Latest / Baba ji Vijay Vats / 20 Oct 25 - ध्यान का पूरा प्रैक्टिकल! क्रिया योग और विचारों के बाहर जाने का रास्ता! Shiv Sutra! Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:02शिवतंत्र सूत्र 11/183 अंत से जैसे हो जाओ।
- 0:18अंतस जैसे हो जा आइए हम गहरे में चलते हैं।
- 0:29आइए शिव तंत्र सूत्र का यह शब्द लें।
- 0:40पतंजलि के अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
- 0:49प्रत्याहार, दार्ना ज्ञान समाप्त, ये अष्टांग आठ अंक आइए बड़ी सरलतम
- 1:01ढंग से मैं आपको समझा देता हूँ प्रथम दो यम और न्यम पहले हम
- 1:12सूत्र ले। सूत्र अंतःस जैसे हो जाओ पहली बात
- 1:27मूर्ति पूजा से बिल्कुल उलट किसी को आईकॉन मत बनो।
- 1:37किसी को आइकॉन मत बनाओ क्योंकि वो झूठा इट्स ए फॉल्स इमेजिनेशन किसी
- 1:49की भी मूर्ति बनाओगे। वह फॉल्स इमेजिनेशन है।
- 1:55क्यों नहीं है वो? तुम मेहनत करके वैसा बनोगे और
- 2:00वैसा बन नहीं पाओगे। हूबहू वैसा नहीं बन पाओगे अंतस
- 2:07जैसे हो जाओ क्रांतिकारी शब्द है। शिव तंत्र सूत्र का 11/183 अंत से
- 2:22जैसे हो जाओ अंत से कैसा है हमारा अंतर तम तल दी इन्नर मोस्ट।
- 2:32कैसा है वह? तो पतंजलि के ये दो अंग ले लें हम
- 2:39यम न्यम ध्यान से सुन लें, मेरा शॉट में सुन जाऊंगा।
- 2:45आपको और सरलता से समझाऊंगा? हृदय में उतर जाएगा।
- 2:52यम के पांच अंग हैं सत्य, अहिंसा जहाँ जाकर तुम सत्यवादी हो जाते
- 3:03हो, सत्यवादी बनने की चेष्टा न करो।
- 3:08यह फलित है यह रिज़ल्ट है, यह परिणति है यह परिणाम तुम सत्य
- 3:20बोलोगे, झूठ बोलोगे, सत्य ही निकलेगा।
- 3:24इसलिए कृष्ण कभी झूठ नहीं बोलते। तुम जानकर बड़ी हैरान हो गए।
- 3:33अहिंसा कृष्ण कभी इंसान नहीं करते, बड़े मज़े की बात है, तुम
- 3:39कहोगे अरे 40,00,000 लोगों को? मैं भीतरी तत्व की बात करता हूँ,
- 3:46उसे कृष्ण कहता हूँ, वो कृष्ण बाबा कबीर, मीरा, चैतन्य सभी एक
- 4:00समान जो हो जाए वह समुद्र है बूँधों का?
- 4:03समूह सभी को इकट्ठा कर लो, आप सभी संतों को और सभी अवतारों को
- 4:14इकट्ठा कर लो। सभी पीरों, पैगंबरों को
- 4:19तीर्थंकरों को। और जिन जिन को भी हम पूछते हैं
- 4:23सबको इकट्ठा कर तो वह बन जाएगा वह स्थान जहाँ पर तुम पहुंचोगे तो
- 4:37पतंजलि कहते हैं वहाँ जाकर। तुम झूठ बोल ही नहीं सकते, सत्य
- 4:44अहिंसा वहाँ जाकर तुम हिंसा नहीं कर सकते।
- 4:51प्रश्न पूछना हो तो बाद में पूछ लेना, उसका मैं विस्तार कर दूंगा।
- 4:55मैं जानता हूँ तुम क्या पूछना चाहते हो।
- 5:00यही पूछोगे ना कि 40,00,000 लोगों को मरवा दिए तो अहिंसा कैसे हो
- 5:04गया? हाँ जैनी ऐसे ही कहते हैं, साथ
- 5:07में नरक में डाल रखा है उसे बेहतर का वह तल।
- 5:17पहुँचकर अब ये शब्द नोट कर रहा हूँ।
- 5:21एक शब्द मत तुम नॉन रिएक्टिव हो जाओगे, पहले तुम नॉन रिएक्टिव
- 5:28होने की चेष्टा करना, यहाँ से करना शुरुआत।
- 5:32फिर तुम जैसे जैसे अपने भीतर उतरोगे तुम्हारे स्वभाव बदलते
- 5:37जाएंगे, जैसे जैसे तुम अपने अंत में उतरोगे, तुम अपने स्वभाव के
- 5:44करीब हो जाओगे और अपने स्वभाव के जीतने करीब होगे, तुम्हारा स्वभाव
- 5:50बदलता जाएगा। बुद्धि के तन पर तुम्हारा स्वभाव
- 5:54और होगा तुम कृपण हो जाओगे, तुम हिसाब भी किताबी हो जाओगे, तुम
- 6:01गणितज्ञ हो जाओगे, तुम सूचनाओं को एकत्र करोगे, तुम बांट नहीं सकोगे
- 6:09तुम इकट्ठा करोगे। तुम बुद्धि के निर्वंश में
- 6:14सूचनाओं को कर लोगे। यह बुद्धि का पैमाना है।
- 6:23बुद्धि यहाँ तक है, बुद्धि बाँट नहीं सकती, इसे गौर से समझ लेना।
- 6:31बुद्धि बाँट नहीं सकती। 100 हाथों से इकट्ठा कर 1000
- 6:37हाथों से बाँट दे बुद्धि से इकट्ठा कर हृदय से बाँट दे।
- 6:44इसका मतलब ये था। क्षत, हस्त, समाहरित सहस्त्र हस्त
- 7:03विसर्जित। सो हाथों से कम हज़ारों से बाँट
- 7:10दो। इसका अर्थ ठीक नहीं किया गया
- 7:15बुद्धि बाँट नहीं सकती, इकट्ठा कर सकती है तुम्हारे न्यूरॉन इकट्ठा
- 7:19करते हैं, लव और लव सूचनाएँ और लव।
- 7:24तुम जब बुद्धि के तल पे होती हो सर रोग बुद्धि के तल पे होते है
- 7:30बुद्धि बाँट नहीं हो सकती, सबसे पहला तल है बुद्धि को बुद्धि बाँट
- 7:38नहीं सकती, इकट्ठा कर सकती है बुद्धि के न्यूरॉन्स।
- 7:44इकट्ठा कर सकते हैं। संग्रहीत कर सकते हैं।
- 7:47क्षत हस्त संग्रहीत सहस्त्र हस्त विसर्जियत बुद्धि के तल से नीचे
- 7:57उतरो, जब तुम ह्रदय के तल पे आ जाओगे, ह्रदय।
- 8:051000 हाथों से बांट दो विशर्जित बुद्धि के तल पे जो व्यक्ति होगा
- 8:14वो हिसाब और लिख लेगा कि मैंने इतना दान किया इस वक्त किया।
- 8:31ऐसे परिवार देखे हैं जब किसी लड़के लड़की की शादी होती है तो
- 8:38बहिए लगी होती है। उसने हमारी बेटी या बेटी की शादी
- 8:44में क्या दक्षिणा दी? दान क्या किया था उतना ही हम करते
- 8:51है। ऐसे ही एक परिवार था मैं उसके पास
- 8:55से वहीं खोल ले, किसी का हिसाब करना था शगुन देने का इसने ₹101
- 9:03दिया था। तो चलो हम भी 101 भी आते हैं
- 9:11कितने साल पहले दिया था कितने 20 साल पहले?
- 9:15मैंने कहता अब सोना क्या भाव था? उसके हिसाब से ये बना लो ₹100 का
- 9:19कितना बनता है, इतना दान करोगे तो बराबर पड़ेगा।
- 9:24लेकिन तुम एक ही परंपरा पे छलने वाले लोग हो बुद्धि से जो सोचेगा
- 9:28ऐसे ही सोचेगा। उसने सोच दिया था तुम भी सोचे थे,
- 9:33लेकिन जो कालखंड बीच में बीत गया, 20 साल पहले उसमें ₹100 10 के
- 9:40बराबर हो गया। अब तो तुम्हे 1000 देना होगा।
- 9:48फिर बर्फ़ भी हो गया और बुद्धि कृपण है, बुद्धि कंजूस है चले आगे
- 9:57चले बुद्धि के दल से शुरू करना। बुद्धि का तल इकट्ठा करने का तल
- 10:02है। बुद्धि सूचनाओं को एकत्रित करती
- 10:06है, तुम्हारे न्यूरोन इकट्ठा करते हैं और वही ज्यादा प्रतिभाशाली
- 10:12कहलाता है जिसके न्यूरोन ज्यादा भरे होते हैं।
- 10:15यद्यपि से बड़ा मूर्ख कोई नहीं होता।
- 10:18क्योंकि अपने अंश के गहन तल में जाने के लिए सभी नेरोज़ का खाली
- 10:23होना आवश्यक है। नेरोज़ को खाली करो या तो एप्टी
- 10:31कर दो या इनसे नाता तोड़ दो दो ढांगे हैं तुम्हें जो अच्छा
- 10:35लगेगा। या तो इनसे नाता तोड़ दो या इनको
- 10:42खाली कर दो बुद्धि के तल पे तो मैं इकट्ठा करना चाहूंगा
- 10:51अप्रिग्रह। पतंजलि का पहला सूत्र सत्य अहिंसा
- 10:58अस्थय चोरी निकर ब्रह्मचर्य, ब्रह्मचर्य ब्रह्म जैसा आचर।
- 11:17व्यवहार जैसे ब्रह्म आचरण करता है।
- 11:23इस पूरे शब्द का यह अर्थ अगर एक शब्द में निकाल लिया जाए तो वह
- 11:27ब्रह्मचर्य अगर ब्रह्म जैसे तुम हो गए तो ब्रह्म तो बांटता ही
- 11:36बांटता है। दाता दे लंदा थकबा जोगा जगन्तर
- 11:40खाई ख ब्रह्म तो बांटता ही बांटता है, लेकिन ब्रह्मचर का अर्थ है कि
- 11:49तुम सारी शक्तियां का इकट्ठा करो, जो बिखरी पड़ी हैं, जो तुम्हारे
- 11:54किसी काम के नहीं। इधर उधर बिखरी पड़ी है।
- 11:59तुमने कुछ कहीं इन्वेस्ट कर दिया, कुछ कहीं इन्वेस्ट कर दिया, कुछ
- 12:03इन्वेस्ट कर दिया। उस सारी इन्वेस्टमेंट को इकट्ठा
- 12:07कर दिया। भीतर जाने की प्रोसेसर शुरू हो
- 12:12जाएगी। बाहर से इकट्ठा करो जो तुमने
- 12:15इन्वेस्टमेंट कर रखा है। कुछ व्यापार में, कुछ मित्रों
- 12:23में, कुछ वासनाओं में, कुछ अनकांक्षाओं में, कुछ भविष्य के
- 12:30लिए, कुछ अतीत के लिए। तुमने जो इन्वेस्ट कर रखा है वो
- 12:35सब सारी को इकट्ठा कर लो। इकट्ठा करके बेहतर उतरा।
- 12:43कौन इकट्ठा करेगा? निरंज निरंज इकट्ठा करने के मात्र
- 12:51ऑपरेटर से हैं। इनसे इकट्ठा करो आप बेतरो उतरो
- 13:00शर्त हस्त 100 हाथों से इकट्ठा करो, हृदय में उतर के बांटना हृदय
- 13:08बाँट सकता है, बुध नहीं बाँट सकते।
- 13:11बुद्धि हिसाब कर सकती है, गणित बिठा सकती है कितने बजे उठना
- 13:17कितने बजे सोना कितने बजे क्या करना टाइम टेबल के हिसाब से चलती
- 13:21है आप देखोगे सर लोग बड़े फैक्चुअल होते हैं वक्त के।
- 13:30इनका सब टाइम टेबल होता है। फुर्सत के लम्हे कहा और जिन्हें
- 13:36फुर्सत के लम्हे कभी मिले नहीं। पहले पड़े आई ए एस कॉम्पिटिशन पास
- 13:42किया फिर नौकरी लगे फिर लात लगा दी आई ए एस को तो मैं सदा ही कहता
- 13:47हूँ हे आचार्य। यह लोभ के कारण तुमने आई ए एस की
- 13:52कुर्सी छोड़ी है, क्योंकि इधर संभावनाओं ही ज्यादा है।
- 13:56पोटेंशिअलिटी ऑर मोर? यह कोई त्याग नहीं है, ज्यादा के
- 14:07लिए छोटे का त्याग कर देना कहीं त्याग होता है।
- 14:10हीरो के लिए मिट्टी को छोड़ देना क्या त्याग?
- 14:14नहीं त्याग होता है हीरो को छोड़ दिया जाये, मोती को भी छोड़ दिया
- 14:21जाये, माटी को भी छोड़ दिया जाये, हृदय के तर्क पे आकर तुम छोड़ोगे।
- 14:30सत्य अहिंसा वहाँ जाकर तुम हिंसा नहीं कर पाओगे यह सूत्र तुम्हें
- 14:38समझाता है कि वहाँ चले जाओ अपने अंत में चले जाओ, वहाँ जाकर तुम
- 14:47सत्य अहिंसा हस्ते। ना झूठ बोल पाओगे, ना हिंसा कर
- 14:53पाओगे, ना चोरी कर पाओगे, ना ही ब्रह्मचर्य का नाश कर पाओगे डॉक
- 15:02मुझे कुछ लगता है यह ब्रह्मचर्य साधना तो बड़ा मुश्किल हो गया
- 15:06बाबा। यही गलती मैं कहता हूँ तुमसे ओशो
- 15:17के मन इच्छा चाहे कुछ भी रही हो, लेकिन जो फैला के गए वो गलत फैला
- 15:22गए। भावना चाही यही रही हो मुनियों
- 15:26वाली रिशों वाली, लेकिन जो फैला के गए जो शीशों में बांट गए, जो
- 15:32आज शीश कर रहे हैं, वो मेरे पास रोज़ मैसेज आते हैं बाबा हम तो इन
- 15:38आनन्दों की झोपड़ी में बैठे हैं, मिला झुला कुछ नहीं।
- 15:44लिब्रल सेक्स की हमें सिखाते हैं। मैंने कहा बिटिया तुम कहीं नहीं
- 15:54पूछोगे, बस अब तो वक्त पास करो, सब बिगड़ चुका है।
- 16:01इनके गर्भ से तुम बाहर नहीं हो सका।
- 16:06जगह जगह बनाए बैठे हैं आपका पूरम और वहाँ चल रहा है लाइब्रेर
- 16:13सेक्स। जब ओशो ही गलती खा गए तो उसके
- 16:19शिष्य सुधार कैसे सकेंगे? खुद ओशो ही करती खबर ब्रह्मचर्य
- 16:26मैं तुम्हें ज़ोर दगे कहता हूँ। सभी ऋषियों ने ब्रह्मचर्य पर बल
- 16:31दिया। अपनी सारी शक्तियां को इकट्ठा
- 16:36रखो, बाहर मत फेंको। 50% ऊर्जा आँखों से बाहर बहती है,
- 16:42बुद्ध का अनुयायी जब जलता है, तो बुद्ध कहता है कि ऐसी अवस्था में
- 16:48तुम आ जाओ हद खुली मिछी छह फुट तक देखोगे तुम देखी दिखेगा ही छह फुट
- 16:56तक तुम चल के देख लो। जब तुम्हारी आँखें आदि बंद होंगी
- 17:02आदि खुली होंगी। जैसे उनमुनि मुद्रा में होता है
- 17:07तो तुम छः फुट ही देख पाओगे। करीब करीब जितना तुम्हारा कतल
- 17:13उससे आगे नहीं देख पाओगे। तो तुम बुद्ध जैसे हो जाओगे, अगर
- 17:19तुम सहजता से चलोगे, इससे ब्रह्मचर्य से देखा, तुम आगे
- 17:27दायें बाएं पीछे नहीं देखोगे, तुम सहजता से चलोगे, ब्रह्मचर्य नहीं
- 17:35खोओगे। आँखों से बहुत कुछ खोया जाता है।
- 17:39आंधी ऊर्जा हमारे शरीर की आँखों से जाती है।
- 17:4310% कानों से जाती है, बाकी अन्य अन्य अंगों से जाती है।
- 17:55ऊर्जा को संग्रहित रखो। वृहद ऊर्जा की जरूरत होती है अपने
- 18:00अंतर में प्रवेश करने के लिए। इसलिए अगर तुम जाप करते हो, तुम
- 18:05थक जाओगे और एनर्जी लेसनेस की व्यवस्था हो जाएगी।
- 18:10कहाँ से लाओगे जनाब? एनर्जी भीतर जाने के लिए तो बड़ी
- 18:12वृहद एनर्जी की जरूरत है। मुझे रोज़ कमेंट आती है, मैं तो
- 18:17वहगुरु वहगुरु का खूब जाप करती हूँ तो बाबा ध्यान के लिए जब बैठे
- 18:21तो नींद आ जाती है। मैंने कहा तुम बैठी थके जाते हो।
- 18:25यू गॉट टू मच टायर्ड तो दोनों में से एक चुन लो अगर जाप में रस आता
- 18:33है। तो बने रहो अगर रस नहीं आता मात्र
- 18:39नींद आती है, एनर्जी लेसनेस आती है, शक्ति खो जाती है और तुम
- 18:44निर्वीय हो जाते हो, निस्तेज हो जाते हो तो फिर तुम आनंद को नहीं
- 18:49पाया, तुमने थकावट को पाया। और जीस चीज़ से थकावट मिले उसको
- 18:56क्यों छुपोगे भाई किस चीज़ से उत्साह मिले?
- 19:02स्फूर्ति आए, एनर्जेटिक महसूस करो, उसको करो ना?
- 19:09भीतर जाने के लिए वृहद एनर्जी की आवश्यकता होती है।
- 19:14तो पौष्टिक भोजन खाओ ये चाव में, चुग्गा, चुग्गा वगैरह ये मत खाओ
- 19:20तले फूले मसालेदार भोजन जब पकौड़ा तला हुआ समोसा, कचौड़ी ये मत खाओ।
- 19:31सिंपल दाल भात या खाओ, उससे सुपच्य भोजन होगा और तुम्हें बहुत
- 19:42बढ़िया शक्ति मिलेंगे। पौष्टिक भोजन को खाकर एनर्जी को
- 19:50संग्रहित करो। और उसे वेस्ट न करो काम वासना के
- 19:58जरिए तो वेस्ट करना बहुत ज्यादा शक्ति का व्यय है।
- 20:02आँखों के जरिए भी वेस्ट न करो, कानों के जरिए भी वेस्ट न करो,
- 20:09कानों में बिरुई धैलो ताकि बाहर की आवाजें तुम्हें डिस्टर्ब ना कर
- 20:20सकें। एक बार बूंदना पड़ेगा।
- 20:25सभी इंद्रियों को आठ की आठ इंद्रियों को बूंदना पड़ेगा।
- 20:29दो पड़ी हैं। तीसरा नेत्र मुद्दा हुआ है सहसरार
- 20:34मुद्दा हुआ है तुम्हारे आठ द्वार खुले हुए हैं, इन्हें मुद्र फिर
- 20:44विचार आएँगे जब तुम भीतर जाओगे विचार आएँगे।
- 20:50अब ये प्रैक्टिकल आ गया। अब इसको ध्यान से सुन शांत होने
- 20:56की कोशिश करोगे। विचार तुम्हें घेरेंगे और ज्यादा
- 21:00घेरेंगे। उस अवस्था में तुम गहरा सांस लो,
- 21:05लम्बा सांस। सांस लंबा लो, जैसे क्रिया में
- 21:12तुमने लंबा सांस लिया और दो पल के लिए ठहर जाओ, उस श्वास को श्वास
- 21:20खींच के एक दो बस इतना रुको तुम पाओगे विचार घट गए।
- 21:31कुछ मौकों पर तीन चार सेकंड तक अगर तुम सांस को रोकते हो तो
- 21:38पाओगे विचार काफी देर के लिए बंद हो जाएंगे ये गहरा सांस एक
- 21:45चमत्कार। 2 मिनट में एक साँस नहीं लेना, ये
- 21:49तो पागलपन हैं। बस जैसे ही विचार तुम्हे तंग करे,
- 21:56एक लम्बा साँस भरो, रुक जाओ, थोड़ी देर के लिए दो चार पल के
- 22:03लिए रुक जाओ। और तुम पाओगे तुम्हारे विचार ठहर
- 22:09गए सांस का और विचार का बड़ा गहरा संबंध है, इसलिए मैंने तुम्हें ये
- 22:17भी कहा था अगर तुम ध्यान में बैठे हो, ज्यादा विचार चल रहे हैं।
- 22:24तो 1,00,000 में रुई दे, जो नाक चल रहा है उसे चलने दो, जो पहले
- 22:31से बंद है उसको बंद कर दो सांस एक नसने से आएगा और तुम पाओगे मन ठहर
- 22:41गया। तुम अभी करके देखो विचार आते हो
- 22:46इसको बंद करो थम क्या विचार इसको ऐसे करो?
- 22:54आधा स्वास्थ्य इधर से जाएगा, आधा इधर से जाएगा इसलिए स्थिरों के
- 22:59विचार ज्यादा चलते हैं। कोई मुझे नहीं होती।
- 23:03आत्मिक विचार कम चलते हैं क्योंकि मूछें श्वास को कम अंदर जाने देते
- 23:09हैं और ज्यादा मूछों वाला श्वास कम जाता है।
- 23:13बड़े गहरे विज्ञान की बातें बता रहा हूँ।
- 23:22स्वास्थ्य का विचारों से गहरा संबंध है।
- 23:28लंबा श्वास लो, थोड़ी देर के लिए रोको तुम पाओगे मन ठहर के इसको
- 23:39अंदर खाने में। जब भी मंच सताए तुम्हें गहरा सांस
- 23:46भरो। किसी बॉस ने कह दिया गुस्सा आ गया
- 23:53किसी ग्राहक ने कुछ कह दिया गुस्सा आ गया।
- 23:57विचार गहरे चलने लगे, तेजी से घूमने लगे।
- 24:01गहरा स्वांस लो रुक जाओ दो चार क्षण के लिए तुम पाओगे तदक क्षण
- 24:10बंद हो गए विचार फिर शुरू करो। बुद्धि जोड़ती है, हृदय बांटता है
- 24:25जैसे जैसे तुम बुद्धि से अंतरप्रवेश किए अपने भीतर प्रवेश
- 24:30किए तुम्हारे विचार और तुम्हारी भावनाएँ।
- 24:38बदलती जाएँगी, तुम्हारा स्वभाव बदल जाएगा जो तुम्हारा स्वभाव
- 24:45बुद्धि में है के छीन लूँ छीन लूँ, दूसरों का छीन लूँ तो समझो
- 24:54तुम बुद्धि के चलते हो। को कोई बुद्धि ही छीना सिखाती है।
- 25:01श्रद्धा बांटना सीखाता है समझेना बात को मैं धीरे धीरे बोल रहा हूँ
- 25:11बुद्धि से खिस्को जैसे जैसे अपने अंदर जाओगे।
- 25:16वैसे वैसे तुम्हारे विचार भी बदलेंगे, भावनाएँ भी बदलेंगी और
- 25:20तुम्हारा स्वभाव भी बदलेगा। भीतर चले जाओ, खिसको खिसको और
- 25:29खिसको भीतर जाओ, भीतर जाओ छोड़ दो अपने आप को।
- 25:34रिलैक्स यूरसेल्फ़ कंप्लीट्ली रिलैक्स यूरसेल्फ़ अपने आप के
- 25:41पकड़ को छोड़ दो, क्लिंगिकनेस को छोड़ दो, इस पकड़ को छोड़ दो।
- 25:50शरीर की सभी यंत्रियों के लगाव को छोड़ दो संबंध को छोड़ दो बुद्धि
- 25:56से लगाव छोड़ो, कानों से लगाव छोड़ो आँखों से लगाव छोड़ो, नाक
- 26:04से लगाव छोड़ो, मूक से लगाव छोड़ो।
- 26:07सभी लगाव छोड़ते चले जाओ तो हम अपने भीतर आते जाओगे फिर हृदय से
- 26:14लगाव छोड़ो रिलैक्स यूरसेल्फ़ यही क्रिया योग का जो मैं कहता हूँ
- 26:25योग नित्रा। यही फॉर्मूला है, छोड़ते जाओ,
- 26:28छोड़ते जाओ, छोड़ते जाओ और तुम ऑफिस में बैठे बैठे भी कर सकते हो
- 26:35अभी कोई ग्राहक नहीं है अभी फुर्सत के लम्हे हैं तुम यही काम
- 26:39करो तुम पाओगे दिन मज़े से गुजर गया।
- 26:44रात को नींद बहुत अच्छी है। ध्यान बहुत अच्छा लगा।
- 26:48तुम सांझ घर लौटोगे थके थके नहीं, लौटोगे वैसे ही जैसे सुबहे निकले
- 26:53थे सत्य अहिंसा दे ब्रह्मचर्य अप्रग्रह।
- 27:01कोई प्रग्रह नहीं करना, किसी जोड़ना नहीं।
- 27:04बुद्धि के तर से नीचे आके बुद्धि तो प्रग्रह करके बुद्धि तो
- 27:11जोड़ेगी तो तल को ही छोड़ दो तुम तुम अगर बुद्धि के तल पर खड़े हो।
- 27:19तो ये सारी चीजें आएगी तुम झूठ भी बोलोगे, तुम हिंसा भी करोगे और उस
- 27:26हिंसा के लिए तुम वाणियों के शब्द भी जुटा लोगे।
- 27:33जीतने दाने, अन्न के जीव में बाज या न कोई फिर कुछ भी खा लो, हत्या
- 27:37तो होगी। तो तुम उसकी उदाहरण को सत्य सावित
- 27:43के लिए धर्मग्रंथों का सहारा भी ले लोगे और मज़े से मांस खाओगे।
- 27:55कोई किसी के शब्द पकड़ लेगा, कोई किसी के शब्द पकड़ लेगा, लेकिन
- 27:59बात तो ये है कि तुम खाना चाहते हो।
- 28:02असल बात ये है विचार बदलेंगे, तमिलना ही बदलेंगे धीरे धीरे सब
- 28:09छोड़ते, छोड़ते, छोड़ते छोड़ते। तुम अपने भीतर उतरते जाओगे, यह
- 28:17फॉर्मूला है। मुझे पूछते हैं लोग अपने भीतर
- 28:20कैसे इन सब ओजारों को छोड़ दो क्योंकि ये तुम नहीं हो।
- 28:26तुम अभी जानते नहीं, मैंने जान लिया है इसलिए तुम्हें बता रहा
- 28:32हूँ ये तुम नहीं हो इसलिए। जो तुम नहीं हो, तुम छोड़ दो तो
- 28:39छोड़ने में कुछ मेहनत नहीं करनी होती तो क्या करना होता?
- 28:44जैसे नींद में तुम क्या करते हो, नींद में तुम छोड़ देते हो, कुछ
- 28:49करते तो नहीं ना विश्राम में आ जाते हो वजह से।
- 28:57सब छोड़ देते हो और नींद आ जाती है जो नींद में करते हो सेम चीज़
- 29:04दोहराओ तुम अपने भीतर से याद करो नींद में तुमने क्या किया था।
- 29:11याद करो तुम लेट गए थे, विश्राम में आ गए थे, याद करो तुमने हाथ
- 29:17जैसे थे वैसे कर दिया और याद करो तुमने सब छोड़ दिया, भूल गए तुम
- 29:24याद करो, तुम्हें पता नहीं कब तक विचार आए, याद करो तुम्हें पता
- 29:30नहीं तुम्हें कब नींद आवे। जब सब छोड़ दिया तब नींद आ जाएगी
- 29:35और फिर भी चेतन में कुछ चलेगा, वह भी अपने आप छोड़ते जाओगे।
- 29:42जब तुम नींद में आ गए तो न्यूरॉन्स में न्यूरॉन्स दें।
- 29:50गाड़ी को चलाना बंद कर दिया। ड्राइविंग बंद कर दी तो तुम खुद
- 29:55से भीतर उतरोगे अचेतन में भी भीतर उतरोगे अब चेतन में भी भीतर
- 30:00उतरोगे लेकिन तुम्हें पता नहीं चलेगा जैसे नींद में जाते हो वैसे
- 30:07जाओ। वैसे छोड़ो ये बड़ा आसान तरीका
- 30:14है, मुझसे मत पूछो अपने आप को तुम रोज़ सोते हो सोते वक्त तुम क्या
- 30:22करते हो? तुम कहोगे हम कुछ नहीं करते, सब
- 30:24करना छोड़ देते हैं, सोचना भी छोड़ देते हैं।
- 30:28अगर कल का कोई फिक्र है तो हम कहते देखेंगे सुबह उठके शायद कल
- 30:33हम जगे ही ना तो मैं जब सोया करता था तो मैं अंतिम प्रणाम करके सोया
- 30:40करता था, एला माई शाम कुंजिया तो यहाँ कर चल यहाँ सरदारी।
- 30:48हम सुबह नहीं उठेंगे ऐसा मन में धारकर मैं सोता था सुबह नहीं
- 30:54उठूंगा फिर सुबह फिर उठ जाता था, लेकिन विचार यही करता था।
- 31:02सुबह नहीं उठूंगा तो सब चिंताएं खत्म।
- 31:08जब तुम गटर से परे हट गए तो बदबू आने बंद हो जायेगा, क्योंकि बदबू
- 31:19का कारण तुम छोड़ आये, जो सोचती थी बुद्धि।
- 31:26उस सतल को तुमने छोड़ दिया, अब विचार नहीं आएँगे।
- 31:32विचारों की जनक है बुद्धि बुद्धि को छोड़ दो विचार गाय और गहरा
- 31:42श्वास लेने से। बुद्धि का साथ छूट जाता है, इसलिए
- 31:49मैं पहले के तुम क्रियाजुक कर ले, बुद्धि से निर्लिप्त हो जाओगे,
- 31:57संलिप्तता हट जाएगी। बुद्धि से दूर खड़े हो जाओगे।
- 32:07जैसे ही अपने बेहतर उतरोगे गहरे गहरे तल बदलेंगे, तुम्हारे विचार
- 32:15भी बदलेंगे। जाने कम हो गए विचारों से दूर।
- 32:21बुद्धि से दूर होकर विचारों से दूर हो जाओ और हृदय से दूर होकर
- 32:30भावनाओं से, ईर्ष्या से, द्वेष से, प्रेम से, नफरत से दूर हो
- 32:34जाओ। भीतर उतरते उतरते तुम तलब भी
- 32:40बदलोगे। और तुम्हारे विचार भी बदलेंगे और
- 32:44तुम्हारे स्वभाव पे ही बदलेगा ये बात ध्यान में रखना मैं बार बार
- 32:48स्वभाव पे लेके आता हूँ बात को स्वभाव भी बदलेगा कहीं राम
- 32:54तुम्हें क्रोध भी दिखेंगे कहीं राम तुम्हें?
- 33:00दुष्ट को मारते हुए भी नजर आएँगे। कहीं राम तुम्हें बिल्ली के पास
- 33:05झूठे पेड़ भी खाते दिखाई पड़ेगा। कहीं राम तुम्हें दुश्मन के भाई
- 33:14को शरण देती हुई मालूम पड़ेगा वे भीषण।
- 33:18और मैंने कहा, विभीषण कुछ लोग होते हैं जिनका पैडा बहुत अच्छा
- 33:21होता है। ये थोड़ी सी बात बहुत गहरी है।
- 33:26किसी वक्त मुझे याद करवा देना, मैं तुम्हें इसकी पूर्ण साइंटिफिक
- 33:31व्याख्या दे दूंगा। कैसे किसी व्यक्ति का पैडा बुरा
- 33:36होता है? वह कुल नाशिक होता है।
- 33:41एक विभीषण ही था जो बचा रहा था सारी लंका को अन्यथा सभी दुष्ट
- 33:49वृत्ति के थे पर वो ही निकल गया। विनाश उसी दिन हो गया तय जीस दिन
- 33:56विभीषण ने लंका छोड़ दिया। वह ही एक पिल्लर बनकर संभाल रहा
- 34:02था। वहीं छोड़ गया।
- 34:07जैसे आत्मा शरीर को छोड़ता है, मैंने कल के प्रवचन में कहा था,
- 34:12बिछुर्त एक प्राण भर लें, मिलत एक दुख धारण दें।
- 34:19लंका से बिछुरे विभीषण प्राण ले गए उनके।
- 34:29लेकिन वही विभीषण राम के चरण में जाते हैं तो स्वीकार कर लेते हैं।
- 34:35ये नहीं सोचते हैं कि दुश्मन कब आई है तो राम की।
- 34:42अवस्थाओं को बदलते हुए आप देखोगे, कहीं क्रोध है, कहीं परम शांति
- 34:48है, कहीं सीता को छुड़ाना है, कहीं सीता को प्रत्यक्त करना है,
- 34:58वही राम है। जो सीता को छुड़ाने के लिए कितना
- 35:02यतन करते हैं और वही राम है जो सीता को प्रत्यक्ष करते वक्त क्षण
- 35:08भी नहीं लगाते। विचार बदलेंगे, भावनाएँ बदलेंगी
- 35:17और तुम्हारी नेचर बदल जाएगा। फिर तरत बदल जाएगी।
- 35:27जैसे जैसे तुम भीतर जाओगे, क्रोध खत्म होता जाएगा और उस दल पर जाकर
- 35:37तुम शांत हो जाओगे। शायद तुम मेरी बात को समझ गए
- 35:43बुद्धि के तन पर सारा शोर है और शोर को तुम बढ़ा सकते हो नाम जैप
- 35:51करके बढ़ा, लेकिन शोर से कुछ मिलेगा।
- 35:57थकावट के अलावा अपने भीतर उतरोगे शांति मिलेंगे, थकावट भी नहीं
- 36:04मिलेंगे। अपने भीतर उतरने से फ्रेशनेस
- 36:07मिलेंगे। जैसे रात को तुम भीतर उतरे अपने
- 36:11सुबह उठकर तुम थका महसूस करते हो। फ्रेशनेस फ्रेशनेस महसूस करते हो।
- 36:18ऐसे ही ध्यान तुम्हें अपने अंतःष्प में लेके जाता है तो
- 36:23ऊर्जा प्रदान करता है तुम्हें और जाप तुम्हारी ऊर्जा को खर्च करता
- 36:32है एनर्जी लस्नेस करते हो तुम थक जाते हो सो जाते हो।
- 36:37तो प्रकृति तुम्हें कहती है कि ये तुम्हें नहीं करना चाहिए था।
- 36:41जीसको करके तुम एनर्जी लिस्ट में आ गए, यह जाप नहीं करना चाहिए था।
- 36:47प्रकृति बहुत शानदार तराचू है। तुम्हें कस के बता देती है कि यह
- 36:55नहीं करना चाहिए? इससे तो थकावट होती है।
- 36:58काम वासना में जाने से थकावट होती है, क्रोध करने से तुम्हारा ब्लड
- 37:06विक्षप्त हो जाता है। एडरनालिन जैसे तत्व है काटेश्वर
- 37:18जैसे तत्व तुम्हारे ब्लड को विषैला कर देते हैं तो परिणाम
- 37:24किसने भुगता, किसने ग्रोध किया, शक्ति किसने गंवाई, जो काम में
- 37:31गया? बस नाम क्या ऐसे ही लोगों को मोह,
- 37:39अहंकार ये तुम्हारी शक्ति को चूस लेते हैं, इसलिए ऋषियों ने जो
- 37:46तुम्हारी शक्ति को चूस ले एनर्जीलेसनेस करे मैंने उसमें एक
- 37:51शब्दों को। एक तो पहले तो भय जुड़ा था।
- 37:58वह तुम्हें एनर्जी लेस्नेस करता है।
- 38:03दूसरा मैं जोड़ता हूँ। जाप जाप तुम्हें एनर्जी लेस्नेस
- 38:08करता है। इसको मैं एक विकार कहता हूँ।
- 38:11तुम चाहे कुछ भी करते रहो, तुम चाहे इसे प्रभु तक जाने का मार्ग
- 38:17सोचते रहो मिलेगा नहीं तो इसको मैं विकार की श्रेणी में ले आया।
- 38:25जाप करना एक विकार है जैसे कॉम्बस ने में जानो एनर्जी लिस्ट में
- 38:30सोचती हूँ। क्रोध में जाते हो, एनर्जिलेसनेस
- 38:34हो जाते हो, बाद में माफी मांगनी पड़ती है, वैसे ही जाप भी एक
- 38:39विकार है ये आज से मैंने तुम्हें ये कन्या शब्द दे दिया।
- 38:49जाप एक विकार है। यह एक वासना है क्योंकि वासना में
- 38:58कुछ पाने की इच्छा होती है और जाप में भी तुम कुछ पाने की इच्छा
- 39:05करते हो, वो धन की इच्छा करो। यह परमात्मा की इच्छा पर इच्छा तो
- 39:12इच्छा परमात्मा की इच्छा भी तुम्हें निस्तेज करती है और धन की
- 39:20इच्छा भी तुम्हें निस्तेज करती है।
- 39:22तुम्हारी शक्ति को हरण करती है, चूस देखती है।
- 39:27एनर्जीलेसनेस होना ही बेकार है, इसलिए जाप भी एक बेकार है।
- 39:33किसी का जाप करो, किसी देवी देवता का जाप करो, भगवान का जाप करो।
- 39:38लेकिन यह तुम्हें एनर्जी लेसनेस करेगा, नींद तुम्हें एनर्जी
- 39:43लेसनेस नहीं करेगी। लेकिन यह संत तो तुम्हें 1:30 बजे
- 39:47आते हैं। तुम सारा कुछ छोड़ कर जागो और
- 39:52हमारे दर्शन करो। यह गलत परंपरा छेड़ ली इन्होंने
- 39:59इनके पंच भौत के शरीर में कुछ भी नहीं है ऐसा।
- 40:03जो देखने के योग्य हो, जो ग्रहण करने के योग्य हो वो ही शरीर में
- 40:09जो होता है वो ही है। गंदगी, बदबू और क्या होगा इनका
- 40:16दर्शन करके क्या करोगे? दर्शन उस एक तत्व का करना है
- 40:21जिसकी मैं बात कर रहा हूँ। उस एक तत्व के पास जाकर उसके
- 40:26दर्शन करके तुम निहाल हो जाओ। उतर गए हो मेरे मन का संसार।
- 40:44मन का संसा। हो तर गयो हो मेरे मन का संसा।
- 41:00मन का संसा। जब ते दर सन पायो ठाकुर तो सरनाई।
- 41:19हाँ, हाँ, ये ठाकुर तुम सर न आयी। किसका दर्शन कर रहा है?
- 41:32जिसके दर्शन के बाद सब संशय खत्म हो रहा?
- 41:37क्या इन संत पुरुषों के रात को 1:30 बजे दर्शन करके तुम्हारे
- 41:41क्षण से समाप्त हो जाते हैं? अगर हो जाते हैं तो करते रहो मैं
- 41:47तुम्हें रोकता हूँ मैं तुम्हें एक तथ्यात्मक बातें बता रहा हूँ ठीक
- 41:54लगे अपना लेना। न ठीक लगे छोड़ देना क्या इन संत
- 42:00पुरुषों के रात की नींद खराब करके 1:30 बजे दर्शन करना तुम्हारी
- 42:08शंशाह को नष्ट करता है? क्या इन महापुरुषों के वचनों को?
- 42:14तुम अपना कर संशय मुक्त हो जाते हो, नहीं, तुम संशय मुक्त तो नहीं
- 42:20होते? तुम ब्रह्म मुक्त हो जाते हो, यह
- 42:23तुम्हें भ्रम देते हैं। रात ही रात ही करते रहो।
- 42:27यह भ्रम कौन है राधा और तुम्हें राधा की आवश्यकता क्या है?
- 42:32तुमने राधा से करवाना क्या है? क्यों राम राम करते हो तुमने राम
- 42:38से लेना क्या राम दूसरा है पर यू अरे इन दी सर्च ऑफ़ यूरसेल्फ़ नो
- 42:51दी सर्च यूरसेल्फ़। रिमेम्बर यूरसेल्फ़, बात तो अपने
- 42:56आपको याद करनी थी, तुम याद दूसरे को कर रहे हो वो राधा हो जराम वो
- 43:03कृष्ण हो या कबीर हो, दूसरे को याद नहीं करना है सेम को याद करना
- 43:09है और सेम को याद करो के ध्यान में।
- 43:13भीतर गहरे तुम बैठे हो स्वयं कस्तूरी कुंडल से मेरे को ढूंढा
- 43:19गणमा कस्तूरी तो कुंडल में होती है ऐसे घाट में हुए हैं तुम ढूंढ
- 43:28कहा रहे हो। ढूंढ कहाँ रहे हो प्रेमान जी
- 43:34महाराज के दर्शन में मिल जाएंगे मूर्ख जाने ना मूर्ख व्यक्त ही
- 43:43ऐसे रात को 1:30 बजे उस परम निद्रा को जिसके लिए लोग तरसते
- 43:48हैं। आज सारा अमेरिका नींद के लिए तरस
- 43:50रहा। और तुम नींद को खराब करते हो,
- 43:55नींद को बलिदान करते हो, जो सबसे बड़ी हत्या है आत्महत्या है नींद
- 43:58को खराब करना रात को तुम्हें एनर्जी फुल चाहिए था थैंकफुल और
- 44:06हो रहे हो तुम दर्शन करके एनर्जी लेसन में।
- 44:15बाबा कहते हैं जब होते हैं दर्शन पायो, मैं शंशाह से विहीन हो गया
- 44:23जो कृष्ण अर्जुन से कहते हैं अर्जुन शंश से आत्मा विनिस्यति है
- 44:30जो व्यक्ति संख्या में उसका विनाश हो जाता है।
- 44:35मैं तुमसे पूछता हूँ तराजू तुम्हारे हाथों में देता हूँ, इन
- 44:41तथाकथित संत जिन्हें तुम संत कहते हो क्या इनके दर्शन करके क्या
- 44:47इनके बोल सुनकर तुम शश्यामुक्त हुए?
- 44:51तुम्हारे भ्रम टूटे या तुम्हारे भ्रम और बढ़े?
- 44:55बस इनका फैसला तुम खुद ही कर रहे हो।
- 44:57बुद्धि है तुम्हारे पास बुद्धि पैमाना है, बुद्धि सोचना समझेना
- 45:03जानती है बुद्धि गणितज्ञ है, गणित लगा लो।
- 45:17जीस बुद्धि में शंशय विचार भ्रम मान्यताएँ तुमने फीड कर रखी है उस
- 45:23बुद्धि को तुमने छोड़ देते हो रात को गटर से दूर हट जाते हो।
- 45:32तुम्हें दुर्गन्धानी बंद हो जाती है, विचार बंद हो जाते हैं, विचार
- 45:35दुर्गन्ध है, वो चाहे परमात्मा का ही क्यों न हो, दुर्गन्ध है जहाँ
- 45:46शोर वहाँ दुर्गन्ध। दिल की धड़कनों से भी इबादत में
- 46:00कदर पड़ती है। इतना भी शोर नहीं चल रहा है।
- 46:07दिल भी ना धड़के और पता ना चले यह शोर है और शोर तुम्हें।
- 46:18शमशाह में ले जाता है, शमशाह मुक्त नहीं करता, भ्रम में ले
- 46:23जाता है, भ्रम मुक्त नहीं करता, कितने भ्रम फैला रहे हैं?
- 46:29ये लोग जो जानते कुछ नहीं, जिन्होंने उस स्थल कुछ छुआ नहीं
- 46:33जिसकी मैं बात करता हूँ। अंत में चले जाओ शिव तंत्र का ये
- 46:39सूत्र और हम अंत में जाने की उस राह में सब छोड़ते जाओ, छोड़ते
- 46:50जाओ बुद्धि को छोड़ दोगे, हृदय को छोड़ दो।
- 46:56फिर तुम उस स्तर पर आ गए, जीस स्तर पर विचार नहीं बचा भावनाओं
- 47:04भी नहीं बची बस वहाँ एक शून्यता है।
- 47:11वहाँ एक शून्यता है नागार्जुन की शून्यवाद, किसी को नागार्जुन ने
- 47:19शून्यवाद कहा, इनर्शिया अन्तश जैसे हो जाओ अन्तश कैसा है?
- 47:35सत्य, अहिंसा, अस्त, ब्रह्मचर्य, अप्रिग्रह आगे शोझ शुद्ध होते हो।
- 47:44तुम शुद्ध होते हो, तुम्हारा अंत बड़ा शुद्ध है।
- 47:50शुद्ध अंतःकरण मलहीन नैरोमल निर्मल मन जन सुई मोहि पावा, मोहे
- 48:04कपट छल छिद्र न बाबा। और कबीर कहते हैं, जब मन निर्मल
- 48:09होता है तो तुम्हें भगवान को खोजने की आवश्यकता नहीं होती, फिर
- 48:14भगवान तुम्हें खोजते हैं कमर्ष की बात कबीरा मन निर्मल भयो जु गंगा
- 48:21को नीर पाक्ष पाक्ष हरिपुर। कह तो कबीर कबीर फिर भगवान
- 48:29तुम्हें तलाशेंगे अब अब तुम परमात्मा को तलाश रहे हो, तुम्हें
- 48:36चैन नहीं, सुकून नहीं, तुम दर्द के मारे बेचारे क्या कुछ नहीं
- 48:48करते। इन बाबाओं से उपदेश लेते हो जो
- 48:53तुम्हारी मान्यताओं को और दृढ़ कर देते हो, जो हीरे के ऊपर जमे हुए
- 49:00कीचड़ के ऊपर और तहे बन जाते हैं। तुम्हारी मान्यताएँ बढ़ जाती हैं,
- 49:08तुम्हारा बोझ बढ़ जाता है, तुम्हारा अंत शोर भारी हो जाता
- 49:12है। ऐसे भीतर उतरते उतरते तुम शून्य
- 49:17में पहुँच जाओगे, जहाँ न ईशा है, न प्रेम, बैलेंस है शून्य फिर
- 49:24उससे आगे। उतरते जाओगे, उतरते जाओगे, आएगा
- 49:30प्रेम प्रेम दो तरह के होते हैं संलिप्त प्रेम निरलिप्त, प्रेम,
- 49:36संलिप्त प्रेम तो तुम्हारा होता है तुम्हें किसी के नए नक्श भागे,
- 49:40किसी की चाल डल, भाग किसी का बोल चाल पाल किसी का।
- 49:45चलना फिर ना भाग गया, वो संलिप्तता हो गई।
- 49:52संलिप्तता के कारण भी प्रेम होता है।
- 49:58जैसे जगडू राम कहने लगे, जगडू राम की घरवाली कहने लगी पहले से तुम
- 50:03मुझे बहुत प्रेम करते थे। अब तुम मुझे प्रेम नहीं करते जगडू
- 50:10राम कहने लगे, कारण हो गया प्रेम का जगडू राम के घरवाले के क्या
- 50:16कारण था? मुझे प्रेम करने का कहते तुम जब
- 50:19हँसते थे, फूल झरते थे अच्छा। अब क्या हुआ?
- 50:25अब दांती कर गए, कार्य खो गया इसे संलिप्त प्रेम है तो जगडू राम तब
- 50:35तक ये प्रेम करेंगे जब तक तुम हस्ती हुई अच्छी नजर आओगे जब
- 50:42थोड़ी सी चंडी का बन गई ना। फिर जबलपुर हम भाग जाए।
- 50:51मैंने ऐसे ही घर देखे हैं लड़ाई वाले जहाँ पति पत्नी का झगड़ा
- 50:56होता है और कुदरती मैं उसके घर में जा रहा था।
- 51:01पहले तब वो भागा हुआ घर से बाहर निकला।
- 51:04पीछे पीछे बेलन आ गया। मैंने कहा ये क्या?
- 51:08यह बेलनों की बरसात फिर चिमटा आ गया फिर कड़छा आ गया, अरे ये
- 51:13क्या? तो फिर व्यक्ति बोला मेरा झगड़ा
- 51:20हो गया घर वाले। तुम दूर रहो, ओवर मारी न लग जाए,
- 51:28तुम शांति ढोंढ़ते आओ जहाँ नारी की पूजा होती है यत्र नारीयस्त
- 51:37पूज्यंत नेवर संति तत्र देवता। जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ
- 51:46सभी देवता निवास करते हैं। देवता शांति आनंद का सम्मुख देवता
- 51:55कहलाता है। शुद्ध विचार आहार।
- 52:00शुध वार्तालाप जैसा शुद्ध निर्मल मन जन सोई मोही बाबा मोहे कपट चल
- 52:09छिद्रण बाबा तुम गहरे गहरे उतरोगे शून्य बाद में उतरोगे हम आगे चलें
- 52:17फिर आएगा प्रेम। निर्लिप्त प्रेम होता है।
- 52:20यह संलिप्त प्रेम तो बाहर छूट गया।
- 52:23बुद्धि के पास बुद्धि और हृदय तक सीमित रहता है।
- 52:27संलिप्त प्रेम जब कारण खत्म हो गया किसी की हँसी पड़ी है किसी का
- 52:35चाल ढाल बड़ी है चुकना टूट गया अब चाल ढाल कहाँ से आएगा?
- 52:42हस्ते क्या कहूँ और चूकना ही टूट गया वो मस्तानी चाल कहाँ।
- 52:52तो वो ये मस्तानी चाल। जग जाए फूलों की ढाल।
- 52:59चाँद और सूरज आकर मांग। तुझसे हँसी जवानी हँसी न।
- 53:07कहाँ से न रह गई? तब दांत बढ़िया थे जब तुम हंसते
- 53:17थे, फूल झड़ते थे, कैसे फूल झड़ते थे?
- 53:19फूल तो तब भी नहीं झड़ते होंगे, कभी फूल झरे हँसते थे, लेकिन
- 53:25तुम्हारे भीतर फूल झड़ते थे, वो कारण खत्म हो गया, दांत झर गए।
- 53:41एक होता है अकारण निर्लिप्त। प्रेम संलिप्त प्रेम तो बुद्धि और
- 53:49हृदय तक ही सीमित रहता है। उससे आगे नहीं जाता, जिसने उसे
- 53:56शाश्वत के पास जाना। जिसमें उस निराधार के पास जाना है
- 54:03तो निराधार होकर जाना पड़ेगा। सब आधार खत्म करके जाओ।
- 54:09त्रौपदी की तरह द्रोपदी को आधार था अपने पतियों का भीष्म का।
- 54:17द्रोण का, तात्याश्री का, बिदुर का लेकिन सब सहारे टूट गए।
- 54:27किसी ने साथ साथ दिया जहाँ पुकारना अपनी व्यर्था को सब गर्दन
- 54:32झुका देते हैं। आखिर में याद आया कन्हैया तुम
- 54:41कहाँ गए महाराज करो मत दी रे दुख हर द्वार का अनाथ शरण मैं तेरे पर
- 54:50जब कोई उसकी शरण में आ जाता है कब आता है?
- 54:56जब सारे सारे जवाब दे देते हैं निरवलम्ब सभी अवलंबन सभी सहारे
- 55:04टूट जाते हैं। तुम बेसहारा हो जाते हो, निर्बल
- 55:08के बलराम और राम थाम लेते हैं। कृष्ण ने थाम लिया द्रोपदी को।
- 55:17कहानी है साड़ी का चीर बढ़ा दिया, थक गए, दुशासन खींचते खींचते
- 55:24महाबरी था, लेकिन थक गया इतनी सड़ी कहानी है इसके भीतर बड़ा
- 55:30गहरा राज़। या कुरखे मेरा सतगुरु प्यारा, उसे
- 55:43कौन है मारणहारा? चाहे जग बने दुश्मन सारा, उसे कौन
- 55:57है मारण हरा जा को राखे मेरा सतगुरु प्यारा।
- 56:07उसे कौन है मारण चाहे जग बने दुश्मन सारा, उसे कौन है मार?
- 56:22हाँ कौन मार सकता है उसे? इस कहानी के भीतर जलेबी की तरह रस
- 56:29है। ऊपर से ये समझ नहीं आ रही
- 56:31बुद्धिवादी लोग कहेंगे यह उपन्यास है ये तो आज लोग ऐसे हैं जो कहते
- 56:37हैं रामायण और महाभारत जस्ट लाइक ए नॉवेल उपन्यास नहीं है भाई।
- 56:45मैंने स्वयं अपनी आँखों से निहारा, भगवान राम को और भगवान
- 56:49कृष्ण को, बुद्ध और महावीर को मैं नहीं निहार पाया।
- 56:54कुछ वक्त का ऐसा तो कहा जा रहा होगा लेकिन कृष्ण भगवान को और राम
- 57:01भगवान को इन आँखों ने निहारा। ओह, श्यामल भरण प्रसंग बहुत गहरा
- 57:09हो जाएगा नीला रंग बड़ा प्यारा रंग उसको देखकर ही आँखें द्रुप्त
- 57:17होती हैं उसको देखकर ही बिरहा की आग भीतर जलती।
- 57:24उसी सांवरे को पुकार रही है मीरा और खूब से मर जाती है।
- 57:33जो मैं ऐसा। जान के प्रियत किए दुःख हो नगर
- 57:54ढिंढोरा। ित नगरियो को जो मैं ऐसा।
- 58:15जान ति ब्रेतक हैं दुःख हो नगर डंडोरा।
- 59:01रोती भी है आंसू थमने का नाम नहीं लेता है बिरहा की मारी बेचार
- 59:09मीरा। यह कुछ कहने को विवश हो जाती है।
- 59:16मेरी सांवरिया आय आने को कह दे, आयन शून्यवास से आगे आएगा, प्रेम
- 59:26संलिप्त, प्रेम छूट गया बुद्धि और हृदय के बाहर नहीं आ सकता।
- 59:32उसकी मजबूरी है। एक होता है निर्लिप्त प्रेम।
- 59:37वो शून्य से बाद में आएगा निर्लिप्त प्रेम, अकारण प्रेम और
- 59:43तुम्हारा स्वभाव है, जब कभी अचानक तुम्हारा हृदय तुम्हारा रोवा रोवा
- 59:49अचानक किसी के प्रति प्रेम से मर जाए।
- 59:53तो तुम समझना तुम उस तन पर खड़े हो जिसका मैं जिक्र कर रहा हूँ अब
- 1:00:01जब कभी अकारण प्रेम, दया, सहानुभूति, करुणा तुम्हें आनी
- 1:00:07शुरू हो जाए, किसी के प्रति तो समझना।
- 1:00:11मैं उस स्तर पे आ गया आ गई जिसकी मैं बात कर रही हूँ नहीं लिप्त
- 1:00:21प्रेम से आगे तुम चलोगे तो प्रेम ठीक हो जाएगा, फिर आएगा आनन्द।
- 1:00:31आनंद अब यहाँ समझ लेना आनंद और सुख में बड़ा फर्क है।
- 1:00:40अक्सर लोग सारा संसार सुख को ही आनंद समझ लेता है।
- 1:00:48अब इसके डिफरेंस को समझ लीजिए, पहले सुख व्हाट?
- 1:00:55इस सुख सुख एक उत्तेजना है जस्ट स्ट्यू मोडेशन वह एक उत्तेजना है
- 1:01:06जो कि इंद्रियों के माध्यम से आती।
- 1:01:09जीवा पर स्वादिष्ट पदार्थ रखोगे। जीवा के तंतु तुम्हें बता देंगे
- 1:01:20यह खट्टी मेठी कड़वी। नीरस कुछ भी नहीं है टेस्ट बड्स
- 1:01:32तुम्हें बता देंगे तंतु तुम्हें बता देंगे तो यह उत्तेजित किया उस
- 1:01:38पदार्थ में जा के तुम्हारी जीव के बड्स को।
- 1:01:45सुख एक उत्तेजना कण भी उत्तेजित होते हैं जब मधुर स्वर कोइल के
- 1:01:54दिन भी मीठी गाती है, लेकिन है उत्तेजना?
- 1:02:02प्रभु नाम कितना भी मीठा हो लेकिन है एक उत्तेजना।
- 1:02:08उस उत्तेजना को तुम सुख समझ लेते हो, यही एक भूल है जो प्रेमी भी
- 1:02:17करता है जो साधक भी करता है। सुख इजस कम्बलेषण और यह
- 1:02:25इन्द्रियों के द्वारा ली जाती है आँखों से सुंदर दृश्य देखा सुंदर
- 1:02:32दृश्य तुम्हें उत्तेजित करके तुम्हें बहुत अच्छा लगा।
- 1:02:37तुम रोज़ उसे हिल स्टेशन पे जाओगे।
- 1:02:40चलो चलो, घूमने चले कुल्लू, मनाली चलो स्विच चले चलो कसौली चले,
- 1:02:55ठंडी हवाएँ बैठती। तुम रोज़ जाओगे, बट इट्स ए
- 1:03:02सिम्युलेशन, इंद्रियों की स्टिमुलेशन, सुंदर नजारे
- 1:03:09स्टिमुलेशन इसे सुख कहते हैं। मैं जीस आनंद की बात कर रहा हूँ
- 1:03:19दैट इस नॉट ए स्टिमुलेशन नॉन स्टिमुलेशन आनंद जहाँ कोई
- 1:03:25स्टिमुलेशन नहीं है कोई उत्तेजना नहीं है परम शांति है कोई तंतु
- 1:03:30उत्तेजित नहीं होता, वहाँ कोई टेस्ट बड।
- 1:03:34उते जितनी होता कोई आँखें उते जितनी होती दृश्य को देख कोई
- 1:03:40इंद्रियों के स्वाद नहीं है इंद्रों के स्वाद को तुम सुख कहते
- 1:03:44हो तुम्हारी भाषा लेकिन जहाँ स्टिमुलेशन नहीं है व्हेर देर इस
- 1:03:52ए नॉन स्टिमुलेशन। जहाँ उत्तेजना नहीं है, वहाँ है
- 1:03:57आनंद तो इस परभाषा को आप ठीक से समझ लेना सुख इस नॉट आनंदा सुख इस
- 1:04:08जस्टिस सुमेंटेशन डे को तेजना है सुख।
- 1:04:12आनंद इस नॉट स्टिमुलेशन उत्तेजना नहीं है, शांति है, इतना आनंद है
- 1:04:20और सुख से इसका कोई मुकाबला नहीं होता क्योंकि दोनों की क्वालिटी
- 1:04:26में फर्क है। डिफरेंस ब्रिटेन क्वालिटी?
- 1:04:32नॉट बिट्वीन क्वांटिटी बहुत मात्रा का सुख बहुत मात्रा का सुख
- 1:04:41तुम्हें आनंद में नहीं देखा जाएगा और आनंद कभी सुख नहीं बन सकेगा।
- 1:04:50ये दोनों कैनट बी कन्वर्टेड इनटू ईच ऑदर ना सुख हैप्पिनेस आनंद में
- 1:04:58तब्दीर हो सकेगा ना आनंद सुख में तब्दीर हो सकेगा।
- 1:05:03विकास क्वांटिटेटिव फर्क नहीं है। क्वालिटेटिव फर्क है, गुणात्मक
- 1:05:11फर्क है, गुणात्मक क्या फर्क है? सुख उत्तेजना है, उत्तेजना ज्यादा
- 1:05:20है तो ज्यादा सुखी हो जाओगे, उत्तेजना कम है तो कम सुखी हो
- 1:05:25जाओगे। लेकिन आनंद अब जहाँ हम प्रवेश किए
- 1:05:31हैं उसमें उत्तेजना नहीं है नॉन स्टिमुलेशन वहाँ कोई उत्तेजना
- 1:05:41नहीं है और उत्तेजना का मतलब कोई हलचल रहित।
- 1:05:48अवस्था वहाँ कोई हलचल है, सब ठहर जाता है पर माँ यह वो तल है जिसकी
- 1:06:02बात करता है ये तंत्र का सूत्र। वहाँ चले जाओ, अंतस के उस तल पर
- 1:06:13चले जाओ, अंतस जैसे हो जाओगे, अंतस क्या है, वहाँ कोई द्वन्द
- 1:06:27नहीं है। तुम्हारे तो यहाँ द्वंद्व है, सुख
- 1:06:33है तो दुख भी है, हर्ष है तो शोक भी है, खुशी है तो गमी भी है,
- 1:06:44अमृत है तो जहर भी है। पीड़ा है तो पीड़ा रहित का भी है।
- 1:06:52रोग है, तो निरोगता भी है सवस्थ भी है जहाँ द्वंद है वहाँ सुख और
- 1:07:01दुख यह जोड़ा है कपट सिक्के का एक।
- 1:07:08पहलू सुख और सिक्के का दूसरा पहलू दुख लेकिन आनंद का कोई पहलू नहीं
- 1:07:16होता। अंध यक तरफ़ा है, जैसे कोई सिक्का
- 1:07:20हो, उसका दूसरा पहलू ही न हो ऐसा आनंद है।
- 1:07:29इसका विपरीत कुछ नहीं आनंद में चले जाओ, अपने अंत में जाओ और अंत
- 1:07:41से जैसे हो जाओ, वो तो सामान्य संबंध में है।
- 1:07:48इसको बराबर कर लो। आप सुख है एनएसीएल की तरह नमक की
- 1:07:56तरह तुम घुल सकते हो, मिल नहीं सकते, मर्ज नहीं हो सकते।
- 1:08:01यू कैन डिसेल्व इंटू वाटर अगर नमक हो तो।
- 1:08:07बट कैनट मर्ज इंटू वाटर कैनट बी ओशन ओशन कौन हो सकता है?
- 1:08:15एच टू ओह की बूंद एच टू ओह का समुद्र हो सकती है।
- 1:08:21पानी की बूंद समुद्र में समा कर समुद्र हो जाती है।
- 1:08:27यही कहता है ये सूत्र शिव सूत्र तंत्र सूत्र अंत से जैसे हो जाओ
- 1:08:35अंत से कैसा है तुम्हें व्यख्यात किया मैंने वह विख्यात किया तो
- 1:08:41नहीं जा सकता। लेकिन मैंने शब्दों से विख्यात
- 1:08:45करने का प्रयास किया है क्योंकि तुमने आनंद की एक झलक कभी देखी
- 1:08:51नहीं तुमने आनंद का एक बूंद भी कभी नहीं पीया पैदा तो बहुत दूर
- 1:08:59की बात है। और कबीर तो प्यारा भी जाता है,
- 1:09:05कबीर तो मटका भी जाता है। सुर तो कलारी भाई मत भा री सुरत
- 1:09:20कलारी। सूरत मदबा पी।
- 1:09:40जाती है। गढ़ा पी जाती है।
- 1:09:42अगस्त से समुद्र पी गया फिर भी प्यास और ज़रा सी दे दे साकी।
- 1:09:57कैसे रहूं चुप के मैंने पी ही क्या?
- 1:10:00है। होश भी तक है बाकी और ज़रा सी दे
- 1:10:11दे साखी और। ज़रा सी अगस्त।
- 1:10:15समुद्र पी लेते है और ज़रा सी दे दे साखी।
- 1:10:22और ज़रा सी। ओह, कैसे रहूं चुप के मैंने पी ही
- 1:10:29क्या होश? भी तक है वा के भी और ज़रा सी दे
- 1:10:39दे सके और ज़रा सी। होश वाकी नहीं रहता, वहाँ जाकर
- 1:10:46तुम खो जाता, वहाँ जाकर विराट हो जाता है, बूंद खो जाती है तो बूँद
- 1:10:56मठ नहीं जाती है, समझे ना बूँद मर्द हो जाती है।
- 1:11:02वहाँ जाकर तुम खो जाते हो, तुम मर्ज हो जाते हो तो सुमित्र हो
- 1:11:06जाते हो, खो नहीं जाते ये समझ लेना तुम्हारा वजूद बना रहता है।
- 1:11:12पहले बूंद की तरह था, अब सूत्र की तरह हो गया, अब अनंत हो गए।
- 1:11:17अब विराट हो गया, विशाल हो गया, अब लिमिटलेस हो गया।
- 1:11:24लिमिटेड बूंद लिमिटेड थे टु लिमिटलेस अब सुमित्रों का है बूंद
- 1:11:33समानी समध में फ्रॉम लिमिटेड टु लिमिटलेस।
- 1:11:41यही सा अंत से जैसे हो जाओ इसको याद रखना, हृदय में उतार लेना अंत
- 1:11:53से कैसा मैं बता दिया। पतंजलि के दो सूत्रों जैसा हाँ,
- 1:11:58अंत से है और अंत से ऐसा कि तुम अंत से में जाके अंत से ही हो
- 1:12:05जाओगे, जैसे भक्त भगवान में जाकर भगवान हित हो जाएगा।
- 1:12:14बूंद समुद्र में जाकर बूंद समुद्र में जाकर समुद्र ही तो हो जाती
- 1:12:19है। उसका वजूद बूंद की तरह कहाँ रहता
- 1:12:25है, उसका वजूद लिमिटलेस की तरह हो जाता है, समुद्र की तरह हो जाता
- 1:12:30है। तुम्हारा अस्तित्व मिटेगा, याद
- 1:12:35रखना, लेकिन घबराना नहीं वह मुझे याद कर लेना मामू स्मर और खो जाना
- 1:12:49क्योंकि मैं जानता हूँ जो खो जाएगा।
- 1:12:52वह हो जाएगा जो खो जाएगा वह हो जाएगा तो अगस्त से और भी मांगते
- 1:13:02हैं समुद्र पी जाते हैं, लेकिन समुद्र कम है और फैला दे।
- 1:13:13और पिलाते फ्रॉम लिमिटेड, तो लिमिटलेस धन्यवाद।