Latest / Baba ji Vijay Vats / 8 Apr 25 - क्या आपको मुमुक्षा का अनुभव हुआ है? मुक्ति की पहली सीढ़ी! तुम मुक्त क्यों नहीं हो पाते?
Transcript
- 0:06हरि रावण उपाध्याय बाबा आप अपने प्रवचनों में अक्सर का इस्तेमाल
- 0:23करते हो। यह मोमोक्षा क्या है?
- 0:33क्या इसको थोड़ा विस्तार से समझाने का कष्ट करेंगे?
- 0:53मो। मोक्ष याने मुक्ति की इच्छा
- 1:03अक्षर। तीन हैं शबद, बड़े गहरे।
- 1:18मुक्ति की इच्छा। होना लेकिन एक बात को।
- 1:29ध्यान में रखना वो मुक्षा जगती है जगानी नहीं पड़ती।
- 1:47वो। मुख्य का अर्थ है बंधन का प्रतीत
- 1:53होना जब तुम्हें ये पता चले कि मेरा सारा अस्तित्व।
- 2:06बंधन में है बंधनों ने मुझे झकड़ लिया है मैं बंध गया हूँ बुरी तरह
- 2:17बंध गया हूँ तो इन बंधनों को इनसे आजाद होने की।
- 2:26भीतर से कामना उठेगी उस। कामना का नाम है वो मुक्षा मुक्ति
- 2:37की इच्छा, लेकिन ये उठेगी कब? तब उठेगी जब तुमने अपने बंदरों को
- 2:52देख लिया और बड़े अफसोस की बात है कि आज मुक्ति की राह पे वो चल
- 3:04पड़े हैं। जिन्हें बंधन दिखे पहली बात समझ
- 3:20लेना वो मुक्षा के लिए बंधनों का दिखना अनिवार्य है जिसे अभी बंधन
- 3:31दिखे नहीं। वह कृपा करके अपना समय।
- 3:36व्यर्थ न कर वक्त। बड़ा कीमती है इंतजार करें जब तक
- 3:52के तुम्हें तुम्हारे बंदन दिखते हैं।
- 3:55तुम्हारे पूरे प्राण त्राहि त्राहि नहीं करते।
- 4:07तुम्हारा पूरा अस्तित्व रोम रोम इन बंधनों को महसूस नहीं करता।
- 4:18तब जगह की मुक्ति की कामना है। अभी तो तुमने शास्त्र पर ली किसी
- 4:29गुरु का प्रोविशन सुन लिया? और मुक्ति को तुमने एक उपलब्धि की
- 4:38तरह ले लिया। मुक्ति जैसी कमा नहीं पड़ती।
- 4:41है और अगर। कुछ आचार्यगण कहते हैं कि मुक्ति
- 4:53होती ही। नहीं तो वो ठीक।
- 4:57कहते हैं इस अर्थ में कभी बंधन ही नहीं हुआ।
- 5:09ऐसा समझो इसको दूर कहीं रेगिस्तान में गर्मी का महीना है तपते हुए
- 5:23रेत में मध्यान्ह का सूरज। तुम्हें तपायना और तुम्हारे शरीर
- 5:34का रोम रोम पसीने से भीग न जाए। शरीर डिहाइड्रेट न हो।
- 5:48और पुकार न उठे। भीतर से पानी, पानी तो फिर भला
- 6:00तुम पानी की तलाश। करोगे अभी?
- 6:06तो तुम मेहमान बन कर जिसके घर जाते हो सबसे पहले।
- 6:12पानी परोसा जाता है। लीजिए सबसे पहले जल और तुम जल
- 6:21पीकर आए हो बहुत जगह से तुम गर्दन हिला देते हो नहीं।
- 6:29ये तो नहीं और चाय भी नहीं क्योंकि उसमें भी पानी होता है।
- 6:38कभी कुछ नहीं, न भूख है, न प्यास है।
- 6:47बिना भूख के भोजन बेकार बिना प्यास के पानी बेकार है।
- 6:57जीस मोमोक्षा का तुम नाम लेते हो वह मोमोक्षा पैदा तब होगी जब
- 7:11तुम्हें तुम्हारे बंधन देखेंगे। हथकड़ियों से छूटने की इच्छा तभी
- 7:19होगी ना जब तुम्हारे हाथ बनते हुए।
- 7:22होंगे जब। तुम्हारे हाथ हथकड़ियों के भीतर
- 7:30बनते हुए होंगे। और तुम अपने हाथों को स्वतंत्र
- 7:33रूप से हिला न पाओगे। दोनों हाथ जकड़े हुए हैं।
- 7:38बेड़ियों में हाथ बंधे हुए हैं, पांव बंधे हुए हैं।
- 7:49फिर ये जिज्ञासा जेगेगी ये काम न जेगेगी के हटाओ।
- 7:56इनको इन बेड़ियों को इन हथकड़ियों को मैं स्वतंत्र होना चाहता।
- 8:06हूँ। मैं स्वतंत्र होना चाहती यूं ही
- 8:21मुक्ति की कामना पैदा नहीं होती, मुक्ति की कामना से पहले बंधन
- 8:30देखने चाहिए और जब बंधन देख जाते हैं।
- 8:39सो नेसेसिटी इस दी मदर ऑफ इन्वेंशन खोज आविष्कार जरूरत की
- 8:53जननी। तो तुम खोज करते हो कैसे मुक्त हो
- 9:05फिर शास्त्र खोलते रहो फिर गुरु के पास जाते हो फिर तुम्हें
- 9:14कंगालना पड़ता है सारा विश्व। रोगी को ही वैद्य की।
- 9:21तलाश होती है निरोग व्यक्ति। वैदिकों को तरासी का डॉक्टर के
- 9:31पास क्यों चढ़ा? बिल्कुल सवस्थ है ज़रा भी तू रोक
- 9:36ले। ये शब्द मैं अक्सर बोलता हूँ
- 9:43बिलाशक लेकिन इस शब्द को शब्द समझकर मुक्ति की तलाश में मत निकल
- 9:53पड़ना। तुम अपने आप को धोखा दोगे।
- 9:59तुम वक्त को बर्बाद करोगे। आज ऐसे ही मो।
- 10:03मोक्ष पांडालों में बैठे हैं। शामिआनों में बैठे हैं, शिवरों
- 10:14में बैठे हैं, तलाश मुक्ति के हैं नहीं।
- 10:26तलाश है किसी और चीज़? की जो तुम्हे खुद भी।
- 10:36पता नहीं कि हमें तलाश। किस चीज़ की है?
- 10:44मुक्ति की तलाश करने से पहले। बंधन का देख जाना जरूरी है।
- 10:53अगर बंधन नहीं देखा तो मुक्ति की तलाश करना व्यर्थ है।
- 11:00प्यास नहीं लगी तो कुआं सामने भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 11:07और कुआं तो सदा सामने। है तुम्हें?
- 11:17पता नहीं के कुआं सामने है अभी प्यास से जगी नहीं है, तुमने कुंए
- 11:27तलाशे नहीं। बंधन दिखा अभी तुम आजादी की
- 11:38छलांगें लांग रहे हो, अभी तुम समेत हो के हम मुक्त हैं ही बस
- 11:46यही मुश्किल है। हर जन्म में ऐसा ही होता है इसलिए
- 11:55हजारों जन्म बीत जाते हैं तो मुक्त नहीं हो पाते, इसलिए नहीं
- 12:04के मुक्त हुआ नहीं जा सकता। नहीं, ऐसा नहीं, बट इसलिए कि
- 12:10तुम्हें तुम्हारा बंधन। दिखाई नहीं पड़ता, जीस।
- 12:18दिन तुम्हें तुम्हारा बंधन दिखाई पड़ गया उस दिन भरा पूरा घर
- 12:24छोड़कर। पुत्र स्त्री को छोड़कर
- 12:31सिंघासियों को छोड़कर तेरे जवाहरात के खजानो को छोड़कर बुध
- 12:40घर से भाग जाते थे। क्या हुआ?
- 12:49बंधन दिज्ञा बंधन क्या था, मृत्यु का बंधन और सत्य है।
- 13:01इसको ठुकराया भी नहीं जा सकता। इसकी उपेक्षा भी नहीं हो सकती।
- 13:09यह तो आएगी लेकिन अगर अन्य जगे तो जगाना मत तुम कीर्तनों में, जाके
- 13:31सत्संगों में जाके। गुरुओं के पाशा के शास्त्रों को
- 13:38पढ़ के मुक्ति को जगाने की चेष्टा मत करना है क्योंकि ये सवाल
- 13:47शास्त्रों का है नहीं और इसका जवाब भी शास्त्रों में नहीं।
- 13:53यह सवाल गुरुओं का है। नहीं और गुरु।
- 14:01तुम्हें मुक्त कर भी न। पायेगा यह सवाल।
- 14:12है कि तुम्हारे भीतर तुम्हें दिखा नहीं कि मुझे बंधन है।
- 14:22अभी तो तुम और बंधनों को, मान्यताओं के बंधनों को,
- 14:31अपेक्षाओं के बंधनों को, समृद्धियों के बंधनों को,
- 14:37कल्पनाओं के बंधनों को? सजाई ही चले जाते हो।
- 14:47क्या तुम सोचते हो कि। तुम्हें कभी मुक्ति की इच्छा
- 14:57उठेगी? अभी तो मान्यताओं को सिर के।
- 15:06ऊपर ठोके जाते हो? और सिर पहले से बहुत उबहरी।
- 15:12है। तुम अपेक्षा मत करना।
- 15:22मुक्ति की इच्छा जगेगी। भीतर से बाहर से नहीं जगानी होती
- 15:29न मंदिर नमस्ते से न गुरुद्वारा, न चर्च, कहीं जाकर भी मुक्ति की
- 15:34इच्छा नहीं उठती। ध्यान रखना इन मंदिरों में,
- 15:40मस्ज़िदों में, गुरुद्वारों में। चर्चो में मुक्ति की इच्छा नहीं
- 15:45उठती और जो मुक्ति की इच्छा मंदिरों में जाके उठती है, वह
- 15:51श्रेणी को होती है। थोड़ी देर।
- 15:53की होती है। जैसे किसी इतर बेचने वाले के पास
- 16:01बैठे। थोड़ी देर के लिए सुगंध आई।
- 16:07बस ऐसा जब तुम वहाँ से उठ के आ जाते हो तो ये तुम्हारे जीवन का
- 16:13सवाल नहीं बनता। मुक्ति जीवन का सवाल बनना चाहिए।
- 16:20और कब बनता है जब तुम्हें जीवन बेड़ियों से बंधा हुआ दिखता है?
- 16:33अभी तो रोज़ रोज़ जीवन सदाबहार लगता है।
- 16:44अभी तो जीवन में इतना आनंद है इतनी।
- 16:48खुशी है तुम। रोज़ सांझ गिनते हो मेरी पूंजी
- 16:57कितने बढ़ गए? मुझे एक आदमी परिषद करवा रहा था
- 17:03अपने आप से परीक्षा करवाया मेरा नाम, ये है पिता का नाम ये माता
- 17:14का नाम ये निवास स्थान वहाँ का। शादी शुदा हूँ एक पुत्र है, एक
- 17:23पुत्री गाय भी है, भैस भी है, पेट भी है और मेरी नेट वर्थ
- 17:372,00,00,000। मैं चौंका नेट वर्थ दो।
- 17:43करोड़ मैंने कहा इसकी क्या आवश्यकता है?
- 17:55वैसे तो वो भी तुम्हारी पहचान नहीं है।
- 18:01वो पहचान भी नकली नकली तुमने बता दी, लेकिन इसकी तो बिल्कुल ही गलत
- 18:06पहचान है। मेरी नेट वर्थ इतनी और तुम देखो
- 18:13आजकल वाकई पहचानी खत्म हो गई। पहचान ही सिर्फ नेट वर्थ की बस
- 18:25बिड़ला की नेट वर्थ इतनी फलांसेठ की इतनी और फलांसेठ की इतनी इससे
- 18:32ही तुम पहचान जाते हो। इस कार से क्या है?
- 18:42अभी तुम्हारा जीवन नेट वर्थ में उलझाए अभी तुम्हारी लालसा मुक्ति
- 18:52में नहीं है। नेट वर्थ कैसे बढ़ा लूँ?
- 18:58अभी तुम्हारी लालसा ही है। डॉक्टर के पास अगर रोग न हो तो
- 19:11उसको बताओगे क्या? डॉक्टर तुम्हे दवाई देगा मेरा नाम
- 19:18ये पिता माता का नाम ये जहाँ जन्मा था शादीशुदा हूँ, बेटा है,
- 19:24बेटी है। और नेट वर्थ 2,00,00,002 अरब मेरा
- 19:31इलाज कीजिये, वो तुम्हे गौर से देखेगा।
- 19:38जरूरत तो है इलाज की। लेकिन भाई कोई दर्द हो तो मुझे
- 19:48बताओ मेरे पास तो ऐनल जैसे कि मिलेगा सेकंड ट्रेक तो में है
- 19:54नहीं, ये कोई पहचान नहीं है और तुम इसको अपनी पहचान समझते हो?
- 20:06मैंने कहा इसकी तो कोई जरूरत नहीं थी, वैसे तो उसकी भी कोई जरूरत
- 20:11नहीं थी जो तुमने बता दिया मैं कहाँ किसी से पूछता हूँ हज़ारों
- 20:18लोग आ गए बस मुझे ये पता है ये क्यों?
- 20:25दीक्षा दे देता हूँ, अंगूठा लगा देता हूँ, तीसरे नेत्र पे बस और
- 20:34मैं नहीं पूछता कहाँ से है तुम्हारे नाम पे कभी पूछा?
- 20:41कभी किसी से पूछता हूँ और वो क्यों पूछता हूँ?
- 20:47उसका कारण मुझे ही मालूम है क्योंकि कुछ लोग अनचाहे अनजाने
- 21:02मेरे पास पहुँच जाते हैं। और जब मैं उनका ओहरा देखता हूँ तो
- 21:10मेरा भीतर प्रसन्नता से कह जाता है बस यह पहुँच जायेगा, यह पहुँच
- 21:18जायेगा इसी जन्म में पहुँच। जायेगा।
- 21:36मैंने कहा इसकी कोई आवश्यकता नहीं जो तुम अपनी आइडेंटिफिकेशन गढ़ते
- 21:42हो और तुम्हारी आइडेंटिफिकेशन है भी।
- 21:51माँ बाप ने नाम दे दिया या ज्योतिष ने नाम रख दिया?
- 21:59शादी हो गई, बाल बच्चे हो गए, पैसा देला कमा लिया, इट्स नॉट योर
- 22:07डायग्निटिक यह तुम्हारी पहचान है क्या?
- 22:19मोमुक्षा क्या है मुक्त होने की इच्छा और पहली बात तुमसे मैंने
- 22:28कही कि मुक्त होने की इच्छा पैदा होती है करनी नहीं होती।
- 22:39तुम्हारे प्राण रोई पानी के गिनवे तुम प्यासे हो जाओ सचमुच
- 22:50रेगिस्तान के भीतर चलते चलते। है और दोपहरी का सूरज प्राणों में
- 23:02संकट आ गया है और तुम्हारे प्राण से लाइन पानी दो अन्यथा वजूद
- 23:10खत्म। बड़े से बड़े सिकंदर पानी मांगने
- 23:19लगते हैं, जिनके पास अकूत संपत्ति होती।
- 23:24है। रेगिस्तानो में जहाँ पानी की
- 23:29व्यवस्था नहीं होती। और जो स्टोर्ड पानी खत्म हो जाता
- 23:34है तब पता चलता है पानी की औकात क्या है अगर प्यास न जगे।
- 23:49तो पानी की तलाश करना मत तुम बड़ा धोखा खाओगे पानी की तलाश में अपना
- 23:59अमूल्य जीवन खराब कर दोगे मुक्ति की खोज बाद में।
- 24:08बंधनों का एहसास पहले तो ध्यान रखना अगर तुम्हें तुम्हारे बंधनों
- 24:16का एहसास न हुआ तो मुक्ति की कामना मत करना, फिर तुम्हारी
- 24:24मुक्ति की कामना शब्द। प्राणों से नहीं आए होंगे।
- 24:32जिसने ये नहीं जाना कि मेरे हाथ पांव मेरा समग्र अस्तित्व बंधन से
- 24:39जकड़ा हुआ है, वह मुक्ति की कामना क्यों करेगा?
- 24:44वह तो स्वतंत्र है। खाओ क्यों मौज करो अभी परमात्मा
- 24:57की दिशा में मत जानो। अभी मुक्ति की दहशत तुम्हारे लिए
- 25:01नहीं है। जिसके लिए है वो चले जाएंगे, भरा
- 25:07पूरा घर छोड़ते चले जाएंगे। लेकिन ध्यान रखना तुम्हारे लिए
- 25:16मुक्ति की अभी जरूरत ही नहीं है। जीवन मरण का सवाल तो जब मुक्ति
- 25:24बनेगी तब बनेंगे, लेकिन अभी तो तुम।
- 25:28बंधनों से तंग ही नहीं आई मेरे पास कलिक युवती का फ़ोन आया।
- 25:38बाबा मेरा तीन बार। तलाक हो।
- 25:46गया। चौथी बार मुझे ये बताओ कि मैं
- 25:55शादी करूँ कि न करूँ? कमाल की बात।
- 26:01है। वासना तुम्हारी भीतर है, तो तुम
- 26:08देखो तुम साथी की जरूरत है कि नहीं है मुझसे क्या पूछते हो मुझे
- 26:18कोई जरूरत नहीं है। मेरा तीन बार तलाक हो।
- 26:23गया। चौथी बार मुझे शादी करनी चाहिए कि
- 26:28नहीं करनी चाहिए? यह कोई प्रश्न है, बिल्कुल वैसा
- 26:35ही जैसे पेड़। मुक्त होना चाहते है कि नहीं तेरा
- 26:49इसका जवाब भी। सुन लो पेड़ को अभी।
- 26:59बदन देखा नहीं, पेड़ इतना जड़ है, थोड़ा सा चेतन है।
- 27:08पत्थर जितना जड़ नहीं है, लेकिन थोड़ा सा चेतना है।
- 27:15जीसको अभी बंधन दिखा नहीं, वो भला मुक्ति की कामना करेगा, बस इसे आप
- 27:23मापदंड की तरह ले लेना। मुक्ति की कामना जागेगी जब बंधन
- 27:35तुम्हें रुलाने लग जाएंगे जब तुम चाहोगे मैं हाथों को उठाऊ।
- 27:44और हथकड़ियाँ अड़े आयेंगे तो मुक्ति की काम न जागेगी, वो आय के
- 27:52भीतर से बाहर के बंधुन्तु में बंधनों जैसे लगेंगे।
- 28:00पेड़ में तो इतनी प्रत्यभज्ञ भी नहीं है कि वो जान ले।
- 28:06के हम बंधन में हैं। यही जवाब था तुम्हारे इस।
- 28:14प्रश्नों का पत्थर को बिल्कुल। ही बंधन नहीं दिखता।
- 28:24और पेड़ को भी बंधन नहीं दिखता और मनुष्य को भी इतनी क्षेत्र होने
- 28:29के बावजूद भी बंधन कहाँ दिखता है? तुम बात करते हो पेड़ो बंधन तो
- 28:38अभी मनुष्य को भी नहीं दिखता की मैं बंधन में हूँ।
- 28:45कुछ भी थोपे चला जाता है और ये मान्यताएँ ही तुम्हारा बंधन है और
- 28:54जब गुरु तोड़ता है मान्यताओं को वह सुनार की हथौड़ी का इस्तेमाल
- 28:59करता है। टक टक टक टक धेरा और उसी से तुम
- 29:06घबरा जाते हो। ये तुम्हारी आइडेंटिटी को तोड़ता
- 29:12है, जो तुमने नकली बना ली। असली आइडेंटिटी तो टूटती ही नहीं।
- 29:22भगवान कृष्ण ने कहा शस्त्र नहीं काटता है, आग नहीं जलाते, पानी
- 29:29नहीं गलाता हवा नहीं सुखाती, तुम्हारी जो आइडेंटिटी है, असल
- 29:34में तो तुम्हारी। सुनार की हथौड़ी क्या करेगी,
- 29:47थपेड़ों को छोड़ो, क्या तुम्हें मुक्ति की इच्छा उठे?
- 29:54वो सारा विश्व मुक्ति की इच्छा में घूम रहा है।
- 30:01इसलिए तो इतने ठग पैदा हो गए। क्षमा करना, इन ठगों को पैदा करने
- 30:15वाली। तुम हो कल।
- 30:21ही मुझे एक कमेंट आया बाबा तुम मुझे दाढ़ी सब कटा लिया करो।
- 30:30ये भारत तुमसे झेला नहीं जाता, मैं समझता हूँ ये कहाँ से बोलते
- 30:35हैं। इस मूर्ख को ये नहीं पता कि मैं
- 30:42उस स्तर पर हूँ अंतर के घट घट की जान।
- 30:48भले ही बुरे कि फिर पहचानें, तुम बोलते कहाँ से हो, मुझे समझाता है
- 30:54ये तुम्हारी मान्यता है और फिर परमात्मा स्त्री को तुम मुझे।
- 31:01देता ही नहीं शायद। इसीलिए तो कहीं जैन धर्म ने नहीं
- 31:08कह दिया कि स्त्री मुक्त नहीं हो सकती क्योंकि उसके मुछे नहीं होते
- 31:14हैं। इन मुड़ताओ में तमूल जे हो, मुझे
- 31:22भी जाना चाहते हो। मैं समझता हूँ तुम कहाँ से बोलते
- 31:29हो। एक व्यक्ति के बड़े बाल लम्बे थे
- 31:47बेक पढ़ जीके पास चला गया रोड मोड।
- 31:51बस एक चुटिया रखी हुई है। छोटी सी बहुत लंबी सी तो पंडित जी
- 32:01मुझे समझ नहीं आया कि तुम में इतना ज्ञान कहाँ से आ जाता है?
- 32:09बातें बड़ी शानदार करते हो, खोजियों वाली बड़े हंसाते हो,
- 32:19बड़ी गहरी गहरी बातें करते हो, बड़े ही शास्त्र कंठस्थ हैं।
- 32:23तुम्हारे तुम्हारे पास इतनी प्रत्यविज्ञा कहा से आती है।
- 32:33तो ब्राह्मण ने कहा फंस गई उम्र की तो ब्राह्मण ने अपनी चुटिया
- 32:42ऊपर कर दी। ये एरियल है ये परमात्मा से।
- 32:50खींचता है सारा ज्ञान ये एरियल है जैसे पुराने जमाने में टेलीविज़न
- 33:03के एरियल नहीं होते थे, हम ऊपर टांग देते थे।
- 33:07आ गया नहीं आया थोड़ा सा और घुमाओ।
- 33:13आज वो जवानी नहीं है तो उसके तो केस बड़े लंबे थे।
- 33:29कहते तुम ये छोटी सी चुटिया रख के ये एरियर है?
- 33:35उसने अपने बाल खोल लिए हैं और ऊपर तक ये देखा एरियर तो ये है।
- 33:44पंडित भी गबरा है, लेकिन पंडित होशियारनी बेईमान जरूर होते हैं।
- 33:56पंडित ने कहा अब क्या करे इसकी बात का तर्क अब कैसे काटू और जब
- 34:03तक काटोगे नहीं, तुम शास्त्रार्थी जीतोगे नहीं।
- 34:08शंकर तब तक नहीं जीते जब तक नहीं काटते।
- 34:14भला की अपनी कला और सिद्धि का इस्तेमाल क्यों नहीं करना पड़े?
- 34:17किसी राजा के शरीर में प्रवेश करता है, मैं कल कभी सोचता हूँ।
- 34:29कि शंकर को आवश्यकता नहीं थी किसी राजा के शरीर में प्रवेश करने की।
- 34:37शंकर अगर वो कला जानते होते, उस जंक्चर पॉइंट पे पहुँच के बड़े
- 34:44रास्ते जाते हैं, पिछले जन्म में उतर जाते हैं।
- 34:48कभी तो राजा भी रहे होंगे, राजा न रहे हों तो अंतरंग क्षणों का आनंद
- 34:59तो दिया होगा। इस घर में आके नहीं गए तो अंतरंग
- 35:06क्षणों में बात रखा है। लेकिन पिछले दिनों में कितनी बार
- 35:11तुम राजा हुए, कितनी बार कंगाल? हुए तो कभी कभी।
- 35:21मुझे शंकर पर शक होता। है।
- 35:26वहाँ तो बड़े रास्ते जाते हैं जो व्यक्ति अपने पिछले जन्म में जा
- 35:32नहीं सका। खैर, एनलाइटन तो हुआ जा सकता है,
- 35:40इसमें तो बेलाशक क्योंकि वहाँ रस्ते पड़े हैं।
- 35:46ये भी एक सिद्धि है। ये भी एक कला है।
- 35:49अगर इस कला में हो लेता प्रवीण तो फिर शरीर छोड़ के छः महीने इतने
- 35:55लोगों को तंग करना, सभी चक्करों को जीवंत करना, शक्ति देना ये ना
- 36:02करना पड़ता उसे। अरे नहीं भाई, मैं किसी के पीछे,
- 36:15लेकिन वह जानते नहीं थे कि पिछला जन्म भी होता है और यह पिछले जन्म
- 36:22में जा सकता है अन्यथा पिछले जन्मो का संग्रह।
- 36:31देख लेते कितनी बार राजा रहे कितनी बार स्त्री, कितनी बार
- 36:37पुरुष रहे, कितनी बार अंतरण लक्षणों का आनंद लिया, बड़े आराम
- 36:46से बता सकते थे। लेकिन ये जानते तो उस व्यक्ति ने
- 36:59तो अपने सारे केस ऊपर कर दिया। कहता देख तेरे एरियल के आगे ये
- 37:07देख एरियल, हमें तो कोई ज्ञान नहीं आता ऊपर से।
- 37:14ये पंडित तो चालाक भी होते है, बेईमान में होते है वो कहता है
- 37:20ज्ञान आता तो है, ये कैसे हो सकता है?
- 37:24मेरी चुटिया से इतना ज्ञान आ जाता है ज्ञान तो तुम्हे भी आता होगा
- 37:29होशियार बुरा होता है पंडित। अगर होशियार ना होता तो तुम्हें
- 37:35लूटता कैसे है ये शेवरों में लाखों लोग ये पंडालों में लाखों
- 37:42लोग मूर्ख बनाता कैसे है? तो पंडित जी ने कहा देखो भैया बात
- 37:56ये है तुम्हारे पास ज्ञान तो बहुत आता है क्योंकि तुम्हारा एरियल
- 38:02बहुत बड़ा है, तो फिर तुम कैसे मेरे से ज्यादा समझदार कहता भाई
- 38:10यह भी तो देखो। ये अर्थ भी तो हो जाता है अब
- 38:18स्मूख है ये नहीं देखा कि ये तो तुमने देख लिया कि मैंने ये नहीं
- 38:24देखा तुमने और थोड़ा सा पागल भी हूँ, मैं कुछ ज्यादा ही हूँ इन
- 38:31दिनों में। मुक्ति की कामना पहले उठेगी।
- 38:47जब तुम्हें बंधन दिखेंगे फिर मुक्ति का करोगे प्रयास मुमुक्षा।
- 39:01मुक्त होने की कामना जगेगी। फिर तुम प्रयास करोगे मुक्त होने
- 39:05का फिर खोजोगे तुम शास्त्रों में गुरूओं में इधर भटकोगे उधर भटकोगे
- 39:15कहीं पत्थरों में तलाश होगे। कहीं जीवंत गुरूओं में तलाश
- 39:21होंगे, कहीं मान्यताओं में तलाश होंगे।
- 39:26बस यही ये पाखंडी लोग तुम्हें उलझा लेते हैं, तुम्हें पता नहीं
- 39:37होता है। कि मुक्ति की तलाश बंधन देखने से
- 39:46होती है और मुक्ति मिलती है कैसे भागने से नहीं मिलती बुद्ध को अगर
- 39:56पता हो तो बुद्ध वापस आते हैं। बड़ा गुस्सा होती है यह सूत्र
- 40:09पिता तो बहुत खुश होता है। पिता तो कहते हो मुझे पता था
- 40:16जिसके एक इशारे से सब कुछ। हाजिर हो गया।
- 40:21वो कैसे भिक्षा मान के गुज़ारा करेगा देर अवेर तुम्हारी धारण
- 40:25ठिकाने आ ही जाएगी बेटा मैं जानता था सो दो जन बोला तो लौटेगा और
- 40:33अवश्य लौटेगा, पूछ ले इन लोगों से मैंने भविष्यवाणी कर दी थी।
- 40:43जगह है। सत्य की तलाश में बेटा मुँह की खा
- 40:48के आएगा भला जिसने राज़ किया हो वो भिक्षापत्र उठा के मांगेगा।
- 40:54कभी इसी बात से तो लोग डरते हैं। तुम कहाँ से हो, कहीं विद्यापत्र
- 41:03न उठ जाए और तुमने तो भाग के विद्यापत्र उठाया, किसी ने कहा भी
- 41:15न था कोई छीनता भी न था ये श्रोत्र के आह को ठेस लगे।
- 41:24यशोत्रा उस वक्त की सुंदरतम स्त्रियों में से एक थी।
- 41:30कित्ते राजाओं के रिश्ते उसने मुड़ हैं और तुम्हे शायद पता हो न
- 41:34हो? चचेरी बहन थी यशोत्रा।
- 41:41बुद्ध, अमिता और सुद्दोधन ये दोनों सखे भाई बहन थे।
- 41:53यशोध की माता का नाम अमित और बुद्ध के पिता का नाम सुधोधन।
- 42:01ये दोनों भाई बहन थे। एक माँ के जाया एक बाप के जाया
- 42:08लेकिन उस वक्त समाज में इतनी कुरीति नहीं थी।
- 42:12इतने बंधन नहीं थे, आज तो तुम शोर मचा देते हो।
- 42:22भाग गया रे भाग गया बज गया, ओह बज गया, कहाँ बज गया कहाँ जाएंगे
- 42:29भागकर कहीं नहीं जाएंगे तुमने मान्यताएँ गलत बना दी।
- 42:37जहाँ मन मिल जाए वहीं प्रेम। आज होता है मुसलमानों के यहाँ
- 42:46होता है और बहुत से ऐसे समाज हैं जहाँ होता है भाई बहनों के बीच
- 42:54में संबंध बनते हैं। चचेरी ममेरी यह बनते है फुफेरी तो
- 43:14छोद्र बड़ी सुन्दर तुम थी बड़े राजाओं के रिश्ते आए थे।
- 43:22जब वो द रातों रात भाग गए तो स्त्री के अहंकार को ठेस लगी।
- 43:32कमी तो न थी फिर ये क्यों भाग गया?
- 43:41मुझे तो अहंकार था कि मेरा लाभन्य मेरा रूप इसको बांध लेगा, लेकिन
- 43:48यह तो दौड़ गया बलाबुद्ध को कोई रोक पाया?
- 44:00तो असल बात ये थी बहुत उलाहने ताने दिये बड़े से कवियों ने
- 44:07यशोधरा के ऊपर कविताएं लिखी और मैंने पढ़ी।
- 44:14लेकिन ये कवि? असल बात को चूक गए क्योंकि असल
- 44:17स्थान पे पहुंचते तो असली बात का पता लगता है।
- 44:22यशोत्रा का अहंकार टूटा, जीस अहंकार को यशोत्रा पाले बैठी थी।
- 44:31क्या मैं विश्व की सुंदरतम स्त्रियों में से एक हूँ?
- 44:35अब ये बंध गया जाएगा कहाँ? लेकिन बुद्धि चला गया और कुछ नहीं
- 44:45हुआ। मातृ इसके अहंकार को ठेस लगी।
- 44:49वर्ण कमी क्या थी? राज़ सिंहासन की मालिका में थे।
- 44:57और अभी तो बारिश दे गया सबूत अभी तो ये भी मरने वाला नहीं है और
- 45:04अगर मर जाएगा तो ये संभाल लेते क्या बात थी इसमें?
- 45:11स्त्रियों ने भी तो राज़ किया है। कोई मुश्किल आज न थी कहीं भी आज
- 45:20का ज़माना था आज से 200 साल पहले का ज़माना थोड़ी है के पकड़ो इसको
- 45:28विधवा हो गई अब इसको जला दो वो ज़माना नहीं है।
- 45:33तब भी नहीं था तो कोई अड़चन नहीं थी।
- 45:39इस सूत्र को पहली बात तो सुद्दोधन ही अभी ठीक था नहीं, मरता था।
- 45:49लेकिन मर भी जाता तो ये सोत्र खुद तो बैठ जाती बच्चा तो चलो छोटा
- 45:54था, क्या आपत्ति थी? दास, दासियां, नौकर, चाकर सब था,
- 46:00जनता थी। जहाँ अगर गुरु मर जाता है तो गुरु
- 46:11माता को गधे नहीं दे देते हैं तो फिर यहाँ क्या हुआ था?
- 46:17गुरु माता चाहे पहुंची हो, चाहे नहीं पहुंची हो, इससे क्या फर्क
- 46:21पड़ता है? तुम कहीं बात को और मत लेके जाया
- 46:28करो। कृपा कर के
- 46:39वो कहता देखो मेरे पास कितने फरमान आते तो पंडित कहता ये जो
- 46:45अर्थ होता है ये भी तो देख लो, ऊपर से आता तो देख।
- 46:52नीचे से खिसकता नहीं देखा। तुमने ये सोत्रा का हंका।
- 47:02टूटा सुंदरतम स्त्री की जो छवि बनाई, उसने आइडेंटिफिकेशन टूट गई।
- 47:11धड़म से टूट गई और ज़रा बताया भी नहीं उसने।
- 47:14और उस वक्त छोड़ा जब न तो उसके पीछे भाग सकती थी, न उसका पीछा कर
- 47:24सकती थी, प्रसूति में पड़ी थी, दर्द से कड़ाह रही थी।
- 47:31अभी घाव न बरत। तो सही तो पता भी न लगा यशोदरा को
- 47:39के बुद्ध ने घर। छोड़ दिया बड़े से कवियों।
- 47:46की कविताओं को मैंने पढ़ा, लेकिन किसी ने नहीं लिखा कि शोदरा के
- 47:51अहंकार कोटे। बड़े प्यारे प्यारे सती लगती है
- 47:59तुम्हें पता नहीं चलता कि कहाँ लगी है चोट दुखती रंग पे चोट लगा।
- 48:05करती है वो मुक्षा जगेगी। पहले बंधन देखने चला अभी तो
- 48:19तुम्हें बंधन नहीं अभी तो तुम्हें खाने में बड़ा स्वाद आता है, पीने
- 48:27में बड़ा स्वाद आता है। जब इस खाने का रस गया जब इस ठेके
- 48:38की शराब का रस गया पीने का तो फिर दूसरी शराब की मुँह मुक्षा जकेगी
- 48:47मैं इसको अपना लूँ कैसे मिलेंगे ये फिर वो गुरु बताएगा।
- 48:58और बुद्ध को पता होता है तो बुध भाग के नहीं जाता है।
- 49:03वर्ण में ये तो पता ही भाग में लगा क्षत्रानी थी।
- 49:10यशोधरा ने कहा तुम क्यों भागे? क्या नहीं था मेरे में मुझे छोड़
- 49:20के क्यों भागें? अब तो पुत्र भी हो गया था, फिर भी
- 49:25क्यों भागें और फिर मेरी एक बात का जवाब देना।
- 49:31क्या जो तुमने वहाँ जाके पाया? कोई यहाँ नहीं मिल सकता।
- 49:39छह वर्ष में सारी कहानियों से पता चल गया जो बौद्ध वृक्ष के नीचे
- 49:44तुमने हासिल किया वो महलों की छत पर नहीं मिल सकता था।
- 49:51बुद्ध कैसे कहीं पे नहीं मिल सकता था इज़ प्रेज़ेंट एवरीवेयर पर वो
- 49:59सब जगह जब मौजूद है तो किसी भी जगह प्राप्त किया जा सकता।
- 50:04है। सिर्फ मंदिर में ही नहीं, मैं
- 50:11खाने में ही मिल जाता है और सच पूछो, मेरी बात को मानो तो मैं
- 50:17खाने में जल्दी मिल जाता है बस तुम्हें पता नहीं है इस बात का।
- 50:28बुध कहते हैं शोधरा गलती? हो गया मैंने जानबूझ।
- 50:37करने की हाँ, मैं क्या करूँ मुझे पता नहीं था यहाँ मिल जाता है।
- 50:43ऐसे संस्कार थे हवाएं नशेली थीं, हवाओं में कुछ जहर घुला हुआ था।
- 50:50हवाएं ऐसी थीं कि घर छोड़ के भागना पड़ेगा।
- 50:53तुम चाहे राजा हो, मैं भाग गया। इन मान्यताओं का असर हवाओं में हो
- 50:59जाता है। हवाएं पी जाती हैं तो हमारी
- 51:02मान्यताओं को इसलिए जैसी ही मान्यता होती हैं।
- 51:05व्यक्ति की वैसी ही हवाएं में हवाएं भी हो जाती हैं।
- 51:10हवाओं में घुल मिल जाता है सारा। स्ट्रक्चर मिल तो सकता था।
- 51:19ये जान कर पाया। यहाँ भी मिल सकता था वह भी मिला,
- 51:29लेकिन मुझे पता नहीं था। बहुत बड़े ईमानदार हैं और बुद्धि
- 51:39झूठ नहीं बोलते। बिलकुल महलों में मिल जाता और
- 51:48ज्यादा अच्छी तरह बैठ जाता। यहाँ तो भिक्षा के लिए भी ना जाना
- 51:54पड़ता है। जो वक्त भिक्षा में खराब किया वह
- 51:58आराम से यहाँ मिल जाता बैठे बैठे। का हे रे बनखो जनजा?
- 52:26काहे रे? सर्ब व्यापी सदा अलेपा आ सर्ब
- 52:51व्यापी सदा अलेपा तोहे। संग समां तो है संग समां गाय र मन
- 53:17खोजन। जा।
- 53:22मुझे पता न था इस सूत्र हर जगह है।
- 53:28वो हवाएं नशीली थीं। हवाएं बहकी बहकी थीं, मैं भी बहक
- 53:43गया, लेकिन तुम्हारा प्रश्न बिल्कुल ठीक है यहाँ मिल जाता
- 53:56ज्यादा आसानी से मिल जाता। वहाँ मशक्कत तो बहुत करनी पड़ी,
- 54:04मैं शर्म सार हूँ मेरी गलती के लिए क्षमा प्रार्थना करता हूँ।
- 54:16बुद्ध निसंकोच कह देते हैं बुद्ध का अहम बचा बुद्ध ने मैं का नकली
- 54:27जंजाल तोड़ दिया। सबसे पहले तुम्हें बंधन प्रतीत
- 54:36होना चाहिए। मत चलना अगर तुम्हें बंधन नहीं
- 54:42दिखा अगर ज़िन्दगी में तुम्हें ऐशो आराम दिखता है भोगों और
- 54:50पदार्थों में तुम्हें सुख लगता है।
- 54:52दिखता है तो परमात्मा की फिक्र छोड़ देना।
- 55:02परमात्मा को मत तलाशना परमात्मा को तब तलाशना पड़ेगा तुम्हे जब
- 55:10बंधन तुम्हारे जी का जंजाल बन जाने का रोवा रोवा पुकारगा प्यास
- 55:18के कारण पानी पानी। अन्यथा ये रिया निकल जायेगा
- 55:28तड़पोगे तुम बुरी तरह तड़पोगे यह जीवन का सवाल।
- 55:34है। पानी के बिना जैसे जीवन का सवाल
- 55:39होता है, मछली के लिए तड़प तड़प के मर जाती है मछली ऐसे ही तुम भी
- 55:47तड़पने लगो फिर पानी की कदर का पता चलेगा।
- 55:57फिर ममुक्षा जगेगी लेकिन अभी तो तुम्हें भोगों में दिखता है।
- 56:06मैं तुमसे बिल्कुल स्पष्ट संकेत देता हूँ संकेत भी है संदेश भी
- 56:12है। मत छोड़ना, घर पर मत जाना किसी
- 56:18गुरु के पास अगर ज़िन्दगी बंधन नहीं दिखने लगे।
- 56:25तो ध्यान रखना। दरबयों का न होना ये अलग बात है
- 56:38ये अभाव है इसको बंधन मत समझ लेना मेरे पास लोग आ जाते हैं बाबा
- 56:43जाएंगे, तन का भाव है, गरीब है। ध्यान में कैसे बैठे कर्ज़ भारी
- 56:53है, मन भटक भटक जाता है, सुबह का वायदा है और सुबह लोग माँगने
- 57:01आएँगे। पैसा तो है नहीं लेकिन ध्यान रखना
- 57:07यह बंधन नहीं है। ये अभाव है, ये अभाव है और ये
- 57:13अभाव तुमने पैदा किया है तुमने तुम्हारी व्यवस्था में यहाँ
- 57:19मार्क्स ठीक लगते हैं। मुझे एक ढंग से मार्क्स यहाँ
- 57:28उपयोगी है। मारकस कहती हैं, 1% व्यक्ति के
- 57:34पास 1% व्यक्ति के पास हिंदुस्तान की 40% पूंजी आ जाए।
- 57:43यह कौन से न्याय है? सोना तो नहीं खाएंगे वो?
- 57:50हीरे जौहरत तो नहीं खाएंगे, सिर्फ आपकी जेब को काटेंगे और सोने के
- 57:56पुशाके पहन के आपको दिखाएंगे और आपको दिखाएंगे क्या आपको जलाएंगे,
- 58:04तुम्हारे अस्तित्व पर प्रहार करेंगे।
- 58:07ये देखो हमने तुम्हें लूट लिया तो मुझे लोग कह देते हैं कि हम क्या
- 58:17करें बाबा हमारा उपाय करो, मैंने कहा न तुम आना ही हो मत मेरे पास
- 58:25ये बंधन नहीं है, कर्ज बंधन नहीं होता।
- 58:30कर्ज अभाव होता है और कर्ज का समाधान तुम खुद करोगे क्योंकि ये
- 58:38कर्ज तुमने ही छुड़ाया है। ये कोई व्यवस्था है के कुछ
- 58:46पूँजीपतियों का लाखों करोड़ रूपया माफ़ हो जाए।
- 58:50और कुछ लोग बेचारे गरीब मशक्कत करते हुए हल जोते हुए अपने शरीर
- 58:57को डिहाइड्रेट कर लें और वृक्ष से लिपट जाएं।
- 59:09वृक्ष से लटक जाएं। ये पुत्र तुम्हारी गलत जी का
- 59:19प्रमाण नहीं है। यह संपत्ति वान सेठों की दुष्टता
- 59:29का प्रमाण है। मैंने बहुत बार बोला।
- 59:39तुम कहते हो हम तंग हैं, फिर ऐसे व्यक्ति को क्यों नहीं चुनते जो
- 59:46तुम्हारी तंगी को खत्म कर दे? कर्ज माफ़ हो सकता है।
- 59:56जब अमीरों का हो सकता है तो तुम गरीबों का नहीं हो सकता।
- 1:00:00अमीर कभी कोई लटकते देखा अभाव के कारण तुम ही लटकते हो जब लटकते हो
- 1:00:11कहाँ गलती है तुम्हारी सोचने में गलती है?
- 1:00:17तुम फिर फिर अपने हाथ कटवा लेते हो, कोई करे भी तो क्या करे?
- 1:00:26कोई कहे भी तो क्या कहे इस बात पर मैं और कुछ नहीं कहता।
- 1:00:30बहुत बार हो चुका है। तुमसे सुना नहीं गया।
- 1:00:38यह बात अलग है कि मेरे शब्दों को ज्यादा विस्तार नहीं दिया गया।
- 1:00:44यह बात अलग है। हर गरीब के कानों में मेरी यह बात
- 1:00:49पर नहीं चाहिए। तुमने कहा अपनी जिम्मेदारी समझी?
- 1:00:55ये बात अलग है। ये इन्हीं सेठों का मीडिया है, जो
- 1:01:02तुम्हें कहता है कि पिछले जन्म में तुमने इसका छीना होगा तो आज
- 1:01:10तुम गरीब हो नहीं, ऐसा नहीं। मैं तुम्हें समझा दूँ, तुमने कुछ
- 1:01:19ऐसा नहीं किया। वह मालिक की सम्पदा सबकी बराबर
- 1:01:25बपौती है। ये है सिर्फ मीडिया का काम।
- 1:01:34मीडिया का प्रचार प्रसार है। जीस दिन ये अपने भीतर झांकेंगे उस
- 1:01:40दिन उन्हें समझाएगा हमने कितना पास किया तुम्हारी नेट वर्थ?
- 1:01:49दो से पांच हो जाए, 10 हो जाए कोई बात नहीं, लेकिन कोई गरीब वृक्ष
- 1:01:55के ऊपर भूखे लटकना नहीं चाहिए, कर्ज के कारण लटकना नहीं चाहिए।
- 1:02:03तुमने इतनो का माफ़ किया, तुम इन गरीबों का भी कर दो क्या बिगड़ता?
- 1:02:08है। और अगर नहीं कर सकते तो गद्दियों
- 1:02:17का वारिस बदल दो जो ईमानदार हो, जो साहसी हो।
- 1:02:27मैं राजनीति में ज्यादा इंटरेस्ट रखता।
- 1:02:31हूँ। मेरा ये विषय भी नहीं।
- 1:02:37मेरा चैनल इसलिए है अभी नहीं, लेकिन सत्य तो कभी कभी बोल देता
- 1:02:44हूँ संसार का सत्य यद्यपि मुझे पता है।
- 1:02:54और तुम्हारी बात भी ठीक है ये कर्ज तो मैं भीतर नहीं जाने देता
- 1:03:01कि अभी मैं जानता हूँ भूखे वजन न होए कोई पाला ये ले अपनी कंठ।
- 1:03:10ये कर्ज उतारे का कौन पत्रो तुम्हारे व्यवस्थापक तुम्हारे
- 1:03:18मैनेजर, जिनके हाथों में तुमने मैनेजमेंट सौंपे?
- 1:03:29मुझे लोग कह देते हैं बाबा ऐसा मत बोलो करो, हमें आपकी बड़ी
- 1:03:35आवश्यकता है, ये लोग तुम्हें मार देंगे।
- 1:03:41मैंने कहा किस को छोड़ा इन्होंने? ईसा को लटका दिया।
- 1:03:50क्या कसूर था मैसूर के हाथ पांव काट दिया, सोक्रेटिस को जहर फैला
- 1:03:57दिया, किस को दंडित नहीं किया बुद्ध जैसे अहिंसक महावीर जैसे
- 1:04:04अहिंसक लोगों के? कानों में केला ठोंक देंगे।
- 1:04:10किसको बख्शा और फिर मृत होने के बाद तो श्राद्ध का कोई औरत नहीं।
- 1:04:18मरने के बाद आज ईसाईयत सबसे बड़ी कौन है?
- 1:04:24लेकिन उसका ईसा को क्या फर्क पड़ता है ईसा को तो ज़रा भी फर्क
- 1:04:30है उसको तो तड़पा के मार दिया तुमने क्या फर्क पड़ता है मंसूर
- 1:04:37को जिसने कहा अनलहक मैं ही खुद को दूँ और यह शब्द?
- 1:04:45हजारों हजारों वर्षों से हमारी फिजाओं में गूंज रहा है अहम
- 1:04:50ब्रह्मस्वा खुद खुदा हूँ, लेकिन वहाँ मान्यताएँ घर थी।
- 1:05:01राजा ने कहा, इस्लाम इसकी आज्ञा नहीं देता।
- 1:05:05अनल हक कहने की अरे जुनैद इसको हटा ले, अपनी बिगड़ी खोपड़ी इस
- 1:05:12शिष्य को समझा ले मुझे तुमसे प्रेम है।
- 1:05:20अन्यथा मैं इसे मार दूंगा और समझाया जनेत ने मान जा मंसूर मैं
- 1:05:34जानता हूँ तो मेरा ही तो शिष्य है।
- 1:05:41क्या मैं नहीं जानता अनल हक तुम ही जानते हो और मनसूर ने फ़ोन
- 1:05:52पकड़ लिया मनसूर कहता गुरुदेव मुझे क्षमण करो।
- 1:06:00पता तो आपको पहले है मुझसे मुझे बाद में लगा लेकिन मैं क्या करूँ?
- 1:06:07मैं मजबूर हूँ मैं खुद नहीं बोलता वह बोल जाता है वह तूफानों की तरह
- 1:06:17आता है। और मेरे अस्तित्व को घेर लेता है।
- 1:06:20चारों तरफ से मुझे घेर लेता है जैसे मैं जकड़ लिया गया हूँ और
- 1:06:26फिर वो ही बोलता है जो बोलता है मैं कहाँ बोलता हूँ, जो है वो ही
- 1:06:32कहता है अनलहक मैं खुद खोदा हूँ और वो है भी जो बोलता है।
- 1:06:42मैं तो कुछ गलत भी नहीं कहता और समझ गए जो नैद जो नैद कहते हैं,
- 1:06:50बस ठीक मैंने तुम्हें समझा लिया है और मैं खुद भी समझ।
- 1:06:55गया। तुम जो चाहे बोलो अब मैं तुम्हें
- 1:07:00कभी नहीं रोकूंगा। तुमने उस तल को छू लिया जहाँ जाकर
- 1:07:08यह वाक्य प्रकट होता है जहाँ जाकर यह वाक्य उदगम होता है।
- 1:07:18मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। अब तुम जाओ, अभाव और बंधन में
- 1:07:29बड़ा फर्क होता है। आप इसको अब तक क्लैरिफाई नहीं कर
- 1:07:39पाए? आप अभाव को ही बंधन समझ लेते हो
- 1:07:42ना? जिनके पास हैं वो कौन सा पहुँच
- 1:07:45गया है वो तो मस्ती मना मैं खा। लिया वो तो पीते।
- 1:07:56हैं। तुम्हारे पास आ जाएगी तो कौन
- 1:08:01जाना? तुम भी ऐसा न कहोगे मस्ती मना मैं
- 1:08:06खाने आया हूँ नहीं ये बंधन बंधन है जब तुम्हारे पास सब हो, इसलिए
- 1:08:17मैंने कितनी बार कहा? के भोग के साधन उपार्जन करो, भोगो
- 1:08:24भोग के देखो अगर संसार बंधन लगता हो, थोपी हुई मान्यताएँ व्यर्थ
- 1:08:35लगती हों। तो व्यर्थ लगते ही गिर जाएँगी तो
- 1:08:40हमें गिरना ही। नहीं पड़ेगा ये।
- 1:08:47मार्कस भी हमें हमारे मार्ग के लिए बड़ी सहायता करते हैं।
- 1:08:54ये हमारे प्रतिद्वंद्वी रहे हमारे राह का रोड़ा नहीं बनते थे बल्कि।
- 1:09:02हमारे काम में सहायक होते हैं। क्योंकि।
- 1:09:07तुम भोगोगे तो हम जानते हैं कि तुम क्या पाओगे और अगर हम नहीं
- 1:09:14जानते तो फिर हम सबको चाहेंगे। हम इतनी प्रबलता से नहीं बोलेंगे
- 1:09:20के भोग में दुख है, बड़ी प्रबलता से बोलते हैं, राजा के आगे बोलते
- 1:09:27हैं हष्टा वकर के भोग भोग से दुख मिलेगा, दुख से वैरग्य होगा
- 1:09:35वैरग्य से मुँह मूक्षा जन्मयेंगी। जैसे मैं करता हूँ, लेकिन महमूषा
- 1:09:42जनमेगी जब तुम्हे भोग जंजीरों की तरह लगने लगेंगे, अभी तो चिंजीर
- 1:09:49ही नजर नहीं है। अभी महमूषा का सवाल भी मत खड़े
- 1:09:53करना, अभी तो भोग का सवाल करना। अभी तो उपभोग के लिए उपार्जन करना
- 1:10:00मैंने बहुत बार बोला है, लेकिन मेरे प्रवचनों में कटाक्ष बहुत
- 1:10:07होते हैं। तुम समझने में असमर्थ हो।
- 1:10:16इसलिए तुम कटक से कर देते हो पर या तो तुम्हारे पास भोगने में
- 1:10:23प्रसुरता होगी या फिर तुम पागल हो गए दो में से एक बात है, अन्यथा
- 1:10:33ये बिल्कुल सही है। के अभाव बंधन नहीं होता ये बात को
- 1:10:43समझ लेना अच्छी तरह से अभाव को तुम दूर करो अभाव तुम्हारा पैदा
- 1:10:48पिया हुआ है। यही मार्ग से निकाल यही मैं कहता।
- 1:11:00हूँ। भोग के साधनों उपलब्ध करो और
- 1:11:06भोगों में देखो आखिर में तुम पाओगे।
- 1:11:09जंजीरों के सिवा कुछ नहीं मिला। सूरज को छूने निकला था।
- 1:11:32आया हाथ अंधेरा कोई नहीं है मेरा। सबके रहते लगता है ऐसे कोई नहीं
- 1:12:04है। मेरा कोई नहीं है सूरज को।
- 1:12:27आया हाथ अंधेरा कोई नहीं। है मेरा कोई नहीं है मेरा कोई
- 1:12:58नहीं है मेरा। रास्ता ही रास्ता है आगे नामंजिल
- 1:13:18न किनारा। जाने कहाँ पर ले चली।
- 1:13:33है। मुझको समय की धारा।
- 1:13:45टूटी नैया बिछरे खिवैया टूटी नैया।
- 1:13:57बिछड़े कि बइया तो हनों ने गहरा कोई नहीं।
- 1:14:17है मेरा सबके रहते। लगता है ऐसी।
- 1:14:33कोई नहीं है मेरा। कोई नहीं है है मेरा सब।
- 1:14:49कुछ है? रस्ता ही रस्ता है।
- 1:14:56अगर इन चाल बाजों की गिरफ्त में आ जाओगे तो रास्ता ही रास्ता
- 1:15:00मिलेगा। मंजिल नहीं आएगा मंजिल तो तुम हो
- 1:15:04खुद मंजिल को पाने के लिए कोई रास्ता तय नहीं करना पड़ता रास्ता
- 1:15:17विहीन मंजिल। वहाँ जाना है।
- 1:15:21इस मंजिल पे कोई रास्ता नहीं जाता क्योंकि जहाँ तुमने जाना और तुम
- 1:15:30को तो अहम ब्रह्मास्म का यही मतलब था अन्ना हक का भी यही मतलब था।
- 1:15:37ए आत्मा ब्रह्म का विजय मतलब दूसरा कोई नहीं है।
- 1:15:42शब्दों से अर्थ बदल दिए जाएं तो सत्य नहीं बदला करता अर्थों के
- 1:15:53बदलने से सत्य कहाँ बदलता है? तुम्हारा कोई भी नहीं है यहाँ
- 1:16:08चारों ओर गणगौर अँधेरा है भी और होगा फिर रौशनाइ तो तुम हो।
- 1:16:22ठीक कहते हैं अचार्य एनलाइटनमेंट नहीं होता क्योंकि तुम ही
- 1:16:25एनलाइटनमेंट हो वह चमकते हुए सितारे, वह प्रकाश तुम स्वयं हो।
- 1:16:38कहाँ जाओगे? आगे तो रास्ता है रास्ता है, ये
- 1:16:45मूरख तुम्हें उलझा लेंगे नामंजिल। हाँ किनारा कोई किनारा नहीं, कोई
- 1:17:02मंजिल नहीं रस्ता ही रस्ता है चले जाओ कहीं नहीं पहुंचोगे टूटी।
- 1:17:11नैया? बिछड़े खिवैया, टूटी नैया बिछड़े।
- 1:17:21खिवैया नैया को तोड़ दो, खिवैया को प्रणाम कर लो।
- 1:17:32यह तुम्हें कहीं नहीं ले जाएंगे। मात्र भटकाएंगे तूफ़ानों।
- 1:17:41ने गहरा। तूफ़ान ही तूफ़ान है अगर तुम
- 1:17:48रास्ता भी। कोई।
- 1:17:53नहीं है में तुम्हारा कोई नहीं है क्योंकि तुम सब कुछ हो।
- 1:18:03यू आर होम नी प्रेज़ेंट यू आर होम इम्पोर्टेंट यू आर।
- 1:18:10हमने असिस्टेंट तुमने कहीं नहीं जाना है, छोड़ दो कोई रास्ता
- 1:18:16नहीं, कोई किनारा नहीं, कोई मंजल नहीं कोई नैया नहीं कोई खबिया
- 1:18:21नहीं सब तोड़ दो तुम पहुँच आओगे, ये तुम्हारे भ्रम कहीं जाना।
- 1:18:31कोई मंजिल, कोई रास्ता सब बकवास है, श्री।
- 1:18:43कृष्ण गोविंद। हरे मुरा हे नाथु नारायण वासुदेव।
- 1:19:09श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारा यन वासुदेव।
- 1:19:32फिर तू मात स्वामी सखामर फिर तू मात स्वामी।
- 1:19:49सखा हमार है न तिनारां यन वासुदेव से कृष्ण गोविन्द।
- 1:20:06हरे हे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।
- 1:20:16से। कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ
- 1:20:23नारायण। वासुदेव हो।
- 1:20:37हे विराट तेरे वराटों को? असंख्य पण धन्यवाद।