Latest / Baba ji Vijay Vats / 9 Sep 25 - Dhyaan Secrets: क्या ध्यान मात्र से शरीर के रोग या दर्द को ठीक किया जा सकता है?
Transcript
- 0:04हरप्रीत सिंह मोहल्ले हमारे चैनल कंट्रोलर प्रश्न पूछते हैं।
- 0:20प्रणाम बाबई। बाबा जीके ध्यान से शरीर के रोग
- 0:28या दर्द को ठीक किया जा सकता है। अगर किया जा सकता है तो कैसे कृपा
- 0:38समझने के लिए कृपा आस्था करें? ध्यान का अर्थ है कॉन्शस निस
- 0:56चेतना को बढ़ाना और अच्छा भला व्यक्ति चलता फिरता
- 1:13कामगार करता। मैंने ऐसे लुक देखे हैं।
- 1:18वेइट लिफ्टर हेवी वेइट लिफ्टर जो इतना सा भजन उठा लेते हैं और उसके
- 1:27बाद जब आखिरी भजन उठाते हैं तो धड़म हो जाते हैं।
- 1:35क्या हो गया? इतना वजन उठाने वाला व्यक्ति उसको
- 1:44कोई और उठाएगा। क्या हुआ?
- 1:51चेतना का संपर्क आत्मा से टूट गया।
- 1:55शरीर से टूट गया। क्या ध्यान से ध्यान करत है
- 2:07चेतना? जब तुम ध्यान में जाते हो तो धीरे
- 2:17धीरे तुम्हारी चेतना का विकास होता है।
- 2:24ध्यान में गहरे चले जाना इसका अर्थ है चेतना का विकास हो जाना।
- 2:39अच्छा विला आदमी जो 2 मिनट पहले उसने इतना वजन उठाया, क्वांटल भर
- 2:47वजन उठाया गामा पहलवान ने 1200 किलोग्राम वजन उठा के।
- 2:591200 किलोग्राम उसको छाती तक ले आए थे और 1200 किलोग्राम भजन उठा
- 3:10के वो काफी दूर तक घूमे थे। आपको शायद नहीं बताओ जो हमारे
- 3:21ब्रुशली ब्रुशली उनको गुरु मानते थे गा मैं पहलवान को।
- 3:331200 किलोग्राम पे। और वह परमात्मा इतने वजन को समेटे
- 3:41हुए है जैसे तुम याद भी करते हो तो शब्दों के साथ।
- 3:58चेतना जब शरीर से निकल गई तो शरीर जड़के ज़रा सोचिये कि वही व्यक्ति
- 4:07के मित्र वही चैत्र में फिर आ जाए तो क्या होगा?
- 4:13वह फिर से जीवंत हो जाएगा। चेतना का निकल जाना, मृत होना और
- 4:18चेतना का फिर से आ जाना, जीवंत हो जाना, चेतना का वापस पुनः लौट आना
- 4:31अगर संभव हो जाए। तो तुम पुनः जीवध हो जाओगे, जब तक
- 4:45शरीर में चेतना रहती है तो तुम्हें दर्द होता है।
- 4:55छटपटाते हो, जख्मों के हाँ? बर्दाश्त नहीं किए जाते और ज़रा
- 5:05देखिए कि वही चेतना जब शरीर से निकल जाती है तो शरीर रोग विहीन
- 5:14हो जाता है और दर्द विहीन हो जाता है।
- 5:16कोई दर्द बाकी नहीं रहता है, मुर्द का कोई दर्द होता है।
- 5:22मुर्दा का बेहाय तोफा करता है तो मुर्दे को आग में डाल देते हो।
- 5:30सब दहा गृहि में 800 800 डिग्री सेल्सियस में डाल देते हैं।
- 5:42ज़रा भी शेख चिल्लाता नहीं बे उसको काट दो, कोई फर्क नहीं
- 5:52पड़ेगा। लेकिन जब वही व्यक्ति जीवत था
- 5:57यानी जब चेतना शरीर के भीतर थी छोटा सा काँटा भी चूब जायेगा तो
- 6:05चीख मरेगा पहले चेतना और जड़। इसका संबंध अच्छी तरह से समझ
- 6:16लीजिए। जड़ की अपनी कोई अनुभूति नहीं है।
- 6:28हालांकि जड़ में भी कुछ नेगलिजबल मात्रा में चेतना होती है।
- 6:37और वो नेगलिजबल चेतना ही विस्तार करके बढ़ जाती है और इतनी जब बढ़
- 6:44जाती है तो मानव के योग्य हो जाती है तो प्रकृति उसे मानव जमा दे
- 6:51देते हैं। जड़ में अपनी कोई स्वय अनुभूति
- 6:58नहीं होती, क्योंकि चेतना नहीं होती।
- 7:04चेतना में स्वय अनुभूति होती है और मज़े की बात है।
- 7:10न तो जड़ अकेला और न चेतन अकेला इन दोनों को दर्द नहीं होता।
- 7:18इसे फिर समझ लेना थोड़ा मुश्किल है।
- 7:23अकेले पत्थर को काटोगे, तोड़ोगे पीटोगे तुमने महल बनाना राजा का
- 7:31वो दर्द से किराहे का नहीं पत्थर? और अकेली चेतना को भी भगवान कृष्ण
- 7:38कहते हैं, नैनम दाहसी भावका नैनम क्ले धनतया को न सूक्ष कहती मारो
- 7:44ता नैनम छृधन थी शस्त्रों किसी शस्त्र से वो काटी नहीं जाती, फिर
- 7:52दर्द कब होता है? मैंने तो प्रश्न कोला जड़ दिल कर
- 8:01दिया ना तो अकेली चेतना को दर्द होता है, ना अकेले जड़ को दर्द
- 8:10होता है, पत्थर को कांट पिट लो ज़रा भी चेक से लाटनी।
- 8:16और चेतना को भी कोई ठीक से लौट नहीं आती, तो फिर ये दर्द होता
- 8:24कैसे है? पहले हम ये देखे दर्द होता है
- 8:29चेतना और जड़ के संयोग से। जब चेतना और जड़ वियोग हो जाता है
- 8:40और दर्द भी नहीं होता, रोग भी नहीं रहता, रोग भी तभी होता है जब
- 8:48जड़ और चेतन इकट्ठे होते है। रोगी व्यक्ति के से चेतना निकल
- 8:57जाए तो रोग भी खत्म होगा। दर्द होता है जड़ और चेतना के
- 9:10सैनू से ठीक है आप समझ गए इस बात। अब आगे चल क्या?
- 9:25ध्यान से रोग और दर्द को ठीक किया जा सकता है।
- 9:36आओ इसपे विचार करें, ध्यान है अपने अंत में जानो और मैंने पहले
- 9:48भी बताया, लेकिन तुम भूल गए हो गए।
- 9:53जैसे जैसे तुम अपना अपने भीतर जाओगे, जितना गहरे में जाओगे,
- 10:00तैसे तैसे तुम्हारा संकल्प घना उतर जाएगा।
- 10:08तुम्हें सिखाया गया संकल्प करना बुद्धि से वह बेकार।
- 10:16बुद्धि से पार हो के संकल्प जगता है।
- 10:21इसको सर्किल में ले लो, बुद्धि को छोड़कर संकल्प जगता है।
- 10:31बुद्धि से नीचे आता है। व्यक्ति ह्रदय में प्रवेश करता है
- 10:34तो संकल्प और गहरा होता है। इसलिए ध्यान रखना किसी प्रेमी
- 10:42व्यक्ति के दिल को दुखा मत देना। क्यों?
- 10:50क्योंकि प्रेमी व्यक्ति की चेतना श्रद्धा के पास होता है।
- 10:56यह जड़ शरीर जब चेतन के साथ संयोग में आ जाता है तो जीवन हो जाता
- 11:02है। ठीक समझ गए चंपा इसलिए जब ये चेतन
- 11:08शरीर से निकल जाता है। तो शरीर अपनी सही अवस्था में आ
- 11:14जाता है। सही अवस्था क्या है?
- 11:16जड़ जड़ता में आ जाता है, पुर्जे सभी होते हैं।
- 11:20तुम चीर के देख लेना, हार्ट भी होगा सारी आपको जेआईटी प्रणाली भी
- 11:26मिलेंगे। लिवर भी मिलेगा, पैंक्रीआस भी
- 11:31मिलेंगे, सारे शरीर की अंग मिलेंगे, लेकिन ठहरे हुए मिलेंगे
- 11:35क्या निकल गया विद्युत निकल गई जिससे चलता था ये सारा तुम्हारा
- 11:40इन्स्ट्रुमेंटेशन पंखा भी चलता था, एसी भी चलता था, वाटर भी।
- 11:47मोटर भी खेंचती थी, ऊपर पंप भी ले जाता था, धूप भी जलती थी, सब कुछ
- 11:52होता था, वह चेतना निकल गई। उस उस चेतना के कारण ही यह शरीर
- 11:59चलता था। आइए अब हम थोड़ा सा आगे चल गए।
- 12:04अब देखिए। आपके शरीर में पीड़ा हो रही है,
- 12:10इसके दो ढंग हैं एक तो विपश्यन हो धृष्टता बन के देखो कि दर्द हो
- 12:18रहा है वो मैं नहीं पांव में दर्द हो रहा है।
- 12:24तो पांव में दर्द हो रहा, मैं देखता हूँ और देखने वाला अलग दर्द
- 12:31अलग देखने वाला अलग इसीलिए मैं शरीर में हूँ, ये छोटी छोटी बातों
- 12:38से तुम समझ पाओगे, शरीर से तुम्हारी अलगव होगी।
- 12:48नॉन क्लिंगनेस में जब तुम देखो दर्द होता है और पेट में है और
- 12:55सैर में है और पैर में है एक काँटा चुप गया, तुम्हें पता चलता।
- 13:04किसके कारण है? ये चेतना शरीर के भीतर बैठी है,
- 13:08इसलिए रात को तुम सोते हो तो रात को तुम्हारी कोई काँटा हो गई?
- 13:19तुम फ़ौरन उठोगे। क्योंकि चेतना है, मन सुख अवस्था
- 13:25में गया है, सिर्फ चेतना तो है, चेतना तो साक्षी है, चेतना
- 13:32तुम्हें गाइड करेगी के उठो खड़े हो, किसी ने काँटा चुप होती है।
- 13:39हर वक्त का रखवाला है वो 24 घंटे का तो मैंने पूछा है कि क्या
- 13:50ध्यान से जब तुम अपने बेहतर जाते हो, तुम्हारा संकल्प गहरा होता
- 13:54जाता है, गहरा, गहरा, गहरा और इतने गहरे जंग से और पॉइंट को
- 13:59क्रॉस करके भी और गहरे और गहरे अपने आप तक पहुँच जाते हो?
- 14:08अब क्या होगा जब तुम उस महासंकल्प के पास पहुँच जाते हो?
- 14:14बहुत से प्रश्नों के मेरे पास आए थे ऐसे कैसे हो सकता है आप क्यों
- 14:20नहीं कर सकते कल एक प्रश्न? औरों को तो पता था ये कब होगा?
- 14:31आपको क्यों नहीं पता चला? आपने क्यों नहीं बताया?
- 14:38ऐसा ही कुछ प्रश्न और था। मैंने कहा भाई मैं ये।
- 14:45बताने के लिए आया हूँ तुम्हें जनाने के लिए आया हूँ नौ दाई सर
- 14:51तुम जानो कि तुम कौन हो मेरा ये मतलब है सभी वीडियो पढ़ के देख लो
- 14:58सुन लो मैं तुम्हें जनाना चाहता हूँ कोई हो आर यू।
- 15:05और अगर तुम ये जानना चाहते हो कि भविष्य में क्या होगा?
- 15:12फिर उनके पास चले जाओ जिन्होंने भविष्यवाणी की थी यहाँ क्या टिंडे
- 15:17ले रहे हो? अरे भाई तुम अभी तक समझ नहीं सके?
- 15:23ढ़ाई 3000 वीडियो हो गई। लंबी लंबी वीडियो हो गई।
- 15:28मैं तुम्हें तुम्हारा आपका जनाना चाहता हूँ, बस सिर्फ क्यों
- 15:33क्योंकि मैं तुम्हें परम आनंद में रस से भीगा हुआ बनाना चाहता हूँ
- 15:41बस मेरा यही उद्देश्य है। और रस से भीगना, उससे ऊपर की कोई
- 15:45संपदा नहीं होती। आदमी के पास मैं तुम्हें चर्म
- 15:50आनंद देना चाहता हूँ मेरी ये अंक अच्छा है मैं तुम्हें भविष्य में
- 15:56क्या होगा यह तो भविष्य बता ही देगा लेकिन बात नहीं है।
- 16:03की आनंद तक तो तुम फिर भी नहीं पहुँच पाओगे।
- 16:07जिसने बताया, उसने बताया क्या तुम आनंद के पास पहुंचे?
- 16:14फिर सर, यहाँ मेरे मेरे सेना पर का ट्रैन टेलर है।
- 16:21बाघ कितनों को मैंने ब्लॉक कर दिया और फिर ये आके कॉमेंट्स में
- 16:28नीचे लिख देते हैं पर मैं वहाँ ऐड कर देता हूँ, फिर ये मैसेज करते
- 16:33हैं, टेलीग्राम में लिखते हैं, वैसे करते हैं वो मैं ब्लॉक कर
- 16:36देता हूँ अब इनके पास। मैं यह कहता हूँ तुम्हारे पास
- 16:39सुनने के सवाव कोई रास्ता नहीं क्योंकि तुम्हारे प्रश्न गलत होते
- 16:42हैं, इसलिए मैंने तुम्हें शून्य से मना नहीं किया।
- 16:48सुनने से तुम्हें किसी को भी मना नहीं कर सकता क्योंकि तुम्हारे
- 16:53रिएक्शन गलत होते हैं। तुम्हारे प्रश्न गलत होते हैं,
- 16:55इसलिए? तो मैं मैं प्रश्न करने से रोकता
- 16:58हूँ, बस यही कर सकता हूँ मैं ऐसे ऐसे प्रश्न चाहती हूँ जो गहरा
- 17:09गहरा चला गया गहरा गहरा चला गया गहरा गहरा चला गया अपने आप में
- 17:14पहुँच गया। ईश्वर महासंकल्प है, तुम वहाँ
- 17:17पहुँच गए तो फिर तुम जो सोचोगे हो जायेगा ये जो लोग कहते थे फिर
- 17:24आपने सोचा क्यों ये मत पूछो। ईश्वर ने सोचा कि वो एक से अनेक
- 17:33हो जाये। हो गया।
- 17:37ये सलाम कहता है कि ईश्वर का होजा तो पृथ्वी हो गई, प्रकृति हो गई,
- 17:44ईश्वर का संकल्प होता है, बस यही बताने के लिए ईश्वर का संकल्प
- 17:50साकार होता है। बस यही बताने के लिए ये शब्दावली
- 17:54थी। हिंदू धर्म ने कहा सनातन ने कहा
- 18:03मैं एक से अनेक हूँ तो वह एक से अनेक हूँ।
- 18:08इस्लाम ने कहा हो जा तो प्रकृति हो गई।
- 18:12इसका कोई मतलब तुम नहीं समझ पाए कि ईश्वर उस स्तर पर जो संकल्प
- 18:18करता है, वह हो जाता है। मतलब यह था इस बात का कहने का तुम
- 18:23मतलब चूक जाते हो, अर्थ चूक जाते हो और अर्थों को चूकने के बजाय
- 18:30अर्थों के अनर्थ कर देते हो। भविष्य मलका को पढ़ लो भाई भविष्य
- 18:44की बातों को जानना चाहते हो तो वो भी मुकाम है, तुम देख लो जंक्शन
- 18:50में पहुंचो। भविष्य को जानने की कवायद बड़ी
- 18:53शाखाएं निकलती हैं। बड़ी बड़ी ब्राँचें है वहाँ।
- 18:57तुम भविष्य को जानने की ब्रांच में निकल जाओ, तुम्हारी अपनी चॉइस
- 19:03है, कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई इंजीनियर, कोई थानेदार बनना
- 19:08चाहता है, कोई सभा ही बनना चाहता है, कोई पटवारी बनना चाहता है,
- 19:14कोई कान्हू बनना चाहता है, एक पटवारी कान्हू हो गया।
- 19:19तो उसकी घरवाली कैसी? तुम पहले ही हंसने लगे, ठीक ठीक
- 19:25करने लगे। हाँ उसकी घरवाली कह रही थी जी जी
- 19:30आप का पटवारी कब बनेंगे? तो कानू वो कहने लगे, अरे भले
- 19:38मानस बड़ी मुश्किल से तो प्रमोशन मिला है, हम परमोट हुए हैं डीमोट
- 19:46नहीं हुए वो कैसी आग लगे फिर प्रमोशन?
- 19:54छटियाँ आ जाती थी, घी आ जाता था, दूध आ जाता था, मेरा सारा काम ही
- 20:00खत्म कर दिया था, मूंग की तो आ जाती थी कणक तो आ जाती थी, पैसा व
- 20:06आटा तो आ जाता था, सब मसाले आ जाते थे, देसी घी बढ़िया आ जाता
- 20:12था। दूध रोज़ की रोज़ सुबह शाम आ जाता
- 20:14था। तेरे कानुगो से मैंने देणे के तो
- 20:19मैं रोज़ पूछती हूँ कि हम पटवारी कब बनेंगे और दो तरीके हैं जब
- 20:30तुम्हारे पेइन होता है, किसी जगह पे शरीर पे होता तो वो चेतना के
- 20:35कारण मुर्दे को कभी पेइन नहीं होता।
- 20:40उसे दफन कर दो, उसे जला दो, उसका आंगन काट का कोई फरक नहीं है।
- 20:48दो तरीके हैं एक तो बुद्ध की विपश्यना दूर से खड़े हो के देखो।
- 20:57कि दर्द किस को हो रहा है वो तुम हो नहीं जीसको दर्द हो रहा है ऐसे
- 21:03संस्कार से ही तुमने मैं शरीर हूँ, मैं विचार हूँ, मैं शरीर
- 21:08हूँ, मैं विचार हूँ मैं भावना हूँ ऐसे संस्कार बना दिया तुमने।
- 21:15तह पे तह जमती गई और तह आज ही हिमालय के बराबर हो गई।
- 21:20कितने जन्म में तुमने बार बार रेपेटिशन की मैं शरीर, मैं शरीर,
- 21:30मैं भावना, मैं मन वही तुम हो गए। अब ये उल्टा मैं चढ़ा दे जब तुम
- 21:38देखोगे, शरीर को दुखते हुए और अपने आपको शरीर से अलग पाओगे तो
- 21:43तुम्हारे भीतर उलट बात आएगी। मैं नहीं हूँ जिसके साथ हुआ हूँ
- 21:49मैं नहीं हूँ वो कोई अलग है मेरे से।
- 21:52मैं नहीं हूँ जिसके दर्द हो रहा उल्टी रेपेटिशन हो गई।
- 21:59इस प्रयोग से तुम्हारी संस्कार टूटेंगे, प्राणी हल्के होंगे,
- 22:06कटते जाएंगे, कटते जाएंगे, कटते जाएंगे।
- 22:09अगर तुमने ये प्रोसेसर जारी रखा, हर क्रिया में सारे दिन तुम
- 22:12क्रिया करते हो, मैं नहीं कर रहा हूँ देखो ये शरीर उठा, मैं देख
- 22:17रहा हूँ हाथ के ये मुँह बोला मैं देख रहा हूँ ऊँखों में से आवाज आ
- 22:22रही है गले में से एक तो थ्री क। ये तो है अपने आपको जानना उससे
- 22:30अलग दर्द से अलग शरीर से अलग दूसरा तरीका अगर बहुत ज्यादा दर्द
- 22:36हो रहा है इतना कि तुम उसको मिटाना चाहते हो तो दूसरा उपाय
- 22:39है, फिर तुम सारी चेतना को इकट्ठा करके फर्ज करो।
- 22:46तुम्हारे पांव के अंगूठे में दर्द हो रहा है या पेट में दर्द हो रहा
- 22:50है? तुम अपनी सारी चेतना को कन्डेन्स
- 22:54करके कछुए की तरह उस स्थान पर एकाग्र कर दो, जैसे हम कॉन्वेक्स
- 23:00लैंड के द्वारा धूप को इकट्ठा करके।
- 23:05कागज़ के ऊपर एक बिल्कुल महीने सी बिंदु की तरह बना लेते है ना और
- 23:11वो जल जाता है कागज़ ऐसा करना सारी चेतना को इकट्ठा करके उस
- 23:18स्थान पे ले आओ जीस स्थान पे। वह चेतना है, मुर्दे में जान डाल
- 23:27देती है। वह चेतना तुम्हें दर्द से मुक्त
- 23:33करवा देगी, बशर्ते के तुम्हारा ध्यान एकाग्र प्रगाढ़ होना चाहिए।
- 23:40प्रगाढ़ दर्द? तुम्हें धीरे धीरे महसूस होगा,
- 23:44जैसे हलके हलके कोई लोरी सुला रहा है, कोई मर्म लगा रहा है तुम्हारे
- 23:49जख्म के ऊपर और धीरे धीरे दर्द घटता घटता घटता तुम सो जाओगे आराम
- 23:55मिल जाएगा। यह दूसरे प्रोसेसर है यह प्रोसेसर
- 23:59है। डॉक्टरी जो डॉक्टर करते है
- 24:06इन्जेक्शन नहीं लगाया लेकिन तुमने अपनी चेतना को कन्डेन्स किया और
- 24:11चेतना जीवन है चेतना में हीलिंग पावर होती है, हीलिंग इतनी की
- 24:19मृत्यु को जीवन में करते है। कर देती है ना तो क्या वो
- 24:24तुम्हारे दर्द को ठीक नहीं करेगा? बिलकुल करती है तुम आजमा के देखो
- 24:30जब भी कहीं कहीं दर्द हो अगर तो तुमने अपने आप को अलग जानना है।
- 24:34ये दो प्रक्रिया ही है समझ लेना, गड्ड मड्ड मत कर देना।
- 24:39अगर तो अपने आपको जानना है शरीर से अलग फिर तो उस दर्द को अलग
- 24:44देखना तुम्हारा संस्कार टूटेगा कि मैं शरीर हूँ, ये तो है अपने दर्द
- 24:52को अपने से अलग देखना तुम्हारा आत्मा तो कभी दर्द होता नहीं उसको
- 24:57तो। तुम्हारी आत्मा तक तो कोई ताप,
- 25:01कोई चिंतन, कोई क्लेश, कोई कष्ट, कोई रोग पहुँच नहीं अगर तुमने
- 25:10अपने से अलग देखना है दर्द को तो वो प्रोसेसर है साक्षी।
- 25:15और अगर तुमने इस दर्द को समाप्त करने की चेष्टा करते हो, तुम और
- 25:21इतनी जल्दी नहीं है। देखिए वक्त लगेगा, इसमें यह कोई
- 25:27इन्जेक्शन नहीं है जो आप इन्जेक्शन लगवा लोगे कोई बस्को
- 25:33पैन का पेट के दर्द के लिए। या किसी प्रकार का एनम से सीख वो
- 25:46दर्द को दूर कर देगा या वो तो है ही नहीं।
- 25:48फौरन ठीक हो जाएगा। धीरे धीरे खत्म होगी।
- 25:51धीरे धीरे तुम्हें सहन सकती होनी चाहिए।
- 25:56जैसे ही तुम अपनी चेतना को कन्डेन्स करके इफेक्टेड स्थान पर
- 26:00लेके जाओगे तो चेतना में जीवन तक देने की स्मृता है।
- 26:07घाव को भरना तो बहुत कम बात है, वो छोटी बात है।
- 26:12वो तुम्हारे गाल को भर देगी, हमारे दर्द को ठीक कर देगी।
- 26:19जीवन शक्ति है चेतना यह चेतना का कन्डेन्स करना एक स्थान पर
- 26:28इफेक्टेड पोरशन पर। यह तुम्हें दर्द से राहत भी दिला
- 26:34सकती है। ये दो क्रियाएं मैं तुम्हें बता
- 26:36दूँ। अगर जरूरत पड़े तो ये क्रिया वर्त
- 26:40लेना, यह हल्का हल्का एनेस्थीसिया टाइप चीज़ देगी।
- 26:46आपको और तुम्हारा दर्द धीरे धीरे धीरे धीरे वक्त लगेगा तुम्हें।
- 26:53इंतजार करना पड़ेगा, दर्द खत्म हो जाएगा, दर्द भी दूर हो जाएगा, रोग
- 26:58भी दूर हो जाएगा। रोग तुम्हारी कोई भी है वक्त तो
- 27:05लगेगा रोग के हिसाब से। जितना गहरा रोग जितना बड़ा रोग
- 27:14उतना वक्त रखेगा उस स्थान पर जहाँ पर रोग है वहाँ पर अपनी चेतना को
- 27:20बराबर कन्डेन्स करके वहाँ पर फेंकते जाओ।
- 27:24रेंज चेतना एक रेंज होती है। फोटोन की तरह जैसे सूरत से रेंज
- 27:34फोटोन वह पार्टिकल भी है, कान भी है और वो विवेक भी है।
- 27:42बिलकुल ऐसे ही तरह की होती है चेतना।
- 27:45इसको तुमने देखा नहीं है खेप में तुमने फ़ोटान को देख लिया तुमने
- 27:52पाटेकर को देख लिया तुमने वेब्स को देख लिया, लेकिन तुमने चेतना
- 27:57को नहीं देखा, तुम कहते हो हमने सब कुछ जान लिया, तुमने चक्कर जान
- 28:02लिया। सात चक्र जान लिए तुमने 1000 जान
- 28:06लिया तुमने कुंडलनी जान ली नहीं जानी बहुत सी चीजें हैं जो डॉक्टर
- 28:14कहते हैं ठीक है, हो सकती हैं लेकिन हमने जानी नहीं।
- 28:17अब तक तुम जानते न पाओगे ये बड़ी अति सूक्ष्म।
- 28:23फिर कर को तुम कहोगे, हमने स्वरात्मा को भी सहन दिया।
- 28:26हमने तो परमात्मा को भी सहन दिया, लेकिन ये सिर्फ यूज़ इकट्ठे करने
- 28:31करने वाले लोगों के लिए तुम्हें मुल्ख बनाने के उपाय और कुछ भी
- 28:37नहीं ये पी एल आर की से। जाते हो, अपने ही अवचेतन मन में
- 28:44बात करते हो। पिछले जन्म की पिछले जन्म में
- 28:47जाने की चाबी तो तुम्हारे पास है परमात्मा ने तुम्हें यह बड़ी
- 28:52पर्सनल मामला है। तुम ये जान सकते हो ये प्रसन्नता
- 29:01है प्रीत का अगर तुमने अलग जानना है।
- 29:06तो ये प्रोसेसर को साक्षी वाली प्रोसेसर को अपनाओ तुम्हें अलग से
- 29:10दिखेगा और तुम्हारी संस्कार प्राणी टूटेंगे।
- 29:13एक वक्त आएगा ये संस्कार बड़े भारी हैं इनपे बहुत वक्त लगेगा
- 29:19बड़े जीव तुम कभी गधे भी थे तुम कभी घोड़े भी थे, कभी हाथी भी थे।
- 29:26कभी अमीबा भी थे और कभी पत्थर भी थे।
- 29:31इन सब में से चेतना गुजरती हुई गुजरती हुई लाखों बरसों में कहीं
- 29:37इस सतर्क का ही के मानव शरीर के योग्य हुए, अब इसमें तो चेतना
- 29:45बड़ी। प्रिफर होती है।
- 29:48100% चेतना हो जाती है, उसे ही परम आत्मा कहते है।
- 29:54परम जागरण कहते है। चेतना का दूसरा नाम है जागृति
- 30:01अवेयरनेस। देखो चेतना जब शरीर में प्रवेश
- 30:06करती है, तभी दर्द होती है, अभी यार तभी होते हो तभी जागते हो,
- 30:12अगर चेतना ना हो तो अंगूठे को दर्द कर तुम काटते रहो सर कोई पता
- 30:16नहीं लगेगा तो यह प्रोसेसर है। अगर तो तुम इस दर्द को खत्म करना
- 30:24चाहते हो तो ये उपाय भी मैंने तुम्हे बताती हूँ।
- 30:28सारी क्षेत्र को इकट्ठा करो, एक स्थान पे ले जाओ उस बिंदु की तरह,
- 30:31जैसे कॉन्वेक्स लेंस सारी धूप को इकट्ठा करके और कागज के ऊपर
- 30:37कन्डेन्स करके उसको जला देता है। और अगर तुमने अलग जानना हो तो
- 30:44उसको बाय सिर्फ साक्षी है। देखो दर्द मुझे नहीं हो रहा है,
- 30:49दर्द किसी और को हो रहा है और दूसरा कौन है और उसको खोजो लेकिन
- 30:59मुझे पता है। ऐसे लोग जो मैं इन्हें मूड भी
- 31:08नहीं हूँ, मूड की दायरे से भी नीचे आते हैं।
- 31:11ये लोग जो कमेंट करते हैं बिना जाने तो एक ही बात है बिना जाने
- 31:19चाहे तुम। अष्टभकर गीता की व्याख्या करो या
- 31:23बिना जाने तुम किसी संत व्यक्ति के या जाने हुए व्यक्ति के शब्दों
- 31:29पर कटाक्ष करो, कमेंट करो बात एक ही है, तुम बराबर के बुत हो।
- 31:34जैसे आचार्य बुत हैं वैसे ही तुम बुत हो, कोई फर्क नहीं है।
- 31:41आचार्य भी गलत व्याख्या करेगा। क्योंकि वो तो उसे तल पे नहीं गया
- 31:46और तुम भी गलत से कमेंट करोगे क्योंकि तुम उसे तल पे नहीं गए
- 31:49हो। अपराध है उस स्थल पर न जाओ, उस
- 31:56स्थल पर जाओ और खोजो। ये ना खोजा बिना खोजे मिलता नहीं
- 32:04फिर तो संसार के मेहमान बने रहो, देखो ना तो कोई घर में कमी है
- 32:08मेरे भब्बू सृष्टि बड़ी प्यारी है, ये भी कोई कम नहीं।
- 32:14अगर ये सृष्टि ना बनाता तो तुम मुझे भी कैसे जानते हो?
- 32:21सृष्टि इतनी सुन्दर ना होती तो मुझे जानने का तुम्हारे भीतर
- 32:25अमूते ही न उठते सृष्टि ही इतनी लाजवाब बना दी कि मुझे देखने की
- 32:33प्रपल अनकक्षा हो जाती है कि आखिर ये बनाई किस?
- 32:40जो लोग थोड़े से अयाशी में होते है वो कहते है छोड़ो किसी ने भी
- 32:44बनाई आप आनंद लें तो भाई आनंद भी ले सकते हो।
- 32:52आप कौन रोकता है? बहुत सी आए, बहुत सी चले गए, आनंद
- 32:57लेकर चले गए, लेकिन आनंद मिला नहीं, फिर फिर आना पड़ा इसको तुम
- 33:03ऐसे कहते हो न ऐसे लेती हैं तुम्हारी इन्द्रियां तुम्हें पता
- 33:06नहीं जीव स्वाद का आनंद लेती हैं। आँखें दृश्य का आनंद लेती है, कान
- 33:16हाँ, बस का आनंद लेती है और गुप्तेन्द्री है संभोग का आनंद
- 33:21लेती है और तुम्हारी त्वचा स्पर्श का आनंद लेती है।
- 33:26ये आनंद लेती है तुम्हारी इंद्रियाँ तुम नहीं आनंद लेते हो
- 33:29तुम तो आनंद लेती हुई इंद्रियों को देखते मात्रो थोड़ा गोर से
- 33:34देखना बड़ी सूक्ष्म बात है, बारीक बात है तुम थोड़ा सा गोर से देखना
- 33:43कि स्वाद लेता कौन है? जीवा रहती है भाई स्वाद तुम तो
- 33:49देखते हो ये मीठा है जीवा को पता लगा टेस्ट व्रत को पता लगा कि ये
- 33:55मीठा है, कड़वा है किसी ने छुआ तुम्हें पता लगा स्पर्श।
- 34:05स्पर्श लेती है स्किन कानों में आवाज आई, वो मधुर थी या वो कौवे
- 34:15जैसी आवाज थी? बद्दी बद्दी।
- 34:17आवाज थी तुम्हें पता चलता है कि बद्दी आवाज आई या सुंदर आवाज?
- 34:22सुंदर नजारा देखते हो तो नजारा देखती है आँखें जिसे तुम ऐश कहते
- 34:31हो न ऐश, ऐश लेती हैं तुम्हारी इंद्रियां तुम नहीं लेती हो तुम
- 34:34तो इंद्रियों को ऐश करते हुए देखते हो।
- 34:39पर तुमने कहा ऐसे ली तुम तो खुद ही आनंद के खजाने क्यों नहीं
- 34:45उसमें डुबकी मार देते क्यों नहीं उसमें चालान लगा देते, जो कि आनंद
- 34:51का सरोवर है, सरोवर नहीं, सागर है, तुम्हारे प्रश्न का जवाब है।
- 35:02कोई न चाहे कुंज कलिन मैं तुझे वे नकलियाँ सुनने को।
- 35:16तुझे बिन कलियाँ चुनने को कोई न जाए कुंज गलिन में तुझे बिन
- 35:29कलियाँ चुनने को। तुझ बिन कलियाँ चुनने को तरस रहे
- 35:42हैं तरस रहे हैं। यमुना के तट मुरली की धुन सुनने
- 35:59को मुरली की धुन सुनने को अब तो हर्स दिखा जा नटखट।
- 36:12क्यों दुविधा में डाला रे अब तो दरिश दिखा जा नटखट क्यों दुविधा
- 36:25में डाला रे बड़ी से भाई? नंदलाला तेरी राह तक के ब्रज बाला
- 36:40ग्वाल बाल इक इक से पूछे कहा है मुरली बाला रे।
- 36:50बड़ी है भाई नंजू लाला चेरी राह च के ब्रजवा धन्यवाद।