्मोही
- 10:27चला गया पाताल के धरातल में और जो मोह से पार प्रेम वह चला गया
- 10:36आसमान की ऊंचाईयों में। तो इन तीन परिस्थितियों को ठीक से
- 10:43समझ लेना मोह से भी नीचे की स्टेजिय वो क्रूल्टी होती है
- 10:55क्रूल्टी। ज़रा भी मोह है ऐसे लोग दैत्य
- 11:04होते हैं, ऐसे लोग राक्षस होते हैं।
- 11:13आम सांसारिक व्यक्ति महोग्रस्त रहे, इसलिए भगवान कृष्ण ने गीता
- 11:20में कहा। कि जिनका तू मोह कर रहा है, पार्थ
- 11:29उनका महकमे करना नहीं चाहिए और तुझे प्रेम में ले चलूँ और तुझे
- 11:40वराट में ले चलूँ। तू जीस गुरु के जीस दादा के बंधन
- 11:54में पड़कर मोह में पड़कर कांप रहा है और तुझे उससे पार ले चलो।
- 12:05आज तुझे उन सितारों पे ले चला जहाँ बहारे ही बहारे जहाँ खेजान
- 12:19जहाँ खेजान। सितारों पे।
- 12:35ले चलो दिल झों। जा।
- 12:46ऐसी। बहारों में ले चलूँ आओ हजूर आओ
- 13:02कृष्ण। कहते आओ।
- 13:04तुझे उस असीम मिली जहाँ आनंद ही आनंद का रस है, खुमार है महारस के
- 13:19झरने बह रहे हैं, सुगंधी बरस रही है।
- 13:24तो कहाँ उलझा है पार? यह उलझने का वेला नहीं हूँ।
- 13:33शंखनाद हो चुका है। जिसे तू दादा कहता जिसे तू गुरू
- 13:42कहता वो तुझे मारने को अतुर शस्त्र शस्त्रगारों से सुसज्जित
- 13:52हथियार लिए खड़े हैं किसके लिए तेरे लिए?
- 13:58तुझे मारने के लिए और तुम उनका मोह कर रहा है ये निर्मोही मोह न
- 14:06जाने जिनका मोह करे मनरे तू काहे नथेरकर हे बार्थ?
- 14:17तुझे चेन क्यों नहीं पड़ता? तू किनके लिए काँप रहा है?
- 14:25तू इनके लिए काँप रहा है जो तुझे मारने के लिए कुरुक्षेत्र के
- 14:31मैदान में तेरे सामने खड़े हैं और शस्त्रों से सुसज्जित करे?
- 14:37क्या यह तुम्हें गले से लगाने आए? क्या तेरे दादा तुम्हें गोदी में
- 14:43बैठानी आए क्या तेरे गुरु तुम्हें शस्त्र विद्या सिखानी आए?
- 14:53नहीं भारत? यह तुम्हें मारने आए।
- 14:58यह युद्ध का मैदान है। पार्थ तू किस मोह के जंजाल में
- 15:04फंस गया? तू निकल इस जंजाल से या तुझे शोभा
- 15:10नहीं देता तू क्षत्रिय? तू अपने धर्म को देख, फिर अपने
- 15:18धर्म को निभाता हुआ तू मर भी जाएगा तो स्वर्ग पायेगा और जीता
- 15:26रहा तू स्वर्ग को भोंकेगा सो धर्मेन धर्म श्रेया।
- 15:32पर धर्मो, व्यावहार और अपने धर्म में मर जाना शिरिष्क रहे मरना तो
- 15:421 दिन होता ही है भला मृत्यु से कौन बच पाए तुम्हारी पचासवीं
- 15:48पीढ़ी याद करो। तुम्हें पंडे बता देंगे, जहाँ फूल
- 15:54कराए जाते हैं वो सब हिसाब किताब रखते हैं।
- 16:00उन्होंने भी तुम्हारे लिए रातों जागे थे, वो भी उन्होंने भी
- 16:05तुम्हारे लिए रातों काली की थी। उन्होंने भी तुम्हारा फिक्र किया
- 16:11था, लेकिन आज वो कहाँ है? उन्होंने भी फिक्र किया था कि
- 16:21मेरे पुत्र का क्या होगा? उन्होंने भी दुआएं की होंगी।
- 16:26परमपिता परमात्मा से। कि मेरे बच्चों का क्या होगा,
- 16:35लेकिन आज वो कहाँ है? क्या तुम्हें अपनी पचासवीं पीढ़ी
- 16:40का नाम याद है? या कि धूल की गुबार में उड़ गया?
- 16:49जा के अंधकार में गुम हो गया जब वो गुब्बार बनकर कहीं खो गया।
- 17:01तुम्हें पता है पारसा वो कहाँ है। और तुम्हें पता है कि 1 दिन वो
- 17:09तुम्हारे लिए रोए थे, 1 दिन वो अपनी पीढ़ियों के लिए रोए थे और
- 17:17वो तुम ही से पुत्र कृष्ण कहते हैं तुम बाओ तुम।
- 17:32को छोड़ दे इस वेला में युद्ध की वेला में तू शस्त्र उठा, जो तू ने
- 17:42फेंक दिया यह वेला शोक मनाने की नहीं, यह वेला शोकहीनता की है।
- 17:57उठा अपना गाड़ी धनुष और इनकी छातियों को भेज दे मैं जानता हूँ
- 18:04तू डर रहा है मैं जानता हूँ तू डर रहा है इनके मरने से लेकिन अर्जुन
- 18:12तुझे पता नहीं। जिन्हें तू जैसा समझता है वो वैसा
- 18:17है नहीं, इसलिए चल मैं तुझे दिखा दूँ कि तू है कौन?
- 18:21सबसे पहले कृष्ण कृष्ण को सबसे पहले कृष्ण अर्जुन को उसका आपा
- 18:27दिखाते हैं कि देख तू कौन? अर्जुन के ऊपर शक्ति बात करते हैं
- 18:37स्वयधर्मी ने। धर्म श्रेया यह धर्म है तेरा तू
- 18:41यह है और अर्जुन देखते हैं कि मैं शरीर नहीं हूँ।
- 18:47अर्जुन देखते हैं कि जब मैं शरीर नहीं हूँ, थोड़ी सी खोपड़ी काम
- 18:51करती है। तो फिर मेरे दादा शरीर कैसे हो
- 18:54गए? फिर मेरे गुरुदेव शरीर कैसे हो
- 18:58गए? जब मैं ही शरीर नहीं हूँ, बड़ा
- 19:00टेढ़ा बांध चलाया उस मुरली मनोहर ने पहले खुद की खुद ही को दिखा
- 19:08दिया कि तू देख कौन? और अर्जुन समझे जब मैं ही शरीर
- 19:18नहीं हूँ, मैं इस शरीर को देखने वाला हूँ, दृष्टा हूँ, मैं तो
- 19:26मात्र ऑब्जर्वर हूँ इन सभी घटनाओं का।
- 19:30मेरा इनसे कोई सरोकार नहीं। यह सरोकार मोह के कारण मैं वर्थ
- 19:41में ही परेशान हो रहा हूँ। कृष्ण कहते हैं।
- 19:54मरेगा सर वह जीसको तू समझता है कि ये गुरु द्रोण है या भीष्म पिता
- 20:03में है, वो भीष्म पिता में हैं नहीं, वो गुरु द्रोण हैं।
- 20:18नहाने ते हनुमानी शरीर मरता है शरीर तुम्हारे गुरु कभी नहीं
- 20:28मरेंगे। यह शरीर तो गुरु का मकान है।
- 20:36गुरु तो इस शरीर के भीतर बैठा है। यह शरीर तो तुम्हारे पितामह के
- 20:43मकान है। तुम्हारे पितामह तो इस शरीर के
- 20:48भीतर बैठे है। इस मकान के भीतर बैठे तो इन
- 20:53मकानों का फिक्र कर रहा है। ये आज नहीं कल मिट जाएंगे।
- 20:57कितनी पीढ़ियां मिट गई और उन पीढ़ियों को तुमने देखा भी नहीं
- 21:03और तुम्हारी उन पीढ़ियों ने तुम्हें भी नहीं देखा होगा।
- 21:06सपने में भी ख्याल नहीं किया होगा कि मेरी आने वाली पच्चीसवीं पीढ़ी
- 21:13कैसी होगी? पचासवीं पीढ़ी कैसी होगी?
- 21:16लेकिन फिक्र किया था, बेवजह का फिक्र है, ये बात इसको छोड़ दे
- 21:25सुधर्मे निधनम श्रेया अपने धर्म में मरजा पर धर्मों व्यावाह।
- 21:34ये बड़ा सुंदर शब्द है स्वधर्मे निधनम से आइए थोड़ा गहरा चलते है।
- 21:49तुम अपने आप को जो समझते हो उसको मार दे।
- 21:56तुम अपने को क्या समझता हो, तुम कौन हो, आंख हो, कान हो, सिर हो,
- 22:10खोपड़ी हो, ब्रेन हो? नासिक का यंत्र हो, बोलने वाला
- 22:17मुख हो, दांत हो, जीवा हो, गला हो, कौन हो, तुम फेफड़ा हो, दिल
- 22:23हो, लिवर हो, अपेंडिक्स हो। ये स्टमक हो जाए अपडब्न हो जाए
- 22:37इंटरस्टाइन हो तुम कौन हो तुम कोई जवाब नहीं दे पाओगे तुम कहोगे हम
- 22:51सबका समूह लेकिन कृष्ण कहते है तुम समूह भी नहीं।
- 23:01तुम इस समूह के भीतर बैठे हुए हो, जीवन चेतना हो, जिसके बिना यह
- 23:08समूह चलता नहीं, अगर वह चेतना बाहर जम्प कर गई?
- 23:15तो यह शरीर खंडहर हो जाएगा? ततक्षम क्या तू इसके लिए मोह करता
- 23:20है? अपना आप देख कर अर्जुन की आँख
- 23:31खुलती है? ओह।
- 23:35मैं वाकई ही मोह में था। मैं वाकई ही दुविधा में था।
- 23:40मैं इनको शरीर समझ रहा था जबकि मैं स्वयं ही शरीर नहीं हूँ,
- 23:50लेकिन कृष्ण कहते हैं तू ठहर बार्थ अभी अधूरा अधूरा नहीं
- 23:55चलेगा। अभी तू देख के मैं कौन उसको अपना
- 24:03आपा दिखा के फिर विराट दिखाता है पहले तुने देखा के तू कौन फिर अब
- 24:14तू देख के मैं कौन? फिर विराट दिखाते हैं फिर विराट
- 24:25बेड भी में हूँ, पत्थर भी में हूँ, जीव जंतु भी मैं हूँ, पाँचों
- 24:33तत्व भी मैं हूँ। ये हवाएं, ये खजाएं, ये फिजाएं,
- 24:42ये पतझड़, ये बसंत, ये ऋतुएं सब में हो, ये जीव जंतु सब में हो
- 24:50दोपाय चौपाय। सब मैं हूँ, मेरे से बार कोई भी
- 24:59नहीं है, मैं विराट हूँ, मैं विशाल हूँ, मैं असीम हूँ, मैं
- 25:06आनंद हूँ, मैं रस्सु हूँ, मैं रहस्य हूँ।
- 25:19और इस वराट को देखकर आपको पता है एक क्षण में कितनी दुनिया मरती है
- 25:33और अर्जुन तो उसका वराटत्व देख रहा था और वराटत्व सिर्फ वसुधा भी
- 25:39नहीं। गृह, तारे, आसमान सब नक्षत्रिय
- 25:44भिंड सभी आकाश गंगाएं सभी ब्राह्मण और सभी ब्राह्मण जिनकी
- 25:53गणना भी नहीं की जा सकती, वहाँ भी जीवन है।
- 26:02इस अपार अनुभूति को थोड़े से लोगों ने देखा उनमें से अर्जुन और
- 26:20कृष्ण कहते हैं, ये ज्ञान मैंने किसी को नहीं।
- 26:26पहले पहले मैंने ये ज्ञान सूरज को दिया था
- 26:39मुझे कल किसी ने सवाल पूछा ये सूरज क्या है?
- 26:42जीसको ज्ञान मिला था वैज्ञानिक कहते हैं कि सबसे पहले और कुछ
- 26:48नहीं था, एक चमकता हुआ पेंट था। एक गोलाकार समूह था उसके सिवा और
- 26:56कुछ भी न था। बस उसे ही सूरज कहते हैं वह
- 27:03अस्तित्व रूपी गोला जो संकल्प करने पे टूट गया।
- 27:12एको अहं बहुत श्याम, मैं एक से अनेक हो जाऊं उस एक गोलाकार
- 27:20अस्तित्व को जो कहते हैं कि अरबों वर्ष पहले टूट के खंड खंड हो गया
- 27:26पता नहीं अभी कुछ नहीं है खोपड़ी खोपड़ी रडाते हैं सिर्फ।
- 27:34और अच्छा है ये सुपोज़ करले क्योंकि सुपोज़ करने से कुछ
- 27:39गुंडिया खुल जाती है। अगर हम मानेंगे ना इस इक्वल टु
- 27:44सेवेन बी इस इक्वल टु सिक्स तो फॉर्मूला।
- 27:49फिर सवाल जो है वो सलूक भी नहीं होगा?
- 27:55उसके लिए मानना आवश्यक है और यह सबसे पहले एक गोलाकार प्रिंट था।
- 28:06यह मानना पड़ता है वैज्ञानिक को। हालांकि वो जानते हैं तुम
- 28:12वैज्ञानिक को सम्मान देते हो, लेकिन वैज्ञानिक खुद ही दुविधा
- 28:18में हैं। वैज्ञानिक को नई नई दुविधाएं
- 28:25छेड़ती रहती हैं क्योंकि वह रहस्य है।
- 28:31वैज्ञानिक कहते थे कि जो फोटॉन है वो पार्टी का है।
- 28:41आज सिद्ध हो गया कि वह पार्टिकल ही नहीं, वह वेब भी है, लहर भी
- 28:46है, तरंग भी है। फिर घमासान मच गया।
- 28:51कहते पार्टिकल है कि तरंग है, क्योंकि तरंग तो बहुत से पार्टिकल
- 28:56से बनती है। और पार्टी कर का जमावड़ा इकट्ठा
- 29:06हो के तरंग पैदा करता है। तरंग कन्जेस्चन में आती है तो
- 29:11पार्टिकल बनती है तो साइंस गड़बड़ा गई।
- 29:23फिर एक नतीजा सामने आया कि जब हम उसको देखते हैं तो वह तरंग बन
- 29:33जाता है। जब उसको नहीं देखते वह वर्टिगर हो
- 29:37जाता है। फिर तुमने क्या खाक जाना?
- 29:43उसकी रचना को तुम ठीक से सॉल्व भी नहीं कर सकते।
- 29:46उसकी रचना को बना कैसे पाओगे? तुम उसकी रचना को सॉल्व भी नहीं
- 29:54कर सकते। तो उसकी रचना को बना के और तुम
- 30:01दावे करते हो बड़े बड़े सिकंदर की तरह जीत लूँगा सारे संसार को वो
- 30:11जब मरता है तो कहते हैं मेरे जनाजेस बाहर मेरे हाथ कर देना।
- 30:22वह विराट अर्जुन ने देखा और कंपनी लग गया।
- 30:31अनंतलोक काल का भ्रास बन रहे हैं अनंतलोक जीवन पार।
- 30:40इस सारे दृश्य को देखकर वह हिल गया।
- 30:43ना जो कम्पन सिर्फ गुरुदेव और दादा श्री के मरने पर कम्पन था,
- 30:50वो तो कुछ भी नहीं था। वो फीका पड़ गया।
- 30:57अब ये बड़ी झंझट खड़ी हो गई। इतनेइतने लोग लाखों करोड़ों
- 31:03करोड़ों लोग मर रहे हैं और करोड़ों करोड़ों लोग जीवन पा रहे
- 31:07हैं। यक सा एकदम से यह सभी ब्राह्मणों
- 31:12की सामूहिक घटना देख रहा है। अर्जुन।
- 31:17और कृष्ण कहते हैं, मैंने यह किसी से पहले बताया नहीं तुझसे पहले
- 31:23मैंने पहले सूर्य को बताया। इस ज्ञान को सबसे पहले मैंने
- 31:33विवोत्स्वान को बताया सूर्य को बताया।
- 31:37सूर्य ने इसे मन्नू को दिया यानी मनुष्य को दिया।
- 31:42मन्नू ने इसे शुवांको को दिया और एक शुवांको से आगे फैलता चला गया।
- 31:53सिम्बोलिक अब्रीविएशन है। भगवान कृष्ण सिम्बल की भाषा में
- 32:01बात कर रहे हैं क्योंकि सत्य को जो अर्जुन देख नहीं पाया, कांप
- 32:08रहा है और समझ से पार हो गए। वह बोला कैसे जा सकता है?
- 32:22कृष्ण कहते हैं, यह ज्ञान मैंने सबसे पहले विवशवान को दिया, सूर्य
- 32:27को दिया। सूर्य ने इसे मन को दिया और मनू
- 32:32ने इसे एक शिवान को। को कर दिया।
- 32:34मन्नू के ही पुत्र से शोक मन्नू से पांचवीं पीढ़ी जैन धर्म की
- 32:47आजाती है। पांचवीं पीढ़ी ऋषभदेव।
- 32:55वृषभ दे व्यारिशभ वहाँ से 24 तीर्थंकर चलते हैं।
- 33:03कृष्ण कहते हैं, अब्रीविएशन में सूक्ष्म रूप से।
- 33:14कि सबसे पहले मैं गोला था यह एक गोला समूह के रूप में फिर मैंने
- 33:26लीला खेल नीचा। फिर मैंने संकल्प किया एको अहम।
- 33:33मैं एक हूँ बहु शामी बहू हो जाऊं बहू तो हो जाऊं तो मैं एक से बहू
- 33:40हो गया मैं फैल गया मेरा पसारा जब कोई चीज़ फूटती है, टूटती है दूर
- 33:49दूर तलक फैल जाती है। ध्यान रखना तुम इसे बुद्धि से
- 34:00समझने की चेष्टा मत करना, क्योंकि कृष्ण ये ज्ञान बुद्धिमान के लिए
- 34:07नहीं दे रहे हैं। कृष्ण यह ज्ञान आस्था बालों के
- 34:14लिए दे रहे है। श्रद्धा बालों के लिए दे श्रद्धा,
- 34:21विश्वास, रूपनों या व्यम बिना न। तुम इसको खोपड़ी से समझने की
- 34:29चेष्टा मत करना, क्योंकि यह खोपड़ी में नहीं आएगा और तुम
- 34:34सोचते सोचते कहोगे, यह तो एक उपन्यास है, और तुम नास्ते हो
- 34:44जाओगे। ऐसे ही बहुत से लोग नास्तिक है।
- 34:51उसकी विराटता को देखकर कोई कहता इतने वराट का बनाने वाला कोई
- 34:58होगा? अब ये बात बुद्धि में नहीं आती।
- 35:05इतनी सूक्ष्मता से प्रणालियाँ को गणित करने वाला कोई इतना महीन
- 35:10महीन महीन दिमाग होगा, यह बात समझ से परे लेकिन विज्ञान जैसे जैसे
- 35:20खोजता चला जाता है। वैसे वैसे उसको उपलब्ध कुछ और हो
- 35:25जाता है और अंत में तुम क्या पाओगे अंत में तुम पाओगे
- 35:31नागार्जुन को शून्य, इसलिए नागर्जनों को मैं आखिर में रखता
- 35:38हूँ शून्य से जब। शून्य से उपजा है ये सारा कुछ।
- 35:49इसे बुद्धि से समझने की चेष्टा मत कर इसे श्रद्धा से स्वीकार कर
- 36:00लें। क्योंकि ये बुद्धि से समझने वाला
- 36:03गणित नहीं है। ये बुद्धि से समझने वाला फॉर्मूला
- 36:08नहीं है। यह एक रहस्य है और रहस्य है।
- 36:14रस भरा इसे पीना होता है, इसे समझना नहीं होता।
- 36:19समझने से तो तुम्हारी। न्यूरॉन्स टूटेंगे, तिडक तिडक
- 36:25करेंगे, सिर दुखेगा एनल जैसे की लेनी पड़ेगी।
- 36:30समझ में कुछ भी नहीं आएगा भला गागर में सागर समा भी जाए तो गागर
- 36:36का हाल क्या होगा? कभी सोचा है?
- 36:42तुम गागर में सागर भरने के उतावले हो?
- 36:46कभी अंजाम भी सोचा है तुमने? गागर का हाल क्या होगा?
- 36:51जिसके ऊपर सागर गिर जाए, उसका नामोनिशान नहीं मिलेगा।
- 37:00बस यही होता है अनुभव में एनलाइटनमेंट की घटना में जब
- 37:07तुम्हारी बूंद के ऊपर वह सागर उतरता है तो तुम्हारा अहम खो जाता
- 37:13है जिसे तुम मैं कहते हो। और ये मैं ही मोह का कारण है, मैं
- 37:26ही मोह का कारण है और मैं ही बंधन का कारण है की मोह एक बंधन है।
- 37:40तो कृष्ण कहते हैं कि मैंने सबसे पहले सूर्य को दिया यह ज्ञान
- 37:46सूर्य को सूर्य ने मन्नू को दिया। मन्नू ने एक शिवांग को यानी पीढ़ी
- 37:53दर पीढ़ी यह चलता रहा इसलिए तुम पाओगे जैन धर्म में बहुत सी
- 37:58चीजें। हिंदू धर्म से यक सा कितने ही अलग
- 38:03मान ले लेकिन यक सा मिले और एक ही धर्म में 24 दिन तुम कर हुए
- 38:11तुम्हें जानकर हैरानी होगी। मैं मल्लीबाई को पढ़ रहा।
- 38:20जैन धर्म की एकमात्र स्त्री देवशंकर उसकी भाषा जैन धर्म के
- 38:33बाकी। तीर्थंकरों से बिल्कुल नहीं मिलती
- 38:36स्त्री अपनी भाषा में बोलेंगे, मनुष्य अपनी भाषा में बोलेंगे।
- 38:43आदमी अपनी भाषा में बोलेंगे तो मलिबाई का ज्ञान किसी तीर्थंकर से
- 38:52मेलान खाता ही नहीं। तुम्हें बड़ा आश्चर्य न हो यह
- 39:00कैसा गया? यह तो रेशम को पलट गया और महावीर
- 39:07ने बिल्कुल ही पलट दिया। बात निकलेगी तो बहुत दूर तक है।
- 39:20मोह और प्रेम में क्या अंत मोह कंजस्टेड होता है?
- 39:29महो शुद्र होता है, महो संकीर्ण होता है, महो तुम्हें बांध लेता
- 39:35है, प्रेम विस्तीर्ण होता है, संकीर्ण नहीं होता, प्रेम विराट
- 39:42होता है, प्रेम बांधता है, प्रेम तुम्हें आजाद का।
- 39:48आज जो प्रेम में प्रेम है गांव में तुम कहते हो प्रेम है वह
- 39:54प्रेम नहीं, प्रेम तो वह है जो टूटे ना प्रेम में जोड़े को कभी
- 40:02भी तलाक की ऐप्लिकेशंस लिए। जस्टिस के सामने नहीं पाओगे।
- 40:10तुम जज के सामने नहीं पाओगे। प्रेम तो कबीर और लोई में होता
- 40:16है। प्रेम तो कृष्ण और सभी पत्नियों
- 40:27में होता है। कबीर के तो एक ही तरफ कृष्ण के तो
- 40:3316,108 और सभी से और किसी से मोर नहीं था।
- 40:43ये तुम्हें बात बड़ी अजीब सी लगेंगी, लेकिन जो उस तल पर चला
- 40:48गया। उसकी जद में सहारा आ गया उसकी जद
- 40:53में 16,108 ही ने वरना ये सारे भ्रमण आ गए, समा गए उसमें वह इतना
- 41:01विस्थिरण हो गया। वह इतना फैल गया कि उससे बाहर कुछ
- 41:06न रहा। सब उसकी जद में लिपट आ गया।
- 41:15इतना ही विस्तीर जो हो जाता है, वह प्रेम में हो जाता है।
- 41:23तुम जीसको प्रेम समते हो, वह प्रेम का धोखा है।
- 41:29इसलिए तो तलाक की अर्जी के लिए तुम जीसको कहते थे कि इसके बिना
- 41:35एक पल न जी प्रमुख उसी को कहते हो।
- 41:42के इसी के बिना चयन आय। ये जब तक है तब तक चैन यह बेचैन
- 41:49किए रहती है। यह बेचैन किए रहता है और आज यह
- 41:56बात तुम्हारी समझ में नहीं आती क्योंकि प्रेम कवि समझ में आता
- 42:01नहीं, प्रेम तो में हुआ नहीं। तुम्हें मुँह हुआ था, तुम्हें कुछ
- 42:09पुर्जा अच्छा लगा होगा, ये घुंघराले बाल, ये मस्तानी चार।
- 42:20तो ये मत वाली चार। तो यह मत वाली चाल झुक जाए फूलों
- 42:30की धार चाँद और सूरज आकर मांगे तुझसे रंगे जमाल हसीना।
- 42:41तेरी मिसाल कहाँ आ तो बाहे मत वाली चाल।
- 42:51झुक जाए। फूलों की ढाल चांदू सूरज आकर
- 42:56मांगे तुझसे रंगे जमाल हसीना? तेरी मसाल काम?
- 43:08और वही मतवाली चाल तुम्हें सबसे बुरी लगने लग जाती है।
- 43:21झगड़ू तलाक की अर्जी देने गया था। मैंने कोर्ट से पूछा यहाँ क्या
- 43:27करने आए और साथ में घरवाले कहते तलाक की अर्जी देने।
- 43:35मैंने कहा तुमने तो प्रेम विवाह किया था, कहते हाँ किया था।
- 43:40तो फिर ये तो कोई प्रेम न हुआ तो किस बात के लिए प्रेम किया कि
- 43:48इसके दांत बड़े सुन्दर मुस्कराते थे तो फूल झड़ते थे यार न के कभी
- 43:54कोई मुस्कुराने से फूल झड़ा नहीं। किसी के ज़रा हो तो बता दो कविता
- 44:04जब मुस्कराती थी तो फूल झरती थी। यह कवियों की भाषा है, कभी बैठा
- 44:14कविता कर रहा था। जो भी का चांद हो या आफताब हो, जो
- 44:32भी। हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो
- 44:46चौधरी का चाँद। एक भूखा गुजरा था पास, उसने भी
- 44:56देखा ऊपर कहते है आज तो रोटी पूरी है, चंद्रमा में तैर रही पूरी
- 45:04रोटी भूखे को वही दिखेगा तो महंगे कवियों को वही दिखेगा।
- 45:13जो भीतर की तमन्नाएं शब्दों में रूबरू हो जाया करतीं, तुम्हें धन
- 45:20चाहिए इसलिए अपने आपको मुँह मिया मिठू बनता है मैं महंगा कभी।
- 45:31₹5 छह अने का माल है, तुममें ये है परमात्मा की जात और बाबा ने
- 45:41इतना शानदार जपजी बोल दिया और बाबा कहते हैं जिसे ए लिखे तिससे
- 45:46सरना जब फरमाए थे अच्छा बप्पा। जिसने ये लिखे हैं उसके सर की खोज
- 45:53नहीं, ये तो उस विराट का सफुरण है जब फुरमय तेबते बप्पा जैसे उसकी
- 46:04सफुरणा उत्तरी वैसे वैसे मैं लिखता चला गया।
- 46:11जुलफे हैं जैसे मैं जुलफे हैं जैसे कांधे पे बादल झुके हुए।
- 46:28आँखें हैं जैसे महक प्याले भरे हुए मस्ती है, जिसमें प्यार की।
- 46:45तुम हो शराब आ चद में का चा या आफताब हो।
- 47:03जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हुआ कमल या ज़िन्दगी के साज़
- 47:58का हो। या आफताब हो होठों पे खेलती
- 48:24करती है कह कशा दुनिया है इश्क तुम इश्क का?
- 48:40शबाब हो चौदहवीं का चांस होठों पे खेलती हैं तबस्सुम।
- 49:00की बिजलियाँ सजदे तुम्हारी राह में करती हैं, कह कशा दुनिया आए?
- 49:16उसने इश्क़ का तुम ही शबब हो छोड़नी का चांदो।
- 49:34या आफताब हो जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो।
- 49:54उसकी सृजना का बेबाक वरना ये कविता में उतर जाता है गुमान मत
- 50:03कर क्या महंगे हैं या सस्ते ये परमात्मा की दें?
- 50:12परमात्मा की सृजना से उतरी हुई ये घटनाएं यह शब्द तुम्हारे नहीं,
- 50:21लेकिन तुम्हें तो संस्कार है, तुम हर चीज़ को जफर डाल देते हो यह
- 50:27मेरी पत्नी है या मेरी पुत्रियां? यह मेरा पुत्र है।
- 50:33यह मेरी जमीन है, यह है मेरी क्वालिफिकेशन, तुम्हारा कुछ भी तो
- 50:37नहीं और अंत में ऋषि यही पता है जब प्रेम की उस विस्तीर्ण अवस्था
- 50:48में चला जाता है। जब कोई और छोर बाकी नहीं बचता,
- 50:56जिसका कोई किनारा नहीं कोई आदि नहीं कोई मध्या नहीं कोई अंत सब
- 51:04वही वही है सब ईशा वस्त्र में हम सर्वमजत किंची जगत याम जगत।
- 51:11जगत के कण कण में वह मौजूद साक्षी बाप से बड़ी प्यारी देखिए, वो
- 51:20साक्षी भी है और वो करता उसने ही बनाई है सारी लीला।
- 51:28और अपनी ही लीला को वो देखता है। बड़े प्यार से नानक विकसे कर
- 51:32विचार बड़े प्यार से निहारता है और प्रसन्न होता है विग से
- 51:38प्रसन्न होता है खुश होता है तुम इस खुशी का लुत्फ उठा लो।
- 51:50यह मानव का जामा लोतफ़ उठाने के लिए मिला।
- 51:57कल का फिक्र करने के लिए नहीं मिला।
- 52:02तुम फिक्र काहे करते हो? जिससे कल का तुम फिगर करते हो,
- 52:07तुम्हें पता है वह कल आएगा या नहीं आएगा।
- 52:15वह कल कभी नहीं आता, वह कल किसी का भी नहीं आता।
- 52:19सिर्फ तुम्हारा ही नहीं रावण ने यही समझाया था लक्ष्मण।
- 52:26भैया आज का काम कल पे मत छोड़ देना क्योंकि कल कभी आता ही नहीं,
- 52:34कल तो काल है कल तो काल का ग्रास बना लेगा तुम्हें।
- 52:41अभी करो अभी अभी आज भी नहीं अभी अभी से शुरू करता हूँ मैं इतनी
- 52:53गीता बोला मैं इतना ग्रंथ बोला लोग मुझे पूछ लेते हैं।
- 53:00बाबा ये दिल धड़कता है तेजी से क्रियायोग के बाद धड़केगा भाई
- 53:05धड़कने दो ये शरीर कपता है कपेगा मैं कपा तो समझना कि तुम्हारे
- 53:14क्रियायोग फल नहीं लेके आया? ये तुम्हारे भीतर छुपा हुआ कूड़ा
- 53:23करकट गंदगी जो जन्मो जन्मो से तुमने लाद दी है, अपने भीतर चेतन
- 53:30अवचेतन, अचेतन, सामूहिक, अवचेतन। जब भरा पड़ा है तुम्हारा सारा कूट
- 53:38कूट के इसलिए तो बोलता कुछ है व्यक्ति निकल कुछ ही जाता है,
- 53:49बोलता है बेटी पढ़ाओ निकलता है बेटी पटाओ।
- 53:54यह यूं ही नहीं आ जाता। यह भीतर से आता है, कभी यूं ही
- 54:00कोई चीज़ निकलती है। यूं ही कुछ भी नहीं हुआ करता।
- 54:05ये कुछ है गड़बड़ भीतर जो बाहर निकल गई सहज हमारे कंट्रोल के
- 54:11बावजूद। सो इसपे इतना मान मत करना, शरीर
- 54:20कपता है कंपनी देना क्योंकि तुम कपते हुए शरीर को देखो और जिसे
- 54:26तुम देख लेते हो उसका मैं मिट जाता है तुम्हारे साथ।
- 54:32कि यह कंपित हुआ शरीर में? इसे अच्छी तरह से कंपनी दो और
- 54:38ज्यादा कंपनी दो। इसको कंपनी में सहयोग करो, उम्मीद
- 54:42से घबराओ मत ऊंचा ऊंचे श्वास लो, ऊंचे ऊंचे श्वास लो और जो तुम
- 54:49शांति से बैठ जाओगे। तो तुम्हारा मन धूल की तरह उठेगा।
- 54:54जैसे हम फर्श साफ करते हैं और गुब्बार उठ जाता है, छत तलक यह
- 55:00गुब्बार है जो भीतर से उठा इसे निकल जाने का ये वही संस्कार है
- 55:06जो तुमने जन्मो जन्मो में इकट्ठे किये हैं, मैं समझ गई।
- 55:11ना तुम शरीर हो, ना भावना हो, ना विचार हो, ना मान्यताएँ हो, ना
- 55:17नॉलेज हो, ना ही सूचनाएँ। तुमने जो बाहर से जोड़ा वो
- 55:27व्यर्थ। वो धन हो, मान प्रतिष्ठा हो, वो
- 55:34कविता हो, वो गद्दियाँ हो, नारेबाजी हो, भाई समझदारी हो, वह
- 55:45पागलपन हो या बाहर से आता है, तुम कभी पागल नहीं हो सकते हो।
- 55:52तुम्हारा तत्व कभी पागल नहीं होता, तुम्हारा स्वयं कभी पागल
- 55:58नहीं होता, जो कटता नहीं, जो जलता नहीं नैनम चकंती शस्त्राणी नैनम
- 56:04दाती पावका नय जैनम क्ले दंते बोना शोषित मरो तह।
- 56:13जिसे हवा उड़ा नहीं सकती। जैसे पानी गला नहीं सकता, वह भला
- 56:18बंधनों में कैसे बांध सकता है? और मुझसे आके पुत्रियां पूछ लेती
- 56:24हैं शादी करें कि न करें? क्यों करने में क्या हर्ज है?
- 56:32बंध जाएंगे देखिए अब कितना भरमा गया है, जो तत्व जलता नहीं, गलता
- 56:42नहीं, काटता नहीं, मरता नहीं। बुझता नहीं सूखता नहीं।
- 56:46वह बंध जाएगा तो यह तो किसी आचार्य से ही सीखा होगा ना?
- 56:54जो जानता नहीं वो सिर्फ बांचता है जो व्याख्यान करता है।
- 56:59जिसने अपने भीतर डुबकी लगाई नहीं तो उसी से सीख किया ही होगी तुम।
- 57:05हाँ, बाबा सीखा तो उसी से था। फिर कोई काम आया जो सूत्र समझ
- 57:14लेते हैं सूत्र बेकार सूत्र मत समझो सत्य समझो सत्य क्या है सत्य
- 57:24वह है। जीसको बांधा नहीं जा सकता सत्य वह
- 57:28जो बंधन से मुक्त है, जो बंधन से युक्त नहीं है जो बंधन से युक्त
- 57:34है वह सत्य नहीं है वह तुम नहीं वह दूसरा।
- 57:42तुम तो वो हो जो बंधन में कभी आए ही नहीं, कभी नहीं आए, कभी नहीं
- 57:49आए और आखिर में तुम नहीं पाओगे, बस तू ठौर के ठौर दादू लू जा को
- 57:59नहीं। दो जी मन की दो दादू दूजा को नहीं
- 58:06दो जी मन की दो दौड़ गई संस गया वस्तु ठहर किठ्ठ फिर बता दूँ दौड़
- 58:19गई संस मिटा? तुम सनसे में इसलिए हो तुम दुख
- 58:25में इसलिए हो कि तुम दौड़ते हो और सूत्रता ही है कि तुम ठहर जाओ।
- 58:35जो दौड़ाता है वहाँ से दौड़ आओ। जो डेरा तुम्हें कहता है पांच
- 58:41नामों में दौड़ो, वहाँ से दौड़ाओ मेरे पास आ जाओ, मैं तुम्हें ठहरा
- 58:49दूंगा, मैं तुम्हें उन सितारों पे ले जाऊंगा जहाँ महकती सुगंध हैं।
- 58:59जहाँ फिज़ाएं हैं जहाँ आनंद का आलम है रस बरस रहा है जहाँ झरने
- 59:08ही झरने हैं जहाँ बाहर ही बाहर है, फिज़ा कभी आई।
- 59:19जो तुमने दौड़ाए वहाँ से दौड़ाना बस तू ठोर कि ठोर तुम पाओगे तुम
- 59:26कभी कहीं गए ही नहीं, तुम कभी कहीं गए ही नहीं जैसे तुम सुबह।
- 59:36स्वप्न में तो तुम पता नहीं कहाँ पहुँच गए थे, लेकिन आँख खुली तो
- 59:43पाया वही चारपाई, वही बिस्तर वही तकिया।
- 59:55वो ही पुराना कम्बर्ग वो ही है चाल बेडंगी जो पहले थी वो अब भी
- 1:00:07है लेकिन सपने में कितनी दूर निकल गए?
- 1:00:15कोई अमेरिका पहुँच जाता है। कोई एपिस्टन के आइलैंड पे पहुँच
- 1:00:20जाता है। कोई इजराइल ईरान पहुँच जाता है,
- 1:00:27ये सब सपना है, जैसे ही आँख खुलेगी तुम पाओगे, तुम कहीं नहीं
- 1:00:36गए और अंत में यही होता। आंख खुलेगी तो सच पाओगे, आंख जब
- 1:00:45तक बंद है तब तक सच का ना पता चलेगा बस तुम्हारा जीना बस
- 1:00:56तुम्हारा मरना। मेरा जीना मेरा मरणा इन्हीं पलकों
- 1:01:07के चले तेरी आँखों के सिवा दुनिया में।
- 1:01:18रखा क्या है मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों के।
- 1:01:30तले ज़िन्दगी दुखी है, तू ये पलके झुकी हैं।
- 1:01:38ज़िन्दगी भागवा है तो पल क्यों उठ गई और जिसकी पल क्यों उठ जाती हैं
- 1:01:46आँखें तो सदा से ही मौजूद हैं आँखें कहीं जाती नहीं भरा तुम सो
- 1:01:51जाते हो तो आँखें कहीं चली जाती हैं।
- 1:01:55तुम अमेरिका चले जाते हो तो कभी आंख साथ लेके जाते हो, तुम
- 1:02:04अमेरिका चले जाते हो तो आंख साथ लेके जाते हो।
- 1:02:10नहीं लेके जाते ना वैसे ही तुम्हारा अस्तित्व तुम्हारे साथ
- 1:02:14नहीं जाते। तुम सपने में हो तुम भ्रांति में
- 1:02:20हो यू आर इन ऐलूजन और तुम्हें इस ऐलूजन को तोड़ना होगा।
- 1:02:27क्या करना है कुछ नहीं करना है मात्र बल्के उठा लेनी है गुरु यही
- 1:02:34तो करता है तुम्हें झंझोर लेता है।
- 1:02:38उसे पता है तुम्हें झंझोर दूंगा तो तुम आंखें और ओके और तुम्हें
- 1:02:47सत्य नजर आ जाएगा। सत्य कहीं जाता थोड़ी है जब।
- 1:02:52तुम्हारी आंख कहीं नहीं। गई तो सत्य भी तो यही रहता है।
- 1:02:58वस्तु ठोर की ठोर वस्तु? कहते हैं तुम्हारे अस्तित्व को न
- 1:03:06सत्य कहीं जाता है, न सत्य को देखने वाली आंख कहीं जाती है, बस
- 1:03:12तुम सपने में न जाने कहाँ खो जाते हो।
- 1:03:17हम तुम न जाने किस जहाँ में खोवै तुम न जाने किस जहाँ में खोवै।
- 1:03:38हम भरी हो गए तुम ना जाने किस यहाँ।
- 1:03:55मैं खो जब। तुम कहते हो संत के पास से मैं
- 1:04:01बहुत दुखी हूँ, मैं तो संत को बड़ी दया आती है।
- 1:04:10दया इसीलिए भी आती है कि कभी वह भी इसी मुकाम में।
- 1:04:15अपने पुराने हालात से याद आते हैं।
- 1:04:21वह भी कभी इसी तरह भटकर, कभी लश्कर का वो जंक्शन था, कभी
- 1:04:30हरिद्वार का वो स्टेशन था। कभी ऋषिकेश जाने की तमन्ना थी,
- 1:04:37लेकिन मिला कहाँ मिला? अपने ही बेहतर मिला वह शरद
- 1:04:47पूर्णिमा की राह का पूरा चाँद मुझे नहला गया।
- 1:04:54और दिखला गया कि ये दुख दर्द तुम नहीं हो यह तुम्हारे ऊपर आसमान पे
- 1:05:00छाये हुए बादल हैं, गाने काले होंगे माना सफेद, उथले होंगे माना
- 1:05:09गरज रहे होंगे माना बरस रहे हो। होंगे माना लेकिन हैं तो बादल
- 1:05:15बादल तुम तो नहीं हो पीड़ा तो होती है मुझे जगाने की चीज़ का भी
- 1:05:22तो मैं भरपूर करता हूँ और फिर से कहता हूँ जाग जाओ बहुत सौली है।
- 1:05:33जागने की वेला आ गई अब तो सूरज में ढल।
- 1:05:37गया उठ जाग मसा फिर भोर भाई अब रहने।
- 1:05:56कहाँ? जो सो मच है उठ जाग मसा फिर भोर
- 1:06:07भाई तुम। सराय में ठहर रहे हो।
- 1:06:12अब रहना। कहा जो सोवत जो सोवत है सो खोवत
- 1:06:26है जो जागत है। सो पावत है जो सोवत है सो खोवत।
- 1:06:40है। जो जागत है सो पावत है।
- 1:06:49उठ जा गमसा फिर बोल रही। धन्यवाद।